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राख्यां चावो जड़ां जीवती, द्यो मायड़ नै मान

Rao GumanSingh Guman singh


भारत नै आजाद हुयां 57 बरस होग्या, पण राजस्थानी भाषा नै, जिकी 15 करोड़ (प्रवासी 7 करोड़) लोगां री भाषा है, भारत रै संविधान में मान्यता नहीं देणो - संविधान री घोर अवमानना है। जनतांत्रिक संविधान में संविधान री जड़ पर कुठाराघात कर्यो गयो है, आ घणी चिन्ता री बात है। राजस्थान विधानसभा में राजस्थानी नै सर्वसम्मत संकल्प सैं पारित कर केन्द्रीय सरकार नै भेज्यो, पण बीं पर तानाशाही राजनेता विचार तक कोनी कर्यो, आ राजस्थानियां सारू अपमानजनक बात है। अब समै आग्यो है कै सब राजस्थानी एकजुट होय जन-जागरण वास्तै अभियान सरू करै। ईं अभियान रो पैलो चरण होसी राजस्थानी रै लियै जन-जागरण - अर ईं काम रै लियै राजस्थान रै हर जिलै में एक समिति गठित करी जावै। इण रा कार्यकर्ता तहसीलां अर पंचायत समितियां ताईं लोगां नै राजस्थानी भाषा री महत्ता री जाणकारी देवै अर उणां नै ईं मुद्दै पर सावचेत करै। जन-जागरण नै प्रभावशाली बणाणै सारू कार्यकर्ता पैदल यात्रा करै अर ढाणी-ढाणी ताईं राजस्थानी रो संदेश पुगावै। ईं जन-जागरण रै बारै में गठित समिति 'राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी' नै सही रपट भेजै। ईं रै बाद में दूसरो चरण जन-आंदोलन होसी। ईं आंदोलन में रेल रोको, स्कूल-कालेजां में हड़ताल, वकीलां री ओर सूं अदालतां रो बहिस्कार अर हरेक कस्बै-शहर में राजस्थानी भाषा नै मान्यता नहीं देणै रै विरोध में काळा झंडां रो जलूस निकळै। ईं सारै कार्यक्रम नै पूरो कर कै कम सैं कम 20 हजार आदमी नई दिल्ली पूंचै। जलूस निकाळ कै महात्मा गांधी री समाधि पर धरणो देवै अर अनशन करै। राजस्थान रा जित्ता भी सांसद है, बांकै घरां पर धरणो देवै अर उण सूं इस्तीफै री मांग करै। सागै-सागै संसद में भी ईं मान्यता सारू राजनैतिक पार्टियां सूं प्रस्ताव रखावै। राजस्थान रा विधायकां नै आप रै क्षेत्र में भाषा री अलख जगाणी चायै।
अमेरिका रा भाषा-विद्वान (अमेरीकन कांग्रेस ऑफ लाईब्रेरीज) दुनियां री 13 समृद्ध भाषावां में राजस्थानी भाषा नै भी एक समर्थ भाषा मानी है। राजस्थानी भाषा री उप-शाखावां में हरियाणवी, मालवी, मेवाती, मारवाड़ी, हाड़ोती, ढूँढाड़ी, बागड़ी अर पश्चिम राजस्थान री गुर्जर भाषा मुख्य है। राजस्थान में करीब 72 बोलियां बोली जावै है। कैबत है 'तीन कोस पर पाणी बदळै, 12 कोस पर बोली।' जकी भाषा री जितणी बोलियां अर उप-शाखावां हुवै, बा उतणी ही समर्थ भाषा मानीजै। नेपाल अलग राष्ट्र होतां हुयां भी बठै री नेपाली भाषा में राजस्थानी रा मोकळा सबद है। कारण साफ है कै बठै रो राजवंश राजस्थान सूं जुड़ेड़ो है।
राजस्थान मरुधर देस है। बीं री परम्परा अर संस्कृति भारत रै अन्य प्रदेशां सूं बिलकुल अलग है। बठै रा लोकदेवता, लोकगीत, लोक-गाथावां, खान-पान-पहराण री आपरी अलग विशेषता है। राजस्थान रा पसु-पाखी, बठै रा रूंख सब अलग हैं। इण री सही अभिव्यक्ति राजस्थानी में ही सम्भव है। बठै री प्रेम-कथावां दूजै साहित्य में कोनी। भारत रै इतिहास में राजस्थान आप री न्यारी पिछाण राखै है। बठै सूं राष्ट्रीय स्वतंत्रता रा सब क्रांतिकारी प्रेरणा ली है।
राजस्थानी भाषा नै मान्यता मिले बिना बठै री महान परम्परावां नै, अनूठी संस्कृति नै टाबर किंया जाणसी?
टाबरियां नै किंया हुवैलो, निज धरती रो ज्ञान।
राख्यां चावो जड़ां जीवती, द्यो मायड़ नै मान॥
-कन्हैया लाल सेठिया
(राजस्थानी भाषा मान्यता आंदोलन रा पर्याय-पुरुष श्री सेठिया कोलकाता सूं 21 दिसम्बर 2004 नै अखिल भारतीय राजस्थानी समारोह रासंयोजक श्री रतन शाह रै नांव लिखियोड़ी पाती रो एक अंश।)
-प्रस्तुति- सत्यनारायण सोनी

बिरखा बिंनणी ( वर्षा वधू )

Rao GumanSingh Guman singh

Ratan Singh Shekhawat,
मानसून पूर्व की वर्षा की बोछारें जगह-जगह शुरू हो चुकी है | किसान मानसून का बेसब्री से इंतजार करने में लगे है | और अपने खेतो में फसल बोने के लिए घास,झाडियाँ व अन्य खरपतवार काट कर (जिसे राजस्थान में सूड़ काटना कहते है ) तैयार कर वर्षा के स्वागत में लगे है | बचपन में सूड़ काटते किसानो के गीत सुनकर बहुत आनंद आता था लेकिन आजकल के किसान इस तरह के लोक गीत भूल चुके है |

जटक जांट क बटक बांट क लागन दे हब्बिडो रै,
बेरी धीडो रै , हब्बिडो |

इस गीत की मुझे भी बस यही एक लाइन याद रही है | जिन गांवों के निवासी पेयजल के लिए तालाबों,पोखरों व कुंडों पर निर्भर है वहां सार्वजानिक श्रमदान के जरिए ग्रामीण गांव के तालाब व पोखर आदि के जल संग्रहण क्षेत्र (केचमेंट एरिया ) की वर्षा पूर्व सफाई करने में जुट जाते है व जिन लोगों ने अपने घरों व खेतो में व्यक्तिगत पक्के कुण्ड बना रखे है वे भी वर्षा पूर्व साफ कर दिए जाते है ताकि संग्रहित वर्षा जल का पेयजल के रूप में साल भर इस्तेमाल किया जा सके |
शहरों में भी नगर निगमे मानसून पूर्व वर्षा जल की समुचित निकासी की व्यवस्था के लिए जुट जाने की घोषणाए व दावे करती है | ताकि शहर में वर्षा जल सडको पर इक्कठा होकर लोगों की समस्या ना बने हालाँकि इनके दावों की पहली वर्षा ही धो कर पोल खोल देती है |
कुल मिलाकर चाहे किसान हो या पेयजल के लिए वर्षा जल पर निर्भर ग्रामीण या शहरों की नगर पलिकाए या गर्मी से तड़पते लोग जो राहत पाने के लिए वर्षा के इंतजार में होते है , सभी वर्षा ऋतु के शुरू होने से पहले ठीक उसी तरह वर्षा के स्वागत की तैयारी में जुट जाते है जैसे किसी घर में नई नवेली दुल्हन के स्वागत में जुटे हो | शायद इसीलिए राजस्थान के एक विद्वान कवि रेवतदान ने वर्षा की तुलना एक नई नवेली दुल्हन से करते हुए वर्षा को बरखा बिन्दणी ( वर्षा वधू ) की संज्ञा देते हुए ये शानदार कविता लिखी है :


लूम झूम मदमाती, मन बिलमाती, सौ बळ खाती ,
गीत प्रीत रा गाती, हंसती आवै बिरखा बिंनणी |
चौमासै में चंवरी चढनै, सांवण पूगी सासरै,
भरै भादवै ढळी जवांनी, आधी रैगी आसरै
मन रौ भेद लुकाती , नैणा आंसूडा ढळकाती
रिमझिम आवै बिरखा बिंनणी |

ठुमक-ठुमक पग धरती , नखरौ करती
हिवड़ौ हरती, बींद पगलिया भरती
छम-छम आवै बिरखा बिंनणी |
तीतर बरणी चूंदड़ी नै काजळिया री कोर
प्रेम डोर मे बांधती आवै रुपाळी गिणगोर
झूंटी प्रीत जताती , झीणै घूंघट में सरमाती
ठगती आवै बिरखा बिंनणी |

घिर-घिर घूमर रमती , रुकती थमती
बीज चमकती, झब-झब पळका करती
भंवती आवै बिरखा बिंनणी |
आ परदेसण पांवणी जी, पुळ देखै नीं बेळा
आलीजा रै आंगणै मे करै मनां रा मेळा
झिरमिर गीत सुणाती, भोळै मनड़ै नै भरमाती
छळती आवै बिरखा बिंनणी |


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सूनी हवेली

Rao GumanSingh Guman singh


हवेली री पीड़

आँख्या-गीड़, उमड़ती भीड़
सूनी छोड़ग्या बेटी रा बाप !
बुझाग्या चुल्है रो ताप
कुण कमावै, कुण खावै
कुण चिणावै, कुण रेवै !
जंगी ढोलां पर चाल्योड़ी तराड़
बोदी भींता रा खिंडता लेवड़ा
भुजणता चितराम
चारूंमेर लाग्योड़ी लेदरी
बतावै भूत-भविस अ’र वरतमान
री कहाणी ! कीं आणी न जाणी !
आदमखोर मिनख
बैंसग्या पड्योड़ा सांसर ज्यूं
भाखर मांय टांडै
जबरी जूण’र जमारो मांडै !
काकोसा आपरै जींवतै थकां
ई भींत पर
एक कीड़ी नी चढ़णै देवतां
पण टैम रै आगै कीं रो जोर ?
काकोसा खुद कांच री फ्रेम में
ऊपर टंगग्या
पेट भराई रै जुगाड़ मैं
सगळो कडुमो छोड्यो देस
बसग्या परदेस,
ठांवा रै ताळा, पोळ्यां में बैठग्या
ठाकर रूखाळा।
टूट्योड़ी सी खाट
ठाकरां रा ठाट
बीड्यां रो बंडल, चिलम’र सिगड़ी
कुणै में उतर्योड़ो घड़ो
गण्डक अ’र ससांर घेरणै तांई
एक लाठी
अरड़ावै पांगली पीड़ स्यूं गैली
बापड़ी सूनी हवेली !

-डॉ. एस.आर.टेलर

बापू---कन्हैयालाल सेठिया

Rao GumanSingh Guman singh

महात्मा गांधी रै सुरगवास माथै देस री कांई दसा व्ही। सगळै जीव जगत माथै उण महान आत्मा रै गमन रौ कांई असर व्हीयो, उणरौ वर्णन कवि सेठिया री रचना मे घणौ मर्मस्पर्शी शब्दां में मिळै। जात-पांत रा भेद नै मेटण वाळौ, मिनख मातर रौ सांचो मींत, महात्मा गांधी जैड़ा अवतारी इण धरती माथै आया न कोई आवै। एक गांधी रै मिटण सूं सगळा री आँख्यां में आँसू है। मरतो-मरतो ई गांधी एकता रौ पाठ पढ़ाय ग्यौ।



आभै में उड़ता खग थमग्या
गेलै में बैंता पग थमग्या
हाको सो फूट्यो धरती पर
बै कुण गमग्या, बै कुण गमग्या?

ओ मिनख मरयो'क मरयो पाखी?
सै साथै नाड़ कियां नाखी?
बा सिर कूटै है हिंदुआणी
बा झुर झुर रोवै तुरकाणी।

इसड़ो कुण सजन सनेही हो
सगळां रा हिवड़ा डगमगग्या।
बै कुण गमग्या, बै कुण गमग्या?

मिनखां रो रुळग्यो मिनखपणो
देवां री मिटगी संकळाई,
बापूजी सुरग सिधार गया
हूणी रै आडी के आई?

जीऊंला सौ'र पचीस बरस
बिसवास दिरा'र किंया ठगग्या?
गिगनार पडै़ लो अब नीचै
सतवादी वचनां स्यूं डिगग्या
बै कुण गमग्या, बै कुण गमग्या?

बापू सा मिनखां देही में
धरती पर मिनख नहीं आया,
आगै री पीढ्यां पूछै ली-
के इस्या नखतरी जुग जाया?

ई एक जोत रै पळकै स्यूं
इतिहास सदा नै जगमगग्या
ईं एक मौत रै मोकै पर
सगळां रा आंसू रळ मिलग्या,
बै कुण गमग्या, बै कुण गमग्या?

साधना के परिणाम बाकी

Rao GumanSingh Guman singh

कन्हैयालाल सेठिया की आत्मा से सम्वाद की प्रक्रिया में मैं गूंगा हो जाता हूं। शब्द नहीं जुड पाते। ब्राह् का परब्राह् रू प मेरा शब्द देवता विस्मित सा मुझे देखता रह जाता है। सन् 1919 के सितम्बर की 11 तारीख को वे जन्मे और सन 2008 के नवम्बर की 11 तारीख को महाप्रयाण कर गए। जीवन के 89 वर्षो में उन्होंने और कोई साधना पाली या नहीं, किन्तु उनकी एक सर्वप्रकट साधना का साक्षी तो मैं स्वयं भी हूं। वह साधना थी अपनी मातृभाषा राजस्थानी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में ससम्मान स्थापित देखना। मात्र 29 वर्ष की आयु में ही राजस्थानी और हिन्दी के प्रख्यात कन्हैयालाल सेठिया ने यह साधना शुरू कर दी थी। देश स्वतंत्र हुआ। संविधान सभा बनी। संविधान में आठवीं अनुसूची जैसी सूची जुडी और सेठिया आल्हादित के साथ ही आनंदित भी हो उठे। यह राजस्थानी के शोधार्थियों का काम है कि वे अध्ययन करके शोध करके बताएं कि इस ने 'धरती धोरां री' गीत किस उम्र में लिखा। देश के आजाद होने से लेकर अपने महाप्रयाण तक 60-62 वर्षो का जीवन काल सेठिया ने अपनी सर्जना के साथ-साथ अपनी चिरसाधना के फलित होने की प्रतीक्षा में बिताया। उन्हें लगता था कि अब केन्द्र सरकार राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दे देगी। किन्तु उनकी यह साध, यह साधना पूरी नहीं हुई। वे अपने जीवनकाल में यह नहीं देख सके। मुझे इस अधूरी आस पर कुछ कहना है।

पूरे 6 वर्ष, सन् 1998 से सन् 2004 तक मैं राज्यसभा का सदस्य था। संयोग यह था कि इन्हीं 6 वर्षों तक संविधानवेत्ता डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी भी राज्यसभा के सदस्य थे। मैं कांग्रेस की ओर से इस अमर सदन में था और उधर भारतीय जनता पार्टी की तरफ से लक्ष्मीमल्ल सिंघवी राज्यसभा में बैठे थे। परिस्थितियां ऎसी बनीं कि इन्हीं वर्षो में भारत के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति महामहिम कृष्णकांत का निधन हो गया और उनके स्थान पर उपराष्ट्रपति का चुनाव लडकर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत भारत के उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति बने। इस पदारू ढता ने सेठिया को नया उल्लास और नया उत्साह दिया। मुझे उनका टेलीफोन मिला। हमेशा की तरह वे बोले-बैरागी! अब तुम लोग मिलजुल कर कोशिश करो कि राजस्थानी को न्याय मिले। मेरी मायड भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थापित हो जाए। मैंने प्रणाम करते हुए अपनी सहमति दी। वे तब भी फोन पर कहते रहे-'सीमा की सुरक्षा और देश की रक्षा में जो भाषा सबसे बडी संख्या में अपने नौजवान बेटे शहीद होने के लिए देश माता को दे, निछावर करे उन बेटों की मां, उनकी मायड भाषा इतना सा सम्मान भी नहीं पा सके यह कब तक चलेगा' जब अशोक गहलोत पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री थे तब उनकी पहल पर राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास कर केन्द्र को भेज दिया था कि राजस्थानी भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किया जाए।

राज्यसभा की उन छह वर्षो की कार्यवाही से स्पष्ट है कि गृहमंत्री पद पर रहते हुए लालकृष्ण आडवाणी ने एक प्रश्न के उत्तर में इस मांग को स्वीकार किया था। इसके बाद सरकार बदल गई। दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी की जगह मनमोहन सिंह आ गए। इस बीच सेठिया को अशोक गहलोत ने विधानसभा के सर्वसम्मत प्रस्ताव की सूचना सगर्व दे दी थी। केन्द्र की सरकार बदलते ही सेठिया का कोलकाता से फिर फोन आया- 'बैरागी! अब क्या बाधा है सब तो अनुकूल हैं। मेरी तबीयत ढीली है। बच्चे मेरी बहुत अच्छी सेवा कर रहे हैं। ये मुझे मरने नहीं दे रहे हैं और दिल्ली वाले मुझे जीने नहीं दे रहे हैं। कुछ करो भैया! और नमस्कार प्रणाम के बाद फिर फोन बंद हो गया। सन् 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार बनने पर जब मेरा और लक्ष्मीमल्ल सिंघवी का निवृत्ति समय करीब आया तो इस दिशा में सिंघवी ने राज्यसभा में अशासकीय संकल्प प्रस्तुत करके यह मांग फिर उठाई। भारत के गृहमंत्री (तत्कालीन) शिवराज पाटिल ने उत्तर दिया। संकल्प के पक्ष में सिंघवी, प्रभा ठाकुर, मैं (बालकवि बैरागी) और डॉ. कर्णसिंह बोले। डॉ. कर्णसिंह ने राजस्थानी के साथ अपनी मातृभाषा डोगरी को भी जोडा। शिवराज पाटिल ने उत्तर दिया कि अकेली राजस्थानी ही नहीं साथ में भोजपुरी को भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की पूरी तैयारी है। माननीय सदस्य अपना संकल्प वापस ले लें। और सिंघवी ने संकल्प वापस ले लिया।

हम आश्वस्त होकर बैठ गए। आज न तो आडवाणी गृहमंत्री हैं, न आई.डी. स्वामी राज्यमंत्री गृह हैं और न शिवराज पाटिल गृहमंत्री के पद पर हैं। शेखावत पूर्व उपराष्ट्रपति हैं। लक्ष्मीमल्ल सिंघवी स्वर्गीय हैं और मैं एक पूर्व सांसद हूं। कन्हैयालाल सेठिया की आत्मा जहां भी है वहां से सभी को देख रही है। राजस्थानी भाषा अपने साथ होने वाले संभावित न्याय की प्रतीक्षा में दिल्ली की ओर देख रही है। और मैं कन्हैयालाल सेठिया की स्मृति में लिख रहा हूं- 'हे निर्मल मन! हे निश्छल आत्मा!! हे पुण्य पुरूष!!! हमें क्षमा करना। हम तुझे श्रद्धा देते रहे पर श्रद्धा के प्रत्येक क्षण के साथ-साथ तुझे श्रद्धांजलि देने का अधिकार खोते रहे। हमें क्षमा कर दो महाकवि!

बाल कवि बैरागी
[लेखक विख्यात कवि और पूर्व सांसद हैं]

Cortesy By- Rajasthan Patrika

पातळ अर पीथळ- कन्हैयालाल सेठिया (२७ मई, महाराणा प्रताप जयंती पर खास)

Rao GumanSingh Guman singh


राजस्थानी रा सिरै नांव कवि अर मनीषी कन्हैयालाल सेठिया री 'पातळ अर पीथळ' नामी अर चावी कविता है। आ कविता १९४२ में लिखीजी। उण वगत अंग्रेजां रो राज हो अर गांधीजी री पुकार 'करो या मरो' रै साथै देस रा सगळा नेतावां नै जेळ में ठूंस दिया हा अर जनता में घणी उदासी अर निरासा फैलगी ही। उण संदर्भ नै ध्यान में राख'र देस री जनता नै चेतावण सारू सेठिया आजादी रै रखवाळै महाराणा प्रताप रै इण इतियास कथा-प्रसंग नै लेय'र आ कविता लिखी। आ कविता इत्ती चावी बणी कै राजस्थानी रा लूंठा विद्वान प्रो. नरोत्तमदास स्वामी इणरी दस हजार प्रतियां छपवा'र आखै राजपूतानै री रियासतां में भिजवाई।
रावत सारस्वत इण कविता रो अंग्रेजी अनुवाद ही करियो। 'पातळ-पीथळ' राजस्थानी भोम रै स्वाभिमान, गौरव, अठै री मान-सम्मान अर वीरता री भावना नै सांगोपांग ढंग सूं प्रगटै। इण ओजस्वी रचना में आपणी संस्क्रति री मरजादा अर माठ-मरोड़ री भावना छिप्योड़ी है। आ रचना राजस्थानी री घणी चावी अर अमर रचना है।

पातळ'र पीथळ

अरै घास री रोटी ही जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो।
नान्हो सो अमरयो चीख पड़्यो राणा रो सोयो दुख जाग्यो।
हूं लड़्यो घणो हूं सह्यो घणो
मेवाड़ी मान बचावण नै
हूं पाछ नहीं राखी रण में
बैरयाँ री खात खिंडावण में,
जद याद करूं हळदी घाटी नैणां में रगत उतर आवै,
सुख दुख रो साथी चेतकड़ो सूती सी हूक जगा ज्यावै,
पण आज बिलखतो देखूं हूं
जद राज कंवर नै रोटी नै,
तो क्षात्र-धरम नै भूलूं हूं
भूलूं हिंदवाणी चोटी नै
मै'लां में छप्पन भोग जका मनवार बिनां करता कोनी,
सोनै री थाळ्यां नीलम रै बाजोट बिनां धरता कोनी,
 हाय जका करता पगल्या
फूलां री कंवळी सेजां पर,
बै आज रुळै भूखा तिसिया
हिंदवाणै सूरज रा टाबर,
आ सोच हुई दो टूक तड़क राणा री भीम बजर छाती,
आंख्यां में आंसू भर बोल्या मैं लिखस्यूं अकबर नै पाती,
पण लिखूं कियां जद देखै है आडावळ ऊंचो हियो लियां,
चितौड़ खड़्यो है मगरां में विकराळ भूत सी लियां छियां,
मैं झुकूं कियां? है आण मनैं
कुळ रा केसरिया बानां री,
मैं बुझूं कियां हूं सेस लपट
आजादी रै परवानां री,
पण फेर अमर री सुण बुसक्यां राणा रो हिवड़ो भर आयो,
मैं मानूं हूं दिल्लीस तनैं समराट् सनेशो कैवायो।
राणा रो कागद बांच हुयो अकबर रो' सपनूं सो सांचो,
पण नैण करयो बिसवास नहीं जद बांच बांच नै फिर बांच्यो,
कै आज हिंमाळो पिघळ बह्यो
कै आज हुयो सूरज सीतळ,
कै आज सेस रो सिर डोल्यो
आ सोच हुयो समराट् विकळ,
बस दूत इसारो पा भाज्यो पीथळ नै तुरत बुलावण नै,
किरणां रो पीथळ आ पूग्यो ओ सांचो भरम मिटावण नै,
बीं वीर बांकुड़ै पीथळ नै
रजपूती गौरव भारी हो,
बो क्षात्र धरम रो नेमी हो
राणा रो प्रेम पुजारी हो,
बैरयाँ रै मन रो कांटो हो बीकाणूं पूत खरारो हो,
राठौड़ रणां में रातो हो बस सागी तेज दुधारो हो,
आ बात पातस्या जाणै हो
घावां पर लूण लगावण नै,
पीथळ नै तुरत बुलायो हो
राणा री हार बंचावण नै,
म्हे बांध लियो है पीथळ सुण पिंजरै में जंगळी शेर पकड़,
ओ देख हाथ रो कागद है तूं देखां फिरसी कियां अकड़?
मर डूब चळू भर पाणी में
बस झूठा गाल बजावै हो,
पण टूट गयो बीं राणा रो
तूं भाट बण्यो बिड़दावै हो,
मैं आज पातस्या धरती रो मेवाड़ी पाग पगां में है,
अब बता मनै किण रजवट रै रजपूती खून रगां में है?
जद पीथळ कागद ले देखी
राणा री सागी सैनाणी,
नीचै स्यूं धरती खसक गई
आंख्यां में आयो भर पाणी,
पण फेर कही ततकाल संभळ आ बात सफा ही झूठी है,
राणा री पाघ सदा ऊंची राणा री आण अटूटी है।
ल्यो हुकम हुवै तो लिख पूछूं
राणा नै कागद रै खातर,
लै पूछ भलांई पीथळ तूं
आ बात सही, बोल्यो अकबर,

म्हे आज सुणी है नाहरियो
स्याळां रै सागै सोवैलो,
म्हे आज सुणी है सूरजड़ो
बादळ री ओटां खोवैलो,

म्हे आज सुणी है चातगड़ो
धरती रो पाणी पीवैलो,
म्हे आज सुणी है हाथीड़ो
कूकर री जूणां जीवैलो,

म्हे आज सुणी है थकां खसम
अब रांड हुवैली रजपूती,
म्हे आज सुणी है म्यानां में
तरवार रवैली अब सूती,
तो म्हांरो हिवड़ो कांपै है मूंछ्यां री मोड़ मरोड़ गई,
पीथळ राणा नै लिख भेज्यो, आ बात कठै तक गिणां सही?

पीथळ रा आखर पढ़तां ही
राणा री आंख्यां लाल हुई,
धिक्कार मनै हूं कायर हूं
नाहर री एक दकाल हुई,

हूं भूख मरूं हूं प्यास मरूं
मेवाड़ धरा आजाद रवै
हूं घोर उजाड़ां में भटकूं
पण मन में मां री याद रवै,
हूं रजपूतण रो जायो हूं रजपूती करज चुकाऊंला,
ओ सीस पड़ै पण पाघ नहीं दिल्ली रो मान झुकाऊंला,
पीथळ के खिमता बादळ री
जो रोकै सूर उगाळी नै,
सिंघां री हाथळ सह लेवै
बा कूख मिली कद स्याळी नै?

धरती रो पाणी पिवै इसी
चातग री चूंच बणी कोनी,
कूकर री जूणां जिवै इसी
हाथी री बात सुणी कोनी,

आं हाथां में तरवार थकां
कुण रांड कवै है रजपूती?
म्यानां रै बदळै बैरयाँ री
छात्यां में रैवैली सूती,
मेवाड़ धधकतो अंगारो आंध्यां में चमचम चमकैलो,
कड़खै री उठती तानां पर पग पग पर खांडो खड़कैलो,
राखो थे मूंछ्यां ऐंठ्योड़ी
लोही री नदी बहा द्यूंला,
हूं अथक लड़ूंला अकबर स्यूं
उजड़्यो मेवाड़ बसा द्यूंला,
जद राणा रो संदेश गयो पीथळ री छाती दूणी ही,
हिंदवाणों सूरज चमकै हो अकबर री दुनियां सूनी ही।

पातळ=प्रताप। पीथळ=कवि पृथ्वीराज राठौड़ जका महाराणा प्रताप रा साथी अर अकबर रै दरबार रा नवरतनां में सूं एक हा। अमरयो=महाराणा प्रताप रो बेटो अमरसिंह। चेतकड़ो=राणा प्रताप रो घोड़ो। बाजोट=जीमण सारू बणी काठ री चौकी। आडावळ=अरावली। पण=प्रण। कूकर=कुत्तो। कड़खो=विजयगान।

मतीरा

Rao GumanSingh Guman singh

मरू मायड़ रा मिसरी मधरा 
मीठा गटक मतीरा।

सोनै जिसड़ी रेतड़ली पर
जाणै पन्ना जड़िया, 
चुरा
 सुरग स्यूं अठै मेलग्यो 
कुण इमरत रा घड़िया?


आं अणमोलां आगै लुकग्या 
लाजां
 मरता हीरा।
 
मरू
 मायड़ रा मिसरी मधरा
 
मीठा गटक मतीरा।


कामधेणु रा थण ही धरती
आं में दूया जाणै,
कलप बिरख रै फळ पर स्यावै
निलजो सुरग धिंगाणै।*

लीलो कापो गिरी गुलाबी
इंद्र  सा लीरा। 
मरू मायड़ रा मिसरी मधरा
 
मीठा गटक मतीरा।


कुचर कुचर नै खपरी पीवो
गंगाजळ सो पांणी,
तिस तो कांईं चीज, भूख नै
ईं री घूंट भजाणी,

हरि-रस हूंतो फीको,
ओ रस, 
जे पी लेती मीरां! 
मरू
 मायड़ रा मिसरी मधरा
 
मीठा
 गटक मतीरा।

*कलप वृक्ष के फल पर स्वर्ग तो बेवजह ही गर्व करता है, इससे कहीं बेहतर फल तो मतीरा है जो धोरों में पैदा होता है।

आज रो औखांणो

मतीरा तो मौसम रा ई मीठा लागै।
अवसर के अनुकूल ही बात सुहानी लगती है।
आपरी सेवा मांय लाया है :
मरुवाणी संघ

मारवाड़ी देस का न परदेस का भाग-1

Rao GumanSingh Guman singh

उधार की जिन्दगी 
आज एक महत्वपूर्ण प्रश्न मारवाड़ी समाज के साथ जुड़ सा गया है। - क्या वह 
उधार की जिन्दगी जी रहा है, या किसी के एहशान के टूकड़ों पर पल रहा है? 
या फिर किसी हमदर्दी और दया का पात्र तो नहीं? मारवाड़ी समाज का प्रवासीय 
इतिहास के तीन सौ वर्षों के पन्ने अभी तक बिखरे पड़े हैं। न तो समाज के 
अतीत को इसकी चिंता थी, नही वर्तमान को इसकी फिक्र। घड़ी की टिक-टीक ने 
इस सन्नाटे में अचानक हलचल पैदा कर दी है। - विभिन्न प्रन्तों में हो रहे 
जातिवाद, आतंकवाद, साम्प्रदायिकता की आड़ में मारवाड़ी समाज के घ्रों को 
जलाना एवं लूट लेना । साथ ही, राजनैतिक दलों का मौन रहना, मुगलों के 
इतिहास को नए सिरे से दोहराते हुए स्थानीय आततायियों के रूप में 
मौकापरस्त लोग एसी हरकतों से कुछ सोचने पर मजबूर कर देते हैं। 
'जात- जडूला' या 'गठजोड़ 
यह प्रश्न आज के परिप्रेक्ष्य में हमारे मानस-पटल पर उभर कर सामने आता है 
कि अपने मूल स्थान से हमने जन्म-जन्मान्तर का नाता तोड़-सा लिये। पहले तो 
समाज के लोग साल में एक दफा ही सही 'देस'  जाया करते थे। अब तो बच्चों को 
पता ही नहीं कि उनके पूर्वज किस स्थान के थे। एक समय था जब 'जडूला' या 
'गठजोड़ की जात'  देस जाकर ही दिया जाता था, समाज में कई ऎसे उदाहरण हैं, 
जिसमें बाप-बेटा और पोता, तीनों का 'जडूला' और 'गठजोड़ की जात' एक साथ 
ही  'देस' जाकर दी । यहाँ यह कहना जरूरी नहीं कि हमारा अपने मूल स्थाना 
से कितना गहरा संबंध रहा  और कितना फासला है। इन दिनों 'जडूला' तो 
स्थानीय प्रचलन एवं मान्यताओं से जूड़ती जा रही है। जो जिस प्रदेश में या 
देश में है, वे उस प्रदेश या देश के अनुकुल अपनी-अपनी अलग प्रथा बनाते जा 
रहे हैं, आने वाली पीढ़ी का अपने मूल प्रदेश से कितना मानसिक लगाव रह 
जायेगा, इस पर संदेह है। वैसे भी एक स्थति और भी है, वर्तमान को ही देखें 
- 'मारवाड़ी कहने को तो अपने आपको रास्थानी मानते हैं,परन्तु राजस्थान के 
लोग इसे मान्यता नहीं देते। यदि कोई प्रवासी राजस्थानी वहाँ जाकर पढ़ना 
चाहे तो उसे राजस्थानी नहीं माना जाता। क्योंकि उसका मूल प्रान्त 
राजस्थान नहीं है। यह कैसी व्यवस्था ? असम , बंगा़ल, उडिसा जैसे अहिन्दी 
भाषी प्रान्त इनको प्रवासी मानते हैं, और राजस्थान इनको अपने प्रदेश का 
नहीं मानता। असम में असमिया मूल के छात्र को और राजस्थान में राजस्थान 
मूल के छात्रों को ही दाखिला मिलेगा तो यह कौम कहाँ जाय? 
 प्रान्तीय भाषा 
मुड़िया में मात्रा की कमी के चलते हिन्दी भाषा के साथ-साथ अन्य प्रन्तीय 
भाषाओं ने इस प्रवासी समाज के अन्दर अपना प्रमुख स्थान ग्रहन कर लिया । 
कई प्रवासी मारवाड़ी परिवार ऎसे हैं जिनको सिर्फ बंगला, असमिया, तमील, या 
उड़िया भाषा ही लिखाना, बोलना और पढ़ना आता है, कई परिवार में  तो 
राजस्थानी की बात तो बहुत दूर उनको हिन्दी  भी ठीक से बोलना-पढ़ना  नहीं 
आता, लिखने की कल्पना ही व्यर्थ है। 
पर्व-त्यौहार 
बिहार में 'छठ पूजा' की बहुअत बड़ी मान्यता है,ठीक वैसे ही बंगाल मैं 
'दुर्गा पूजा', 'काली पूजा', असम में 'बिहू उत्सव', महाराष्ट्र में 'गणेश- 
महोत्सव, उड़ीसा में 'जगन्नाथ जी की रथयात्रा', दक्षिण भारत में 'ओणम- 
पोंगल',  राजस्थान में होली-दिवाली, गुजरात में डांडीया-गरबा, पंजाब में 
'वैशाखी उत्सव' आदि पर्व व त्योहरों की विषेश मान्यता है, असके साथ ही 
हिन्दू धर्म के अनुसार कई त्योहार मनाये जाते हैं जिसमें राजस्थान में 
विषेशकर के राखी, गणगोर की विषेश मान्यता है, गणगोर तो राजस्थान व 
हरियाणावासियो का अनुठा त्योहार माना जाता है। जैसे-जैसे मारवड़ी समाज के 
लोग इन प्रान्तों में बसते गये, ये लोग अपने पर्व के साथ-साथ स्थानीय 
मान्यताओं के पर्व व त्योहारों को अपनाते चले गये। बिहार के मारवाड़ी तो 
छठ पूजा ठीक उसी तरह मानाने लगे, जैसे बिहार के स्थानीय समाज मानाते हैं 
यहाँ यह बताना जरूरी है कि जो मारवाड़ी परिवार कालान्तर बिहार से उठकर 
किसी अन्य प्रदेश में बस गये, वे आज भी छठ पूजा के समय ठीक वैसे ही बिहार 
जाते हैं जैसे बिहार के मूलवासी इस पर्व को मनाने जाते हैं। अब विवशता यह 
है कि राजस्थान के बिहार के मारवाड़ी को बिहारी, असम के मारवाड़ियों को 
असमिया, बंगाल व उड़ीसा के मारावाड़ियों को बिहारी, बंगाली, असमिया, या 
उड़िया समझते हैं, एवं स्थानीय भाषायी लोग मारवाड़ियों को राजस्थानी 
मानते हैं। विडम्बना यह है,कि मारवाड़ी कहने को तो रजस्थानी है, परन्तु 
राजस्थान के लोग इसे राजस्थानी नहीं मानते। 
लोगों का भ्रम: 
आम तौर पर लोगों को यह भ्रम है कि मारवाड़ी समाज एक धनी-सम्पन्न समाज है, 
परन्तु सच्चाई इस भ्रम से कोसों दूर है। यह कहना तो संभव नहीं कि 
मारवाड़ी समाज में कितने प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, हाँ ! धनी 
वर्ग का प्रतिशत इतर समाज के अनुपात में नहीं के बराबर माना जा सकता है। 
उद्योग-व्यवसाय तो  सभी समाज में कम-अधिक है। प्रवासी राजस्थानी,  जिसे 
हम देश के अन्य भागों में मारवाड़ी कह कर सम्बोधित  करते हैं या जानते 
हैं, अधिकतर छोटे-छोटे दुकानदार या फिर दलाली के व्यापार से जुड़े हुए 
हैं, समाज के सौ में अस्सी प्रतिशत परिवार तो  नौकरी-पेशा से जुड़े हुए 
हैं, शेष बचे बीस प्रतिशत का आधा भा़ग ही संपन्न माना जा सकता है, बचे दस 
प्रतिशत भी मध्यम श्रेणी के ही माने जायेगें। कितने परिवार को  तो दो जून 
का खाना भी ठीक से नसीब नहीं होता, बच्चे किसी तरह से संस्थाओं के सहयोग 
से पढ़-लिख पाते हैं। कोलकाता के बड़ाबाजार का आंकलन करने से पता चलता है 
कि किस तरह एक छोटे से कमरे में पूरा परिवार अपना गुजर-बसर कर रहा है। 
इस समाज की एक खासियत यह है कि यह कर्मजीव समाज है, मांग के खाने की जगह 
कमा कर खाना ज्याद पसंद करता है, समाज के बीच साफ-सुथरा रहना अपना 
कर्तव्य समझता है, और कमाई का एक हिस्सा दान-पूण्य में खर्च करना अपना 
धर्म। शायद इसलिए भी हो सकता है इस समाज को धनी समाज माना जाता हो,  या 
फिर विड़ला-बांगड़ की छाप इस समाज पर लग चुकी हो। ऎसा सोचना कि यह समाज 
धनी समाज है, किसी भी रूप में उचित नहीं है। आम समाज की तरह ही यह समाज 
भी है, जिसमें सभी तबके के लोग हैं , पान की दुकान, चाय की दुकान, नाई , 
जमादार, गुरूजी(शिक्षक), पण्डित जी (ब्राह्मण), मिसरानी ( ब्राह्मण की 
पत्नी), दरवान, ड्राईवर, महाराज ( खाना बनाने वाले), मुनीम (खाता-बही 
लिखने वाला) ये सभी मारवाड़ी समाज में होते हैं इनकी आय भारतीय मुद्रा के 
अनुसार आज भी दो - तीन हजार रूपये प्रतिमाह (कुछ कम-वेसी) के आस-पास ही 
आंकी जा सकती है। यह बात सही है कि समाज में सम्पन्न लोग के आडम्बर से 
गरीब वर्ग हमेशा से शिकार होता आया है, यह बात इस समाज पर भी लागू होती 
है। 
आडम्बर: 
मारवाड़ी समाज के एक वर्ग को संपन्न समाज माना जाता है, इनके कल-कारखाने, 
करोबार, उद्योग, या व्यवसाय में आय की कोई सीमा नहीं होती, ये लो़ग जहाँ 
एक तरफ समाज के सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर  हिस्सा लेते पाये जाते 
हैं वहीं दूसरी तरफ अपने बच्चों की शादी-विवाह, जन्मदिन का जश्न मनाने 
में, या सालगिरह के नाम पर आडम्बर को भी मात देने में लग जाते हैं, उस 
समय पता नही इतना धन कहाँ से एकाएक इनके पास आ जाता है, जिसे पानी की तरह 
बहाने में इनको आनन्द आता है, अब कोलकाता में तो बहार से आकर शादी करना 
एक फैशन सा बनते जा रहा है, बड़े-बड़े पण्डाल, लाखों के फूल-पत्ती, लाखों 
की सजावट, मंहगे-मंहगे निमंत्रण कार्ड, देखकर कोई भी आदमी दंग रह जायेगा। 
सबसे बड़ा हास्यास्पद तब लगता है, जब कोई समाज की सभाओं में इन आडम्बरों 
के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें तो करता है, जब खुद का समय आता है तो यही 
व्यक्ति सबसे ज्यादा अडम्बर करते पाया जाता है। एक-दो अपवादों को छोड़ 
दिया जाय तो अधिकांशतः लोग समाज के भीतर गन्दगी फैलाने में लगे हैं। इनका 
इतना पतन हो चुका है कि इनको किसी का भय भी नहीं लगता। समाज के कुछ दलाल 
किस्म के हिन्दी के पत्रकार भी इनका साथ देते नजर आते हैं। चुंकि उनका 
अखबार उनके पैसे से चलता है इसलिये भी ये लाचार रहतें हैं, दबी जुबान 
थोड़ा बोल देते हैं परन्तु खुलकर लिखने का साहस नहीं करते। इन पत्रकारों 
की मानसिकता इतनी गिर चुकी है कि, कोई भी इनको पैसे से खरिद सकता है, 
भाई ! पेट ही तो है, जो मानता नहीं। अखबार इनलोगों से चलता है, इनका घर 
इनकी दया पर चलता है, तो कलम का क्या दोष वह तो इनके दिमाग से नहीं इनके 
हाथ से चलती है। 
इन पत्रकारों के पास न तो कलम होती है, न ही हाथ य लुल्ले पत्रकार होते 
हें , इनके पास सिर्फ कगज छापने की एक लोहे की मशीन भर होती है, बस , 
भगवान ही इनका मालिक होता है, दिमाग भी इतना ही दिया कि ये बस मजे से खा 
सकते हैं। इनका समाज में किसी भी प्रकार का सामाजिक दायित्व नहीं के 
बराबर है। 
 क्रमशः आगे लेख जारी है। - शम्भु चौधरी दिनांक: 03.02.2008 

सेठिया साथै शंभु चौधरी री हथाईयां

Rao GumanSingh Guman singh

'धरती धौरां री... 
-शम्भु चौधरी- 
 कोलकात्ता 15.5.2008 : आज शाम पाँच बजे श्री कन्हैयालाल सेठिया जी के 
कोलकात्ता स्थित उनके निवास स्थल 6, आशुतोष मखर्जी रोड जाना था । ‘समाज 
विकास’ का अगला अंक श्री सेठिया जी पर देने का मन बना लिया था, सारी 
तैयारी चल रही थी,  मैं ठीक समय पर उनके निवास स्थल पहुँच गया। उनके 
पुत्र श्री जयप्रकाश सेठिया जी से मुलाकत हुई। थोड़ी देर उनसे बातचीत 
होने के पश्चात वे, मुझे श्री सेठिया जी के विश्रामकक्ष में ले गये । 
विस्तर पर लेटे श्री सेठिया जी का शरीर काफी कमजोर हो चुका है, उम्र के 
साथ-साथ शरीर थक सा गया है, परन्तु बात करने से लगा कि श्री सेठिया जी 
में कोई थकान नहीं । उनके जेष्ठ पुत्र भाई जयप्रकाश जी बीच में बोलते 
हैं, -  ‘‘ थे थक जाओसा....... कमती बोलो ! ’’  परन्तु श्री सेठिया जी 
कहाँ थकने वाले, कहीं कोई थकान उनको नहीं महसूस हो रही थी, बिल्कुल 
स्वस्थ दिख रहे थे । बहुत सी पुरानी बातें याद करने लगे। स्कूल-कॉलेज, 
आजादी की लड़ाई, अपनी पुस्तक ‘‘अग्निवीणा’’ पर किस प्रकार का देशद्रोह का 
मुकदमा चला । जयप्रकाश जी को बोले कि- वा किताब दिखा जो सरकार निलाम करी 
थी, मैंने तत्काल देवज्योति (फोटोग्रफर) से कहा कि उसकी फोटो ले लेवे । 
जयप्रकाश जी ने ‘‘अग्निवीणा’’  की वह मूल प्रति दिखाई जिस पर मुकदमा चला 
था । किताब के बहुत से हिस्से पर सरकारी दाग लगे हुऐ थे, जो इस बात का आज 
भी गवाह बन कर सामने खड़ा था । सेठिया जी सोते-सोते बताते हैं  - ‘‘ हाँ! 
या वाई किताब है जीं पे मुकदमो चालो थो....देश आजाद होने...रे बाद सरकार 
वो मुकदमो वापस ले लियो ।’’  थोड़ा रुक कर फिर बताने लगे कि आपने करांची 
में भी जन अन्दोलन में भाग लिया था । स्वतंत्रा संग्राम में आपने जिस 
सक्रियता के साथ भाग लिया, उसकी सारी बातें बताने लगे, कहने लगे ‘‘भारत 
छोड़ो आन्दोलन’’ के समय आपने करांची में स्व.जयरामदास दौलतराम व 
डॉ.चैइथराम गिडवानी जो कि सिंध में कांग्रेस बड़े नेताओं में जाने जाते 
थे, उनके साथ करांची के खलीकुज्जमा हाल में हुई जनसभा में भाग लिया था, 
उस दिन  सबने मिलकर स्व.जयरामदास दौलतराम व डॉ.चैइथराम गिडवानी के 
नेतृत्व में एक जुलूस निकाला था, जिसे वहाँ की गोरी सरकार ने कुचलने के 
लिये लाठियां बरसायी, घोड़े छोड़ दिये, हमलोगों को कोई चोट तो नहीं आयी, 
पर अंग्रेजी सरकार के व्यवहार से मन में गोरी सरकार के प्रति नफरत पैदा 
हो गई । आपका कवि हृदय काफी विचलित हो उठा, इससे पूर्व आप ‘‘अग्निवीणा’’ 
लिख चुके थे।  बात का क्रम टूट गया, कारण इसी बीच शहर के जाने-माने 
समाजसेवी श्री सरदारमल कांकरियाजी आ गये। उनके आने से मानो श्री सेठिया 
जी के चेहरे पे रौनक दमकने लगी हो । वे आपस में बातें करने लगे। कोई 
शिथिलता नहीं, कोई विश्राम नहीं, बस मन की बात करते थकते ही नहीं,  इस 
बीच जयप्रकाश जी से परिवार के बारे में बहुत सारी बातें जानने को मिली। 
श्री जयप्रकश जी, श्री सेठिया जी के बड़े पुत्र हैं, छोटे पुत्र का नाम 
श्री विनय प्रकाश सेठिया है और एक सुपुत्री  सम्पतदेवी दूगड़ है । महाकवि 
श्री सेठिया जी का विवाह लाडणू के चोरडि़या परिवार में श्रीमती धापूदेवी 
सेठिया के साथ सन् 1939 में हुआ । आपके परिवार में दादाश्री स्वनामधन्य 
स्व.रूपचन्द सेठिया का तेरापंथी ओसवाल समाज में उनका बहुत ही महत्वपूर्ण 
स्थान था। इनको श्रावक श्रेष्ठी के नाम से संबोधित किया जाता है। इनके 
सबसे छोटे सुपुत्र स्व.छगनमलजी सेठिया अपने स्व. पिताश्री की भांति 
अत्यन्त सरल-चरित्रनिष्ठ-धर्मानुरागी, दार्शनिक व्यक्तित्व के धनी थे । 
समाज सेवा में अग्रणी, आयुर्वेद का उनको विशेष ज्ञान था । 
श्री सेठिया जी का परिवार 100 वर्षों से ज्यादा समय से बंगाल में है । 
पहले इनका परिवार 199/1 हरीसन रोड में रहा करता था । सन् 1973 से 
सेठियाजी का परिवार  भवानीपुर में 6, आशुतोष मुखर्जी रोड, कोलकात्ता-20 
के प्रथम तल्ले में निवास कर रहा है। इनके पुत्र ( श्री सेठियाजी से 
पूछकर ) बताते हैं कि आप 11 वर्ष की आयु में सुजानगढ़ कस्बे से कलकत्ता 
में शिक्षा  ग्रहन हेतु आ गये थे। उन्होंने जैन स्वेताम्बर तेरापंथी 
स्कूल एवं माहेश्वरी विद्यालय में प्रारम्भिक शिक्षा ली, बाद में रिपन 
कॉलेज एवं विद्यासागर कॉलेज में शिक्षा ली । 1942 में द्वितीय विश्वयुद्ध 
के समय शिक्षा अधूरी छोड़कर पुनः राजस्थान चले गये, वहाँ से आप करांची 
चले गये । इस बीच हमलोग उनके साहित्य का अवलोकन करने में लग गये। सेठिया 
जी और सदारमल जी आपस में मन की बातें करने में मसगूल थे, मानो दो दोस्त 
कई वर्षों बाद मिले हों । दोनों अपने मन की बात एक दूसरे से आदान-प्रदान 
करने में इतने व्यस्त हो गये कि, हमने उनके इस स्नेह को कैमरे में कैद 
करना ही उचित समझा। जयप्रकाश जी ने तब तक उनकी बहुत सारी सामग्री मेरे 
सामने रख दी, मैंने उन्हें कहा कि ये सब सामग्री तो राजस्थान की अमानत 
है, हमें चाहिये कि श्री सेठिया जी का एक संग्राहलय बनाकर इसे सुरक्षित 
कर दिया जाए, बोलने लगे - ‘म्हाणे कांइ आपत्ती’  मेरा समाज के सभी वर्गों 
से, सरकार से निवेदन है कि श्री सेठियाजी की समस्त सामग्री का एक 
संग्राहल बना दिया जाना चाहिये, ताकि हमारी आनेवाली पीढ़ी उसे देख सके, 
कि कौन था वह शख्स जिसने करोड़ों दिलों की धड़कनों में अपना राज जमा लिया 
था। 
किसने ‘धरती धौरां री...’ एवं अमर लोक गीत  ‘पातल और पीथल’  की रचना की 
थी! 
कुछ देर बाद श्री सेठिया जी को बिस्तर से उठाकर बैठाया गया, तो उनका 
ध्यान मेरी तरफ मुखातिफ हुआ, मैंने उनको पुनः अपना परिचय बताने का प्रयास 
किया, कि शायद उनको याद आ जाय, याद दिलाने के लिये कहा - शम्भु! - 
मारवाड़ी देस का परदेस वालो - शम्भु....! बोलने लगे... ना... अब तने लोग 
मेरे नाम से जानगा- बोले... असम की पत्रिका म वो लेख तूं लिखो थो के?, 
मेरे बारे में...ओ वो शम्भु है....तूं.. अपना हाथ मेरे माथे पर रख के 
अपने पास बैठा लिये। बोलने लगे ... तेरो वो लेख बहुत चोखो थो। वो राजु 
खेमको तो पागल हो राखो है। मुझे ऐसा लग रहा था मानो सरस्वती बोल रही हो । 
शब्दों में वह स्नेह, इस पडाव पर भी इतनी बातें याद रखना, आश्चर्य सा 
लगता है। फिर अपनी बात बताने लगे- ‘आकाश गंगा’  तो सुबह 6 बजे लिखण 
लाग्यो... जो दिन का बारह बजे समाप्त कर दी। हम तो बस उनसे सुनते रहना 
चाहते थे, वाणी में सरस्वती का विराजना साक्षात् देखा जा सकता था। मुझे 
बार-बार एहसास हो रहा था कि यह एक मंदिर बन चुका है श्री सेठियाजी का घर 
। यह तो कोलकाता वासी समाज के लिये सुलभ सुयोग है, आपके साक्षात् दर्शन 
के, घर के ठीक सामने 100 गज की दूरी पर सामने वाले रास्ते में नेताजी 
सुभाष का वह घर है जिसमें नेताजी रहा करते थे, और ठीक दक्षिण में 300 गज 
की दूरी पर माँ काली का दरबार लगा हो,  ऐसे स्थल में श्री सेठिया जी का 
वास करना महज एक संयोग भले ही हो, परन्तु इसे एक ऐतिहासिक घटना ही कहा जा 
सकता है। हमलोग आपस में ये बातें कर रहे थे, परन्तु श्री सेठियाजी इन 
बातों से बिलकुल अनजान बोलते हैं कि उनकी एक कविता ‘राजस्थान’ (हिन्दी 
में) जो कोलकाता में लिखी थी, यह कविता सर्वप्रथम ‘ओसवाल नवयुवक’ कलकत्ता 
में छपी थी, मानो मन में कितना गर्व था कि उनकी कविता ‘ओसवाल नवयुवक’ 
में छपी थी। एक पल मैं सोचने लगा मैं क्या सच में उसी कन्हैयालाल सेठिया 
के बगल में बैठा हूँ जिस पर हमारे समाज को ही नहीं, राजस्थान को ही नहीं, 
सारे हिन्दुस्थान को गर्व है। 
मैंने सुना है, कि कवि का हृदय बहुत ही मार्मिक व सूक्ष्म होता है, कवि 
के भीतर प्रकाश से तेज जगमगता एक अलग संसार होता है, उसकी लेखनी ध्वनि से 
भी तेज रफ्तार से चलती है,  उसके विचारों में इतने पड़ाव होते हैं कि सहज 
ही कोई उसे नाप नहीं सकता, श्री सेठियाजी को देख ये सभी बातें स्वतः 
प्रमाणित हो जाती है। सच है जब बंगलावासी रवीन्द्र संगीत सुनकर झूम उठते 
हैं, तो राजस्थानी श्री कन्हैयालाल सेठिया के गीतों पर थिरक उठता है, 
मयूर की तरह अपने पंख फैला के नाचने लगता है। शायद ही कोई ऐसा राजस्थानी 
आपको मिल जाये कि जिसने श्री सेठिया जी की कविता को गाया या सुना न हो । 
इनके काव्यों में सबसे बड़ी खास बात यह है कि जहाँ एक तरफ राजस्थान की 
परंपरा, संस्कृति, एतिहासिक विरासत, सामाजिक चित्रण का अनुपम भंडार है, 
तो वीररस, श्रृंगाररस का अनूठा संगम भी जो असाधारण काव्यों में ही देखने 
को मिलता है। बल्कि नहीं के बराबर ही कहा जा सकता है। हमारे देश में 
दरबारी काव्यों की रचना की लम्बी सूची पाई जा सकती है, परन्तु,  बाबा 
नागार्जुन, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चैहान, निराला, हरिवंशराय 
बच्चन, भूपेन हजारिका जैसे गीतकार हमें कम ही देखने को मिलते हैं। श्री 
सेठिया जी के काव्यों में हमेशा नयापन देखने को मिलता है, जो बात अन्य 
किसी में भी नहीं पाई जाती, कहीं कोई बात तो जरूर है, जो उनके काव्यों 
में हमेशा नयापन बनाये रखने में सक्षम है। इनके गीतों में लय, मात्राओं 
का जितना पुट है, उतना ही इनके काव्यों में सिर्फ भावों का ही नहीं, 
आकांक्षाओं और कल्पनाओं की अभिनव अभिव्यक्ति के साथ-साथ समूची संस्कृति 
का प्रतिबिंब हमें देखने को मिलता है। लगता है कि राजस्थान का सिर गौरव 
से ऊँचा हो गया हो। इनके गीतों से हर राजस्थानी इठलाने लगता हैं। देश- 
विदेश के कई प्रसिद्ध संगीतकारों-गीतकारों ने, रवींद्र जैन से लेकर 
राजेन्द्र जैन तक, सभी ने इनके गीतों को अपने स्वरों में पिरोया है। 
‘समाज विकास’ का यह अंक यह प्रयास करेगा कि हम समाज की इस अमानत को 
सुरक्षित रख पाएं । श्री कन्हैयालाल सेठिया न सिर्फ राजस्थान की धरोहर 
हैं बल्कि राष्ट्र की भी धरोहर हैं। समाज विकास के माध्यम से हम राजस्थान 
सरकार से यह निवेदन करना चाहेगें कि श्री सेठियाजी को इनके जीवनकाल तक न 
सिर्फ राजकीय सम्मान मिले,  इनके समस्त प्रकाशित साहित्य, पाण्डुलिपियों 
व अन्य दस्तावेजों को सुरक्षित करने हेतु उचित प्रबन्ध भी करें। 
- शम्भु चौधरी 
http://samajvikas.blogspot.com/ 

धरती धोरां री !

Rao GumanSingh Guman singh


धरती धोरां री !

आ तो सुरगां नै सरमावै,
ईं पर देव रमण नै आवै,
ईं रो जस नर नारी गावै,
धरती धोरां री !
सूरज कण कण नै चमकावै,
चन्दो इमरत रस बरसावै,
तारा निछरावल कर ज्यावै,
धरती धोरां री !
काळा बादलिया घहरावै,
बिरखा घूघरिया घमकावै,
बिजली डरती ओला खावै,
धरती धोरां री !
लुळ लुळ बाजरियो लैरावै,
मक्की झालो दे’र बुलावै,
कुदरत दोन्यूं हाथ लुटावै,
धरती धोरां री !
पंछी मधरा मधरा बोलै,
मिसरी मीठै सुर स्यूं घोलै,
झीणूं बायरियो पंपोळै,
धरती धोरां री !
नारा नागौरी हिद ताता,
मदुआ ऊंट अणूंता खाथा !
ईं रै घोड़ां री के बातां ?
धरती धोरां री !
ईं रा फल फुलड़ा मन भावण,
ईं रै धीणो आंगण आंगण,
बाजै सगळां स्यूं बड़ भागण,
धरती धोरां री !
ईं रो चित्तौड़ो गढ़ लूंठो,
ओ तो रण वीरां रो खूंटो,
ईं रे जोधाणूं नौ कूंटो,
धरती धोरां री !
आबू आभै रै परवाणै,
लूणी गंगाजी ही जाणै,
ऊभो जयसलमेर सिंवाणै,
धरती धोरां री !
ईं रो बीकाणूं गरबीलो,
ईं रो अलवर जबर हठीलो,
ईं रो अजयमेर भड़कीलो,
धरती धोरां री !
जैपर नगर्यां में पटराणी,
कोटा बूंटी कद अणजाणी ?
चम्बल कैवै आं री का’णी,
धरती धोरां री !
कोनी नांव भरतपुर छोटो,
घूम्यो सुरजमल रो घोटो,
खाई मात फिरंगी मोटो
धरती धोरां री !
ईं स्यूं नहीं माळवो न्यारो,
मोबी हरियाणो है प्यारो,
मिलतो तीन्यां रो उणियारो,
धरती धोरां री !
ईडर पालनपुर है ईं रा,
सागी जामण जाया बीरा,
अै तो टुकड़ा मरू रै जी रा,
धरती धोरां री !
सोरठ बंध्यो सोरठां लारै,
भेळप सिंध आप हंकारै,
मूमल बिसर्यो हेत चितारै,
धरती धोरां री !
ईं पर तनड़ो मनड़ो वारां,
ईं पर जीवण प्राण उवारां,
ईं री धजा उडै गिगनारां,
धरती धोरां री !
ईं नै मोत्यां थाल बधावां,
ईं री धूल लिलाड़ लगावां,
ईं रो मोटो भाग सरावां,
धरती धोरां री !
ईं रै सत री आण निभावां,
ईं रै पत नै नही लजावां,
ईं नै माथो भेंट चढ़ावां,
भायड़ कोड़ां री,
धरती धोरां री !

पातल’र पीथल

Rao GumanSingh Guman singh


अरै घास री रोटी ही जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो।

नान्हो सो अमर्यो चीख पड्यो राणा रो सोयो दुख जाग्यो।
हूं लड्यो घणो हूं सह्यो घणो
मेवाड़ी मान बचावण नै,
हूं पाछ नहीं राखी रण में
बैर्यां री खात खिडावण में,
जद याद करूँ हळदी घाटी नैणां में रगत उतर आवै,
सुख दुख रो साथी चेतकड़ो सूती सी हूक जगा ज्यावै,
पण आज बिलखतो देखूं हूँ
जद राज कंवर नै रोटी नै,
तो क्षात्र-धरम नै भूलूं हूँ
भूलूं हिंदवाणी चोटी नै
मैं’लां में छप्पन भोग जका मनवार बिनां करता कोनी,
सोनै री थाल्यां नीलम रै बाजोट बिनां धरता कोनी,
ऐ हाय जका करता पगल्या
फूलां री कंवळी सेजां पर,
बै आज रुळै भूखा तिसिया
हिंदवाणै सूरज रा टाबर,
आ सोच हुई दो टूक तड़क राणा री भीम बजर छाती,
आंख्यां में आंसू भर बोल्या मैं लिख स्यूं अकबर नै पाती,
पण लिखूं कियां जद देखै है आडावळ ऊंचो हियो लियां,
चितौड़ खड्यो है मगरां में विकराळ भूत सी लियां छियां,
मैं झुकूं कियां ? है आण मनैं
कुळ रा केसरिया बानां री,
मैं बुझूं कियां ? हूं सेस लपट
आजादी रै परवानां री,
पण फेर अमर री सुण बुसक्यां राणा रो हिवड़ो भर आयो,
मैं मानूं हूँ दिल्लीस तनैं समराट् सनेषो कैवायो।
राणा रो कागद बांच हुयो अकबर रो’ सपनूं सो सांचो,
पण नैण कर्यो बिसवास नहीं जद बांच नै फिर बांच्यो,
कै आज हिंमाळो पिघळ बह्यो
कै आज हुयो सूरज सीतळ,
कै आज सेस रो सिर डोल्यो
आ सोच हुयो समराट् विकळ,
बस दूत इसारो पा भाज्यो पीथळ नै तुरत बुलावण नै,
किरणां रो पीथळ आ पूग्यो ओ सांचो भरम मिटावण नै,
बीं वीर बांकुड़ै पीथळ नै
रजपूती गौरव भारी हो,
बो क्षात्र धरम रो नेमी हो
राणा रो प्रेम पुजारी हो,
बैर्यां रै मन रो कांटो हो बीकाणूँ पूत खरारो हो,
राठौड़ रणां में रातो हो बस सागी तेज दुधारो हो,
आ बात पातस्या जाणै हो
धावां पर लूण लगावण नै,
पीथळ नै तुरत बुलायो हो
राणा री हार बंचावण नै,
म्है बाँध लियो है पीथळ सुण पिंजरै में जंगळी शेर पकड़,
ओ देख हाथ रो कागद है तूं देखां फिरसी कियां अकड़ ?
मर डूब चळू भर पाणी में
बस झूठा गाल बजावै हो,
पण टूट गयो बीं राणा रो
तूं भाट बण्यो बिड़दावै हो,
मैं आज पातस्या धरती रो मेवाड़ी पाग पगां में है,
अब बता मनै किण रजवट रै रजपती खून रगां में है ?
जंद पीथळ कागद ले देखी
राणा री सागी सैनाणी,
नीचै स्यूं धरती खसक गई
आंख्यां में आयो भर पाणी,
पण फेर कही ततकाळ संभळ आ बात सफा ही झूठी है,
राणा री पाघ सदा ऊँची राणा री आण अटूटी है।
ल्यो हुकम हुवै तो लिख पूछूं
राणा नै कागद रै खातर,
लै पूछ भलांई पीथळ तूं
आ बात सही बोल्यो अकबर,
म्हे आज सुणी है नाहरियो
स्याळां रै सागै सोवै लो,
म्हे आज सुणी है सूरजड़ो
बादळ री ओटां खोवैलो;
म्हे आज सुणी है चातगड़ो
धरती रो पाणी पीवै लो,
म्हे आज सुणी है हाथीड़ो
कूकर री जूणां जीवै लो
म्हे आज सुणी है थकां खसम
अब रांड हुवैली रजपूती,
म्हे आज सुणी है म्यानां में
तरवार रवैली अब सूती,
तो म्हांरो हिवड़ो कांपै है मूंछ्यां री मोड़ मरोड़ गई,
पीथळ नै राणा लिख भेज्यो आ बात कठै तक गिणां सही ?
पीथळ रा आखर पढ़तां ही
राणा री आँख्यां लाल हुई,
धिक्कार मनै हूँ कायर हूँ
नाहर री एक दकाल हुई,
हूँ भूख मरूं हूँ प्यास मरूं
मेवाड़ धरा आजाद रवै
हूँ घोर उजाड़ां में भटकूं
पण मन में मां री याद रवै,
हूँ रजपूतण रो जायो हूं रजपूती करज चुकाऊंला,
ओ सीस पड़ै पण पाघ नही दिल्ली रो मान झुकाऊंला,
पीथळ के खिमता बादल री
जो रोकै सूर उगाळी नै,
सिंघां री हाथळ सह लेवै
बा कूख मिली कद स्याळी नै?
धरती रो पाणी पिवै इसी
चातग री चूंच बणी कोनी,
कूकर री जूणां जिवै इसी
हाथी री बात सुणी कोनी,
आं हाथां में तलवार थकां
कुण रांड़ कवै है रजपूती ?
म्यानां रै बदळै बैर्यां री
छात्याँ में रैवैली सूती,
मेवाड़ धधकतो अंगारो आंध्यां में चमचम चमकै लो,
कड़खै री उठती तानां पर पग पग पर खांडो खड़कैलो,
राखो थे मूंछ्याँ ऐंठ्योड़ी
लोही री नदी बहा द्यूंला,
हूँ अथक लडूंला अकबर स्यूँ
उजड्यो मेवाड़ बसा द्यूंला,
जद राणा रो संदेष गयो पीथळ री छाती दूणी ही,
हिंदवाणों सूरज चमकै हो अकबर री दुनियां सूनी ही।


मींझर से