पीयू कायर पधारिया अरियों आगळ भाग।फट जावे धरा धसूं मिल जावे गर माग।।
हूं खप जाती खग तले, हूं कट जाती उण ठौड़।
बोटी बोटी बिखरती पण रहती रण राठौड़।।
हेली राजमहल रा दीपक दो बुजाय।
उजासो किणने अजसे पीव घर आया धाय।।
राठौड़ा किम रण थने भायो नहीं भरतार।
थे रहवो रंग महल में, मन देवो तलवार।।
राठौड़ रण सूं भागयो शोभे नहीं सुभट्ट।
इण कायरता उपेर रोवे अब रजवट।।
हिवड़ो खूब हरकतो जे आतो कट शीश।
सतियां भेली शोभती सुणो मरूधरधीश।।
साभार:- कविवर श्री हनुवन्तसिंघ देवड़ा पुस्तक का नाम "सिंहनाद"
पिचरंग पाणा री धरती रो , पीतल पातल री धरती रो, मीरा करमा री धरती रो
कितरो कितरो रे करां म्हें बखाण, कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान ...
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर मंजलां भई धर मंजलां
कोटा बूंदी भलो भरतपुर अलवर अर अजमेर
पुष्कर तीरथ बड़ो की जिणरी महिमा चारूं मेर
दे अजमेर शरीफ औलिया नित सत रो फरमान
रे कितरो कितरो रे करा म्हें बखाण, कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान....
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर मंजलां भई धर मंजलां
दसो दिसावां में गूंजे रे मीरा रो गुण गान
हल्दीघाटी अर प्रताप रे तप पर जग कुरबान
चेतक अर चित्तोड़ पे सारे जग ने है अभिमान
कितरो कितरो रे करां म्हें बखाण, कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर मंजलां भई धर मंजलां
उदियापुर में एकलिंगजी गणपति रंथमभोर
जैपुर में आमेर भवानी जोधाणे मंडोर
बीकाणे में करणी माता राठोडा री शान
कितरो कितरो रे करा म्हें बखान कण कण सूं गूंजे जय जय राजस्थान
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर मंजलां भई धर मंजलां
आबू छत्तर तो सीमा रो रक्षक जैसलमेर
किर्ने गढ़ रा परपोटा है बांका घेर घूमेर
घर घर गूंजे मेड़ततणी मीरा रा मीठा गान
कितरो कितरो रे करां म्हें बखाण, कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर मंजलां भई धर मंजलां
राणी सती री शेखावाटी जंगळ मंगळ करणी
खाटू वाले श्याम धणी री महिमा जाए न वरणी
करणी बरणी रोज चलावे बायेड़ री संतान
कितरो कितरो रे करा म्हें बखाण, कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर मंजलां भई धर मंजलां
गोगा पाबू, तेजो दादू , झाम्बोजी री वाणी
रामदेव की परचारी लीला किण सूं अणजाणी
जैमल पन्ना भामाशा री आ धरती है खान
कितरो कितरो रे करा म्हें बखाण, कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर कुंचा भई धर मंजलां
धर मंजलां भई धर मंजलां
कोई घोडो कोई पुरखडों, कोई सतसंगी नार।
सरजण हारे सिरजिया, तीनूं रतन संसार।।
जौधाणे री कामणी, गोखां काढै गात।
मन तो देवां रा डिगै, मिनखा कितीक बात।।
जोधाणो जसराज रो, खूबी करे खलक्क।
खावण पीवण गांठ रो, देखण री हलक्क।।
मारु थारा देस में, निपजे तीन रतन।
एक ढोला दूजी मारवण, तीजो कसूमल व्रन्न।।
खग धारां थोड़ां नरां, सिमट भरयो सह पाण।
इण थी मुरधर तरळ जळ, पाताळां परवांण।।
राजस्थानी हु प्रेम करणीया चावे तो, ब्याव-शादी री कूकू पत्री राजस्थानी मा छीपा सके |
इऊ आपणो अर् आपणी भासा रो मान बधसी| घणी मेनत हु इक कू-कू पत्री लाधी,
बीरो नमूणौ देऊ हु ।
< ईष्ट देब रो मंतर >
श्री ****** री घणी किरपा हु
<बींद रो नाम >
<बाप-दादा रो नाम अर् ठिकाणौ>
व
<बधू रो नाम >
<बधू रा बाप-दादा रो नाम अर् ठिकाणौ >
रो शुभ-ब्याव
<मास बार तारीख > न होवाणों तय हुयो हे ।
म्हे हाथ जोढर घणेमाण हु आपणे अरज करा के ब्याव रे इण
मांगलिक ठाणे माथे राज रे पधारिया ही म्हारी शोभा व्हेलासा ।
*ब्याव रा नेगचार *
बान <तारीख > <समय >
भात <> <>
सामेळो <**> <**>
<बच्योडा कार्य-करम >
ठाणो : <कालोनी , शहर >
<जान रो ढूकबा रो समय >
पधारण री बाट जोवता
<बींद रे बडा रो नाम >
दर्शाणा रा कोडारू
<बींद रे बिराओ रो नाम >
दर्शाणा न उडिकता
<बींद रे ठेठू आला रो नाम >
Rajasthani Vaata
पिया सूं मलबां गांव चली, म्हारे पग में पड ग्या छाला रे।
रिमझिम........
भरी ज्वानी म्हांने छोड गया क्यूं, जोबन का रखवाला रे।
सोलह बरस की रही कुंवारी, अब तो कर मुकलावां रे।
रिमझिम...........
घणी र दूर सूं आई सजनवां, थांसू मिलवा रातां रे।
हाथ पकड म्हांने निकां बिठाया, कान में कर गया बातां रे।
रिमझिम.......
हिरा वैरागर हुएं, चारण मारु देस।
भाट फिटक संखोटिया, कोहमी सकळ परवेश।।
जो न जळमतो जोगडो, तो कुण आ रीझ करंत।
मांगण मेढीं बैल ज्यूं, मूंडो बांध मरंत।।
जोगो किणी न जोग, सजोगो कियो सकव।
लाठा चारण लोग, तारण कुल सत्रियां तणौं।
नदी बहतों जाय, साद ज सांगरिएं दियो।
केजो म्हारी मांय ने, कवि ने देवे कांबळी।।
इसर री आवाज, सांगा जळ थळ सांभलै।
कांबळ दैवण काज, वैगो कर जळ वीस वयंण।।
सांगो गौड़ सिरै, थासू यदुनाथ ठाकरां।
इणरी रीस न थाय, दे उणरा देवळ चढै।।
दिनी रजा यदुनाथ, सांगा ने बाछां समेत।
राखी पथ मरजाद, सेवक इसरदास री।।
टूटे बाजूडा री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
टूटे बाजूबंद री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
कोई पंचरंगी लहेरिया रो पल्लो लहेराए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए
टूटे बाजूडा री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
टूटे बाजूबंद री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
कोई पंचरंगी लहेरिया रो पल्लो लहेराए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए
लागी प्यारी फुलवारी आतो झूम झूम जाए
ल्याई गोरी रो संदेशो घर आओ नी सजन
बैरी आंसुडा रो हार बिखर नही जाए
कोई चमकी री चुंदरी में सळ पड़ जाए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो री बयारिया
झालो सहयो नही जाए
शहर बाजार में जाइजो हो बना जी हो राज
पान मंगाय वो रंगतदार बनजी बांगा माहे
पांन खाय बनी सांभी सभी, बना हजी हो राजे
बनो खीचे बनी से हाथ .. हो बांगा माहे
हाव्यलड़ों मत खीचों बना जी हो राजे
रुपया लेस्सूँ सात हजार .... हो बांगा माहे
ऊधार फुझाब मैं नहीं करां हो राज
रुपया गिगलां सात हजार ... हो बांगा माहे
शहर बाजरां मती जाइजो हो राज
म्हांने परदेसी रो कांई रे विसवास .. हो बांगा माहे...
एक गांव मे भोजा नाम रौ मिनख रैवतौ हौं। उणरी लुगाई रौ नाम केसरी हौ। कैसरी घणी लड़ाक ही। दोनूं आपरै घर सूं न्यारा रैवता हा। घर में वै सिरफ तीन मिनख हा। अेक टाबर भी हौ। रात दिन बात-बात में लड़ाई करणौ तौ केसरी रौ सौक हौ। भोजौ इण बात सूं घणौं कायौं व्हैतौ। वौ केसरी नै घणी समझाई। पग पकड़िया, हाथा-जोड़ी करी। उणरै मां-बाप सूं बात करी। छोरी री मां अर बाप उणनै समझाई। लाड़ेसर, अे थ्हारा धणी हैं। धणी भगवान समान व्है, इणरी सेवा करणौ थ्हारौ धरम हैं। पण केसरी नै किणी बात रौ फरक नीं पड़ियौं, वा तौ आपरी मरजी री मालकिन ही। साधु-मातमा कना सूं भी उपाय करवाया पण वा तौ लखणौ री लाड़गी ही। भोजा रा मां-बाप अर बहना उणनै आंख देवता ही नीं सुवाता। भौजों कितरी बार मरन री कोसिस करी, पण वा कैवती अबै यूं नीं करू ? म्हारी गलती व्हैगी। भौजौं घर सूं जावण री बात करतौ तौ वा मरण-मारण री धमकी देवती। कितरी बार कपड़ा में आग लगाय देवती। भाजा अर उणरा परिवार नै घणी भूंडी बोलती। रोज-रोज रा झगड़ा सूं कायौं व्हैनै भोजो सोचियौं कै अबै यूं नी चालैला। इणरी धमकिया सूं डरगियौ तौ म्हारौ जमारौ खराब व्है जावैला। औ विचार नै वौ केसरी सूं कह्यौं, म्हैं तौ जा रियो हूं, अबै थू अेकली रै सुख सूं। केसरी घणा ही नाटक करिया। भोजा थूं घर सूं ग्यौ तौ मर जाऊंला। मां-बाप तौ मुंडौ घालैला नीं। भौजौ इण बार अेक नीं सुंणी। जिण समै भौजौं घर छोड़ण री बात करी ही, वा आटौं गूंद री ही। वा कुंड़ौ उठायनै भोजा रै माथा माथै मार दियौं। बापड़ौ भौजौ वठै ही बैठ ग्यौ अर कह्यौं, बस कठी दूंजी जगै मत मार दीजै, म्है कठी ही नीं जाऊंला।
भोजै भजंगी मारी, कम्मर लीनी कस।
क्ेसरी कुंडै की मारी, भाजौ बौल्यों बस।
पण कैसरी नीं मानीं। इण बार वा माथा मंे वार करियौ अर भौजा रौ जीव निकलग्यौं। भौजौ मरियों तौ घणी पछताई, टाबर अनाथ व्यैगियौं। पण अबै की व्हैं। अबै उणनै नीं तौ घर वाला नीं पीर वाला मुंडौ घालता। क्यूंकि सगळा उणरा लखण जाणता। इण कहाणी सूं आ सीख मिलै कै घर में लड़ाई झगड़ा परिवार नै खराब कर दैवे। लुंगाई घर में लिछमी रौ रूप व्हैं, उणनै आपरी मर्यादा में रैवणौ चाहिजें।
एक ऊंदरा री नगरी हीं। उणमें घणा सारा ऊंदरा रैवता हा। वठै जगै-जगै उणरा घणा सारा बिल हां। एकर वठा सूं हाथियां रज्ञै झुंड पाणी पीवण सारू निकलियौ। ऊंदरा झुंड नै देखियौं तौ उणमें खलबली माचगी। अबै करै तौ कांई। इण पर सगळा विचारियौं कै हाथियां सूं बात करणी चाहिजे। ऊंदरा रौ सरदार हाथियां कनै गयौ अर हाथ जोड़नै अरज करी कै महाराज, औ ऊंदरां रौ मुलक हैं। अठैं ऊंदरा रां घणा सारा बिल हैं। आप राग अठै पडग्या तो हाहाकार मच जावैला। आप किरपा करनै दूजी जगा पधार जावौ। आपरी घणी किपरा व्हैला। हाथियां नै आ बात जचगी कै बापड़ा यूं ही मारियां जावैला। वै सिरदारा री बात मान नै दूजीं जगै सारू व्हिर व्हिया। इण पर ऊंदरां रो सरदार कह्यौ, महाराज आप घणी किरपा करी हौं। जद कदैई आपनै जरूरत पड़े, म्हानै जरूर याद करजौ। म्हैं जितरी व्है सकैला उतरी आपरी मदद जरूर करूंला।
ऊंदरां रै सरदार री बात सुण हाथियां नै हंसी आयगी। बापड़ा उंदरा म्हारी कांई मदद करैला। व्है हंसता-हंसता ही व्हिर व्हिया अर कह्यौं जरूर याद करांला। घणौं टेम निकलियौ। एक दिन सिकारी रै जाल सूं हार्थी एक मोटा खाड़ा रै मांय पड़ ग्या। खाड़ा में पड़णै सूं हार्थी रौ बल बेकार व्हैगियौ। घणी कोसिस करी पण सगळी बैकार गई। जद उणनै ऊंदरां रे सरदार री कयोड़ी बात याद आई। वौ उणी टैम सरदार नै याद करियौं। याद करता हीं ऊंदरां रौ सिरदार वठै पूंग गयौं। हार्थी री दसा देख वौ कह्यौं, महाराज, म्है आपरा थोड़ा और सार्थी लेय‘र आंऊ। म्हैं सगळा मिल नै आप नै निकाल देवाला। इण बार भी हार्थी हंसिया बिना नी रै सकियां। ऊंदरां रौ सिरदार गयौ अ‘र सगळी परजा नै वठै बुला ली।
सरदार रै आदेस रै मुजब सगळा वठै पहुंचिया अर खाड़ा में धूल भरण लागा। ऊंदरां रै पगा में इतरी धूड़ ही कै अंधेरौ पड़ ग्यौ। हाथी आपरा पगा सूं धूड़ सू खाड़ौ भरण लागौ। ज्यूं-ज्यूं धूड़ पड़ती री खाड़ौ भरतौ गयौ। थोड़ी दैर रै मांय ही खाड़ौ भर ग्यौ। हाथी बारै निकलग्यौ तौ आपरी सूंड में उठायर ऊंदरां रै सरदार ने आपरै गले लगायौ अर उणनै धन्यवाद दियौ। हार्थी नै आ बात समझ आयगी कै दुनिया में कोई छोटो नीं व्हिया करै। मुस्किल री घड़ी मंे कोई भी एक दूजा रौ साथ दे सके। हाथी आपरी नगरी अर ऊंदरां आपरी नगरी सारू व्हिर व्हिया।
कठै गमग्या है वै इतरा आखर
गुनहगार गजला रा आखर हैं कुचमादी, श्रीमाली सुरगां सूं म्हारो गांव वालो है।
सळवटा मीटणी हैं, मूंडे जो समाज रे है, हाडी राणी वालों देश जग सूं रूखाळो है।
साहित्य सूरज बण, मेटणो है जड़ा मूल, जन मन व्यापो जो भी अंधकार काळो है।
साहित्य सूरज रामेश्वर री उड़ान देख, साचाणी लागै अबै बावनो हिमालो है।
-साहित्यकार रामेश्वरदयाल श्रीमाली को श्रद्धाजंलि स्वरूप भीनमाल में व्याखाता अरूण दवे ने ये पक्तियां लिखी। जिनमें श्रीमाली की सभी पुस्तकों के नाम शामिल हैं।
साहित्यकार रामेश्वर दयाल श्रीमाली के निधन पर साहित्य जगत और अन्य लोगों ने जताया शोक। कहा- श्रीमाली ने शुरू की थी राजस्थानी भाषा के लिए संघर्ष की यात्रा। अपने साहित्य की बदौलत दिलाया राजस्थानी को मान सम्मान। अंतिम संस्कार में उमड़े लोग।
कठीनै गमग्या है वै बावळा आखर
मूडां मायं सूं एक हरफ नीकलतो हो- देस
अर मूडां री माळा गूंथीजती ही च्यारूमेर
थमती ई कोनी हो माथा देवणिया रो रेळो
मां कैवतां ई जागतो हो नेह अर बलिदान
मुलक सारू मिटता ही माथा
लूळा साटै बिकता हा माथा
कठै गमग्या है वे आखर
असल उन्मादी अरथावाळा आखर।
अपनी राजस्थानी कविता कुचमादी आखर में ही लाईनों के माध्यम से समाज में आ रहे बदलाव, खत्म होते रिश्ते और भावनओं समेत अन्य समाप्त होती परंपराओं पर तीखी चोट करने वाले साहित्यकार रामेश्वर दयाल श्रीमाली बुधवार को पंचतत्व में विलीन हो गए। उनका मंगलवार शाम को निधन हो गया था। कुचमादी आखर नामक इस कविता संग्रह में उन्होंने बताया था कि अपनापन भरे और भावनाओं से ओतप्रोत आखर आज मिट गए हैं। श्रीमाली के निधन का समाचार सवेरे जैसे ही लोगों तक पहुंचा किसी को विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि एक दिन पहले तक ही लोगों ने उन्हें हमेशा की तरह उत्साह के साथ बात करते हुए देखा था।
सरलता और सादगी
सरलता और सादगी ही श्रीमाली की पहचान थी। उन्होंने लगभग तीन साल तक साहित्य की साधना की, लेकिन कभी भी निराशा और घमंड को अपने पर हावी नहीं होने दिया। साहित्य के क्षेत्र में भी राजस्थानी भाषा के लिए उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। ७६ वर्ष की आयु में भी वे अक्सर बाहर होने वाले साहित्य सम्मेलनों में भाग लेते और शेष समय घर पर बच्चों के साथ खेलकर और नवीन साहित्य सृजन में बिताते थे। साहित्य के माध्यम से उनका व्यंग्य तीखी चोट करता था।
साहित्यकार ही नहीं प्रेरक भी
जालोर में उनकी पहचान एक साहित्यकार के रूप में ही नहीं बल्कि वे कई युवा साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्रोत भी रहे। उन्होंने कई युवाओं को साहित्य सृजन के लिए तैयार किया और मार्गदर्शन भी दिया।
-उनका साहित्य मन पर चोट करता था। कविताओं की पक्तियां नया जोश भर देती थी। वे खुद ही साहित्य की साधना नहीं करते थे बल्कि अपने छोटे कई युवाओं को उन्होंने प्रेरित किया। जिनमें मैं भी शामिल हूं। उनकी प्रेरणा से ही मै साहित्य सृजन कर पाया। निराशा को उन्होंने कभी स्वयं पर हावी नहीं होने दिया। यही कारण था कि जब भी उनके पास जाते वे सदैव नए जोश से भरे हुए रहते थे।
-पुरुषोत्तम पोमल, साहित्यकार, जालोर
-उन्होंने साहित्य का जो सृजन शुरू किया वह उनके निधन तक अनवरत जारी रहा। पिछले तीन दशकों में मंैने उन्हें कभी ठहरा हुआ नहीं देखा। हमेशा वे चिंतन करते और कुछ ना कुछ लिखते रहते। समाज में व्याप्त बुराइयों के प्रति उनका दृष्टिïकोण व्यापक था। जिसे उन्होंने अपने साहित्य में भी उतारा। व्यंग्य भी किया तो इतना सटीक कि सीधा मन पर चोट करता।
-अचलेश्वर आनंद, साहित्यकार, जालोर
-राजस्थानी भाषा के लिए उनका योगदान सदैव याद किया जाएगा। इस भाषा में लिखी उनकी कई पुस्तकों का हिंदी और बंगाली में अनुवाद हुआ। राजस्थानी शब्दों का उन्होंने जिस प्रकार से उपयोग किया है उसके बाद उनका साहित्य लगातार पढऩे का मन करता है। साथ ही राजस्थान दिवस के दिन ही उनका मौन हो जाना एक संयोग ही है।
-अशोक दवे, जनसम्पर्ककर्मी, जालोर
-जीवन के सरोकारों से जुड़ी रचनाएं जुड़ी हुई थी। मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत थी। कविता और कहानी दोनों क्षेत्रों में आम व्यक्ति को पीड़ा और भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रदान की थी।
-अरूण दवे, व्याख्याता, जालोर
नम आंखो से किया विदा
श्रीमाली का अंतिम संस्कार सवेरे करीब साढ़े नौ बजे समाज के श्मशान घाट में किया गया। इससे पूर्व चामुंडा मंदिर के समीप स्थित उनके निवास से अंतिम यात्रा शुरू हुई। जो अस्पताल चौराहा, सूरजपोल होते हुए श्मशान घाट पहुंची। वहां उनके ज्येष्ठï पुत्र विश्वनाथ श्रीमाली ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान वरिष्ठï लेखाकार ईश्वरलाल शर्मा, साहित्यकार पुरूषोत्तम पोमल, बाबूभाई व्यास, अचलेश्वर आनंद, मधुसूदन व्यास, ऋषिकुमार दवे, भीनमाल से व्याखाता अरूण दवे और अशोक दवे समेत कई लोग मौजूद थे।
राजस्थांन दिवस मनावण री मन मांय उमक जागी, अेक’र पाछौ टटोळ्यौ जकौ पोसाळां मांय बांच्यौ हौ. राजस्थांन कंया बण्यौ अर इणरौ इतिहास कांई हौ.
सब देख’र लागौ कै फक्त इणरौ नांव इज राजस्थान पड़यौ छै, राजस्थान मांय रेवणीयौ राजस्थानी कुहावै पण वौ ई फक्त नांव रौ राजस्थांनी, उणनै उणरी भासा अर संस्क्रती सूं हेत राखण रौ हक ईं नीं दियौ भारत सरकार.
सरदार पटेल राजपुतानै रै सगळा राजावां नै लाळा-लुंभा करनै अर वांनै वांरी अर वांरै रईयत (प्रजा) री भलाई बताय’र भारत मांय विलय वास्तै राजी कर दिया. इणरै साथै ईं अठा री संस्क्रती, अठा री सभ्यता, रीति रिवाज सैं कीं खतम कर दियौ. भारत मांय विलय रै साथै ईं आपां आपणी हजारूं बरसां री परंपरा, भासा अर संस्क्रती रौ राष्ट्रीय अेकता अर अखंडता रै नांव पर आपां समर्पण कर दियौ.
राजस्थांनी भारत मांय सबसूं विशाळ भाग मांय बोली जावण वाळी भासा छै. आ भासा आखै राजस्थांन, मध्य प्रदेश रै माळवै, उत्तर गुजरात, पाकिस्तान रै सिंध, थारपारकर अर पंजाब रा घणकरा इलाकां, हरियाणा अर इणरी अेक बोली गुजरी तौ कश्मिर, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चेकोस्लाविया अर सोवियत रुस रा घणकरा देसां मांय बोलीजे.
भारत सरकार राजपुतानै नै राजस्थांन नांव तौ दे दियौ, पण राजस्थांन रा प्राण अठा री भासा नै मानता नीं दी. राजस्थांन री सगळी बोलियां सूं मिळ’र जै भासा बणै वा अेक राजस्थांनी नै इण री बोलीयां रै हिसाब सूं तोड दी अर इणनै हिंदी भासा री अेक बोली बताय दि.
भारत सरकार नै औ डर ई सतावै कै जिण हिंदी भासा नै राष्ट्रभासा बणावण रौ वा सुपणां देखै छै, अर बोलै छै कै आ भासा दुनीया री तीजी सबसूं ज्यादा बोली जावण वाळी भासा छै. राजस्थानी भासा नै मान्यता मिळ जावै तौ इण भारत सरकार री आ बात झुठी हु जावै, क्युं कै राजस्थांनी अेक स्वतंत्र भासा रै रुप मांय भारत री सबसूं ज्यादा बोली जावण वाळी भासा छै.
राजस्थान रै भारत मांय विलय सूं राजस्थांन नै अेक हिसाब सूं गुलामी इज हाथ लागी है. भारत मांय रेवता राजस्थांनीयां नै आपरी भासा वापरवा रौ इधकार कोनीं, जिणसूं वांनै वांरै राज्य मांय भासा रै आधार पर मिलण वाळा सगळा हकां सूं हाथ धोवणा पडे छै. राजथांनीयां नै वांरै खुद रै राज्य मांय नौकरी नीं मिळै. दूजा राज्यां रा हिंदी भासी आय’र अठै नौकरी करै अर आपणा राजस्थांनी भाई प्रदेसा कांनी न्हावै.
दूजी कांनी पोसाळां मांय शिक्षा हिंदी भासा मांय हुवण सूं टाबरां नै भणाई मांय तकलिफ आवै. टाबर डाफाचुक व्है जावै कै, घरै तौ वौ दूजी भासा बोलै अर पोसाळां मांय दूजी भासा छै. वौ खुद री भासा नै हिनता री निजर सूं देखण लागै. अेड़ौ टाबर ना तौ हिंदी बराबर सिखै ना ई राजस्थांनी रौ ग्यान हुवै. सेवट ૪-૫ पास करनै वौ पोसाळां (स्कुलां) छोड’र प्रदेशां कांनी मुंडो करै.
राजस्थांन रै भारत मांय विलय सूं अठा रै मानखां नै बेरोजगारी मिळी, लोगां नै आपणी भासा-संस्क्रती रै प्रती हिन भावना मिळी. पछै बतावौ कैड़ौ राजस्थांन दिवस. हकिकत मांय तौ ૩૦ मार्च नै राजस्थांन वासियां नै काळा दिन रै रुप मांय मनावणौ चाईजै. लोग केह्वै इण दिन राजपुतानै री सगळी रियासतां आपस रौ बैर भुलाय’र अेक हूगी, ना आ बात नीं है, राजस्थान सूं पैली जद राजपुतानौ हौ उण समै अेकता अबार रै राजस्थान करता वधारै ही, हर रियासत री राजभासा राजस्थानी ही. लोगां रै कन्नै रुजगार हौ अर आपसरी मांय घणौ भाईपौ हौ.
रहसी राजस्थान, राजस्थानी राखिया ।
Posted by हनवंतसिंघ at 2:00 AM
जन्मे सूत सादल जिसों,आहंसी तपवान!!१!!
"धर गुज्जर वालो धणी ,सोलंकी सिधराव !
बणियो बनदो बनथली,कहिया सुजस कहाव !!
देग तेग भड़ डोडिया ,बांका जगत विख्यात !
ए अनमी अपनाविया,राव धणी गुजरात !!२!!

भारत नै आजाद हुयां 57 बरस होग्या, पण राजस्थानी भाषा नै, जिकी 15 करोड़ (प्रवासी 7 करोड़) लोगां री भाषा है, भारत रै संविधान में मान्यता नहीं देणो - संविधान री घोर अवमानना है। जनतांत्रिक संविधान में संविधान री जड़ पर कुठाराघात कर्यो गयो है, आ घणी चिन्ता री बात है। राजस्थान विधानसभा में राजस्थानी नै सर्वसम्मत संकल्प सैं पारित कर केन्द्रीय सरकार नै भेज्यो, पण बीं पर तानाशाही राजनेता विचार तक कोनी कर्यो, आ राजस्थानियां सारू अपमानजनक बात है। अब समै आग्यो है कै सब राजस्थानी एकजुट होय जन-जागरण वास्तै अभियान सरू करै। ईं अभियान रो पैलो चरण होसी राजस्थानी रै लियै जन-जागरण - अर ईं काम रै लियै राजस्थान रै हर जिलै में एक समिति गठित करी जावै। इण रा कार्यकर्ता तहसीलां अर पंचायत समितियां ताईं लोगां नै राजस्थानी भाषा री महत्ता री जाणकारी देवै अर उणां नै ईं मुद्दै पर सावचेत करै। जन-जागरण नै प्रभावशाली बणाणै सारू कार्यकर्ता पैदल यात्रा करै अर ढाणी-ढाणी ताईं राजस्थानी रो संदेश पुगावै। ईं जन-जागरण रै बारै में गठित समिति 'राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी' नै सही रपट भेजै। ईं रै बाद में दूसरो चरण जन-आंदोलन होसी। ईं आंदोलन में रेल रोको, स्कूल-कालेजां में हड़ताल, वकीलां री ओर सूं अदालतां रो बहिस्कार अर हरेक कस्बै-शहर में राजस्थानी भाषा नै मान्यता नहीं देणै रै विरोध में काळा झंडां रो जलूस निकळै। ईं सारै कार्यक्रम नै पूरो कर कै कम सैं कम 20 हजार आदमी नई दिल्ली पूंचै। जलूस निकाळ कै महात्मा गांधी री समाधि पर धरणो देवै अर अनशन करै। राजस्थान रा जित्ता भी सांसद है, बांकै घरां पर धरणो देवै अर उण सूं इस्तीफै री मांग करै। सागै-सागै संसद में भी ईं मान्यता सारू राजनैतिक पार्टियां सूं प्रस्ताव रखावै। राजस्थान रा विधायकां नै आप रै क्षेत्र में भाषा री अलख जगाणी चायै।
अमेरिका रा भाषा-विद्वान (अमेरीकन कांग्रेस ऑफ लाईब्रेरीज) दुनियां री 13 समृद्ध भाषावां में राजस्थानी भाषा नै भी एक समर्थ भाषा मानी है। राजस्थानी भाषा री उप-शाखावां में हरियाणवी, मालवी, मेवाती, मारवाड़ी, हाड़ोती, ढूँढाड़ी, बागड़ी अर पश्चिम राजस्थान री गुर्जर भाषा मुख्य है। राजस्थान में करीब 72 बोलियां बोली जावै है। कैबत है 'तीन कोस पर पाणी बदळै, 12 कोस पर बोली।' जकी भाषा री जितणी बोलियां अर उप-शाखावां हुवै, बा उतणी ही समर्थ भाषा मानीजै। नेपाल अलग राष्ट्र होतां हुयां भी बठै री नेपाली भाषा में राजस्थानी रा मोकळा सबद है। कारण साफ है कै बठै रो राजवंश राजस्थान सूं जुड़ेड़ो है।
राजस्थान मरुधर देस है। बीं री परम्परा अर संस्कृति भारत रै अन्य प्रदेशां सूं बिलकुल अलग है। बठै रा लोकदेवता, लोकगीत, लोक-गाथावां, खान-पान-पहराण री आपरी अलग विशेषता है। राजस्थान रा पसु-पाखी, बठै रा रूंख सब अलग हैं। इण री सही अभिव्यक्ति राजस्थानी में ही सम्भव है। बठै री प्रेम-कथावां दूजै साहित्य में कोनी। भारत रै इतिहास में राजस्थान आप री न्यारी पिछाण राखै है। बठै सूं राष्ट्रीय स्वतंत्रता रा सब क्रांतिकारी प्रेरणा ली है।
राजस्थानी भाषा नै मान्यता मिले बिना बठै री महान परम्परावां नै, अनूठी संस्कृति नै टाबर किंया जाणसी?
टाबरियां नै किंया हुवैलो, निज धरती रो ज्ञान।
राख्यां चावो जड़ां जीवती, द्यो मायड़ नै मान॥
-कन्हैया लाल सेठिया
(राजस्थानी भाषा मान्यता आंदोलन रा पर्याय-पुरुष श्री सेठिया कोलकाता सूं 21 दिसम्बर 2004 नै अखिल भारतीय राजस्थानी समारोह रासंयोजक श्री रतन शाह रै नांव लिखियोड़ी पाती रो एक अंश।)
-प्रस्तुति- सत्यनारायण सोनी
बोलैनीं हेमाणी.....
जिण हाथां सूं
थें आ रेत रची है,
वां हाथां ई
म्हारै ऐड़ै उळझ्योड़ै उजाड़ में
कीं तो बीज देंवती!
थकी न थाकै
मांडै आखर,
ढाय-ढायती ई उगटावै
नूंवा अबोट,
कद सूं म्हारो
साव उघाड़ो औ तन
ईं माथै थूं
अ आ ई तो रेख देवती!
सांभ्या अतरा साज,
बिना साजिंदां
रागोळ्यां रंभावै,
वै गूंजां-अनुगूंजां
सूत्योड़ै अंतस नै जा झणकारै
सातूं नीं तो
एक सुरो
एकतारो ई तो थमा देंवती!
जिकै झरोखै
जा-जा झांकूं
दीखै सांप्रत नीलक
पण चारूं दिस
झलमल-झलमल
एकै सागै सात-सात रंग
इकरंगी कूंची ई
म्हारै मन तो फेर देंवती!
जिंयां घड़यो थेंघड़ीज्यो,
नीं आयो रच-रचणो
पण बूझण जोगो तो
राख्यो ई थें
भलै ई मत टीप
ओळियो म्हारो,
रै अणबोली
पण म्हारी रचणारी!
सैन-सैन में
इतरो ई समझादै-
कुण सै अणदीठै री बणी मारफत
राच्योड़ो राखै थूं
म्हारो जग ऐड़ो? [‘जिण हाथां आ रेत रचीजै’ से ]
कीडी नगरो सहर है मोटर बंगला कार ।
जठै जमारो बेच कै मिनख करै रूजगार ॥
अजब रीत परदेस री एक सांच सौ झूँठ ।
हँस बतळावै सामनै घात करै पर पूठ ॥
खेत खळा अर रूंखडा बै धोरा बै ऊंट ।
बाँ खातर परदेस के तज देवूँ बैकूँट ॥
देह मशीना मै गळै आयो मौसम जेठ ।
बिरथा खोयी जूण म्हे परदेसा मँ बैठ ।।
ऊमस महीना जेठ रो बो पीपळ रो गांव ।
संगळियाँ संग खेलता चोपङ ठंडी छाव ॥
गाता गीत न गा सक्या करता करया न कार ।
जीतै जी ना जी सक्या मरिया पडसी पार ॥
ठीडै ठाकर ठेस रा ठीडै ही ठुकरेस ।
बिना ठौड अर ठाईचै क्यूँ भटकै परदेस ॥
समरथ जाणु लेखणी सांचो जाणू रोग ।
गावैला जद चाव सूँ दरद दिसावर लोग ।।
सूना सा दिन रात है सूनी सूनी सांझ ।
बंस बध्यो है पीर रो खुशिया रै गी बांझ ।।
हिरण्याँ हर ले नीन्द नै किरत्याँ कैदे बात ।
तारा गिणता काटदे नित परदेसी रात ॥
रिमझिम बरसै भादवो झरणा री झणकार ।
परदेसी रै आन्गणै रूत लागी बेकार ॥
साखीणो संसार है कद तक राखा साख ।
साख राखताँ गांव मँ मिटगी खुद री साख ॥
तन री मौज मजूर हा मन री मौज फकीर ।
दोनूँ बाताँ रो कठै परदेसाँ मँ सीर ॥
ऊंचा ऊंचा माळिया ऊची ऊंची छांव ।
महला सूँ चोखो सदा झूंपडियाँ रो गांव ॥
बाट जोंवता जोंवता मन हुग्यो बैसाख ।
छोड प्रीत री आस नै प्रीत रमाली राख ॥
जद सूँ छोड्यो गांव नै हिवडै पडी कुबाण ।
गीत प्रीत री याद मँ आवै नित मौकाण ॥
प्रीत आपरी सायनी होगी म्हारै गैल ।
भारी पडज्या गांव नै जिया कंगलौ छैल॥
प्रीत करी नादान सूँ हुयो घणो नुकसान ।
आप डूबतो पांडियो ले डूब्यो जुजमान ॥
हेत कामयो देश मँ परदेसा मँ दाम ।
किण री पूजा मै करू गूगो बडो क राम ॥
बाबो मरगो काळ मै करग्यो बारा बाट ।
घर मँ टाबर मौकळा कै करजै रो ठाठ ॥
मारै आह गरीब री करदे मटिया मेट ।
पण कंजूसी सेठ रो रति ना सूकै पेट ॥
किण नै देवाँ ओळमाँ किण नै कैँवा बात ।
टाबरियाँ रै पेट पर राम मार दी लात ॥
भगीरथ सिंह भाग्य
सूका सूका खेतडा पण नैणा मै बाढ ।
घर मँ कोनी बाजरी ऊपर सूँ दो साढ ॥
जद सूँ पाकी बाजरी काचर मोठ समेत ।
दिन भर नापै चाव सूँ पटवारी जी खेत ॥
फिर फिर आवै बादळी घिर घिर आवै मेह ।
सर सर करती पून मँ थर थर कांपै देह ॥
होगी सोळा साल री बेटी करै बणाव ।
कद निपजैली टीबडी कद मांडूला ब्याव ॥
टूटी फूटी झूँपडी बरसै गरजै गाज ।
इण चौमासै रामजी दोराँ रहसी लाज ॥
टाबर टीकर मोकळाँ करजै री भरमार ।
राम रूखाळी राखजै थाँ सरणै घरबार ॥
निरधनियाँ नै धन मिल्यो रोजणख्याँ नै राग ।
राम बता कद जागसी परदेसी रा भाग ॥
उगतो पिणघट ऊपराँ सुणतो मिठी बात ।
गळी गुवाडी घूमतो चान्दो सारी रात ॥
ना पिणघट ना बावडी ना कोयल ना छाँव ।
तो भी चोखो सहर सूँ म्हारो आधो गांव ॥
सांझ ढळ्याँ नित जांवता देखै सारो गांव ।
पिरमा थारी लाडली पटवारी रै ठांव ॥
पैली उठती गौरडी पाछै उठती भोर ।
झांझर कै ही नीरती सगळा डांगर ढोर ॥
छैल सहर सूँ बावडै खरचै धोबा धोब ।
पडै गांव मै रात दिन पटवारी सा रोब ॥
जद मन तरस्यो गांव नै जद जद हुयो अधीर ।
दूहा रै मिस मांडदी परदेसी री पीर ॥
प्रीत आपरी अचपळी घणी करै कुचमाद ।
सुपना मै सामी रवै जाग्या आवै याद ॥
पाती लिख रियो गांव नै अपरंच ओ समचार ।
दुख पावुँ परदेस मँ जीवूँ हूँ मन मार ॥
राग रंग नी आवडै कींकर उपजै तान ।
घर मै कोनी बाजरी अर टूट्योडी छान ॥
घर दे घर रूजगार दे घर घर री दे साख ।
ना देवै तो सांवरा जीवण पाछो राख ॥
बिन हरियाळी रूंखडा घरघूल्या सा ठांव ।
’राही’ दीखै दूर सूँ थारो आधो गांव ॥
लेग्या तो हा गांव सूँ कंचन देही राज ।
पाछी ल्याया सहर सूँ खांसी कब्जी खाज ॥
गाय चराती छोरडयाँ जोबन सूँ अणजाण ।
देख ओपरा जा लूकै कर जांटी री आण ।।
जोध जुवानी बेलड्याँ मिलसी करयाँ बणाव ।
आखडजै मत पावणा पगडंड्या रै गांव ॥
के तडपासी बादळी के कोयल री कूक ।
पैली ही सूँ काळजो हुयो पड्यो दो टूक ॥
अजब पीर परदेस री म मर जीवै जीव ।
घर मै तरसै गोरडी परदेसाँ मै पीव ।।
ना आंचळ ना घूंघटो ना हीवडै मै लाज ।
घिरसत पाळै गोरडी रोटी पोवै राज ॥
घाटै रो घर दे दिये दुख दीजै अणचींत ।
मतना दीजे सांवरा परदेसी री प्रीत ॥
धान महाजन रै घराँ ढोर बिक्या बे दाम ।
करज पुराणो बाप रो कीयाँ चुकै राम ॥
बेटो तो परदेस मै घर बूढा मा बाप ।
दोनो पीढी दो जघाँ दुख भोगै चुपचाप ॥
ठाला बिन रूजगार कै ताना देता लोग ।
भरी न अब तक गांव सूँ मनस्या बळण जोग ॥
जद जासी परदेस तूँ हुसी जद बरबाद ।
दरद दिसावर ई कडया रोज करैलो याद ॥
कितरा ही दुहा लिखूँ अकथ रहीज्या भाव ।
परदेसी रो दरद तो है गूंगै रो भाव ॥
भासा राजस्थान री, रहियां राजस्थान।
राजस्थानी रै बिना, थोथो मान 'गुमान'॥
आढो दुरसौ अखौ, ठाढ़ा कवि टणकेल।
भासा बिना न पांगरै, साहित वाळी बेल॥
पीथल बीकाणै पुर्णा, जाणै सकल जिहान।
पातल नै पत्री पठा, गहर करायौ ग्यान॥
सबद बाण पीथल लगै, मन महाराणा मोद।
अकबर दल आयो अड़ण, हलदी घाट सीसोद॥
धर बांकी बांका अनड़, वांका नर अर नार।
इण धरती रा ऊपना, प्रिथमी रा सिंणगार॥
धन धरती धन ध्रंगड़ो, धन धन धणी धिणाप।
धन मारु धर धींगड़ा, जपै जगत ज्यां जाप॥
रचदे मेहंदी राचणी, नायण रण मुख नाह।
जीतां जंग बधावस्यां, ढहियां तन संग दाह॥
नरपुर लग निभवै नहीं, आज काल री प्रीत।
सुरपुर तक पाळी सखी, प्रेम तणी प्रतीत॥
मायड़ भासा मान सूं, प्रांत तणी पहिचांण।
भासा में ईज मिलैह, आण काण ऒळखांण॥
मायड़ भासा जाण बिण, गूंगो ग्यान 'गुमान'।
तीजा गवरा होळीका, हुवै प्रांत पहिचांन॥
भाइ बीज राखी बंधण, गीत भात अर बान।
बनौ विन्याक कामण्या, विण भासा न बखान॥





