बोलैनीं हेमाणी.....
जिण हाथां सूं
थें आ रेत रची है,
वां हाथां ई
म्हारै ऐड़ै उळझ्योड़ै उजाड़ में
कीं तो बीज देंवती!
थकी न थाकै
मांडै आखर,
ढाय-ढायती ई उगटावै
नूंवा अबोट,
कद सूं म्हारो
साव उघाड़ो औ तन
ईं माथै थूं
अ आ ई तो रेख देवती!
सांभ्या अतरा साज,
बिना साजिंदां
रागोळ्यां रंभावै,
वै गूंजां-अनुगूंजां
सूत्योड़ै अंतस नै जा झणकारै
सातूं नीं तो
एक सुरो
एकतारो ई तो थमा देंवती!
जिकै झरोखै
जा-जा झांकूं
दीखै सांप्रत नीलक
पण चारूं दिस
झलमल-झलमल
एकै सागै सात-सात रंग
इकरंगी कूंची ई
म्हारै मन तो फेर देंवती!
जिंयां घड़यो थेंघड़ीज्यो,
नीं आयो रच-रचणो
पण बूझण जोगो तो
राख्यो ई थें
भलै ई मत टीप
ओळियो म्हारो,
रै अणबोली
पण म्हारी रचणारी!
सैन-सैन में
इतरो ई समझादै-
कुण सै अणदीठै री बणी मारफत
राच्योड़ो राखै थूं
म्हारो जग ऐड़ो? [‘जिण हाथां आ रेत रचीजै’ से ]
आँख्या-गीड़, उमड़ती भीड़
हवेली री पीड़
सूनी छोड़ग्या बेटी रा बाप !
बुझाग्या चुल्है रो ताप
कुण कमावै, कुण खावै
कुण चिणावै, कुण रेवै !
जंगी ढोलां पर चाल्योड़ी तराड़
बोदी भींता रा खिंडता लेवड़ा
भुजणता चितराम
चारूंमेर लाग्योड़ी लेदरी
बतावै भूत-भविस अ’र वरतमान
री कहाणी ! कीं आणी न जाणी !
आदमखोर मिनख
बैंसग्या पड्योड़ा सांसर ज्यूं
भाखर मांय टांडै
जबरी जूण’र जमारो मांडै !
काकोसा आपरै जींवतै थकां
ई भींत पर
एक कीड़ी नी चढ़णै देवतां
पण टैम रै आगै कीं रो जोर ?
काकोसा खुद कांच री फ्रेम में
ऊपर टंगग्या
पेट भराई रै जुगाड़ मैं
सगळो कडुमो छोड्यो देस
बसग्या परदेस,
ठांवा रै ताळा, पोळ्यां में बैठग्या
ठाकर रूखाळा।
टूट्योड़ी सी खाट
ठाकरां रा ठाट
बीड्यां रो बंडल, चिलम’र सिगड़ी
कुणै में उतर्योड़ो घड़ो
गण्डक अ’र ससांर घेरणै तांई
एक लाठी
अरड़ावै पांगली पीड़ स्यूं गैली
बापड़ी सूनी हवेली !-डॉ. एस.आर.टेलर
यह बात हम सभी मानते हैं कि इस समाज ने समाज-सेवा, शिक्षा, धर्म, चिकित्सा, आकस्मिक आपदाओं, प्राकृतिक विपदाओं, काल-अकाल आदि दुर्योगों के समय तथा अन्य विविध क्षेत्रों के साथ-साथ हिन्दी साहित्य सेवा के अलावा भी समस्त भारतीय भाषा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। विद्वानों, साहित्यकारों, कलाकारों, आदि को सम्मानपूर्वक आर्थिक सहयोग प्रदान कर उनके जीवन को सुगम बनाने में अपनी भूमिका का निर्वाह भी करता रहा है, जबकि इस तरह का कार्य इतर समाज में देखने को कम ही मिलता है, जो थोड़ा बहुत मिलता है, उसका कार्यक्षेत्र स्वयं के समाज तक सिमटा नजर आता है, कुछ सामाजिक संस्थाओं को छोड़ दिया जाय तो, आंकड़े भी मिलने संभव नहीं है। जो वैगर सरकारी सहयोग के कार्य किया हो। यह एक अलग बहस का विषय है, मैं इस विवाद की तरफ नहीं जाना चाहता, किसने क्या काम किया, इस लेख में सिर्फ यह बात जानने का प्रयास करूँगा कि आखिर वे कौन-कौन से कारण हो सकते हैं जिसके चलते मारवाड़ी समाज इतर समाज में कुंठा का कारण बना रहता है। इन तमाम कार्यों के विपरीत मारवाड़ी समाज ने एक छोटी किन्तु भारी गलती भी की। वह गलती है समाज के इतिहास को महत्व न दिया जाना, यदि कहिं कुछ थोड़ा बहुत छपा भी तो उन प्रकाशनों में सम्पन्नता झलकती है। इस छोटी सी गलती ने समस्त मारवाड़ी समाज के तमाम कार्यों पर पानी फेर रखा है। हम अपने बच्चों को स्वाभिमान की जिन्दगी जीने लायक नहीं रख पाये। इसके लिये हमें आस-पास के परिवेश में मारवाड़ी समाज के प्रति व्याप्त कुंठा के लिये हम अपने ही समाज को दोषी ठहरा सकते हैं। इस कौम की एक विशेषता यह भी है कि वह किसी भी घटना का प्रतिवाद न कर हमेशा से 'आत्म-सुरक्षा' का रुख अख्तियार करता रहा है। यह आत्म-सुरक्षा, किसी आत्म-सम्मान की सूचक नहीं वरन् अपमान भरी भावना का घूँट पीने जैसा है। इस आत्म-सूरक्षा का दूसरा पहलू इस रूप में सामने आता है कि भयभीत मानसिकता के प्रतिफल के रूप में अपने बच्चों की मानसिकता को कमजोर करते हुए, कई बार यह कहते पाये जाते थे - "छोड़ ण आपणो के लेव - जाण दे" या फिर " मांयणे आकर सांकली लगा ले" अर्थात स्वयं पर कोई बात होने पर कहता है - छोद़ दो, अपना क्या लेता है, या किसी आस-पड़ोस की तकलीफ में खड़ा न होकर यह कहते पाया जाता है - 'घर के अन्दर आ जाओ और दरवाजा बन्द कर लो' । मारवाड़ी समाज सामाजिक तो है , पर की बार ऎसा लगता है कि सामाजिक प्राणी नहीं है। मैने कई बार पाया है कि कुछ लोग मेरे द्वारा स्वयं के समाज के प्रति की गई टिप्पणियों को गलत तरीके से इस्तमाल करते हैं खास कर ऎसे लोगों से मेरा निवेदन रहेगा कि वैगर किसी संदर्भ के किसी पेरा को मोटे अक्षरों में दिखाने से पूर्व अपनी बात को रखें ताकि हमारे समाज तक आपकी भावना का सही अवलोक भी साथ में किया जा सकेगा। समाज में राजनैतिक परिवेश: एक समय था जब इस समाज का प्रतिनिधित्व, समाज के चन्द पूँजीपति घराने तक ही सिमटा हुआ था, उनके द्वारा दिये गये या सुझाये गये नाम को ही संसद या विधानसभा में स्थान दिया जाता रहा। अब यह स्थिति काफी बदल चुकी है, जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओँ ने अपनी पहचान कायम की है। साथ ही साथ समाज का झूकाव एक दल की तरफ न होकर काफी फैल चुका है। आजादी के समय कांग्रेस को खुला समर्थन देने वाले समाज ने साथ ही साथ को जनसंघ वर्तमान में भाजपा को भी सहयोग दिया। परन्तु यहाँ यह बात भी महत्वपूर्ण है कि ये लोग राजनीति को कभी नजदीक से नहीं देखते थे, परोक्ष रूप से आर्थिक सहयोग देना, एवं सत्ताधारी दल से अपने फायदे या उद्योग व्यापार से जुड़ी बातों से ही अपना मतलब रखते थे। किसी सभा का आयोजक बनकर उस सभा का खर्च जुगार करने वाले वफादार कार्यकर्त्ता माने जाते थे। अब इस दिशा में भी इनकी पहचान गौण, बल्कि यूँ लिखा जा सकता है कि राजनैतिक दलों को सोच में काफी बदलाव देखने को मिला है, एक तरफ सभी दल धर्म की आड़ में एक विशेष संप्रदाय के वोटरों को लुभाने हेतु मिथ्या धर्मनिपेक्षता का चोला पहन रखें हैं और एक धर्म को केन्द्र कर अपने दल की राजनीति करने में लगे हैं वहीं कुछ प्रन्तीय स्तर के दल जात-पात की राजनीति करने में लग गये, इनकी इस राजनिति का परिणाम अभी हाल ही में हमें महाराष्ट्र के अन्दर देख्ने को मिला। यह बात हमें मान लेनी चाहिये कि भारत की एकता न तो जातिय आधार की राजनीति में समाहित हो सकती है न ही धर्म की राजनीति में, ये दोनों सिद्धान्त कुछ समय तक भले ही किसी को सत्ता में ला दे लेकिन दूरगामी परिणाम कफी भी अच्छे नहीं हो सकते। मारवाड़ी समाज का वर्तमान राजनैतिक परिवेश शुन्य में भटक चुका है। राजस्थान के सांसद, विधायक अपने को मारवाड़ी नहीं मानते, और मारवाड़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग इतने सक्षम नहीं की वे अपने बुते किसी भी क्षेत्र से विधायक या सांसद बन सके, यह बात सही है कि समाज के कई लोगों ने इस क्षेत्र में अपनी पहचान कायम की है जिसमें असम के स्व.हीराला पटवारी, एवं स्व. राधाकिशन खेमका, श्री कमला प्रसाद अग्रवाला (तेजपुर), बंगाल से स्व.विजयसिंह नाहर, स्व.प्रभुदयाल हिम्मतसिंका, स्व.ईश्वरदास जालान,श्रीमती सरला माहेशवरी,श्री राजेश खेतान, श्री संतोष बागड़ोदिया, स्व.देवकीनन्दन पौद्दार, श्री सत्यनारायण बजाज एवं अब इनके पुत्र- श्री दिनेश बजाज(कोलकात्ता), बिहार से स्व.सीताराम चमड़ीया, श्री शंकर टेकरीवाल (छपड़ा), श्री सुशील मोदी, श्री धिरेन्द्र अग्रवाल(छपड़ा), श्री बनरसी प्रसाद झूणझूणवाला(Bhagalpur), श्रीमती राजकुमारी हिम्मतसिंहका केन्द्रीय स्तर पर स्व.लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, वर्तमान में उनके पुत्र श्री अभिषेक सिंघवी, महाराष्ट्र प्रान्त के श्री राज के पुरोहित, डॉ जयप्रकाश मुंदड़ा,श्री मुरली देवड़ा, श्री दिलीप कु.मनसुखलाल गांधी, दिल्ली प्रान्त से श्री जयप्रकाश अग्रवाल श्री गोयल जी , उत्तरप्रदेश: श्री होती लाल अग्रवाल, श्री विरेन्द्र अग्रवाला(मुरादावाद) श्री मुकुन्दलाल अग्रवाल(वरेली)मध्यप्रदेश: श्री कमलनयन बजाज,श्री बी.आर.नाहटा, श्री श्रीमन नारायण अग्रवाल( वर्धा), श्री श्रीकृष्ण अग्रवाल (Mahasamund), श्री कल्याण जैन(Indore)पंजाब- श्री श्रीचंद गोयल, हरियाणा: श्री ओमप्रकाश जिंदल, श्री नवीन जिंदल इसमें कई प्रन्तों से विधायकों के नाम जोड़े जाने बाकी हैं ( मेरी जानकारी में नहीं होने के चलते नहीं जोड़ पाया हूँ, आपके पास कोई जानकारी हो तो मेल द्वारा सूचित करेगें-लेखक) ऊपर में राजस्थान से सिर्फ स्व.लक्ष्मीमल सिंघवी व उनके पुत्र वर्तमान में श्री अभिषेक जी का नाम ही जोड़ा गया है, वैसे इन दिनों मारवाड़ी युवा मंच के एक कार्यक्रम में श्रीमती सुषमा स्वराज ने भी अपनी पहचान मारवाड़ी होने की दी है। इन लोगों के अलाव भी बहुत सारे नाम है जिन्हें इस सूची में जोड़े जा सकता हैं। इन सबके होते हुए भी यह लिखने में मुझे जरा भी झीझक नहीं है, कि ये समाज राजनीति स्तर पर राजनैतिक दलों में अपनी पहचान बनाने में कसी भी प्रकार से सफल नहीं दिखते। हाँ, बिहार में श्री सुशील मोदी और दिल्ली के श्री अभिषेक सिंघवी को छोड़ दिया जाय तो सभी व्यापारी श्रेणी में ही आंके जा सकते हैं। मेरे कहने का अर्थ यह नहीं कि इनका व्यापारी होना समाज के लिये अच्छा नहीं था, मेरा मानना है कि राजनीति में जाना हो तो व्यापार की बात समाज को सोचना बन्द करके शुद्ध रूप से राजनीति करनी चाहिये। मारवाड़ी भले ही किसी राजनैतिक पार्टी का कोषाध्यक्ष बनकर अपने आपको महान समझता रहे, परन्तु मैं मानता हूँ कि यह समाज के लिये मात्र कमजोरी वाली बात है, मुझे खुशी है कि मारवाड़ी सम्मेलन के वर्तमान अध्यक्ष श्री सीताराम शर्मा ने अपने सत्र में राजनैतिक रूप से सजग होने के लिये एक अभियान चलाया है, जिसमें समाज को वोटर लिस्ट में अपने व अपने परिवार का नाम दर्ज कराना, चुनाव के दिन मतदान में हिस्सा लेना, व वोट डालने के लिये समय पर जाना, साथ ही धन के बजाय जंमीनीस्तर की राजनीति करने की सलाह दी गई है। हमारा समाज अभी तक राजनैतिक स्तर पर अपना सही प्रतिनिधित्व नहीं कर पाया है और न ही इसके लिये कोई सोच तैयार कर पा रहे हैं ना ही कोई संगठित ढाँचा है, जिस पर केंद्रित होकर काम किया जा सके। मेरा सोचना है कि आज के वर्तमान दृश्य को ध्यान में रखते हुये मारवाड़ी समाज को देश की राजनीति में हिस्सेदारी निभाने के लिये नई भूमिका क निर्वाह करना होगा, न कि केवल भामाशाह के रूप में , जैसा कि होता आया है। क्रमशः लेख आगे जारी रहेगा, आप अपनी राय से मझे अवगत कराते रहें - शम्भु चौधरी http://groups.google.com/group/hindibhasha http://groups.google.com/group/samajvikas http://samajvikas.in


मारवाड़ी शब्द वर्तमान समय में संकुचित और रूढ़ीगत दायरे की चपेट से बाहर आने लगा है। धीरे-धीरे यह शब्द देश के विकास का सूचक बनता जा रहा है, एक समय था जब समाज के लोग भी इसे घृणा का पर्यावाची सा मानने लगे थे। मंच के कुछ जागरूक सदस्यों ने मेरा मंच ब्लॉग पर इस बात पर एक परिचर्चा शुरू की है। जहाँ तक मेरा मानना है कि 'मारवाड़ी' - शब्द न कोई जाति, न धर्म और न ही किसी प्रान्त का द्योतक है जैसे- पंजाबी, बंगाली, गुजराती आदि कहने से अहसास होता है। राजस्थान एवं हरियाणा व पंजाब के कुछ सीमावर्ती इलाके के प्रवासी लोगों को भारत के अन्य प्रान्तों या विदेशों में भी इस समाज को 'मारवाड़ी ' शब्द से जाना व पहचाना जाता है, वहीं इसी प्रान्त के मुसलमान समाज ने अपने आपको इस शब्द से अलग ही कर रखा हैं [कुछ अपवादों को छोड़कर]। जबकि अन्य धर्म व संप्रदाय के सभी लोगों को जिसमें विशेषत: हिन्दू, जैन, ओसवाल, माहेश्वरी, ब्राह्मण, राजपुत, बनीया आदि सभी धर्म जाति के लोग शामिल पाये जाते हैं। यहाँ पंजाब और हरियाणा क्षेत्र के राजस्थानी जो एक समय राजपुताने क्षेत्र में ही आते थे, अब भूगौलिक परिवर्तन व पंजाब और हरियाणा प्रान्तों के रूप में जाने जाने के चलते इस क्षेत्र का मारवाड़ी समाज अपने आपको पंजाबी या हरियाणवी ही मानने लगे हैं, जबकि इनकी बोलचाल-भाषा, पहनवे, रीति-रिवाज, राजस्थानी भाषा संस्कृति से मिलते ही नहीं राजस्थानी संस्कृति ही हैं, इसीलिए प्रवासी मारवाड़ी समाज के लिये आम तौर पर राजस्थानी शब्द का ही प्रयोग किया जाता है भले ही वे हरियाणा या पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र से ही क्यों न आतें हों पीछले दिनों श्री राजेश कुमार जैन ने यह प्रश्न उठाया था कि मारवाड़ी से तात्पर्य जब राजस्थानी भाषा और संस्कृति से ही लगाया जाता है तो हरियाणा की क्या कोई साहित्य या अपनी संस्कृति नहीं है? यह प्रश्न आज की युवा पीढ़ी का उठाना वाजिब सा लगता है जब हरियाणा एक समय पंजाब के अन्तर्गत आता था तो यह बात पंजाब के साथ भी उठती थी की हरियाणा की अपनी अलग संस्कृति है इस पंजाब से अलग कर दिया जाय और हुआ भी ऎसा ही पंजाब ने यह स्वीकार किया कि हरियाणा को एक अलग राज्य का दर्जा देना ही उचित रहेगा। परन्तु इस राज्य के अलग दर्जे को प्राप्त कर लेने से जो क्षेत्र राजस्थान रियासतों के अधिन आते थे उनकी भाषा, संस्कृति, पहनावे, खान-पान , रीति-रिवाज हो या पर्व त्योहारों सभी में एक समानता पाई जाती थी जो थोड़ा बहुत अन्तर था तो वह सिर्फ बोली का ही था। देखें नीचे दिये गये एक चित्र के लाल निशान को जिसमें हिसार, भिवानी, रोहतक, गुड़गावं, लेहारू, महेन्द्रगढ़, पटियाला और दिल्ली का भी छोटा सा भाग राजपुताने क्षेत्र में दिखाया हुआ है। जो इन दिनों
आज एक महत्वपूर्ण प्रश्न मारवाड़ी समाज के साथ जुड़ सा गया है। - क्या वह
उधार की जिन्दगी जी रहा है, या किसी के एहशान के टूकड़ों पर पल रहा है?
या फिर किसी हमदर्दी और दया का पात्र तो नहीं? मारवाड़ी समाज का प्रवासीय
इतिहास के तीन सौ वर्षों के पन्ने अभी तक बिखरे पड़े हैं। न तो समाज के
अतीत को इसकी चिंता थी, नही वर्तमान को इसकी फिक्र। घड़ी की टिक-टीक ने
इस सन्नाटे में अचानक हलचल पैदा कर दी है। - विभिन्न प्रन्तों में हो रहे
जातिवाद, आतंकवाद, साम्प्रदायिकता की आड़ में मारवाड़ी समाज के घ्रों को
जलाना एवं लूट लेना । साथ ही, राजनैतिक दलों का मौन रहना, मुगलों के
इतिहास को नए सिरे से दोहराते हुए स्थानीय आततायियों के रूप में
मौकापरस्त लोग एसी हरकतों से कुछ सोचने पर मजबूर कर देते हैं।
'जात- जडूला' या 'गठजोड़
यह प्रश्न आज के परिप्रेक्ष्य में हमारे मानस-पटल पर उभर कर सामने आता है
कि अपने मूल स्थान से हमने जन्म-जन्मान्तर का नाता तोड़-सा लिये। पहले तो
समाज के लोग साल में एक दफा ही सही 'देस' जाया करते थे। अब तो बच्चों को
पता ही नहीं कि उनके पूर्वज किस स्थान के थे। एक समय था जब 'जडूला' या
'गठजोड़ की जात' देस जाकर ही दिया जाता था, समाज में कई ऎसे उदाहरण हैं,
जिसमें बाप-बेटा और पोता, तीनों का 'जडूला' और 'गठजोड़ की जात' एक साथ
ही 'देस' जाकर दी । यहाँ यह कहना जरूरी नहीं कि हमारा अपने मूल स्थाना
से कितना गहरा संबंध रहा और कितना फासला है। इन दिनों 'जडूला' तो
स्थानीय प्रचलन एवं मान्यताओं से जूड़ती जा रही है। जो जिस प्रदेश में या
देश में है, वे उस प्रदेश या देश के अनुकुल अपनी-अपनी अलग प्रथा बनाते जा
रहे हैं, आने वाली पीढ़ी का अपने मूल प्रदेश से कितना मानसिक लगाव रह
जायेगा, इस पर संदेह है। वैसे भी एक स्थति और भी है, वर्तमान को ही देखें
- 'मारवाड़ी कहने को तो अपने आपको रास्थानी मानते हैं,परन्तु राजस्थान के
लोग इसे मान्यता नहीं देते। यदि कोई प्रवासी राजस्थानी वहाँ जाकर पढ़ना
चाहे तो उसे राजस्थानी नहीं माना जाता। क्योंकि उसका मूल प्रान्त
राजस्थान नहीं है। यह कैसी व्यवस्था ? असम , बंगा़ल, उडिसा जैसे अहिन्दी
भाषी प्रान्त इनको प्रवासी मानते हैं, और राजस्थान इनको अपने प्रदेश का
नहीं मानता। असम में असमिया मूल के छात्र को और राजस्थान में राजस्थान
मूल के छात्रों को ही दाखिला मिलेगा तो यह कौम कहाँ जाय?
प्रान्तीय भाषा
मुड़िया में मात्रा की कमी के चलते हिन्दी भाषा के साथ-साथ अन्य प्रन्तीय
भाषाओं ने इस प्रवासी समाज के अन्दर अपना प्रमुख स्थान ग्रहन कर लिया ।
कई प्रवासी मारवाड़ी परिवार ऎसे हैं जिनको सिर्फ बंगला, असमिया, तमील, या
उड़िया भाषा ही लिखाना, बोलना और पढ़ना आता है, कई परिवार में तो
राजस्थानी की बात तो बहुत दूर उनको हिन्दी भी ठीक से बोलना-पढ़ना नहीं
आता, लिखने की कल्पना ही व्यर्थ है।
पर्व-त्यौहार
बिहार में 'छठ पूजा' की बहुअत बड़ी मान्यता है,ठीक वैसे ही बंगाल मैं
'दुर्गा पूजा', 'काली पूजा', असम में 'बिहू उत्सव', महाराष्ट्र में 'गणेश-
महोत्सव, उड़ीसा में 'जगन्नाथ जी की रथयात्रा', दक्षिण भारत में 'ओणम-
पोंगल', राजस्थान में होली-दिवाली, गुजरात में डांडीया-गरबा, पंजाब में
'वैशाखी उत्सव' आदि पर्व व त्योहरों की विषेश मान्यता है, असके साथ ही
हिन्दू धर्म के अनुसार कई त्योहार मनाये जाते हैं जिसमें राजस्थान में
विषेशकर के राखी, गणगोर की विषेश मान्यता है, गणगोर तो राजस्थान व
हरियाणावासियो का अनुठा त्योहार माना जाता है। जैसे-जैसे मारवड़ी समाज के
लोग इन प्रान्तों में बसते गये, ये लोग अपने पर्व के साथ-साथ स्थानीय
मान्यताओं के पर्व व त्योहारों को अपनाते चले गये। बिहार के मारवाड़ी तो
छठ पूजा ठीक उसी तरह मानाने लगे, जैसे बिहार के स्थानीय समाज मानाते हैं
यहाँ यह बताना जरूरी है कि जो मारवाड़ी परिवार कालान्तर बिहार से उठकर
किसी अन्य प्रदेश में बस गये, वे आज भी छठ पूजा के समय ठीक वैसे ही बिहार
जाते हैं जैसे बिहार के मूलवासी इस पर्व को मनाने जाते हैं। अब विवशता यह
है कि राजस्थान के बिहार के मारवाड़ी को बिहारी, असम के मारवाड़ियों को
असमिया, बंगाल व उड़ीसा के मारावाड़ियों को बिहारी, बंगाली, असमिया, या
उड़िया समझते हैं, एवं स्थानीय भाषायी लोग मारवाड़ियों को राजस्थानी
मानते हैं। विडम्बना यह है,कि मारवाड़ी कहने को तो रजस्थानी है, परन्तु
राजस्थान के लोग इसे राजस्थानी नहीं मानते।
लोगों का भ्रम:
आम तौर पर लोगों को यह भ्रम है कि मारवाड़ी समाज एक धनी-सम्पन्न समाज है,
परन्तु सच्चाई इस भ्रम से कोसों दूर है। यह कहना तो संभव नहीं कि
मारवाड़ी समाज में कितने प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, हाँ ! धनी
वर्ग का प्रतिशत इतर समाज के अनुपात में नहीं के बराबर माना जा सकता है।
उद्योग-व्यवसाय तो सभी समाज में कम-अधिक है। प्रवासी राजस्थानी, जिसे
हम देश के अन्य भागों में मारवाड़ी कह कर सम्बोधित करते हैं या जानते
हैं, अधिकतर छोटे-छोटे दुकानदार या फिर दलाली के व्यापार से जुड़े हुए
हैं, समाज के सौ में अस्सी प्रतिशत परिवार तो नौकरी-पेशा से जुड़े हुए
हैं, शेष बचे बीस प्रतिशत का आधा भा़ग ही संपन्न माना जा सकता है, बचे दस
प्रतिशत भी मध्यम श्रेणी के ही माने जायेगें। कितने परिवार को तो दो जून
का खाना भी ठीक से नसीब नहीं होता, बच्चे किसी तरह से संस्थाओं के सहयोग
से पढ़-लिख पाते हैं। कोलकाता के बड़ाबाजार का आंकलन करने से पता चलता है
कि किस तरह एक छोटे से कमरे में पूरा परिवार अपना गुजर-बसर कर रहा है।
इस समाज की एक खासियत यह है कि यह कर्मजीव समाज है, मांग के खाने की जगह
कमा कर खाना ज्याद पसंद करता है, समाज के बीच साफ-सुथरा रहना अपना
कर्तव्य समझता है, और कमाई का एक हिस्सा दान-पूण्य में खर्च करना अपना
धर्म। शायद इसलिए भी हो सकता है इस समाज को धनी समाज माना जाता हो, या
फिर विड़ला-बांगड़ की छाप इस समाज पर लग चुकी हो। ऎसा सोचना कि यह समाज
धनी समाज है, किसी भी रूप में उचित नहीं है। आम समाज की तरह ही यह समाज
भी है, जिसमें सभी तबके के लोग हैं , पान की दुकान, चाय की दुकान, नाई ,
जमादार, गुरूजी(शिक्षक), पण्डित जी (ब्राह्मण), मिसरानी ( ब्राह्मण की
पत्नी), दरवान, ड्राईवर, महाराज ( खाना बनाने वाले), मुनीम (खाता-बही
लिखने वाला) ये सभी मारवाड़ी समाज में होते हैं इनकी आय भारतीय मुद्रा के
अनुसार आज भी दो - तीन हजार रूपये प्रतिमाह (कुछ कम-वेसी) के आस-पास ही
आंकी जा सकती है। यह बात सही है कि समाज में सम्पन्न लोग के आडम्बर से
गरीब वर्ग हमेशा से शिकार होता आया है, यह बात इस समाज पर भी लागू होती
है।
आडम्बर:
मारवाड़ी समाज के एक वर्ग को संपन्न समाज माना जाता है, इनके कल-कारखाने,
करोबार, उद्योग, या व्यवसाय में आय की कोई सीमा नहीं होती, ये लो़ग जहाँ
एक तरफ समाज के सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते पाये जाते
हैं वहीं दूसरी तरफ अपने बच्चों की शादी-विवाह, जन्मदिन का जश्न मनाने
में, या सालगिरह के नाम पर आडम्बर को भी मात देने में लग जाते हैं, उस
समय पता नही इतना धन कहाँ से एकाएक इनके पास आ जाता है, जिसे पानी की तरह
बहाने में इनको आनन्द आता है, अब कोलकाता में तो बहार से आकर शादी करना
एक फैशन सा बनते जा रहा है, बड़े-बड़े पण्डाल, लाखों के फूल-पत्ती, लाखों
की सजावट, मंहगे-मंहगे निमंत्रण कार्ड, देखकर कोई भी आदमी दंग रह जायेगा।
सबसे बड़ा हास्यास्पद तब लगता है, जब कोई समाज की सभाओं में इन आडम्बरों
के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें तो करता है, जब खुद का समय आता है तो यही
व्यक्ति सबसे ज्यादा अडम्बर करते पाया जाता है। एक-दो अपवादों को छोड़
दिया जाय तो अधिकांशतः लोग समाज के भीतर गन्दगी फैलाने में लगे हैं। इनका
इतना पतन हो चुका है कि इनको किसी का भय भी नहीं लगता। समाज के कुछ दलाल
किस्म के हिन्दी के पत्रकार भी इनका साथ देते नजर आते हैं। चुंकि उनका
अखबार उनके पैसे से चलता है इसलिये भी ये लाचार रहतें हैं, दबी जुबान
थोड़ा बोल देते हैं परन्तु खुलकर लिखने का साहस नहीं करते। इन पत्रकारों
की मानसिकता इतनी गिर चुकी है कि, कोई भी इनको पैसे से खरिद सकता है,
भाई ! पेट ही तो है, जो मानता नहीं। अखबार इनलोगों से चलता है, इनका घर
इनकी दया पर चलता है, तो कलम का क्या दोष वह तो इनके दिमाग से नहीं इनके
हाथ से चलती है।
इन पत्रकारों के पास न तो कलम होती है, न ही हाथ य लुल्ले पत्रकार होते
हें , इनके पास सिर्फ कगज छापने की एक लोहे की मशीन भर होती है, बस ,
भगवान ही इनका मालिक होता है, दिमाग भी इतना ही दिया कि ये बस मजे से खा
सकते हैं। इनका समाज में किसी भी प्रकार का सामाजिक दायित्व नहीं के
बराबर है।
