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म्हैं खत थानै..

Rao GumanSingh Guman singh

श्री नरपतदान आशियां निवासी खांण
तहसील रेवदर जिला सिरोही द्वारा विरचित रचना

गोरे धोरां री धरती रो- Nandubhai sarswat

Rao GumanSingh Guman singh

गोरे धोरां री धरती रो
पिचरंग पाणा री धरती रो , पीतल पातल री धरती रो, मीरा करमा री धरती रो
कितरो कितरो रे करां म्हें बखाण, कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान ...
धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर मंजलां भई धर मंजलां 

कोटा बूंदी भलो भरतपुर अलवर अर अजमेर
पुष्कर तीरथ बड़ो की जिणरी महिमा चारूं मेर
दे अजमेर शरीफ औलिया नित सत रो फरमान
रे कितरो कितरो रे करा म्हें बखाण, कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान....

धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर मंजलां भई धर मंजलां 

दसो दिसावां में गूंजे रे मीरा रो गुण गान
हल्दीघाटी अर प्रताप रे तप पर जग कुरबान
चेतक अर चित्तोड़ पे सारे जग ने है अभिमान
कितरो कितरो रे करां म्हें बखाण, कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर मंजलां भई धर मंजलां 

उदियापुर में एकलिंगजी गणपति रंथमभोर
जैपुर में आमेर भवानी जोधाणे मंडोर
बीकाणे में करणी माता राठोडा री शान
कितरो कितरो रे करा म्हें बखान कण कण सूं गूंजे जय जय राजस्थान

धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर मंजलां भई धर मंजलां

आबू छत्तर तो सीमा रो रक्षक जैसलमेर
किर्ने गढ़ रा परपोटा है बांका घेर घूमेर
घर घर गूंजे मेड़ततणी मीरा रा मीठा गान
कितरो कितरो रे करां म्हें बखाण, कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर मंजलां भई धर मंजलां

राणी सती री शेखावाटी जंगळ मंगळ करणी
खाटू वाले श्याम धणी री महिमा जाए न वरणी
करणी बरणी रोज चलावे बायेड़ री संतान
कितरो कितरो रे करा म्हें बखाण, कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर मंजलां भई धर मंजलां

गोगा पाबू, तेजो दादू , झाम्बोजी री वाणी
रामदेव की परचारी लीला किण सूं अणजाणी
जैमल पन्ना भामाशा री आ धरती है खान
कितरो कितरो रे करा म्हें बखाण, कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर कुंचा भई धर मंजलां 
धर मंजलां भई धर मंजलां

थारे ही पाण, कर लियो सीणगार- Siya Choudhary

Rao GumanSingh Guman singh

थारे ही पाण, लगा लिया पाँखङा
उभगी मेङी पर, पण
क्यों डरपे है काळजो
उङबा का नाँव सूँ...

थारे ही पाण, कर लियो सीणगार
बेठगी डोली में, पण
क्यों घभरावे है जीव
बी अणजाणा गाँव सूँ...

थारे ही पाण, बांध लियो भरोसो
चाल पड़ी ला’र, पण
क्यों रुक झुक खरुँचू
आस री जमी पांव सूँ...!!!
-सिया चौधरी

(एक छोटी सी कोशिश, उनके लिए..जिन्होंने मुझे फिर से लिखने की प्रेरणा दी J )

भादरवै री गाज

Rao GumanSingh Guman singh


आज धराऊ धूंधळौ, मोटी छांटां मेह।
भगा बसन पधारजौ, जद जाणूंला नैह।।

ओढ ल्हैरियों गोरी ऊभी, मन ई मन मुसकावैं।
बागां बिच में मोर पपीहा, रूत रा गीत सुणावैं।।

होळै-होळै मन मदमाती, पवन चलै पुरवाई।
सावणियै री तीज गोरियां, तीज मनावण आई।।

हरियाळी छाई चहु दिस में, सूख गयौ मन म्हारौ।
नैणां पंथ बिछाया साजन, देखण नै उणियारौ।।

भादरवै री गाज सूं, हिवड़ौ धडका खाय।
इण बैळा म्हैं एकेळी, एकर मिळलौ आय।।

मेहा बरसे.......

Rao GumanSingh Guman singh

रिमझिम-रिमझिम मेहा बरसे, काळा बादळ छाया रे।
पिया सूं मलबां गांव चली, म्हारे पग में पड ग्या छाला रे।
रिमझिम........

भरी ज्वानी म्हांने छोड गया क्यूं, जोबन का रखवाला रे।
सोलह बरस की रही कुंवारी, अब तो कर मुकलावां रे।
रिमझिम...........

घणी र दूर सूं आई सजनवां, थांसू मिलवा रातां रे।
हाथ पकड म्हांने निकां बिठाया, कान में कर गया बातां रे।

रिमझिम.......

कठै गमग्या है वै इतरा आखर

Rao GumanSingh Guman singh

कठै गमग्या है वै इतरा आखर
गुनहगार गजला रा आखर हैं कुचमादी, श्रीमाली सुरगां सूं म्हारो गांव वालो है।
सळवटा मीटणी हैं, मूंडे जो समाज रे है, हाडी राणी वालों देश जग सूं रूखाळो है।
साहित्य सूरज बण, मेटणो है जड़ा मूल, जन मन व्यापो जो भी अंधकार काळो है।
साहित्य सूरज रामेश्वर री उड़ान देख, साचाणी लागै अबै बावनो हिमालो है।


-साहित्यकार रामेश्वरदयाल श्रीमाली को श्रद्धाजंलि स्वरूप भीनमाल में व्याखाता अरूण दवे ने ये पक्तियां लिखी। जिनमें श्रीमाली की सभी पुस्तकों के नाम शामिल हैं।
साहित्यकार रामेश्वर दयाल श्रीमाली के निधन पर साहित्य जगत और अन्य लोगों ने जताया शोक। कहा- श्रीमाली ने शुरू की थी राजस्थानी भाषा के लिए संघर्ष की यात्रा। अपने साहित्य की बदौलत दिलाया राजस्थानी को मान सम्मान। अंतिम संस्कार में उमड़े लोग।

कठीनै गमग्या है वै बावळा आखर
मूडां मायं सूं एक हरफ नीकलतो हो- देस
अर मूडां री माळा गूंथीजती ही च्यारूमेर
थमती ई कोनी हो माथा देवणिया रो रेळो
मां कैवतां ई जागतो हो नेह अर बलिदान
मुलक सारू मिटता ही माथा
लूळा साटै बिकता हा माथा
कठै गमग्या है वे आखर
असल उन्मादी अरथावाळा आखर।


अपनी राजस्थानी कविता कुचमादी आखर में ही लाईनों के माध्यम से समाज में आ रहे बदलाव, खत्म होते रिश्ते और भावनओं समेत अन्य समाप्त होती परंपराओं पर तीखी चोट करने वाले साहित्यकार रामेश्वर दयाल श्रीमाली बुधवार को पंचतत्व में विलीन हो गए। उनका मंगलवार शाम को निधन हो गया था। कुचमादी आखर नामक इस कविता संग्रह में उन्होंने बताया था कि अपनापन भरे और भावनाओं से ओतप्रोत आखर आज मिट गए हैं। श्रीमाली के निधन का समाचार सवेरे जैसे ही लोगों तक पहुंचा किसी को विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि एक दिन पहले तक ही लोगों ने उन्हें हमेशा की तरह उत्साह के साथ बात करते हुए देखा था।
सरलता और सादगी
सरलता और सादगी ही श्रीमाली की पहचान थी। उन्होंने लगभग तीन साल तक साहित्य की साधना की, लेकिन कभी भी निराशा और घमंड को अपने पर हावी नहीं होने दिया। साहित्य के क्षेत्र में भी राजस्थानी भाषा के लिए उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। ७६ वर्ष की आयु में भी वे अक्सर बाहर होने वाले साहित्य सम्मेलनों में भाग लेते और शेष समय घर पर बच्चों के साथ खेलकर और नवीन साहित्य सृजन में बिताते थे। साहित्य के माध्यम से उनका व्यंग्य तीखी चोट करता था।
साहित्यकार ही नहीं प्रेरक भी

जालोर में उनकी पहचान एक साहित्यकार के रूप में ही नहीं बल्कि वे कई युवा साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्रोत भी रहे। उन्होंने कई युवाओं को साहित्य सृजन के लिए तैयार किया और मार्गदर्शन भी दिया।

-उनका साहित्य मन पर चोट करता था। कविताओं की पक्तियां नया जोश भर देती थी। वे खुद ही साहित्य की साधना नहीं करते थे बल्कि अपने छोटे कई युवाओं को उन्होंने प्रेरित किया। जिनमें मैं भी शामिल हूं। उनकी प्रेरणा से ही मै साहित्य सृजन कर पाया। निराशा को उन्होंने कभी स्वयं पर हावी नहीं होने दिया। यही कारण था कि जब भी उनके पास जाते वे सदैव नए जोश से भरे हुए रहते थे।
-पुरुषोत्तम पोमल, साहित्यकार, जालोर
-उन्होंने साहित्य का जो सृजन शुरू किया वह उनके निधन तक अनवरत जारी रहा। पिछले तीन दशकों में मंैने उन्हें कभी ठहरा हुआ नहीं देखा। हमेशा वे चिंतन करते और कुछ ना कुछ लिखते रहते। समाज में व्याप्त बुराइयों के प्रति उनका दृष्टिïकोण व्यापक था। जिसे उन्होंने अपने साहित्य में भी उतारा। व्यंग्य भी किया तो इतना सटीक कि सीधा मन पर चोट करता।
-अचलेश्वर आनंद, साहित्यकार, जालोर
-राजस्थानी भाषा के लिए उनका योगदान सदैव याद किया जाएगा। इस भाषा में लिखी उनकी कई पुस्तकों का हिंदी और बंगाली में अनुवाद हुआ। राजस्थानी शब्दों का उन्होंने जिस प्रकार से उपयोग किया है उसके बाद उनका साहित्य लगातार पढऩे का मन करता है। साथ ही राजस्थान दिवस के दिन ही उनका मौन हो जाना एक संयोग ही है।
-अशोक दवे, जनसम्पर्ककर्मी, जालोर
-जीवन के सरोकारों से जुड़ी रचनाएं जुड़ी हुई थी। मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत थी। कविता और कहानी दोनों क्षेत्रों में आम व्यक्ति को पीड़ा और भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रदान की थी।
-अरूण दवे, व्याख्याता, जालोर
नम आंखो से किया विदा
श्रीमाली का अंतिम संस्कार सवेरे करीब साढ़े नौ बजे समाज के श्मशान घाट में किया गया। इससे पूर्व चामुंडा मंदिर के समीप स्थित उनके निवास से अंतिम यात्रा शुरू हुई। जो अस्पताल चौराहा, सूरजपोल होते हुए श्मशान घाट पहुंची। वहां उनके ज्येष्ठï पुत्र विश्वनाथ श्रीमाली ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान वरिष्ठï लेखाकार ईश्वरलाल शर्मा, साहित्यकार पुरूषोत्तम पोमल, बाबूभाई व्यास, अचलेश्वर आनंद, मधुसूदन व्यास, ऋषिकुमार दवे, भीनमाल से व्याखाता अरूण दवे और अशोक दवे समेत कई लोग मौजूद थे।

दरद दिसावर भाग -3

Rao GumanSingh Guman singh

कीडी नगरो सहर है मोटर बंगला कार ।
जठै जमारो बेच कै मिनख करै रूजगार ॥

अजब रीत परदेस री एक सांच सौ झूँठ ।
हँस बतळावै सामनै घात करै पर पूठ ॥

खेत खळा अर रूंखडा बै धोरा बै ऊंट ।
बाँ खातर परदेस के तज देवूँ बैकूँट ॥

देह मशीना मै गळै आयो मौसम जेठ ।
बिरथा खोयी जूण म्हे परदेसा मँ बैठ ।।

ऊमस महीना जेठ रो बो पीपळ रो गांव ।
संगळियाँ संग खेलता चोपङ ठंडी छाव ॥

गाता गीत न गा सक्या करता करया न कार ।
जीतै जी ना जी सक्या मरिया पडसी पार ॥


ठीडै ठाकर ठेस रा ठीडै ही ठुकरेस ।
बिना ठौड अर ठाईचै क्यूँ भटकै परदेस ॥

समरथ जाणु लेखणी सांचो जाणू रोग ।
गावैला जद चाव सूँ दरद दिसावर लोग ।।

सूना सा दिन रात है सूनी सूनी सांझ ।
बंस बध्यो है पीर रो खुशिया रै गी बांझ ।।

हिरण्याँ हर ले नीन्द नै किरत्याँ कैदे बात ।
तारा गिणता काटदे नित परदेसी रात ॥

रिमझिम बरसै भादवो झरणा री झणकार ।
परदेसी रै आन्गणै रूत लागी बेकार ॥

साखीणो संसार है कद तक राखा साख ।
साख राखताँ गांव मँ मिटगी खुद री साख ॥

तन री मौज मजूर हा मन री मौज फकीर ।
दोनूँ बाताँ रो कठै परदेसाँ मँ सीर ॥

ऊंचा ऊंचा माळिया ऊची ऊंची छांव ।
महला सूँ चोखो सदा झूंपडियाँ रो गांव ॥

बाट जोंवता जोंवता मन हुग्यो बैसाख ।
छोड प्रीत री आस नै प्रीत रमाली राख ॥

जद सूँ छोड्यो गांव नै हिवडै पडी कुबाण ।
गीत प्रीत री याद मँ आवै नित मौकाण ॥

प्रीत आपरी सायनी होगी म्हारै गैल ।
भारी पडज्या गांव नै जिया कंगलौ छैल॥

प्रीत करी नादान सूँ हुयो घणो नुकसान ।
आप डूबतो पांडियो ले डूब्यो जुजमान ॥

हेत कामयो देश मँ परदेसा मँ दाम ।
किण री पूजा मै करू गूगो बडो क राम ॥

बाबो मरगो काळ मै करग्यो बारा बाट ।
घर मँ टाबर मौकळा कै करजै रो ठाठ ॥

मारै आह गरीब री करदे मटिया मेट ।
पण कंजूसी सेठ रो रति ना सूकै पेट ॥

किण नै देवाँ ओळमाँ किण नै कैँवा बात ।
टाबरियाँ रै पेट पर राम मार दी लात ॥

भगीरथ सिंह भाग्य

भासा राजस्थान री, रहियां राजस्थान।

Rao GumanSingh Guman singh

भासा राजस्थान री, रहियां राजस्थान।
राजस्थानी रै बिना, थोथो मान 'गुमान'॥

आढो दुरसौ अखौ, ठाढ़ा कवि टणकेल।
भासा बिना न पांगरै, साहित वाळी बेल॥

पीथल बीकाणै पुर्णा, जाणै सकल जिहान।
पातल नै पत्री पठा, गहर करायौ ग्यान॥

सबद बाण पीथल लगै, मन महाराणा मोद।
अकबर दल आयो अड़ण, हलदी घाट सीसोद॥

धर बांकी बांका अनड़, वांका नर अर नार।
इण धरती रा ऊपना, प्रिथमी रा सिंणगार॥

धन धरती धन ध्रंगड़ो, धन धन धणी धिणाप।
धन मारु धर धींगड़ा, जपै जगत ज्यां जाप॥

रचदे मेहंदी राचणी, नायण रण मुख नाह।
जीतां जंग बधावस्यां, ढहियां तन संग दाह॥

नरपुर लग निभवै नहीं, आज काल री प्रीत।
सुरपुर तक पाळी सखी, प्रेम तणी प्रतीत॥

मायड़ भासा मान सूं, प्रांत तणी पहिचांण।
भासा में ईज मिलैह, आण काण ऒळखांण॥

मायड़ भासा जाण बिण, गूंगो ग्यान 'गुमान'।
तीजा गवरा होळीका, हुवै प्रांत पहिचांन॥

भाइ बीज राखी बंधण, गीत भात अर बान।
बनौ विन्याक कामण्या, विण भासा न बखान॥

बिरखा बिंनणी ( वर्षा वधू )

Rao GumanSingh Guman singh

Ratan Singh Shekhawat,
मानसून पूर्व की वर्षा की बोछारें जगह-जगह शुरू हो चुकी है | किसान मानसून का बेसब्री से इंतजार करने में लगे है | और अपने खेतो में फसल बोने के लिए घास,झाडियाँ व अन्य खरपतवार काट कर (जिसे राजस्थान में सूड़ काटना कहते है ) तैयार कर वर्षा के स्वागत में लगे है | बचपन में सूड़ काटते किसानो के गीत सुनकर बहुत आनंद आता था लेकिन आजकल के किसान इस तरह के लोक गीत भूल चुके है |

जटक जांट क बटक बांट क लागन दे हब्बिडो रै,
बेरी धीडो रै , हब्बिडो |

इस गीत की मुझे भी बस यही एक लाइन याद रही है | जिन गांवों के निवासी पेयजल के लिए तालाबों,पोखरों व कुंडों पर निर्भर है वहां सार्वजानिक श्रमदान के जरिए ग्रामीण गांव के तालाब व पोखर आदि के जल संग्रहण क्षेत्र (केचमेंट एरिया ) की वर्षा पूर्व सफाई करने में जुट जाते है व जिन लोगों ने अपने घरों व खेतो में व्यक्तिगत पक्के कुण्ड बना रखे है वे भी वर्षा पूर्व साफ कर दिए जाते है ताकि संग्रहित वर्षा जल का पेयजल के रूप में साल भर इस्तेमाल किया जा सके |
शहरों में भी नगर निगमे मानसून पूर्व वर्षा जल की समुचित निकासी की व्यवस्था के लिए जुट जाने की घोषणाए व दावे करती है | ताकि शहर में वर्षा जल सडको पर इक्कठा होकर लोगों की समस्या ना बने हालाँकि इनके दावों की पहली वर्षा ही धो कर पोल खोल देती है |
कुल मिलाकर चाहे किसान हो या पेयजल के लिए वर्षा जल पर निर्भर ग्रामीण या शहरों की नगर पलिकाए या गर्मी से तड़पते लोग जो राहत पाने के लिए वर्षा के इंतजार में होते है , सभी वर्षा ऋतु के शुरू होने से पहले ठीक उसी तरह वर्षा के स्वागत की तैयारी में जुट जाते है जैसे किसी घर में नई नवेली दुल्हन के स्वागत में जुटे हो | शायद इसीलिए राजस्थान के एक विद्वान कवि रेवतदान ने वर्षा की तुलना एक नई नवेली दुल्हन से करते हुए वर्षा को बरखा बिन्दणी ( वर्षा वधू ) की संज्ञा देते हुए ये शानदार कविता लिखी है :


लूम झूम मदमाती, मन बिलमाती, सौ बळ खाती ,
गीत प्रीत रा गाती, हंसती आवै बिरखा बिंनणी |
चौमासै में चंवरी चढनै, सांवण पूगी सासरै,
भरै भादवै ढळी जवांनी, आधी रैगी आसरै
मन रौ भेद लुकाती , नैणा आंसूडा ढळकाती
रिमझिम आवै बिरखा बिंनणी |

ठुमक-ठुमक पग धरती , नखरौ करती
हिवड़ौ हरती, बींद पगलिया भरती
छम-छम आवै बिरखा बिंनणी |
तीतर बरणी चूंदड़ी नै काजळिया री कोर
प्रेम डोर मे बांधती आवै रुपाळी गिणगोर
झूंटी प्रीत जताती , झीणै घूंघट में सरमाती
ठगती आवै बिरखा बिंनणी |

घिर-घिर घूमर रमती , रुकती थमती
बीज चमकती, झब-झब पळका करती
भंवती आवै बिरखा बिंनणी |
आ परदेसण पांवणी जी, पुळ देखै नीं बेळा
आलीजा रै आंगणै मे करै मनां रा मेळा
झिरमिर गीत सुणाती, भोळै मनड़ै नै भरमाती
छळती आवै बिरखा बिंनणी |


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आपणी भाषा-आपणी बात

Rao GumanSingh Guman singh

लुगायां, लाठी ल्याओ ऐ,
गूदड़ै में डोरा घालां


-ओम पुरोहित कागद

राजस्थानी लोकसाहित्य जग में सिरै। राजस्थानी लोक साहित्य में बात, ओखांणा, कैबतां अनै आड्यां अजब-गजब। साहित्य अजब-गजब तो कथणियां बी अजब-गजब। एड़ा ई अजबधणी हा भूंगर कवि। भूंगर कवि बेमेळा सबदां री भेळप सूं बेअरथी कविता लिखता। ऐ कवितावां आज भी भूंगर रा घेसळा सिरैनांव सूं लोक में भंवै। भूंगर रो जलम कद अर कठै हुयो, इण रो कोई परवाण नीं। कई विद्वान उण नै अमीर खुसरो रै बगत रो बतावै। भूंगर रो ठिकाणो कई लोग बीकानेर डिवीजन रै नोखा या रतनगढ़ नै बतावै तो कई बतावै कै भूंगर नागौर रै साठिका या भदोरै गांव रा हा। खैर कद रा या कठै ई रा हा, पण हा राजस्थान रा ई। बां आपरै घेसळां सूं राजस्थान अर राजस्थानी भाषा रो जस चौगड़दे पुगायो।
अब आप पूछस्यो कै घेसळो कांई हुवै? घेसळो हुवै बोरटी री अणघड़ जाडी अर बांकी-बावळी लकड़ी सूं बणायोड़ोचलताऊ सौटौ जकै सूं खळै में बाजरी रै सिट्टां नै कूट'र दाणा काढ़्या करै। इण नै रेरू, खोटण या घेसळो कैवै। भूंगर रा घेसळा बी इण भांत ई बांका-बावळा अर बेअरथा हुवै। हिन्दी में अमीर खुसरो, घासीराम अर वासूजी ई घेसळां माफक ढकोसळा लिख्या। इण भांत रै बेअरथै छंद नै हिन्दी में ढकोसला, परसोकला या झटूकला कैईज्यौ। आं सगळां में सिरै पण भूंगर रा घेसळा ई थरपीज्या। इणी रै पाण भूंगर नै राजस्थानी लोक साहित्य में बो मुकाम मिल्यो जकौ अमीर खुसरो नै हिन्दी साहित्य में मिल्यो।
भूंगर राजस्थानी भाषा में हंसावणियां अर बेअरथा घेसळा लिखता। आं घेसळां री खास बात आ है कै आं में बेमेळा सबद है अर छेकड़ली तुक नीं मिलै। घेसळा बेतुका होंवता थकां बी रसाल है। भूंगर नै किणी री फटकार ही कै थारी कविता में जकै दिन लारली तुक मिलसी उण दिन थारी मौत हुयसी। मौत तो हरेक नै आवै। भूंगर नै बी आवणी ई ही। पण भूंगर री मौत फटकार नै साची करगी।
एक दिन री बात। भूंगर सांढ माथै गांवतरौ करै हा। गेलै में एक सुन्नो कुओ आयो। कुए मांय कोई कूकै हो। बचाओ-बचाओ। भूंगर कुऐ में देख्यो तो एक माणस टिरै। भूंगर नै दया आयगी। माणस नै काढ़ण री जुगत बैठाई। उण सांढ नै कुओ डकावण सारू तचकाई। सांढ लखायो ही, इण सारू ताती अर बेगवान ही। सांढ एक फाळ में ई कुओ डाकगी। सांढ रै डाकतां थकां भूंगर कुए में टिरतै माणस री टांग पकड़ली। सांढ तो परलै पार पण भूंगर धै कुए में। अब भूंगर बी माणस टांग थाम्योड़ो कुए में टिरै। कवि मन इण विपदा में ई कविता कर दी जको कोठै सूं होटै आयगी- ''डाकणी ही सांढ, डाकगी कुओ। एक तो हो ई, एक और हुओ।'' बीं नै अचाणचक चेतै आई कै आज तो कविता में हुओ री तुक कुओ सूं मिलगी। आज आयगी दिखै मौत। पण उण नै लखायो कै फटकार बेअसर होयगी दिखै। फटकार रो असर होंवतो तो मर नीं जांवतो? बण इणी खुसी में ताळी बजाई कै धर'र'र-धम्म कुए रै पींदै जा पड़्यो। कुए में पड़तां ई भूंगर रो हंसलो उडग्यो। इयां निभी फटकार। भूंगर री लोक सूं विदाई हुई पण उण रो साहित्य आज बी लोक में भंवै। आओ बांचां भूंगर रा कीं घेसळा-
(1)
बरसण लाग्या सरकणा, भीजण लागी भींत।
ऊंठ सरिसा बैयग्या, दाळ रो सुवाद आयो ई कोयनीं।।

(2)
गुवाड़ बिचाळै पींपळी, म्हे जाण्यो बड़बोर।
लाफां मार्यो घेसळो, छाछ पड़ी मण च्यार।
लुगायां, कांदा चुगल्यो ऐ, चीणां री दाळ-सा।।

(3)
भूंगर चाल्यो सासरै, सागै च्यार जणां।
भली जिमाई लापसी, वा रै कस्सी डंडा।।

(4)
भिड़क भैंस पींपळ चढी, दोय भाजग्या ऊंठ।
गधै मारी लात री, हाथी रा दोय टूक।
लुगायां, लाठी ल्याओ ऐ, गूदड़ै में डोरा घालां।।

(5)
चूल्है लारै के पड़्यो, म्हे जाण्यो लड़लूंक।
पूंछ ऊंचो कर'र देखां, तो टाबरां री माय।।

(6)
चरड़-चरड़ फळसो करै, फळसै आगै दो सींग।
आगै जाय'र देखूं तो, कुतड़ी पाल्लो खाय।
चरणद्यो बापड़ी नै, गाय री जाई है।।

(7)
गुवाड़ बिचाळै गोह पड़ी, म्हैं जाण्यो गणगौर।
पूंछड़ो ऊंचो कर'र देखूं तो, दीयाळी रा दिन तीन ही है।।

आज रो औखांणो

मूंड मुंडायां तीन गुण, मिटी टाट री खाज।
बाबा बाज्या जगत में, खांधै मैली लाज।।


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Posted By AAPNI BHASHA - AAPNI BAAT to AAPNI BHASHA-AAPNI BAAT at 6/30/2009 01:00:00 AM

राजस्थानी काव्य में राष्ट्रवादी अग्नि-शिखा के ऋत्विक : शंकरदान सामौर

Rao GumanSingh Guman singh


भारतीय इतिहास में राजस्थान ने अपनी विशिष्ट पहिचान कुछ वरेण्य जीवन मूल्यों में लिए सतत बलिदानों की सुदीर्घ परम्परा से बनायी है। स्वातंत्र्य प्रेम को इन मूल्यों का सुमेरु कहा जा सकता है। इस तथ्य की काव्यात्मक अभिव्यक्ति मरुभूमि में इन्द्र की कृपणता का खुलासा स्वातंत्र्य चेतना व उसकी रक्षार्थ उत्सर्ग की तत्परता के संदर्भ में शंकरदान द्वारा इस भाँति हुई है-
पंणी रौ कांई पिये, (आ) रगत पियौड़ी रज्ज।
संके कन में आ समझ, घण नह बरसै गज्ज।।

स्वातंत्र्य रक्षण के प्रयत्नों की महत्ता राजस्थानी मानस में इस भाँति रची बसी है कि-
सुत मरियौ हित देश रै, हरख्यौ बंधु समाज।
मा नह हरखी जनम दे, जितरी हरखी आज।।

उन्नींसवीं सदी में राजस्थान में इस स्वातंत्र्य चेतना का तूर्यनाद करने वाले चूरू जिले के बोबासर गाँव में २२ नवम्बर १८२४ को जन्में कवि शंकरदान सामौर का व्यक्ति और जीवन इस प्रदेश की बलिदानी परम्परा का गौरव मंडित अध्याय है। सामौर क्रांतिचेता कवि होने के साथ-साथ जनसाधारण के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर चुके थे। अपनी गहरी सूझ-बूझ से उन्होंने विदेशी शासन की वास्तविक प्रकृति व उसके विनाशकारी प्रभाव को भली-भाँति समझ लिया था। साथ ही तत्कालीन सामंती व्यवस्था की विद्रूपता व उसके जनविरोधी स्वरूप की भी उन्हें ठीक-ठीक पहचान थी। समकालीन हालात से उनसे भीतर जो विक्षोभ खदबदा रहा था, १८५७ के विप्लव ने उस लावे को बहिर्मुख कर दिया। वे स्वतंत्रता यज्ञ में समिधा डालने हेतु तत्पर हो गये और अपनी काव्य प्रतिभा का प्रभावी उपयोग इस महत् ध्येय की सिद्धि के लिये किया।
अन्याय व अनाचार का विरोध उनकी दूसरी प्रकृति थी। उस समय शासक वर्ग की मनमानी और कदाचार के विरूद्ध चारणों द्वारा दिए जाने वाले धरानों में उनकी सदैव अग्रणी भूमिका रही और इस भावना का चरमोत्कर्ष १९५७ के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका से परिलक्षित होता है। शंकरदान के काव्य में युगीन चेतना के स्वर सशक्त रूप से उभरे। उनका काव्य मनो विनोद या निसत्व राजाओं के प्रशस्तिगान द्वारा लाख पसाव प्राप्त करने का साधन नहीं अपितु राष्ट्र के सुप्त पौरुष व निष्पंद गौरव भाव को जगाने, लोगों में ऐक्य भाव का संचार करने, कर्तव्य विमुख हो चुके सत्ताधीशों को शब्दों के प्रतोद से प्रताड़ित करने एवं विदेशी शासन के बहुविध शोषण से हतश्री हो चुके देश के जनसाधारण को उठ खड़े होने का आव्हान था। उनके काव्य में राष्ट्रीयता की तेजस्विता व स्निग्धता दोनों विद्यमान थीं। समकालीन परिस्थिति से अवसन्न इस कवि की दृष्टि से जनसाधारण के दु:ख-दर्द कभी ओझल नहीं हुए। यही कारण है कि उनके काव्य में सर्वत्र प्रखर देशभक्ति व मातृभूमि के उद्धार के लिए बलिदान की महत्ती आवश्यकता मुखरित हुई है।
१८५७ के विप्लव को पराधीनता के पाश से मुक्ति पाने का महान्ब अवसर मानने वाले सामौर ने अपने पूर्ववर्ती कविराजा बांकीदास की भाँति राष्ट्रवासियों को जगाने का स्तुत्य कार्य किया। वे इस विप्लव की घटनाओं के न केवल साक्षी थे वरन् इसमें उन्होंने सक्रिय भूमिका भी निभायी। अंग्रेज व उनके आश्रित राजाओं-सामन्तों की जन विरोधी घातक नीतियों व क्रिया कलापों ने उन्हें आहत कर दिया था, जिसकी अभिव्यक्ति उनके सम्पूर्ण सृजन में हुई है। तत्कालीन राजस्थान के हालात के संदर्भ में क्रांति का शंखनाद करने वाले इस जनकवि की व्यथा को भली-भाँति समझा जा सकता है।

ब्रिटिश सत्ता के विस्तार की परिणति-
ब्रिटिश प्रभुत्व की स्थापना से राजस्थान में अराजकता व राजनीतिक अस्थिरता के अंधयुग की तो समाप्ति हुई किन्तु जनसाधारण के लिए उस अन्तहीन दु:खरजनी का प्रारम्भ हुआ जिसमें, अन्याय, शोषण व उत्पीड़न के अंधकार में जीवन एक दु:सह अभिशाप बन कर रह गया। ब्रिटिश प्रभुओं से प्राप्त अभयदान ने राजाओं को अपनी प्रजा पर कहर ढ़ाने की खुली छूट दे दी। इस युग में राजस्थान में सामन्ती व्यवस्था प्रजापीड़न, क्रूरता व मानवीय अध:पतन की पराकाष्ठा की प्रतीक बनकर रह गयी। एक जंगल राज की शुरुआत हो गई जिसमें रैयत राजाओं व उनके जागीरदारों का भक्ष्य बन गयी। गोरे प्रभुओं की चाटुकारिता मंे तल्लीन राजा व जागीरदार प्रजा की गर्दन पर सिंदवाद की कथाओं के बूढ़े की तरह सवार हो गए। जिन मेहनतकश लोगों के परिश्रम पर उनकी विलासिता का तांडव चल रहा था, वे तिहरी गुलामी के बोझ के नीचे दबकर सर्वथा असहाय हो गए। सामंती तत्त्वों के गर्हित आचरण के फलस्वरूप जागीरदारी प्रथा जुल्म का पर्याय बन गयी। रियासती प्रजा रूपी नींबू को इतनी निर्दयता से निचोड़ा गया कि उसके रेशे तक बाहर निकल आये। ये शोषक सामन्त इतने विवेकहीन हो चुके थे कि रैयत द्वारा की गई फरियाद को भी उन्होंने अपनी सत्ता के लिए चुनौती समझ कर निर्मम दमन का सहारा लिया। सामौर ने तत्कालीन परिस्थिति पर समग्रता से विचार किया। फलत: यह बात उनके सम्मुख दिन के उजाले की भाँति स्पष्ट हो गई कि 'मीठे ठग` अंग्रेजों की बनिया मनोवृति ही इसके लिए उत्तरदायी है। श्री अरविन्द के शब्दों में ''बनिया जब शासक बन जाता है तो सबसे बुरा शासक सिद्ध होता है।`` उदीयमान ब्रिटिश पूंजीवाद के हितों के संवर्धन के लिए स्वावलंबी भारतीय अर्थ व्यवस्था को तो अंग्रेजों ने चौपट किया ही और साथ ही राजनीतिक प्रभुत्व के विस्तार के लिए हर प्रकार के छल-छद्म का भी सहारा लिया। इन तथ्यों व उनके निहितार्थ का चित्रण सामौर ने अपने एक गीत में इस प्रकार किया है-
बिणज रौ नांव ले आया बण बापड़ा, तापड़ा तोड़िया राज तांईं
मोकौ पा मुगळां रौ माण जिण मारियौ, पोखो थां कुणकयां समझ कांईं
धोळ दिन देखतां नबाबी धपाई, संताई बेगमां अवधसाई
खोड़लां फौज हिंदवांण री खपाई, सफाई नांखौ मत सरम साई
धरा हिंदवांण री दाबर्या धकै सूं, प्रगट में लड़यां ई पार पड़सी
संकट में अेक हुय भेद मेटो सकळ, लोक जद जोस हूं जबर लड़सी

अंग्रेजों के अत्याचारों को उन्होंने सूक्ष्म दृष्टि से देखा था। अपनी वणिक वृत्ति से उन्होंने पूर्ववर्ती सभी आक्रान्ताओं को पीछे छोड़ दिया था। इस बात को रेखांकित करते हुए सामौर ने कहा कि अंगे्रज तो चंगेज खां से भी दो कदम आगे थे, क्योंकि-
महलज लूटण मोकळा, चढया सुण्या चंगेज।
लूटण झूंपा लालची, आया बस इंगरेज।।
सामौर अपनी निर्भयता व स्पष्टवादिता की दृष्टि से अद्वितीय हैं। अत: अंगे्रजों के विरूद्ध अपने आक्रोश के प्रकटीकरण व आत्म सम्मान को धता बताकर क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए उनकी चाटुकारिता करने वाले राष्ट्र द्रोही राजाओं व सामन्तों की भर्त्सना करते समय उनकी लेखनी ने आग्नेय रूप धारण कर लिया। राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने वाले सामौर के लिए कहा गया यह दोहा उनके जीवन का सार प्रस्तुत कर देता है-
शंकरियै सामौर रा गोळी जिसड़ा गीत।
मिंत ज साचा मुलक रा, विपुवां उलटी रीत।।

१८५७ का स्वतंंत्रता संग्राम और सामौर
विदेशी शासन के अभिशाप से देश को मुक्त कराने हेतु प्राणापण से सचेष्ट सामौर का तेजस्वी रूप १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी पूर्णता से प्रकट हुआ। वे सर्वतोभावेन इस महद् प्रयास की सफलता के लिए जुट गए। वे इस संग्राम की महत्ता को भली भाँति समझते थे। इस अवसर का लाभ उठाने के लिए उन्होंने देशवासियों को उद्बोधन देते हुए स्पष्ट किया कि इस दुर्लभ अवसर को खो देने पर हिन्द की खोयी आजादी को प्राप्त करने का ऐसा मौका फिर नहीं आएगा, जैसे छलांग भरते समय एक बार चूक जाने पर हिरण फिर संभल नहीं पाता। यह छप्पय द्रष्टव्य है-
आयौ औसर आज, प्रजा पख पूरण पाळण
आयौ औसर आज, गरब गौरां रौ गाळण
आयौ औसर आज, रीत राखण हिंदवाणी
आयौ औसर आज, विकट रण खाग बजाणी
फाळ हिरण चूक्यां फटक, पाछौ फाळ न पावसी
आजाद हिन्द करवा अवर, औसर इस्यौ न आवसी

सामौर १८५७ के विप्लव के निहितार्थों को भली भाँति समझते थे। उनकी अन्तस्थ देश भक्ति इस समय प्रबल आलोड़न की अवस्था में थी। उनके दृष्टिपथ में समस्त भारत था। अत: इस संग्राम के साथ जुड़े सभी क्षेत्रों के छोटे-बड़े सभी योद्धाओं का उन्होंने स्तवन किया। तांत्या टोपे के तो वे प्रत्यक्ष संपर्क में आए थे और गाढ़े समय में टोपे की उन्होंने जो मदद की, वह इस प्रदेश के स्वाधीनता संघर्ष का स्वर्णिम अध्याय है। तात्या जैसे दुर्धर्ष योद्धा के अथक प्रयासों से वे अभिभूत थे। उनके अदम्य साहस व प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अविचल भाव से डटे रहने जैसे गुणों की सराहना में सामौर द्वारा रचित इस गीत से इस निजंधरी नायक के प्रति उनके अहोभाव की ऊर्मिया तरंगित होती हैं।
जठै गयौ जंग जीतियौ, खटके बिन रणखेत।
तकड़ौ जड़ियौ तांतियौ, हिंदथान रै हेत।।
मचायौ हिंद में आखी तहलको तांतियै मोटो
घोटो जेम घुमायौ लंक में हणूं घोर
रचायौ रूळंती राजपूती रौ आखरी रंग
जंग में दिखायौ सुवायौ अथाग जोर
हुय हतास राजपूती छंडियौ छत्रियां हाथ
साथ चंगौ सोधियौ दिक्खणी महासूर
बिड़द धार छतीसां वंस रौ रंण बांको बीर
नीर धारी हिन्द रौ बंचायौ सागी नूर
पळकती आकास बीज कठै ई जांवती पड़ै
छड़ै तांतियै री व्हैगी इसी ही छलांग
खळकती नंद्ंया रा खाळ मांय हूतो पाड़ खड़ै
लड़ै इणा विधी लाखां हूतं एकलांग

गीत में ''रचायौ रूळंती राजपूती रौ आखरी रंग`` और ''पळकती आकाश बीज कठै ई जांवती पड़ै`` जैसी पंक्तियाँ अप्रतिम योद्धा तात्या के सम्बन्ध में कवि के गहन अध्ययन को दर्शाती हैं। अरिदल पर उनके आक्रमण जिस तीव्रता व आकस्मिकता से होते थे, उस तथ्य का रूपक द्वारा वर्णन सुहृद्य बन पड़ा है।
१८५७ के विप्लव के आखिरी दौर में चारों ओर से निराश होने के पश्चात् तात्या टोपे मदद की आशा से शेखावाटी इलाके में आए। इस समय सामौर ने उनकी यथासंभव भरपूर मदद की। मदद के भरोसे तात्या लक्ष्मणगढ़ के किले के किले में घिर गए। वहाँ से किसी तरह निकलने के बाद कहीं पर भी सहायता न मिलती देखकर सामौर उन्हें अपने पैतृक गाँव बोबासर अपने भाई पृथ्वीसिंह सामौर के गढ़ में ले आए। इस पर क्रुद्ध हो अंगे्रेजों ने गढ़ को बारूद से उड़ा दिया। इस प्रकार सामौर ने केवल शब्दों द्वारा ही नहीं वरन् अपने कर्तव्य द्वारा भी क्रांतिधर्मा होने का प्रमाण दिया। उनके अंग्रेज विरोधी रुख की भारी कीमत बड़े भाई पृथ्वीसिंह ने चुकायी। इस बारे में स्वयं शंकरदान ने कहा-
गढ़वी पिरथीसिंह गुणी, गोरां मेट गरूर।
मरद तांतिये री मदत, की उण बेळ करूर।।

तांत्या की मदद करते हुए तो सामौर परिवार को अपना सब कुछ गंवाना पड़ा पर इस स्वातंत्र्य यज्ञ में अपनी आहुति देने वाले अन्य सेनानी भी सामौर की दृष्टि से ओझल नहीं हुए। झाँसी की रानी, अवध के सैनिकों व आऊवा ठाकुर कुशालसिंह के बलिदानों का स्तवन करने में भी वे अग्रणी रहे। लक्ष्मी बाई के अप्रतिम शौर्य व बलिदान को उन्होंने इस भाँति याद किया-
हुयौ जांण बेहाल, भाल हिन्द री भोम रौ।
झगड़ौ निज भुज झाल, लिछमी झांसी री लड़ी।।

इस तरह अवध राज्य के सैनिकों की सूरमाई व अंग्रेज विरोधी हलचल का बखान करते हुए लिखा-
फिरंगां तणी फजीत, करवा नै कस कस कमर।
जण जण बण जंगजीत, लड़या अवध रा लाडला।

इस विप्लव में राजस्थान में ब्रिटिश सत्ता को सबसे गम्भीर चुनौती देने वाले आऊवा की घटनाएँ इस प्रदेश के स्वाधीनता संग्राम का सर्वाधिक रोमांचक अध्याय है। ब्रिटिश सत्ता को सर्वाधिक ध्यान आऊवा पर ही देना पड़ा उनके विरुद्ध किये गये तनी अभियना एवं तदुपरान्त भीषण प्रतिशोध की भावना से किया गया आऊवा का सर्वनाश इस बात को स्पष्ट करते हैं कि अंग्रेजों की दृष्टि में आऊवा की हल-चल कितनी खतरनाक थी। इस समय आऊवा द्वारा किये गये बलिदान को गौरवभाव से चित्रित करते हुए सामौर ने लिखा-
हुआ दुखी ंहिंदवाण रा, रुकी न गोरां राह।
विकट लड़यौ सहियो बिखौ, वाह आऊवा वाह।।

आऊवा ठाकुर खुशालसिंह को इस अभियान का नेतृत्व संभालने के फलस्वरूप भीषण आपदाओं से गुजरना पड़ा उनके बारे में सामौर कहते हैं- खेल्यौ रण में खाग हूं, जचकर जूझ्यौ जंग। दियौ सरब हित देश रै, रंग खुशाला रंग।
आऊवा की अगुआई में हुए संघर्ष में मारवाड़, बीकानेर, मेवाड़ एवं शेखवाटी के कई ठिकानों ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। आऊवा से निपटने के बाद अंग्रेजों ने इस सभी ठिकानों को ठिकाने लगाने पर ध्यान दिया।
१८५७ के विप्लव का सबसे दु:खद पहलू यह रहा कि राजस्थान के सभी रजवाड़े इस मुक्ति संग्राम से न केवल विलग रहे अपितु उसे कुचलने में भी अंग्रेजों का भरपूर सहयोग दिया। राष्ट्रभक्त शंकरदान को राजाओं के इस निंदनीय कृत्य से मरणान्तक व्यथा हुई।
गुलामी को खाद-पानी देने वाले इन राजाओं के प्रति सामौर के क्रोध का कोई पारावार नहीं था। अपनी रियासत बीकानेर के शासक सरदारसिंह भी इस दुष्कर्म के भागी थे। कवि ने इन सभी देशद्रोहियों की जमकर खबर ली। स्वातंत्र्य योद्धाओं का स्तवन करने वाली उनकी लेखनी ने अंग्रेज समर्थकों की भर्त्सना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बीकानेर रियासत के गोपाळपुरा, कणवारी तथा शेखावाटी के नवलगढ़, खेतड़ी, खण्डेला आदि ठिकाने भी उनके कोपभाजन बने क्योंकि इन ठिकानेदारों ने तात्या की मदद करने से उनके आग्रह को ठुकरा दिया था। अत्यन्त तीक्ष्ण शब्दशरों से उन्हें अंग्रेज भक्तों को बींध डाला। सरदारसिंह को धिक्कारते हुए कहा-
देख मरै हित देश रै, पेख सचौ रजपूत।
सरदारा तोनै सदा, कहसी जगत कपूत।।
खास बांधवां खीज, सैण गोरिया गिण सचा।
थूं बा`वै अेहड़ा बीज, फोग फोग फळ भोगसी।।

बीकानेर दरबार को मूर्ख मण्डली की संज्ञा देते हुए कवि ने कहा-
डफ राजा डफ मुसद्दी डफ ई देश दीवांण।
डफ ई डफ भेळा हुया, (जद) बाज्यौ डफ बीकांण।।

सरदारसिंह के उत्तराधिकारी डूंगरसिंह की अंग्रेज परस्ती के विरुद्ध सामौर के रोष की अभिव्यक्ति इस प्रकार हुई-
हो-छोगो हिंदवाण रौ, अडिग फिरंती आण।
पत्थर पाट बिराजतां, बटटौ लग्यौ बीकांण।।

तांत्या की मदद करने से इन्कार करने पर गोपाळपुरा के ठिकानेदार हमीरसिंह को उपालंभ देते हुए कहा-
तन मोटो मोटो तखत, मोटो वंश गंभीर।
हुयौ देश हित क्यूं हमैं, (थारौ) मन छोटो हम्मीर।।

इस वजह से खेतड़ी के शासक को इन शब्दों में फटकारा-
खेतड़ी मिळा दूं भेळी रेतड़ी
आकां ऊन ज्यूं उड़ा दूं हुर्र् फुर्र्।।

युगचेतना के उद्गाता जनकवि के रूप में-
सामौर ने राजस्थानी काव्य को एक नई भाव-भूमि पर खड़ा कर दिया। दरबारी संरक्षण में पनपी और फली-फूली कविता के सरोकार सर्वथा भिन्न थे। राजस्थान में ब्रिटिश प्रभुत्व के विस्तार ने ऐसे हालात पैदा कर दिये थे जिनमें आप व्यक्ति का जीवन दुस्वप्न में बदल गया। अभाव व भुखमारी जनता की नियति बन गये। सामौर के काव्य में विदेशी शासन के फलितार्थों के साथ ही जन साधारण की व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। झोंपड़ियों में रहने वाले राष्ट्र के मेरुदण्ड स्वरूप धरती पुत्रों की महिमा व कष्ट गाथा, दोनों को उन्होंने उजागर किया। उनकी रचना 'वगत बायरौ` में अंग्रजी शासन शोषणकारी प्रवृत्ति और उससे हतश्री सामान्य जनता की दशा का चित्रण हुआ है तो 'देश दर्पण` में देश वासियों को उठ खड़े होने के उद्बोधन के साथ साथ झोंपड़ियों को राष्ट्र का सच्चा शृंगार बताते हुए उनकी महत्ता को रेखांकित किया गया है। 'वगत वायरौ` हालात को समझने की उनकी विश्लेषणात्मक प्रतिभा का उत्तम उदाहरण है। अंग्रेजी अमल की अनुगूंज उसमें सुनाई पड़ती है। जन सामान्य की विपदाओं से सर्वथा उदासीन सत्ताधारी वर्ग को झिंझोड़ने वाले इस जनकवि की व्यथा इस प्रकार प्रकट हुइ है-
हुयगा सह हुक्काम, मिळ अंगरेजां हूं मुरख।
आज दुख्यारण आम, रैयत बापड़ी रामजी।।
रह्यौ सह्यौ रुजगार, अंगरेजां खोस्यौ अठै।
भूखी किण विध भार, रैयत झालै रामजी।।
सजा मुख मली सेज, नर सूवै हुय हुय निशंक।
बै कांटां रा बेझ, रै क्यूं जाणै रामजी।।
मुगळां खो निज मत्त, सहर बिगाड़या सांतरा।
गांवां री आ गत्त, अंगरेजां की रामजी।।

स्वामी विवेकानन्द ने बारम्बार इस बात पर बल दिया था कि देश के उद्धरण की आशा दीन-हीन सामान्य जनों से ही है। सामौर ने अपनी कृत 'देश दर्पण` में इसी तथ्य को रेखांकित किया है, जब वे कहते हैं-
धिन झूंपड़ियां रा घण्यां, भुज थां भारत भारत।
हो थे ई इण मुलक रा, साचकला सिणगार।।
झूंपड़िया रहसी जितै, इण धरती पर अेक।
मिनखपणौ रहसी मतै, छळी कपटियां छेक।

ये दोहे इस बात को प्रमाणित करते हैं कि 'शंकरदान की साम्राज्य विरोधी चेतना क्रम से जनवाद की ओर अग्रसर हुई। सामौर ने कविता को आधुनिक विचारधारा से जोड़कर एक नयी सम्भावना जगायी। अब तक चली आ रही साहित्यिक व सामाजिक मान्यताओं को तोड़ा। कविता को स्वतंत्रता व राष्ट्रीयता से जोड़ा। अंग्रेजों को मुल्क के 'मीठे ठग` करार देकर उन्हें निकाल बाहर करने हेतु एक होने का मूलमंत्र देकर कवि ने युगधर्म निभाया। अपने समकालीनों में यह आव्हान करने वाले सामौर अकेले थे-
मिळ मुसळमान, रजपूत ओ मरेठा, जाट सिख पंथ छंड जबर जुड़सी।
दौड़सी देश रा दबियौड़ा, दाकल कर, मुलक रा मीठा ठग तुरत मुड़सी।।

जिस समय अधिकांश कवियों की देशभक्ति की भावना अपनी रियासत की सीमाओं से जुड़ी हुई थी, सामौर की वाणी में जाति, धर्म और प्रान्तीयता का अतिक्रमण करती हुई राष्ट्र के नवविहान की सूचक स्वतंत्रता की शंखध्वनि सुनायी पड़ती है।
शंकरदान सही अर्थों में अग्निधर्मा कवि थे। उन्हें गोरी सत्ता के विद्रोही कवि, गोळी हंदा गीतों के कवि के रूप में याद किया जाता है। जब अन्य कवियों के स्वर में राष्ट्रीयता तुतला रही थी, तब उनके स्वर में उसका प्रचंड गर्जन था। राजस्थानी कविता के माध्यम से व्यक्त राष्ट्रीयता की भावना को व्यक्त करने वाले कवियों में वे पांक्तेय थे। उनके काव्य में राष्ट्र के प्रति गौरवभाव व निर्भयता पदे पदे लक्षित होती है। उनके समकालिनों द्वारा कहे गये मरसियों से यह बात प्रमाणित होती है। उदाहरण स्वरूप ये मरसिये-
नह जणजै जग में निलज, दीण-हीण दबकेल
बेमाता हेकण भळै, जण शंकर जबरैल

- गिरधारीसिंह गारबदेसर
सुण्यौ निधन सामौर रौ, चट आयी आ चींत
कुण दकाल कहसी अबैं, गोळी जेहड़ा गीत
मीठा ठग इण मुलक रा, नहचै हुवा नचींत
बीतौ शंकर बाहरू, मुलक तणौ दृढ़ मींत

- पाबूदान बारहठ फोगां
रह्यौ हितू बण रैंत रौ, लाग लपट सह तोड़
नान्हां मिनखां हित लड़यौ, मुलक तणौ सिर मोड़


- डॉ. के. एल. राजपुरोहित 
ज. ना. व्यास वि.वि., जोधुपर के राजनीति विज्ञान विभाग में एसोसियेट प्रोफेसर

तालरिया मगरिया रे मोरू बाई लारे रया

Rao GumanSingh Guman singh


तालरिया मगरिया रे मोरू बाई लारे रया

आयो रे धोरां वाळो देश बीरो बिण्जारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

बीरो बिण्जारो रे यो म्हाने लागे प्यारो रे

आयो रे धोरां वालो देश बीरो बिण्जारो रे

आयो रे धोरां वालो देश बीरो बिण्जारो रे


कुण थाने बोल्या रे मोरू बाई बोलणा

कुण तो दिनी झिणी गाळ बीरो बिण्जारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

आयो रे धोरां वाळो देश बीरो बिण्जारो रे

आयो रे धोरां वालो देश बीरो बिण्जारो रे


सासूजी बोल्या रे मोरू बाई ने बोलणा

नळदल तो दिनी झिणी गाळ बीरो बिण्जारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

आयो रे धोरा वाळो देश बीरो बिण्जारो रे

आयो रे धोरा वाळो देश बीरो बिण्जारो रे


हरिया पोदीना

Rao GumanSingh Guman singh


ओ लुळ ओ झुक
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
ओ तने सिल पे बटांऊं हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
क्यारियां में बाऊं केवडो़ खेताँ में बाऊं हरियो पोदिनो
ओ लुळ ओ झुक
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
माथा पे ल्याई केवडो़ झोळी में ल्याई हरियो पोदिनो
ओ लुळ ओ झुक
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
सासूजी ने भावे केवडो़ सुसराजी ने भावे हरियो पोदिनो
ओ लुळ ओ झुक
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
जेठजी ने भावे केवडो़ जेठाणी ने भावे हरियो पोदिनो
ओ लुळ ओ झुक
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
देवेरजी ने भावे केवडो़ देवरानी ने भावे हरियो पोदिनो
ओ लुळ ओ झुक
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
ओ तने सिल पर बटांऊं हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना

बाजूबंद री लूम

Rao GumanSingh Guman singh


टूटे बाजूडा री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
टूटे बाजूबंद री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
कोई पंचरंगी लहेरिया रो पल्लो लहेराए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए
टूटे बाजूडा री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
टूटे बाजूबंद री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
कोई पंचरंगी लहेरिया रो पल्लो लहेराए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए
लागी प्यारी फुलवारी आतो झूम झूम जाए
ल्याई गोरी रो संदेशो घर आओ नी सजन
बैरी आंसुडा रो हार बिखर नही जाए
कोई चमकी री चुंदरी में सळ पड़ जाए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो री बयारिया
झालो सहयो नही जाए

म्हारो गोरबन्द नखराळो

Rao GumanSingh Guman singh


लड़ली लूमा झूमा ऐ लड़ली लूमा झुमा ऐ

ओ म्हारो गोरबन्द नखराळो आलिजा म्हारो गोरबन्द नखराळो

ओ लड़ली लूमा झूमा ऐ लड़ली लूमा झुमा ऐ

ओ म्हारो गोरबन्द नखराळो आलिजा म्हारो गोरबन्द नखराळो


ऐ ऐ ऐ गायाँ चरावती गोरबन्द गुंथियों

तो भेंसयाने चरावती मैं पोयो पोयो राज मैं तो पोयो पोयो राज

म्हारो गोरबन्द नखराळो आलिजा म्हारो गोरबन्द नखराळो

ओ लड़ली लूमा झूमा ऐ लड़ली लूमा झुमा ऐ

ओ म्हारो गोरबन्द नखराळो आलिजा म्हारो गोरबन्द नखराळो


ऐ ऐ ऐ ऐ खारासमद सूं कोडा मंगाया

तो बिकाणे तो गड़ बिकाणे जाए पोया पोया राज मैं तो पोया पोया राज

म्हारो गोरबन्द नखराळो आलिजा म्हारो गोरबन्द नखराळो

ओ लड़ली लूमा झूमा ऐ लड़ली लूमा झुमा ऐ

ओ म्हारो गोरबन्द नखराळो आलिजा म्हारो गोरबन्द नखराळो


ऐ ऐ ऐ ऐ देराणी जिठणी मिल गोरबन्द गुंथियों

तो नडदल साचा मोती पोया पोया राज मैं तो पोया पोया राज

म्हारो गोरबन्द नखराळो आलिजा म्हारो गोरबन्द नखराळो

ओ लड़ली लूमा झूमा ऐ लड़ली लूमा झुमा ऐ

ओ म्हारो गोरबन्द नखराळो आलिजा म्हारो गोरबन्द नाखारालो


कांच री किवाडी माथे गोरबन्द टांकयो

तो देखता को हिवडो हरखे ओ राज हिवडो हरखे ओ राज

म्हारो गोरबन्द नखराळो आलिजा म्हारो गोरबन्द नखराळो

ओ लड़ली लूमा झूमा ऐ लड़ली लूमा झुमा ऐ

ओ म्हारो गोरबन्द नखराळो आलिजा म्हारो गोरबन्द नाखारालो



ऐ ऐ ऐ ऐ डूंगर चढ़ ने गोरबन्द गायो

तो झोधाणा तो झोधाणा क केडी हैलो सांभळो जी राज हैलो सांभळो जी राज

म्हारो गोरबन्द नखराळो आलिजा म्हारो गोरबन्द नखराळो

ओ लड़ली लूमा झूमा ऐ लड़ली लूमा झुमा ऐ

ओ म्हारो गोरबन्द नखराळो आलिजा म्हारो गोरबन्द नाखारालो


ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ

Rao GumanSingh Guman singh


ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ

घुमर रमवा म्हें जास्याँ

ओ राजरी घुमर रमवा म्हें जास्याँ

ओ म्हाने रमता ने काजळ टिकी लादयो ऐ माँ

घुमर रमवा म्हें जास्याँ

ओ राजरी घुमर रमवा म्हें जास्याँ

ओ म्हाने रमता ने लाडूङो लादयो ऐ माँ

घुमर रमवा म्हें जास्याँ .

ओ राजरी घुमर रमवा म्हें जास्याँ .

ओ म्हाने परदेशियाँ मत दीजो रे माँ

घुमर रमवा म्हें जास्याँ

ओ राजरी घुमर रमवा म्हें जास्याँ

ओ म्हाने राठोडा रे घर भल दीजो ऐ माँ

घुमर रमवा म्हें जास्याँ

ओ राजरी घुमर रमवा म्हें जास्यां

ओ म्हाने राठोडा री बोली प्यारी लागे ऐ माँ

घुमर रमवा म्हें जास्याँ

ओ राजरी घुमर रमवा म्हें जास्यां

ओ म्हारी घुमर छे नखराळी ऐ माँ

घुमर रमवा म्हें जास्याँ ...


सपना तूं सोभागियो

Rao GumanSingh Guman singh


सुपने में प्रीतम मिल्या, हूँ लागी गळ रोय।
डरपत पलक न खोळ ही, मत बिछोहो होय॥

जिण
ने सुपने देखती, प्रगट भया पिव आय।
डरती आंख न मूंदहीं, मत सुपनो हुय जाय॥

सुपना तोहि मरावसूं, हिये दिरावूं छेक।
जद सोवूं तद दो जणां, जद जागूँ तद एक॥

हूंता सखी मौ हीवडै, सायणां हंदा हत्थ।
जो सपनो सांचौ हुवै, सपनो बड़ी वसत्त॥

सुपने प्रियतम मुझ मिल्यां, हूँ ळागी गळ रोय।
डरपत पळक न खोल ही, मत सपनो हो जाय॥

सुपनो आयो फिर गयो, मैं सर भरिया रोय।
आव सुहागण नींदड़ी, वळि पिउ देखूं सोय॥

सपना तूं सो भागियो, उत्तम थारी जात।
सो कोसां साजण वसै, आण मिलावै रात॥

उदियापुर री कामनी

Rao GumanSingh Guman singh


उदियापुर री कामनी,गोए काढे गात्र।
देव तारा मन डगे, मानवीया कुण मात्र॥

चलो व्रज नार चलो ब्रजनार
खेल देखो पनिहारन का
रुमक जुमक चाल चलें,गज छुटा फौजदारन का

तेरे ललाट पे बूंद पर्यो
जाणे हार तुटा लखचारण का
सेंथापुर के आई खड़ी
जाणे घाव लगा तलवारन का

नगर ठठा मुलताण में, ऐसीं नहिं कामनी
गले मोतनकी माल, दमंके जणे दामनी

छुटा मेली केश, अंबोडो छोड़ के
उभी सरोवर पाल, मृगली अंग मरोड़कें