एक सेठ रै घरै रात रै चोर घुस ग्यौ। सेठ-सेठाणी, सूता हां, पण चोर री खड़खड़ाहट सूं आंख खुलगी। चोर नै आयं देख, सेठ सौच्यौ, चोर रै कनै हथियार व्हियो तो मार नाखेला। सेठ डरपोक जरूर हो, पण बाणिया बुद्धि तो विरासत में ही मिल्या करै, सो वो आप री लुगाई सूं बातां लाग ग्यौ। केवण लाग्यों, नींद नी आ रेयी है, थनै म्हारै मन री बात केवूं, अबकै साल आपां रामसापीर रै धोक देवण पाळा जावांला। सेठाणी हुंकारौ भरियौ। उबासी खायनै वा पळकां उघाड़ी तौ उण नै चोर दिया ग्यो। जे हाकौ करै तो पाड़ोसियां सूं पैला चोर सुणै। पाड़ौसी आवै जद तक तौ चार मार जावै। दोनां रै टूंपौ दै दियौ तौ। सेठाणी समझ गी कै सेठ जी नै भी ठाह पड़ ग्यी है। वा भी बातां मंे लाग गी। घर री बातां चाल पड़ी। चोर सोच्यौ, सेठ-सेठाणी री बातां रै मांय जरूर काम री पत लागेला। वौ एक खंभे से लारै छिप नै बाता सुनण लाग्यौ। सेठजी कह्यौं, अरे भागवान, वै राया री दोनूं बोरिया आढ़ोड़ी साळ में सावळ राख्योड़ी तो है नी ? सेठाणी पड़ूतर दियो, म्हारै तौ सावचैते ई उतरग्यौ। ध्यान ई नीं रह्यौ, वै बोरियां तो बारलै चैक में हीं राख्योड़ी पड़ी है। सेठजी कह्यौं-थूं बावळी है, थने ठाह कोनी रायां रौ भाव चांदी सूं ईं ऊॅंचा चढ़ग्या है। दस रिपिया मण हो ग्या है। सेठाणी कह्यौं-थै नाराज क्यूं व्है रिया हौ, अबार आड़ोड़ी साळ में रखवा दूं ? सेठ थोड़ो ढीलो पड़यो, बोल्यो, अबै रात रा रैवण दे, दिनूगे देखालां। चोर बातां सुणी तौ घणौ राजी व्हिया। मन में सोच्यौ-अबै तौ रायां बजार में हीं मिलैला, यू सोच चोर रायां री दोनूं बोरिया उठायने ले ग्यौ। चोर उठां सी पार व्हिया तो सेठ अर सेठाणी री आंख्या लागी। दूजै दिन चोर रायां ले यर बजार में फिरियौं पण उण नेै दस रिपिया मण में रायां रा लैवाल कोनी मिल्या। चोर जांणियौ के बांणिया म्हनै लूटणी चावै। वो राया दूजी बोरियां में घाल र उण से ठ री दूकान पूग ग्यौ, जठै सूं चोरी करी ही। सेठ री दूकान चढ़ता हीं, सेठ चोर ने पेचाण लियौ। सेठ कह्यौं-बजार में आज राया रा भाव एक रिपियें मण रा है। चोर कह्यौ, काल तो लोग बाग रात नै रायां रा भाव चांदी जैड़ा बतावै हा। सेठ कह्यौ, अरे बावळा, राया भाव रातै वाळा तो रातै ही गया, अब दिन उग ग्यौ.......।
एक करसी हो। लगो-लग दो तीन बरसां सू काळ रे चालतां खेती में कीं आवक नहीं हो रेयी ही। घर रो चूलों चलावणों दौरौ हौग्यो हो। वौ उनाळू साख सारू चैथा वांटा में एक जमीनदार सूं बात करी अर, उण रो बेरौ बंटाई रे हिसाब सूं तै कर लियौ। वे बेरौ सितर हाथ ऊंडौ झेलवौ बेरौ हो। चार जोड़िया बिना वो ताबै आवणौ ही दोरो हौ। इण खातर करसो अेक सेठ कनै गयौ अर उणसूं सूद माथै करजो लियौ। उण रै मन में ही कै चैखी साख होवता हीं माथै सगळी फारगती कर दूं ला। पैले फटकारै ई पूरौ खातौ वाळण सारू करसौ सगळा जाव में वो मिरचा बोय दी। कैणा में तौ जमींदार रौ बांटौ चैथौ हो, पण वो बैजा तंग करण लागग्यौ। रोजीना री मांगा-तांगी में के आज फलांणजी रै मिरचा भेजणी, आज ढींकड़जी रै अर आज पूछडंजी रै, यूं कर नै सगळौ बांटौ आधा सूं ईं करणौ पड़ियौ। दूबळा नै सौ दोखा व्ळिया करै। जोग री बात, पछै मिरचा में रोग व्हैगौ, की दावा री झपट लागगी, कीं ठाकर री गिरै अर कीं भाव धापनै मोळौ रेगौ। करसौ तौ लेणा में साव कळग्यौ। भूंडै ढाळै पड़ग्यौ। कमायो कीं नीं, सूद ऊपर सूं। रिपिया में जोखौ राखणियौ, अैड़ौ भोळौ सेठ ई कोनीं हौ। करसा री च्यारूं जोड़िया, थोड़ौ घणौं गैणौ गांठौ, वित-मवेसी, कपड़ा-लत्ता, बरतन-बासण सूंकाम नीं सरियौ तौ सेठ करसा रै डील रा गाभा ई उतार दिया। पौतियौं अंगरखी अर पगरखियां धुराधुर खुलायली। फगत गोड़ा सूं अेक वेंत ऊंची फोटोड़ी झीर-झीर व्हियोड़ी धोती राखी। पण लैणौं नीं उतरियौ ? करसौ घणौ ई रोयौ, कळपियौ पण सेठजी अेक लाल-छदांम छोड़ण नै ई त्यार नीं हा। करसो घणी बेईज्जती अर कूटण रा डर सूं रात रा आप रो झंूपौं छौड़नै छानै छिपतौं मंदिर में जाय नै छिपग्यौ। जांणियौ झांझरकै पौर रात थकां उठा सूं ठेको देय ने निकळ जावूंला। जीव रौ उकारळियौड़ी वौ पारसनाथ जी री पूतळी रै लारै लुकग्यौ। अंधारा में पूतळी साव नागी-तड़ंग। पूतळी रा माथा माथै हाथ फेरनै वो होळै सूं ड़रतै ड़रतै कह्यौं, भाया, थूं दो बेरा करिया दीसै। म्हारै अेक फोटोड़ी धोतड़ी तौ है, थारै तो वा ई कोनी। भगवान भी मन रे मांय हंस नै रेय ग्या, करता भी काई, करसे रा भाग चितरगुप्त भी ऐड़ा हीं लिख्या हा।
एक सेठ रौ बेटौ ब्याव करनै सासरा सू पाछौ आवतौ हौ। बेटा रा सारा वाळा घणौ दायाजौ दियौ। बारात गाजां-बाजां रै सागै उठा सूं वहीर व्ही। अेक धाड़ैती उण बारात नै लूटण रौ मतौ करियौ। वौ छौटा-मोटी लूट करतौ हौ। वौ सौ मिनखा रौ जत्थौ बणायौ। मौका री घाटी देखनै वठै आपरौ मोरचै लगायौ। सेठ रै कानां में ईं इण बात री भणक पड़गी। बारात पांच सो मिनखा री ही। गांव जावण रौ मारग ई अेक इज हौ। बाराज दूजा मारग सूं नीं जा सके। जै धाड़ैती मारेचां लियां बैठा है तौ वे अक भी जणा नै जीवतौ नीं छोड़ैला। वै मन में सोच लियौ के औ ब्याव घणौं मूघौ पड़ैला। खून-खराबै सूं सुगन बिगड़ैला। बींदणी रै कीं व्हैगौ तौ मूंड़ौ दिखावण जोग ई नीं रैवैला। इण वगत अकल हीं काम आवैला। सेठजी विचार करण लागा। थौड़ी देर पछै बोझ उतरग्यौ। सगळा जांनिया नै विस्वास दियौ के डरण री जरूरत नीं है। सेठा री अकल माथै सगळां नै ई भरोसौ हौ। सैठ बींदणी अर बंदी रै साथै सबसू आगै वाळा रथ में बैठ्या। बारात घाटै पूगी। सेठ तौ पूरौ जाब्तौ करियों बैठा हा। घाटा रै बीच में धाड़ैत आड़ा फिरिया। सेठ तौ निरभै बींदणी नै लेयनै रथ सूं हैटै उतरिया। वांरा दोनूं हाथां में दोय थाळ हां, अेक में मैवो-मिस्ठान, मिसरी अर पतासा भरियोड़ा हां। दूजा थाळ में इक्कीस मोहरां पळकती हीं। सेठ कह्यौ-म्हारीं आ बींदणी आपरै खोळै है। अर म्हारी तरफ सूं आपनै औ मामूली निजराणौ हैं। कबूल करौ। सेठ री बात सुणतां ई ठाकर तलवार अळगी फंेक ली। कह्यौ-म्हारी लाड़ल बेटी, दूधां न्हावौ अर पूतां फळौ। सेठां सांम्हीं देखनै केवण लागा-सेठां, आ बींदणी म्हारै खोळै है, पण बेटी रै दायजा री कीं चीज म्हैं निजरांणा में कबूल नीं करूंला। इणरौ घर रौ पांणी पीवणौ ई म्हारै वास्ते निखेद हैं। पछै ठाकर सेठां रा मोर थापलनै कह्यौ-सेठां, थें अेक बोल र्में इं म्हनै फंसा दियौ। पण, कोई बात नीं, बणी सो भाग री। अबै थै म्हारी तरफ सूं बेटी रै सारू अेक सौ अेक रिपिया कबूल करौ। पछै आपरो जत्थौ लेयनै बारात रै सागै व्हिर व्हिया। घरै पूगियां पछै सेठ ठाकरां नै पाठा नीं जावण दिया। आपरै साथै ई धंधा में भेळा राख दिया। दोनूं भाई व्ळै ज्यूं ऊमर भर भेळा रह्या।
एक सेठ नै कांदा घाणा भावता हां। वो तीसूं तारीख कांदां रौ सांग खावता। घर वाला पैला तौ काया व्हिया, पर हौळे-हाळे हेवा व्हैगिया। टेकर उण गांव में संत पधारिया। आगती-पागती सूं लोग उणरा परवचन सुणण सारू आया। केई दिनां तकयूं हीं चालतौ रियौ। संत अेक-अेक साहूकार नै खावण-पीवण री सोगन-सपथां दिराई। जोग री बात के उण कांदा वाला सेठ नै संत कांदा खावण री सोगन दिराई। सेठ कह्यौ-महाराज, आप फरमावों तौ धांन छोड दूं पण म्हारा सूं कांदा मरियां ईं नी छूटे। संत कह्यौ-मरियां पछै तौ सगळी चीजां अठै ई छूट जावैला। जीवतां छोड़णी आपरै हाथै हैं। संत ई हठी अणहूंता हा। कह्यौ छोड़णौ व्है तो कांदा छोड, नीतर थारौ मन व्है ज्यूं कर। संठ नै सेवट कांदां छोडण सारू मनवायनै ईं मान्या। सोगन लियां पंछै सेठ घरै आयौ। सेठाणी सू पूछयौ-आज साग कांई करियौ ? सेठाणी बोली-इण में पूछण री कांई बात। साग तौ कांदा रौ ई बणायौ है। सेठ कह्यौं- आज तौ म्हनैं संत कांदां नीं खावण री सोगन दिरायदी। सेठाणी कह््यौ-संत किया देखण नै आवै। अपारै सोगन ई खाय खेवणी अर कांदां ई खाय लेवणा। पण सेठ कह्यौ-आ बात तौ मन मांनै कोनी। सोगन खाई जकौ तौ अबै पालणी ई पड़सी। थें दूजौ साग बणा दियौ। सेठाणी कांम करण में माठी ही। कह्यौ-अबै कुण चूल्हौ चेतावै। आज-आज जो जिमलै, नीतर मन में रैय जावेला। तौ ई सेठ रौ मन नीं मानियौ। भूख अणहूंती लागोड़ी है। दोय पापड़ छमक दियौ। सेठाणी फेर ओजौ ताकियौ। बोली-पापड़ा रो सागकरूंला, जितरै आपरी भूख मर जावैला। सौगण खावणी तौ साचा मन सूं खावणी। मन में आवणौ ता आधौ खावणौं है। कांदां रा नांव सूं तौ थारै लाळा पड़ै। म्हारौ कैणौं मानौ आज आज तौ खायलौ। सेठ रै मन में तौ खावण री ही इज। सेठाणी रै इता कैवणा सूं वौ कह्यौ-थ्हारी मरजी व्है तौ औ साग लै आवौ। पण अेक उपाय कर, धेकची रै ढकणौ काठौ लगायणै कौरौ झोळ-झौळ आवण दौ। कांदां मत आवण दीजौ। सेठाणी कह्यौ-हां, आ गळी तौ थें नांकी काढी। झोळ में तौ मुसाला, पांणी अर बघार घी रौ है। माराजा आंरी तौ थ्ज्ञानै सोगन दिराई कोनी। म्हैं अैड़ी सुथराई सूं झोल घालूला कै तासळी में कांदां रौ फुतरकौ ई नीं आवण दूं। झौळ रै सागै कांदां ई पड़ता गिया। इण तरै वौ आपरी सोगन निभाई।
एक नगर में रातीराम नाम रो सेठ रैवतौ हौ। उणरै घरै छौरौ जलमियौ तौ ‘बै-माता‘ अंछर डालण सारू आई। सेठ बे-माता सू पंूछियौ आप कुण हौ। ‘बै-माता‘ कह्यौ, मै ‘बै-माता‘ हूं और थ्हारा बेटे मांय अंछर रै बारै में पूछियौं तौ ‘बै-माता‘कह्यौं थ्यारै मरण रै पछै थारौ छोरो सिकारी बनेळा, जिनावर मारनै पेट भरेला। ‘बै-माता‘ री बात सुण सेठ कह्यों म्हारै अठै तो जिनावर भी भूखा नीं सोवै, अेड़ो कदी नीं व्है। थ्हारा अंछर झूठा हैं। दूजी बार सैठ रै घर छौरी जलमी। ‘बै-माता‘ पाछी आई। सेठ पूछियों तो ‘बै-माता‘ कह्यौ, आ खोटा काम करैला। सेठ नै आ बात भी नीं जची। थोड़ा टैम पछै सेठजी सुरग सिधार गिया। उणरौ सगळौ धन खत्म व्हैगियौ। सेठ रौ छौरौ शिकारी बण गियौ। वौ जिनावर मारतौ अर आपरै पेट पाळतौ। छोरी खोटा काम में पड़गी। एकर एक संत जो, उण सेठ रा सथी हा, वे वठै आया। मिनखा सूं सेठ रौ पूछियौ तौ उणनै सगळी बात ठा पड़गी। संत वठै हीं जम ग्या। सिंझया पोर जद सेठ रौ छौरौ जंगल सूं पाछै आयौ तौ उणनै आपरी ओलखाण बताई। दूजे दिन संत भी उणरै सागै जंगल गिया। संत कह्यौ थ्हारै हाथ सूं एक जिनावर मरैला, अेड़ो थ्हारा भाग में है। इण सारू थूं छोटा मोटा जिनावर मत मार। वठै चिड़ी-कमेड़ी सूं लेयर घणा जिनावर उणरै आगै आया पण संत हर बार उणरौ हाथ पकड़ लियो। उणनै कोजी भूख लागी हीं, पण वौ मजबूर हौ। सिंझया व्हैती-व्हैती वठै एक हाथी आयौ जणै वो तीर मारियौ तौ हाथी चित व्हैगियौ। उणरा माथ्ज्ञा सूं घणा गजमुक्ता निकलिया, इणणै बैचणै सेठ रौ बेटौ पाछौ मालदार बण गियौ। अगली बार संत सेठ री छोरी रैकने पूगिया। उणनै कह्यौ, थ्हारै घरै जौ भी आवै थूं किंवाड़ मत खोलजै। वा यूं ही करियौ। पैला कम रिपिया रा देवाल आया पछै हजारों रिपिया देवण वाला आया पर वा किवाड़ नी खोलिया। बे-माता रा अंछर खोटा नीं व्है इण सारू खुद भगवान मिनख रा वेष में आया, पण वो किवाड़ नीं खोलिया। वा कह्यौ अगर थ्हैं भगवान हो तो किवाड़ बंद होवण पर भी अंदर आ सकौ। जद भगवान् मायनै आयनै उणनै दरसन दिया अर उणरी मुक्ति व्हिई।
एक गांव में एक सेठ पैलवान हो। गांव में कुश्ती करण आवण वाला सगळा पहलवानों नै वौ पछ़ाड़ियौ हो। पण अबै सेठ री अवस्था ढलन लागी हीं अर सागै ताकत भी कम व्हैगी हीं। उणसूं जलण वाला मिनखा मैं आ बात ठाह पड़ी तौ वै मौकौ साजण री सोची। वे दूजा गांव सूं एक पैलवान ने न्यौता दियौ। एक दिन गांव में एक नुंवौ पैलवान आयौ अर सेठ नै कुश्ती करण सारू ललकारियौ। सेठ सोचियौ आज तक री इज्जत धूड़ में पड़ जावैला। सरीर में ताकत नीं ही, वो घणी चिंता में पड़ग्यौ। इज्जत रै खातर वो उण पैलवान री चुनौती स्वीकार ली। सेठ सूं जलण वाला मिनख घणा खुश व्हिया। गांव में चरचा चालगी कै अबै सेठ क्हैं तिरी ताकत हैं, ठा पड़ जावैला। कुश्ती में जीतण वाना नै 500 रिपिया रौ इनाम मिळणौ हौ। थोड़ा दिन पछ़ै, अखाड़ा में कुश्ती रौ आयोजन व्हियौ। कुश्ती देखण पूरौ गांव जुटियौ। टैम माथै कुश्ती शुरू व्हिई। दोनां पैलवान आपस में गुथ गया। सेठ जद देखियौ कै जीतण री आशा नीं है तौ वौ दूजा पैलवान रै कानां में धीरे सूं कह्यौं, थूं जीत जावैला तौ थ्हनै पांच सौ रिपिया हीं मिलेळा, पण हार जावै तौ क्है थ्हनैं एक हजार रिपिया इनाम में दूंला। पैलवान बातां में लाग गियौ। वौ मन में सोचियौं मैं तो नौसिखियों हूं, कठी हारूला, कठी जीत जाऊंळा। क्हैं जाण बूझ नै हार भी जावूं जौ क्हनैं कई फरक पड़ै, हजार रिपिया घणा काम आवैला। यूं सोच नै वौ सेठ नै जिताय दियौ। सेठ आपरी मूंछां माथै ताव देवण लागौ तौ ईष्र्या करण वालां रा मूंडा उतर गिया। सेठ पांच सौ रिपिया लेयर आपरै घरै आयौ। थोड़ी देर पछै पैलवान सेठ रै पाग पूग ग्यौ। अर उणरी जुबान रै मुजब एक हजार रिपिया मांगिया। सेठ व्यंग्य सूं हंसण लागौ अर पैलवान सूं कह्यौ, बावला, काहौ रा रिपिया लैवणै आयौ है ? वौ तो बखल रौ दांव हौ, जो चाल गियौ। पैलवान उतरियौ मूंड़ौ लैयर घरे गियौ, वौ घणौं पछतायौ के पांच सौ रिपिया भी आपरी मूरखता में गमा दिया, सेठ री गांव में इज्जत घणी बढ़गी, लोग उणसूं जितरा ड़रता उणती ज्यादा डरण लागा।
एक मिनख गंगाजी गियौ। पूरी तैयारी रै सागै। हरद्वार सूं पाछौ वहीर व्हियौ तौ उणरै जची के दिन दिल्ली निजरां सूं देखलूं तो कैड़ौक व्है। अबै तौ म्हारा ई फुल गंगाजी में आवैला। खुद रै आवण रौ तौ मौको पाछौ नीं बणैला। राजी-राजी वौ हरद्वार सूं आवण रै वगत दिल्ली उतरग्यौ। दिल्ली देखणै वौ घणौ राजी व्हियौ। ऊंचा मैला, पक्की सड़कां अर सुरंगा बाग-बगीचा। जमना रै काठै बसियोड़ी। आ नगरी तौ सुरगापुरी नै ई मात करै। मिनख नगरी देखण में मस्त हौ के तीन च्यार लफंगा उणरै लारै पड़ग्या। वौ ग्वार व्है ज्यूं दिखतौ हौ। पैली वळा दिल्ली आयौ हौ। वौ तौ आपरै मन परवांण धौळी-धौळी सै दूध जांणतौ। मिनख जात रौ पतियारौ करतौ। पण लफंगा तौ अैड़ा भोळा मिनखा री इज टौय में रैवे। वै उणरै लारै-लारै अटकळ विचारता, निरी दूर लारौ करता रह्या। मिनख अेकांत ठौड़ देखनै बैठग्यौ। उगां नै औ ई मिस लाधौ। तुरंत उणनै पजावण री विचारली। मिनख ऊभौं व्हियौ तौ वै उणरै दौळा व्हैगा। कह्यौ-थू पवितर आतमा रौ अपमान व्हियौ। थारी मौत तौ नीं आई। कोतवाळ कनै चाल। दस साल जेळ में पंड़ियौ सिडै़ला। बूढ़ो है, पण इतौं ई होस नीं। मिनख कह्यौ-म्हैं गांव रौ अबूझ हूं, म्हनै ठाह कोनीं। भूल संू गलती व्हैगी, हाथ जोड़नै माफी चावूं। कीं डंड भरणौ व्है तौ पावली-आठ आंनी अठै ई लै लिरावौ। म्हनै कोतवाळ करै मत घसीटौ। कीकर ई पिंड छूटै जकी बात करौ। थांनै आसीस देवूंला। ठग कह्यौ-बदमास, थूं पवितर आतमा री कीमत चार आनां ईक रै। आ तौ फैल जुलम री बात हैं। थनै कोतवाळी में लै जांवणी ई पड़सी। थूं जांण करनै आ पाप करियौ। मिनख हाथ जोड़तो बौल्यौ-म्हनै इण में कांई हाथ आवै ! आप हुकम दिरावै तौ आ सगळी ठौड़ म्हारै हाथां सफ कर दूं। पण ठग किणरां मानै। सगळा दोळा व्हिया जकौ रोवता-ई उणरौ सैंग माल मतौ खोस लियौ। फगत पैरण नै धोतड़ी लारै छोड़ी। मिनख जांणियौ के इता में ईं पिंड छूटौ। दस बरस री जेळ तौ भुगतणी नीं पड़ै। पण उणरा मन में पूरौ बैठग्यौ। कठैई फेर गलती व्हैगी तो अबकै लारौ नीं छूटैला। इण विचार सूं पूछयो-अबै तौ म्हनै सावळ रिह्यौ।
एक सेठ तिमंजली हवेली बणाई। घणा कोड़ सू हवेली रौ पूजन करायौ। गांव रा जमींदार नै खास तौर सूं निवतिया। उणनै राजी करण सारू हवेली रा सिरै मोड़ माथै वारै पिताजी रौ चितराम लगायौ। चितराम नै बतावती वगत सेठ कह्यो-छोटे मूंडै मोटी बात तो नीं करू पण तौ ई म्हनै कैणौ पड़ेला के मायतां रा चितराम सूं हवेली री छिब सुधरग्यी। जमींदार कह्यौ-क्यूं सेठा, साची कैजो बापजी री करड़ी निजर रौ तौ जीवता सिंघ बिचै ई घणौं वतौ डर नीं लागे ? सेठ जवाब दियौ-इण में कांई कूड़ी बात। आज दिन ताई वारी धाक सूं मोटा चोर अर धाड़ायती रा थर-थर कांपे ! जमींदार मूछंया माथै हाथ फेरनै घांटी हिलायनै बोल्या-हां, इण में कांई मीन मेख। उण दि री बात पछै तीन चार बरस बीतग्या। अेक दिन जमींदार मतै चलायनै सेठां री हवेली पधारिया। सेठ घणा ई राजी व्हिया। बोल्या-की हुकम व्है फरमाऔ। जमींदार कह्यौ-यूं ईं मन में जचगी, सेठा सूं मिळण री। की हिसाब किताब ई करणौ हैं। सेठ अचरज सूं पूछ्यौ-हुकम, किसौ हिसाब किताब, म्हनै कीं जाच कोनीं। जमींदार बात बदळनै कह्यौ-अैड़ी कीं खास बात कोनीं। घर री बात हैं। बोले सेठां, रह्या तौ राजी खुसी ? कींडर भै तौ कोनी। सेठ कह्यौ-अै बातां आप सूं काई छांनी ? आणंद रा थाट हैं। नरमाई सू पाछौ कह्यौ-म्हारा कैणा परताप ! परताप तौ पुराणा जमींदारा रा हैं। पछै सेठां नै बात समझाई-इण हवेली री प्रतिस्ठा नै आज चैथौ बरस लागण आयौ। उण दिन आप खुद ई फरमायौ के जे आपरै सिरै म्हारै बापजी रौ चितराम नीं व्हैतो तौ आपरी लाखूं रिपिया री माया पार व्है जाती। आठ पौर बतीस घड़ी वे हवेली री रूखाळी करता। उण रूखाळी पेटै तीन बरसां रा बीस हजार रिपिया कीं वती बात कोनीं। घणा बरसा रौ हिसाब भेळो व्हियां आपरै माथै घणौ भार पड़तौ। सगळी बात सुणतां ई सेठा रा तौ हौसला ई गुम व्हैगा। पण जोर ई कांई करै ! माडांणी मुळकण री कोसिस करी। कह्यौ-म्है तो बापजी रौ मान राखण सारू चितराम लगायौ हौ, आप औ बोझौ दे दियौ। जमींदार रिसां बळनै कह्यौ-सेठां, औ तौ थारौ धापनै नुगरापणौ है। सेठ बापड़ो कांई करतौ ! जांणग्यौ जमींदार रिपिया तौ किणी भाव छोड़ै नीं। पछै हील हुज्जत करणी फालतू हैं। हवेली में जायनै बीस हजार रिपिया लायौ। चितराम रै माथै धरनै जमींदार रै निजर कर दिया। मन में घणौं ई पिछतावौ करियौ के जमींदार तो कंवळै टिरियोड़ी ई खोटौ।
आजकल घणकरा घरां में लुगाया रो राज है अ‘र लुगायां रौ ईज बोलबालो हैं। मूछाला मरद बापड़ा घर में भड़ती बगत मूछा नीची कर‘र ड्योढ़ी में बढ़े। म्हारा ई कई मींत मिळै तो आपरी घर गाथ सुणावे। उणमें कीं बातां सुख री व्है तो केई दुख री भी व्हैं। मलै मिनळ आळा लोग अर मींत आपरौ जिकौ तजुरबो मनै सुणावै, उणरे मुजब वांरी घरवाली या जोड़ायत भांत-भांत रा सुभाव अ‘र आदतां रै कारण न्यारी ओळखाण राखे नै आपरै घरधणी नै उणी ढंग सू परोटे। मोटै तौर सूं बै इण मुजब देखण में आवै। केई भायलां री घरवालीं पतिदेव सूं बेसी वांरी जेब सू हेत राखे अ‘र तनखा लावतां ईपूरी तनखा आपरे कबजे कर ले अ‘र घरधणी बिचारौ गुटका-बीड़ी सारू ई पईसा ने तरसै। वांरी लुगायां नित नवा कपड़ा पेहरै अ‘र वै भाई लोग वार-तिवांर नै ई नवा कपड़ा सारू उडीकता रेय ज्यावै। पति परमेसर रै हाथ में पईसा देखतां ई ए लुगायां पतंग री डोर ज्यूं खेच‘र पईसा आपरे हवाले करले। केई देविया तो दोयां च्यारां छानै-ओले पति री जेबां टटोळती रेवै अ‘र चोरियौड़े धन सूं बजार में चाट-पकौड़ी खावै। कदेई-कदास गुटका सुपारी रो ई भाग लगावै। ऐड़ी लुगायां कसाई री श्रेणी में गिणीजै। दूजै कांनी केईघर लिछमी ऐड़ी भी व्है, जिकी आपरे पतिदेव नै खोळे रै टाबर ज्यूं राो अ‘र उणरै खाणै-पीणै सूं लेय‘र कपड़ा-लतां तांई पूरौ ध्यान राखै। घरधणी रे दियोडे़ माल-असबाब सूं लेयर उणरै कागद-पानां तांई सगळी चीजां संभाल र राखै, उणरी आतमा ने कदैई कष्ट नीं पोंचावै अ‘र सदा खुश राखण रौ जतन करै। ऐड़ी लुगायां मां रूपी पत्नी कहीजै। पण केई घरवालियां ऐड़ी भी हुवै, जका काम-काज सूं तो किनारौ राखैं पण खावण-खंड़ी घणी व्है। इयां लिछमीयां री खुराक तो अणूती व्है, पण काम रै नावां माथै फळी ई नीं फोडे। रोट तोड़णा अ‘र नींद काढणी इयां रे खास सुभाव में गिणीजै। काम पड्यां घरधणी नै गाल काढ़णै सूं लेय‘र इज्जत उतारण तांई कोई औसर नीं चूकै। आपरे पति नै रमतियो समझण आली ए लुगायां कर्कसा लुगायां कहीजै। इणरै टाळ केई लुगाया पतिदेव रै हुकम बिना पावंड़ो ई नीं भरै, अ‘र पति री इंदा मुजब घर चलावै अ‘र पति ने प्रिय भोजन रो भोग लगावै, मान-मनवार सागै जिमावै, पछै खुद खावै, वा पत्नी आग्याकारी घर लिछमी कहीजै। ऐड़ी लुगायां पति रै एक इशारै माथै दोड़ती निजर आवै। केई लुगायां इसी ई व्है, जिकी आपरे पति नै देखतां पाण हरख करै, हंसी-ठिठोळी करै अ‘र जे घणै अरसे सूं पतिदेव परदेसां सू पधार्या व्है तो उणरौ कोड़ करै, उच्छब करै अ‘र आरती उतारै। भांत-भांत रा जीमण जिमावै नै खुद ई उणरै सागै भोजन करै, वा घरवाली मित्र पत्नी कैवावै। केईक लुगायां ऐड़ी भी व्है, जिकी पति रै रीस कर्या सूं रीसां नीं बळै, नीं पाछौ तूटतौ जबाब देवै। सदैव मन में घरधणी रो ड़र खटकतौ रेवै, अ‘र भूले-भटके पतिदेव हाथ उठायदै तो ई चुप-चाप सहन करलै, पण मन में पति रै वास्तै कदेई दुरभावना नीं राखै, ऐड़ी लुगाया दास पत्नियां कहीजै। इण भांती लुगाया रे सुभाव रै ढ़ालै वांरी विगत अठै दीवी है। आपई आप रै मन में तौल‘र निरणै करो कै आपरी घरवाली उपर लिख्यौड़ी लिछमियां री कुणसी केटेगरी मंे आवै अ‘र आप किता पाणी में हौ। पति देवां रा कांई-कांई रूप व्है अ‘र कांई कुलक्खण पाळै, इण विगत रै सागै फेर कदेई हाजर होवूंला।
एक जाट री मां मरी तौ वौ गांव रा पंडतजी नै गंगाजी वहीर करिया। हरद्वारा सूं तीसेक मील पैलां पड़तजी रौ सासरौ हो। तीच-च्यार बरसां सूं सासरै जावण रौ काम नीं पड़ियौ। अर कांम पड़तौ तौ ई इत्ती अळगी पड़ियौ भांय जावण सारू खरचो माथै पड़तौ। चैधरण रा फूल गंगाजी घालण रौ औ टांणौ देखियौ तौ वै केतां पांण मांनग्या। पण पंडत रा मन में कुटळाई आई। जाट सूं हरद्वार रौ पूरौ भाड़ौ लयनै वै आपरै सासरै ई मौज करणी चावता। फूलां नै सासरा री नाड़ी में छाने सूं पटक देवूंला। किणई नै कांई ठाह पड़ै। पंडतजी तौ सोची जकी ई करी। जाट सूं ठेठ हरद्वारा रौ आवण-जावण रौ खरचै लेयनै वै तो सीधा आपरै सासरे गिया। उठे आठ-दस दिनां तक आराम सूं रहयौ। खरचा मांय सूं खासा भला दांम बचाय लिया। दिनां री गिणती करनै वै पाछा हिसाब सूं गांव पूराग्रूा। जाट आपरी मां रै लारै घणौ ई खरचै खातौ करियौ। गंगाजळी वरतायनै सगळी न्यात निंवती। नांमी मौसर करियौ। केई दिन बीत्यां पछै जाट नै खबर पड़ी के पंड़तजी तौ ठागौ करग्या। ठेक हरद्वार गिया ई कोनीं। सासरा सू ई पांछा वळग्या। उठा री नाड़ी में फूल पटकनै झूठ ई गंगाजी रौ नांव ले लियौ। आ बात जाट नै अणहूंती खारी लागी। पंडतजी नै औळवौ देवतां कहयौ- पंडतजी, म्हैं आपनै म्हारा खास घरू जांण नै मां रा फूल सूंप्या। पण म्हनै रात रा सपनौ आयौ। सपा में मां आयनै म्हने कहयौ - पंडतजी आपरै सासरै ई म्हारा फूल पटक दिया। गंगाजी में घालिया बिना म्हारी गति नीं व्हैं। अबै कीकर ई करनै म्हनै गंगाजी पूगती कर। गंगाजी पुगायां बिना थारौ सगळौ खरचै-खातौ अकारथ जावैला। जाट री बात सुणनै पंडतजी कह्यौ - चैधरीं, म्हनैं तौ थारी मां, लखंणा बायरी ई दीसी। म्हारा सासरा सूं इतौं गौतौं खायनै पाछी अठै गांव कांई खावण नै आई। उठीनै ई सीधी गंगाजी पूग जावती तौ उणनै कुण बरजतौं हौ। थारौ खरचो-खातोै ई सुक्यारथ लाग जावतौ अर उणरी ई गति व्हैं जाती। पण लखणांबायरी लुगायां रौ कोई कांई करै। तबड़का मारती अठीनै नी आयनै उठीनै ई बळ जावती तौ कांई जोर आवतौ। गंगाजी तौ उठा सूं साम्ही नैड़ा हा। पंडत रौ पडूंतर सुणनै जाट घणों सरमीझियौं।
आपणै ग्रंथा मांय बच्चिया रौ लालन-पालण अर ताड़ण पर जोर हैं। अठै गौर तलब है क आज बच्चा रौ लालन-पालण रो तो पतौं ई गायब हो गयै क्यूंकि मों अर बच्चा रै बीचै अंग्रेजी पालणां आं ग्या। मां रे पलंग पर बच्चियां नै जगै नीं मिल सकै। पैला कनै सूती मां अर बच्चियों बिचे बेक घड़कणां री भाषा हुती। लौरी साथै थापी री भाषा रो अेक रंग हुतो। दादा-दादी, मां-बाप, बुआ-मासी, ताऊ जी कई रिस्ता हुता। अंग्रेजीयत अर अेकळ परिवार में अबै कीं नी। ताड़ना रौ जिम्मो लियौ है कान्वेंट स्कूल। इंग्लिष मिड़ियम रा स्कूल। जका बरसाती कुकुरमता जैड़ी फसला ज्यूं कस्बा, गांवां तक उग ग्या है। मैनरस रै नांव सूं पीर रैया हैै बच्चा...पण संस्कृति ? कांई पैला स्कूंला मांय सस्कार नीं दिया जवता। इण स्कूंला माय साइंस तौ पढ़ाई जावै पण आपणौं मारल हर तरै सूं डाउन राख्यौ जावै। स्ककूलां मायं मातृभाषा बोलण पर जुर्मानों हुवै है। गंवार अर सभ्य भाषा रो भाव उभर रैयौ हैं। गंवार भाषा गिणीजै क्यूं ? क्यूं नीं हुवै म्हां अंग्रेजी ने माथेै जौ चढ़ाय दी है। इण भाषा रै कारण बच्चा आपरै घरां अर रिस्तेदार बिचै अजनबी बण र रैय जावै। सुबै चिड़ियाघर में टाबरियां ने लेयर गई। म्हैं अेक बच्चा ने बांदरा कनै देखर पूछियौ ‘बेटा आपणी भाषा में मंकी अर डंकी ने कांई कैवे ? बो आपरी मां रौ मुंड़ो जोवण लागौ। मासी आपने कांई पतो म्हारा टाबरिया अंग्रेजी स्कूल में पढ़े है। इणां वासते तौ हिंदी रौ काळौ आखर भैंस बरोबर है‘ बा घणी गूमेज सूं बोली ‘म्हारा बच्चिया तौ अंग्रेजी में ई खाईंग, अंग्रेजी में ई पढ़िंग अर अंग्रेजी मांय ई रैविंग।‘ सुणर मांय रै मांय हंसी रोकती म्है कैयौ, थारा टाबर थनै अंग्रेजी खूब सिखाई है। जिंदगी री पैली पाठषाला तो घर हुवै अर मां पैली गुरू। यो कथन आज पलटी खा ग्यौ। मां-बाप‘ बर ‘मम्मी-डेडी‘ कांई दो भाषावां रा दो सबद संबोधन मात्र है ? कांई किणीं भी देस री भाषा ने आपणी भाष ने छोड़र ई अपणाणौं ई आपणी संस्कृति रैयगी है। म्हंै तो कैवूं क कोई भी संस्कृति आपरी भाषा रो अलग अस्तित्व राख सकै। मजै री बात है, अबै ओ हाल है क किण ने ई गुस्सौ आवै तो बो ई अंग्रेजी में बोलण ढूकेै, अंग्रेजी में गाळिया काढे भलई मतलब जाणै चाहे नीं जाणै। बाजार में अेड़ा भी कई निजर आवै है जकी अंग्रेजी में बोले, भलई उण रो अरथ बदळ ावै। अंट-संट बोलर लोंगां री हंसी रो कारण बण जावै। और तौ और बहुराष्ट्रीय कंपनीया अर पूंजीवाद रो विरोध करणीयां पाणी पी-पीयर हाका करणवाला, स्वदेसी रा नारा लगावण वाला, हिंदी ने ओढण-बिछावण वाला, हिंदी रो पक्ष लेवण वाला लोग भी अंग्रेजीयत री मानसिकता सूं ग्रस्त है। म्हां अग्रंेजी भासा रो विरोध नी करां। म्हां जाण हां कै अंग्रेजी में साइंस रो ज्ञान रो विस्तृत रूप में मिले हैं। इण वास्तै विद्यार्थिओंने अंगेजी सूं घणौ फायदो मिलो। अंग्रेजी में विज्ञान पढ़नो जरूरी है। पण आपरी संस्कृति नै कायम राखणौ ई जरूरी है। साक्षरता अर सांस्कृतिक विरासत ने विद्यार्थिओं तक पहुंचाण सू पूर्व उणांने उणां री मातृभाषा देनी होसी। राष्ट्रीय भावना सूं ओतप्रोत कीं लोग, उच्चाधिकारीं अर केंद्रिय शासन कानी सूं कई क्षेत्रां में हिंदी भासा रो प्रयोग लागू कारण हिंदी भाषा अंग्रेजी ने अंगेठौ बतावती प्रगति रै पथ माथै बढ़ रैयी है।
एक चोर रा सगला घरवाळा मर खूटग्या तौ उणनै वैराग ऊठग्यों। वौ एक साधू-मातरा रै पगां पड़ने कहयौ-संता, म्हारौ औ जलम तौ बिगड़ियौ जकौ बिगड़ियौ ई, अबै आगौतर नीं बिगड़ेै, इण खातर आपरै सरणै आयौ हूं। सारी ऊमर, चोरियां में काढ़ी, अबै ढळती उमर रांम रौ नांव लेवण चावूं। पण बिन गुरू बिना वौ ई लिरीजै कठै। म्हारा जैड़ा पापी माथै दया बिचारौ अर म्हनै तारौ। साधू मातमा उणनै चेलौ बन लियौ। मातमा रौ अड़खंजौ लाठौ हौ। रामुदंवार में कोई संन्यासी रैवता हा। घणी ई वित-मवेसी अर घणौ ई घीणौ-धापौ हो। रांमदुवार में केई चारियां, लोटा गिलास, कूंडा, केइ राच-पीच, केई ठांव-ठीकरा अर केई बरतन-बासणा हां। रामजी री किरपा सूं गिरस्ती रा सगळा थाट इण रामदुंवारा में हा। चोर रै तौ मोज बणी पण बणी। सैकडूं चोरिया करनै ई वौ इतौ आराम नीं पायौ। पछै चोरी करण में कांई सार, पण तौ ई रांमदुवारा में अठी-उठी हेर-फेर करियां बिना उणनै नेहचै नीं व्हैतौ। केई बरसा रीं जूंनी लत ही। सारै-सास छूटै तो कीकर छूटै। वो आपरीं पुरांणी आदत पोखण सारू रांमदुवारा रा सगळा बरतन-बासणां री अठी-उठी हेरा-फेरी करतौ रेवणो। दूजा चेला ठोड़ री ठोड़ सगळी चीजां सावळ सुथराई सूं जमायनै धरता अर वौ जमायोड़ी चीजां ने अठी-उठी कर दैवतौ। सगळा चेला उणरी हेरा-फेरी सूं काठा काया व्हैगा। वै महंतजी नै चुगली करी तौ महंतजी उणनै बुलायनै समझायो-भाया, सगळी मूरतियां थारी घणी सिकायतां करै। थूं बिना कांम कारग चालतौ ई वांरी जमायोड़ी चीजा नै ठोड़ क्यूं छुड़ावै। रामदुवारा री सगळी मूरतियां थारी इण हेरा-फेरी सूं नाराज हैं। चोर महंतजी रै पगां हाथ लगायनै कहयौ-बाबजी, आप ई न्याव करौ के चोर, चोरी सूं गियौ जको तौ ठीक, पण हेरा-फेरी सूं ई गियौ। पुरांणी लत हैं, चोरी तौ छूटगी पण हेरा-फेरी नीं छूटै। मातमा उणनै समझायौ तो एकर मान गियौ। थोड़ा टैम वो हेरा-फेरी नीं करी। पण वो आपरी आदत नीं छोड़ सकियौ, रांमुदवारा रा मिनख मातमा नै घणी सिकायत करता पण मातमा मातमा उणनै बुलायनै समझावाता ही रैता। तामता जाणियौ के इणरी चैरी करण री आदत तो रांमदुवारा में रैहणै छूटी। लारै जाता वै हेरा-फेरी री लत आगोतर माथे छूट गी।
एक सेठ छकड़ौ जोतनै आपरै सासरै जावतौ हौ। साथै सेठाणी अर उणरौ बैटौ भी हौ। बैटा री उमर सतरा-अठारा बरस हीं। सूरज मथारै आयौड़ौ हौ अर वै हौळौ-हौळै बळदां नै खड़ता हा। मारग में एक जाड़ी घेर-घुमेर बोरड़ी रै टेटे वे छकड़ौ ढाबियौ। सेठाणी कहयौ-धमैक बिसाई खायनै दौफरी करलां। बोरड़ी री छींया नांमी है। वौ कटोरदांन खालनै रोटिया खावण ढूंका के वांनै दोय घोड़िया सरणाट साम्हीं आवती दीसी। धोड़िया रा असवार ई बोरड़ी हैटे छकड़ौ देख्यौ तौ लगांम खांची। सेठां ने कहयो-कोई म्हारीं पूछै तौ बताजौ मती। जै बताय दियौ तौ थें थारी जाणौ। आ कैयनै वै दोनूं चोर भरणाटै डावै पसवाड़े उजड़ टळग्या। थोड़ी ताळ पछे जीम-जूठने सेठ पाछो छकड़ौ। जोतियौ। दूजा दौय असवार वळै आवता दीखिया। ै कदास घोड़िया रा धणी हा। चोरां नें पकड़गण सारू वारै लारै वार चढ़या हा। घोड़िया रै खोजा-खोजां वै उणी मारग लारै उड़ता आया हा। पण तौ ई खासी छेती रैगीं। सिरदार छकड़ा रै पाखती आयनै घोड़िया ढाबा। आखता पड़नै पूछियौ-सेठां, अठीकर दोय घोड़िया जाती देखी कांई। सेठ रै जवाब दैवे उण सूं पैला उणरौ बीच में बौल्यौ-हां देखी। सिरदार वळै पूछयौं-उणरौ रंग कैड़ौ हौ ?वो दीखण में कैड़ी हीं ? चोरां रौ तौ ना दियौड़ौ हौ इण उपरांत सेठ सौच्यौ के घोड़िया हाथ आया पछै गवाईयां में फिरणौ पड़ैला। कुण मारग चालता घांदा में पड़ै। वै बैठा नै इसारौ करियौ तौ ई वौ समझियौं कोनीं। कोड़यौ होयनै साची बात कैवण लागौ-रांत रंग री फूठरी घोड़िया हीं। तद सेठ बळदा री रासां तणकार नै कह्यौ-चेत, चेत। अबे जावतौ वौ सांनी में समझग्यौ। भोळौ गणनै हाथ उंचै करियौ। खुंणी रे आंगळियां लगायनै कहयौ-फैर घोड़िया रै इता लांबा-लाबंबा सींगड़ाहा। सिरदार नै ई उणरी बात सुणनै हंसी छूटगी। कह्यौ-बावळा, घोड़िया रै ई कदै ई सींगडा हंसता थका कहयौ-बांणिया रा बैटा, घोड़िया मंे काई समझै। औ तो टाबर है। आपनै यू झूठ ई बताय दियौ। म्हां तौ घोड़िया देखी नीं कोई घोड़ा देखिया। आ कैयनै सेठ ई आपरै मारग बळ खड़िया अर सिरदार ई आपरी घोड़िया चोरां रै लारै बगडाई।
एक मिनख रै तोटौ आयग्यौ। परभात रौ आथण अर आथण रौ परभात पकड़णौ दौरौ व्हैगा। आपरी ऊपर में वौ चिलम ई मांगनै नीं पीवी तौ किणी सूं रिपिया कीक मांगै। पण दिन धकावणा मुळगा ई दूभर व्हैगा तौ काठौ कायो हायनै वो एक बांणिया री पेढ़ी चढ़यौ। बांणियौ उणनै ओळखतौ हौ। आव-आदर रै सागै बतळायौ-आवौ सिरदारा, आज अठीनै कीकरण किरपा करी ? मिनख सूं नीं तौबोलीजियौ अर नीं उण सूं बांणिया रै साम्हीं ई भाळीजियौ। वौ तौ नीची धूण करनै बौलो-बौली पैढ़ी माथै बैठग्यौ। सेठ मा‘ टौ बड़ौ समझणौ हौ। तुरण उणरै मन री बात लखग्यौ बौल्यौ-अर पौ आपरै घर री पेढी है। म्हारां सूं आप संकोच राखौ, बड़ी अचंभा री बात है। मिनख सूं ई कांम पड़िया करै। फरमावौ किता रिपिया री जरूरत है ? मिनख गळगळा कंठ सू जवाब दियौ, सेठां, रिपिया तौ म्हारे हजार चाहीजै। पण करो चाहीजण सूं ई कांइ व्है, म्हारै कनै गैणौ-गांठौ की कोनी। अर जीम म्है मारियं इ किणी रै नांव नी मंडावू। बांणियो बीच में बौल्यौ-कुण बुरीगार आप सूं गैणौ-गांठौ मांगियो। आपरी मूंछ रौ फगत एक बाळ म्हनै तौड़नै दे दिरावौ, मिनख आपरा धूजता हाथ सूं मूंछ रौ एक बाळ पकड़ियौ। तणकरौ देयनै तो बाळ तौ तोड लियौ पण बांणिया नै बाळ झिलावतां उणरी आंख्या जळजळी रहेगी। मिनख रै पाखती ई एक राईको बैठौ हो। वौ ई सेठा कनैरिपिया लेवण सारू आयो हौ। मूंछया रा बाळ साटै रिपिया मिळला देख्या तौ वौ तुरंत आपरी मूंछ रा लट्टी बांणिया साम्हीं करनै कहयौ-लौ सेठां, अंक री ठौड़ औ पचास बाळ। म्हनै ई आरै साटै पांच सौ रिपिया दे दौ। बाणियौ खिखरा करतौ बोल्यौ-बावळा, एड़ी जट तौ टकै घड़ी बिके। औ तौ मूंछ-मूंछ रौ फरक है। अळगी बारै फंेक, क्यूं हाट में फूस बिखरे। इणरी मंूछ रौ एक बाल हीं म्हारै करजा चुकावण सारू घणै हो, ओ उतरी रात सावैला नीं जठा तक वौ पेढ़ी माथै सूं बाल नीं लै जावै। राईका नै सगली बात समझ आयगी, वौ बोलो-बौलो आपरौ कंदौरो काढ़ने पांच सौ रिपिया लिया। मिनख नै मूंछ रे एक बाल रे सागै हजार रूपिया मिलगिया।
अैक बांणिया रो जंवाई मुकलावौ लावण सारू सासरै गियौ। सासरे में जंवाई रा लाड़-कोड़ करण सारू आगती-पागती री लुगाया कमरा रै माय बुलायौ। घणा इ गीत गाया, घणा ई लाड़-कोड़ करिया अर घाणा ई ख्याल-तमासा बताया। जंवाई रै आगती-पागती लुगायां रौ थट लगौड़ो हौ। रूपाळा जंवाई रौ रूप् निरख-निरखनै सगळी लुगायां घ्ज्ञणी ई राजी व्हीं। इता में एक छोटी-सी डावड़ी जवांई री सासू नै अेक कागद लायनै दियौ। लुगायां तौ भणियोड़ी ही नी। जंवाई सूं कांई चोज। वौ तो घर रा बेटा ज्यूं हैं। आ सोच ने सांसू जर्वाइ नै बांचण सारू कागद पकड़ाय दियौ। जंवाई कागद खोलनै आपरै साम्हीं करियौ। थोड़ी ई टेम रै पछै जंवाई रा दोनूं हाथ थर-थर धूजण लागा। अर ठळाक-ठळाक उणरी आंख्या सूं आंसू बैवण लागा। धूजता हाथौ सूं कागज नीचै पर्डग्यौ। रोवण रै समचै जंवाई रौ मूूंड़ो अेकदम काळै-मिट पडग्यौ। जंवाई रौ औ ढालौ देख्यौ तो लुगाया रा तौ धै छिलग्या। वै जाण्यौ के कोई भूड़ा समचार आया हैं। जंवाई नै रावतां देखनै सबसूं पैली उणरी सास रोवण लागी। पछै आगती-पागती री लुगाइयां। सारा घर में हाय-त्राय मचगी। बिना मरणा री खबर रै जंवाई रौवता थेड़ा ई। आज रै सुभं दिन कैड़ी अमंगल सुणावणी आई। जोग री बात। घर में रावणौ सुण्यौ तै तुरत आड़ौस-पाड़ौस री लुगाया ई रोवती-रोवती सेठां रै घरे आई। अचांणचक आ कांई अजोगती बात व्हीं ? कुण चलियौ ? किणी री साज-मांद तौ सुणई ई नीं हीं। घरवाळी लुगायां जवाब दियौ-कंवरसा नै रोवता देख्या तौ म्हां ई रोवण लागी। म्हांने ई ठाह कोनी के कुण चलियौ अर कुण नीं चलियौ। घरवाला डरता-धूजता आया अर पूछ्यौ-कांई बात व्ही ? आंे रोवणौ-रिंकणौ क्यूं मांड़िया ? की म्हानै ई ठाह पड़ेे। सैठाणी रोवतो-रोवतो कहयौं कंवरसा रा हाथ मंे कागद हैंख् उणनै बांच्यां आपनै सगळी बात ठाह पड़ जावैला। जल्दी बांचै। कंवरसा तौ दुख रा मार्या की बोल ई नीं सकै। संचांणी जंवाई तो अधमरियों सौ व्हैगा। तद सेठ लड़खड़ावती वांणी में पूछ्यौ-कंवरसा कांई बात व्हीं ? आप कागद बांचनै राया क्यूं ? तद जंवाई अटकतौ-अटकतौ कैवण लागौ-म्हैं कागद बांचनै नीं रौयौ। कागद बांचणी आवतौ तौ म्हैं रोवर्ता ई नीं। पढ़ण रा दिनों में म्हैं तबड़का देवतौ रोवतौ फिरयोंै, जिण सूं म्हनै आज रोवणौ पड़ियो। अणभणियां रां जीवण बिचै तौ मरणौ आछौ। जंवाई री बात सुणनै लुगायां खिल-खिल हंसण लागी।
एक गांव में एक पिंजारौ रैवतो हो। एकर उणरी लुगाई उणसूं कह्यों कै आज - काळ अठै कोई काम धंधों नीं हैं, इण सारू सहर जावौ अर कमावौ। पिंजारौ आपरी धुनकी अर दूजौ सामान लेयर सहर री कानी निकळियोै। चालता-चालता वौ जंगल मांय पूगिग्यों, वठै उणनै एक सैर आवतौ दिखियौ। पिंजारौ ने दैखिओ अर सैर पिनारै नै। दोंनां एक दूजै सूं डर गिया।पिंजारै कंधै माथै धुनकी देख सेर सौचियौ कै मोटो सिकारी आयौ हैं, लूंठा अस्त्रर-सस्त्रर लायौ हैं। म्हैं तो आज तक अेड़ा अस्त्रर नीं देखिया, ओ तो म्हारी जान लेने हीं चुप व्हैला। पिजांरे री जान निकलरीहीं। इतरा में वठै एक गीदड़ आयो। वो दोनो री मनोदसा समझगियों। वो सेर रै कनै पूंगौ अर कहयौ मामा, आज यूं किकर पूंछ दबायनै खड़ा हौ ? सेर पूरी बात बताय दी। गीदड़ तो चालाक हो हीं, वो कह्यों, मानों नीं मानो आ मिनख हैं तो न्यारौ, पण म्हैं इणसूं थ्हारौ जीवण बचा सकू। पण म्हारी एक बात माननी पड़ैला, म्हनै जंगल मय घूमण फिरण री छूट देन पड़ेला। सैर तो ड़रियोड़ो वो हाथां हाथ बात मान ली। पछै गीदड़ पिंजारै रै पास पूगा। पिंजारौ आपरा हाल बताया। गीदड़ सेर सूं जीवन बचावण रौ आस्वासन दियो, पण सागै कहयौ कै म्हारीं सरत माननी पड़ैला। जद सेर अठा सूं जावैला जणै म्हैं थ्हारा सरीर पर जठै चाहूं ला, वठै दों बटका भर लूं ला। पिंजारौ सोचियों जान जावण सूं बढ़िया कै गीदड़ दरी बात मान लूं। ज्यूं ही पिंजारौ हां भरियौ, गीदड़ सेर कानी इशारौ करियौ तो वो वठा सू भाग गियौ। अबै गीदड़ पिंजारै नै पूरौ देखियौ। उणरै कठी मांस नीं दिखयौ छाती माथै मांस उभरियोड़ौ उनणै दिख गयौ। गीदड़ पिंजारे सू कह्यों, म्हैं थ्हारीं छाती माथै दो बटका भरूंला। सेर सूं डरियौड़ै पिंजारौ आपरौ कुरतोै उपरै उठायौ जणै दीखी। वो पिंजारै सूं माजरौ पूछिया ? उणरै भेजा मांय एक युक्ति आई, वौ कह्यों इणरै मायंे एक कुतौ घुसगियौ है, थ्हनै देख अर भौक रियौं है, मै किणी तरै इणै बारै आवणसूं रोकियों हूं, पिंजरै री बात सुणता हीं गीदड़ रा हौस उड़ गिया, वौ पूंछ ददबार वठा सू भाग गियौ। अबै पिंजारै री जान में जान आई, अर वो झट झट सहर पूग गयौ।
अेक मिनख रात रा सपना देख्यौ के उणरै कनै एक गाडोलिया लुहार आयो अर उण रै नारकिया रो मौल पूछ्यों। वो मिनख गोडोलिया लुहार नै कह्यों, थूं ईं मोल कर। गाडोलिया लुहार मिनख नै कह्यों, थारी चीज हैं तो इण रौ मोल थूं ही बता। घणी झोड़ रै पछै मिनख नारकिया रा तीन-बीसी रिपिया मांगिया। पण गाडोलियों लुहार उणरा पचास रिपिया धामिया। मिनख कह्यों, म्हैं तीन-बीसी सूं अेक कौडी ई कम नीं लूवं। गाडोलिया लुहार कह्यों, म्हैं पचास रिपिया सूं अेक छदाम बती नीं देंवू। थारी मरजी है तो बोल। निरी ताळ झिकाळ व्ळैती रैयी। सेवट गाडोलिया लुहार आपरी नौळी सूं पचपन रिपिया कळदार गिणिया अर नारकिया री राहड़ी में हाथ घालियौ। पण मिनख पचपन रिपियां सूं राजी नीं व्हियों। वो गाडोलिया लुहार रौ हाथ झटकतौ थकौ बोल्यौ, बाब री सोगन, जे तीन बीसी सूं राती छदाम ई कम लूेवूं तौ। दोनां री झड़पा-झड़प् में मिनख री नंीद खुलगी। वो परेशान व्हेग्यो। अरे ओ म्हैं कांई कर्यो। नींद खुलतां ई पैली बाम उणरा मन में आई के मुरख पणै में पचपन रिपिया गमा दिया। अबारा पचपन रिपिया आ जावता तो जोरदार काम व्है जावतो। वौ सौच्यौ कै, पचपन रिपिया इण नारकिये रा कांई बुरा हैं। वो झट पाछी आंख्यां मींची अर, हाथ धकै करतौ बौल्यौ-ला पचास ई दै। उण नै कीं कोनीदिख्यौ, वौ गैला व्हैग्यौ; आंख्याा मीचियोड़ों हीं हथाळी मेंरिपियां रौ परसन नीं व्हियौं तौ वो थोड़ो हाथ आगै बधायनै कह्यौ, नाराज क्यूं व्है रिया हो, रामा धरमी री बात, लाओं अबै चालीस ई दे दो, काम चला लेवूंला। पण चाळीस भी कठै पडया हा। वौ सूतो-सूतो, जोस सूं आख्या मींचनै आगै सिरकतो कह्यों, अबै सौदो तूट व्है है, ला तीस ई दै, अइ ओ नारकियों हाथ मैं पकड़। पण उठै कोई हाथ कोनी दिख्यो। वो फेर उतावळोै पड़ने बौल्यो, ला बीस रिपिया हीं दे दे, अरे, दस ई दे दे। चाल, अंत बात करां, लां पांच ईदै। मिनख जाणियौं पांवू रौ तौ रिपियों ई वतौ। सेवट आंख्यां मींच्योड़ौ ई मांचा सू उभौ व्हियौ अर आप रो पूरौ हाथ धकै करनै कह्यों, अबै नटियौ तौ थन्ने रामसापीर री सौगण हैं। ला अेक रूपियौं कोई कोनी हो, सपना री बातांग, गम गी आंख्या खुलता...। तठै तो पचपन रिपिया मिल रह्या हैं और अबै एक रिपिया कोनी मिल्यौ।
जांबूवाला बैरा माथै पनड़री री खांडिंद-खंडिंद रौ ठेको, घड़लिया रौ खळकतौ पांणी, बांकली में रळकतो, नाळौ, होड़ा देवतौ ढलकतौ धारौ, पीयोड़ा क्यारां सूं आवता ठाड़ा लैरका अर आंबली माथै बैठी कायलां रा मीठा टकूड़ा। इण थाट बिचाळै गादेल माथै बैठौ सागड़ी मौज सू रागां करै तौ इण मेंकिणरौ दोस। गादेल माथै बैठो सागड़ीह मीठी अर तीखी राग मेंतैजौ गावतौं के उणरी धरवाळी भातौ लयनै आई। आपरा धणी नै इण गत मौज में गीत गावतां देख्यों तौ उणनै रीस आई। उणरौ माजनौ पाड़ती वा कह्यौ-हे ओ, थानै थोड़ी-घणी लाज को आवै नी ? थारां सुसरौजी नै चलियां पूरौ पखवाड़ौ ई नीं बीत्यौं अब थें ढोली री बळाई रांगां करौ ? गनौ हौ तौ म्हारै हौ, थांनै वांरौ कांई सोच? सागड़ी लतेड़ सुणनै लचकांणौ तौअवस पड़ग्यौं पण वौ जाणतौ के आ गादेल री ठौड़ इज अैड़ी हैं, इण माथै बैठैला जिणनै तो गावणौ ई पड़ैला। गादेल सूं उतरनै बौल्यौ, म्हैं रोटी खांवू जितै थूऔ डोरी उतार देै। रोटी खायनै घड़ी आधघड़ी मोर पाधरा करणी चावूं। बैठा-बैठा री कड़िया कुळण लागी। सागड़ी रोटी खावण नै बैठो अर उणरी घरवाली गादेल माथै बैठी बळद खड़ण ढूकी। बळद सात-आठेक भळाका लाया जितै तौ वा मूंडौ साजयोड़ी बोली-बोली बैठी रीवी। पछै हौळे-हौळे होठां रै मांय गुणमुण-गुणमुण करण लागी। सागड़ी ई लखग्यौं के आ गादेल तौ आपरौ परताप दरसायां रैसी। चळू करनै वौ कह्यौ-धमैक आड़ौ व्है जावूं, थू वैरो खड़ती रेजै। आंबली री जाड़ीह छीयां में वौ माथै खेसळों तांणनै सूयग्यौ। वौ सूवण रौ फगत मिस बणायौ हौ। उणरां कांन तौ घरवाळी री राग सुणण में लाग्योड़ा हा। थोडी ताभ् पछै, ई गादेल माथै बैठी उणरी घरवाळी तै मीठी अर तीखी ढाळ खेसला रै मांय उणरा धणी सूं सबूरी राखणी दौरी व्हैगी तौ वौ झट ऊभौ होसनै कह्यों - लिछमी,थनैरांगा करता सरमा को बावै नीं ? म्हारै तो ससुरोै व्हैतौ हों, पण थारौ तो बापहौ। थनै तौ थोड़ी - जांणतौ हौ के बाप मरौ, भलांई मां मरौ इण गादैल माथे जकौ बैठसी उणनै तौ गांणऔं सूझैला इज। अबै थनै कीं सोजी बंधी ? उणरी घरवाळी लचकांणी पड़नै माथै नीचै कर लियौ। कांई पडूत्तर देवती।
हिन्दी री हैवाई छोडो, भासा मायड़ बोलो रै।
परभासा रै भूतां नै दूधै रौ तेज दिखाद्यो रै।
भासा मायड़ बोलो रै, राजस्थानी बोलो रै।
छाछ लेवण नैं आई आ तो घर री धिराणी बणगी रै।
रोटी-रूजगार खोस्या इण तो दफ्तर्यां में छागी रै।
भासा मायड़ बोलो रै, राजस्थानी बोलो रै।
साठ बरसां सूं छाती पर मूंग दळ रैयी
संस्क्रति रौ करियो कबाड़ो रै।
इण रौ बाळण बाळौ रै, इण रै लांपौ लगाद्यो रै।
भासा मायड़ बोलो रै, राजस्थानी बोलो रै।
पांच परदेसां रै पांण आ तो रास्ट्रभासा बणगी रै।
जबरी पोल मचाई इण तो समझ नाथी रौ बाड़ो रै।
फरजी डिगर्यां ले-ले आया धाड़वीं, नौकर्यां कब्जाई रै।
इण रौ नखरो भांगौ रै, राजस्थानी बोलो रै, भासा मायड़ बोलो रै।
जद बाईस भासावां संविधान सीकारी, रास्ट्रभासा कुणसी रै ?
राजस्थानी री बळी लेय'र आ तो हुयगी राती-माती रै।
इण नैं थोड़ी छांगो रै, इण री कड़तू तोड़ो रै, राजस्थानी बोलो रै।
जागो ! छात्र-छत्रपती, खोल उणींदी आंखड़ल्यां।
देद्यो नाहर सी दकाळ रै, धरती धूतै,
आभौ गरजै, धूजै भारत री सरकार रै।
छांटा-छिड़कां सूं नीं बूझैला आ मान्यता री आग रै।
छात्र-छत्रपती जागो रै, भासा मायड़ बोलो रै।
तू ही म्हारो काळजो, तू ही म्हारो जीव।
रावळा कोट में लांठौड़ी चौकी ऊपर मकरांणा रा फूटरा गलीचा री बिछायत करियोड़ी ही। चौकी माथै पाखती एक चौधरी बैठो हो। ठाकरसा बिना बात ई राम जाणै क्यूं राजी हां ? वै मूंछ्यां माथै हाथ फ ैरता चौधरी नै मिसखरी रा भाव सूं पूछ्यौ-हे रे चौधरी, म्हेैं मोरसाण माथै बैठ्यों तौ थूं नीचै चौकी माथै बैठग्यो, पण जे म्हेै चौकी माथे बैठूं तो थूं कठे बैठेला ? चौधरीं हाथ जोड़ता कह्यौ-हुकुम, रावलै चौकी माथै बिराजौ तो म्हैं नीचै धूड़ रै आंगणै बैठ जावूंला। म्हनै तो आप सूं नीचै बैठणौ हीं ज पड़ैला। ठाकरसा फेर आगै कैवण लागा-है रे चौधरीं, थू नीचै बैठण री बात करी तौ पछै म्हनै इणरों सावल म्यांनो दै, जे म्हैं नीचे धूड़ आंगणै बैठूं तौ थूं कठै बैठेैला ? चौधरीं कहï्यौ रावले रोज आंगणै गिराजी। आंगणै बैठण रा करम तौ म्हांरा इज हैं। आपरै तौ लारला भौ री करणी चोखी करियोड़ी है, इण सूं आपरै हेटै तो सदा आसण ई रैवैला। ठाकरसा कहï्यौ-नीं नीं बावळा कदै ई अैड़ौ मौकौ बण जावै। थूं अबै गुचळकिया मत खा। म्हनैं सुभट बता के म्हैं जमीं माथैं बैठूं तो थूं कठै बैठैला ? चौधरीं मुभ्कतौ बोल्यो-हुकुम, जे रावळै जमीं माथै बिराजौ तो म्हैं थोड़ौ खाड़ो खेदनै नीचे बैठ जावूंला। ठाकरसा भळै पूछ़्यौ-चौधरी जे म्हैं खाड़ा में बैठू तौ थूं कठै बैठैला ? चौधरीं सोच में पडग्यौ। थोड़ी ताळ विचारनै पडूंतर दियौ-जै म्हैं उण ऊंड़ोड़ा खाड़ा में बैठग्यों तौ थूं कठै बैठैला ? चौधरी बौल्यौ-म्हैं भळै पांचके हाथ ऊंडौ धैड़ खादनै नीचे बैठ जावूंला ? रावलौ तो सदा ऊंचा ई बिराजौला? पण ठाकरसा नै फेर ई धीरज नीं व्हियों। बौल्या-हां रे चौधरीं, जै म्हैं ऊंडोड़ा धैउ़ में बैठग्यो तौ थूं पछै कांई करैला ? चौधरीं इण दपूचा आगै कायो व्हैग्या। उणनै जूंंझल छूटी। बैड़ाई सूं जवाब दियौ-म्हैं तो घड़ी-घड़ी आज इज कैवूं के रावलै ऊचां ई बिराज्या रैवो, पण आपरी मरजी ऊंडोड़ा धैड़ में बैठण री हैं, तो खुसी सूं उठै बिराजौ। म्हैं धूड़ न्हाकियां पूठैं लांठी सिलाड़ी सिरकाय देवूंला। इण तरै चौधरीं चतराई सूं ठाकर सा ने चुप कर दिया।
जरणी धर जाळोर री, जीतां अरि पग जाय।
लाजै मावड़ लोरियां, कुळ काळस लग जाय॥
भारत रचियां ही भड़ां, भारत रुप कहाय।
भारत सूं के दिर डरां, रहणी भारत मांय॥
प्रमलै सौरभ पौढियौ, आजादी री आंण।
जलम घूंट में जांणियौ, समर चढ़ंण चहुआंण॥
वरदायक वर वीरता, प्रथमी जस पूजाण।
सिर पडियां लड़ियौ समर, वीरमदेव चहुआंण॥
रंण बंका थैं राखियौ, मात भौम रो मांण।
अवसल वीरम आप री, पिरलै लग पहचांण॥
चार बांस चोवीस गज, अंगुळ अष्ट प्रमाण।
ईते पर सुळतान है, मत चूकैं चौहाण॥
ईहीं बाणं चौहाण, रा रावण उथप्यो।
ईहीं बाणं चौहाण, करण सिर अरजण काप्यौ॥
ईहीं बाणं चौहाण, संकर त्रिपरासुर संध्यो।
ईहीं बाणं चौहाण, भ्रमर ळछमण कर वेध्यो॥
सो बाणं आज तो कर चढयो, चंद विरद सच्चों चवें।
चौवान राण संभर धणी, मत चूकैं मोटे तवे॥
ईसो राज पृथ्वीराज, जिसो गोकुळ में कानह।
ईसो राज पृथ्वीराज, जिसो हथह भीम कर॥
ईसो राज पृथ्वीराज, जिसो राम रावण संतावण।
ईसो राज पृथ्वीराज, जिसो अहंकारी रावण॥
बरसी तीस सह आगरों, लछन बतीस संजुत तन।
ईम जपे चंद वरदाय वर, पृथ्वीराज उति हार ईन॥
एक सेठ रो कारोबार देस-दिसावर फैलियोड़ो हो। उणरै एक बेटो हो। ठोर-ठोर उणरी गद्दिया हीं, पण उणरै स्वरगसिधारण रै पछै छोरो ठीक तरीका सूं काम नीं संभालियो। वो पुराणा लोगां नै निकाल नुवा मिनखा नै काम माथे राख दिया। इणरो असर ओ व्हियों कै काम-काज खराब व्हैवण लागो। एक दिन सेठ रै बैटा माथै दस हजार रूपिया री दरसन हुंडी आई। गल्ला में रूपिया नहीं हा, पण हुंडो सिकारनी जरूरी हीं। छोरो उदास मुंडा सू घरै गियो, उणरी मां कह्यों कै बात हैं ? वो सारी बात बतलायी तो मां कह्यो रूपया रा जुगाड़ में थोड़ो अैम लाग जावैला, तू आपरी गद्दिया माथै कागद लिख अर रूपिया भेजण वास्ते कह, पण इतरा टैम हुंडी खड़ी नीं रै सके, इण सारू जुणोड़े बूढे मुनीम नै बुलावा। बूढ़ा मुनीम रै घरे बुलावो भेजियो ग्यो। मुनीम री घणी उमर व्हैगी ही। ठंड रो मौसम हो, इण सारू बुढो मुनीम रूई अर शाला ओढणै जाड़ा रै मारै कांपतो-कांपतो सेठी री पेड़ी माथै पूगियो। उणमें काम करण री आसग नीं ही। मुनीम कह्यों आज घणी ठंड हैं, पेड़ी माथै हीं सिगड़ी मंगवाओं ? मुनीम रै सारू सिगड़ी मंगवाई गई। हुंडी लावण वालो मिनख हुंडी बूढा मुनीम रै हाथ में दी अर मुनीम कांपता हाथां सूं हुंडी पढण लागौ। मुनीम रा हाथ ठंड सू कांप रिया हा। हुंडी उणरै हाथ सू छूट सिगडी मांय पडगी। हुंडी जल-बग गी जणै मुनीम घणों दुख परगट करियो वो उणसूं कह्यो भाई । हुडी म्हारा हाथ सूं सिगड़ी माय पडऩै जलगी, अब थै उणरी पैठ मंगवा लो। पैठ आवैला जणै थाणै रूपिया मिल जावैला। हुंडी लावण वालां मिनख आ बात नीं जान सकिया कै बूढ़ौ मुनीण जाण-बूझणै हुंडी सिगड़ी मांयने डाली है। सेठ री फरम घणी मोटी हीं, मुनीम रो भारी परभाव हो। वो मिनख वठा सूं चलो गियो। उणरै जावण रै पछेै सेठ रो बैटो मुनीम रा पग पकड़ लिया अर उणणै पाछौ बड़ा मुनीम री गादी माथे बिठा दियो। थौड़ा टेैम रे पछै सैठ रो कारोबार उणी तरा सूं चालण लागौ। देस-दिसावर में सेठ रा छोरा री पैचाण व्हैगी।
एक डोकरे आप रे धरा जा रहï्यो हो। रास्ते में उणनै एक छोरो मिल्यो। दोनूं सागै हो लिया। वै जिकै गांव जा रहï्या हां, वो चार कोस हो। छोरी डोकरे ने कहï्यों, बाबा, गंाव चार कोस पर है, दो कोस थे म्हनै कांधे पर चढ़ा ल्यां, दो कोस म्हैं थाने चढ़ा लेस्यूं। डोकरो कहï्यो, थू तो जवान है, म्हनै चढ़ा लेसी, पण म्है कीकरण थनै चढाऊंला, रहण दे भाया। बीच में एक जगा नाठो आयो तो डाकरो जूता आपरे हाथां में ले लिया, पण छोरो पैर्या हीं राख्या। डोकरो मन में सोची, ओ छोरो मूरख है, नया जूता पानी में गीला कर र खराब कर लिया। थोड़ी देर में दोनूं गांव पूरा ग्या। डोकरो छोरे ने इशारे सूं आपरो घर बतायो, तो छोरो एक कांकरी घर कै किवांड पर मार दियो। किवांड डोकरे री छोरी खोल्या। छोरो पाणी मांग्यो। छोरी पाणी लेयर आई तो छोरो पूछ्यो, पाणी काचो है के पाको ? छोरी भी हुशियार हीं, बोली, पाणी काचो है। डोकरो ऐ बाता सुण र हैरान होग्यो। वो छोरी ने मांयने ले जाय र कहï्यो कै छोरी मूरख है, रस्ते में इण तरहा री बातां करो। छोरी हुशियार हीं, मा बापू ने कैवण लागी, बाबा, छोरो मूरख कोनी, हुशियार है। वो आधे रस्ते थाने चढ़ावण और आधे रस्ते खुद चढ़ण री बात यूं करी हीं कै आधे रस्ते थे की बोलो, आधे रस्ते म्हैं कीं बोलू तो रस्तो आराम सूं कट जावैला। पाणी रे मांय जूता इण वास्ते नीं उतारया, क्यूंकि पाणी रे तल रे मांय कोई चीज सूं पगां में चोट लाग सके। जूता मिनख री जान सूं बता कीमती कोनी हुया करै। गांव आया पछै छोरो किवांड पर कांकरो फेंक्यो, उण टैम म्हैं न्हा रेया हीं। म्हैं फटाफट बारै निकळ कर कपड़ा पैरय और बारे आय र किवांड़ खेल दियो। घरै आतां ही छोरो पाणी लावण पर पूछये कै पाणी काचो है या पको, इण रो मतलब यो हैं कै म्हैं कुंवारी हूं या ब्याहता, म्हैं पडूतर दियो, पाणी काचो है, यानी म्हैं कुंवारी हूं। डोकरो पूरी बात समझग्यों अर छोरी सो ब्याह उण छोरे सू कर दियों। दोनूं राजी सुखी रैवण लाग गया।
एक पठान नै घोड़ा री जोरदार पैचाण की। पण किणी कारणा सूं उणनै धंधा में घाटो व्हैगियो। उणरी मां रै कन्नै थोड़ा रिपिया बचायोड़ा हां । एक दिन पठान मां सू रिपिया लिया अर घोड़ा लेवण सारू निकलियो। घणो घूम्यो पण उणनै कोई घोड़ो रास नी आयो। फिरतो-फिरतो वो एक रात धोबी रै घरे रूकियो। रात राा उणनै लक्खी घोड़ा री टाप सुजीणी। वो प्रकास करनै देखियो तो धोबी रे गधां रै माय एक बछड़ो हो। दिनूगै वो दस रिपिया में बछड़ो धोबी सूं ले लियो। वो उणनै खिलायो पिलायो। एक बरस में वो मोटो तगड़ो व्हैगियो। वो उणनै बेचण सारू बादसाह रै कनै गियो। बादशाह रै कनै एक आलिम आयोड़ो होद्ध वो एक तीर सूं निशाने लगा मोर रो चितराम बणा दियो। बादसाह उणरै एक सेर आटा अर पइसा भर घी रोज बांध दियो। पछेै वो चितराम दिखाया तो उणरै पांच कपड़ा बणवा दिया। उणनै दुख व्यिहों कै राजा उणरो मान बिगाड़ दियो। एक दिन बादसाह री सवारी निकली पठान आपरा घोड़ा लेयर शामिल व्यिहों।् पारसी बादसाह सूं कह्यो लक्खी घोड़ा री टाप सुनाई देवे है। बादसाह उणसूं घोड़ो ढूंढ़ लावण रो कहïïयो। परखी घोउड़ो राजा रै सामी हाजिर कर दियो। बादशाह नै घोड़ा घणो पंसद आयो। पारखी नै इनाम रै रूप में एक चारपाई दिलवा दी अर पठान सूं सवा लाख रिपिया में घोड़ो खरीद लियो। एक दिन उस्ताद कहï्यों म्हैं एक हुनर जाणूं। म्हैं मिनख देख बता सकूं कै वो मां-बाप री औलाद हैं या वर्णसंकर। बादशाह कह्यों तड़के म्हारे दरबारियां री पैचाण करजे। रात रा सगला दरबारी पारखी रै घरै पूग्या अर उणनै घणा रूपिया देयर आपरी बात कैवण सारू राजी करियो। पारखी दूजै दिन दरबार में बादसाह सू कहïï्यो आप भटियारा रा बैटा हो। झूठ बोलू तो मां नै पूछ लिरावो। बादसाह उणी टैम आपरी मां सू साची बात पूछण लागौ। मां कहï्यों-बेैटा तू थारे बाप रो हीं पण सामी एक भटियारो रैवतो व्है सके उणरी छाया पडग़ी हों। वो पारखी सू राज पूछयों जणै वो कहियो कै आप जिको इनाम दियो उणसूं आ बात जाणी। बादशाह नै घणी सरम आई वो पारखी नै घणो इनाम दे विदा करियो।
कन्हैयालाल सेठिया की आत्मा से सम्वाद की प्रक्रिया में मैं गूंगा हो जाता हूं। शब्द नहीं जुड पाते। ब्राह् का परब्राह् रू प मेरा शब्द देवता विस्मित सा मुझे देखता रह जाता है। सन् 1919 के सितम्बर की 11 तारीख को वे जन्मे और सन 2008 के नवम्बर की 11 तारीख को महाप्रयाण कर गए। जीवन के 89 वर्षो में उन्होंने और कोई साधना पाली या नहीं, किन्तु उनकी एक सर्वप्रकट साधना का साक्षी तो मैं स्वयं भी हूं। वह साधना थी अपनी मातृभाषा राजस्थानी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में ससम्मान स्थापित देखना। मात्र 29 वर्ष की आयु में ही राजस्थानी और हिन्दी के प्रख्यात कन्हैयालाल सेठिया ने यह साधना शुरू कर दी थी। देश स्वतंत्र हुआ। संविधान सभा बनी। संविधान में आठवीं अनुसूची जैसी सूची जुडी और सेठिया आल्हादित के साथ ही आनंदित भी हो उठे। यह राजस्थानी के शोधार्थियों का काम है कि वे अध्ययन करके शोध करके बताएं कि इस ने 'धरती धोरां री' गीत किस उम्र में लिखा। देश के आजाद होने से लेकर अपने महाप्रयाण तक 60-62 वर्षो का जीवन काल सेठिया ने अपनी सर्जना के साथ-साथ अपनी चिरसाधना के फलित होने की प्रतीक्षा में बिताया। उन्हें लगता था कि अब केन्द्र सरकार राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दे देगी। किन्तु उनकी यह साध, यह साधना पूरी नहीं हुई। वे अपने जीवनकाल में यह नहीं देख सके। मुझे इस अधूरी आस पर कुछ कहना है।
पूरे 6 वर्ष, सन् 1998 से सन् 2004 तक मैं राज्यसभा का सदस्य था। संयोग यह था कि इन्हीं 6 वर्षों तक संविधानवेत्ता डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी भी राज्यसभा के सदस्य थे। मैं कांग्रेस की ओर से इस अमर सदन में था और उधर भारतीय जनता पार्टी की तरफ से लक्ष्मीमल्ल सिंघवी राज्यसभा में बैठे थे। परिस्थितियां ऎसी बनीं कि इन्हीं वर्षो में भारत के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति महामहिम कृष्णकांत का निधन हो गया और उनके स्थान पर उपराष्ट्रपति का चुनाव लडकर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत भारत के उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति बने। इस पदारू ढता ने सेठिया को नया उल्लास और नया उत्साह दिया। मुझे उनका टेलीफोन मिला। हमेशा की तरह वे बोले-बैरागी! अब तुम लोग मिलजुल कर कोशिश करो कि राजस्थानी को न्याय मिले। मेरी मायड भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थापित हो जाए। मैंने प्रणाम करते हुए अपनी सहमति दी। वे तब भी फोन पर कहते रहे-'सीमा की सुरक्षा और देश की रक्षा में जो भाषा सबसे बडी संख्या में अपने नौजवान बेटे शहीद होने के लिए देश माता को दे, निछावर करे उन बेटों की मां, उनकी मायड भाषा इतना सा सम्मान भी नहीं पा सके यह कब तक चलेगा' जब अशोक गहलोत पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री थे तब उनकी पहल पर राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास कर केन्द्र को भेज दिया था कि राजस्थानी भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किया जाए।
राज्यसभा की उन छह वर्षो की कार्यवाही से स्पष्ट है कि गृहमंत्री पद पर रहते हुए लालकृष्ण आडवाणी ने एक प्रश्न के उत्तर में इस मांग को स्वीकार किया था। इसके बाद सरकार बदल गई। दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी की जगह मनमोहन सिंह आ गए। इस बीच सेठिया को अशोक गहलोत ने विधानसभा के सर्वसम्मत प्रस्ताव की सूचना सगर्व दे दी थी। केन्द्र की सरकार बदलते ही सेठिया का कोलकाता से फिर फोन आया- 'बैरागी! अब क्या बाधा है सब तो अनुकूल हैं। मेरी तबीयत ढीली है। बच्चे मेरी बहुत अच्छी सेवा कर रहे हैं। ये मुझे मरने नहीं दे रहे हैं और दिल्ली वाले मुझे जीने नहीं दे रहे हैं। कुछ करो भैया! और नमस्कार प्रणाम के बाद फिर फोन बंद हो गया। सन् 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार बनने पर जब मेरा और लक्ष्मीमल्ल सिंघवी का निवृत्ति समय करीब आया तो इस दिशा में सिंघवी ने राज्यसभा में अशासकीय संकल्प प्रस्तुत करके यह मांग फिर उठाई। भारत के गृहमंत्री (तत्कालीन) शिवराज पाटिल ने उत्तर दिया। संकल्प के पक्ष में सिंघवी, प्रभा ठाकुर, मैं (बालकवि बैरागी) और डॉ. कर्णसिंह बोले। डॉ. कर्णसिंह ने राजस्थानी के साथ अपनी मातृभाषा डोगरी को भी जोडा। शिवराज पाटिल ने उत्तर दिया कि अकेली राजस्थानी ही नहीं साथ में भोजपुरी को भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की पूरी तैयारी है। माननीय सदस्य अपना संकल्प वापस ले लें। और सिंघवी ने संकल्प वापस ले लिया।
हम आश्वस्त होकर बैठ गए। आज न तो आडवाणी गृहमंत्री हैं, न आई.डी. स्वामी राज्यमंत्री गृह हैं और न शिवराज पाटिल गृहमंत्री के पद पर हैं। शेखावत पूर्व उपराष्ट्रपति हैं। लक्ष्मीमल्ल सिंघवी स्वर्गीय हैं और मैं एक पूर्व सांसद हूं। कन्हैयालाल सेठिया की आत्मा जहां भी है वहां से सभी को देख रही है। राजस्थानी भाषा अपने साथ होने वाले संभावित न्याय की प्रतीक्षा में दिल्ली की ओर देख रही है। और मैं कन्हैयालाल सेठिया की स्मृति में लिख रहा हूं- 'हे निर्मल मन! हे निश्छल आत्मा!! हे पुण्य पुरूष!!! हमें क्षमा करना। हम तुझे श्रद्धा देते रहे पर श्रद्धा के प्रत्येक क्षण के साथ-साथ तुझे श्रद्धांजलि देने का अधिकार खोते रहे। हमें क्षमा कर दो महाकवि!
बाल कवि बैरागी
[लेखक विख्यात कवि और पूर्व सांसद हैं]
स्कंद पुराण रा श्रीमाल महात्म्य रै ३३वें अध्याय मायने खरानना देवी री जाणकारी मिलै। इणरे मुताबिक श्रीमाल याने भीनमाल इलाकां में सरकूप नाम रो तीरथ मायै गरदभ जैडा मुंडा वाली खरानना देवी री जगै है। ऐड़ी मानता है कै इणरा दरशन सूं जीव रौ भय मिट जावै। माजीसा री पूजा करण सूं किणी भी भांत रा दुसमण नैडा नीं आवै। डरावणा सुपणा दूर जावै। ज्योतिष अर तंत्र शास्त्रां में नवग्रह अर चौषठ जोगणियां री पूजा रौ विधान है। खरानना देवी इण चौषठ जोगणियां रे मायने सूं एक है। श्रीमाली ब्राह्म्णां रे मांय दवे- गोधाआं री कुलदेवी खरानना देवी ही है। जोधपुर किलां रै लारे पुराणो अमरनाथ मंदिर, रिक्तिया भैरूजी मंदिर, दत्त समाज री समाधि अर कलजी महाराज रौ आश्रम है। पैला अठै एकलिंगजी स्थापित हा, पण कुछ बरस पैलां इण मंदिर रो जीर्णोद्वार व्हियो। पछै अठै शरद पूनम रै दिन नवग्रह अर खरनना देवी री परतिमा लगाई गी। कैवे कै इन नवग्रहों री परतिमा राजमहल ठाकर लाया हा। परतिमा फतेहसागर री शिव बावड़ी में रखी ही। इणरै बाद जिण-जिण परतिमा लगावा रो परयास करियौ वो काल रा मुंडा में गिया परा। नौ बामण मर ग्या। तब शास्त्रोक्त विधान रै मुजब शुद्र वर्ग रा आदमी सूं सूरज देव री परतिमा लगाई गी। शास्त्रीय विधान री पालणा करण सूं इण रै पछै हादसा नीं व्हियो। नवग्रह री परतिमा में सूरज देव बीच में स्थापित करिया। परतिमा नै सोना जैड़ा कपड़ा पैराया। चंद्रमा रो आसण अग्रिकोण कानी है। उननै धोला कपड़ा पैराया। आ परतिमा पचिम दिसा री कानी है। चंद्रमा धरती रै पाणी नै परभावित करै अर दरिया में आवा वाळा जवार भाटा रां नियामक है। इण कारण सूं वै मानव मन रे मायने आवा वाला जवार भाटा नै काबू करै है। कैवे है कै आदमी पूनम अर इणरै आगे अर लारे री तिथियां माथै खुदकुसी करै। मंगल ग्रह री परतिमा माथै लाल कपड़ा पैराया ग्या है। अर इणरौ मुंडो दखिन दिसा री कानी है। आगली वातां सारू बाट जोवौत्र........ साभार:- मारवाड़ री फुलवारी

राजस्थानी भासा संसार री सिरैजोग भासावां मांय सूं एक है, इण में रत्ती भर रो ही फरक कोनी। इण रौ इतिहास ढाई हजार बरस जूनौ है अर इण रौ सबद कोस सैसूं लूंठौ है, जिण में दो लाख दस हजार सबद है जिका संसार रै किणी सबदकोस में नीं है। इण में अलेखूं मुहावरा नैं कहावतां है अर एक एक सबद रा अनेकूं पर्यायवाची सबद है, जित्ता संसार री किणी भी भासा में मिलणा अबखा है। आर्य भासावां में राजस्थानी रो मुकाबलो करण री खिमता किणी भासा में कोनी। असमिया, बंगला, उड़िया, मराठी आद भासावा मांय सूं संस्कृत रा सबदां नैं टाळ दिया जावै तो इण भासावां री गत देखणजोग व्है।
मतलब इण भासावां रौ आप रौ न्यारौ इसौ कोई लूंठौ थंब-थळ कोनी कै वै आप रै पगां पर थिर रह सकै। आधुनिक काळ में इण भासावां में अथाग साहित्य रौ सिरजण तो व्हियौ है पण इण में इण भासावां री मौलिकता अर भासा री मठोठ निगै नीं आवै। इण भासावां रा सबदकोस भी इत्ता लूंठा नीं है कै ऐ आप रै खुद रै बूतै पर कोई सिरजण कर सकै। संस्कृत सबदां री बोळगत इण भासावां में है। भासावां री जणनी वैदिक भासा संस्कृत रै पुन परताप बिना तो कोई भी भासा खड़ी नीं हुय सकै। राजस्थानी भासा में भी संस्कृत रै तत्सम सबदां रौ प्रयोग व्है पण इण सूं राजस्थानी भासा री आप री निजू मठोठ कदैई कम नी व्है। राजस्थानी रै जूनै साहित्य सूं ले'र आज रै आधुनिक साहित्य रै सिरजण तकात राजस्थानी भासा आप री मूळ लीक पर चालती रैयी अर आप री मठोठ नीं छोडी।
आ वीरां, सूरां, संतां अर १३ करोड़ जणखै री जींवती जागती मिसरी सी मीठी भासा है। इण री कविता रै एक छंद सूं खागां खड़क उठै। जुध रै वर्णन री कविता आज रै टेलिविजन रै लाइव प्रसारण नैं भी लारै बैठावै। एक बांनगी निजर है- तोपें तें तें धुधआळी धधक उठी धुंआआळी गोळी पर बरसे गोळी पण लोही सूं खेले होळी। कांठळ आयां ज्यूं काळी आभै छायी अंधियारी। बोल्यो गरणाटो गोळी रूकगी सूरज री उगियाळी। इण रै रसपाण सूं वीर बळती लाय में कूद पड़ै। इण री एक हाकल सूं बैरी आप री पूठ पाछी फोरले। रूप अर सिणगार रै गैणां सूं लड़ालूम आ एकदम आजाद न्यारी-निरवाळी आर्य भासा है।
आ नीं तो आथूणी (पश्चिमी) हिन्दी अर अगूणी (पूर्वी) हिन्दी री बोली है अर नीं ही इण री उप भासा है। भारतीय संविधान लागू हुवण सूं पैली यूनिवर्सिटी प्रेस बोम्बे-कलकता-मद्रास कानीं सूं एन हिस्टोरीकल एटलस ऑफ दी इण्डियन पेनिनसुला रो पेलड़ौ संस्करण जिकौ १९४९ में छपियो उण में विगतवार ४०-४१ पांनावळी ८२ सूं ८५ तांई में पांनावळी ८२-८३ में समूची विगत रै सागै भारत री आर्य भासावां रा छपिया भासावार इतिहासू नक्ष इण री साख आपूं आप भरै कै राजस्थानी अेक न्यारी-निरवाळी एकदम आजाद आर्य भासा है, जिण रौ खेतर बौत बडौ नैं इण री डाळ्यां समूचै राजस्थान में पांगरयोड़ी है। इण साच नैं संसार री कोई ताकत कूड़ नीं घाल सकै।
इणी नक्शे में हिन्दी फगत ईस्टर्न हिन्दी अर वेस्टर्न हिन्दी रै रूप में दिखाईजी है जिण रौ खेतर आज रै भारत रा उत्तर प्रदेश अर मध्य प्रदेश रा कैई इलाका है। इण रै अलावा इण दोवूं प्रांतां में भी आप-आप री क्षेत्रीय भासावां रा पसराव है। आदिकाळ सूं इण इलाकां री आपरी न्यारी लूंठी भासावां ही जिकी आज मरणागत है। याद करो तुलसीदास जी री ''रामचरित मानस'' नैं जिकी अवधी भासा में रचीजी ही, जिकी हरैक हिन्दू रै कंठां बस्यौड़ी है पण कित्तै दुरभाग री बात है कै आज उण काळजयी भासा रौ नांमून तकात मिटा दियौ। डरता गोगो धोके री तरज पर फगत रामायण पाठ रै अलावा आज इण रौ कोई नांव ई नीं लेवै। इण रै सागै ई वैदिक भासा संस्कृत जिकी सगळी भासावां री जणनी है, जिण में धर्म, ज्ञान-विज्ञान, वेद-उपनिसद अर समूची सृसिट ई समाइज्यौड़ी है उण भासा री आज कांईं दुरगत व्है रैयी है- आ किणी सूं छानी नीं है। मगध रा राजा जनक जी री मिथिलांचल प्रदेश री भासा मैथिली री गत भी इसी गमाईजी है। इणी भांत उत्तरादे भारत रा राज्यावां री घणकरी भासावां काळ रौ कव्वो बणगी। आखर कुण गिटग्यो इण भासावां नैं अर डिकार ई नीं ली? जवाब सांपड़ते है कै जिका राजस्थानी नैं गटकण री चेस्टा करी वां ही ताकतां इण भासावां नैं गटक'र डिकार ही नीं ली। आजादी सूं पैली राजस्थानी सैती इण सगळी भासावां री आप री न्यारी पिछाण ही अर बोल-बतलावण रै सागै आपू-आप री रियासतां में राज-काज री भासा पण ही। लोकतंत्र री आड में राज करण री हूंस रै पाण इण भासावां नैं आप री बळी देवणी पड़गी। उतरादे भारत खासकर जिण नैं हिन्दी बेल्ट कह्यौ जावै री जनता नैं भारत रा राजनेतावां रास्ट्रवाद अर देसभगती रै नांव पर भोदू बणा'र वांरी भासावां री बळी लेय ली अर राज री गिदी माथै बैठग्या अर लारलै साठ बरसां सूं सत्ता रौ सुख भोग रह्या है। कारण कै इण पांच प्रांतां में जठै हिन्दी थरप्यौड़ी है, ऐ पांच प्रांत है उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान अर हरियाणा। लोक सभा री ५४२ सीटां मांय सूं लगैटगै आधी सीटां इणी हिन्दी बेल्ट सूं आवै, बाकी सीटां समूचै भारत सूं आवै। इण समूचै भारत मांय सरकार २२ भासावां नैं संविधान री आठवीं अनूसुचि में भेळ राखी है जिकी आपू आप में रास्ट्रभासा है जिण मांय सूं घणकरी भासावां तो भारत रा केई प्रांतां री भासा है अर केई भासावां जियां संस्कृत, उर्दू, सिंधी, नेपाळी आद भासावां है जिकां रौ कोई थळ-थंब नीं है पण वै भारत रै संविधान री आठवीं सूचि में सामल है।
भारत सरकार आ दुहाई देवै कै काश्मीर सूं ले'र कन्या कुमारी अर गुजरात सूं ले'र आसाम तांई भारत एक है! ओ एक क्यूं है? इण रौ कारण भी साफ है कै बठै आप आप री भासावां है भारत सरकार रो कोई दखळ कोनी। इण भासावां रै पांण ही ओ भारत एक है, भारत भर में व्हिया भासायी आंदोलण इण री साख भरै। नेहरूजी हिन्दी नैं पनपावण खातर अर इण नैं रास्ट्रभासा बणावण सारू घणा ही ताफड़ा तोड़या पण वांरी आस फळी कोनी अर वांनै ओ ऐलाण करणो पड्यो कै जद तांई ऐ प्रांत नीं चावैला बठै हिन्दी नीं थरपीजैला। आजादी सूं पैली भारत एक हो, एक सुर हो, पण आजादी मिल तांई सगळी ऐकता-अखंडता लीरा-लीरा हुयगी। सता री मळाई खातर सगळा लड़-भिड़ पड़या। वांरी रास्ट्रीयता भारतीय नीं हुय'र असमिया, बंगाली, उड़िया, मराठी, गुजराती, पंजाबी, तमिल, कन्नडिगा, मलयाली, तेलंगाना, हुयगी। बंगला अर असमिया भासा में एक सबद रो प्रयोग व्है ''जातीय'' जिण रौ अरथ रास्ट्रीय सूं है जिण रौ सीधो अरथ लगायो जा सकै कै वांरी रास्ट्रीयता भारतीय नीं बल्कै असमिया अर बांग्ला है! महारास्ट्र में मी मुंबईकर, आमी अखोमिया, आमी बांग्ला आद कांई साबत करै? मतलब सगळां री आपू-आप री भासावां रास्ट्रीय भासा है अर आपू आप री रास्ट्रीयता है तद म्हांरी क्यूं नीं? म्हांरी भासा-संस्कृति नैं भारत सरकार अर प्रदेस में वांरा हजूरिया-खजूरिया रिगदोळण अर गटकण री समूची चेस्टा करली।
पण राजस्थानी भासा वा लूंठी अर रगत सूं सींचिज्यौड़ी भासा है कै इण नैं कोई काळ रौ कव्वौ नीं बणा सकै। राजस्थानी भासा री मानता री मांग लारलै साठ बरसां सूं लगौलग चाल रैयी है, राजस्थानी में लगौतार साहित्य रौ सृजन व्है रह्यौ है। इण नैं लेय'र धरणा, प्रदर्शन, मुखपत्ती सत्यागृह व्है रह्या है। एक पीढी खतम व्है तो दूजी पीढी मोरचो लेवण नैं त्यार व्है जावै। कहणै रौ मतलब औ कै राजस्थानी री मानता री मांग अठै कदैई मगसी नीं पड़ी। अठै रा लोगां में देश प्रेम अर रास्ट्रवाद री भावना कूट-कूट'र भरयौड़ी है कै वां आपरी इण मानता री चिणखारी नैं हरमैस सिलकायां राखी पण देश हित में कदैई वां आप री सींवा नीं तोड़ी।
भारत रै संविधान री सींवा रै मांय रैय नैं आप रौ अहिंसात्मक आंदोलण चलायौ। स्यात विश्व रौ सैसूं बडौ-लूंठौ नैं लंबो भासायी आंदोलण है जिकौ आज भी आप रै नैम-धरम सूं चाल रह्यौ है। दूजै खांनी इणी भारत देश में जिका भासायी आंदोलण व्हिया वांरै रगत रा छींटा आज भी निगै आवै। राजस्थानी लोग भी चांवता तो हिंसा रै मारग चाल सकता हा पण राजस्थानी लोगां देश हित रै आगै कदैई आपै सूं बारै नीं आया अर मांय ही मांय मोसीजता रैया। इसी आस लियां राजस्थानी रा घणकरा हेताळू जिका चांवता कै वांरै जींवता जी राजस्थानी नैं नीं मानता मिळ जावै, सुरग सिधारग्या अर वांरी मन री मन मांही रैगी। फैर भी नूंवी पीढी इणी ढाळै आप रै आंदोलण नै चलांवती थकी इण चिणखारी नैं सिलगायां राखी है, इण खातर वांनै घणा-घणा रंग, लखदाद।
इण भासायी आंदोलण में राजनेतावां री भूमिका सरूपोत सूं ही नाजोगी रैयी है। आपरी पार्टी रै बडै नेतावां री स्यान में पूंछ हिलावण वाळा राजस्थान रा राजनेतावां कदैई इण लूंठी भासा री भावना री कदर नीं करी। फगत बीकानेर रा सांसद महाराजा करणीसिंहजी लोकसभा में पैलीपौत १९६८ में राजस्थानी भासा री संवैधानिक मानता सारू निजू विधेयक लाया हा पण बहुमत रै जबकै रै आगे वांरौ निजू विधेयक पारित नीं हुय सक्यौ। फेर भी वां हारा नीं मानी अर राजस्थानी री मानता री बात सूं संसद नैं गुंजायां राखी। पण दुरभाग री बात कै वै किणी पार्टी सूं जुड़योड़ा नीं हा इण कारण वांरी आ आस फळी कोनी अर वै भी आ ईज आस ले परा'र सुरग सिधारग्या। वांरै गयां पछै तो लोकसभा में ऐन सून वापरगी अर राजस्थानी री मानता री मांग इण मिजळा नेतावां री भेंट चढगी। लाख-लाख धिक्कार है! इण मिजळा नेतावां नैं जिका राजस्थानी लोगां रै वोटां रै पुन परताप सूं लोकसभा अर विधान सभा में पूगै। अठै पूग्यां पछै तो वांरी जीभ रै डाम सो लाग ज्यावै, वै भासा रा भावां नैं भूल ज्यावै अर आप रा नव रा तेरह करण में लाग जावै। इतिहास इण नेतावां नैं कदैई माफ नीं करैला।
राजस्थानी लोगां रास्ट्र री ऐकता अर अखंडता रै नांव पर हिन्दी नैं पनपावण खातर भारत रा भाग्यविधातावां रै कैवण मतै हिन्दी नैं अंगेजली अर हिन्दी नैं पनपावण में किणी भांत री कौर-कसर नीं राखी। ध्यान जोग है कै हिन्दी रौ आदिकाळ अर मध्यकाळ राजस्थानी रै थंबा पर टिक्योड़ौ है, जिण नैं कोई नकार नीं सकै। हिन्दी नैं रास्ट्रभासा रै रूप में थापित करण में इण राजस्थान प्रांत अर देश रै खुणै-खुणै में बसणिया राजस्थानी लोगां रै योगदान नैं बिसरायो नीं जा सकै। उण सगळा राजस्थानियां री ही आ मायड़ भासा राजस्थानी है।
राजस्थानी रा चावा-ठावा कवि कानदान जी रौ एक कथण है कै राजस्थान रा आदमी तो इण आकाश रा थंबा है, अर ऐ थंबा पड़ ज्यावै तो लोग मर ज्यावै किचरीज'र। आ बात सोळै आना साची है। हिन्दी पत्रकारिता रै इतिहास सूं लगा'र आज तकात देखलो - हिन्दी अखबार जगत रा मालिक कुण है? गीता प्रेस गोरखपुर रौ हिन्दी नैं पनपावण में कित्तो बडो हाथ रह्यौ है इण रौ जित्तो भी बखाण कियौ जावै कम हुसी। वांरी री भी जड़ां राजस्थान सूं है अर वै भी मूळ राजस्थानी है। इत्तो ही नीं हिन्दुत्व नैं आप री बापौती समझण वाळी भाजपा अर रास्ट्रीय स्वंयसेवक संघ रौ रास्ट्रीय सरूप बणायै राखण रौ समूचौ भार ही प्रवासी राजस्थानियां आप रै कांधा पर उठा राख्यौ है। उतर पूर्व सूं लेय'र ठेट दिखणादे भारत में रास्ट्रीय स्वंयसेवक संघ अर भाजपा रा जमीं सूं जुड़योड़ा कार्यकर्ता वै राजस्थानी इज है जिका इणा रै झण्डां रौ भार आप रै कांधा पर ढो रह्या है।
केहणौ रो मतलब औ है कै भारत देश रै हर भांत रै बिगसाव में राजस्थानी लोगां आप रौ सौ क्यूं वार दियो। आजादी रै आंदोलण में क्रातिकारियां नैं रातवासा इण राजस्थानी लोगां ही इज दिया अर वांरी तन-मन-धन सूं सेवा करी। क्यूं भूलै वै भारतवासी? हिंदवाणै री लाज राखणिया बीकानेर रा राजा कर्णसिंह जिकां औरंगजेब री सगळै हिन्दू राजावां नैं मुसळमान बणावण री योजना नैं सिग चढण सूं पैली अटक नदी पर राख्यौड़ी नावां में सूं पैली नाव तोड़'र हिन्दुत्व री लाज राखी अर जय जंगळधर बादशाह री पदवी पाई। महाराणा प्रताप अर मुगल पादसाह अकबर री इतिहासू लड़ाई जिण में कई कीरत थापित हुया अर आज भारत री राजनीति रा पंडित भी हिन्दु मुस्लिम भाईचारै रै इण प्रसंग सूं वोटां री फसल काटण में पाछ नीं राखै।
बनारस हिन्दु विश्वविधालय री थापना में बीकानेर रा महाराजा गंगासिंहजी रौ कित्तो बडौ उदगर है? जिण नैं जाणणौ चावौ तो पंडित मदन मोहन मालवीय रा संस्मरण पढो तो बेरो पड़ ज्यासी कै ओ उदगर किंया है? अठै उदगर सबद रो बरताव जाण-बूझ'र कर्यो है- जिण सूं हिन्दुत्व रा झंडा लियोड़ा वां लोगां अर भारत सरकार रा ऐलकारां नैं पतो पड़ै कै म्है किण दिस चाल रह्या हां। इत्तो हुंवता थका भी अठै रा जाया-जलम्या लोगां री मायड़ भासा राजस्थानी आजादी रै साठ बरसां पछै भी मानता खातर क्यूं झूर रैयी है? संसार रै सैसूं लूंठै देश अमरीका री सरकार राजस्थानी भासा नैं मानता देय दी तद २००३ में राजस्थान विधानसभा सूं राजस्थानी भासा नैं संविधान री आठवीं अनुसूचि में भेळण रौ सरब सम्मति सूं पारित प्रस्ताव केन्द्र सरकार क्यूं दबा राख्यौ है? संसार री सिरै भासावां में तेरवीं ठौड़ राखण वाळी भासा राजस्थानी भारत रै संविधान री आठवीं अनुसूचि में सामल २२ भासावां में गिणणजोग क्यूं नीं?
आज तकात भारत सरकार २२ भासावां नैं संवैधानिक मानता दे राखी है - राजस्थानी सागै आ दुभांत क्यूं? कठै है राजस्थानी लोगां रो समानता रौ अधिकार? राजस्थान री जनता रौ चुण्योड़ौ विधायक इण २२ भासावां में तो सपथ ले सके-बोल सके, पण आप री मायड़ भासा राजस्थानी में नीं- औ कठै रौ न्याव है? कांई ओ ही लोकतंत्र है? कांई राजस्थान भारत रै गणराज्य रौ गमलो कोनी? नेपाळी भासा जिकी एक पराये मुलक री भासा है- नेपाळी भासी लोग भारत रै सिक्किम, बंगाल अर आसाम रै चाय बगानां में रैवास कर'र मजदूरी करै। इण वास्तै सिक्किम, आसाम अर बंगाल री सरकार फगत एक हिमायत री पांनड़ी केन्द्र सरकार नैं भेजी अर केन्द्र सरकार हाथूंहाथ नेपाळी भासा नैं आठवीं अनुसूचि में भेळली।
अठिनैं देश रै सैसूं बडै प्रांत राजस्थान री विधान सभा सूं पारित संकळप री कोई गिनर ही नी। कांई आ राजस्थान विधान सभा री अवमानना कोनी? केन्द्र सरकार री आ दुभांत लोकतंत्र पर आंगळी उठणी नीं है? आखर केन्द्र सरकार री मनस्या कांई है? जद राजस्थान रै एक जिलै जितै राज्य री भासा नैं संविधान री आठवीं अनुसूचि में भेळ सकै तद राजस्थानी भासा नैं आठवीं अनूसुचि में भेळण सारू ओसका क्यूं ताक रैयी है?
राजस्थानी लोग संत सुभाव रा अर देश भगत है अर आप रौ ओ आंदोलण साठ बरसां सूं गांधीगिरी रै सागै चला रैया है। इत्तौ लंबो आंदोलण तो आजादी खातर गांधी बाबे भी नीं चलायो हो पण केन्द्र सरकार कपटी नींवत रै सागै आप री आंख्यां मींच राखी है। लारलै साठ बरसां सूं भारत री केन्द्र सरकार राजस्थान री प्रदेस सरकार राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति नैं रिगदोळण में लागौड़ी है। प्रदेस सरकार राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी बणाणै रै सागै राजस्थान नैं नाथी रौ बाड़ो समझ'र पांच दूजी भासावां री अकादमियां औरूं खोल दी। अठै भी जिकै दळ री सरकार व्है उण रा पटठा अकादमी री जाजम पर बैठ'र मळाई खांवता रेवै अर पुरस्कारां री बांदरबांट में अळूझ्योड़ा रेवै। भासा रो इण सूं कोई भलो नीं व्है। इण नेतावां रो नाजोगापण देखौ कै अठै राजस्थानी भासा री अकादमी तो समझ में आवै पण दूजी भासावां री अकादमी री अठै जरूत नी ही फैर भी अठै दूजी भासायी अकादमियां थरपदी अर राजस्थानी भासा री अकादमी नैं पूरी बापड़ी बणा दी। अठै नीं तो अध्यक्ष है अर नीं ही सचिव, बिना कार्य समिति अर सामान्य सभा रै अकादमी चाल रैयी है।
राजस्थान में पढाई-लिखाई रौ स्तर सफां गमाईज्योड़ौ है अर पाठ्यक्रम रौ तो समूचौ घाण ही कचोईज्योड़ौ है। पाठ्यक्रम में पढेसरी रै सारू जिकी जरूत है वो तो नीं है बिना सींग-पूंछ रौ मसालो अर इतिहास भर्यो पड़यौ है जिकौ उण नैं माडाणी पढणो पड़ै। जद उण नैं खुद री भासा, साहित्य अर संस्कृति री ही समझ नीं है जद वो आथूण री सभ्यता अर संस्कृति, यूरोप अर मध्य-पूर्व रौ इतिहास पढ'र किसौ तीर मार सकैला? राजस्थान में शिक्षा रौ स्तर कित्तो गयो-बीतो है एक नमूनो निजर है - एक पढेसरी जिकौ एम ए एम फिल है अर बी. ऐड. कर रह्यौ है उण सूं एक दिन बात व्ही तो ठा पड़यौ कै उण नैं हाल ओ भी ज्ञान नीं है कै नानी बाई अर नरसी मेहता कुण हा? नानी बाई रौ मायरौ कित्तो जगचावौ है इण रौ भी उण नैं ज्ञान नीं है तद सोचो अर समझो कै राजस्थान रौ शिक्षा स्तर कित्तौ निमळौ है। इण पढेसरयां सूं तो बत्तौ ज्ञान गांव रा वां अणपढ लोगां कनै है जिका इण भासा संस्कृति नैं जीवै-पोखै।
तीन-तीन पीढ्यां बीतगी मानता मानता करतां अर बिना आप री भासा में भणया। भासा रै इण बिछेड़ै रा जुम्मेवार कुण? ओ तो हळाहळी किणी दूध चूंगतै टाबर सूं मां रा हांचळ खोस परोर परयां कर दियौ जावै, सैंग ओ ही हाल भारत री सरकार राजस्थानी लोगां रा आपरी भासा में पढण रा अधिकार खोस'र कर्यौ है। कांई भारत री सरकार आ चावै कै राजस्थान रा जोध-जवान सड़कां पर आय'र प्रदेश री शांति नैं भंग करै-तोड़ा-फोड़ा, आग-बळीता करै तद वा आप री आंख्या नैं खोले?
आज री भारत री राजनीति रा नूंवा युवराज राहुल गांधी सूं राजस्थानियां री खास दरखास्त है कै जदि वै अपणै आप नैं भारत री राजगिदी रै उंचै आसण पर बैठयौ देखणौ चावै तो राजस्थानी लोगां री मांग नैं सीकार करणी पड़सी नींतर, इण रा सुपना ही लेवौला! राजस्थानी अबकी बेळां सोनै री तश्तरी में राख'र आप री आजादी अडाणै मेलण वाळा नीं है, जिण भांत राजस्थान रा बडेरा राजनेतावां नेहरूजी रै कैवणमतै आप री आजादी अडाणै मेलदी ही। इण खातर युवराज राहुल गांधी हुंसियार-खबरदार! ओ कांटां रौ सेवरौ बांधण सूं पैली सोच लिया कै कठैई राजस्थानी भी नाहर नीं बण जावै। खूंटी टंग्यौड़ी खागां खड़क नीं उठै! राजस्थानी जवानां में धधक रैयी चिणखारी राजनीति रा महलां नैं बाळ नीं न्हाखै। राजस्थान में उठता आंधी रा भतूळ आप री राजनीति री चूळां नैं हिला'र राख दे अर आप रै राजा बणण रा सुपनां नैं किरची-किरची कर दे!!
आखर अन्याव अर दुभांत री सींव हूया करै। इतिहास इण बात रौ साखी है कै जद जद भी ससक आम जन री भासा, संस्कृति नैं कचोवण अर दबावण री चेस्टा करी वै कदै लंबो राज नीं कर सक्या। ब्रिटिष् साम्राज्य रौ सूरज कदै आथमतो नीं हो उण नैं भी इण कारण जावणौ पड़ियौ कै वां अठै री भासा संस्कृति रै सागै रळ-मिळ'र चालण री ठौड़ आप री अंग्रेजियत थरपणी चावी अर वांनै आप रा बींटा गोळ करणा पड़िया। मूगल, लोधी, चन्द्रगुप्त, अशोक, शक अर हूण सगळां री ही आ इज गत व्ही। अठीनैं राठौड़ राजवंश जठै भी गयौ बठै री भासा, संस्कृति नैं अंगेजली अर आप रै राज री सींवा रौ बिगसाव कर्यौ। राजस्थान में राठौड़ बदायूं सूं आया अर अठै री भासा, संस्कृति रै सागै रळ-मिल'र चाल्या अर अठै रा ही इज बण'र रैयग्या अर वांरै जस रा गीतड़ा आज भी गाईजै। राठौड़ां रौ समूचौ इतिहास इण बात री साख भरै कै जदि वै आपसरी में नीं लड़-भिड़ता तो स्यात आज इण मिजळा नेतावां नैं राज करण रौ मोकौ नीं मिळतो। इसी आप है कै औ पाप रौ घड़ो एक दिन अवस फूटैला अर राजस्थानी लोगां नैं आप री मायड़ भासा में भणण रा अधिकार मिलैला। जय राजस्थान, जय राजस्थानी।
ई ठिकाणौ :- rajastahnihelo@gmail.com
गूदड़ै में डोरा घालां
-ओम पुरोहित कागद
अब आप पूछस्यो कै घेसळो कांई हुवै? घेसळो हुवै बोरटी री अणघड़ जाडी अर बांकी-बावळी लकड़ी सूं बणायोड़ोचलताऊ सौटौ जकै सूं खळै में बाजरी रै सिट्टां नै कूट'र दाणा काढ़्या करै। इण नै रेरू, खोटण या घेसळो कैवै। भूंगर रा घेसळा बी इण भांत ई बांका-बावळा अर बेअरथा हुवै। हिन्दी में अमीर खुसरो, घासीराम अर वासूजी ई घेसळां माफक ढकोसळा लिख्या। इण भांत रै बेअरथै छंद नै हिन्दी में ढकोसला, परसोकला या झटूकला कैईज्यौ। आं सगळां में सिरै पण भूंगर रा घेसळा ई थरपीज्या। इणी रै पाण भूंगर नै राजस्थानी लोक साहित्य में बो मुकाम मिल्यो जकौ अमीर खुसरो नै हिन्दी साहित्य में मिल्यो।
भूंगर राजस्थानी भाषा में हंसावणियां अर बेअरथा घेसळा लिखता। आं घेसळां री खास बात आ है कै आं में बेमेळा सबद है अर छेकड़ली तुक नीं मिलै। घेसळा बेतुका होंवता थकां बी रसाल है। भूंगर नै किणी री फटकार ही कै थारी कविता में जकै दिन लारली तुक मिलसी उण दिन थारी मौत हुयसी। मौत तो हरेक नै आवै। भूंगर नै बी आवणी ई ही। पण भूंगर री मौत फटकार नै साची करगी।
एक दिन री बात। भूंगर सांढ माथै गांवतरौ करै हा। गेलै में एक सुन्नो कुओ आयो। कुए मांय कोई कूकै हो। बचाओ-बचाओ। भूंगर कुऐ में देख्यो तो एक माणस टिरै। भूंगर नै दया आयगी। माणस नै काढ़ण री जुगत बैठाई। उण सांढ नै कुओ डकावण सारू तचकाई। सांढ लखायो ही, इण सारू ताती अर बेगवान ही। सांढ एक फाळ में ई कुओ डाकगी। सांढ रै डाकतां थकां भूंगर कुए में टिरतै माणस री टांग पकड़ली। सांढ तो परलै पार पण भूंगर धै कुए में। अब भूंगर बी माणस टांग थाम्योड़ो कुए में टिरै। कवि मन इण विपदा में ई कविता कर दी जको कोठै सूं होटै आयगी- ''डाकणी ही सांढ, डाकगी कुओ। एक तो हो ई, एक और हुओ।'' बीं नै अचाणचक चेतै आई कै आज तो कविता में हुओ री तुक कुओ सूं मिलगी। आज आयगी दिखै मौत। पण उण नै लखायो कै फटकार बेअसर होयगी दिखै। फटकार रो असर होंवतो तो मर नीं जांवतो? बण इणी खुसी में ताळी बजाई कै धर'र'र-धम्म कुए रै पींदै जा पड़्यो। कुए में पड़तां ई भूंगर रो हंसलो उडग्यो। इयां निभी फटकार। भूंगर री लोक सूं विदाई हुई पण उण रो साहित्य आज बी लोक में भंवै। आओ बांचां भूंगर रा कीं घेसळा-
बरसण लाग्या सरकणा, भीजण लागी भींत।
ऊंठ सरिसा बैयग्या, दाळ रो सुवाद आयो ई कोयनीं।।
(2)
गुवाड़ बिचाळै पींपळी, म्हे जाण्यो बड़बोर।
लाफां मार्यो घेसळो, छाछ पड़ी मण च्यार।
लुगायां, कांदा चुगल्यो ऐ, चीणां री दाळ-सा।।
(3)
भूंगर चाल्यो सासरै, सागै च्यार जणां।
भली जिमाई लापसी, वा रै कस्सी डंडा।।
(4)
भिड़क भैंस पींपळ चढी, दोय भाजग्या ऊंठ।
गधै मारी लात री, हाथी रा दोय टूक।
लुगायां, लाठी ल्याओ ऐ, गूदड़ै में डोरा घालां।।
(5)
चूल्है लारै के पड़्यो, म्हे जाण्यो लड़लूंक।
पूंछ ऊंचो कर'र देखां, तो टाबरां री माय।।
(6)
चरड़-चरड़ फळसो करै, फळसै आगै दो सींग।
आगै जाय'र देखूं तो, कुतड़ी पाल्लो खाय।
चरणद्यो बापड़ी नै, गाय री जाई है।।
(7)
गुवाड़ बिचाळै गोह पड़ी, म्हैं जाण्यो गणगौर।
पूंछड़ो ऊंचो कर'र देखूं तो, दीयाळी रा दिन तीन ही है।।
मूंड मुंडायां तीन गुण, मिटी टाट री खाज।
बाबा बाज्या जगत में, खांधै मैली लाज।।
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Posted By AAPNI BHASHA - AAPNI BAAT to AAPNI BHASHA-AAPNI BAAT at 6/30/2009 01:00:00 AM
