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राजस्थानी काव्य में राष्ट्रवादी अग्नि-शिखा के ऋत्विक : शंकरदान सामौर

Rao GumanSingh Guman singh


भारतीय इतिहास में राजस्थान ने अपनी विशिष्ट पहिचान कुछ वरेण्य जीवन मूल्यों में लिए सतत बलिदानों की सुदीर्घ परम्परा से बनायी है। स्वातंत्र्य प्रेम को इन मूल्यों का सुमेरु कहा जा सकता है। इस तथ्य की काव्यात्मक अभिव्यक्ति मरुभूमि में इन्द्र की कृपणता का खुलासा स्वातंत्र्य चेतना व उसकी रक्षार्थ उत्सर्ग की तत्परता के संदर्भ में शंकरदान द्वारा इस भाँति हुई है-
पंणी रौ कांई पिये, (आ) रगत पियौड़ी रज्ज।
संके कन में आ समझ, घण नह बरसै गज्ज।।

स्वातंत्र्य रक्षण के प्रयत्नों की महत्ता राजस्थानी मानस में इस भाँति रची बसी है कि-
सुत मरियौ हित देश रै, हरख्यौ बंधु समाज।
मा नह हरखी जनम दे, जितरी हरखी आज।।

उन्नींसवीं सदी में राजस्थान में इस स्वातंत्र्य चेतना का तूर्यनाद करने वाले चूरू जिले के बोबासर गाँव में २२ नवम्बर १८२४ को जन्में कवि शंकरदान सामौर का व्यक्ति और जीवन इस प्रदेश की बलिदानी परम्परा का गौरव मंडित अध्याय है। सामौर क्रांतिचेता कवि होने के साथ-साथ जनसाधारण के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर चुके थे। अपनी गहरी सूझ-बूझ से उन्होंने विदेशी शासन की वास्तविक प्रकृति व उसके विनाशकारी प्रभाव को भली-भाँति समझ लिया था। साथ ही तत्कालीन सामंती व्यवस्था की विद्रूपता व उसके जनविरोधी स्वरूप की भी उन्हें ठीक-ठीक पहचान थी। समकालीन हालात से उनसे भीतर जो विक्षोभ खदबदा रहा था, १८५७ के विप्लव ने उस लावे को बहिर्मुख कर दिया। वे स्वतंत्रता यज्ञ में समिधा डालने हेतु तत्पर हो गये और अपनी काव्य प्रतिभा का प्रभावी उपयोग इस महत् ध्येय की सिद्धि के लिये किया।
अन्याय व अनाचार का विरोध उनकी दूसरी प्रकृति थी। उस समय शासक वर्ग की मनमानी और कदाचार के विरूद्ध चारणों द्वारा दिए जाने वाले धरानों में उनकी सदैव अग्रणी भूमिका रही और इस भावना का चरमोत्कर्ष १९५७ के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका से परिलक्षित होता है। शंकरदान के काव्य में युगीन चेतना के स्वर सशक्त रूप से उभरे। उनका काव्य मनो विनोद या निसत्व राजाओं के प्रशस्तिगान द्वारा लाख पसाव प्राप्त करने का साधन नहीं अपितु राष्ट्र के सुप्त पौरुष व निष्पंद गौरव भाव को जगाने, लोगों में ऐक्य भाव का संचार करने, कर्तव्य विमुख हो चुके सत्ताधीशों को शब्दों के प्रतोद से प्रताड़ित करने एवं विदेशी शासन के बहुविध शोषण से हतश्री हो चुके देश के जनसाधारण को उठ खड़े होने का आव्हान था। उनके काव्य में राष्ट्रीयता की तेजस्विता व स्निग्धता दोनों विद्यमान थीं। समकालीन परिस्थिति से अवसन्न इस कवि की दृष्टि से जनसाधारण के दु:ख-दर्द कभी ओझल नहीं हुए। यही कारण है कि उनके काव्य में सर्वत्र प्रखर देशभक्ति व मातृभूमि के उद्धार के लिए बलिदान की महत्ती आवश्यकता मुखरित हुई है।
१८५७ के विप्लव को पराधीनता के पाश से मुक्ति पाने का महान्ब अवसर मानने वाले सामौर ने अपने पूर्ववर्ती कविराजा बांकीदास की भाँति राष्ट्रवासियों को जगाने का स्तुत्य कार्य किया। वे इस विप्लव की घटनाओं के न केवल साक्षी थे वरन् इसमें उन्होंने सक्रिय भूमिका भी निभायी। अंग्रेज व उनके आश्रित राजाओं-सामन्तों की जन विरोधी घातक नीतियों व क्रिया कलापों ने उन्हें आहत कर दिया था, जिसकी अभिव्यक्ति उनके सम्पूर्ण सृजन में हुई है। तत्कालीन राजस्थान के हालात के संदर्भ में क्रांति का शंखनाद करने वाले इस जनकवि की व्यथा को भली-भाँति समझा जा सकता है।

ब्रिटिश सत्ता के विस्तार की परिणति-
ब्रिटिश प्रभुत्व की स्थापना से राजस्थान में अराजकता व राजनीतिक अस्थिरता के अंधयुग की तो समाप्ति हुई किन्तु जनसाधारण के लिए उस अन्तहीन दु:खरजनी का प्रारम्भ हुआ जिसमें, अन्याय, शोषण व उत्पीड़न के अंधकार में जीवन एक दु:सह अभिशाप बन कर रह गया। ब्रिटिश प्रभुओं से प्राप्त अभयदान ने राजाओं को अपनी प्रजा पर कहर ढ़ाने की खुली छूट दे दी। इस युग में राजस्थान में सामन्ती व्यवस्था प्रजापीड़न, क्रूरता व मानवीय अध:पतन की पराकाष्ठा की प्रतीक बनकर रह गयी। एक जंगल राज की शुरुआत हो गई जिसमें रैयत राजाओं व उनके जागीरदारों का भक्ष्य बन गयी। गोरे प्रभुओं की चाटुकारिता मंे तल्लीन राजा व जागीरदार प्रजा की गर्दन पर सिंदवाद की कथाओं के बूढ़े की तरह सवार हो गए। जिन मेहनतकश लोगों के परिश्रम पर उनकी विलासिता का तांडव चल रहा था, वे तिहरी गुलामी के बोझ के नीचे दबकर सर्वथा असहाय हो गए। सामंती तत्त्वों के गर्हित आचरण के फलस्वरूप जागीरदारी प्रथा जुल्म का पर्याय बन गयी। रियासती प्रजा रूपी नींबू को इतनी निर्दयता से निचोड़ा गया कि उसके रेशे तक बाहर निकल आये। ये शोषक सामन्त इतने विवेकहीन हो चुके थे कि रैयत द्वारा की गई फरियाद को भी उन्होंने अपनी सत्ता के लिए चुनौती समझ कर निर्मम दमन का सहारा लिया। सामौर ने तत्कालीन परिस्थिति पर समग्रता से विचार किया। फलत: यह बात उनके सम्मुख दिन के उजाले की भाँति स्पष्ट हो गई कि 'मीठे ठग` अंग्रेजों की बनिया मनोवृति ही इसके लिए उत्तरदायी है। श्री अरविन्द के शब्दों में ''बनिया जब शासक बन जाता है तो सबसे बुरा शासक सिद्ध होता है।`` उदीयमान ब्रिटिश पूंजीवाद के हितों के संवर्धन के लिए स्वावलंबी भारतीय अर्थ व्यवस्था को तो अंग्रेजों ने चौपट किया ही और साथ ही राजनीतिक प्रभुत्व के विस्तार के लिए हर प्रकार के छल-छद्म का भी सहारा लिया। इन तथ्यों व उनके निहितार्थ का चित्रण सामौर ने अपने एक गीत में इस प्रकार किया है-
बिणज रौ नांव ले आया बण बापड़ा, तापड़ा तोड़िया राज तांईं
मोकौ पा मुगळां रौ माण जिण मारियौ, पोखो थां कुणकयां समझ कांईं
धोळ दिन देखतां नबाबी धपाई, संताई बेगमां अवधसाई
खोड़लां फौज हिंदवांण री खपाई, सफाई नांखौ मत सरम साई
धरा हिंदवांण री दाबर्या धकै सूं, प्रगट में लड़यां ई पार पड़सी
संकट में अेक हुय भेद मेटो सकळ, लोक जद जोस हूं जबर लड़सी

अंग्रेजों के अत्याचारों को उन्होंने सूक्ष्म दृष्टि से देखा था। अपनी वणिक वृत्ति से उन्होंने पूर्ववर्ती सभी आक्रान्ताओं को पीछे छोड़ दिया था। इस बात को रेखांकित करते हुए सामौर ने कहा कि अंगे्रज तो चंगेज खां से भी दो कदम आगे थे, क्योंकि-
महलज लूटण मोकळा, चढया सुण्या चंगेज।
लूटण झूंपा लालची, आया बस इंगरेज।।
सामौर अपनी निर्भयता व स्पष्टवादिता की दृष्टि से अद्वितीय हैं। अत: अंगे्रजों के विरूद्ध अपने आक्रोश के प्रकटीकरण व आत्म सम्मान को धता बताकर क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए उनकी चाटुकारिता करने वाले राष्ट्र द्रोही राजाओं व सामन्तों की भर्त्सना करते समय उनकी लेखनी ने आग्नेय रूप धारण कर लिया। राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने वाले सामौर के लिए कहा गया यह दोहा उनके जीवन का सार प्रस्तुत कर देता है-
शंकरियै सामौर रा गोळी जिसड़ा गीत।
मिंत ज साचा मुलक रा, विपुवां उलटी रीत।।

१८५७ का स्वतंंत्रता संग्राम और सामौर
विदेशी शासन के अभिशाप से देश को मुक्त कराने हेतु प्राणापण से सचेष्ट सामौर का तेजस्वी रूप १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी पूर्णता से प्रकट हुआ। वे सर्वतोभावेन इस महद् प्रयास की सफलता के लिए जुट गए। वे इस संग्राम की महत्ता को भली भाँति समझते थे। इस अवसर का लाभ उठाने के लिए उन्होंने देशवासियों को उद्बोधन देते हुए स्पष्ट किया कि इस दुर्लभ अवसर को खो देने पर हिन्द की खोयी आजादी को प्राप्त करने का ऐसा मौका फिर नहीं आएगा, जैसे छलांग भरते समय एक बार चूक जाने पर हिरण फिर संभल नहीं पाता। यह छप्पय द्रष्टव्य है-
आयौ औसर आज, प्रजा पख पूरण पाळण
आयौ औसर आज, गरब गौरां रौ गाळण
आयौ औसर आज, रीत राखण हिंदवाणी
आयौ औसर आज, विकट रण खाग बजाणी
फाळ हिरण चूक्यां फटक, पाछौ फाळ न पावसी
आजाद हिन्द करवा अवर, औसर इस्यौ न आवसी

सामौर १८५७ के विप्लव के निहितार्थों को भली भाँति समझते थे। उनकी अन्तस्थ देश भक्ति इस समय प्रबल आलोड़न की अवस्था में थी। उनके दृष्टिपथ में समस्त भारत था। अत: इस संग्राम के साथ जुड़े सभी क्षेत्रों के छोटे-बड़े सभी योद्धाओं का उन्होंने स्तवन किया। तांत्या टोपे के तो वे प्रत्यक्ष संपर्क में आए थे और गाढ़े समय में टोपे की उन्होंने जो मदद की, वह इस प्रदेश के स्वाधीनता संघर्ष का स्वर्णिम अध्याय है। तात्या जैसे दुर्धर्ष योद्धा के अथक प्रयासों से वे अभिभूत थे। उनके अदम्य साहस व प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अविचल भाव से डटे रहने जैसे गुणों की सराहना में सामौर द्वारा रचित इस गीत से इस निजंधरी नायक के प्रति उनके अहोभाव की ऊर्मिया तरंगित होती हैं।
जठै गयौ जंग जीतियौ, खटके बिन रणखेत।
तकड़ौ जड़ियौ तांतियौ, हिंदथान रै हेत।।
मचायौ हिंद में आखी तहलको तांतियै मोटो
घोटो जेम घुमायौ लंक में हणूं घोर
रचायौ रूळंती राजपूती रौ आखरी रंग
जंग में दिखायौ सुवायौ अथाग जोर
हुय हतास राजपूती छंडियौ छत्रियां हाथ
साथ चंगौ सोधियौ दिक्खणी महासूर
बिड़द धार छतीसां वंस रौ रंण बांको बीर
नीर धारी हिन्द रौ बंचायौ सागी नूर
पळकती आकास बीज कठै ई जांवती पड़ै
छड़ै तांतियै री व्हैगी इसी ही छलांग
खळकती नंद्ंया रा खाळ मांय हूतो पाड़ खड़ै
लड़ै इणा विधी लाखां हूतं एकलांग

गीत में ''रचायौ रूळंती राजपूती रौ आखरी रंग`` और ''पळकती आकाश बीज कठै ई जांवती पड़ै`` जैसी पंक्तियाँ अप्रतिम योद्धा तात्या के सम्बन्ध में कवि के गहन अध्ययन को दर्शाती हैं। अरिदल पर उनके आक्रमण जिस तीव्रता व आकस्मिकता से होते थे, उस तथ्य का रूपक द्वारा वर्णन सुहृद्य बन पड़ा है।
१८५७ के विप्लव के आखिरी दौर में चारों ओर से निराश होने के पश्चात् तात्या टोपे मदद की आशा से शेखावाटी इलाके में आए। इस समय सामौर ने उनकी यथासंभव भरपूर मदद की। मदद के भरोसे तात्या लक्ष्मणगढ़ के किले के किले में घिर गए। वहाँ से किसी तरह निकलने के बाद कहीं पर भी सहायता न मिलती देखकर सामौर उन्हें अपने पैतृक गाँव बोबासर अपने भाई पृथ्वीसिंह सामौर के गढ़ में ले आए। इस पर क्रुद्ध हो अंगे्रेजों ने गढ़ को बारूद से उड़ा दिया। इस प्रकार सामौर ने केवल शब्दों द्वारा ही नहीं वरन् अपने कर्तव्य द्वारा भी क्रांतिधर्मा होने का प्रमाण दिया। उनके अंग्रेज विरोधी रुख की भारी कीमत बड़े भाई पृथ्वीसिंह ने चुकायी। इस बारे में स्वयं शंकरदान ने कहा-
गढ़वी पिरथीसिंह गुणी, गोरां मेट गरूर।
मरद तांतिये री मदत, की उण बेळ करूर।।

तांत्या की मदद करते हुए तो सामौर परिवार को अपना सब कुछ गंवाना पड़ा पर इस स्वातंत्र्य यज्ञ में अपनी आहुति देने वाले अन्य सेनानी भी सामौर की दृष्टि से ओझल नहीं हुए। झाँसी की रानी, अवध के सैनिकों व आऊवा ठाकुर कुशालसिंह के बलिदानों का स्तवन करने में भी वे अग्रणी रहे। लक्ष्मी बाई के अप्रतिम शौर्य व बलिदान को उन्होंने इस भाँति याद किया-
हुयौ जांण बेहाल, भाल हिन्द री भोम रौ।
झगड़ौ निज भुज झाल, लिछमी झांसी री लड़ी।।

इस तरह अवध राज्य के सैनिकों की सूरमाई व अंग्रेज विरोधी हलचल का बखान करते हुए लिखा-
फिरंगां तणी फजीत, करवा नै कस कस कमर।
जण जण बण जंगजीत, लड़या अवध रा लाडला।

इस विप्लव में राजस्थान में ब्रिटिश सत्ता को सबसे गम्भीर चुनौती देने वाले आऊवा की घटनाएँ इस प्रदेश के स्वाधीनता संग्राम का सर्वाधिक रोमांचक अध्याय है। ब्रिटिश सत्ता को सर्वाधिक ध्यान आऊवा पर ही देना पड़ा उनके विरुद्ध किये गये तनी अभियना एवं तदुपरान्त भीषण प्रतिशोध की भावना से किया गया आऊवा का सर्वनाश इस बात को स्पष्ट करते हैं कि अंग्रेजों की दृष्टि में आऊवा की हल-चल कितनी खतरनाक थी। इस समय आऊवा द्वारा किये गये बलिदान को गौरवभाव से चित्रित करते हुए सामौर ने लिखा-
हुआ दुखी ंहिंदवाण रा, रुकी न गोरां राह।
विकट लड़यौ सहियो बिखौ, वाह आऊवा वाह।।

आऊवा ठाकुर खुशालसिंह को इस अभियान का नेतृत्व संभालने के फलस्वरूप भीषण आपदाओं से गुजरना पड़ा उनके बारे में सामौर कहते हैं- खेल्यौ रण में खाग हूं, जचकर जूझ्यौ जंग। दियौ सरब हित देश रै, रंग खुशाला रंग।
आऊवा की अगुआई में हुए संघर्ष में मारवाड़, बीकानेर, मेवाड़ एवं शेखवाटी के कई ठिकानों ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। आऊवा से निपटने के बाद अंग्रेजों ने इस सभी ठिकानों को ठिकाने लगाने पर ध्यान दिया।
१८५७ के विप्लव का सबसे दु:खद पहलू यह रहा कि राजस्थान के सभी रजवाड़े इस मुक्ति संग्राम से न केवल विलग रहे अपितु उसे कुचलने में भी अंग्रेजों का भरपूर सहयोग दिया। राष्ट्रभक्त शंकरदान को राजाओं के इस निंदनीय कृत्य से मरणान्तक व्यथा हुई।
गुलामी को खाद-पानी देने वाले इन राजाओं के प्रति सामौर के क्रोध का कोई पारावार नहीं था। अपनी रियासत बीकानेर के शासक सरदारसिंह भी इस दुष्कर्म के भागी थे। कवि ने इन सभी देशद्रोहियों की जमकर खबर ली। स्वातंत्र्य योद्धाओं का स्तवन करने वाली उनकी लेखनी ने अंग्रेज समर्थकों की भर्त्सना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बीकानेर रियासत के गोपाळपुरा, कणवारी तथा शेखावाटी के नवलगढ़, खेतड़ी, खण्डेला आदि ठिकाने भी उनके कोपभाजन बने क्योंकि इन ठिकानेदारों ने तात्या की मदद करने से उनके आग्रह को ठुकरा दिया था। अत्यन्त तीक्ष्ण शब्दशरों से उन्हें अंग्रेज भक्तों को बींध डाला। सरदारसिंह को धिक्कारते हुए कहा-
देख मरै हित देश रै, पेख सचौ रजपूत।
सरदारा तोनै सदा, कहसी जगत कपूत।।
खास बांधवां खीज, सैण गोरिया गिण सचा।
थूं बा`वै अेहड़ा बीज, फोग फोग फळ भोगसी।।

बीकानेर दरबार को मूर्ख मण्डली की संज्ञा देते हुए कवि ने कहा-
डफ राजा डफ मुसद्दी डफ ई देश दीवांण।
डफ ई डफ भेळा हुया, (जद) बाज्यौ डफ बीकांण।।

सरदारसिंह के उत्तराधिकारी डूंगरसिंह की अंग्रेज परस्ती के विरुद्ध सामौर के रोष की अभिव्यक्ति इस प्रकार हुई-
हो-छोगो हिंदवाण रौ, अडिग फिरंती आण।
पत्थर पाट बिराजतां, बटटौ लग्यौ बीकांण।।

तांत्या की मदद करने से इन्कार करने पर गोपाळपुरा के ठिकानेदार हमीरसिंह को उपालंभ देते हुए कहा-
तन मोटो मोटो तखत, मोटो वंश गंभीर।
हुयौ देश हित क्यूं हमैं, (थारौ) मन छोटो हम्मीर।।

इस वजह से खेतड़ी के शासक को इन शब्दों में फटकारा-
खेतड़ी मिळा दूं भेळी रेतड़ी
आकां ऊन ज्यूं उड़ा दूं हुर्र् फुर्र्।।

युगचेतना के उद्गाता जनकवि के रूप में-
सामौर ने राजस्थानी काव्य को एक नई भाव-भूमि पर खड़ा कर दिया। दरबारी संरक्षण में पनपी और फली-फूली कविता के सरोकार सर्वथा भिन्न थे। राजस्थान में ब्रिटिश प्रभुत्व के विस्तार ने ऐसे हालात पैदा कर दिये थे जिनमें आप व्यक्ति का जीवन दुस्वप्न में बदल गया। अभाव व भुखमारी जनता की नियति बन गये। सामौर के काव्य में विदेशी शासन के फलितार्थों के साथ ही जन साधारण की व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। झोंपड़ियों में रहने वाले राष्ट्र के मेरुदण्ड स्वरूप धरती पुत्रों की महिमा व कष्ट गाथा, दोनों को उन्होंने उजागर किया। उनकी रचना 'वगत बायरौ` में अंग्रजी शासन शोषणकारी प्रवृत्ति और उससे हतश्री सामान्य जनता की दशा का चित्रण हुआ है तो 'देश दर्पण` में देश वासियों को उठ खड़े होने के उद्बोधन के साथ साथ झोंपड़ियों को राष्ट्र का सच्चा शृंगार बताते हुए उनकी महत्ता को रेखांकित किया गया है। 'वगत वायरौ` हालात को समझने की उनकी विश्लेषणात्मक प्रतिभा का उत्तम उदाहरण है। अंग्रेजी अमल की अनुगूंज उसमें सुनाई पड़ती है। जन सामान्य की विपदाओं से सर्वथा उदासीन सत्ताधारी वर्ग को झिंझोड़ने वाले इस जनकवि की व्यथा इस प्रकार प्रकट हुइ है-
हुयगा सह हुक्काम, मिळ अंगरेजां हूं मुरख।
आज दुख्यारण आम, रैयत बापड़ी रामजी।।
रह्यौ सह्यौ रुजगार, अंगरेजां खोस्यौ अठै।
भूखी किण विध भार, रैयत झालै रामजी।।
सजा मुख मली सेज, नर सूवै हुय हुय निशंक।
बै कांटां रा बेझ, रै क्यूं जाणै रामजी।।
मुगळां खो निज मत्त, सहर बिगाड़या सांतरा।
गांवां री आ गत्त, अंगरेजां की रामजी।।

स्वामी विवेकानन्द ने बारम्बार इस बात पर बल दिया था कि देश के उद्धरण की आशा दीन-हीन सामान्य जनों से ही है। सामौर ने अपनी कृत 'देश दर्पण` में इसी तथ्य को रेखांकित किया है, जब वे कहते हैं-
धिन झूंपड़ियां रा घण्यां, भुज थां भारत भारत।
हो थे ई इण मुलक रा, साचकला सिणगार।।
झूंपड़िया रहसी जितै, इण धरती पर अेक।
मिनखपणौ रहसी मतै, छळी कपटियां छेक।

ये दोहे इस बात को प्रमाणित करते हैं कि 'शंकरदान की साम्राज्य विरोधी चेतना क्रम से जनवाद की ओर अग्रसर हुई। सामौर ने कविता को आधुनिक विचारधारा से जोड़कर एक नयी सम्भावना जगायी। अब तक चली आ रही साहित्यिक व सामाजिक मान्यताओं को तोड़ा। कविता को स्वतंत्रता व राष्ट्रीयता से जोड़ा। अंग्रेजों को मुल्क के 'मीठे ठग` करार देकर उन्हें निकाल बाहर करने हेतु एक होने का मूलमंत्र देकर कवि ने युगधर्म निभाया। अपने समकालीनों में यह आव्हान करने वाले सामौर अकेले थे-
मिळ मुसळमान, रजपूत ओ मरेठा, जाट सिख पंथ छंड जबर जुड़सी।
दौड़सी देश रा दबियौड़ा, दाकल कर, मुलक रा मीठा ठग तुरत मुड़सी।।

जिस समय अधिकांश कवियों की देशभक्ति की भावना अपनी रियासत की सीमाओं से जुड़ी हुई थी, सामौर की वाणी में जाति, धर्म और प्रान्तीयता का अतिक्रमण करती हुई राष्ट्र के नवविहान की सूचक स्वतंत्रता की शंखध्वनि सुनायी पड़ती है।
शंकरदान सही अर्थों में अग्निधर्मा कवि थे। उन्हें गोरी सत्ता के विद्रोही कवि, गोळी हंदा गीतों के कवि के रूप में याद किया जाता है। जब अन्य कवियों के स्वर में राष्ट्रीयता तुतला रही थी, तब उनके स्वर में उसका प्रचंड गर्जन था। राजस्थानी कविता के माध्यम से व्यक्त राष्ट्रीयता की भावना को व्यक्त करने वाले कवियों में वे पांक्तेय थे। उनके काव्य में राष्ट्र के प्रति गौरवभाव व निर्भयता पदे पदे लक्षित होती है। उनके समकालिनों द्वारा कहे गये मरसियों से यह बात प्रमाणित होती है। उदाहरण स्वरूप ये मरसिये-
नह जणजै जग में निलज, दीण-हीण दबकेल
बेमाता हेकण भळै, जण शंकर जबरैल

- गिरधारीसिंह गारबदेसर
सुण्यौ निधन सामौर रौ, चट आयी आ चींत
कुण दकाल कहसी अबैं, गोळी जेहड़ा गीत
मीठा ठग इण मुलक रा, नहचै हुवा नचींत
बीतौ शंकर बाहरू, मुलक तणौ दृढ़ मींत

- पाबूदान बारहठ फोगां
रह्यौ हितू बण रैंत रौ, लाग लपट सह तोड़
नान्हां मिनखां हित लड़यौ, मुलक तणौ सिर मोड़


- डॉ. के. एल. राजपुरोहित 
. ना. व्यास वि.वि., जोधुपर के राजनीति विज्ञान विभाग में एसोसियेट प्रोफेसर

चंदबरदाई / परिचय

Rao GumanSingh Guman singh



इसे हिन्दी का प्रथम महा कवि माना जाता है। इनका पृथ्वीराजरासो हिंदी का प्रथम महाकाव्य है। चंद दिल्ली के अंतिम हिंदू सम्राट महाराज पृथ्वीराज के सामंत और राजकवि के रुप में जाने जाते हैं। इससे इनके नाम में भावुक हिन्दुओं के लिए एक विशेष प्रकार का आकर्षण बढ़ता है।चंद ड़िंगळ व पिंगळ भाषा के भी जानकार थे। जन्म रासो के अनुसार ये जागीरदार राव जाति के जगात नामक गोत्र के थे। इनके पूर्वज की भूमि पंजाब थी। इनका जन्म लाहोर में हुआ था। इनका और महाराज पृथ्वीराज का जन्म एक ही दिन हुआ था। ये महाराज पृथ्वीराज के राजकवि के साथ-साथ उनके सखा ओर सामंत भी थे। वे षड्भाषा, व्याकरण, काव्य, साहित्य, छंद:शास्र, ज्योतिष, पुराण, नाटक आदि अनेक विद्याओं में पारंगत थे। इन्हें जालंधरी देवी का इष्ट था जिनकी कृपा से ये अदृष्ट-काव्य भी कर सकते थे। इनका जीवन पृथ्वीराज के जीवन के साथ ऐसा मिला हुआ था कि अलग नहीं किया जा सकता। युद्ध में, आखेट में, सभा में, यात्रा में, सदा महाराज के साथ रहते थे, और जहाँ जो बातें होती थीं, सब में सम्मिलित रहते थे। चन्द और पृथ्वीराजरासो पृथ्वीराजरासो ढाई हजार पृष्ठों का बहुत बड़ा ग्रंथ है जिसमें ६९ समय (सर्ग या अध्याय) हैं। प्राचीन समय में प्रचलित प्रायः सभी छंदों का इसमें व्यवहार हुआ है। मुख्य छन्द हैं - कवित्त (छप्पय), दूहा, तोमर, त्रोटक, गाहा और आर्या। जैसे कादंबरी के संबंध में प्रसिद्ध है कि उसका पिछला भाग बाण के पुत्र ने पूरा किया है, वैसे ही रासो के पिछले भाग का भी चंद के पुत्र जल्हण द्वारा पूर्ण किया गया है। रासो के अनुसार जब शहाबुद्दीन गोरी पृथ्वीराज को कैद करके गजनी ले गया, तब कुछ दिनों पीछे चंद भी वहीं गए। जाते समय कवि ने अपने पुत्र जल्हण के हाथ में रासो की पुस्तक देकर उसे पूर्ण करने का संकेत किया। जल्हण के हाथ में रासो को सौंपे जाने और उसके पूरे किए जाने का उल्लेख रासो में है - पुस्तक जल्हण हत्थ दै चलि गज्जन नृपकाज । रघुनाथनचरित हनुमंतकृत भूप भोज उद्धरिय जिमि । पृथिराजसुजस कवि चंद कृत चंदनंद उद्धरिय तिमि ।। रासो में दिए हुए संवतों का ऐतिहासिक तथ्यों के साथ बिल्कुल मेल न खाने के कारण अनेक विद्वानों ने पृथ्वीराजरासा के समसामयिक किसी कवि की रचना होने में पूरा संदेह किया है और उसे १६वीं शताब्दी में लिखा हुआ एक जाली ग्रंथ ठहराया है। रासो में चंगेज, तैमूर आदि कुछ पीछे के नाम आने से यह संदेह और भी पुष्ट हाता है। प्रसिद्ध इतिहासज्ञ रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा रासो में वर्णित घटनाओं तथा संवतों का बिल्कुल भाटों की कल्पना मानते हैं। पृथ्वीराज की राजसभा के काश्मीरी कवि जयानक ने संस्कृत में "पृथ्वीराजविजय' नामक एक काव्य लिखा है जो पूरा नहीं मिला है। उसमें दिए हुए संवत् तथा घटनाएं ऐतिहासिक खोज के अनुसार ठीक ठहरती है। उसमें पृथ्वीराज की माता का नाम कर्पूरदेवी लिखा है जिसका समर्थन हाँसी के शिलालेख से भी होता है। उक्त ग्रंथ अत्यंत प्रामाणिक और समसामयिक रचना है। उसके तथा "हम्मीर महाकाव्य' आदि कई प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार सोमेश्वर का दिल्ली के तोमर राजा अनंगपाल की पुत्री से विवाह होना और पृथ्वीराज का अपने नाना की गोद जाना, राणा समरसिंह का पृथ्वीराज का समकालीन होना और उसके पक्ष में लड़ना, संयोगिताहरण इत्यादि बातें असंगत सिद्ध होती हैं। इसी प्रकार आबू के यज्ञ से चौहान आदि चार अग्निकुलों की उत्पत्ति की कथा भी शिलालेखों की जाँच करने पर कल्पित ठहरती है, क्योंकि इनमें से सोलंकी, चौहान आदि कई कुलों के प्राचीन राजाओं के शिलालेख मिले हैं जिनमें वे सूर्यवंशी, चंद्रवंशी आदि कहे गए हैं, अग्निकुल का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या ने रासो के पक्ष समर्थन में इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि रासो के सब संवतों में, यथार्थ संवतों से ९०-९१ वर्ष का अन्तर एक नियम से पड़ता है। उन्होंने यह विचार उपस्थित किया कि यह अंतर भूल नहीं है, बल्कि किसी कारण से रखा गया है। इसी धारणा को लिए हुए उन्होंने रासो के इस दोहे को पकड़ा - एकादस सै पंचदह विक्रम साक अनंद । तिहि रिपुजय पुरहरन को भग पृथिराज नकिंरद ।। फिर यह भी विचारणीय है कि जिस किसी ने प्रचलित विक्रम संवत् में से ९०-९१ वर्ष निकालकर पृथ्वीराजरासो में संवत् दिए हैं, उसने क्या ऐसा जान बूझकर किया है अथवा धोखे या भ्रम में पड़कर। ऊपर जो दोहा उद्धृत किया गया है, उसमें अनंद के स्थान पर कुछ लोग अनिंद पाठ का होना अधिक उपयुक्त मानते हैं। इसी रासो में एक दोहा यह भी मिलता है - एकादस सैपंचदह विक्रम जिम ध्रमसुत्त । त्रतिय साक प्रथिराज कौ लिष्यौ विप्र गुन गुत्त ।। जीवन परिचय हिंदी के महान कवि चन्दबरदाई का जन्म संवत् १२२५ में हुआ था। उनका जन्म स्थान लाहौर बताया जाता है। चन्द पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर के समय में राजपूताने आए थे। सोमेश्वर ने आपको अपना दरबारी कवि बनाया। यहीं से आपकी दरबारी जिंदगी शुरु होती है। पृथ्वीराज के समय में आप नागौर में बस गए। यहाँ आज भी आपके वंशज रहते हैं। चन्दबरदाई की औलाद चंद के वंश के सितारे नानूराम के अनुसार चंद के चार लड़के थे। चार में से एक लड़का मुसलमान हो गया। तीसरा लड़का अमोर में बस गया और उसका वंश वहीं चलता रहा। चौथे लड़के का वंश नागौर में चला। चंद ने पृथ्वीराजरासो में अपने लड़कों का उल्लेख इस प्रकार किया है:- दहति पुत्र कविचंद कै सुंदर रुप सुजान। इक्क जल्ह गुन बावरो गुन समुदं ससभान।। साहित्य लहरी की टीका में एक पद इस तरह बयान करता है -- प्रथम ही प्रथु यज्ञ ते ये प्रगट अद्भुत रुप। ब्रह्मराव विचारी ब्रह्मा राखु नाम अनूप।। पान पय देवी दियो सिव आदि सुर सुख पाय। कहमो दुर्गा पुत्र तेरो भयो अति अधिकाय।। पारि पाँयन सुख के सुर सहित अस्तुति कीन। तासु बंस प्रसंस मैं भौ चंद चारु नवीन।। भूप पृथ्वीराज दीन्हीं तिन्हें ज्वाला दंस। तनय ताके चार कीनो प्रथम आप नरेस।। दूसरे गुनचंद ता सुत सीलचंद सरुप। वीरचंद प्रताप पूरन भयो अद्भुत रुप।। रणथंभौर हमीर भूपति लँगत खेसत जाये। तासू बंस अनूप भौ हरिचंद अति विख्यात।। आगों रहि गोपचल मैं रहयो तर सुत वीर। पुत्र जन्मे सात तोके महा भट गंभीर।। कृष्णाचंद्र उदारचंद जु रुपचंद सुभाई। बुद्धिचंद प्रकास चौथे चंद में सुखदाई।। देवचंद प्रबोध संसृतचंद ताको नाम। भयो सप्तो नाम सूरजचंद मंद निकाम।। उपर्युक्त पद और नानूराम के द्वारा बताये गए एक नाम के अलावा सभी नाम मिलते- जुलते दिखाई देते हैं। चन्दबरदाइ दरबार में चन्द दिल्ली के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज के दरबार में एक सामंत तथा राजकवि के रुप में प्रसिद्ध हैं। इनका जन्म और सम्राट पृथ्वीराज का जन्म एक ही दिन हुआ माना जाता है। दोनों की इस संसार से विदाई भी एक ही दिन हुई थी। दुनिया में आने से मरने तक दोनों एक साथ रहे। ये दोनों कहीं भी एक साथ दिखाई दे सकते थे। महाराज चाहे घर में हों, युद्ध में या यात्रा में चन्दजी साथ में अवश्य होते थे और प्रत्येक बात मशविरे में शामिल रहा करते थे। इसी अथाह प्रेम में चन्दबरदाई ने हिंदी भाषा का प्रथम महाकाव्य पृथ्वीराज रासो की रचना कर डाली। इसमें चंद ने पृथ्वीराज की जिंदगी की अनेक घटनाओं उका उल्लेख किया है। इसमें पायी जाने वाली बहुत- सी घटनाओं से पृथ्वीराज की चरित्र को प्रस्तुत में सार्मथ्य मानी जाती हैं। यह महाकाव्य ढ़ाई हजार पृष्ठों का विशाल ग्रंथ है। इसमें कुल मिलाकर उनहत्तर अध्याय की रचना की गई है। बाण की कादंबरी की तरह पृथ्वीराजरासो के बारे में भी यह कहा जाता है कि पिछले भाग को चंद के पुत्र जल्हण ने पूर्ण किया। चंद ने अपने पुत्र जल्हण को यह महान काव्य देते हुए कहा था :- पुस्तक जल्हण हत्थ है चलि गज्ज्न नृपकाज। रघुनाथ चरित हनुमंतकृत भूप भोज उद्धरिय जिमि। पृथ्वीराज सुजस कवि चंद कृत चंदनंद उद्धरिय तिमि।। नानूराम के अनुसार उसके पास पृथ्वीराज रासो की एक असल प्रति अब भी मौजूद है। इस असली पृथ्वीराजरासो का एक नमूना जो पद्मावती के समय का है, उल्लेख किया जा रहा है:- हिंदूवान थान उत्तम सुदेस। तहँ उदित द्रूग्गा दिल्ली सुदेस। संभरिनरेस चहुआन थान। पृथ्वीराज तहाँ राजत भान।। संभरिनरेस सोमेस पूत। देक्त रुप अवतार धूत।। जिहि पकरि साह साहाब लीन। तिहुँ बेर करिया पानीप हीन।। सिंगिनि- सुसद्द गुनि चढि जंजीर। चुक्कइ न सबद बधंत तीर।। मनहु कला ससमान कला सोलह सो बिन्नय। बाल वेस, ससिता समीप अभ्रित रस पिन्निय।। विगसि कमलास्त्रिग, भमर, बेनु खंजन मग लुट्टिय। हरी, कीय, अरु, बिंब मोति नखसिख अहिघुट्टिय।। कुट्टिल केस सुदेस पोह परिचियत पिक्क सह। कमलगंध बयसंघ, हंसगति चलाति मंद मंद।। सेत वस्र सोहे सरीर नख स्वाति बूँद जस। भमर भवहिं भुल्लहिं सुभाव मकरंद बास रस।। पृथ्वीराज की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा:- प्रिय प्रथिराज नरेस जोग लिखि कग्गार दिन्नो। लगन बराग रचि सरब दिन्न द्वादस ससि लिन्नो।। से ग्यारह अरु तीस साष संवत परमानह। जो पित्रीकुल सुद्ध बरन, बरि रक्खहु प्रानह।। दिक्खंत दिट्ठि उच्चरिय वर इक पलक्क् विलँब न करिय। अलगार रयनि दिन पंच महि ज्यों रुकमिनि कन्हर बरिय।। पृथ्वीराजरासो की भाषा इस महाकाव्य की भाषा कई स्थानों पर आधुनिक सांचे में ढली दिखाई देती है। कुछ स्थानों पर प्राचीन साहित्यिक रुप में भी दिखाई देती हैं। इसमें प्राकृत और अपभ्रंश शब्दों के साथ- साथ शब्दों के रुप और विभक्तियों के निशानात पुराने तरीके से पाये जाते हैं। बज्जिय घोर निसान राज चौहान चहों दिस। सकल सूर सामंत समरि बल जंत्र मंत्र तिस।। उद्वि राज प्रिथिराज बाग मानो लग्ग बीर नट। कढ़त तेग मनवेग लगंत मनो बीजु झ छट।। थकि रहे सुर कौतिज गगन। रंगन मगन भाई सोन घर।। हदि हरषि बीर जग्गे हुलसी। दुरंउ रंग नवरत बर।। खुरासान मुलतान खघार मीर। बलख स्थो बलं तेग अच्चूक तीर।। रुहंगी फिरगो हल्बबी सुमानी। ठटी ठ भल्लोच ढालं निसानी।। मजारी- चषी मुक्ख जंबु क्कलारी। हजारी- हजारी हुकें जोध भारी।।

पृथ्वीराज रासो

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 पद्मसेन कूँवर सुघर ताघर नारि सुजान।

ता उर इक पुत्री प्रकट, मनहुँ कला ससभान॥

मनहुँ कला ससभान कला सोलह सो बन्निय।
बाल वैस, ससि ता समीप अम्रित रस पिन्निय॥

बिगसि कमल-स्रिग, भ्रमर, बेनु, खंजन, म्रिग लुट्टिय।
हीर, कीर, अरु बिंब मोति, नष सिष अहि घुट्टिय॥

छप्पति गयंद हरि हंस गति, बिह बनाय संचै सँचिय।
पदमिनिय रूप पद्मावतिय, मनहुँ काम-कामिनि रचिय॥

मनहुँ काम-कामिनि रचिय, रचिय रूप की रास।
पसु पंछी मृग मोहिनी, सुर नर, मुनियर पास॥

सामुद्रिक लच्छिन सकल, चौंसठि कला सुजान।
जानि चतुर्दस अंग खट, रति बसंत परमान॥

सषियन संग खेलत फिरत, महलनि बग्ग निवास।
कीर इक्क दिष्षिय नयन, तब मन भयो हुलास॥

मन अति भयौ हुलास, बिगसि जनु कोक किरन-रबि।
अरुन अधर तिय सुघर, बिंबफल जानि कीर छबि॥

यह चाहत चष चकित, उह जु तक्किय झरंप्पि झर।
चंचु चहुट्टिय लोभ, लियो तब गहित अप्प कर॥

हरषत अनंद मन मँह हुलस, लै जु महल भीतर गइय।
पंजर अनूप नग मनि जटित, सो तिहि मँह रष्षत भइय॥

तिहि महल रष्षत भइय, गइय खेल सब भुल्ल।
चित्त चहुँट्टयो कीर सों, राम पढ़ावत फुल्ल॥

कीर कुंवरि तन निरषि दिषि, नष सिष लौं यह रूप।
करता करी बनाय कै, यह पद्मिनी सरूप॥

कुट्टिल केस सुदेस पोहप रचयित पिक्क सद।
कमल-गंध, वय-संध, हंसगति चलत मंद मंद॥

सेत वस्त्र सोहे सरीर, नष स्वाति बूँद जस।
भमर-भमहिं भुल्लहिं सुभाव मकरंद वास रस॥

नैनन निरषि सुष पाय सुक, यह सुदिन्न मूरति रचिय।
उमा प्रसाद हर हेरियत, मिलहि राज प्रथिराज जिय॥

चंदबरदाई

मारवाड़ी देस का न परदेस का भाग-5 लेखक: शम्भु चौधरी

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यह बात हम सभी मानते हैं कि इस समाज ने समाज-सेवा, शिक्षा, धर्म, चिकित्सा, आकस्मिक आपदाओं, प्राकृतिक विपदाओं, काल-अकाल आदि दुर्योगों के समय तथा अन्य विविध क्षेत्रों के साथ-साथ हिन्दी साहित्य सेवा के अलावा भी समस्त भारतीय भाषा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। विद्वानों, साहित्यकारों, कलाकारों, आदि को सम्मानपूर्वक आर्थिक सहयोग प्रदान कर उनके जीवन को सुगम बनाने में अपनी भूमिका का निर्वाह भी करता रहा है, जबकि इस तरह का कार्य इतर समाज में देखने को कम ही मिलता है, जो थोड़ा बहुत मिलता है, उसका कार्यक्षेत्र स्वयं के समाज तक सिमटा नजर आता है, कुछ सामाजिक संस्थाओं को छोड़ दिया जाय तो, आंकड़े भी मिलने संभव नहीं है। जो वैगर सरकारी सहयोग के कार्य किया हो। यह एक अलग बहस का विषय है, मैं इस विवाद की तरफ नहीं जाना चाहता, किसने क्या काम किया, इस लेख में सिर्फ यह बात जानने का प्रयास करूँगा कि आखिर वे कौन-कौन से कारण हो सकते हैं जिसके चलते मारवाड़ी समाज इतर समाज में कुंठा का कारण बना रहता है। इन तमाम कार्यों के विपरीत मारवाड़ी समाज ने एक छोटी किन्तु भारी गलती भी की। वह गलती है समाज के इतिहास को महत्व न दिया जाना, यदि कहिं कुछ थोड़ा बहुत छपा भी तो उन प्रकाशनों में सम्पन्नता झलकती है। इस छोटी सी गलती ने समस्त मारवाड़ी समाज के तमाम कार्यों पर पानी फेर रखा है। हम अपने बच्चों को स्वाभिमान की जिन्दगी जीने लायक नहीं रख पाये। इसके लिये हमें आस-पास के परिवेश में मारवाड़ी समाज के प्रति व्याप्त कुंठा के लिये हम अपने ही समाज को दोषी ठहरा सकते हैं। इस कौम की एक विशेषता यह भी है कि वह किसी भी घटना का प्रतिवाद न कर हमेशा से 'आत्म-सुरक्षा' का रुख अख्तियार करता रहा है। यह आत्म-सुरक्षा, किसी आत्म-सम्मान की सूचक नहीं वरन् अपमान भरी भावना का घूँट पीने जैसा है। इस आत्म-सूरक्षा का दूसरा पहलू इस रूप में सामने आता है कि भयभीत मानसिकता के प्रतिफल के रूप में अपने बच्चों की मानसिकता को कमजोर करते हुए, कई बार यह कहते पाये जाते थे - "छोड़ ण आपणो के लेव - जाण दे" या फिर " मांयणे आकर सांकली लगा ले" अर्थात स्वयं पर कोई बात होने पर कहता है - छोद़ दो, अपना क्या लेता है, या किसी आस-पड़ोस की तकलीफ में खड़ा न होकर यह कहते पाया जाता है - 'घर के अन्दर आ जाओ और दरवाजा बन्द कर लो' । मारवाड़ी समाज सामाजिक तो है , पर की बार ऎसा लगता है कि सामाजिक प्राणी नहीं है। मैने कई बार पाया है कि कुछ लोग मेरे द्वारा स्वयं के समाज के प्रति की गई टिप्पणियों को गलत तरीके से इस्तमाल करते हैं खास कर ऎसे लोगों से मेरा निवेदन रहेगा कि वैगर किसी संदर्भ के किसी पेरा को मोटे अक्षरों में दिखाने से पूर्व अपनी बात को रखें ताकि हमारे समाज तक आपकी भावना का सही अवलोक भी साथ में किया जा सकेगा। समाज में राजनैतिक परिवेश: एक समय था जब इस समाज का प्रतिनिधित्व, समाज के चन्द पूँजीपति घराने तक ही सिमटा हुआ था, उनके द्वारा दिये गये या सुझाये गये नाम को ही संसद या विधानसभा में स्थान दिया जाता रहा। अब यह स्थिति काफी बदल चुकी है, जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओँ ने अपनी पहचान कायम की है। साथ ही साथ समाज का झूकाव एक दल की तरफ न होकर काफी फैल चुका है। आजादी के समय कांग्रेस को खुला समर्थन देने वाले समाज ने साथ ही साथ को जनसंघ वर्तमान में भाजपा को भी सहयोग दिया। परन्तु यहाँ यह बात भी महत्वपूर्ण है कि ये लोग राजनीति को कभी नजदीक से नहीं देखते थे, परोक्ष रूप से आर्थिक सहयोग देना, एवं सत्ताधारी दल से अपने फायदे या उद्योग व्यापार से जुड़ी बातों से ही अपना मतलब रखते थे। किसी सभा का आयोजक बनकर उस सभा का खर्च जुगार करने वाले वफादार कार्यकर्त्ता माने जाते थे। अब इस दिशा में भी इनकी पहचान गौण, बल्कि यूँ लिखा जा सकता है कि राजनैतिक दलों को सोच में काफी बदलाव देखने को मिला है, एक तरफ सभी दल धर्म की आड़ में एक विशेष संप्रदाय के वोटरों को लुभाने हेतु मिथ्या धर्मनिपेक्षता का चोला पहन रखें हैं और एक धर्म को केन्द्र कर अपने दल की राजनीति करने में लगे हैं वहीं कुछ प्रन्तीय स्तर के दल जात-पात की राजनीति करने में लग गये, इनकी इस राजनिति का परिणाम अभी हाल ही में हमें महाराष्ट्र के अन्दर देख्ने को मिला। यह बात हमें मान लेनी चाहिये कि भारत की एकता न तो जातिय आधार की राजनीति में समाहित हो सकती है न ही धर्म की राजनीति में, ये दोनों सिद्धान्त कुछ समय तक भले ही किसी को सत्ता में ला दे लेकिन दूरगामी परिणाम कफी भी अच्छे नहीं हो सकते। मारवाड़ी समाज का वर्तमान राजनैतिक परिवेश शुन्य में भटक चुका है। राजस्थान के सांसद, विधायक अपने को मारवाड़ी नहीं मानते, और मारवाड़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग इतने सक्षम नहीं की वे अपने बुते किसी भी क्षेत्र से विधायक या सांसद बन सके, यह बात सही है कि समाज के कई लोगों ने इस क्षेत्र में अपनी पहचान कायम की है जिसमें असम के स्व.हीराला पटवारी, एवं स्व. राधाकिशन खेमका, श्री कमला प्रसाद अग्रवाला (तेजपुर), बंगाल से स्व.विजयसिंह नाहर, स्व.प्रभुदयाल हिम्मतसिंका, स्व.ईश्वरदास जालान,श्रीमती सरला माहेशवरी,श्री राजेश खेतान, श्री संतोष बागड़ोदिया, स्व.देवकीनन्दन पौद्दार, श्री सत्यनारायण बजाज एवं अब इनके पुत्र- श्री दिनेश बजाज(कोलकात्ता), बिहार से स्व.सीताराम चमड़ीया, श्री शंकर टेकरीवाल (छपड़ा), श्री सुशील मोदी, श्री धिरेन्द्र अग्रवाल(छपड़ा), श्री बनरसी प्रसाद झूणझूणवाला(Bhagalpur), श्रीमती राजकुमारी हिम्मतसिंहका केन्द्रीय स्तर पर स्व.लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, वर्तमान में उनके पुत्र श्री अभिषेक सिंघवी, महाराष्ट्र प्रान्त के श्री राज के पुरोहित, डॉ जयप्रकाश मुंदड़ा,श्री मुरली देवड़ा, श्री दिलीप कु.मनसुखलाल गांधी, दिल्ली प्रान्त से श्री जयप्रकाश अग्रवाल श्री गोयल जी , उत्तरप्रदेश: श्री होती लाल अग्रवाल, श्री विरेन्द्र अग्रवाला(मुरादावाद) श्री मुकुन्दलाल अग्रवाल(वरेली)मध्यप्रदेश: श्री कमलनयन बजाज,श्री बी.आर.नाहटा, श्री श्रीमन नारायण अग्रवाल( वर्धा), श्री श्रीकृष्ण अग्रवाल (Mahasamund), श्री कल्याण जैन(Indore)पंजाब- श्री श्रीचंद गोयल, हरियाणा: श्री ओमप्रकाश जिंदल, श्री नवीन जिंदल इसमें कई प्रन्तों से विधायकों के नाम जोड़े जाने बाकी हैं ( मेरी जानकारी में नहीं होने के चलते नहीं जोड़ पाया हूँ, आपके पास कोई जानकारी हो तो मेल द्वारा सूचित करेगें-लेखक) ऊपर में राजस्थान से सिर्फ स्व.लक्ष्मीमल सिंघवी व उनके पुत्र वर्तमान में श्री अभिषेक जी का नाम ही जोड़ा गया है, वैसे इन दिनों मारवाड़ी युवा मंच के एक कार्यक्रम में श्रीमती सुषमा स्वराज ने भी अपनी पहचान मारवाड़ी होने की दी है। इन लोगों के अलाव भी बहुत सारे नाम है जिन्हें इस सूची में जोड़े जा सकता हैं। इन सबके होते हुए भी यह लिखने में मुझे जरा भी झीझक नहीं है, कि ये समाज राजनीति स्तर पर राजनैतिक दलों में अपनी पहचान बनाने में कसी भी प्रकार से सफल नहीं दिखते। हाँ, बिहार में श्री सुशील मोदी और दिल्ली के श्री अभिषेक सिंघवी को छोड़ दिया जाय तो सभी व्यापारी श्रेणी में ही आंके जा सकते हैं। मेरे कहने का अर्थ यह नहीं कि इनका व्यापारी होना समाज के लिये अच्छा नहीं था, मेरा मानना है कि राजनीति में जाना हो तो व्यापार की बात समाज को सोचना बन्द करके शुद्ध रूप से राजनीति करनी चाहिये। मारवाड़ी भले ही किसी राजनैतिक पार्टी का कोषाध्यक्ष बनकर अपने आपको महान समझता रहे, परन्तु मैं मानता हूँ कि यह समाज के लिये मात्र कमजोरी वाली बात है, मुझे खुशी है कि मारवाड़ी सम्मेलन के वर्तमान अध्यक्ष श्री सीताराम शर्मा ने अपने सत्र में राजनैतिक रूप से सजग होने के लिये एक अभियान चलाया है, जिसमें समाज को वोटर लिस्ट में अपने व अपने परिवार का नाम दर्ज कराना, चुनाव के दिन मतदान में हिस्सा लेना, व वोट डालने के लिये समय पर जाना, साथ ही धन के बजाय जंमीनीस्तर की राजनीति करने की सलाह दी गई है। हमारा समाज अभी तक राजनैतिक स्तर पर अपना सही प्रतिनिधित्व नहीं कर पाया है और न ही इसके लिये कोई सोच तैयार कर पा रहे हैं ना ही कोई संगठित ढाँचा है, जिस पर केंद्रित होकर काम किया जा सके। मेरा सोचना है कि आज के वर्तमान दृश्य को ध्यान में रखते हुये मारवाड़ी समाज को देश की राजनीति में हिस्सेदारी निभाने के लिये नई भूमिका क निर्वाह करना होगा, न कि केवल भामाशाह के रूप में , जैसा कि होता आया है। क्रमशः लेख आगे जारी रहेगा, आप अपनी राय से मझे अवगत कराते रहें - शम्भु चौधरी http://groups.google.com/group/hindibhasha http://groups.google.com/group/samajvikas http://samajvikas.in

मारवाड़ी समाज में समाप्त होती परम्परा:

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मारवाड़ी समाज में ब्याह-शादियों में कल तक मुस्लिम घरों की राजस्थानी मुस्लिम औरतें ही लखारी चूड़ियाँ पहनाया करती थी। यह ब्याह की एक रस्म सी बन चुकी थी। मुस्लिम औरतों का समाज के घरों मे आना-जाना भी था। परन्तु हिन्दुस्तान विभाजन ने इन रिस्तों में काफी दरार पैदा कर दी, अब तो यह परम्परा समाप्त सी हो गई है। ठीक इसी प्रकार हर गाँव व कस्बे में मारवाड़ी 'नाई' एवं 'मिसरानी' का होना उतना ही जरूरी माना जाता था, जितना जीना-मरना। कुछ ऎसी बातें इस समाज में उदाहरण के रूप में आज भी मिल जायेगी, जिससे यह सबुत आसानी से मिल जाएँगे कि यह समाज राजस्थान से जैसे- जैसे दूर होता गया, वैसे-वैसे ही स्थानीय समाज एवं स्थानीय बोल-चाल, भाषा, लोक त्योहारों को अपनाता चला गया। समय का यह दौर यहाँ तक चला कि लोगों ने राजस्थान की पुश्तों पुरानी जमीन-जायदाद को कौड़ियों के भाव बिक्री कर दी। जो जिस प्रदेश में बसा वह वहीं का होकर रह गया। देश में आजादी के पूर्व मारवाड़ियों का केन्द्र प्रायः अविभाजित बंगाल ही रहा। धीरे-धीरे यह समाज आस-पास के शहरों, प्रान्तौं में फैलता चला गया। यहाँ बता देना भी जरूरी होगा कि दक्षिण भारत को छोड़कर पूर्वी भारत में मारवाडि़यों का प्रवेश प्रायः 300 वर्ष पूर्व ही हो गया था, जिसमें बिहार ( झारखण्ड के साथ) , असम, अविभाजित बंगाल (उडिसा को लेकर), और कलकत्ता इनका केन्द्र बना रहता । एक प्रकार से कोलकाता को मारवाड़ीयों का 'मिनी राजस्थान' भी कहा जा सकता है। स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी थी, कि कलकत्ता एक प्रकार से मारवाड़ियों का मक्का-मदीना बन चुका था। इस हरी-भरी धरती को अपना बना लेने वाला यह समाज अपने आप में एक उदाहरण तो है ही, साथ ही साथ यहाँ के सुख-दुःख में भी बराबर का साथ रहा है, चाहे वह अकाल की घटना हो या बाढ़ की हर पल इस समाज ने अग्रणी भूमिका अदा की है। एक सबसे बड़ी बात मुझे देखने को मिली की अहिन्दी भाषी प्रन्तों में मारवाड़ी समाज ने हिन्दी का एक प्रकार से लालन-पोषण ही किया। इसका सबसे बड़ा कारण था, इन प्रन्तों हिन्दी भाषा-भाषी के लिये किसी प्रकार की शिक्षण व्यवस्था का न होना, जगह-जगह हिन्दी का पोषण करने हेतु स्कूल-विद्यालय-पुस्तकालय की स्थापना के साथ-साथ हिन्दी समाचार पत्रों के प्रकाशन में इस प्रवासी समाज के योगदान को इंकार करना किसी भी प्रकार से संभव नहीं है। पिछले दिनों जब समाज विकास में 'मारवाड़ी समाज के धरोहर' का प्रकाशन का निर्णय लिया तो, विभिन्न प्रन्तों से काफी आंकड़े प्राप्त हुए, जिसके विवरणों को आगे देने का प्रयास करूंगा, पाया कि इस समाज ने जो भी जनोपयोगी कार्य किये वे समस्त मानवजाति के लिये तो किये ही, साथ ही साथ स्थानीय साहित्य,भाषा, संस्कृति के विकास में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह बात मेरे लिख देने से या कह देने से प्रमाणित नहीं हो जाती, कोई भी यह जानना जरूर चाहेगा कि, यह बात कैसे प्रमाणित की जाय? इसका एक छोटा सा उदाहरण असम में "रूपकंवर ज्योतिप्रसाद अग्रवाला" का ही देना चाहूगां, असम में एक दिन का राजकीय छुट्टी प्रति वर्ष मनाई जाती है, इनके नाम से और इस दिन समुचा असमिया समाज दिनभर सांस्कृतिक कार्यक्रम करते हैं, एकप्रकार से "रूपकंवर ज्योतिप्रसाद अग्रवाला" को असम का रविन्द्रनाथ ठाकुर कहा जा सकता है। एक समय था जब समाज के लोग न सिर्फ अपने समाज के विकास की बात सोचते थे, वे स्थानीय साहित्य,भाषा, संस्कृति के विकास में भी अपना महत्वपूर्ण दिया है। आज की पीढ़ी में यह बात देखने को नहीं मिलती, जो काम मारवाड़ी समाज ने किये उनके आंकडों का एक दस्तावेज यदि बनाया जाय तो यह ज्यादा उपयोगी होगा। मारवाड़ी शब्द की परिभाषा: जहाँ तक मेरा मानना है, 'मारवाड़ी' - शब्द न कोई विशेष जाति, न धर्म और न ही किसी प्रान्त को द्योतक है। जैसे पंजाबी, बंगाली, गुजराती आदि कहने पर अहसास होता है। राजस्थान व हरियाणा के लोगों को इनकी भाषा-बोली, पहनाव- संस्कृति में एकरूपता के चलते इन्हें देश के अन्य प्रन्तों में, विदेशों में भी मारवाड़ी शब्द से सम्बोधित किया जाने लगा। (इस बात पर आगे चर्चा करूगाँ कि, कब से और कैसे इस समाज को 'मारवाड़ी' शब्द से संबोधित किया जाने लगा, और इसके पीछे क्या कारण थे।) अब यह प्रश्न स्वभाविक तौर पर हो सकता है, कि तब मारवाड़ी किस प्रान्त के हैं? एक पाठक ने रायपुर से ई- मेल कर, मुझसे प्रश्न किया कि - "मारवाड़ी से तात्पर्य सीधे रूप में राजस्थानी से माना जाता है, मारवाड़ी सम्मेलन भी अपने संविधान में राजस्थानी संस्कृति की बात करती है, तो फिर हरियाणा के प्रवासी लोगों को देश के अन्य हिस्सों में मारवाड़ी शब्द से क्यों सम्बोधित किया जाता है?" इसका सटिक उत्तर अभी तक मेरे पास नहीं है, हाँ यह बात तो सही है कि जहाँ एक तरफ राजस्थान व हरियाणा के लोगों को देश के अन्य भागों में मारवाड़ी कह कर संबोधित किया जाता है, वहीं राजस्थानी व हरियाण्वी अपने मूल प्रान्त के अन्दर अपने आपको मारवाड़ी नहीं मानते। इसका कारण क्या है इस पर हम बाद में विचार करगें। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात ओर है, जिसपर भी गौर करने की बात है कि, हिन्दू, जैन, ब्राह्मण समाज, माहेश्वरी, ओसवाल, जाट, बनिया, आदि सभी को देश-विदेश के समस्त हिस्सों में मारवाड़ी कहा जाता है, परन्तु राजस्थान, हरियाणा के मुसलमानों को मारवाड़ी शब्द से संबोधित नहीं किया जाता है और ( कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो ) न ही वे अपने आपको संबंधित रखना पसंद करते हैं । वैसे तो अभी तक इस शब्द की सही व्याख्या नहीं हो पाई है, फिर भी कई विद्वानों ने इसकी व्याख्या करने का प्रयास किया है। जिसमें मारवाड़ के सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ श्री गौरीशंकर हीरा चन्द जी ओझा ने लिखा है, 'मारवाड़' शब्द देशवाची और मारवाड़ी शब्द लोकभाषा एवं संस्कृतिवाची है। राजपुताना के लोगों को हिन्दूस्तान में मारवाड़ी ही कहते हैं। जयपुर के प्रसिद्ध इतिहासज्ञ तथा पुरातत्ववेत्ता पुरोहित श्री हरि नारायण जी ने लिखा है - " राजपूताना से बाहर जाने वाले लोग अपने पहनावे, रहन-सहन, व्यवहार और व्यापार आदि में समानता के कारण राजस्थान से बाहर कलकत्ता, मुंबई आदि भारत के सभी स्थानों में मारवाड़ी कहे जाते हैं, भले ही वे राजस्थान में जोधपुर, बीकानेर अथवा जयपुर के या अन्य किसी राज्य (राजस्थानी रियासत वाले#) के निवासी क्यों न हों। डॉ.डी.के.टकनेत ने अपनी पुस्तक "मारवाड़ी समाज" में बालचन्द मोदी का हवाला देकर लिखा है कि " मारवाड़ शब्द संस्कृत के 'मरुवर' का अपभ्रंश है एवं प्राचीन काल में यह मरू प्रदेश कहलाता था। इसकी व्याख्या श्री मोदी के अनुसार 'माड' जैसलमेर का दूसरा नाम था और 'वाड' मेवाड़ का अंतिम अंश। इन दोनों शब्दों को मिलाकर मारवाड़ शब्द बना और इसी शब्द से 'मारवाड़ी' शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है। जब यहा बात लिखी गई थी उन दिनों राजस्थान में कई अलग-अलग रियासतें भी थी, जिसे बाद मेम राजस्थान में विलय कर दिया गया। क्रमशः - शम्भु चौधरी

मारवाड़ी शब्द का प्रयोग -शम्भु चौधरी

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मारवाड़ी शब्द वर्तमान समय में संकुचित और रूढ़ीगत दायरे की चपेट से बाहर आने लगा है। धीरे-धीरे यह शब्द देश के विकास का सूचक बनता जा रहा है, एक समय था जब समाज के लोग भी इसे घृणा का पर्यावाची सा मानने लगे थे। मंच के कुछ जागरूक सदस्यों ने मेरा मंच ब्लॉग पर इस बात पर एक परिचर्चा शुरू की है। जहाँ तक मेरा मानना है कि 'मारवाड़ी' - शब्द न कोई जाति, न धर्म और न ही किसी प्रान्त का द्योतक है जैसे- पंजाबी, बंगाली, गुजराती आदि कहने से अहसास होता है। राजस्थान एवं हरियाणा व पंजाब के कुछ सीमावर्ती इलाके के प्रवासी लोगों को भारत के अन्य प्रान्तों या विदेशों में भी इस समाज को 'मारवाड़ी ' शब्द से जाना व पहचाना जाता है, वहीं इसी प्रान्त के मुसलमान समाज ने अपने आपको इस शब्द से अलग ही कर रखा हैं [कुछ अपवादों को छोड़कर]। जबकि अन्य धर्म व संप्रदाय के सभी लोगों को जिसमें विशेषत: हिन्दू, जैन, ओसवाल, माहेश्वरी, ब्राह्मण, राजपुत, बनीया आदि सभी धर्म जाति के लोग शामिल पाये जाते हैं। यहाँ पंजाब और हरियाणा क्षेत्र के राजस्थानी जो एक समय राजपुताने क्षेत्र में ही आते थे, अब भूगौलिक परिवर्तन व पंजाब और हरियाणा प्रान्तों के रूप में जाने जाने के चलते इस क्षेत्र का मारवाड़ी समाज अपने आपको पंजाबी या हरियाणवी ही मानने लगे हैं, जबकि इनकी बोलचाल-भाषा, पहनवे, रीति-रिवाज, राजस्थानी भाषा संस्कृति से मिलते ही नहीं राजस्थानी संस्कृति ही हैं, इसीलिए प्रवासी मारवाड़ी समाज के लिये आम तौर पर राजस्थानी शब्द का ही प्रयोग किया जाता है भले ही वे हरियाणा या पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र से ही क्यों न आतें हों पीछले दिनों श्री राजेश कुमार जैन ने यह प्रश्न उठाया था कि मारवाड़ी से तात्पर्य जब राजस्थानी भाषा और संस्कृति से ही लगाया जाता है तो हरियाणा की क्या कोई साहित्य या अपनी संस्कृति नहीं है? यह प्रश्न आज की युवा पीढ़ी का उठाना वाजिब सा लगता है जब हरियाणा एक समय पंजाब के अन्तर्गत आता था तो यह बात पंजाब के साथ भी उठती थी की हरियाणा की अपनी अलग संस्कृति है इस पंजाब से अलग कर दिया जाय और हुआ भी ऎसा ही पंजाब ने यह स्वीकार किया कि हरियाणा को एक अलग राज्य का दर्जा देना ही उचित रहेगा। परन्तु इस राज्य के अलग दर्जे को प्राप्त कर लेने से जो क्षेत्र राजस्थान रियासतों के अधिन आते थे उनकी भाषा, संस्कृति, पहनावे, खान-पान , रीति-रिवाज हो या पर्व त्योहारों सभी में एक समानता पाई जाती थी जो थोड़ा बहुत अन्तर था तो वह सिर्फ बोली का ही था। देखें नीचे दिये गये एक चित्र के लाल निशान को जिसमें हिसार, भिवानी, रोहतक, गुड़गावं, लेहारू, महेन्द्रगढ़, पटियाला और दिल्ली का भी छोटा सा भाग राजपुताने क्षेत्र में दिखाया हुआ है। जो इन दिनों 

आपणा इलाका :

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आपणा इलाका : आपणा नांव-

ओम पुरोहित 'कागद'

राजस्थान जूनो प्रदेश। जूनी मानतावां। जूनो इतिहास। जूनी भाषा। जूनी परापर। परापर एड़ी कै आज तक इकलग चालै। खावणै-पीवणै, उठणै-बैठणै अनै बोवार री आपरी रीत। रीत में ठरको। ठरकै में इतिहास री ओळ। ग्यान-विग्यान अर भूगोल री ओळ। बात-बोवार अर नांव में राजस्थानी री सौरम। इण सौरम रो जग हिमायती। आजादी सूं पैली राजस्थान में घणा ठिकाणा। घणा ई राज। राजपूतां रा राज। इणी पाण राजपूताना। राजा राज करता पण धरती प्रजा री। प्रजा राखती नांव धरती रा। नांवकरण में ध्यान धरती रै गुण रो। राजवंश, फसल, माटी, पाणी, फळ, पसु-पखेरू धरती रा धणी। आं री ओळ में थरपीजता इलाकै रा नांव।बीकानेर रा संस्थापक राव बीकाजी रै नांव माथै बीकाणो। बीकाणै में बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, भटिंडा, अबोहर, सिरसा अर हिसार। राव शेखाजी रै नांव माथै शेखावाटी। शेखावाटी में चूरू, सीकर अर झुंझुणू। मारवाड़ में जोधपुर, पाली जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर। मेवाड़ में उदयपुर, चितोड़ , भीलवाड़ा अर अजमेर। बागड़ में बांसवाड़ा अर डूंगरपुर। ढूंढाड़ में जयपुर, दौसा, टोंक, कीं सवाईमाधोपुर। हाड़ौती में कोटा, बूंदी, बांरा, झालावाड़, कीं सवाईमाधोपुर। मेवात में अलवर, भरतपुर। जैसलमेर में माड़धरा, हनुमानगढ़ नै भटनेर, करोली-धोलपुर नै डांग, अलवर नै मतस्य, जयपुर नै आमेर, अजमेर नै अजयमेरू, उदयपुर नै झीलां री नगरी, जैसलमेर नै स्वर्णनगर, जोधपुर नै जोधाणो अर सूर्यनगरी, भीलवाड़ा नै भीलनगरी, बीकानेर नै जांगळ अर बागड़ भी कैईजै। राजस्थान रै हर खेतर रा न्यारा-निरवाळा नांव। कीं नांव बिणज-बोपार माथै। कीं नांव जमीन री खासियतां रै पाण। बीकाणै में भंडाण, थळी, मगरो अर नाळी जे़डा नांव सुणीजै। ऐ हाल तो बूढै-बडेरां री जुबान माथै है। बतळ में उथळीजै। पण धीरै-धीरै बिसरीज रैया है। आओ आपां जाणां आं नांवां री मैमा।
भंडाण भंडाण बीकानेर जिलै री लूणकरणसर, बीकानेर अर कीं कोलायत तहसील रै उण गांवां नै कैवै जकां रै छेकड़ में 'ऐरा' लागै। जियां- हंसेरा, धीरेरा, दुलमेरा, खींयेरा, वाडेरा।भंडाण रा मतीरा नांमी होवै। मीठा। अठै री आल जबर मीठी होवै। आल लाम्बै मतीरै नै कैवै। भंडाण री गायां-भैंस्यां, भेड-बकरयां अर ऊंट नांमी। भंडाण रो घी, मावो अर मोठ नांमी। मतीरो भंडाण रो सै सूं सिरै। अठै रै मतीरै सारू कैबा है-
खुपरी जाणै खोपरा, बीज जाणै हीरा।बीकाणा थारै देस में, बड़ी चीज मतीरा।।थळीथळी चूरू जिलै रै रतनगढ़ अर सुजानगढ़ रै खेतर नै थळी कैवै। इण खेतर रा लोग थळिया। थळी री बाजरी, मोठ, काकड़िया, मतीरा नांमी हुवै। थळी री बाजरी न्हानी अर मीठी होवै। थळी रा वासी मोटो अनाज खावै। काम में चीढा अनै जुझारू अर तगड़ा जिमारा होवै। थळी सारू कैबा है-
खाणै में दळिया, मिनखां में थळिया।
मगरोबीकानेर जिलै री कोलायत तहसील अर इणरै लागता जैसलमेर रा कीं गांवां नै मगरो कैवै। अठै री जमीन कांकरा रळी। मगर दाईं समतळ। पधर। इण कारण नांव धरीज्यो मगरो। मगरै रा ऊंट, गा-भेड अर बकरी नांमी। कोलायत धाम भी मगरै में पड़ै।
नाळीहनुमानगढ़, सूरतगढ़, पीळीबंगा, अनूपगढ़, विजयनगर अर हरियाणा रै सिरसै जिलै रै गांवां नै नाळी कैवै। अठै बगण आळी वैदिक नदी सुरसती जकी नै अजकाळै घग्घर भी कैवै। इण नदी खेतर नै नाळी कैईजै। इण इलाकै रो नांव नाळी क्यूं थरपीज्यो। इण सूं जुड़ियोड़ी एक रोचक बात है। आओ बांचां-जद घग्घर में पाणी आंवतौ। बीकानेर रा राजा नदी पूजण हनुमानगढ़ आंवता। एकर राजाजी हनुमानगढ़ आयोड़ा हा। लारै सूं एक जणौ अरदास लेय’र म्हैलां पूग्यौ। राजाजी नीं मिळ्या। पूछ्यौ तौ लोगां बतायौ, नदी पूजण गया है। बण पूछ्यो, नदी के होवै? एक कारिंदै जमीन माथै माटी में घोचै सूं लीकटी बणाई। लोटै सूं उण में पाणी घाल्यो। बतायो, नदी इयां होवै। बण कैयो, ए डोफा! आ क्यांरी नदी ? आ तो नाळी है, नाळी। बस उण दिन रै बाद इण इलाकै रो नांव नाळी पड़ग्यो। नाळी रा चावळ, कणक अर चीणा जग में नांमी। नाळी री जमीन घणी उपजाऊ होवै।
आज रौ औखांणौबूढळी रै कह्यां खीर कुण रांधै?

प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका, वाया-गोगामे़डी, जिलो- हनुमानगढ़ -335504कानाबाती- 09602412124
राजस्थानी रा लिखारां सूं अरज- आप ई आपरा आलेख इण स्तंभ सारू भेजो सा!

कोरियर री डाक इण ठिकाणै भेजो सा!सत्यनारायण सोनी, द्वारा- बरवाळी ज्वेलर्स, जाजू मंदिर, नोहर-335523email-
aapnibhasha@gmail.com

लालां बिचलो मोती

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लालां बिचलो मोती, लाखीणो भरतार।

प्रो. जहूरखां मेहर
राजस्थानी लूंठी भासा। लूंठो इणरो सबदकोस। लूंठी इणरी बातां। एक-एक सबद रा पर्याय गिणो तो गिणण में नीं आवै। लाधता जावै, लाधता जावै। लारलै दिनां छैल भंवर रा नांव अर विशेषण छाप्या तो आप घणा दाय करिया। घणी सरावणा कीनी। आज कीं और भळै बांचो। ऐ नांव आपणै सारू अंवेर'र भेज्या है- जोधपुर सूं प्रो. जहूरखां मेहर।
अंतर रो फूंबो, अंतर रो छकियो, अंतरियो बनड़ो, अंधारै घर रो पांवणो, अचूकरा बोलणो, अलबेलो ओठी, अलवलियो असवार, आंखड़ल्यां रो ठार, आंख्यां रो अंजन, आंख्यां रो काजळ, आतमा रो आधार, ऊगतो भाण, ऊगतै सूरज रो तेज, ऊजळदंतो कानूड़ो। कमोदणी रो चांद, काचै किरसलियै रो रूप, कान्हकंवर-सा, काया री कोर, काळजै री कूंप, केतकी रो कंथ, केळू री कांब, केळू री पांख, केसर वरणो, केसरियो भरतार, कोटड़ियां रो रूपक, कोडीलो, खावंद। गसारी रा प्राण आधार, गाडाळ, गायड़ रो गाडो, गुडळो बादळ, गोपियां मांयलो कान्ह। घण नेहाळू, घणबिलमाऊ, घण-रीसाळू, घण-रूपाळू, घण-संकाळू, घणहंसा, घर रो आधार, घर रो धणी, घु़डलां रो असवार।
चंवरी रो रूप, चतर रो चांद, चतुर बुद्ध रो जाण, चु़डलै रो रूप। छिरजगारो, छैल-छबीलो। जग-मोवणो, जीव री जड़ी, जीव रो आसरो, जोड़ी रो भरतार, जोबन रो जोड़। टोळी मांय सूं टाळको, टोळी रो टीकायत। ढळती नथ रा मोती। तन रो ताईतियो, तारां बिचलो चांद, तुनक मिजाजी। थोड़ा बोली रो सायबो। दुख-भंजक। धण रो धणी, धरती-सो धीमो। नखराळो, नथड़ी रो मोती, नेतल रो भरतार, नैणां री जोत, नैणां रो नीर, नैणां रो वासी, नैणां रो हीर, नैनी नणद रो वीर।
परदेसियो, परदेसी सूवटियो, परभात रो रूप, पीरजादो। फूटरियो, फूल बनी रो सायबो, फूलां बिचलो गुलाब। बागां मांयलो केवड़ो, बागां मांयलो चंपलो, बागां रो छैल, बागां रो भंवरो, बागां रो सूवटो, बाड़ी रा भौंरा, बाजू़डै री लूंब, बाढाळो, बाताळु, बायां बिचलो बीजळो, बाव नोचण। भंवरियै पटां रो, भाखर जिस्या भारी, भायां रो लाडलो। मंडियोड़ो मोर, मजलस रो मांझी, मदछकियो स्याम, मनचोर, मनभरियो, मन रो तीमण, मन रो धणी, मन रो मीत, मन रो राजा, महलां मांयलो दिवलो, महलां रो मान, माथा रो मैमद, माथै रो मौड़ , मारूड़ो, मालको, मिजाजी, मिणधर, मिसरी मेवो, मिसरी रो डळो, मैमद मोरियो, मैलां रो मेवासी, मोवनगारो, मौजां रा बगसणहार।रंगीलो बादळ, रखड़ी रो उजास, रागां रो रसियो, रागां रो रीझाळू, राय, रिड़मलो, रीसाळु राज, रूप रो डळो, रेजो, रेसम, रेसम रो भारो। लळवळियो सरदार, लाखीणो भरतार, लाडो, लालां बिचलो मोती। व्हालो।संसार रो सुख, सइयां, सईजादो, बनड़ो, सगां रो सूवटियो, सजनी रो सूओ, समंदां जिस्या अथाह, सरद पून्यूं रो चांद, सांवळियो मोटियार, सवाग रो चीर, सवाग रो धणी, सातां बैनां रो बीर, सायधण रो चीर, सायरमल, सायर सोढो, सासू-जायो, सासू रो मोबी, सिर रो सेवरो, सुन्दर रो सायबो, सुखकरण, सुख रो सागर, सूरज रो साखियो, सेजां रो सुख, सेजां रो धणी, सेजां बिचलो स्याम, सेजां रो सरूप, सेजां रो सिणगार, सेजां रो सुखवासी, सेजां रो सूवटियो, सैणां रो सूवटो, सोरमियो, सोळा कळा सुजान। हथळेवै रो हाथ, हरियाळो बनड़ो, हाटां मांयलो हीर, हाथां रो खतमी, हाथां रो खामची, हिवड़ै रो चीर, हिवड़ै रो हमीर, हिवड़ै रो हार, हीयै री जोत, हीयै रो हीर, हेताळु हंसलो।
अर अबार सुणो सा, ओ दूहो-मोरां बिन डूंगर किसा, मेह बिन किसा मल्हार।तरिया बिन तीजां किसी, पिव बिना किसा सिंगार।।
आज रौ औखांणौधणी बिना गीत सूना तो सिरदार बिना फौज निकांमी
प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका, वाया-गोगामे़डी, जिलो- हनुमानगढ़ -335504कानाबाती- 09602412124
राजस्थानी रा लिखारां सूं अरज- आप ई आपरा आलेख इण स्तंभ सारू भेजो सा!
कोरियर री डाक इण ठिकाणै भेजो सा!सत्यनारायण सोनी, द्वारा- बरवाळी ज्वेलर्स, जाजू मंदिर, नोहर-335523email- aapnibhasha@gmail.com

ओबामा सरकार नै घणा-घणा रंगमान

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बध्यो मायड़ रौ- हरिमोहन सारस्वत
हरिमोहन सारस्वत रो जलम 14 सितम्बर, 1971 नै हनुमानगढ़ मांय हुयो। राजस्थानी रा समरथ लिखारा। 'गमियोड़ा सबद' कविता संग्रै माथै मारवाड़ी सम्मेलन, मुम्बई रो घनश्यामदास सराफ सर्वोत्तम साहित्य पुरस्कार समेत मोकळा मान-सनमान। राजस्थानी आंदोलन रा आगीवांण। श्रीगंगानगर सूं आखै राजस्थान घूमता थकां नई दिल्ली तक री मायड़भासा-सनमान जातरा रा संयोजक रैया। अबार अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति रा प्रदेश पाटवी। आज बांचो, आं री कलम री कोरणी- ओ खास लेख।
राजस्थानियां वास्तै आज हरख-उमाव रो दिन है। खुशियां मनावण रो दिन है। नाचण-गावण रो दिन है। मौज मनावण रो दिन है। दुनिया रै सब सूं तागतवर मानीजण वाळै देस अमरीका राजस्थान री भासा नै सरकारी स्तर पर मान्यता देय'र राजस्थान अर राजस्थानी रो मान बधायो है। अमरीका सरकार रै राजनीतिक पदां सारू जका आवेदन करीजैला, वां में दुनिया री 101 भासावां में सूं किणी भासा रा जाणकार आवेदन कर सकैला। वां में सूं 20 भासावां भारत री है। जिणां मांय सूं मारवाड़ी, हरियाणवी, छतीसगढ़ी, भोजपुरी, अवधी अर मगधी ऐड़ी भासावां हैं जिकी अजे तांईं भारतीय संविधान री आठवीं अनुसूची में आपरी जिग्यां नीं थरप सकी।राजस्थान रा जका लोग बारै बसै, वां नै मारवाड़ी अर वां री भासा पण मारवाड़ी नांव सूं जाणीजै। अमरीका में 'राजस्थान एशोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमरीका' (राना) नांव सूं एक जबरो संगठन है। राना रा प्रतिनिधि डॉ. शशि शाह बतावै कै अमरीका में राजस्थानी रै पर्याय रूप में मारवाड़ी सबद घणो चलन में है। मारवाड़ी राजस्थानी रो ई दूजो नांव है।अमरीका सरकार हरियाणवी नै भी मान्यता दीनी है। हरियाणवी भी राजस्थानी भासा रो एक रूप है। भासा वैग्यानिकां घणकरै हरियाणा प्रांत नै राजस्थानी भासी क्षेत्र रै रूप में गिण्यो है। हरियाणवी अर राजस्थानी संस्कृति एकमेक है, तो भासा री समरूपता रै ई कारण।अमरीका री शिकागो यूनिवर्सिटी मांय भी राजस्थानी बरसां सूं पढ़ाई जावै। इण यूनिवर्सिटी मांय राजस्थानी रो न्यारो-निरवाळो विभाग भी थरपीजियोड़ो है। अमरीका री एक संस्था 'लायब्रेरी ऑफ कांग्रेस' बरसां पैली विश्व भासा सर्वेक्षण करवायो तो दुनिया री तेरह समृद्धतम भासावां में राजस्थानी आपरी ठावी ठोड़ थरपी।जिकी भासा रो दुनिया में इत्तो मान-सम्मान। वा आपरै घर राजस्थान में ई दुत्कारीजै तो काळजो घणो ई बळै। आपरी मायड़ रो ओ अपमान सहन नीं हुवै। कित्ती अजोगती बात है कै राजस्थान रो एक विधायक, जको राजस्थान रो जायो-जलम्यो, राजस्थानी माटी में पळ्यो-बध्यो, राजस्थानी भासा रा संस्कार लेय'र विधानसभा पूग्यो। राजस्थान री विधानसभा में बो दूजी २२ भासावां में भासण देय सकै, पण आपरी मायड़भासा में शपथ भी नीं लेय सकै! राजस्थान रै स्कूलां में पैली भासा रै रूप मांय हिन्दी पढ़ाई जावै। राजस्थानी लोग उणरो स्वागत करै। पण दूसरी भासा रै रूप में राजस्थानी री मांग करै। पण राजस्थानी तो तीजी भासा रै रूप में भी नीं सिकारीजै। तीजी भासा रै रूप में दूजै प्रांतां री दर्जनभर भासावां पढ़ाई जावै, तो राजस्थान री राजस्थानी क्यूं नीं? सेठियाजी कैयो-
आठ करोड़ मिनखां री मायड़ भासा समरथ लूंठी।नहीं मानता द्यो तो टांगो लोकराज नै खूंटी।।
(भारत सरकार अगर इयूं समझै कै राजस्थांनी वांरा गुलाम है अर वांनै वांरी मायड़भासा अर संस्कृती सूं हेत राखण रौ कोई हक कोनी, तौ एड़ी भारत सरकार रौ आपांनै विरोध करणौ चावै. म्हें पैली ईं केह चुक्यौ हूं कै अगर एक बरस मांय भारत सरकार आपाणी मायड़भासा नै मानता नीं देवै तौ जोरदार विरोध करणौ पड़सी अर अगर जरुरत पड़ै तौ भलै अलगाववाद री नीती ई अपणावणी पड़ै. भारत सरकार रौ मानणौ है कै राजस्थांनी भारत रै आर्थीक विकार अर सेना मांय सैयोग देवता रह्‌वै पण वांनै राजस्थांन अर राजस्थांनी रै बारै मांय बोलणा रौ कै सोचणै रौ हक कोनी तौ वा गलत है, अठै कन्हैयालाल जी साची कही है कै लोकराज (लोकतंत्र) नै खूंटी टांगौ, सिधी आंगळी सूं घी नीं निकळै (कै तौ आंगळी टेढी करु नहीं तौ टिपरीयौ वापरौ)....
आपरौ हनवंतसिंघ राजपुरोहित)
अमरीका में बसण वाळा राजस्थानियां नै घणा-घणा रंग! ओबामा सरकार नै घणा-घणा रंग! वां राजस्थान अर राजस्थानी रो मान बधायो है। 21 फरवरी दुनियाभर में 'विश्व मातृभाषा दिवस' रै रूप में मनाइजै। अखिल भारतीय राजस्थानी भासा मान्यता संघर्ष समिति राजस्थानी नै संवैधानिक मानता री मांग नै लेय'र प्रदेश रा सगळा संभाग मुख्यालयां पर धरना-प्रदर्शन अर मुखपत्ती सत्याग्रह करैला। आपां नै भी आपणी भासा रै मान-सनमान वास्तै लारै नीं रैवणो है।
आज रो औखांणोमां कैवतां मूंडो भरीजै।थां खुद समझदार हौ, मतळब बतावण री कोई जरुरत तौ है कोनी पण इत्तौ जरुर बोलू कै, मां, मायड़भोम अर मायड़भासा रौ दरजौ सुरग सूं ईं उचौ हुवै.
प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका, वाया-गोगामे़डी, जिलो- हनुमानगढ़ -335504कोरियर री डाक इण ठिकाणै भेजो सा!सत्यनारायण सोनी, द्वारा- बरवाळी ज्वेलर्स, जाजू मंदिर, नोहर 335504

email-aapnibhasha@gmail.com

शर्म करो भारत सरकार

Rao GumanSingh Guman singh

भारत सरकार अगर इयूं समझै कै राजस्थांनी वांरा गुलाम है अर वांनै वांरी मायड़भासा अर संस्कृती सूं हेत राखण रौ कोई हक कोनी, तौ एड़ी भारत सरकार रौ आपांनै विरोध करणौ चावै. म्हें पैली ईं केह चुक्यौ हूं कै अगर एक बरस मांय भारत सरकार आपाणी मायड़भासा नै मानता नीं देवै तौ जोरदार विरोध करणौ पड़सी अर अगर जरुरत पड़ै तौ भलै अलगाववाद री नीती ई अपणावणी पड़ै. भारत सरकार रौ मानणौ है कै राजस्थांनी भारत रै आर्थीक विकार अर सेना मांय सैयोग देवता रह्‌वै पण वांनै राजस्थांन अर राजस्थांनी रै बारै मांय बोलणा रौ कै सोचणै रौ हक कोनी तौ वा गलत है, अठै कन्हैयालाल जी साची कही है कै लोकराज (लोकतंत्र) नै खूंटी टांगौ, सिधी आंगळी सूं घी नीं निकळै (कै तौ आंगळी टेढी करु नहीं तौ टिपरीयौ वापरौ)....
मां कैवतां मूंडो भरीजै।मां, मायड़भोम अर मायड़भासा रौ दरजौ सुरग सूं ईं उचौ हुवै.
राजस्थांनीयां वास्तै आज हरख-उमाव रौ दिन है. दुनिया रै सब सूं तागतवर मानीजण वाळै देस अमरीका राजस्थान री भासा नै सरकारी स्तर पर मान्यता देय'र राजस्थान अर राजस्थानी रौ मान बधायौ है. अमरीका सरकार रै राजनीतिक पदां सारू जका आवेदन करीजैला, वां में दुनिया री 101 भासावां में सूं किणी भासा रा जाणकार आवेदन कर सकैला, वां मांय एक मारवाड़ी (राजस्थांनी) है. आपरी माहिती वास्तै आखी दुनिया मांय राजस्थांनी मारवाड़ी रै नांव सूं ओळखीजै अर वांरी भासा मारवाड़ी भासा कुहावै.

गैरों ने अपनाया - अपनों ने ठुकराया शर्म करो भारत सरकार

आपरौ,
हनवंतसिंघ राजपुरोहित

हूं रे हूं-विजयदांन देथा री बातां

Rao GumanSingh Guman singh

हूं रे हूं
 
 
अे जाडी गवाड़ी रो धणी चालतो रह्‌यौ तो उणरी घरवाळी केई दिनां तांई रोवती नीं ढबी। न्यात अर कड़ूंबा रा जाट भेळा होय उणनै समझावण लागा। तद वा रोवती-रोवती ई कैवण लागी- धणी रै लारै मरणा सूं तो रीवी। आ दाझ तो जीवूंला जित्तै बुझैला नीं। अबै रोवणो तो इण बात रो है कै लारै घर में कोई मोट्यार कोनीं। म्हारी आ छह सौ बीघा जमीं कुण जोतैला, बोवैला?
हाथ में गेडी अर खांधै पटू़डो* लियां अेक जाट पाखती ई ऊभो हो। वो जोर सूं बोल्यो- हूं रे हूं।
पछै वा जाटणी वळै रोवती-रोवती बोली- म्हारै तीन सौ गायां री छांग अर पांच सौ लरड़ियां रो ऐवड़ है। उणरो धणी-धोरी कुण व्हैला?
वो सागी ई जाट वळै कह्यो- हूं रे हूं।
वा जाटणी वळै रोवती-रोवती बोली- म्हारै च्यार पचावा*, तीन ढूंगरियां* अर पांच बाड़ा है, वां री सार-संभाळ कुण करैला?
वो जाट तो किणी दूजा नै बोलण रो मौको ई नीं दियो। तुरंत बोल्यो- हूं रे हूं।
जाटणी तो रोवती नीं ढबी। डुस्कियां भरती-भरती बोली- म्हारो धणी बीस हजार रो माथै लेहणो छोड़नै गियो, उणनै कुण चुकावैला?
अबकी वो जाट कीं नीं बोल्यो। पण थोड़ी ताळ तांईं किणी दूजा नै इणरो हूंकारो नीं भरतां देख्यो तो जोस खाय कह्यो- भला मिनखां, इत्ती बातां रा म्हैं अेकलो हूंकारा भरिया। थैं इत्ता जणा ऊभा हो, इण अेक बात रो तो कोई हूंकारो भरो। यूं पाछा-पाछा कांईं सिरको!
(विजयदांन देथा री बातां री फुलवाड़ी सूं साभार।) 
पटू़डो- ओढण रो ऊनी गाभो।
 पचावा-ज्वार- बाजरी रै पूळां रो ढिग।
ढूंगरियां- सूकै घास रो ढिग।
 

मरूधर रो अगनबोट ऊंट

Rao GumanSingh Guman singh

प्रो. जहूरखां मेहर
सन 1941 मांय जोधपुर मांय जाया-जलम्या प्रो. जहूरखां मेहर राजस्थानी रा विरला लिखारां मांय सूं अे. जिणां री भासा में ठेठ राजस्थानी रो ठाठ देखणनै मिळै. राजस्थान रै इतिहास, संस्कृति अर भासा-साहित पेटै आपरा निबंध लगोलग छपता रैवै. मोकळा पुरस्कार-सनमान मिल्या है. आज बांचो आं रौ औ खास लेख 
रेगिस्तानी बातां सारू राजस्थानी री मरोड़ अर ठरको ई न्यारो. सबदां सूं लड़ालूंब घणी राती-माती भासा है राजस्थानी. इण लेख में मरुखेतर रै अेक जीव ऊंट सूं जुड़ियोड़े रो लेखो करता थकां आ बात जतावण री खप्पत करी है कै थळी रै जीवां अर बातां सारू राजस्थानी भासा री मरोड़ अर ठरको ई न्यारो.
ऊंट मरुखेतर रो अगनबोट कैईजै अर इण सारू राजस्थानी साहित, इतिहास अर बातां में इतरा बखाण लाधै कै इचरज सूं बाको फाड़णो पड़ै. दूजी भासावां में तो 'ऊंट' अर 'कैमल' सूं आगै काळी-पीळी भींत. मादा ऊंट सारू 'ऊंटनी' अर 'सी कैमल' या 'कैमलैस' सूं धाको धिकाणो पड़ै. पण आपणी भासा में इण जीव रा कितरा-कितरा नांव! कीं तो म्हे अंवेरनै लाया हां. बांच्यां ई ठा पड़ै -
जाखोड़ो, जकसेस, रातळो, रवण, जमाद, जमीकरवत, वैत, मईयो, मरुद्विप, बारगीर, मय, बेहटो, मदधर, भूरो, विडंगक, माकड़ाझाड़, भूमिगम, पींडाढाळ, धैंधीगर, अणियाळ, रवणक, फीणनांखतो, करसलो, अलहैरी, डाचाळ, पटाल, मयंद, पाकेट, कंठाळक, ओठारू, पांगळ, कछो, आखरातंबर, टोरड़ो, कंटकअसण, करसो, घघ, संडो, करहो, कुळनारू, सरढो, सरडो, हड़बचियो, हड़बचाळो, सरसैयो, गघराव, करेलड़ो, करह, सरभ, करसलियो, गय, जूंग, नेहटू, समाज, कुळनास, गिडंग, तोड़, दुरंतक, भुणकमलो, वरहास, दरक, वासंत, लंबोस्ट, सिंधु, ओठो, विडंग, कंठाळ, करहलो, टोड, भूणमत्थो, सढ़ढो, दासेरक, सळ, सांढियो, सुतर, लोहतड़ो, फफिंडाळो, हाथीमोलो, सुपंथ, जोडरो, नसलंबड़, मोलघण, भोळि, दुरग, करभ, करवळो, भूतहन, ढागो, गडंक, करहास, दोयककुत, मरुप्रिय, महाअंग, सिसुनामी, क्रमेलक, उस्ट्र, प्रचंड, वक्रग्रीव, महाग्रीव, जंगळतणोजत्ती, पट्टाझर, सींधड़ो, गिड़कंध, गूंघलो, कमाल, भड्डो, महागात, नेसारू, सुतराकस अर हटाळ.
मादा ऊंट रा ई मोकळा नांव. बूढी, ग्याबण, जापायती, बांझड़ी, कागबांझड़ी अर भळै के ठा कित्ती भांत री सांढां सारू न्यारा-न्यारा नांव. मादा ऊंट नै सांढ, टोडड़ी, सांयड, सारहली, टोडकी, सांड, सांईड, क्रमाळी, सरढी, ऊंटड़ी, रातळ, करसोड़ी, रातल, करहेलड़ी, कछी अर जैसलमेर में डाची कैवै. सांढ जे ढळती उमर री व्है तो डाग, रोर, डागी, रोड़ो, खोर, डागड़ जै़डै नांवां सूं ओळखीजै. सांढ जे बांझ व्है तो ठांठी, फिरड़ी, फांडर अर ठांठर कहीजै. लुगायां ज्यूं कागबांझड़ी व्है अर अेकर जणियां पछै पाछी कदैई आंख पड़ै इज कोयनी. ज्यूं सांढ ई अेकर ब्यायां पछै दोजीवायती नीं व्है तो बांवड़ कहीजै. बांवड़ नै कठैई-कठैई खांखर अर खांखी ई कैवै. पेट में बचियो व्है जकी सांढ सुबर कहीजै. जिण सांढ रै साथै साव चिन्योक कुरियो व्है वा सलवार रै नांव सूं ओळखीजै. कदैई जे कुरियो हूवतां ई मर जावै तो बिना कुरियै री आ सांढ हतवार कुहावै.

ऊंट रो साव नान्हो बचियो कुरियो कुहावै. कुरियो तर-तर मोटो व्है ज्यूं उणरा नांव ई बदळता जावै. पूरो ऊंट बणण सूं पैलां कुरियो, भरियो, भरगत, करह, कलभ, करियो अर टोडियो या टोरड़ो अर तोरड़ो कहीजै.

राजस्थानी संस्कृति में ऊंट सागे़डो रळियोड़ो, अेकमेक हु
योड़ो. लोक-साहित इणरी साख भरै. ऊंट सूं जुड़ियोडा अलेखूं ओखाणा अर आडियां मिनखां मूंडै याद. लोकगीतां रो लेखो ई कमती नीं.

जगत री बीजी कोई जोरावर सूं जोरावर भासा में ई अेक चीज रा इत्ता नांव नीं लाधै. कोई तूमार लै तो ठा पड़ै कै कठै तो राजस्थानी रै सबदां रो हिमाळै अर कठै बीजी फदाक में डाकीजण जोग टेकरियां. कठै भोज रो पोथीखानो, कठै गंगू री घाणी!
 
(आ हिंदी भासा तौ राजस्थांनी रै आगे पाणी कम चा है, इण हिंदी रौ राजस्थांनी अर दूजी प्रादेसिक भासावां रा घणा सबद चोरी कर्‌या है तौ ई इणमांय इत्ता प्रयायवाची सबद नीं लाधै. हिंदी रौ अर इज राजस्थांनी री रक्षा कर सकै है - हनवंतसिंघ).

आज रौ औखांणौ

जांन में कुण-कुण आया? कै बीन अर बीन रो भाई, खोड़ियो ऊंट अर कांणियो नाई।
प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका,
वाया-गोगामे़डी, जिलो- हनुमानगढ़ -335504.
 
राजस्थानी रा लिखारां सूं अरज- आप भी आपरा आलेख इण स्तम्भ सारू भेजो सा!
कोरियर री डाक इण ठिकाणै भेजो सा!
सत्यनारायण सोनी, द्वारा- बरवाळी ज्वेलर्स, जाजू मंदिर, नोहर 335523.
email- aapnibhasha@gmail.com
blog- aapnibhasha.blogspot.com

रंगीलो राजस्थान

Rao GumanSingh Guman singh

राजस्थान रंगीलो प्रदेस. राजस्थान नै परम्परागत रूप सूं रंगां रै प्रति अणूंतो लगाव. सगळी दुनिया रो मन मोवै राजस्थानी रंग.
बरसां पैली नेहरू रै बगत नागौर में पंचायत राज रो पैलड़ो टणकौ मेळौ लाग्यौ। 2 अक्टूबर, 1959 रौ दिन हौ. राजस्थान रा सगळा सिरैपंच भेळा हुया। नेहरूजी मंच माथै पधारिया तो निजरां साम्हीं रंग-बिरंगा साफा रो समंदर लहरावतो देख'र मगन हुयग्या। रंगां री आ छटा देख वां री आंख्यां तिरपत हुयगी। मन सतरंगी छटा में डूबग्यो। रंगां रै इण समंदर में डूबता-उतरता गद्-गद् वाणी में बोल्या- ''राजस्थान वासियां! थै म्हारी एक बात मानज्यो, आ म्हारै अंतस री अरदास है। वगत रा बहाव में आय'र रंगां री इण अनूठी छटा नै मत छोड़ज्यो। राजस्थानी जनजीवण री आ एक अमर औळखांण है। इण धरती री आ आपरी न्यारी पिछाण है। इण वास्तै राजस्थान रो ओ रंगीलो स्वरूप कायम रैवणो चाइजै।''
राजस्थानी जनजीवण रा सांस्कृतिक पख नै उजागर करता पंडतजी रा अे  बोल घणा महताऊ है। 'रंग' राजस्थानी लोक-संस्कृति री अेक खासियत है। अठै कोई बिड़दावै, स्याबासी दिरीजै तो उणनै 'रंग देवणो' कहीजै- 'घणा रंग है थनै अर थारा माईतां नै कै थे इस्यो सुगणो काम करियो।' अमल लेवती-देवती वगत ई जिको 'रंग' दिरीजै उणमें सगळा सतपुरुषां नै बिड़दाइजै।
राजस्थान री धरती माथै
ठोड़-ठोड़ मेळा भरीजै। आप कोई मेळै में पधार जावो- आपनै रंगां रो समंदर लहरावतो निगै आसी। लुगायां रौ रंग-बिरंगा परिधान आपरो मन मोह लेसी। खासकर विदेसी सैलाणियां नै ओ दरसाव घणो ई चोखो लागै। इण रंगां री छटा नै वै आपरै कैमरां में कैद करनै जीवण लग अंवेर नै राखै।
राजस्थानी पैरवास कु़डती-कांचळी अर लहंगो-ओढणी संसार में आपरी न्यारी मठोठ राखै। लैरियो, चूंनड़ी, धनक अर पोमचो आपरी सतरंगी छटा बिखेरै। ओ सगळो रंगां रो प्रताप।
इणीज भांत राजस्थानी होळी अेक रंगीलो महोच्छब। इण मौकै मानखै रो तन अर मन दोन्यूं रंगीज जावै। उड़तोड़ी गुलाल अर छितरता रंग अेक मनमोवणो वातावरण पैदा करै। रंगां रो जिको मेळ होळी रै दिनां राजस्थान में देखण नै मिलै, संसार में दूजी
ठोड़ स्यात ई निजरां आवै।
मानवीय दुरबळतावां रै कारण साल भर में पैदा हुयोड़ा टंटा-झगड़ा, मन-मुटाव अर ईर्ष्या-द्वेष सगळा इण रंगीलै वातावरण में धुप नै साफ होय जावै, मन रो मैल मिट जावै।
इण रंगीलै प्रदेस री रंगीली होळी रै मंगळ मौकै आपां नै आ बात चेतै राखणी कै वगत रै बहाव में आय'र भलां ई सो कीं छूट जावै पण आपणी रंग-बिरंगी संस्कृति री अनूठी छटा बणायां राखणी।

कंवल उणियार रो लिखियोड़ौ दूहो बांचो सा!

चिपग्या कंचन देह रै, कपड़ा रंग में भीज।
सदा सुरंगी कामणी, खिली और, रंगीज।।


आज रौ औखांणौ

फूहड़ रो मैल फागण में उतरै।
जे मिनख आपणै डिल री साफ-सफाई माथै ध्यांन नीं उण माथै कटाक्ष स्वरूप आ केवत कह्‌विजै।
प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका,
वाया-गोगामे़डी, जिलो- हनुमानगढ़-335504
कोरियर री डाक इण ठिकाणै भेजो सा!
सत्यनारायण सोनी, द्वारा- बरवाळी ज्वेलर्स, जाजू मंदिर, नोहर-335523
राजस्थानी रा लिखारां सूं अरज- आप भी आपरा आलेख इण स्तम्भ सारू भेजो सा! 

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हाड़ौती बोली में राजस्थानी री बात

Rao GumanSingh Guman singh


-अतुल कनक 
भासान् का मसला पे आपणां राजनीतिक स्वारथ साधबा की जुगत सुतंतर भारत बेई कोय नुई बात कोय न्हं। स्वारथ का रथ पे असवारी करतां-सतां जिम्मेदार मनख्यां ने जठी नरी भासान् के तांई ऊ मुकाम भी बख्श्यो, जीं की वे सांच्या ही हकदार न्हं छी (म्हूँ नांव अर नजीर दे'र कोय विवाद न्हं पनपाबो चावूं), उठी ही राजस्थानी जशी तागतवर भासा सूं सौतेलो बर्ताव भी कर्यो। म्हां ईं बात को निर्णय बगत के माथै छोड़ भी द्यां के आज़ादी का अतना बरस पाछै भी राजस्थानी नै संवैधानिक मानता न्हं मिलबा देबा का जिम्मेदार कुण छै, तो भी या टीस तो रह रह'र साळै ई छै के राजस्थानी अबार भी संविधान की आठवीं अनुसूची में आपणो मुकाम न्हं पा सकी।
लारला दनां राजस्थानी भासा नै संवैधानिक मानता न्ह मिल पाबा को दरद काळज्या में ऊँ बग़त फेर साळ्यो, जद लगै-टगै सोळह विधायकां विधायक पद की आन बेई राजस्थानी भासा में शपथ लेणी चाही, पण वे ईं लेखे आपणी इच्छा न्ह पूर सक्या। क्यूं के राजस्थानी नै संविधान की आठवीं अनुसूची में भैळै न्हं करयो गयो। कांई यो लोकतंत्र का मूळ भाव की आड़ी स्वारथ की राजनीति की चींगण्या कोय न्हं के राजस्थान प्रदेस की विधानसभा में एक विधायक चाह्वै तो कोंकणी अर नेपाली जशी भासान् में तो शपथ ल्ये सकै छै पण राजस्थानी में शपथ न्हं ल्ये सकै?
पण ईं चींगण्यां का महताऊ पख भी छै। या घटना वां लोगां के तांई बग़त को ऊथळो छै जे ये कह'र मानता की मांग की मुहिम की आड़ी सूं उदासीन हो ज्यावै छै के मानता मिलबा सूं भासा की साख में सुरखाब का पाँखड़ा न्ह लाग ज्यावैगा। या घटना आम आदमी के तांई भी स्यात् ईं बात को अहसास करा सकै के मायड़ भासा नै मानता न्हं मिलबो जूण नै कशी-कशी अबखायां सूं दो-च्यार करा सकै छै।
भारत सरकार को गजट भी मानै छै के देस में जे भासावां सैं सूं बेसी बापरी ज्यावै छै, राजस्थानी वां मं सूं एक छै। न्हं जाणै कितणी जगत पोसाळां में राजस्थानी पढ़ाई ज्यावै छै। पाकिस्तान सूं ले'र नेपाल अर रूस तांई राजस्थानी की भासाई रंगत का दरसाव होवै छै। जीं राजस्थानी की महताऊ पोथ्यां सूं राष्ट्रभासा हिन्दी की थरपना मानी ज्यावै छै अबार भी जीं राजस्थानी में मांडबा हाळां की एक पूरी पांत छै। जे ऊ ही राजस्थानी आपणी मानता सूं बरज दी ज्यावै तो ओछोपण भासा को न्हं, मानता देबा हाळां को साबित होवै छै।
एक मसलो हमेस राजस्थानी की मानता के आड़े फरै छै। नरा लोग क्है छै के राजस्थानी में एकरूपता कोय न्हं अर मानता देती बग़तां कश्या रूप नै मानता द्यां! यो सवाल जबर हो ज्यावै छै। यो सवाल खड़्यो करबा हाळा स्यात् भासान् का चरित्तर न्हं पहचाणै। संसार की सगळी सामरथवान भासान् का घणकरा रूप चलन में होवै छै। न्हं अंग्रेजी ईं को अपवाद छै। नाळी-नाळी बोलियां अर उपबोलियां तो भासा को प्राणतत्त्व होवै छै। कांईं बिहार में बापरबा हाळी हिन्दी अर मुंबई में बोली जाबा हाळी हिन्दी एक स्यारकी छै।
म्हूं मानूं छूं के एकरूपता की दीठ सूं महताऊ जतन बग़त की दरकार छै। पण ये एकरूपता पोथियां के पांण अर बुद्धिजीवियां के बेई ही हो सकै छै। लोक में जीवती रहबा हाळी भासावां अर बोलियां लोकचलन की गति-गैल सूं ही चालै छै। राजस्थानी की मानता के आड़े एकरूपता को मसलो रळकाबा हाळा अर 'कशी राजस्थानी' को सवाल खड़ो करबा हाळा भी ईं सांच ने प्हैचाणै छै। पण ज्यां को मकसद ई कुचमाद करबो होवै, वां ने गाल बजाबा सूं कुण बरज सकै छै?
न्हं तो आप बताओ, यो सवाल ऊं बगत खड़ो क्यूं न्हं होयो जीं बग़त केन्द्रीय साहित्य अकादेमी ने भारत की मोकळी भासान् के लारै राजस्थानी भासा पे भी सालीणो ईनाम देबो सरू कर्यो? पच्चीस बरस सूं राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी, बीकानेर में काम कर रही छै अर कशी राजस्थानी को सवाल न्हं उठ्यो। पाठ्यक्रमां में राजस्थानीपढ़ाई ज्यावै छै अर वां में सगळा राजस्थान का रचनाकारां की रचनावां छै तो फेर कशी राजस्थानी को सवाल कठी सूं उठ्यो? पच्चीस बरस की आपणी कवि-सम्मेलनी जातरा में म्हंनै पायो छै के राजस्थानी का नरा लाडेसर अर मानीता कवि राजस्थान में ही न्हं राजस्थान सूं बारे भी चाव सूं सुण्या अर गुण्या जावै छै। फेर 'कशी राजस्थानी' को सवाल फगत कुचमाद कोय न्हं तो कांई छै?
नाळा-नाळा रूपां में बापरबा जाबा हाळी राजस्थानी आपणां प्राणतत्त्व में एक छै। ईं बात को एक बड़ो प्रमाण तो यो ही छै के ईं बेर विधानसभा का प्हैला सत्र में विधायक पद की शपथ राजस्थानी में लेबा की मांग करबा हाळा जनप्रतिनिधि राजस्थान का सगळा अंचलां सूं जीत'र विधानसभा में पूग्या छै। राजस्थानी भासा की बोलियां अर उपबोलियां तो गंगा की अशी धारां की नांई छै, जे देस का नाळा-नाळा हिसान् सूं माटी की सौरम समेट गंगा में खमावै छै अर ऊं ईं पापधोवणी बणावै छै।
आज रो औखांणो
मां री गाळियां, घी री नाळियां।
मां की गालियां, घी की नालियां।
मां ललकारती-फटकारती है तो संतान के भले की खातिर। उसके मन में दूर-दूर तक कोई दुर्भावना नहीं रहती। मां की गालियां ममता का ही दूसरा रूप है।

अतुल कनक रो जलम १६ फरवरी १९६७ नै रामगंज मंडी (कोटा) में हुयो। राजस्थानी रा चावा-ठावा मंचीय कवि। तीन पोथ्यां छपी। राजस्थानी, हिन्दी अर अंग्रेजी मांय सात हजार सूं बेसी रचनावां पत्र-पत्रिकावां में छपी। आकाशवाणी अर दूरदर्शन सारू मोकळो लेखन। हाड़ौती राजस्थानी भासा री घणी प्यारी बोली। आपरी भासा में हाड़ौती बोली री सांगोपांग रळक आवै। आओ, आज आं रै इण लेख में आपणी भासा री हाड़ौती बोली रो स्वाद चाखां।
प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका।

मसखरी

Rao GumanSingh Guman singh


गांव में एक लुगाई बुहारी निकाळ रैयी थी। चौक में उण रो धणी बैठ्यो थो। बा बुहारी काडती-काडती उणरै कनै आई तो बोली, 'परै सी सरकियो।'
आदमी उठकै पौळी में आगो। लुगाई भी बुहारी काडती-काडती पौळी में आगी और धणी नै बोली, 'आगै नै सरकियो दिखां।'
आदमी बारलै चौक में आगो। थोड़ी ताळ पछै बठै भी आगै सरकणै की बात कैयी। बो उठकै घरां रै बारणै दरूजै पर आगो अर चबूतरै पर बैठगो। लुगाई बुहारती-बुहारती घरां कै बारै आई तो पति नै बोली, 'सरकियो दिखां।'
आदमी आखतो होय'र मुंबई चल्यो गयो। बठै सूं चिट्ठी लिखी- 'अब भी तेरै अड़ूं हूं कै और आगै सरकूं? आगै समंदर है, देख लिए।'

आज रो औखांणो
संपत हुवै तो घर, नींतर भलो परदेस।
प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी, परलीका। 

तालरिया मगरिया रे मोरू बाई लारे रया

Rao GumanSingh Guman singh


तालरिया मगरिया रे मोरू बाई लारे रया

आयो रे धोरां वाळो देश बीरो बिण्जारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

बीरो बिण्जारो रे यो म्हाने लागे प्यारो रे

आयो रे धोरां वालो देश बीरो बिण्जारो रे

आयो रे धोरां वालो देश बीरो बिण्जारो रे


कुण थाने बोल्या रे मोरू बाई बोलणा

कुण तो दिनी झिणी गाळ बीरो बिण्जारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

आयो रे धोरां वाळो देश बीरो बिण्जारो रे

आयो रे धोरां वालो देश बीरो बिण्जारो रे


सासूजी बोल्या रे मोरू बाई ने बोलणा

नळदल तो दिनी झिणी गाळ बीरो बिण्जारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

बीरो बिण्जारो रे मोरू ने लागे प्यारो रे

आयो रे धोरा वाळो देश बीरो बिण्जारो रे

आयो रे धोरा वाळो देश बीरो बिण्जारो रे


एक बार आओजी जवाईजी पावणा

Rao GumanSingh Guman singh

एक बार आओजी जवाईजी पावणा
थाने सासूजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना
सासूजी ने मालुम होवे म्हारे भाई आज होयो
म्हारे घरे से मौक्ळो काम सासूजी मने माफ़ करो...
एक बार आओजी जवाईजी पावणा......
थाने सुसराजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना
सुसराजी ने मालूम होवे बाप म्हारो सेहर गयो
म्हारे घर से लारलो काम
सुसराजी मने माफ़ करो
एक बार आओजी जवाईजी पावणा......
थाने साळीजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना
साळीजी ने मालुम होवे साढुजी ने भेजू हूँ
म्हारा साढुजी नाचेला सारी रात
साळीजी मने माफ़ करो
एक बार आओजी जवाईजी पावणा......
थाने बुवाजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना
बुवाजी ने मालुम होवे म्हारे भी बुवाजी आया
बुवासासुजी ने जोडू लंबा हाथ बुवाजी मने माफ़ करो
एक बार आओजी जवाईजी पावणा......
थाने लाडीजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना
लाडीजी बुलावे तो लाडोजी भी आवे है
मैं तो जाऊंला सासरिये आज साथिङा मने माफ़ करो
एक बार आओजी जवाईजी पावणा...........
थाने सासूजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना....
थाने सुसराजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना...
थाने साळीजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना....
थाने बुवाजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना...
थाने लाडीजी बुलावे घर आव जवाई लाड्कना...

Rao gumansingh. Pushkar

Rao GumanSingh Guman singh


P A P U. Pushkar
Originally uploaded by Claude Renault
already posted a picture from Papu. She has been on the front page of so many magazines...
The Gypsies, Roma, the ethnic minority who brought to the West the spark of a vibrant culture, left the Indian subcontinent about a thousand years ago embarking on a migration that scattered them all over the world. The culture they left behind remained unscathed throughout the centuries,isolated within the barriers of their hostile habitat: the Thar Desert of Rajasthan

Canon EOS 3. Fuji velvia, canon EF 28/70mm f:2,8

This is taken during the 2001 Pushkar Mela, the famous camel fair. A lot of those Women have beautiful green eyes.