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गाज्यो-गाज्यो जेठ-असाढ कंवर तेजा रे!

Rao GumanSingh Guman singh

तेजोजी राजस्थान रा घणा चावा लोकदेवता। जकां री लोकगाथा एक लाम्बै गीत रै रूप में गाइज्यै।

इण गाथा नै'तेजो' कैइज्यै। तेजो अठै रा हाळी गावै। इण वास्तै गीत खेतीखड़ां अर हाळियां रो बाजै।
गाथा मुजब ग्यारवींसताब्दी में मारवाड़ रै नागाणै देस रै नागौर परगनै खरनाळ गांव में धोळिया जाट वंशज
सरदार मोहितराव राजकरता। मोहितराव रै बेटै थिरराव रै छठै बेटै रै रूप में संवत 1010 री भादवा सुद दसम
नै तेजोजी जलम्या।मोहितराव खुद खरनाळ रा शासक होवता थकां आपरो घरू करसाणी काम खुद करता
अनै आपरै बेटा-पोतां सूंकरवाता। तेजोजी भी हाळी हा। कर्नल टॉड रै मुजब जाट एक जूझारू कौम है जकै
खेती रै साथै-साथै आपरी वीरता राप्रमाण दिया है। तेजो एक ड़ो चरितर है जको बहादुरी रै कारण मरुभोम
रो लोकनायक अर पछै लोकदेवताबणग्यो। वीर, सच्चो, सीधो अर भोळो हुवै। बो चालतो भोभर में पग देद्यै।
पराई लाय में कूद पड़ै। सांच नै पारलंघावण सारू उधारी लेयल्यै। सांच रै पाणै में लाठी लेय' कूद पड़ै।
अर सुभ काम में बो मौको-बेमौको,नफो-नुकसान, जगां-बेजगां अर वेळा-कुवेळा कोनी देखै।
साच री जीत सारू जूझणो वो आपरो धेय मानै। क्यूँकै वीररी फितरत में खुद रो उजाड़' दूजां रो बसावण री
खासियत हुवै। कैबा है कै कायरां सूं जुग बसै पण जोधां री तो गाथा चालै। इसो एक जोधो हो तेजो, जको लावण
तो गयो आपरी नुंवी-नकोर बीनणी, जकी बरसां सूं उणरी बाट जोवैही अर बीड़ो चाब बैठ्यो लाछां गूजरी रो।
जकी री गायां नै गुवाळियां सूं झांप' धाड़वी ले ज्यांवता। लाछां गळगळीहोय' इमदाद मांगी। पछै देर क्यांरी!
जोम अर जोस सूं तेजै रा गाबा फाटण लागग्या। गायां री वार चढ्यो।देखतां-देखतां खांडो लेय' धाड़वियां में कूद
पड़्यो। सैंकड़ूं डाकुआं रा रुंड-मुंड उडाय' गायां नै आजाद कराई। पणघायल इसो हुयो कै तिंवाळो खाय' जमीं पर
पड़ग्यो अर सदां-सदां सारू मरुभोम रै कण-कण में रळग्यो। सुरीली रागबण' हाळियां रै कंठां बसग्यो।
जठै बसणो चइयै हो बठै बसग्यो। हां, बहादुरां रा घर तो दो जिग्यां हुवै। का कंठां में,का दिलां में। दूहो है-
बसणो दो'रो है दिलां, बसणो सो'रो चांद।
जे सुख चावै बास में, तो दिलां टापरो बांध।।

लोगां रै दिलां में बसणो सै सूं अबखो काम। पण तेजो बसग्यो। बो जमीं पर घर नीं बसा सक्यो। जमीं पर घर तो कायर बसावै। तेजो आपरी अखन कंवारी अर अबोट बीनणी नै चिता पर बिठाय'र साथै ई लेयग्यो। पण जद जेठ उतरै। असाढ लागै। पैली बिरखा रै साथै ऊंट रै राखड़ी बांध किरसो हळोतियै रो पैलो खूड ल्यावै। तो तेजो आपरी जोड़ायत रो हाथ थाम हवळै-हवळै आभै सूं खेतां में आय ऊतरै। हाळियां रै कंठां सूं राग बण निसरै-

गाज्यो-गाज्यो जेठ-असाढ कंवर तेजा रे!
लागतो ई गाज्यो है सावण-भादवो
धरती रो मंडाण मेह कंवर तेजा रे!
आभै री मांडण चमकै बीजळी
सुतो सुख भर नींद कंवर तेजा रे।
थारोड़ा साईनां बीजै बाजरो.....

ओ एक लांबो गीत है जकै में तेजै री छोटै रूप में गाथा है। आ गाथा भोत ई रोमांचक लोक सुर में गाईजी है। बियां ई लोकगीत में भोत ताकत हुवै। लोकगीत धरती रा प्राण हुवै। कुदरत नै देखण री आंख हुवै लोकगीत। प्रकृति जद गीतां में ढळै तो उणरो नुंवै सिरै सूं रचाव हुवै। गीत ई कुदरत में रस भरै। उण नै मीठी बणावै। अर गीत ई उणनै फुटरापो देय'र देखणजोग बणावै। इण अरथ में जद तेजो किरसाणां रै कंठां ढळै तो खेत संगीतमय बणज्यै। रेत रो कण-कण गांवतो-सो लखावै।

आज रो औखांणो

जरणी जणै तो रतन जण, कै दाता कै सूर।
नींतर रहजै बांझड़ी, मती गमाजै नूर।।

-रामस्वरूप किसान

मरुधर महिमा मोकळी,वरणन करी न जाय

Rao GumanSingh Guman singh

राजस्थानी भाषा बातां री धिरयाणी। बातां में बातां। पण बातां में तंत। तंत बी इत्तो कै अंत नीं। बोल्यां मूंडै मिठास। अंगेज्यां उच्छाब। अर बपरायां हिमळास। पण बोलण में सावचेती री दरकार। दुनिया में राजस्थानी ई ऐड़ी भाषा जकी में हरेक क्रिया सारू निरवाळा सबद। संज्ञावां रा न्यारा विशेषण। क्रिया अर संज्ञा सबदां री आपरी कांण। आ कांण राख्यां ई सरै। नींस अरथ रो अनरथ होय जावै।
राजस्थानी भाषा में फूल नै पुहुप कैइजै। जे आप कैवो कै म्हैं फूल ल्यायो हूं। तो बडेरो मिनख टोकसी कै फूल ल्या बडेरां रा। ओ तो पुहुप का पुस्ब है। पटाखो फूटै नीं, छूटै। बंदूक बी चालै नीं, छूटै। भांडा साफ नीं करीजै, मांजीजै। फूस बुहारीजै अर झाड़ू काढीजै। मोती चमकै नीं, पळकै। ढोल ढमकै। बाजा बाजै। बंदोरो कढै नीं, नीसरै। विदाई नीं, सीख दिरीजै का लिरीजै। नेग दिरीजै-लिरीजै।
जिनावरां री बोली रा बी सबद न्यारा-न्यारा। डेडर डर-डर। चीड़ी चीं-चीं का चींचाट करै। कागलो कांव-कांव। घोड़ो हींसै। गा ढांकै। गोधो दड़ूकै। ऊंठ आरड़ै-गरळावै। भैंस रिड़कै। गधियो भूंकै। कुत्तो भूंसै। सांढ झेरावै। बकरियो बोकै।
जिनावरां रै बच्चियां रा नांव भी निरवाळा। कुत्तै रो कुकरियो, हूचरियो का कूरियो। सांढ रो टोडियो-तोडियो। भैंस रो पाडियो। भेड रो उरणियो। गा रो बछड़ियो, टोगड़ियो, लवारियो, केरड़ो। आं रा स्त्रीलिंग- कूरड़ी-हुचरड़ी, टोडकी-तोडकी, पाडकी, बछड़ती। डांगरां रा नांव ओज्यूं है। गा-बैडकी। भैंस-पाडी, झोटी। सांढ-टोरड़ी। घोड़ी-बछेरी।
पसुवां रै गरभ धारण करण रा बी पाखती नांव। भेड तुईजै। सांढ लखाइजै। गा हरी होवै। धीणै होवै, दूध रळै, नूंई होवै, कामल होवै, साखीजै, गोधै रळाइजै, गोधै भेळी करीजै। भैंस गड़ीजै। पाडो छोडीजै। पाळै आवै। घोड़ी ठाण देवै। आं नै काबू करण रा नांव भी न्यारा-न्यारा तरीका, न्यारा-न्यारा नांव। गा रै नाजणो-न्याणो। भैंस रै पैंखड़ो। घोड़ी रै लंगर। ऊंठ रै नोळ बीडणी। घोड़ी रै नेवर। बळधां रै दावणा देईजै।
राजस्थानी में उच्छबां रा। तीज-तिंवारां रा। मेळां-मगरियां रा। रीत-परम्परा सारू आपरा सबद। बनड़ो गाइजै। जल्लो गाइजै। चंवरी मंडै। हथळेवो जु़डै। घोड़ो घेरीजै। बारणो रोकीजै। सामेळो-समठूणी करीजै। तागा तोड़ीजै। पागा पूजीजै। ढूंढ माथै तेड़ीजै। जच्चा गाइजै। भाषा भाखीजै। कूंत करीजै। झाळ अर तिरवाळा आवै। होळी मंगळाइजै। बीनणी बधारीजै। कूं-कूं चिरचीजै। धोक लगाइजै। पगां पड़ीजै। जात लगाइजै। फेरी देइजै। झड़ूलो उतारीजै। चेजो चिणाइजै। माल-बस्त मोलाइजै। गांवतरो करीजै। खळो काढीजै। रळी आवै। चे़डा आवै। भूत बड़ै। बायरियो बाजै। पून चालै आंधी आवै।
इण बात माथै बांचो धोंकळसिंह चरला रो ओ दूहो-
                                             धन धोरा धन धोळिया, धन मरुधर माय।
                                          मरुधर महिमा मोकळी, वरणन करी न जाय।।


                                                            आज रो औखांणो

                                            मीठो बोल्यां मन बधै, मोसौ मार्यां बैर।

                                      मीठा बोलने से मन बढ़ता है, ताना मारने से बैर।


-ओम पुरोहित 'कागद' आपणी भाषा-आपणी बात
तारीख-//2009

पातळ अर पीथळ- कन्हैयालाल सेठिया (२७ मई, महाराणा प्रताप जयंती पर खास)

Rao GumanSingh Guman singh


राजस्थानी रा सिरै नांव कवि अर मनीषी कन्हैयालाल सेठिया री 'पातळ अर पीथळ' नामी अर चावी कविता है। आ कविता १९४२ में लिखीजी। उण वगत अंग्रेजां रो राज हो अर गांधीजी री पुकार 'करो या मरो' रै साथै देस रा सगळा नेतावां नै जेळ में ठूंस दिया हा अर जनता में घणी उदासी अर निरासा फैलगी ही। उण संदर्भ नै ध्यान में राख'र देस री जनता नै चेतावण सारू सेठिया आजादी रै रखवाळै महाराणा प्रताप रै इण इतियास कथा-प्रसंग नै लेय'र आ कविता लिखी। आ कविता इत्ती चावी बणी कै राजस्थानी रा लूंठा विद्वान प्रो. नरोत्तमदास स्वामी इणरी दस हजार प्रतियां छपवा'र आखै राजपूतानै री रियासतां में भिजवाई।
रावत सारस्वत इण कविता रो अंग्रेजी अनुवाद ही करियो। 'पातळ-पीथळ' राजस्थानी भोम रै स्वाभिमान, गौरव, अठै री मान-सम्मान अर वीरता री भावना नै सांगोपांग ढंग सूं प्रगटै। इण ओजस्वी रचना में आपणी संस्क्रति री मरजादा अर माठ-मरोड़ री भावना छिप्योड़ी है। आ रचना राजस्थानी री घणी चावी अर अमर रचना है।

पातळ'र पीथळ

अरै घास री रोटी ही जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो।
नान्हो सो अमरयो चीख पड़्यो राणा रो सोयो दुख जाग्यो।
हूं लड़्यो घणो हूं सह्यो घणो
मेवाड़ी मान बचावण नै
हूं पाछ नहीं राखी रण में
बैरयाँ री खात खिंडावण में,
जद याद करूं हळदी घाटी नैणां में रगत उतर आवै,
सुख दुख रो साथी चेतकड़ो सूती सी हूक जगा ज्यावै,
पण आज बिलखतो देखूं हूं
जद राज कंवर नै रोटी नै,
तो क्षात्र-धरम नै भूलूं हूं
भूलूं हिंदवाणी चोटी नै
मै'लां में छप्पन भोग जका मनवार बिनां करता कोनी,
सोनै री थाळ्यां नीलम रै बाजोट बिनां धरता कोनी,
 हाय जका करता पगल्या
फूलां री कंवळी सेजां पर,
बै आज रुळै भूखा तिसिया
हिंदवाणै सूरज रा टाबर,
आ सोच हुई दो टूक तड़क राणा री भीम बजर छाती,
आंख्यां में आंसू भर बोल्या मैं लिखस्यूं अकबर नै पाती,
पण लिखूं कियां जद देखै है आडावळ ऊंचो हियो लियां,
चितौड़ खड़्यो है मगरां में विकराळ भूत सी लियां छियां,
मैं झुकूं कियां? है आण मनैं
कुळ रा केसरिया बानां री,
मैं बुझूं कियां हूं सेस लपट
आजादी रै परवानां री,
पण फेर अमर री सुण बुसक्यां राणा रो हिवड़ो भर आयो,
मैं मानूं हूं दिल्लीस तनैं समराट् सनेशो कैवायो।
राणा रो कागद बांच हुयो अकबर रो' सपनूं सो सांचो,
पण नैण करयो बिसवास नहीं जद बांच बांच नै फिर बांच्यो,
कै आज हिंमाळो पिघळ बह्यो
कै आज हुयो सूरज सीतळ,
कै आज सेस रो सिर डोल्यो
आ सोच हुयो समराट् विकळ,
बस दूत इसारो पा भाज्यो पीथळ नै तुरत बुलावण नै,
किरणां रो पीथळ आ पूग्यो ओ सांचो भरम मिटावण नै,
बीं वीर बांकुड़ै पीथळ नै
रजपूती गौरव भारी हो,
बो क्षात्र धरम रो नेमी हो
राणा रो प्रेम पुजारी हो,
बैरयाँ रै मन रो कांटो हो बीकाणूं पूत खरारो हो,
राठौड़ रणां में रातो हो बस सागी तेज दुधारो हो,
आ बात पातस्या जाणै हो
घावां पर लूण लगावण नै,
पीथळ नै तुरत बुलायो हो
राणा री हार बंचावण नै,
म्हे बांध लियो है पीथळ सुण पिंजरै में जंगळी शेर पकड़,
ओ देख हाथ रो कागद है तूं देखां फिरसी कियां अकड़?
मर डूब चळू भर पाणी में
बस झूठा गाल बजावै हो,
पण टूट गयो बीं राणा रो
तूं भाट बण्यो बिड़दावै हो,
मैं आज पातस्या धरती रो मेवाड़ी पाग पगां में है,
अब बता मनै किण रजवट रै रजपूती खून रगां में है?
जद पीथळ कागद ले देखी
राणा री सागी सैनाणी,
नीचै स्यूं धरती खसक गई
आंख्यां में आयो भर पाणी,
पण फेर कही ततकाल संभळ आ बात सफा ही झूठी है,
राणा री पाघ सदा ऊंची राणा री आण अटूटी है।
ल्यो हुकम हुवै तो लिख पूछूं
राणा नै कागद रै खातर,
लै पूछ भलांई पीथळ तूं
आ बात सही, बोल्यो अकबर,

म्हे आज सुणी है नाहरियो
स्याळां रै सागै सोवैलो,
म्हे आज सुणी है सूरजड़ो
बादळ री ओटां खोवैलो,

म्हे आज सुणी है चातगड़ो
धरती रो पाणी पीवैलो,
म्हे आज सुणी है हाथीड़ो
कूकर री जूणां जीवैलो,

म्हे आज सुणी है थकां खसम
अब रांड हुवैली रजपूती,
म्हे आज सुणी है म्यानां में
तरवार रवैली अब सूती,
तो म्हांरो हिवड़ो कांपै है मूंछ्यां री मोड़ मरोड़ गई,
पीथळ राणा नै लिख भेज्यो, आ बात कठै तक गिणां सही?

पीथळ रा आखर पढ़तां ही
राणा री आंख्यां लाल हुई,
धिक्कार मनै हूं कायर हूं
नाहर री एक दकाल हुई,

हूं भूख मरूं हूं प्यास मरूं
मेवाड़ धरा आजाद रवै
हूं घोर उजाड़ां में भटकूं
पण मन में मां री याद रवै,
हूं रजपूतण रो जायो हूं रजपूती करज चुकाऊंला,
ओ सीस पड़ै पण पाघ नहीं दिल्ली रो मान झुकाऊंला,
पीथळ के खिमता बादळ री
जो रोकै सूर उगाळी नै,
सिंघां री हाथळ सह लेवै
बा कूख मिली कद स्याळी नै?

धरती रो पाणी पिवै इसी
चातग री चूंच बणी कोनी,
कूकर री जूणां जिवै इसी
हाथी री बात सुणी कोनी,

आं हाथां में तरवार थकां
कुण रांड कवै है रजपूती?
म्यानां रै बदळै बैरयाँ री
छात्यां में रैवैली सूती,
मेवाड़ धधकतो अंगारो आंध्यां में चमचम चमकैलो,
कड़खै री उठती तानां पर पग पग पर खांडो खड़कैलो,
राखो थे मूंछ्यां ऐंठ्योड़ी
लोही री नदी बहा द्यूंला,
हूं अथक लड़ूंला अकबर स्यूं
उजड़्यो मेवाड़ बसा द्यूंला,
जद राणा रो संदेश गयो पीथळ री छाती दूणी ही,
हिंदवाणों सूरज चमकै हो अकबर री दुनियां सूनी ही।

पातळ=प्रताप। पीथळ=कवि पृथ्वीराज राठौड़ जका महाराणा प्रताप रा साथी अर अकबर रै दरबार रा नवरतनां में सूं एक हा। अमरयो=महाराणा प्रताप रो बेटो अमरसिंह। चेतकड़ो=राणा प्रताप रो घोड़ो। बाजोट=जीमण सारू बणी काठ री चौकी। आडावळ=अरावली। पण=प्रण। कूकर=कुत्तो। कड़खो=विजयगान।

मतीरा

Rao GumanSingh Guman singh

मरू मायड़ रा मिसरी मधरा 
मीठा गटक मतीरा।

सोनै जिसड़ी रेतड़ली पर
जाणै पन्ना जड़िया, 
चुरा
 सुरग स्यूं अठै मेलग्यो 
कुण इमरत रा घड़िया?


आं अणमोलां आगै लुकग्या 
लाजां
 मरता हीरा।
 
मरू
 मायड़ रा मिसरी मधरा
 
मीठा गटक मतीरा।


कामधेणु रा थण ही धरती
आं में दूया जाणै,
कलप बिरख रै फळ पर स्यावै
निलजो सुरग धिंगाणै।*

लीलो कापो गिरी गुलाबी
इंद्र  सा लीरा। 
मरू मायड़ रा मिसरी मधरा
 
मीठा गटक मतीरा।


कुचर कुचर नै खपरी पीवो
गंगाजळ सो पांणी,
तिस तो कांईं चीज, भूख नै
ईं री घूंट भजाणी,

हरि-रस हूंतो फीको,
ओ रस, 
जे पी लेती मीरां! 
मरू
 मायड़ रा मिसरी मधरा
 
मीठा
 गटक मतीरा।

*कलप वृक्ष के फल पर स्वर्ग तो बेवजह ही गर्व करता है, इससे कहीं बेहतर फल तो मतीरा है जो धोरों में पैदा होता है।

आज रो औखांणो

मतीरा तो मौसम रा ई मीठा लागै।
अवसर के अनुकूल ही बात सुहानी लगती है।
आपरी सेवा मांय लाया है :
मरुवाणी संघ

What is RAJASTHAN in INDIA

Rao GumanSingh Guman singh

भारत मांय विलय रै पछै राजस्थान नै हर जगा निचै माथौ करणौ पड़ रह्‌यौ है. आज राजस्थांन री नूंवी पीढी लिखणी तौ दुर री बात है, राजस्थानी बोल ईं कोनी सकै है.

जकौ कोई बोले है, वै अगर एक जिल्ला सूं दूजै जिल्ला मांय जाय तौ बोलै आ राजस्थानी तौ दूजी है अर हिंदी मांय बात करै.

मान्यता नीं मिलण सूं राजस्थांनी रा सबद कोश मांय हिंदी सबदां री भरमार हुवती जाय रह्‌यी है.

आज भारत सरकार सामै भीख मांगण री कोई जरुरत कोनीं. आपां राजस्थांनी भारत सरकार नै देवौ हौ, अर बदळी मांय भारत आपां नै कांई देवै है ??? हरि रा नांव ....!

सीमा उपर मरवा वाळा फक्त अर फक्त राजस्थांनी निजर आवै, देश रै आर्थीक विकास मांय राजस्थांनीयां रौ घणौ मोटो जोगदान है. अर इण री बदळी मांय औ दिल्ली दरबार आपां नै आपणै राजस्थांन मांय इज राजस्थांनी बोलण सूं रौकै है. एड़ौ जुलम तौ मुगलां अर अंग्रेजां रै टाईम इ नीं हुयौ. मुगल बादशाह जद राजपुतानै रै कोई राजा नै कागद लिखता हा तौ वै राजस्थांनी भासा रौ प्रयोग करता हा अर जद राजस्थान रौ कोइ राजा मुगलां नै कागद लिखतौ तौ ई भासा राजस्थांनी हुवती.

अंगरेजा रै राज मांय ईं रजवाड़ा री राजभासा राजस्थांनी ही.

इब सगळी बात रौ सारांश अर लारला 60 बरस भारत रै सागै काढ’र औ नतीजौ निकळै कै भारत मांय राजस्थांन रौ विलय आपणी सबसूं बड़ी भुल ही, आ भारत सरकार आपणा मिनखां नै, आपणां विधायकां नै आपणै राजस्थांन मांय इज आपणी मायड़भासा राजस्थांनी नीं बोलण देवती. इण भारत सरकार रौ बस चालै तौ आ आपणै घरां मांय ईं हिंदी भासा अनिवार्य कर देवै, हाल तौ पोसाळां मांय राजस्थांनी बोलण पर जुर्मानौ लागै है.

सौ बात री एक बात, भीख मांगणी तौ करौ बंद. हक मांगौ... अर आपणौ हक नीं दे सकै तौ आजादी मांगौ.... स्वतंत्र राजस्थांन...

आपणां राजस्थांनी भाईया नै भारत सरकार री फौजां मांय जावण सूं ना पाड़ौ अर अगर देस सेवा री भावना मन मांय हुवै तौ मायड़भोम राजस्थांन री सेवा करै.

जै राजस्थांन!  जै राजस्थांनी!!

ढूंढ तो करावो थांरै मौबी बेटा री--प्रो. जहूरखां मेहर

Rao GumanSingh Guman singh

बीजी जागां तो सोळा संस्कार पण राजस्थान में होळी सूं जुड़ियो थको सतरवों संस्कार भी मौजूद। ढूंढ संस्कार। ढूंढ होळी नै घणै ई लाडां-कोडां लडाईजण री साख भरै। किणी टाबर रै जलम्यां पछै पैली होळी आवै जद ढूंढ करीजै। इण वेळा टाबर रै झांझरिया घड़ावै। टाबर री मां रै वेस सिड़ावै। ढूंढ करण सारू न्यात-बास रा लोग फागण गावता टाबर रै घरै पूगै। टाबर रो काको क गवाड़ रो कोई मोटियार बारणै बिचाळै बाजोट ढाळै। बाजोट रा दो पागा फिळै रै मांय अर दो बारै राखै। उण माथै खुद बैठै। टाबर नै बो आपरै खोळै में सुवावै। आवण वाळा गैरियां मांय सूं दो जणा आगै आवै। टाबर रै ऊपर आडी लाठी ताण देवै। बाकी रा गैरिया आप-आप री लकड़ियां सूं बीं लाठी पर वार करै। तड़ातड़-तड़ातड़ बाजती जावै। सगळा गावण लागै-
चंग म्हारो गैरो बाजै
खाल बाजै घेटा री
ढूंढ तो करावो थांरै मौबी बेटा री
म्हांनै खाजा दो क हां रे खाजा दो।
ताळ तड़ातड़-भड़ाभड़ करियां पछै गैरियां री अगवाई करतो व्है जको टाबर रो लाड करै। उणनै हजारी उमर री आसीस देवै। इण पछै टाबर रै घर रो बडेरो गैरियां नै आपरी सरधा मुजब गुळ, खाजा, टक्का अर मिठाई देवै। कठैई बामण एकलो घर में जाय अर सगळी रीत सूं एकलो ई निवड़लै। बीजा गैरिया फिळै रै बारै ई ऊभा रैवै। ओ ढूंढ संस्कार। ढूंढ सूं जुड़ियोड़ो एक औखांणो ई चावो। एक होळी रा ढूंढियोड़ा। कोई साईनो अणूंती डींगां हांकै अर हेकड़ी पादै जद कहीजै क भाई क्यूं घसकां धरै, हां तो आपां एक ई होळी रा ढूंढियोड़ा।
आज रो औखांणो
फरड़ियो अर गवूं करड़ियो।

(फागुन का रुख बदला और गेहूं पका।)

मौसम आने पर प्रत्येक वनस्पति फलती है, पकती है। फागुन में गेहूं ही या पुरुषों की उत्तेजना भी पकने लगती है।
प्रस्तुति : सत्यनारायण सोनी अर विनोद स्वामी,

परलीका,वाया-गोगामे़डी, जिलो- हनुमानगढ़ -335504.कानांबाती-9602412124, 9829176391
कोरियर री डाक इण ठिकाणै भेजो सा!सत्यनारायण सोनी, द्वारा- बरवाळी ज्वेलर्स, जाजू मंदिर, नोहर-335523


राजस्थानी रा लिखारां सूं अरज- आप भी आपरा आलेख इण स्तम्भ सारू भेजो सा!

जैता चीबा री ख्यात

Rao GumanSingh Guman singh


सोमाहर तिळक सींचतो साबळ,
करतो खग दांती कहर।
रिण रोहियो घणो राठोड़ै,
चीबोळ एकलवा वर ।।१।।
भाजै छांळ खरडक़ै भाला,
पड़ै न पिंड देतो पसर।
एकल जैत सलख आहेडी,
सकै न पाड़ै भड़ सिहर।।२।।
ऊपाडिय़ै लूट आधंतर,
जण-जण पूगो लुवो- जुवो।
खींवर हा कलियो खीमावत,
होकर जाड़ विहाड़ हुवो।।३।।

(देवड़ा राजपूतों की चीबा शाखा के जैता के संबंध का यह डींगळ काव्य एक प्रसिद्ध छंद है। भावार्थः- वाराह की भांति सोमा देवडा के वंश में तिलक रुप जैता चीबा को कई राठौडौ ने घेर लिया है। जैता अपने खड़ग से कहर मचाता हुआ व भाले से रक्त सिंचता हुआ युद्घ कर रहा है। जैता की युद कलाऒ पर कवि ने उत्तम काव्य की रचना की है्।) दुरसा आढ़ा रचित्

सेवाड़ा- पातालेश्वर प्रताप

Rao GumanSingh Guman singh

 ऊंचों देवल अजब, झिलमिल दिपे जगत में।

पाहण आरस पाण, विश्वकर्मा री वगत में॥
देवल चिणायों देवता, पातालेश्वर प्रताप।
पत्थर-पत्थर प्रगटीयों, अनंत देवता आप॥
चौसठ जोगणी चहुं दिश, रूद्र सदा रखवाल।
विर बावन चौकी भरे, विनाश्यों किस विधकाल॥
काल तने प्रवाह ने, रोक सके नही कोय।
भव्यता भूमि पड़ी, देख समझ पशताय॥
पहाण-पहाण प्रतिमा, खण्ड़ीत पड़ी अब मौन।
वैभवता बिलख रही, कहो सम्भाले कौन॥
 सेवाड़ा में सदाशिव, पातालेश्वर भगवन्त।
देवल खंडि़त देखता, हीवड़ो रूदन करन्त॥
कुण्डलीयां
शिव पातालेश्वर शंभू, भोले शंकर भूप।
असुर की अरदास पर, साध मौन भयो चुप॥
साध मौन भयो चुप, देवगति जावे न जाणी।
ऊंचों शिखर आभ, भव्यता भूमि आणी॥
प्रतिमा 'मंछाराम पाषाण री, खण्डि़त चुन-चुन किव।
अकूत नुकसान सहे आप, शंभु पातालेश्वर शिव॥
(कवि मंछाराम परिहार रानीवाड़ा)
9414565791

भीत हुवा भड़ भड़भड़ै, रोद्रित कर गज रीत

Rao GumanSingh Guman singh


छायळ फूल विछाय, वीसम तो वरजांगदे।

गैमर गोरी राय, तिण आंमास अड़ाविया।।
इसड़ै सै अहिनांण, चहुवांणो चौथे चलण।
डखडखती दीवांण, सुजड़ी आयो सोभड़ो।।
काला काळ कलास, सरस पलासां सोभड़ो।
वीकम सीहां वास, मांहि मसीतां मांडजै।।
हीमाळाउत हीज, सुजड़ी साही सोभड़े।
ढ़ील पहां रिमहां घड़ी, खखळ-बखळ की खीज।।
सोभड़ा सूअर सीत, दूछर ध्यावै ज्यां दिसी।
भीत हुवा भड़ भड़भड़ै, रोद्रित कर गज रीत।।
चोळ वदन चहुवांण, मिलक अढ़ारे मारिया।
सुजड़ी आयो सोभड़ो, डखडखती दीवांण।।
वणवीरोत वखांण, हीमाळावत मन हुवा।
त्रिजड़ी काढ़ेवा तणी, चलण दियै चहुवांण।।
सोभड़ै कियो सुगाळ, मुंहगौ एकण ताळ में।
खेतल वाहण खडख़ड़ै, चुडख़ै चामरियाळ।।
लोद्रां चीलू आंध, भागी सोह कोई भणै।
सोभ्रमड़ा सरग सात मै, बाबा तोरण बांध।।
(सांचोर मा संवत् १६९५ वात ह, मुगल पातसाह ने सांचोर में परेमखां को आधी जागीर इंणायत करीयोड़ी थी । उण टेम आधी जागीर सोभा चहुवांण रे कनै ही। गढ़ मा गाय ने मारण रे कारण दोयो मा जुद हुयौ। उणमां सोभे चहुवांणे परेमाखां ने मार भगायो। गाय रो आ परेम कविए ड़िंगळ भासा मा लिखर जतायो है।)

रावळ बापा री ख्यात:-

Rao GumanSingh Guman singh


आदि मूळ उतपति, ब्रहम पिण खत्री जांणां,

आणंदपुर सिणगार, नयर आहोर वखांणां।

दळ समूह राव रांण, मिळै मंडळीक महाभड़,

मिळै सबै भूपती, गरू गहलोत नरेसर।

एकल्ल मल्ल धू ज्युॅ अचळ, कहै राज बापै कीयौ,

एकलिंगदेव आहूठमां, राजपाठ इण पर दीयो।।१।।

छपन कोड सोवन्न, रिखी हारीत समप्पै,

सैंदेही श्रग गयौ, राय-रायां उथप्पै।

अंतरीख ले अमरत, सिद पिण आघो कीन्हो,

भयो हाथ दस देह, सस्त्र वजर मई सं दीन्हो।

आवध्ध अंग लगै नहीं, आदि देव इम वर दीयौ,

गुहादित तणै भैरव भणै, मेदपाट इण पर लीयौ।।२।।

हर हारीत पसाय, सात-वीसां वर तरणी,

मंगळवार अनेंक, चैत वद पंचम परणी।

चित्रकोट कैलास, आप वस परगह कीधौ,

मोरी दळ मारेव, राज रायां गुर लीधौ।

बारह लख बोहतर सहस, हय गय दळ पैदळ वणं,

नित मूडो मीठो ऊपडै, भंूजाई बापा तणै।।३।।

खडग़ धार पाहार, नित भॅयसा दुय भंजै,

करै आहार छ वार, ताम भोजन मन रंजै।

पट्टोळो पैतीस हाथ, पेहरण पहरीजै,

पिछोडो सोळे हाथ, तेण तन नहीं ढक़ीजै।

पय तोडर तोल पचास मण, खडग़ बत्तीसा मण तणौ,

सुण बापा सेन सम्मं चलै, जिण भय कांपै गज्जणौ।।४।।

जालन्धर कसमीर, सिंध सोरठ खुंरसांणी,

ओडिसा कनवज्ज, नगरथट्टा मूलतांणी।

कुंकण नै केदार, दीप सिंघळ मालेरी,

द्रावड सावड़ देस, आंण तिलॅंगांणह फेरी।

उतर दिखण पूरब पछिम, कोई पांण न दख्खवै,

सांवत एक एकाणवै, बापा समो न चक्कवै।।५।।

(मूथा नैणसी री ख्यात रै पांने सूं लियो)