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मारवाड़ी समाज में समाप्त होती परम्परा:

Rao GumanSingh Guman singh


मारवाड़ी समाज में ब्याह-शादियों में कल तक मुस्लिम घरों की राजस्थानी मुस्लिम औरतें ही लखारी चूड़ियाँ पहनाया करती थी। यह ब्याह की एक रस्म सी बन चुकी थी। मुस्लिम औरतों का समाज के घरों मे आना-जाना भी था। परन्तु हिन्दुस्तान विभाजन ने इन रिस्तों में काफी दरार पैदा कर दी, अब तो यह परम्परा समाप्त सी हो गई है। ठीक इसी प्रकार हर गाँव व कस्बे में मारवाड़ी 'नाई' एवं 'मिसरानी' का होना उतना ही जरूरी माना जाता था, जितना जीना-मरना। कुछ ऎसी बातें इस समाज में उदाहरण के रूप में आज भी मिल जायेगी, जिससे यह सबुत आसानी से मिल जाएँगे कि यह समाज राजस्थान से जैसे- जैसे दूर होता गया, वैसे-वैसे ही स्थानीय समाज एवं स्थानीय बोल-चाल, भाषा, लोक त्योहारों को अपनाता चला गया। समय का यह दौर यहाँ तक चला कि लोगों ने राजस्थान की पुश्तों पुरानी जमीन-जायदाद को कौड़ियों के भाव बिक्री कर दी। जो जिस प्रदेश में बसा वह वहीं का होकर रह गया। देश में आजादी के पूर्व मारवाड़ियों का केन्द्र प्रायः अविभाजित बंगाल ही रहा। धीरे-धीरे यह समाज आस-पास के शहरों, प्रान्तौं में फैलता चला गया। यहाँ बता देना भी जरूरी होगा कि दक्षिण भारत को छोड़कर पूर्वी भारत में मारवाडि़यों का प्रवेश प्रायः 300 वर्ष पूर्व ही हो गया था, जिसमें बिहार ( झारखण्ड के साथ) , असम, अविभाजित बंगाल (उडिसा को लेकर), और कलकत्ता इनका केन्द्र बना रहता । एक प्रकार से कोलकाता को मारवाड़ीयों का 'मिनी राजस्थान' भी कहा जा सकता है। स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी थी, कि कलकत्ता एक प्रकार से मारवाड़ियों का मक्का-मदीना बन चुका था। इस हरी-भरी धरती को अपना बना लेने वाला यह समाज अपने आप में एक उदाहरण तो है ही, साथ ही साथ यहाँ के सुख-दुःख में भी बराबर का साथ रहा है, चाहे वह अकाल की घटना हो या बाढ़ की हर पल इस समाज ने अग्रणी भूमिका अदा की है। एक सबसे बड़ी बात मुझे देखने को मिली की अहिन्दी भाषी प्रन्तों में मारवाड़ी समाज ने हिन्दी का एक प्रकार से लालन-पोषण ही किया। इसका सबसे बड़ा कारण था, इन प्रन्तों हिन्दी भाषा-भाषी के लिये किसी प्रकार की शिक्षण व्यवस्था का न होना, जगह-जगह हिन्दी का पोषण करने हेतु स्कूल-विद्यालय-पुस्तकालय की स्थापना के साथ-साथ हिन्दी समाचार पत्रों के प्रकाशन में इस प्रवासी समाज के योगदान को इंकार करना किसी भी प्रकार से संभव नहीं है। पिछले दिनों जब समाज विकास में 'मारवाड़ी समाज के धरोहर' का प्रकाशन का निर्णय लिया तो, विभिन्न प्रन्तों से काफी आंकड़े प्राप्त हुए, जिसके विवरणों को आगे देने का प्रयास करूंगा, पाया कि इस समाज ने जो भी जनोपयोगी कार्य किये वे समस्त मानवजाति के लिये तो किये ही, साथ ही साथ स्थानीय साहित्य,भाषा, संस्कृति के विकास में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह बात मेरे लिख देने से या कह देने से प्रमाणित नहीं हो जाती, कोई भी यह जानना जरूर चाहेगा कि, यह बात कैसे प्रमाणित की जाय? इसका एक छोटा सा उदाहरण असम में "रूपकंवर ज्योतिप्रसाद अग्रवाला" का ही देना चाहूगां, असम में एक दिन का राजकीय छुट्टी प्रति वर्ष मनाई जाती है, इनके नाम से और इस दिन समुचा असमिया समाज दिनभर सांस्कृतिक कार्यक्रम करते हैं, एकप्रकार से "रूपकंवर ज्योतिप्रसाद अग्रवाला" को असम का रविन्द्रनाथ ठाकुर कहा जा सकता है। एक समय था जब समाज के लोग न सिर्फ अपने समाज के विकास की बात सोचते थे, वे स्थानीय साहित्य,भाषा, संस्कृति के विकास में भी अपना महत्वपूर्ण दिया है। आज की पीढ़ी में यह बात देखने को नहीं मिलती, जो काम मारवाड़ी समाज ने किये उनके आंकडों का एक दस्तावेज यदि बनाया जाय तो यह ज्यादा उपयोगी होगा। मारवाड़ी शब्द की परिभाषा: जहाँ तक मेरा मानना है, 'मारवाड़ी' - शब्द न कोई विशेष जाति, न धर्म और न ही किसी प्रान्त को द्योतक है। जैसे पंजाबी, बंगाली, गुजराती आदि कहने पर अहसास होता है। राजस्थान व हरियाणा के लोगों को इनकी भाषा-बोली, पहनाव- संस्कृति में एकरूपता के चलते इन्हें देश के अन्य प्रन्तों में, विदेशों में भी मारवाड़ी शब्द से सम्बोधित किया जाने लगा। (इस बात पर आगे चर्चा करूगाँ कि, कब से और कैसे इस समाज को 'मारवाड़ी' शब्द से संबोधित किया जाने लगा, और इसके पीछे क्या कारण थे।) अब यह प्रश्न स्वभाविक तौर पर हो सकता है, कि तब मारवाड़ी किस प्रान्त के हैं? एक पाठक ने रायपुर से ई- मेल कर, मुझसे प्रश्न किया कि - "मारवाड़ी से तात्पर्य सीधे रूप में राजस्थानी से माना जाता है, मारवाड़ी सम्मेलन भी अपने संविधान में राजस्थानी संस्कृति की बात करती है, तो फिर हरियाणा के प्रवासी लोगों को देश के अन्य हिस्सों में मारवाड़ी शब्द से क्यों सम्बोधित किया जाता है?" इसका सटिक उत्तर अभी तक मेरे पास नहीं है, हाँ यह बात तो सही है कि जहाँ एक तरफ राजस्थान व हरियाणा के लोगों को देश के अन्य भागों में मारवाड़ी कह कर संबोधित किया जाता है, वहीं राजस्थानी व हरियाण्वी अपने मूल प्रान्त के अन्दर अपने आपको मारवाड़ी नहीं मानते। इसका कारण क्या है इस पर हम बाद में विचार करगें। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात ओर है, जिसपर भी गौर करने की बात है कि, हिन्दू, जैन, ब्राह्मण समाज, माहेश्वरी, ओसवाल, जाट, बनिया, आदि सभी को देश-विदेश के समस्त हिस्सों में मारवाड़ी कहा जाता है, परन्तु राजस्थान, हरियाणा के मुसलमानों को मारवाड़ी शब्द से संबोधित नहीं किया जाता है और ( कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो ) न ही वे अपने आपको संबंधित रखना पसंद करते हैं । वैसे तो अभी तक इस शब्द की सही व्याख्या नहीं हो पाई है, फिर भी कई विद्वानों ने इसकी व्याख्या करने का प्रयास किया है। जिसमें मारवाड़ के सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ श्री गौरीशंकर हीरा चन्द जी ओझा ने लिखा है, 'मारवाड़' शब्द देशवाची और मारवाड़ी शब्द लोकभाषा एवं संस्कृतिवाची है। राजपुताना के लोगों को हिन्दूस्तान में मारवाड़ी ही कहते हैं। जयपुर के प्रसिद्ध इतिहासज्ञ तथा पुरातत्ववेत्ता पुरोहित श्री हरि नारायण जी ने लिखा है - " राजपूताना से बाहर जाने वाले लोग अपने पहनावे, रहन-सहन, व्यवहार और व्यापार आदि में समानता के कारण राजस्थान से बाहर कलकत्ता, मुंबई आदि भारत के सभी स्थानों में मारवाड़ी कहे जाते हैं, भले ही वे राजस्थान में जोधपुर, बीकानेर अथवा जयपुर के या अन्य किसी राज्य (राजस्थानी रियासत वाले#) के निवासी क्यों न हों। डॉ.डी.के.टकनेत ने अपनी पुस्तक "मारवाड़ी समाज" में बालचन्द मोदी का हवाला देकर लिखा है कि " मारवाड़ शब्द संस्कृत के 'मरुवर' का अपभ्रंश है एवं प्राचीन काल में यह मरू प्रदेश कहलाता था। इसकी व्याख्या श्री मोदी के अनुसार 'माड' जैसलमेर का दूसरा नाम था और 'वाड' मेवाड़ का अंतिम अंश। इन दोनों शब्दों को मिलाकर मारवाड़ शब्द बना और इसी शब्द से 'मारवाड़ी' शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है। जब यहा बात लिखी गई थी उन दिनों राजस्थान में कई अलग-अलग रियासतें भी थी, जिसे बाद मेम राजस्थान में विलय कर दिया गया। क्रमशः - शम्भु चौधरी

मारवाड़ी शब्द का प्रयोग -शम्भु चौधरी

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मारवाड़ी शब्द वर्तमान समय में संकुचित और रूढ़ीगत दायरे की चपेट से बाहर आने लगा है। धीरे-धीरे यह शब्द देश के विकास का सूचक बनता जा रहा है, एक समय था जब समाज के लोग भी इसे घृणा का पर्यावाची सा मानने लगे थे। मंच के कुछ जागरूक सदस्यों ने मेरा मंच ब्लॉग पर इस बात पर एक परिचर्चा शुरू की है। जहाँ तक मेरा मानना है कि 'मारवाड़ी' - शब्द न कोई जाति, न धर्म और न ही किसी प्रान्त का द्योतक है जैसे- पंजाबी, बंगाली, गुजराती आदि कहने से अहसास होता है। राजस्थान एवं हरियाणा व पंजाब के कुछ सीमावर्ती इलाके के प्रवासी लोगों को भारत के अन्य प्रान्तों या विदेशों में भी इस समाज को 'मारवाड़ी ' शब्द से जाना व पहचाना जाता है, वहीं इसी प्रान्त के मुसलमान समाज ने अपने आपको इस शब्द से अलग ही कर रखा हैं [कुछ अपवादों को छोड़कर]। जबकि अन्य धर्म व संप्रदाय के सभी लोगों को जिसमें विशेषत: हिन्दू, जैन, ओसवाल, माहेश्वरी, ब्राह्मण, राजपुत, बनीया आदि सभी धर्म जाति के लोग शामिल पाये जाते हैं। यहाँ पंजाब और हरियाणा क्षेत्र के राजस्थानी जो एक समय राजपुताने क्षेत्र में ही आते थे, अब भूगौलिक परिवर्तन व पंजाब और हरियाणा प्रान्तों के रूप में जाने जाने के चलते इस क्षेत्र का मारवाड़ी समाज अपने आपको पंजाबी या हरियाणवी ही मानने लगे हैं, जबकि इनकी बोलचाल-भाषा, पहनवे, रीति-रिवाज, राजस्थानी भाषा संस्कृति से मिलते ही नहीं राजस्थानी संस्कृति ही हैं, इसीलिए प्रवासी मारवाड़ी समाज के लिये आम तौर पर राजस्थानी शब्द का ही प्रयोग किया जाता है भले ही वे हरियाणा या पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र से ही क्यों न आतें हों पीछले दिनों श्री राजेश कुमार जैन ने यह प्रश्न उठाया था कि मारवाड़ी से तात्पर्य जब राजस्थानी भाषा और संस्कृति से ही लगाया जाता है तो हरियाणा की क्या कोई साहित्य या अपनी संस्कृति नहीं है? यह प्रश्न आज की युवा पीढ़ी का उठाना वाजिब सा लगता है जब हरियाणा एक समय पंजाब के अन्तर्गत आता था तो यह बात पंजाब के साथ भी उठती थी की हरियाणा की अपनी अलग संस्कृति है इस पंजाब से अलग कर दिया जाय और हुआ भी ऎसा ही पंजाब ने यह स्वीकार किया कि हरियाणा को एक अलग राज्य का दर्जा देना ही उचित रहेगा। परन्तु इस राज्य के अलग दर्जे को प्राप्त कर लेने से जो क्षेत्र राजस्थान रियासतों के अधिन आते थे उनकी भाषा, संस्कृति, पहनावे, खान-पान , रीति-रिवाज हो या पर्व त्योहारों सभी में एक समानता पाई जाती थी जो थोड़ा बहुत अन्तर था तो वह सिर्फ बोली का ही था। देखें नीचे दिये गये एक चित्र के लाल निशान को जिसमें हिसार, भिवानी, रोहतक, गुड़गावं, लेहारू, महेन्द्रगढ़, पटियाला और दिल्ली का भी छोटा सा भाग राजपुताने क्षेत्र में दिखाया हुआ है। जो इन दिनों 

आपणा इलाका :

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आपणा इलाका : आपणा नांव-

ओम पुरोहित 'कागद'

राजस्थान जूनो प्रदेश। जूनी मानतावां। जूनो इतिहास। जूनी भाषा। जूनी परापर। परापर एड़ी कै आज तक इकलग चालै। खावणै-पीवणै, उठणै-बैठणै अनै बोवार री आपरी रीत। रीत में ठरको। ठरकै में इतिहास री ओळ। ग्यान-विग्यान अर भूगोल री ओळ। बात-बोवार अर नांव में राजस्थानी री सौरम। इण सौरम रो जग हिमायती। आजादी सूं पैली राजस्थान में घणा ठिकाणा। घणा ई राज। राजपूतां रा राज। इणी पाण राजपूताना। राजा राज करता पण धरती प्रजा री। प्रजा राखती नांव धरती रा। नांवकरण में ध्यान धरती रै गुण रो। राजवंश, फसल, माटी, पाणी, फळ, पसु-पखेरू धरती रा धणी। आं री ओळ में थरपीजता इलाकै रा नांव।बीकानेर रा संस्थापक राव बीकाजी रै नांव माथै बीकाणो। बीकाणै में बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, भटिंडा, अबोहर, सिरसा अर हिसार। राव शेखाजी रै नांव माथै शेखावाटी। शेखावाटी में चूरू, सीकर अर झुंझुणू। मारवाड़ में जोधपुर, पाली जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर। मेवाड़ में उदयपुर, चितोड़ , भीलवाड़ा अर अजमेर। बागड़ में बांसवाड़ा अर डूंगरपुर। ढूंढाड़ में जयपुर, दौसा, टोंक, कीं सवाईमाधोपुर। हाड़ौती में कोटा, बूंदी, बांरा, झालावाड़, कीं सवाईमाधोपुर। मेवात में अलवर, भरतपुर। जैसलमेर में माड़धरा, हनुमानगढ़ नै भटनेर, करोली-धोलपुर नै डांग, अलवर नै मतस्य, जयपुर नै आमेर, अजमेर नै अजयमेरू, उदयपुर नै झीलां री नगरी, जैसलमेर नै स्वर्णनगर, जोधपुर नै जोधाणो अर सूर्यनगरी, भीलवाड़ा नै भीलनगरी, बीकानेर नै जांगळ अर बागड़ भी कैईजै। राजस्थान रै हर खेतर रा न्यारा-निरवाळा नांव। कीं नांव बिणज-बोपार माथै। कीं नांव जमीन री खासियतां रै पाण। बीकाणै में भंडाण, थळी, मगरो अर नाळी जे़डा नांव सुणीजै। ऐ हाल तो बूढै-बडेरां री जुबान माथै है। बतळ में उथळीजै। पण धीरै-धीरै बिसरीज रैया है। आओ आपां जाणां आं नांवां री मैमा।
भंडाण भंडाण बीकानेर जिलै री लूणकरणसर, बीकानेर अर कीं कोलायत तहसील रै उण गांवां नै कैवै जकां रै छेकड़ में 'ऐरा' लागै। जियां- हंसेरा, धीरेरा, दुलमेरा, खींयेरा, वाडेरा।भंडाण रा मतीरा नांमी होवै। मीठा। अठै री आल जबर मीठी होवै। आल लाम्बै मतीरै नै कैवै। भंडाण री गायां-भैंस्यां, भेड-बकरयां अर ऊंट नांमी। भंडाण रो घी, मावो अर मोठ नांमी। मतीरो भंडाण रो सै सूं सिरै। अठै रै मतीरै सारू कैबा है-
खुपरी जाणै खोपरा, बीज जाणै हीरा।बीकाणा थारै देस में, बड़ी चीज मतीरा।।थळीथळी चूरू जिलै रै रतनगढ़ अर सुजानगढ़ रै खेतर नै थळी कैवै। इण खेतर रा लोग थळिया। थळी री बाजरी, मोठ, काकड़िया, मतीरा नांमी हुवै। थळी री बाजरी न्हानी अर मीठी होवै। थळी रा वासी मोटो अनाज खावै। काम में चीढा अनै जुझारू अर तगड़ा जिमारा होवै। थळी सारू कैबा है-
खाणै में दळिया, मिनखां में थळिया।
मगरोबीकानेर जिलै री कोलायत तहसील अर इणरै लागता जैसलमेर रा कीं गांवां नै मगरो कैवै। अठै री जमीन कांकरा रळी। मगर दाईं समतळ। पधर। इण कारण नांव धरीज्यो मगरो। मगरै रा ऊंट, गा-भेड अर बकरी नांमी। कोलायत धाम भी मगरै में पड़ै।
नाळीहनुमानगढ़, सूरतगढ़, पीळीबंगा, अनूपगढ़, विजयनगर अर हरियाणा रै सिरसै जिलै रै गांवां नै नाळी कैवै। अठै बगण आळी वैदिक नदी सुरसती जकी नै अजकाळै घग्घर भी कैवै। इण नदी खेतर नै नाळी कैईजै। इण इलाकै रो नांव नाळी क्यूं थरपीज्यो। इण सूं जुड़ियोड़ी एक रोचक बात है। आओ बांचां-जद घग्घर में पाणी आंवतौ। बीकानेर रा राजा नदी पूजण हनुमानगढ़ आंवता। एकर राजाजी हनुमानगढ़ आयोड़ा हा। लारै सूं एक जणौ अरदास लेय’र म्हैलां पूग्यौ। राजाजी नीं मिळ्या। पूछ्यौ तौ लोगां बतायौ, नदी पूजण गया है। बण पूछ्यो, नदी के होवै? एक कारिंदै जमीन माथै माटी में घोचै सूं लीकटी बणाई। लोटै सूं उण में पाणी घाल्यो। बतायो, नदी इयां होवै। बण कैयो, ए डोफा! आ क्यांरी नदी ? आ तो नाळी है, नाळी। बस उण दिन रै बाद इण इलाकै रो नांव नाळी पड़ग्यो। नाळी रा चावळ, कणक अर चीणा जग में नांमी। नाळी री जमीन घणी उपजाऊ होवै।
आज रौ औखांणौबूढळी रै कह्यां खीर कुण रांधै?

प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका, वाया-गोगामे़डी, जिलो- हनुमानगढ़ -335504कानाबाती- 09602412124
राजस्थानी रा लिखारां सूं अरज- आप ई आपरा आलेख इण स्तंभ सारू भेजो सा!

कोरियर री डाक इण ठिकाणै भेजो सा!सत्यनारायण सोनी, द्वारा- बरवाळी ज्वेलर्स, जाजू मंदिर, नोहर-335523email-
aapnibhasha@gmail.com

लालां बिचलो मोती

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लालां बिचलो मोती, लाखीणो भरतार।

प्रो. जहूरखां मेहर
राजस्थानी लूंठी भासा। लूंठो इणरो सबदकोस। लूंठी इणरी बातां। एक-एक सबद रा पर्याय गिणो तो गिणण में नीं आवै। लाधता जावै, लाधता जावै। लारलै दिनां छैल भंवर रा नांव अर विशेषण छाप्या तो आप घणा दाय करिया। घणी सरावणा कीनी। आज कीं और भळै बांचो। ऐ नांव आपणै सारू अंवेर'र भेज्या है- जोधपुर सूं प्रो. जहूरखां मेहर।
अंतर रो फूंबो, अंतर रो छकियो, अंतरियो बनड़ो, अंधारै घर रो पांवणो, अचूकरा बोलणो, अलबेलो ओठी, अलवलियो असवार, आंखड़ल्यां रो ठार, आंख्यां रो अंजन, आंख्यां रो काजळ, आतमा रो आधार, ऊगतो भाण, ऊगतै सूरज रो तेज, ऊजळदंतो कानूड़ो। कमोदणी रो चांद, काचै किरसलियै रो रूप, कान्हकंवर-सा, काया री कोर, काळजै री कूंप, केतकी रो कंथ, केळू री कांब, केळू री पांख, केसर वरणो, केसरियो भरतार, कोटड़ियां रो रूपक, कोडीलो, खावंद। गसारी रा प्राण आधार, गाडाळ, गायड़ रो गाडो, गुडळो बादळ, गोपियां मांयलो कान्ह। घण नेहाळू, घणबिलमाऊ, घण-रीसाळू, घण-रूपाळू, घण-संकाळू, घणहंसा, घर रो आधार, घर रो धणी, घु़डलां रो असवार।
चंवरी रो रूप, चतर रो चांद, चतुर बुद्ध रो जाण, चु़डलै रो रूप। छिरजगारो, छैल-छबीलो। जग-मोवणो, जीव री जड़ी, जीव रो आसरो, जोड़ी रो भरतार, जोबन रो जोड़। टोळी मांय सूं टाळको, टोळी रो टीकायत। ढळती नथ रा मोती। तन रो ताईतियो, तारां बिचलो चांद, तुनक मिजाजी। थोड़ा बोली रो सायबो। दुख-भंजक। धण रो धणी, धरती-सो धीमो। नखराळो, नथड़ी रो मोती, नेतल रो भरतार, नैणां री जोत, नैणां रो नीर, नैणां रो वासी, नैणां रो हीर, नैनी नणद रो वीर।
परदेसियो, परदेसी सूवटियो, परभात रो रूप, पीरजादो। फूटरियो, फूल बनी रो सायबो, फूलां बिचलो गुलाब। बागां मांयलो केवड़ो, बागां मांयलो चंपलो, बागां रो छैल, बागां रो भंवरो, बागां रो सूवटो, बाड़ी रा भौंरा, बाजू़डै री लूंब, बाढाळो, बाताळु, बायां बिचलो बीजळो, बाव नोचण। भंवरियै पटां रो, भाखर जिस्या भारी, भायां रो लाडलो। मंडियोड़ो मोर, मजलस रो मांझी, मदछकियो स्याम, मनचोर, मनभरियो, मन रो तीमण, मन रो धणी, मन रो मीत, मन रो राजा, महलां मांयलो दिवलो, महलां रो मान, माथा रो मैमद, माथै रो मौड़ , मारूड़ो, मालको, मिजाजी, मिणधर, मिसरी मेवो, मिसरी रो डळो, मैमद मोरियो, मैलां रो मेवासी, मोवनगारो, मौजां रा बगसणहार।रंगीलो बादळ, रखड़ी रो उजास, रागां रो रसियो, रागां रो रीझाळू, राय, रिड़मलो, रीसाळु राज, रूप रो डळो, रेजो, रेसम, रेसम रो भारो। लळवळियो सरदार, लाखीणो भरतार, लाडो, लालां बिचलो मोती। व्हालो।संसार रो सुख, सइयां, सईजादो, बनड़ो, सगां रो सूवटियो, सजनी रो सूओ, समंदां जिस्या अथाह, सरद पून्यूं रो चांद, सांवळियो मोटियार, सवाग रो चीर, सवाग रो धणी, सातां बैनां रो बीर, सायधण रो चीर, सायरमल, सायर सोढो, सासू-जायो, सासू रो मोबी, सिर रो सेवरो, सुन्दर रो सायबो, सुखकरण, सुख रो सागर, सूरज रो साखियो, सेजां रो सुख, सेजां रो धणी, सेजां बिचलो स्याम, सेजां रो सरूप, सेजां रो सिणगार, सेजां रो सुखवासी, सेजां रो सूवटियो, सैणां रो सूवटो, सोरमियो, सोळा कळा सुजान। हथळेवै रो हाथ, हरियाळो बनड़ो, हाटां मांयलो हीर, हाथां रो खतमी, हाथां रो खामची, हिवड़ै रो चीर, हिवड़ै रो हमीर, हिवड़ै रो हार, हीयै री जोत, हीयै रो हीर, हेताळु हंसलो।
अर अबार सुणो सा, ओ दूहो-मोरां बिन डूंगर किसा, मेह बिन किसा मल्हार।तरिया बिन तीजां किसी, पिव बिना किसा सिंगार।।
आज रौ औखांणौधणी बिना गीत सूना तो सिरदार बिना फौज निकांमी
प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका, वाया-गोगामे़डी, जिलो- हनुमानगढ़ -335504कानाबाती- 09602412124
राजस्थानी रा लिखारां सूं अरज- आप ई आपरा आलेख इण स्तंभ सारू भेजो सा!
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ओबामा सरकार नै घणा-घणा रंगमान

Rao GumanSingh Guman singh

बध्यो मायड़ रौ- हरिमोहन सारस्वत
हरिमोहन सारस्वत रो जलम 14 सितम्बर, 1971 नै हनुमानगढ़ मांय हुयो। राजस्थानी रा समरथ लिखारा। 'गमियोड़ा सबद' कविता संग्रै माथै मारवाड़ी सम्मेलन, मुम्बई रो घनश्यामदास सराफ सर्वोत्तम साहित्य पुरस्कार समेत मोकळा मान-सनमान। राजस्थानी आंदोलन रा आगीवांण। श्रीगंगानगर सूं आखै राजस्थान घूमता थकां नई दिल्ली तक री मायड़भासा-सनमान जातरा रा संयोजक रैया। अबार अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति रा प्रदेश पाटवी। आज बांचो, आं री कलम री कोरणी- ओ खास लेख।
राजस्थानियां वास्तै आज हरख-उमाव रो दिन है। खुशियां मनावण रो दिन है। नाचण-गावण रो दिन है। मौज मनावण रो दिन है। दुनिया रै सब सूं तागतवर मानीजण वाळै देस अमरीका राजस्थान री भासा नै सरकारी स्तर पर मान्यता देय'र राजस्थान अर राजस्थानी रो मान बधायो है। अमरीका सरकार रै राजनीतिक पदां सारू जका आवेदन करीजैला, वां में दुनिया री 101 भासावां में सूं किणी भासा रा जाणकार आवेदन कर सकैला। वां में सूं 20 भासावां भारत री है। जिणां मांय सूं मारवाड़ी, हरियाणवी, छतीसगढ़ी, भोजपुरी, अवधी अर मगधी ऐड़ी भासावां हैं जिकी अजे तांईं भारतीय संविधान री आठवीं अनुसूची में आपरी जिग्यां नीं थरप सकी।राजस्थान रा जका लोग बारै बसै, वां नै मारवाड़ी अर वां री भासा पण मारवाड़ी नांव सूं जाणीजै। अमरीका में 'राजस्थान एशोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमरीका' (राना) नांव सूं एक जबरो संगठन है। राना रा प्रतिनिधि डॉ. शशि शाह बतावै कै अमरीका में राजस्थानी रै पर्याय रूप में मारवाड़ी सबद घणो चलन में है। मारवाड़ी राजस्थानी रो ई दूजो नांव है।अमरीका सरकार हरियाणवी नै भी मान्यता दीनी है। हरियाणवी भी राजस्थानी भासा रो एक रूप है। भासा वैग्यानिकां घणकरै हरियाणा प्रांत नै राजस्थानी भासी क्षेत्र रै रूप में गिण्यो है। हरियाणवी अर राजस्थानी संस्कृति एकमेक है, तो भासा री समरूपता रै ई कारण।अमरीका री शिकागो यूनिवर्सिटी मांय भी राजस्थानी बरसां सूं पढ़ाई जावै। इण यूनिवर्सिटी मांय राजस्थानी रो न्यारो-निरवाळो विभाग भी थरपीजियोड़ो है। अमरीका री एक संस्था 'लायब्रेरी ऑफ कांग्रेस' बरसां पैली विश्व भासा सर्वेक्षण करवायो तो दुनिया री तेरह समृद्धतम भासावां में राजस्थानी आपरी ठावी ठोड़ थरपी।जिकी भासा रो दुनिया में इत्तो मान-सम्मान। वा आपरै घर राजस्थान में ई दुत्कारीजै तो काळजो घणो ई बळै। आपरी मायड़ रो ओ अपमान सहन नीं हुवै। कित्ती अजोगती बात है कै राजस्थान रो एक विधायक, जको राजस्थान रो जायो-जलम्यो, राजस्थानी माटी में पळ्यो-बध्यो, राजस्थानी भासा रा संस्कार लेय'र विधानसभा पूग्यो। राजस्थान री विधानसभा में बो दूजी २२ भासावां में भासण देय सकै, पण आपरी मायड़भासा में शपथ भी नीं लेय सकै! राजस्थान रै स्कूलां में पैली भासा रै रूप मांय हिन्दी पढ़ाई जावै। राजस्थानी लोग उणरो स्वागत करै। पण दूसरी भासा रै रूप में राजस्थानी री मांग करै। पण राजस्थानी तो तीजी भासा रै रूप में भी नीं सिकारीजै। तीजी भासा रै रूप में दूजै प्रांतां री दर्जनभर भासावां पढ़ाई जावै, तो राजस्थान री राजस्थानी क्यूं नीं? सेठियाजी कैयो-
आठ करोड़ मिनखां री मायड़ भासा समरथ लूंठी।नहीं मानता द्यो तो टांगो लोकराज नै खूंटी।।
(भारत सरकार अगर इयूं समझै कै राजस्थांनी वांरा गुलाम है अर वांनै वांरी मायड़भासा अर संस्कृती सूं हेत राखण रौ कोई हक कोनी, तौ एड़ी भारत सरकार रौ आपांनै विरोध करणौ चावै. म्हें पैली ईं केह चुक्यौ हूं कै अगर एक बरस मांय भारत सरकार आपाणी मायड़भासा नै मानता नीं देवै तौ जोरदार विरोध करणौ पड़सी अर अगर जरुरत पड़ै तौ भलै अलगाववाद री नीती ई अपणावणी पड़ै. भारत सरकार रौ मानणौ है कै राजस्थांनी भारत रै आर्थीक विकार अर सेना मांय सैयोग देवता रह्‌वै पण वांनै राजस्थांन अर राजस्थांनी रै बारै मांय बोलणा रौ कै सोचणै रौ हक कोनी तौ वा गलत है, अठै कन्हैयालाल जी साची कही है कै लोकराज (लोकतंत्र) नै खूंटी टांगौ, सिधी आंगळी सूं घी नीं निकळै (कै तौ आंगळी टेढी करु नहीं तौ टिपरीयौ वापरौ)....
आपरौ हनवंतसिंघ राजपुरोहित)
अमरीका में बसण वाळा राजस्थानियां नै घणा-घणा रंग! ओबामा सरकार नै घणा-घणा रंग! वां राजस्थान अर राजस्थानी रो मान बधायो है। 21 फरवरी दुनियाभर में 'विश्व मातृभाषा दिवस' रै रूप में मनाइजै। अखिल भारतीय राजस्थानी भासा मान्यता संघर्ष समिति राजस्थानी नै संवैधानिक मानता री मांग नै लेय'र प्रदेश रा सगळा संभाग मुख्यालयां पर धरना-प्रदर्शन अर मुखपत्ती सत्याग्रह करैला। आपां नै भी आपणी भासा रै मान-सनमान वास्तै लारै नीं रैवणो है।
आज रो औखांणोमां कैवतां मूंडो भरीजै।थां खुद समझदार हौ, मतळब बतावण री कोई जरुरत तौ है कोनी पण इत्तौ जरुर बोलू कै, मां, मायड़भोम अर मायड़भासा रौ दरजौ सुरग सूं ईं उचौ हुवै.
प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका, वाया-गोगामे़डी, जिलो- हनुमानगढ़ -335504कोरियर री डाक इण ठिकाणै भेजो सा!सत्यनारायण सोनी, द्वारा- बरवाळी ज्वेलर्स, जाजू मंदिर, नोहर 335504

email-aapnibhasha@gmail.com

शर्म करो भारत सरकार

Rao GumanSingh Guman singh

भारत सरकार अगर इयूं समझै कै राजस्थांनी वांरा गुलाम है अर वांनै वांरी मायड़भासा अर संस्कृती सूं हेत राखण रौ कोई हक कोनी, तौ एड़ी भारत सरकार रौ आपांनै विरोध करणौ चावै. म्हें पैली ईं केह चुक्यौ हूं कै अगर एक बरस मांय भारत सरकार आपाणी मायड़भासा नै मानता नीं देवै तौ जोरदार विरोध करणौ पड़सी अर अगर जरुरत पड़ै तौ भलै अलगाववाद री नीती ई अपणावणी पड़ै. भारत सरकार रौ मानणौ है कै राजस्थांनी भारत रै आर्थीक विकार अर सेना मांय सैयोग देवता रह्‌वै पण वांनै राजस्थांन अर राजस्थांनी रै बारै मांय बोलणा रौ कै सोचणै रौ हक कोनी तौ वा गलत है, अठै कन्हैयालाल जी साची कही है कै लोकराज (लोकतंत्र) नै खूंटी टांगौ, सिधी आंगळी सूं घी नीं निकळै (कै तौ आंगळी टेढी करु नहीं तौ टिपरीयौ वापरौ)....
मां कैवतां मूंडो भरीजै।मां, मायड़भोम अर मायड़भासा रौ दरजौ सुरग सूं ईं उचौ हुवै.
राजस्थांनीयां वास्तै आज हरख-उमाव रौ दिन है. दुनिया रै सब सूं तागतवर मानीजण वाळै देस अमरीका राजस्थान री भासा नै सरकारी स्तर पर मान्यता देय'र राजस्थान अर राजस्थानी रौ मान बधायौ है. अमरीका सरकार रै राजनीतिक पदां सारू जका आवेदन करीजैला, वां में दुनिया री 101 भासावां में सूं किणी भासा रा जाणकार आवेदन कर सकैला, वां मांय एक मारवाड़ी (राजस्थांनी) है. आपरी माहिती वास्तै आखी दुनिया मांय राजस्थांनी मारवाड़ी रै नांव सूं ओळखीजै अर वांरी भासा मारवाड़ी भासा कुहावै.

गैरों ने अपनाया - अपनों ने ठुकराया शर्म करो भारत सरकार

आपरौ,
हनवंतसिंघ राजपुरोहित

हूं रे हूं-विजयदांन देथा री बातां

Rao GumanSingh Guman singh

हूं रे हूं
 
 
अे जाडी गवाड़ी रो धणी चालतो रह्‌यौ तो उणरी घरवाळी केई दिनां तांई रोवती नीं ढबी। न्यात अर कड़ूंबा रा जाट भेळा होय उणनै समझावण लागा। तद वा रोवती-रोवती ई कैवण लागी- धणी रै लारै मरणा सूं तो रीवी। आ दाझ तो जीवूंला जित्तै बुझैला नीं। अबै रोवणो तो इण बात रो है कै लारै घर में कोई मोट्यार कोनीं। म्हारी आ छह सौ बीघा जमीं कुण जोतैला, बोवैला?
हाथ में गेडी अर खांधै पटू़डो* लियां अेक जाट पाखती ई ऊभो हो। वो जोर सूं बोल्यो- हूं रे हूं।
पछै वा जाटणी वळै रोवती-रोवती बोली- म्हारै तीन सौ गायां री छांग अर पांच सौ लरड़ियां रो ऐवड़ है। उणरो धणी-धोरी कुण व्हैला?
वो सागी ई जाट वळै कह्यो- हूं रे हूं।
वा जाटणी वळै रोवती-रोवती बोली- म्हारै च्यार पचावा*, तीन ढूंगरियां* अर पांच बाड़ा है, वां री सार-संभाळ कुण करैला?
वो जाट तो किणी दूजा नै बोलण रो मौको ई नीं दियो। तुरंत बोल्यो- हूं रे हूं।
जाटणी तो रोवती नीं ढबी। डुस्कियां भरती-भरती बोली- म्हारो धणी बीस हजार रो माथै लेहणो छोड़नै गियो, उणनै कुण चुकावैला?
अबकी वो जाट कीं नीं बोल्यो। पण थोड़ी ताळ तांईं किणी दूजा नै इणरो हूंकारो नीं भरतां देख्यो तो जोस खाय कह्यो- भला मिनखां, इत्ती बातां रा म्हैं अेकलो हूंकारा भरिया। थैं इत्ता जणा ऊभा हो, इण अेक बात रो तो कोई हूंकारो भरो। यूं पाछा-पाछा कांईं सिरको!
(विजयदांन देथा री बातां री फुलवाड़ी सूं साभार।) 
पटू़डो- ओढण रो ऊनी गाभो।
 पचावा-ज्वार- बाजरी रै पूळां रो ढिग।
ढूंगरियां- सूकै घास रो ढिग।
 

मरूधर रो अगनबोट ऊंट

Rao GumanSingh Guman singh

प्रो. जहूरखां मेहर
सन 1941 मांय जोधपुर मांय जाया-जलम्या प्रो. जहूरखां मेहर राजस्थानी रा विरला लिखारां मांय सूं अे. जिणां री भासा में ठेठ राजस्थानी रो ठाठ देखणनै मिळै. राजस्थान रै इतिहास, संस्कृति अर भासा-साहित पेटै आपरा निबंध लगोलग छपता रैवै. मोकळा पुरस्कार-सनमान मिल्या है. आज बांचो आं रौ औ खास लेख 
रेगिस्तानी बातां सारू राजस्थानी री मरोड़ अर ठरको ई न्यारो. सबदां सूं लड़ालूंब घणी राती-माती भासा है राजस्थानी. इण लेख में मरुखेतर रै अेक जीव ऊंट सूं जुड़ियोड़े रो लेखो करता थकां आ बात जतावण री खप्पत करी है कै थळी रै जीवां अर बातां सारू राजस्थानी भासा री मरोड़ अर ठरको ई न्यारो.
ऊंट मरुखेतर रो अगनबोट कैईजै अर इण सारू राजस्थानी साहित, इतिहास अर बातां में इतरा बखाण लाधै कै इचरज सूं बाको फाड़णो पड़ै. दूजी भासावां में तो 'ऊंट' अर 'कैमल' सूं आगै काळी-पीळी भींत. मादा ऊंट सारू 'ऊंटनी' अर 'सी कैमल' या 'कैमलैस' सूं धाको धिकाणो पड़ै. पण आपणी भासा में इण जीव रा कितरा-कितरा नांव! कीं तो म्हे अंवेरनै लाया हां. बांच्यां ई ठा पड़ै -
जाखोड़ो, जकसेस, रातळो, रवण, जमाद, जमीकरवत, वैत, मईयो, मरुद्विप, बारगीर, मय, बेहटो, मदधर, भूरो, विडंगक, माकड़ाझाड़, भूमिगम, पींडाढाळ, धैंधीगर, अणियाळ, रवणक, फीणनांखतो, करसलो, अलहैरी, डाचाळ, पटाल, मयंद, पाकेट, कंठाळक, ओठारू, पांगळ, कछो, आखरातंबर, टोरड़ो, कंटकअसण, करसो, घघ, संडो, करहो, कुळनारू, सरढो, सरडो, हड़बचियो, हड़बचाळो, सरसैयो, गघराव, करेलड़ो, करह, सरभ, करसलियो, गय, जूंग, नेहटू, समाज, कुळनास, गिडंग, तोड़, दुरंतक, भुणकमलो, वरहास, दरक, वासंत, लंबोस्ट, सिंधु, ओठो, विडंग, कंठाळ, करहलो, टोड, भूणमत्थो, सढ़ढो, दासेरक, सळ, सांढियो, सुतर, लोहतड़ो, फफिंडाळो, हाथीमोलो, सुपंथ, जोडरो, नसलंबड़, मोलघण, भोळि, दुरग, करभ, करवळो, भूतहन, ढागो, गडंक, करहास, दोयककुत, मरुप्रिय, महाअंग, सिसुनामी, क्रमेलक, उस्ट्र, प्रचंड, वक्रग्रीव, महाग्रीव, जंगळतणोजत्ती, पट्टाझर, सींधड़ो, गिड़कंध, गूंघलो, कमाल, भड्डो, महागात, नेसारू, सुतराकस अर हटाळ.
मादा ऊंट रा ई मोकळा नांव. बूढी, ग्याबण, जापायती, बांझड़ी, कागबांझड़ी अर भळै के ठा कित्ती भांत री सांढां सारू न्यारा-न्यारा नांव. मादा ऊंट नै सांढ, टोडड़ी, सांयड, सारहली, टोडकी, सांड, सांईड, क्रमाळी, सरढी, ऊंटड़ी, रातळ, करसोड़ी, रातल, करहेलड़ी, कछी अर जैसलमेर में डाची कैवै. सांढ जे ढळती उमर री व्है तो डाग, रोर, डागी, रोड़ो, खोर, डागड़ जै़डै नांवां सूं ओळखीजै. सांढ जे बांझ व्है तो ठांठी, फिरड़ी, फांडर अर ठांठर कहीजै. लुगायां ज्यूं कागबांझड़ी व्है अर अेकर जणियां पछै पाछी कदैई आंख पड़ै इज कोयनी. ज्यूं सांढ ई अेकर ब्यायां पछै दोजीवायती नीं व्है तो बांवड़ कहीजै. बांवड़ नै कठैई-कठैई खांखर अर खांखी ई कैवै. पेट में बचियो व्है जकी सांढ सुबर कहीजै. जिण सांढ रै साथै साव चिन्योक कुरियो व्है वा सलवार रै नांव सूं ओळखीजै. कदैई जे कुरियो हूवतां ई मर जावै तो बिना कुरियै री आ सांढ हतवार कुहावै.

ऊंट रो साव नान्हो बचियो कुरियो कुहावै. कुरियो तर-तर मोटो व्है ज्यूं उणरा नांव ई बदळता जावै. पूरो ऊंट बणण सूं पैलां कुरियो, भरियो, भरगत, करह, कलभ, करियो अर टोडियो या टोरड़ो अर तोरड़ो कहीजै.

राजस्थानी संस्कृति में ऊंट सागे़डो रळियोड़ो, अेकमेक हु
योड़ो. लोक-साहित इणरी साख भरै. ऊंट सूं जुड़ियोडा अलेखूं ओखाणा अर आडियां मिनखां मूंडै याद. लोकगीतां रो लेखो ई कमती नीं.

जगत री बीजी कोई जोरावर सूं जोरावर भासा में ई अेक चीज रा इत्ता नांव नीं लाधै. कोई तूमार लै तो ठा पड़ै कै कठै तो राजस्थानी रै सबदां रो हिमाळै अर कठै बीजी फदाक में डाकीजण जोग टेकरियां. कठै भोज रो पोथीखानो, कठै गंगू री घाणी!
 
(आ हिंदी भासा तौ राजस्थांनी रै आगे पाणी कम चा है, इण हिंदी रौ राजस्थांनी अर दूजी प्रादेसिक भासावां रा घणा सबद चोरी कर्‌या है तौ ई इणमांय इत्ता प्रयायवाची सबद नीं लाधै. हिंदी रौ अर इज राजस्थांनी री रक्षा कर सकै है - हनवंतसिंघ).

आज रौ औखांणौ

जांन में कुण-कुण आया? कै बीन अर बीन रो भाई, खोड़ियो ऊंट अर कांणियो नाई।
प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका,
वाया-गोगामे़डी, जिलो- हनुमानगढ़ -335504.
 
राजस्थानी रा लिखारां सूं अरज- आप भी आपरा आलेख इण स्तम्भ सारू भेजो सा!
कोरियर री डाक इण ठिकाणै भेजो सा!
सत्यनारायण सोनी, द्वारा- बरवाळी ज्वेलर्स, जाजू मंदिर, नोहर 335523.
email- aapnibhasha@gmail.com
blog- aapnibhasha.blogspot.com

रंगीलो राजस्थान

Rao GumanSingh Guman singh

राजस्थान रंगीलो प्रदेस. राजस्थान नै परम्परागत रूप सूं रंगां रै प्रति अणूंतो लगाव. सगळी दुनिया रो मन मोवै राजस्थानी रंग.
बरसां पैली नेहरू रै बगत नागौर में पंचायत राज रो पैलड़ो टणकौ मेळौ लाग्यौ। 2 अक्टूबर, 1959 रौ दिन हौ. राजस्थान रा सगळा सिरैपंच भेळा हुया। नेहरूजी मंच माथै पधारिया तो निजरां साम्हीं रंग-बिरंगा साफा रो समंदर लहरावतो देख'र मगन हुयग्या। रंगां री आ छटा देख वां री आंख्यां तिरपत हुयगी। मन सतरंगी छटा में डूबग्यो। रंगां रै इण समंदर में डूबता-उतरता गद्-गद् वाणी में बोल्या- ''राजस्थान वासियां! थै म्हारी एक बात मानज्यो, आ म्हारै अंतस री अरदास है। वगत रा बहाव में आय'र रंगां री इण अनूठी छटा नै मत छोड़ज्यो। राजस्थानी जनजीवण री आ एक अमर औळखांण है। इण धरती री आ आपरी न्यारी पिछाण है। इण वास्तै राजस्थान रो ओ रंगीलो स्वरूप कायम रैवणो चाइजै।''
राजस्थानी जनजीवण रा सांस्कृतिक पख नै उजागर करता पंडतजी रा अे  बोल घणा महताऊ है। 'रंग' राजस्थानी लोक-संस्कृति री अेक खासियत है। अठै कोई बिड़दावै, स्याबासी दिरीजै तो उणनै 'रंग देवणो' कहीजै- 'घणा रंग है थनै अर थारा माईतां नै कै थे इस्यो सुगणो काम करियो।' अमल लेवती-देवती वगत ई जिको 'रंग' दिरीजै उणमें सगळा सतपुरुषां नै बिड़दाइजै।
राजस्थान री धरती माथै
ठोड़-ठोड़ मेळा भरीजै। आप कोई मेळै में पधार जावो- आपनै रंगां रो समंदर लहरावतो निगै आसी। लुगायां रौ रंग-बिरंगा परिधान आपरो मन मोह लेसी। खासकर विदेसी सैलाणियां नै ओ दरसाव घणो ई चोखो लागै। इण रंगां री छटा नै वै आपरै कैमरां में कैद करनै जीवण लग अंवेर नै राखै।
राजस्थानी पैरवास कु़डती-कांचळी अर लहंगो-ओढणी संसार में आपरी न्यारी मठोठ राखै। लैरियो, चूंनड़ी, धनक अर पोमचो आपरी सतरंगी छटा बिखेरै। ओ सगळो रंगां रो प्रताप।
इणीज भांत राजस्थानी होळी अेक रंगीलो महोच्छब। इण मौकै मानखै रो तन अर मन दोन्यूं रंगीज जावै। उड़तोड़ी गुलाल अर छितरता रंग अेक मनमोवणो वातावरण पैदा करै। रंगां रो जिको मेळ होळी रै दिनां राजस्थान में देखण नै मिलै, संसार में दूजी
ठोड़ स्यात ई निजरां आवै।
मानवीय दुरबळतावां रै कारण साल भर में पैदा हुयोड़ा टंटा-झगड़ा, मन-मुटाव अर ईर्ष्या-द्वेष सगळा इण रंगीलै वातावरण में धुप नै साफ होय जावै, मन रो मैल मिट जावै।
इण रंगीलै प्रदेस री रंगीली होळी रै मंगळ मौकै आपां नै आ बात चेतै राखणी कै वगत रै बहाव में आय'र भलां ई सो कीं छूट जावै पण आपणी रंग-बिरंगी संस्कृति री अनूठी छटा बणायां राखणी।

कंवल उणियार रो लिखियोड़ौ दूहो बांचो सा!

चिपग्या कंचन देह रै, कपड़ा रंग में भीज।
सदा सुरंगी कामणी, खिली और, रंगीज।।


आज रौ औखांणौ

फूहड़ रो मैल फागण में उतरै।
जे मिनख आपणै डिल री साफ-सफाई माथै ध्यांन नीं उण माथै कटाक्ष स्वरूप आ केवत कह्‌विजै।
प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका,
वाया-गोगामे़डी, जिलो- हनुमानगढ़-335504
कोरियर री डाक इण ठिकाणै भेजो सा!
सत्यनारायण सोनी, द्वारा- बरवाळी ज्वेलर्स, जाजू मंदिर, नोहर-335523
राजस्थानी रा लिखारां सूं अरज- आप भी आपरा आलेख इण स्तम्भ सारू भेजो सा! 

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हाड़ौती बोली में राजस्थानी री बात

Rao GumanSingh Guman singh


-अतुल कनक 
भासान् का मसला पे आपणां राजनीतिक स्वारथ साधबा की जुगत सुतंतर भारत बेई कोय नुई बात कोय न्हं। स्वारथ का रथ पे असवारी करतां-सतां जिम्मेदार मनख्यां ने जठी नरी भासान् के तांई ऊ मुकाम भी बख्श्यो, जीं की वे सांच्या ही हकदार न्हं छी (म्हूँ नांव अर नजीर दे'र कोय विवाद न्हं पनपाबो चावूं), उठी ही राजस्थानी जशी तागतवर भासा सूं सौतेलो बर्ताव भी कर्यो। म्हां ईं बात को निर्णय बगत के माथै छोड़ भी द्यां के आज़ादी का अतना बरस पाछै भी राजस्थानी नै संवैधानिक मानता न्हं मिलबा देबा का जिम्मेदार कुण छै, तो भी या टीस तो रह रह'र साळै ई छै के राजस्थानी अबार भी संविधान की आठवीं अनुसूची में आपणो मुकाम न्हं पा सकी।
लारला दनां राजस्थानी भासा नै संवैधानिक मानता न्ह मिल पाबा को दरद काळज्या में ऊँ बग़त फेर साळ्यो, जद लगै-टगै सोळह विधायकां विधायक पद की आन बेई राजस्थानी भासा में शपथ लेणी चाही, पण वे ईं लेखे आपणी इच्छा न्ह पूर सक्या। क्यूं के राजस्थानी नै संविधान की आठवीं अनुसूची में भैळै न्हं करयो गयो। कांई यो लोकतंत्र का मूळ भाव की आड़ी स्वारथ की राजनीति की चींगण्या कोय न्हं के राजस्थान प्रदेस की विधानसभा में एक विधायक चाह्वै तो कोंकणी अर नेपाली जशी भासान् में तो शपथ ल्ये सकै छै पण राजस्थानी में शपथ न्हं ल्ये सकै?
पण ईं चींगण्यां का महताऊ पख भी छै। या घटना वां लोगां के तांई बग़त को ऊथळो छै जे ये कह'र मानता की मांग की मुहिम की आड़ी सूं उदासीन हो ज्यावै छै के मानता मिलबा सूं भासा की साख में सुरखाब का पाँखड़ा न्ह लाग ज्यावैगा। या घटना आम आदमी के तांई भी स्यात् ईं बात को अहसास करा सकै के मायड़ भासा नै मानता न्हं मिलबो जूण नै कशी-कशी अबखायां सूं दो-च्यार करा सकै छै।
भारत सरकार को गजट भी मानै छै के देस में जे भासावां सैं सूं बेसी बापरी ज्यावै छै, राजस्थानी वां मं सूं एक छै। न्हं जाणै कितणी जगत पोसाळां में राजस्थानी पढ़ाई ज्यावै छै। पाकिस्तान सूं ले'र नेपाल अर रूस तांई राजस्थानी की भासाई रंगत का दरसाव होवै छै। जीं राजस्थानी की महताऊ पोथ्यां सूं राष्ट्रभासा हिन्दी की थरपना मानी ज्यावै छै अबार भी जीं राजस्थानी में मांडबा हाळां की एक पूरी पांत छै। जे ऊ ही राजस्थानी आपणी मानता सूं बरज दी ज्यावै तो ओछोपण भासा को न्हं, मानता देबा हाळां को साबित होवै छै।
एक मसलो हमेस राजस्थानी की मानता के आड़े फरै छै। नरा लोग क्है छै के राजस्थानी में एकरूपता कोय न्हं अर मानता देती बग़तां कश्या रूप नै मानता द्यां! यो सवाल जबर हो ज्यावै छै। यो सवाल खड़्यो करबा हाळा स्यात् भासान् का चरित्तर न्हं पहचाणै। संसार की सगळी सामरथवान भासान् का घणकरा रूप चलन में होवै छै। न्हं अंग्रेजी ईं को अपवाद छै। नाळी-नाळी बोलियां अर उपबोलियां तो भासा को प्राणतत्त्व होवै छै। कांईं बिहार में बापरबा हाळी हिन्दी अर मुंबई में बोली जाबा हाळी हिन्दी एक स्यारकी छै।
म्हूं मानूं छूं के एकरूपता की दीठ सूं महताऊ जतन बग़त की दरकार छै। पण ये एकरूपता पोथियां के पांण अर बुद्धिजीवियां के बेई ही हो सकै छै। लोक में जीवती रहबा हाळी भासावां अर बोलियां लोकचलन की गति-गैल सूं ही चालै छै। राजस्थानी की मानता के आड़े एकरूपता को मसलो रळकाबा हाळा अर 'कशी राजस्थानी' को सवाल खड़ो करबा हाळा भी ईं सांच ने प्हैचाणै छै। पण ज्यां को मकसद ई कुचमाद करबो होवै, वां ने गाल बजाबा सूं कुण बरज सकै छै?
न्हं तो आप बताओ, यो सवाल ऊं बगत खड़ो क्यूं न्हं होयो जीं बग़त केन्द्रीय साहित्य अकादेमी ने भारत की मोकळी भासान् के लारै राजस्थानी भासा पे भी सालीणो ईनाम देबो सरू कर्यो? पच्चीस बरस सूं राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी, बीकानेर में काम कर रही छै अर कशी राजस्थानी को सवाल न्हं उठ्यो। पाठ्यक्रमां में राजस्थानीपढ़ाई ज्यावै छै अर वां में सगळा राजस्थान का रचनाकारां की रचनावां छै तो फेर कशी राजस्थानी को सवाल कठी सूं उठ्यो? पच्चीस बरस की आपणी कवि-सम्मेलनी जातरा में म्हंनै पायो छै के राजस्थानी का नरा लाडेसर अर मानीता कवि राजस्थान में ही न्हं राजस्थान सूं बारे भी चाव सूं सुण्या अर गुण्या जावै छै। फेर 'कशी राजस्थानी' को सवाल फगत कुचमाद कोय न्हं तो कांई छै?
नाळा-नाळा रूपां में बापरबा जाबा हाळी राजस्थानी आपणां प्राणतत्त्व में एक छै। ईं बात को एक बड़ो प्रमाण तो यो ही छै के ईं बेर विधानसभा का प्हैला सत्र में विधायक पद की शपथ राजस्थानी में लेबा की मांग करबा हाळा जनप्रतिनिधि राजस्थान का सगळा अंचलां सूं जीत'र विधानसभा में पूग्या छै। राजस्थानी भासा की बोलियां अर उपबोलियां तो गंगा की अशी धारां की नांई छै, जे देस का नाळा-नाळा हिसान् सूं माटी की सौरम समेट गंगा में खमावै छै अर ऊं ईं पापधोवणी बणावै छै।
आज रो औखांणो
मां री गाळियां, घी री नाळियां।
मां की गालियां, घी की नालियां।
मां ललकारती-फटकारती है तो संतान के भले की खातिर। उसके मन में दूर-दूर तक कोई दुर्भावना नहीं रहती। मां की गालियां ममता का ही दूसरा रूप है।

अतुल कनक रो जलम १६ फरवरी १९६७ नै रामगंज मंडी (कोटा) में हुयो। राजस्थानी रा चावा-ठावा मंचीय कवि। तीन पोथ्यां छपी। राजस्थानी, हिन्दी अर अंग्रेजी मांय सात हजार सूं बेसी रचनावां पत्र-पत्रिकावां में छपी। आकाशवाणी अर दूरदर्शन सारू मोकळो लेखन। हाड़ौती राजस्थानी भासा री घणी प्यारी बोली। आपरी भासा में हाड़ौती बोली री सांगोपांग रळक आवै। आओ, आज आं रै इण लेख में आपणी भासा री हाड़ौती बोली रो स्वाद चाखां।
प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका।

मसखरी

Rao GumanSingh Guman singh


गांव में एक लुगाई बुहारी निकाळ रैयी थी। चौक में उण रो धणी बैठ्यो थो। बा बुहारी काडती-काडती उणरै कनै आई तो बोली, 'परै सी सरकियो।'
आदमी उठकै पौळी में आगो। लुगाई भी बुहारी काडती-काडती पौळी में आगी और धणी नै बोली, 'आगै नै सरकियो दिखां।'
आदमी बारलै चौक में आगो। थोड़ी ताळ पछै बठै भी आगै सरकणै की बात कैयी। बो उठकै घरां रै बारणै दरूजै पर आगो अर चबूतरै पर बैठगो। लुगाई बुहारती-बुहारती घरां कै बारै आई तो पति नै बोली, 'सरकियो दिखां।'
आदमी आखतो होय'र मुंबई चल्यो गयो। बठै सूं चिट्ठी लिखी- 'अब भी तेरै अड़ूं हूं कै और आगै सरकूं? आगै समंदर है, देख लिए।'

आज रो औखांणो
संपत हुवै तो घर, नींतर भलो परदेस।
प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका। 

तालरिया मगरिया रे मोरू बाई लारे रया

Rao GumanSingh Guman singh


तालरिया मगरिया रे मोरू बाई लारे रया

आयो रे धोरां वाळो देश बीरो बिण्जारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

बीरो बिण्जारो रे यो म्हाने लागे प्यारो रे

आयो रे धोरां वालो देश बीरो बिण्जारो रे

आयो रे धोरां वालो देश बीरो बिण्जारो रे


कुण थाने बोल्या रे मोरू बाई बोलणा

कुण तो दिनी झिणी गाळ बीरो बिण्जारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

आयो रे धोरां वाळो देश बीरो बिण्जारो रे

आयो रे धोरां वालो देश बीरो बिण्जारो रे


सासूजी बोल्या रे मोरू बाई ने बोलणा

नळदल तो दिनी झिणी गाळ बीरो बिण्जारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

आयो रे धोरा वाळो देश बीरो बिण्जारो रे

आयो रे धोरा वाळो देश बीरो बिण्जारो रे


एक बार आओजी जवाईजी पावणा

Rao GumanSingh Guman singh

एक बार आओजी जवाईजी पावणा
थाने सासूजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना
सासूजी ने मालुम होवे म्हारे भाई आज होयो
म्हारे घरे से मौक्ळो काम सासूजी मने माफ़ करो...
एक बार आओजी जवाईजी पावणा......
थाने सुसराजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना
सुसराजी ने मालूम होवे बाप म्हारो सेहर गयो
म्हारे घर से लारलो काम
सुसराजी मने माफ़ करो
एक बार आओजी जवाईजी पावणा......
थाने साळीजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना
साळीजी ने मालुम होवे साढुजी ने भेजू हूँ
म्हारा साढुजी नाचेला सारी रात
साळीजी मने माफ़ करो
एक बार आओजी जवाईजी पावणा......
थाने बुवाजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना
बुवाजी ने मालुम होवे म्हारे भी बुवाजी आया
बुवासासुजी ने जोडू लंबा हाथ बुवाजी मने माफ़ करो
एक बार आओजी जवाईजी पावणा......
थाने लाडीजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना
लाडीजी बुलावे तो लाडोजी भी आवे है
मैं तो जाऊंला सासरिये आज साथिङा मने माफ़ करो
एक बार आओजी जवाईजी पावणा...........
थाने सासूजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना....
थाने सुसराजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना...
थाने साळीजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना....
थाने बुवाजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना...
थाने लाडीजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना...

Rao gumansingh. Pushkar

Rao GumanSingh Guman singh


P A P U. Pushkar
Originally uploaded by Claude Renault
already posted a picture from Papu. She has been on the front page of so many magazines...
The Gypsies, Roma, the ethnic minority who brought to the West the spark of a vibrant culture, left the Indian subcontinent about a thousand years ago embarking on a migration that scattered them all over the world. The culture they left behind remained unscathed throughout the centuries,isolated within the barriers of their hostile habitat: the Thar Desert of Rajasthan

Canon EOS 3. Fuji velvia, canon EF 28/70mm f:2,8

This is taken during the 2001 Pushkar Mela, the famous camel fair. A lot of those Women have beautiful green eyes.

हरिया पोदीना

Rao GumanSingh Guman singh


ओ लुळ ओ झुक
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
ओ तने सिल पे बटांऊं हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
क्यारियां में बाऊं केवडो़ खेताँ में बाऊं हरियो पोदिनो
ओ लुळ ओ झुक
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
माथा पे ल्याई केवडो़ झोळी में ल्याई हरियो पोदिनो
ओ लुळ ओ झुक
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
सासूजी ने भावे केवडो़ सुसराजी ने भावे हरियो पोदिनो
ओ लुळ ओ झुक
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
जेठजी ने भावे केवडो़ जेठाणी ने भावे हरियो पोदिनो
ओ लुळ ओ झुक
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
देवेरजी ने भावे केवडो़ देवरानी ने भावे हरियो पोदिनो
ओ लुळ ओ झुक
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
ओ तने सिल पर बटांऊं हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना

बाजूबंद री लूम

Rao GumanSingh Guman singh


टूटे बाजूडा री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
टूटे बाजूबंद री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
कोई पंचरंगी लहेरिया रो पल्लो लहेराए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए
टूटे बाजूडा री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
टूटे बाजूबंद री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
कोई पंचरंगी लहेरिया रो पल्लो लहेराए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए
लागी प्यारी फुलवारी आतो झूम झूम जाए
ल्याई गोरी रो संदेशो घर आओ नी सजन
बैरी आंसुडा रो हार बिखर नही जाए
कोई चमकी री चुंदरी में सळ पड़ जाए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो री बयारिया
झालो सहयो नही जाए

मारवाड़ी देस का न परदेस का भाग-1

Rao GumanSingh Guman singh

उधार की जिन्दगी 
आज एक महत्वपूर्ण प्रश्न मारवाड़ी समाज के साथ जुड़ सा गया है। - क्या वह 
उधार की जिन्दगी जी रहा है, या किसी के एहशान के टूकड़ों पर पल रहा है? 
या फिर किसी हमदर्दी और दया का पात्र तो नहीं? मारवाड़ी समाज का प्रवासीय 
इतिहास के तीन सौ वर्षों के पन्ने अभी तक बिखरे पड़े हैं। न तो समाज के 
अतीत को इसकी चिंता थी, नही वर्तमान को इसकी फिक्र। घड़ी की टिक-टीक ने 
इस सन्नाटे में अचानक हलचल पैदा कर दी है। - विभिन्न प्रन्तों में हो रहे 
जातिवाद, आतंकवाद, साम्प्रदायिकता की आड़ में मारवाड़ी समाज के घ्रों को 
जलाना एवं लूट लेना । साथ ही, राजनैतिक दलों का मौन रहना, मुगलों के 
इतिहास को नए सिरे से दोहराते हुए स्थानीय आततायियों के रूप में 
मौकापरस्त लोग एसी हरकतों से कुछ सोचने पर मजबूर कर देते हैं। 
'जात- जडूला' या 'गठजोड़ 
यह प्रश्न आज के परिप्रेक्ष्य में हमारे मानस-पटल पर उभर कर सामने आता है 
कि अपने मूल स्थान से हमने जन्म-जन्मान्तर का नाता तोड़-सा लिये। पहले तो 
समाज के लोग साल में एक दफा ही सही 'देस'  जाया करते थे। अब तो बच्चों को 
पता ही नहीं कि उनके पूर्वज किस स्थान के थे। एक समय था जब 'जडूला' या 
'गठजोड़ की जात'  देस जाकर ही दिया जाता था, समाज में कई ऎसे उदाहरण हैं, 
जिसमें बाप-बेटा और पोता, तीनों का 'जडूला' और 'गठजोड़ की जात' एक साथ 
ही  'देस' जाकर दी । यहाँ यह कहना जरूरी नहीं कि हमारा अपने मूल स्थाना 
से कितना गहरा संबंध रहा  और कितना फासला है। इन दिनों 'जडूला' तो 
स्थानीय प्रचलन एवं मान्यताओं से जूड़ती जा रही है। जो जिस प्रदेश में या 
देश में है, वे उस प्रदेश या देश के अनुकुल अपनी-अपनी अलग प्रथा बनाते जा 
रहे हैं, आने वाली पीढ़ी का अपने मूल प्रदेश से कितना मानसिक लगाव रह 
जायेगा, इस पर संदेह है। वैसे भी एक स्थति और भी है, वर्तमान को ही देखें 
- 'मारवाड़ी कहने को तो अपने आपको रास्थानी मानते हैं,परन्तु राजस्थान के 
लोग इसे मान्यता नहीं देते। यदि कोई प्रवासी राजस्थानी वहाँ जाकर पढ़ना 
चाहे तो उसे राजस्थानी नहीं माना जाता। क्योंकि उसका मूल प्रान्त 
राजस्थान नहीं है। यह कैसी व्यवस्था ? असम , बंगा़ल, उडिसा जैसे अहिन्दी 
भाषी प्रान्त इनको प्रवासी मानते हैं, और राजस्थान इनको अपने प्रदेश का 
नहीं मानता। असम में असमिया मूल के छात्र को और राजस्थान में राजस्थान 
मूल के छात्रों को ही दाखिला मिलेगा तो यह कौम कहाँ जाय? 
 प्रान्तीय भाषा 
मुड़िया में मात्रा की कमी के चलते हिन्दी भाषा के साथ-साथ अन्य प्रन्तीय 
भाषाओं ने इस प्रवासी समाज के अन्दर अपना प्रमुख स्थान ग्रहन कर लिया । 
कई प्रवासी मारवाड़ी परिवार ऎसे हैं जिनको सिर्फ बंगला, असमिया, तमील, या 
उड़िया भाषा ही लिखाना, बोलना और पढ़ना आता है, कई परिवार में  तो 
राजस्थानी की बात तो बहुत दूर उनको हिन्दी  भी ठीक से बोलना-पढ़ना  नहीं 
आता, लिखने की कल्पना ही व्यर्थ है। 
पर्व-त्यौहार 
बिहार में 'छठ पूजा' की बहुअत बड़ी मान्यता है,ठीक वैसे ही बंगाल मैं 
'दुर्गा पूजा', 'काली पूजा', असम में 'बिहू उत्सव', महाराष्ट्र में 'गणेश- 
महोत्सव, उड़ीसा में 'जगन्नाथ जी की रथयात्रा', दक्षिण भारत में 'ओणम- 
पोंगल',  राजस्थान में होली-दिवाली, गुजरात में डांडीया-गरबा, पंजाब में 
'वैशाखी उत्सव' आदि पर्व व त्योहरों की विषेश मान्यता है, असके साथ ही 
हिन्दू धर्म के अनुसार कई त्योहार मनाये जाते हैं जिसमें राजस्थान में 
विषेशकर के राखी, गणगोर की विषेश मान्यता है, गणगोर तो राजस्थान व 
हरियाणावासियो का अनुठा त्योहार माना जाता है। जैसे-जैसे मारवड़ी समाज के 
लोग इन प्रान्तों में बसते गये, ये लोग अपने पर्व के साथ-साथ स्थानीय 
मान्यताओं के पर्व व त्योहारों को अपनाते चले गये। बिहार के मारवाड़ी तो 
छठ पूजा ठीक उसी तरह मानाने लगे, जैसे बिहार के स्थानीय समाज मानाते हैं 
यहाँ यह बताना जरूरी है कि जो मारवाड़ी परिवार कालान्तर बिहार से उठकर 
किसी अन्य प्रदेश में बस गये, वे आज भी छठ पूजा के समय ठीक वैसे ही बिहार 
जाते हैं जैसे बिहार के मूलवासी इस पर्व को मनाने जाते हैं। अब विवशता यह 
है कि राजस्थान के बिहार के मारवाड़ी को बिहारी, असम के मारवाड़ियों को 
असमिया, बंगाल व उड़ीसा के मारावाड़ियों को बिहारी, बंगाली, असमिया, या 
उड़िया समझते हैं, एवं स्थानीय भाषायी लोग मारवाड़ियों को राजस्थानी 
मानते हैं। विडम्बना यह है,कि मारवाड़ी कहने को तो रजस्थानी है, परन्तु 
राजस्थान के लोग इसे राजस्थानी नहीं मानते। 
लोगों का भ्रम: 
आम तौर पर लोगों को यह भ्रम है कि मारवाड़ी समाज एक धनी-सम्पन्न समाज है, 
परन्तु सच्चाई इस भ्रम से कोसों दूर है। यह कहना तो संभव नहीं कि 
मारवाड़ी समाज में कितने प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, हाँ ! धनी 
वर्ग का प्रतिशत इतर समाज के अनुपात में नहीं के बराबर माना जा सकता है। 
उद्योग-व्यवसाय तो  सभी समाज में कम-अधिक है। प्रवासी राजस्थानी,  जिसे 
हम देश के अन्य भागों में मारवाड़ी कह कर सम्बोधित  करते हैं या जानते 
हैं, अधिकतर छोटे-छोटे दुकानदार या फिर दलाली के व्यापार से जुड़े हुए 
हैं, समाज के सौ में अस्सी प्रतिशत परिवार तो  नौकरी-पेशा से जुड़े हुए 
हैं, शेष बचे बीस प्रतिशत का आधा भा़ग ही संपन्न माना जा सकता है, बचे दस 
प्रतिशत भी मध्यम श्रेणी के ही माने जायेगें। कितने परिवार को  तो दो जून 
का खाना भी ठीक से नसीब नहीं होता, बच्चे किसी तरह से संस्थाओं के सहयोग 
से पढ़-लिख पाते हैं। कोलकाता के बड़ाबाजार का आंकलन करने से पता चलता है 
कि किस तरह एक छोटे से कमरे में पूरा परिवार अपना गुजर-बसर कर रहा है। 
इस समाज की एक खासियत यह है कि यह कर्मजीव समाज है, मांग के खाने की जगह 
कमा कर खाना ज्याद पसंद करता है, समाज के बीच साफ-सुथरा रहना अपना 
कर्तव्य समझता है, और कमाई का एक हिस्सा दान-पूण्य में खर्च करना अपना 
धर्म। शायद इसलिए भी हो सकता है इस समाज को धनी समाज माना जाता हो,  या 
फिर विड़ला-बांगड़ की छाप इस समाज पर लग चुकी हो। ऎसा सोचना कि यह समाज 
धनी समाज है, किसी भी रूप में उचित नहीं है। आम समाज की तरह ही यह समाज 
भी है, जिसमें सभी तबके के लोग हैं , पान की दुकान, चाय की दुकान, नाई , 
जमादार, गुरूजी(शिक्षक), पण्डित जी (ब्राह्मण), मिसरानी ( ब्राह्मण की 
पत्नी), दरवान, ड्राईवर, महाराज ( खाना बनाने वाले), मुनीम (खाता-बही 
लिखने वाला) ये सभी मारवाड़ी समाज में होते हैं इनकी आय भारतीय मुद्रा के 
अनुसार आज भी दो - तीन हजार रूपये प्रतिमाह (कुछ कम-वेसी) के आस-पास ही 
आंकी जा सकती है। यह बात सही है कि समाज में सम्पन्न लोग के आडम्बर से 
गरीब वर्ग हमेशा से शिकार होता आया है, यह बात इस समाज पर भी लागू होती 
है। 
आडम्बर: 
मारवाड़ी समाज के एक वर्ग को संपन्न समाज माना जाता है, इनके कल-कारखाने, 
करोबार, उद्योग, या व्यवसाय में आय की कोई सीमा नहीं होती, ये लो़ग जहाँ 
एक तरफ समाज के सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर  हिस्सा लेते पाये जाते 
हैं वहीं दूसरी तरफ अपने बच्चों की शादी-विवाह, जन्मदिन का जश्न मनाने 
में, या सालगिरह के नाम पर आडम्बर को भी मात देने में लग जाते हैं, उस 
समय पता नही इतना धन कहाँ से एकाएक इनके पास आ जाता है, जिसे पानी की तरह 
बहाने में इनको आनन्द आता है, अब कोलकाता में तो बहार से आकर शादी करना 
एक फैशन सा बनते जा रहा है, बड़े-बड़े पण्डाल, लाखों के फूल-पत्ती, लाखों 
की सजावट, मंहगे-मंहगे निमंत्रण कार्ड, देखकर कोई भी आदमी दंग रह जायेगा। 
सबसे बड़ा हास्यास्पद तब लगता है, जब कोई समाज की सभाओं में इन आडम्बरों 
के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें तो करता है, जब खुद का समय आता है तो यही 
व्यक्ति सबसे ज्यादा अडम्बर करते पाया जाता है। एक-दो अपवादों को छोड़ 
दिया जाय तो अधिकांशतः लोग समाज के भीतर गन्दगी फैलाने में लगे हैं। इनका 
इतना पतन हो चुका है कि इनको किसी का भय भी नहीं लगता। समाज के कुछ दलाल 
किस्म के हिन्दी के पत्रकार भी इनका साथ देते नजर आते हैं। चुंकि उनका 
अखबार उनके पैसे से चलता है इसलिये भी ये लाचार रहतें हैं, दबी जुबान 
थोड़ा बोल देते हैं परन्तु खुलकर लिखने का साहस नहीं करते। इन पत्रकारों 
की मानसिकता इतनी गिर चुकी है कि, कोई भी इनको पैसे से खरिद सकता है, 
भाई ! पेट ही तो है, जो मानता नहीं। अखबार इनलोगों से चलता है, इनका घर 
इनकी दया पर चलता है, तो कलम का क्या दोष वह तो इनके दिमाग से नहीं इनके 
हाथ से चलती है। 
इन पत्रकारों के पास न तो कलम होती है, न ही हाथ य लुल्ले पत्रकार होते 
हें , इनके पास सिर्फ कगज छापने की एक लोहे की मशीन भर होती है, बस , 
भगवान ही इनका मालिक होता है, दिमाग भी इतना ही दिया कि ये बस मजे से खा 
सकते हैं। इनका समाज में किसी भी प्रकार का सामाजिक दायित्व नहीं के 
बराबर है। 
 क्रमशः आगे लेख जारी है। - शम्भु चौधरी दिनांक: 03.02.2008 

सेठिया साथै शंभु चौधरी री हथाईयां

Rao GumanSingh Guman singh

'धरती धौरां री... 
-शम्भु चौधरी- 
 कोलकात्ता 15.5.2008 : आज शाम पाँच बजे श्री कन्हैयालाल सेठिया जी के 
कोलकात्ता स्थित उनके निवास स्थल 6, आशुतोष मखर्जी रोड जाना था । ‘समाज 
विकास’ का अगला अंक श्री सेठिया जी पर देने का मन बना लिया था, सारी 
तैयारी चल रही थी,  मैं ठीक समय पर उनके निवास स्थल पहुँच गया। उनके 
पुत्र श्री जयप्रकाश सेठिया जी से मुलाकत हुई। थोड़ी देर उनसे बातचीत 
होने के पश्चात वे, मुझे श्री सेठिया जी के विश्रामकक्ष में ले गये । 
विस्तर पर लेटे श्री सेठिया जी का शरीर काफी कमजोर हो चुका है, उम्र के 
साथ-साथ शरीर थक सा गया है, परन्तु बात करने से लगा कि श्री सेठिया जी 
में कोई थकान नहीं । उनके जेष्ठ पुत्र भाई जयप्रकाश जी बीच में बोलते 
हैं, -  ‘‘ थे थक जाओसा....... कमती बोलो ! ’’  परन्तु श्री सेठिया जी 
कहाँ थकने वाले, कहीं कोई थकान उनको नहीं महसूस हो रही थी, बिल्कुल 
स्वस्थ दिख रहे थे । बहुत सी पुरानी बातें याद करने लगे। स्कूल-कॉलेज, 
आजादी की लड़ाई, अपनी पुस्तक ‘‘अग्निवीणा’’ पर किस प्रकार का देशद्रोह का 
मुकदमा चला । जयप्रकाश जी को बोले कि- वा किताब दिखा जो सरकार निलाम करी 
थी, मैंने तत्काल देवज्योति (फोटोग्रफर) से कहा कि उसकी फोटो ले लेवे । 
जयप्रकाश जी ने ‘‘अग्निवीणा’’  की वह मूल प्रति दिखाई जिस पर मुकदमा चला 
था । किताब के बहुत से हिस्से पर सरकारी दाग लगे हुऐ थे, जो इस बात का आज 
भी गवाह बन कर सामने खड़ा था । सेठिया जी सोते-सोते बताते हैं  - ‘‘ हाँ! 
या वाई किताब है जीं पे मुकदमो चालो थो....देश आजाद होने...रे बाद सरकार 
वो मुकदमो वापस ले लियो ।’’  थोड़ा रुक कर फिर बताने लगे कि आपने करांची 
में भी जन अन्दोलन में भाग लिया था । स्वतंत्रा संग्राम में आपने जिस 
सक्रियता के साथ भाग लिया, उसकी सारी बातें बताने लगे, कहने लगे ‘‘भारत 
छोड़ो आन्दोलन’’ के समय आपने करांची में स्व.जयरामदास दौलतराम व 
डॉ.चैइथराम गिडवानी जो कि सिंध में कांग्रेस बड़े नेताओं में जाने जाते 
थे, उनके साथ करांची के खलीकुज्जमा हाल में हुई जनसभा में भाग लिया था, 
उस दिन  सबने मिलकर स्व.जयरामदास दौलतराम व डॉ.चैइथराम गिडवानी के 
नेतृत्व में एक जुलूस निकाला था, जिसे वहाँ की गोरी सरकार ने कुचलने के 
लिये लाठियां बरसायी, घोड़े छोड़ दिये, हमलोगों को कोई चोट तो नहीं आयी, 
पर अंग्रेजी सरकार के व्यवहार से मन में गोरी सरकार के प्रति नफरत पैदा 
हो गई । आपका कवि हृदय काफी विचलित हो उठा, इससे पूर्व आप ‘‘अग्निवीणा’’ 
लिख चुके थे।  बात का क्रम टूट गया, कारण इसी बीच शहर के जाने-माने 
समाजसेवी श्री सरदारमल कांकरियाजी आ गये। उनके आने से मानो श्री सेठिया 
जी के चेहरे पे रौनक दमकने लगी हो । वे आपस में बातें करने लगे। कोई 
शिथिलता नहीं, कोई विश्राम नहीं, बस मन की बात करते थकते ही नहीं,  इस 
बीच जयप्रकाश जी से परिवार के बारे में बहुत सारी बातें जानने को मिली। 
श्री जयप्रकश जी, श्री सेठिया जी के बड़े पुत्र हैं, छोटे पुत्र का नाम 
श्री विनय प्रकाश सेठिया है और एक सुपुत्री  सम्पतदेवी दूगड़ है । महाकवि 
श्री सेठिया जी का विवाह लाडणू के चोरडि़या परिवार में श्रीमती धापूदेवी 
सेठिया के साथ सन् 1939 में हुआ । आपके परिवार में दादाश्री स्वनामधन्य 
स्व.रूपचन्द सेठिया का तेरापंथी ओसवाल समाज में उनका बहुत ही महत्वपूर्ण 
स्थान था। इनको श्रावक श्रेष्ठी के नाम से संबोधित किया जाता है। इनके 
सबसे छोटे सुपुत्र स्व.छगनमलजी सेठिया अपने स्व. पिताश्री की भांति 
अत्यन्त सरल-चरित्रनिष्ठ-धर्मानुरागी, दार्शनिक व्यक्तित्व के धनी थे । 
समाज सेवा में अग्रणी, आयुर्वेद का उनको विशेष ज्ञान था । 
श्री सेठिया जी का परिवार 100 वर्षों से ज्यादा समय से बंगाल में है । 
पहले इनका परिवार 199/1 हरीसन रोड में रहा करता था । सन् 1973 से 
सेठियाजी का परिवार  भवानीपुर में 6, आशुतोष मुखर्जी रोड, कोलकात्ता-20 
के प्रथम तल्ले में निवास कर रहा है। इनके पुत्र ( श्री सेठियाजी से 
पूछकर ) बताते हैं कि आप 11 वर्ष की आयु में सुजानगढ़ कस्बे से कलकत्ता 
में शिक्षा  ग्रहन हेतु आ गये थे। उन्होंने जैन स्वेताम्बर तेरापंथी 
स्कूल एवं माहेश्वरी विद्यालय में प्रारम्भिक शिक्षा ली, बाद में रिपन 
कॉलेज एवं विद्यासागर कॉलेज में शिक्षा ली । 1942 में द्वितीय विश्वयुद्ध 
के समय शिक्षा अधूरी छोड़कर पुनः राजस्थान चले गये, वहाँ से आप करांची 
चले गये । इस बीच हमलोग उनके साहित्य का अवलोकन करने में लग गये। सेठिया 
जी और सदारमल जी आपस में मन की बातें करने में मसगूल थे, मानो दो दोस्त 
कई वर्षों बाद मिले हों । दोनों अपने मन की बात एक दूसरे से आदान-प्रदान 
करने में इतने व्यस्त हो गये कि, हमने उनके इस स्नेह को कैमरे में कैद 
करना ही उचित समझा। जयप्रकाश जी ने तब तक उनकी बहुत सारी सामग्री मेरे 
सामने रख दी, मैंने उन्हें कहा कि ये सब सामग्री तो राजस्थान की अमानत 
है, हमें चाहिये कि श्री सेठिया जी का एक संग्राहलय बनाकर इसे सुरक्षित 
कर दिया जाए, बोलने लगे - ‘म्हाणे कांइ आपत्ती’  मेरा समाज के सभी वर्गों 
से, सरकार से निवेदन है कि श्री सेठियाजी की समस्त सामग्री का एक 
संग्राहल बना दिया जाना चाहिये, ताकि हमारी आनेवाली पीढ़ी उसे देख सके, 
कि कौन था वह शख्स जिसने करोड़ों दिलों की धड़कनों में अपना राज जमा लिया 
था। 
किसने ‘धरती धौरां री...’ एवं अमर लोक गीत  ‘पातल और पीथल’  की रचना की 
थी! 
कुछ देर बाद श्री सेठिया जी को बिस्तर से उठाकर बैठाया गया, तो उनका 
ध्यान मेरी तरफ मुखातिफ हुआ, मैंने उनको पुनः अपना परिचय बताने का प्रयास 
किया, कि शायद उनको याद आ जाय, याद दिलाने के लिये कहा - शम्भु! - 
मारवाड़ी देस का परदेस वालो - शम्भु....! बोलने लगे... ना... अब तने लोग 
मेरे नाम से जानगा- बोले... असम की पत्रिका म वो लेख तूं लिखो थो के?, 
मेरे बारे में...ओ वो शम्भु है....तूं.. अपना हाथ मेरे माथे पर रख के 
अपने पास बैठा लिये। बोलने लगे ... तेरो वो लेख बहुत चोखो थो। वो राजु 
खेमको तो पागल हो राखो है। मुझे ऐसा लग रहा था मानो सरस्वती बोल रही हो । 
शब्दों में वह स्नेह, इस पडाव पर भी इतनी बातें याद रखना, आश्चर्य सा 
लगता है। फिर अपनी बात बताने लगे- ‘आकाश गंगा’  तो सुबह 6 बजे लिखण 
लाग्यो... जो दिन का बारह बजे समाप्त कर दी। हम तो बस उनसे सुनते रहना 
चाहते थे, वाणी में सरस्वती का विराजना साक्षात् देखा जा सकता था। मुझे 
बार-बार एहसास हो रहा था कि यह एक मंदिर बन चुका है श्री सेठियाजी का घर 
। यह तो कोलकाता वासी समाज के लिये सुलभ सुयोग है, आपके साक्षात् दर्शन 
के, घर के ठीक सामने 100 गज की दूरी पर सामने वाले रास्ते में नेताजी 
सुभाष का वह घर है जिसमें नेताजी रहा करते थे, और ठीक दक्षिण में 300 गज 
की दूरी पर माँ काली का दरबार लगा हो,  ऐसे स्थल में श्री सेठिया जी का 
वास करना महज एक संयोग भले ही हो, परन्तु इसे एक ऐतिहासिक घटना ही कहा जा 
सकता है। हमलोग आपस में ये बातें कर रहे थे, परन्तु श्री सेठियाजी इन 
बातों से बिलकुल अनजान बोलते हैं कि उनकी एक कविता ‘राजस्थान’ (हिन्दी 
में) जो कोलकाता में लिखी थी, यह कविता सर्वप्रथम ‘ओसवाल नवयुवक’ कलकत्ता 
में छपी थी, मानो मन में कितना गर्व था कि उनकी कविता ‘ओसवाल नवयुवक’ 
में छपी थी। एक पल मैं सोचने लगा मैं क्या सच में उसी कन्हैयालाल सेठिया 
के बगल में बैठा हूँ जिस पर हमारे समाज को ही नहीं, राजस्थान को ही नहीं, 
सारे हिन्दुस्थान को गर्व है। 
मैंने सुना है, कि कवि का हृदय बहुत ही मार्मिक व सूक्ष्म होता है, कवि 
के भीतर प्रकाश से तेज जगमगता एक अलग संसार होता है, उसकी लेखनी ध्वनि से 
भी तेज रफ्तार से चलती है,  उसके विचारों में इतने पड़ाव होते हैं कि सहज 
ही कोई उसे नाप नहीं सकता, श्री सेठियाजी को देख ये सभी बातें स्वतः 
प्रमाणित हो जाती है। सच है जब बंगलावासी रवीन्द्र संगीत सुनकर झूम उठते 
हैं, तो राजस्थानी श्री कन्हैयालाल सेठिया के गीतों पर थिरक उठता है, 
मयूर की तरह अपने पंख फैला के नाचने लगता है। शायद ही कोई ऐसा राजस्थानी 
आपको मिल जाये कि जिसने श्री सेठिया जी की कविता को गाया या सुना न हो । 
इनके काव्यों में सबसे बड़ी खास बात यह है कि जहाँ एक तरफ राजस्थान की 
परंपरा, संस्कृति, एतिहासिक विरासत, सामाजिक चित्रण का अनुपम भंडार है, 
तो वीररस, श्रृंगाररस का अनूठा संगम भी जो असाधारण काव्यों में ही देखने 
को मिलता है। बल्कि नहीं के बराबर ही कहा जा सकता है। हमारे देश में 
दरबारी काव्यों की रचना की लम्बी सूची पाई जा सकती है, परन्तु,  बाबा 
नागार्जुन, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चैहान, निराला, हरिवंशराय 
बच्चन, भूपेन हजारिका जैसे गीतकार हमें कम ही देखने को मिलते हैं। श्री 
सेठिया जी के काव्यों में हमेशा नयापन देखने को मिलता है, जो बात अन्य 
किसी में भी नहीं पाई जाती, कहीं कोई बात तो जरूर है, जो उनके काव्यों 
में हमेशा नयापन बनाये रखने में सक्षम है। इनके गीतों में लय, मात्राओं 
का जितना पुट है, उतना ही इनके काव्यों में सिर्फ भावों का ही नहीं, 
आकांक्षाओं और कल्पनाओं की अभिनव अभिव्यक्ति के साथ-साथ समूची संस्कृति 
का प्रतिबिंब हमें देखने को मिलता है। लगता है कि राजस्थान का सिर गौरव 
से ऊँचा हो गया हो। इनके गीतों से हर राजस्थानी इठलाने लगता हैं। देश- 
विदेश के कई प्रसिद्ध संगीतकारों-गीतकारों ने, रवींद्र जैन से लेकर 
राजेन्द्र जैन तक, सभी ने इनके गीतों को अपने स्वरों में पिरोया है। 
‘समाज विकास’ का यह अंक यह प्रयास करेगा कि हम समाज की इस अमानत को 
सुरक्षित रख पाएं । श्री कन्हैयालाल सेठिया न सिर्फ राजस्थान की धरोहर 
हैं बल्कि राष्ट्र की भी धरोहर हैं। समाज विकास के माध्यम से हम राजस्थान 
सरकार से यह निवेदन करना चाहेगें कि श्री सेठियाजी को इनके जीवनकाल तक न 
सिर्फ राजकीय सम्मान मिले,  इनके समस्त प्रकाशित साहित्य, पाण्डुलिपियों 
व अन्य दस्तावेजों को सुरक्षित करने हेतु उचित प्रबन्ध भी करें। 
- शम्भु चौधरी 
http://samajvikas.blogspot.com/ 

बाबू माणिकलाल डांगी-पुण्यतिथि १३ नवंबर को

Rao GumanSingh Guman singh


बाबू माणिकलाल डांगी राजस्थानी नाटकों के लेखन एवं प्रदर्शन में स्व. भरत व्यास, जमुनादास पचेरिया, बाबू माणिकलाल डांगी, कन्हैयालाल पंवार और नवल माथुर अगुवा रहे। कलकत्ता के ‘मूनलाइट थियेटर’ में राजस्थानी के अनेक नाटक मंचित हुए जिनकी आलम में बड़ी धूम रही।स्वतंत्रता संग्राम के परिप्रेक्ष्य में बाबू माणिकलाल डांगी के ‘जागो बहुत सोये’ नाटक का गहरा रंग रहा जो कलकत्ता में 1936 में खेला गया था और उन्हीं के 1940 में मंचस्थ ‘हिटलर’ नाटक ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। ब्रिटिश शासन द्वारा उनके ‘दुर्गादास राठौड़’ एवं ‘जय हिन्द’ नाटक पर रोक लगा दी गई थी, किन्तु वे इससे निराश नहीं हुए और उन्होंने चित्रकला की टेम्परा टेक्नीक की तरह रंगमंच के चित्रफलक पर ‘राजस्थनी साहस एवं वीरता’ के बिम्ब पूरी तरह बिम्बित किए। बाद में 1946 में ‘जय हिन्द’ नाटक को स्व. रफी अहमद किदवई ने पढ़ा और खेलने की अनुमति प्रदान की।स्वतन्त्रता के बाद बाबू माणिकलाल डांगी कलकत्ता से जोधपुर लौटे और उन्होंने वहाँ ‘दुर्गादास राठौड़’, ‘हैदराबाद’, ‘कश्मीर’, ‘जय हिन्द’, ‘आपका सेवक’, ‘घर की लाज’, एवं ‘धरती के सपूत’ हिन्दी और ‘राज आपणो’, ‘करसाँ रो कालजो’, ‘मेजर शैतानसिंह’ तथा ‘एक पंथ दो काज’ राजस्थानी नाटकों के प्रदर्शन किए। देश लौटकर उन्होंने ‘माणिक थियेटर’ की स्थापना की। राजस्थान सरकार ने भी नाट्य विधा के महत्व को समझा और फिर सर्वत्र नाटक खेले जाते रहे।उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतेन्दु हरिशचन्द्र, जयशंकर प्रसाद, नारायण प्रसाद बेताब, राधेश्याम कथावाचक और आगा है जैसे नाटककारों ने नाटकों में प्राचीन गरिमा और गौरव को प्रदर्शित किया। उनके नाटकों के विषय थे राष्ट्रीय चेतना और नवजागरण।नाटक ‘दुर्गादास राठौड’ का सात रुपये का टिकट तब डेढ़ सौ रुपये में बिकता था। बाद में कुछ मुस्लिम नेताओं के आग्रह पर बंगाल सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया हालांकि बड़ी संख्या में मुसलमान भी यह नाटक देखने आते थे।राजस्थानी भाषा का प्रथम नाटक भरत व्यास लिखित ‘रामू चनणा’ था जो 1941 में अल्फ्रेड थिएटर (दीपक) कलकत्ता में खेला गया। बाद में कन्हैयालाल पंवार के राजस्थानी भाषा में लिखे नाटकों का दौर चला। ‘ढोला मरवण’ नाटक अनेक बार खेला गया जिसमें वे स्वयं ‘ढोला’ की भूमिका अभिनीत किया करते थे। इसी श्रंखला में ‘चून्दड़ी’, ‘कुंवारो सासरो’, ‘बीनणी जोरा मरदी आई’ जैसे नाटक भी खेले गए। बंगाली एवं पंजाबी कलाकारों से राजस्थानी भाषा का शुद्ध उच्चारण करवाने का श्रेय उन्हीं को प्राप्त था। राजस्थानी नाटकों के मंचन पंडित ‘इन्द्र’ भरत व्यास, जमुनादास पचैरिया, माणिकलाल डांगी और कन्हैयालाल पवार ने निरन्तर किए।कलकत्ता के 30, ताराचन्द दत्त स्ट्रीट के ‘मूनलाइट थिएटर’ में राजस्थानी नाटकों का एक अनूठा क्रम था तो बम्बई के ‘मारवाड़ी थिएटर’ में अपना रूप।स्वाधीनता प्राप्ति के बाद के परिवर्तित परिवेश में राजस्थान में ‘संगीत-नाटक अकादमी’ जोधपुर में स्थापित की गई, जयपुर में ‘रवीन्द्र मंच’ बना। जनसम्पर्क विभाग और बाद में सहकारी विभाग में सहकार मंच अस्तित्व में आया। नाट्य लेखन को निरन्तरता प्रदान किए जाने के उद्देश्य से नाटक प्रतियोगिताएँ रखी जाने लगीं। मण्डल, परिषद और कला निकेतन आदि नामों से अनेक संस्थाएँ बनीं। राजस्थान में एमेच्योर संस्थाओं का जाल-सा बिछ गया तो हिन्दी-राजस्थानी के नाटकों के दर्शक बने रहे। रंगमंच के रास्ते से चल कर भारतीय सिनेमा के मुकाम तक पहुँचने वाले पहले राजस्थानी लोक कलाकार थे। उन्होंने नाटकों के साथ ‘सखी लुटेरा’, ‘नकली डाॅक्टर’, ‘शकुन्तला’, ‘लैला मजनूं’, ‘शीरी फराहाद’ आदि हिन्दी फिल्मों में भी अभिनय किया।जोधपुर में वि.सं. 1958 माह सुदी एकम को जन्मे सालगराम डांगी के सुपुत्र बाबू माणिकलाल डांगी के पितामह लक्ष्मीणदासजी ने राजस्थान में सर्वप्रथम ‘मारवाड़ नाटक कम्पनी’ की स्थापना की थी। उनका नाटक ‘द्रौपदी स्वयंवर’ जब पहले दिन खेल गया, उसी दिन बाबू माणिकलाल का जन्म हुआ था। साधारण शिक्षा के बावजूद वे छोटी उम्र में ही अपने चाचा फूलचन्द डांगी के साथ बाहर निकल गए और उन्होंने अमृतसर-लूणमण्डी की रामलीला देखी, बड़े प्रभावित हुए।बाबू माणिकलाल डांगी के ‘जागो बहुत सोये’ नाटक को 1942 में अंग्रेजों ने अमृतसर में और ‘हिटलर’ नाटक को सर सिकन्दर हयात की मिनिस्ट्री ने लाहौर में बंद करवा दिया था, फिर भी उन्होंने हैदराबाद, सिंध, शिकारपुर, कोटा, लरना और करांची शहरों में बड़े हौसले के साथ नाटक खेले।स्वतंत्रता के बाद भी बाबूजी ने ‘दुर्गादास’ और ‘जागो बहुत सोये’ नाटक खेले, जिन्हें चोटी के नेताओं की सराहना मिली। उन्होंने 1945 में दिल्ली में लाल किले के सामने ‘भारत की पुकार’ एवं ‘जय हिन्द’ नाटक खेले थे और 1946 में भी उनके ‘जय हिन्द’ नाटक को ‘डान’ पत्र की शिकायत पर अंग्रेजी हुकूमत ने बंद करवा दिया था।कलकत्ता में उन्हें दिल का दौरा पड़ा। वे लघु भ्राता गणपतलाल डांगी के साथ जयपुर लौटे और 13 नवम्बर, 1964 को उनका स्वर्गवास हो गया।

धरती धोरां री !

Rao GumanSingh Guman singh


धरती धोरां री !

आ तो सुरगां नै सरमावै,
ईं पर देव रमण नै आवै,
ईं रो जस नर नारी गावै,
धरती धोरां री !
सूरज कण कण नै चमकावै,
चन्दो इमरत रस बरसावै,
तारा निछरावल कर ज्यावै,
धरती धोरां री !
काळा बादलिया घहरावै,
बिरखा घूघरिया घमकावै,
बिजली डरती ओला खावै,
धरती धोरां री !
लुळ लुळ बाजरियो लैरावै,
मक्की झालो दे’र बुलावै,
कुदरत दोन्यूं हाथ लुटावै,
धरती धोरां री !
पंछी मधरा मधरा बोलै,
मिसरी मीठै सुर स्यूं घोलै,
झीणूं बायरियो पंपोळै,
धरती धोरां री !
नारा नागौरी हिद ताता,
मदुआ ऊंट अणूंता खाथा !
ईं रै घोड़ां री के बातां ?
धरती धोरां री !
ईं रा फल फुलड़ा मन भावण,
ईं रै धीणो आंगण आंगण,
बाजै सगळां स्यूं बड़ भागण,
धरती धोरां री !
ईं रो चित्तौड़ो गढ़ लूंठो,
ओ तो रण वीरां रो खूंटो,
ईं रे जोधाणूं नौ कूंटो,
धरती धोरां री !
आबू आभै रै परवाणै,
लूणी गंगाजी ही जाणै,
ऊभो जयसलमेर सिंवाणै,
धरती धोरां री !
ईं रो बीकाणूं गरबीलो,
ईं रो अलवर जबर हठीलो,
ईं रो अजयमेर भड़कीलो,
धरती धोरां री !
जैपर नगर्यां में पटराणी,
कोटा बूंटी कद अणजाणी ?
चम्बल कैवै आं री का’णी,
धरती धोरां री !
कोनी नांव भरतपुर छोटो,
घूम्यो सुरजमल रो घोटो,
खाई मात फिरंगी मोटो
धरती धोरां री !
ईं स्यूं नहीं माळवो न्यारो,
मोबी हरियाणो है प्यारो,
मिलतो तीन्यां रो उणियारो,
धरती धोरां री !
ईडर पालनपुर है ईं रा,
सागी जामण जाया बीरा,
अै तो टुकड़ा मरू रै जी रा,
धरती धोरां री !
सोरठ बंध्यो सोरठां लारै,
भेळप सिंध आप हंकारै,
मूमल बिसर्यो हेत चितारै,
धरती धोरां री !
ईं पर तनड़ो मनड़ो वारां,
ईं पर जीवण प्राण उवारां,
ईं री धजा उडै गिगनारां,
धरती धोरां री !
ईं नै मोत्यां थाल बधावां,
ईं री धूल लिलाड़ लगावां,
ईं रो मोटो भाग सरावां,
धरती धोरां री !
ईं रै सत री आण निभावां,
ईं रै पत नै नही लजावां,
ईं नै माथो भेंट चढ़ावां,
भायड़ कोड़ां री,
धरती धोरां री !

पातल’र पीथल

Rao GumanSingh Guman singh


अरै घास री रोटी ही जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो।

नान्हो सो अमर्यो चीख पड्यो राणा रो सोयो दुख जाग्यो।
हूं लड्यो घणो हूं सह्यो घणो
मेवाड़ी मान बचावण नै,
हूं पाछ नहीं राखी रण में
बैर्यां री खात खिडावण में,
जद याद करूँ हळदी घाटी नैणां में रगत उतर आवै,
सुख दुख रो साथी चेतकड़ो सूती सी हूक जगा ज्यावै,
पण आज बिलखतो देखूं हूँ
जद राज कंवर नै रोटी नै,
तो क्षात्र-धरम नै भूलूं हूँ
भूलूं हिंदवाणी चोटी नै
मैं’लां में छप्पन भोग जका मनवार बिनां करता कोनी,
सोनै री थाल्यां नीलम रै बाजोट बिनां धरता कोनी,
ऐ हाय जका करता पगल्या
फूलां री कंवळी सेजां पर,
बै आज रुळै भूखा तिसिया
हिंदवाणै सूरज रा टाबर,
आ सोच हुई दो टूक तड़क राणा री भीम बजर छाती,
आंख्यां में आंसू भर बोल्या मैं लिख स्यूं अकबर नै पाती,
पण लिखूं कियां जद देखै है आडावळ ऊंचो हियो लियां,
चितौड़ खड्यो है मगरां में विकराळ भूत सी लियां छियां,
मैं झुकूं कियां ? है आण मनैं
कुळ रा केसरिया बानां री,
मैं बुझूं कियां ? हूं सेस लपट
आजादी रै परवानां री,
पण फेर अमर री सुण बुसक्यां राणा रो हिवड़ो भर आयो,
मैं मानूं हूँ दिल्लीस तनैं समराट् सनेषो कैवायो।
राणा रो कागद बांच हुयो अकबर रो’ सपनूं सो सांचो,
पण नैण कर्यो बिसवास नहीं जद बांच नै फिर बांच्यो,
कै आज हिंमाळो पिघळ बह्यो
कै आज हुयो सूरज सीतळ,
कै आज सेस रो सिर डोल्यो
आ सोच हुयो समराट् विकळ,
बस दूत इसारो पा भाज्यो पीथळ नै तुरत बुलावण नै,
किरणां रो पीथळ आ पूग्यो ओ सांचो भरम मिटावण नै,
बीं वीर बांकुड़ै पीथळ नै
रजपूती गौरव भारी हो,
बो क्षात्र धरम रो नेमी हो
राणा रो प्रेम पुजारी हो,
बैर्यां रै मन रो कांटो हो बीकाणूँ पूत खरारो हो,
राठौड़ रणां में रातो हो बस सागी तेज दुधारो हो,
आ बात पातस्या जाणै हो
धावां पर लूण लगावण नै,
पीथळ नै तुरत बुलायो हो
राणा री हार बंचावण नै,
म्है बाँध लियो है पीथळ सुण पिंजरै में जंगळी शेर पकड़,
ओ देख हाथ रो कागद है तूं देखां फिरसी कियां अकड़ ?
मर डूब चळू भर पाणी में
बस झूठा गाल बजावै हो,
पण टूट गयो बीं राणा रो
तूं भाट बण्यो बिड़दावै हो,
मैं आज पातस्या धरती रो मेवाड़ी पाग पगां में है,
अब बता मनै किण रजवट रै रजपती खून रगां में है ?
जंद पीथळ कागद ले देखी
राणा री सागी सैनाणी,
नीचै स्यूं धरती खसक गई
आंख्यां में आयो भर पाणी,
पण फेर कही ततकाळ संभळ आ बात सफा ही झूठी है,
राणा री पाघ सदा ऊँची राणा री आण अटूटी है।
ल्यो हुकम हुवै तो लिख पूछूं
राणा नै कागद रै खातर,
लै पूछ भलांई पीथळ तूं
आ बात सही बोल्यो अकबर,
म्हे आज सुणी है नाहरियो
स्याळां रै सागै सोवै लो,
म्हे आज सुणी है सूरजड़ो
बादळ री ओटां खोवैलो;
म्हे आज सुणी है चातगड़ो
धरती रो पाणी पीवै लो,
म्हे आज सुणी है हाथीड़ो
कूकर री जूणां जीवै लो
म्हे आज सुणी है थकां खसम
अब रांड हुवैली रजपूती,
म्हे आज सुणी है म्यानां में
तरवार रवैली अब सूती,
तो म्हांरो हिवड़ो कांपै है मूंछ्यां री मोड़ मरोड़ गई,
पीथळ नै राणा लिख भेज्यो आ बात कठै तक गिणां सही ?
पीथळ रा आखर पढ़तां ही
राणा री आँख्यां लाल हुई,
धिक्कार मनै हूँ कायर हूँ
नाहर री एक दकाल हुई,
हूँ भूख मरूं हूँ प्यास मरूं
मेवाड़ धरा आजाद रवै
हूँ घोर उजाड़ां में भटकूं
पण मन में मां री याद रवै,
हूँ रजपूतण रो जायो हूं रजपूती करज चुकाऊंला,
ओ सीस पड़ै पण पाघ नही दिल्ली रो मान झुकाऊंला,
पीथळ के खिमता बादल री
जो रोकै सूर उगाळी नै,
सिंघां री हाथळ सह लेवै
बा कूख मिली कद स्याळी नै?
धरती रो पाणी पिवै इसी
चातग री चूंच बणी कोनी,
कूकर री जूणां जिवै इसी
हाथी री बात सुणी कोनी,
आं हाथां में तलवार थकां
कुण रांड़ कवै है रजपूती ?
म्यानां रै बदळै बैर्यां री
छात्याँ में रैवैली सूती,
मेवाड़ धधकतो अंगारो आंध्यां में चमचम चमकै लो,
कड़खै री उठती तानां पर पग पग पर खांडो खड़कैलो,
राखो थे मूंछ्याँ ऐंठ्योड़ी
लोही री नदी बहा द्यूंला,
हूँ अथक लडूंला अकबर स्यूँ
उजड्यो मेवाड़ बसा द्यूंला,
जद राणा रो संदेष गयो पीथळ री छाती दूणी ही,
हिंदवाणों सूरज चमकै हो अकबर री दुनियां सूनी ही।


मींझर से


मानसरोवर सूं उड़ हंसौ, मरुथळ मांही आयौ

Rao GumanSingh Guman singh

मानसरोवर सूं उड़ हंसौ, मरुथळ मांही आयौ
धोरां री धरती नै पंछी, देख-देख चकरायौ

धूळ उड़ै अर लूंवा बाजै, आ धरती अणजाणी
वन-विरछां री बात न पूछौ, ना पिवण नै पाणी

दूर नीम री डाळी माथै, मोर निजर में आयौ,
हंसौ उड़कर गयौ मोर नै, मन रौ भेद बतायौ

अरे बावळा, अठै पड़्यौ क्यूं, बिरथा जलम गमावै
मानसरोवर चाल’र भाया, क्यूं ना सुख सरसावै

मोती-वरणौ निरमळ पाणी, अर विरछां री छाया
रोम-रोम नै तिरपत करसी, वनदेवी री माया

साची थारी बात सुरंगी, सुण सरसावै काया
जलम-भोम सगळा नै सुगणी, प्यारी लागै भाया

मरुधर रौ रस ना जाणै थूं, मानसरोवर वासी
ऊंडै पाणी रौ गुण न्यारौ, भोळा वचन-विलासी

दूजी डाळी बैठ्यौ विखधर, निजर हंस रै आयौ
सांप-सांप करतौ उड़ चाल्यौ, अंबर में घबरायौ

मोर उतावळ करी सांप पर, करड़ी चूंच चलाई
विखधर री सगळी काया नै, टुकड़ा कर गटकाई

अब हंस नै ठाह पड़ी आ, मोरां सूं मतवाळी
मानसरोवर सूं हद ऊंची, धरती धोरां वाळी

लेता जैजो जी दिल्डो देता जैजो

Rao GumanSingh Guman singh


लेता जैजो जी दिल्डो देता जैजो

म्हारी लाल ननद बाई रा बीरा रे रूमाल म्हारो लेता जैजो

छोटी ननद बाई रा बीरा रे रूमाल म्हारो लेता जैजो

लेता जैजो जी दिल्डो देता जैजो

छोटी ननद बाई रा बीरा रे रूमाल म्हारो लेता जैजो

म्हारी लाल ननद बाई रा बीरा रे रूमाल म्हारो लेता जैजो


आप रे कारण म्हे तो बाग़ लगायो सा

घुमण रे मिस आजो नैना रा लोभी

हरियो रुमाल म्हारो लेता जैजो जी दिल्डो देता जैजो

छोटी ननद बाई रा बीरा रे रूमाल म्हारो लेता जैजो


आप रे कारण म्हे तो थाळ परोस्यो सा

आप रे कारण म्हे तो भोजन परोस्यो सा

जीमण रे मिस आजो नैना रा लोभी

हरियो रुमाल म्हारो लेता जैजो जी दिल्डो देता जैजो

लाल ननद भाई रा बीरा रे रुमाल म्हारो लेता जैजो


आप रे कारण म्हे तो होद भरायो सा

नहावण रे मिस आजो नैना रा लोभि

हरियो रुमाल म्हारो लेता जैजो जी दिल्डो देता जैजो

छोटी ननद बाई रा बीरा रे रूमाल म्हारो लेता जैजो

लेता जैजो जी दिल्डो देता जैजो

छोटी ननद बाई रा बीरा रे रूमाल म्हारो लेता जैजो

म्हारी लाल ननद बाई रा बीरा रे रूमाल म्हारो लेता जैजो