राजिया रे दूहा सारु http://rajiaduha.blogspot.com क्लिक करावें रज़वाड़ी टेम री ठावकी ख्यातां रो ब्लॉग आपरै सांमै थोड़ाक टेम मा आरीयो है वाट जोवताईज रौ।

'आओ, म्हारै कंठां बसो भवानी' -ओम पुरोहित कागद

Rao GumanSingh Guman singh

राजस्थान रजपूतां-रणबंका री खान। पण सारू रण। पण पाळै अर रण भाळै। जीत री पाळै हूंस। हूंस पण स्यो-सगत रो वरदान। इणीज कारण स्यो रा गण भैरूं अठै पूजीजै। मां सगत दुरग रूखाळी। इणीज कारण दुरगा बजै। रणबंका खुद नै सगत रा पूत बतावै। मरूधरा रै कण-कण में रण री छाप। रण री देवी रणचंडी री ध्यावना आखो राजस्थान करै। नोरतां में तो कैवणो ई काँईं।घर-घर दुरगा री पूजा हुवै। सरूपोत में गजानंद महाराज अर सुरसत सिंवरीजै। भळै मात भवानी ध्यावै।



सिमरूं देवी सारदा। गुणपत लागूं पांय।।
सदा भवानी दाहिनी, सन्मुख होय गणेश।
पांच देव रक्षा करै, ब्रह्मा विष्णु महेश।।


एक साल में च्यार नोरता आवै। चैत, आसाढ, आसौज अर माघ रै चानण पख री एक्युं सूं नौमीं ताईं। चैत रा नोरतां नै वासन्तिक नौरता। आसाढ अर माघ रा नोरता गुप्त नोरता। आसोज रा नोरता बजै शारदीय नोरता। नोरता में जगजामण मां भागोती रै सैंकड़ूं रूपां री पूजा होवै। तीन मूळ देवियां- महालक्षमी, महाकाळी अर महासरस्वती। शक्ति रा उपासक आं री ध्यावना करै। शक्ति रा उपासक इणी पाण शाक्त बजै।दीठमान जग रै सरूपोत में बिरमा जी परगट्या। एकला डरप्या। साथ री गरज पाळी। खुद रै ई रूप सूं देवी परगटाई।इण सारू बिरमा अर सगत में राई-रत्ती रो ई भेद नीं मानीजै। महादेवी कैवै- म्हैं अर बिरम सदीव एक हां। बुद्धि रै भरम सूं ई भेद लखावै। इणी जग जामण शून्य जगत नै पूरण करियो। महादेवी यानी महालक्ष्मी देवियां अर देव परगटाया। महालक्ष्मी पैली महाकाळी अर महासरस्वती नै प्रगट करी। भळै आं दोन्यां नै एक-एक स्त्री-पुरूष सिरजण री आज्ञा दीवी। खुद बिरमां अर लक्ष्मी नै सिरज्या। महाकाळी शंकर अर त्रयी नै। महासरस्वती विष्णु अर गौरी नै। पछै आपस में जोड़ा बनाया। शंकर-गौरी, विष्णु-लक्ष्मी, बिरमा-त्रयी(सुरसत) रा जोड़ा बण्या। भळै बिरमां अर सुरसत जगत रच्यो। विष्णु अर लक्ष्मी जगत नै पाळ्यो। शंकर अर गौरी परळैबेळा में जगतसंहार करियो।महालक्ष्मी-महाकाळी अर महासरस्वती ई नौ देवियां परगट करी। शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी अर सिद्धिदात्री। आं रा दूजा रूप है-चामुंडा, वाराही, ऐन्द्री, वैष्णवी, महेश्वरी, कौमारी, लक्ष्मी, ईश्वरी अर ब्राह्मामी। नोरतां में इणी नौ देवियां री पूजा देवी भागवत मार्कण्डेय पुराण अर दुर्गासप्तसती में बताई विधि मुजब नौ दिनां तक होवै। पैलै दिन केश-संस्कार। दूजै दिन केश गूंथण-संस्कार। तीजै दिन सिंदूर-आरसी संस्कार। चौथै दिन मधुपर्क तिलक संस्कार। पांचवै दिन अंगराग-आभूषण संस्कार। छठै दिन पुष्पमाळा संस्कार। सातवैं दिन ग्रहमध्य पूजा। आंठवैं दिन उपवास अर पूजन। नौवैं दिन कुमारी पूजा। कुमारी कन्यावां नै जीमाइजै। दसवैं दिन पूजा करणियैं री पूजा अर जीमण, दान-दखणां। नौ रातां ताणी एकत करै। इणी कारण ऐ नौ दिन नोरता बजै।
============== 
नोरतां रो पूजन विधान
==============
पैली घट थापना होवै। बेकळा री वेदी थरपीजै। वेदी में जौ-कणक रा ज्वारा बाईजै। इण माथै सोनै, चांदी, तांबै या माटी रो कळसियो धरै। कळसियै माथै देवी री फोटू लगावै। फोटू ना होवै तो कळसियै रै लारै साथियो। असवाड़ै-पसवाड़ै त्रिसूळ। पोथी या साळगराम धरै। पैलै नोरतै में स्वस्तिवाचन अर शान्ति पाठ कर'र संकळप लेईजै। भळै गणपत, षोडष मात्रिका, लोकपाळ, खेतरपाळ, नवग्रह, वरूण, ईष्टदेव री ध्यावना करै। प्रधान देवळ री षोडषोपचार सूं पूजा होवै। अनुष्ठान में महाकाळी अर महासरस्वती री पूजा होवै। नौ दिन तक दुर्गा-सप्तशती रा पाठ करै। नौ रातां दिवळो चेतावै। आधीरात, भखावटै अर दिनूगै जोत करीजै। सम्पदा चावणियां आठवैं दिन अर आखी धरती रै राज री मनस्या राखणियां नौवैं दिन माताजी री कढ़ाई करै। कढ़ाई रै दिन कुमारी पूजन होवै। कन्यावां नै देवी मान पग धोय'र गन्ध पुहुप सूं पूजा करियां पछै जीमावै। चूनड़ी-गाभा भेंटै। नोरतां में कन्यावां री पूजा रा फळ बखाणीजै। एक सूं एश्वर्य। दो सूं भोग अर मोक्ष। तीन सूं धर्म अर्थ अर काम। च्यार सूं राज्यपद पांच सूं विद्याङ्क्तबुद्धि। छै सूं षटकर्म सिद्धि। सात सूं राज्य। आठ सूं सम्पदा अर नौ सूं पिरथी री प्रभुता मिलै । दस वर्ष सूं कम री कन्यावां न्यारी-न्यारी देवी मानीजै। दो बरस री कन्या कुमारी। तीन बरस री त्रिमूर्तिनी। च्यार बरस री कल्याणी। पांच बरस री रोहिणी। छै: बरस री काळी। सात बरस री चंडिका। आठ बरस शाम्भवी। नौ बरस री दुर्गा अर दस बरस री कन्या सुभद्रा या स्वरूपा बजै।

छबीस दूहा पूंछ आळा--ओम जी पुरोहित"कागद"

Rao GumanSingh Guman singh

चरका मरका चाबतां 

चंचल होगी चांच ।
फीका लागै फलकिया
अकरा सेकै आंच ।
करमां रो कीट लागै ।

2

नेता नाटक मांडिया
ले नेता री ओट ।
नेता नै नेता चुणै
जनता घालै बोट ।।
लोक सिधारो परलोक ।।

3

लोक घालै बोटड़ा
नेता भोगै राज ।
लोकराज रै आंगणै
देखो कैड़ा काज ।।
जोग संजोग री बात।।

4

हाकम रै हाकम नहीँ
चोर न जामै चोर ।
नेता तो नेता जणै
नीँ दाता रो जोर ।।
नेता जस अमीबा ।।

5

चोरी जारी स्मगलिँग
है नेता रै नाम ।
आं कामां नै टाळगै
दूजो केड़ो काम।।
आप बिकै नी बापड़ा ।।

6

जनता हाथां हार कर
हाट करावै बंद।
फेर ऐ खुल्ला सांडिया
खूब खिंडावै गंद ।।
जिताओ बाळो आगड़ा।।

7

चोळा बदळै रोज गा
चालां रो नीँ अंत ।
भाषण देवै जोर गा
वादां में नीँ तंत।।
कियां घड्या रामजी ।।

8
नेता मरियां कामणी
माता मरियां पूत।
बो इज होवै पाटवी
जो मोटो है ऊत ।
मारो साळां रै जूत ।।

9

बोट घलावै बापजी
दे कंठां मेँ हाथ
जीत बजावै ढोलड़ा
अणनाथ्या हे नाथ ।।
पोल मेँ बजावै ढोल ।।

10

बाजो बाजै जीत गो
नेता घर मेँ रोज ।
हारै जनता बापड़ी
भूखी टाबर फोज ।।
घालो ओज्यूं बोट।।

11

नेता खावै धापगै
जनता भूखी भेड़ ।
पांच साल मेँ कतरगै
पाछी चाढै गेड़ ।।
राम ई राखसी टेक ।।

12

नेता मुख है मोवणां
धोळा धारै भेस ।
जीत्यां जावै आंतरा
हार्‌यां करै कळेस ।।
दे बोट काटो कळेस ।।

13

पाटै बैठ्या धाड़वी
नितगा खोसै कान ।
नेता भाखै आपनै
चोखो पावै मान ।।
नमो कळजुगी औतार ।।

14

सेडो चालै नाक मेँ
मुंडै काढै गाळ ।
नेता मांगै बोटड़ा
कूकर गळसी दाळ ।।
रामजी ई रुखाळसी ।।

15

लोकराज रै गोरवैं
खूब पळै है सांड ।
चरणो बांरो धरम है,
बांध्यां राखो पांड ।।
करणी तो भरणी पड़ै।।

16

काळू ल्यायो टिगटड़ी
बणग्यो काळूराम ।
जनता टेक्या बोटड़ा
जैपर बण्यो मुकाम ।।
इयां ई तिरै ठीकरी ।।

17

धापी आई परण गै
नेता जी रै लार ।
नेता राखै चोकसी
बा टोरै सरकार ।।
पतिबरता है बापड़ी।।


18

नेता पूग्यो सुरग मेँ
धापी रै
गी लार।
ओ'दो मांग्यो लारलां,
धापी देगी धार।।
धणी री तो ही कुरसी।।

19
नेता चाबी झालगै,
दी कूए मेँ न्हाख ।
लोकराज रै बारणै,
अब तूं बैठ्यो झांख ।।
फसा ली कुतड़ी कादै।।

20

लोगां पूछी पारटी
नेता होग्यो मौन ।
नेता पूछी पारटी
कर नेता नै फोन ।।
बदळी तो कोनीँ आज।।

21

बेल्यां मांगी पारटी
नेता मारी डांट।।
पारटी म्हारी आपग,
है देवणगी आंट ।।
पारटी बदळै क देवै ।।

22

बोट घालो धपटवां,
नीँ तो करस्यूं झोड़।
नीँ छोडूंला गांव मेँ,
भाज्या फिरस्यो खोड़।।
बोट सूं कटसी पापो ।।

23

नेतावंश विशेष है,
औ’दै रो हकदार ।
नेतण जाम्यौ सेडलौ,
बणसी बो सरदार ॥
ऊंदर जामसी ऊंदर ॥

24

नेता फ़ळ तलवार रो,
बधै बुढापै धार ।
आडौ पटकै राज नै,
जे खा जावै खार ॥
और के खाडा खोदै ॥

25

नेता भासण ठोकियो,
ढीली करगै राफ़ ॥
म्हानै टेको बोटडा़,
पाणी देस्यां साफ़ ॥
जा पछै नै’र बंद है ॥

26

नेता टोरी बातडी़,
दे वादां री पांड ।
अबकै आपां जीतगै,
करस्यां खेत कमांड ॥
छावनी खोली छेकड़ ॥

मोबाइल में मायड़ भाषा री गूंज

Rao GumanSingh Guman singh



जालोर। (हिंगलाज चारणआप जिण मोबाइल सूं सम्पर्क करण री कोशिश कर रिया हो वो जवाब कोनी दे रियो है सा। थोड़ी देर पछे कोशिश करो या आप जिण मोबाइल सूं सम्पर्क करण री कोशिश कर रिया हो वो फिलहाल कवरेज क्षेत्र सूं बारे हैं। मोबाइल में अगर इस तरह का मीठा संदेश सुनने को मिले तो चौंकिए मत। आज कल कुछ मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों की ओर से राजस्थानी में इस प्रकार की सूचनाएं मुहैया कराई जा रही है। इससे न केवल मायड़ भाषा का मान बढ़ रहा है, वरन गैर राजस्थानियों के बीच भाषा का प्रचार-प्रसार भी हो रहा है।

मायड़ भाष्ाा को भले ही अभी तक मान्यता नहीं मिली हो, लेकिन मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों ने इसे भाषा का दर्जा दे दिया है। यही कारण है कि गुजराती, मराठी या अन्य किसी स्थानीय भाषा की तरह राजस्थान के मोबाइल उपभोक्ताओं को राजस्थानी में संदेश मिल रहे हैं। मोबाइल की ऑटोमेटिक टेली मेन्यूलिंग सिस्टम में अब राजस्थानी को जगह मिल गई है। किसी उपभोक्ता का मोबाइल बंद हो, कवरेज क्षेत्र से बाहर या वह जवाब नहीं दे रहा है तो इसकी तमाम तरह की सूचना राजस्थानी मेे मिल रही है। हालांकि यह सेवा सुविधा अभी तक कुछ ही सेवा प्रदाता कंपनियों ने शुरू की है।

समझ बढ़ेगी

राजस्थान में राजस्थानी बोलने वाले रहते हैं ऎसे में मोबाइल कंपनियों का यह कदम सराहनीय है। इससे राजस्थानी का प्रचार तो होगा ही। गांवो में रह रहे ग्रामीणों को भी सही व सटीक जानकारी मिल पाएगी। इससे भाषा का मान बढ़ा है। भाषा की मान्यता के लिए सबको मिलकर प्रयास करने होंगे।
- लालदास राकेश, राजस्थानी साहित्यकार

भाषा का मान बढ़ा

आज का जमाना तकनीक का है। मोबाइल की यह सुविधा करोड़ों लोगों तक राजस्थानी को पहुंचा रही है। यह बहुत बड़ी बात है। इससे भाषा का तो फायदा होगा ही यहां के लोगों में अपनापन भी बढेगा। राजस्थानी बहुत ही समद्ध भाषा है।
- अर्जुनसिंह उज्जवल, व्याख्याता राजकीय महाविद्यालय जालोर
फायदा होगा

मोबाइल की दुनिया में जगह मिलने से भाषा को प्रचार-प्रसार होगा। यह बहुत ही अच्छी पहल है। इससे ग्रामीण लोगों को सूचना के समझने में काफी फायदा होगा। राजस्थानी के लिए भी गर्व की बात है। हम सभी लोगों को मिलकर इसकी मान्यता के लिए प्रयास करने होंगे। 
- शैतानसिंह काबावत, जिला पाटवी, राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति चिन्तन परिषद



पर्यावरण रा दूहा

Rao GumanSingh Guman singh

प्रदूशण नै रोकणो, सै सूं पैलो काम।
जे काबू ओ नीं हुयो, बचा नीं सके राम।।
 रंग-बिरंगो जैर‘तो, रच रैयो पोलीथीन।
 फैषन, सुविधा कारणै, जीवण मौत अधीन ।।
नई है सुद्ध खावणो, नीं है निरमल नीर।
आभै में विस घुल रयो, हवा जै‘र रा तीर।।
 दिवलो एक बाट रो, जल सी आखी रात।
 दियो जी चार बाट रो, बुझती आधी रात।।
इण धरा री सुदंरता, रंग-रूप-रस पाण।
जे प्रकशित मिटती गई, जगती हुसी मसाण।।
 धरती सै री मात है, आभो है जी तात।
 मा- जाया सा बिरछ है, मत कर इण सूं घात।
धुंआ पी-पी धुंआ हुया, तन धुंएं री लकीर ।
तन-मन धन धुंआ लगा, हुयग्यो फकीर ।।
 घायल धरा टसक रयी, हुयो गगन बीमार,
 सागर रो दम धुट रयो, नदियां हाहाकार
सिवजी दाई जै‘र पी, इमरत बाँटे रूख।
कामधेनु अे कलपतरू, मत काटो थे रूख।।
 जांभा जी सूं सीख लो, खेजडली री आण।
 हरा रूंख जे काट सो, हुय सी देस मसाण।।
धरती मा रो दूध पी, बधै अे हरिया रूंख।
मा-जाया नै बाढ थे, बालो मा री कूख।।
 इकीसवीं मे रैवणिया, सुणो सदी रो ग्यान।
 आज लगाओं बन हरा, भविय मिलै बरदान।।
गगन-पवन, जल अर धरा, बणिया जै‘री दंस।
मिनख जमीं जलमा रया, धश्तराश्ट्री बंस।।
 जठै-जठै आदम गयो, मैल बिखरी जाण।
 गंग, हिमालो, चांद ई, मैला मिनखा पाण।।
नीं मेला, ना मगरिया, नई तीज-त्योहार।
सावण नीं, फागण नई, किंया करै सिणगार।।
 भोर कुंकमिया नई, केसरिया नीं सांझ।
 मोती सा दिनडा कठै, नीं चांदणिया रात



लक्ष्मीनारायण रंगा

बूढ़ी माई बापरी, हरखी धरा समूल

Rao GumanSingh Guman singh

आसाढ़ री पैली बिरखा साथै धरती पर एक जीव उतरै। बेजां फूटरो, बेजां कंवळो अर बेजां नाजक। नाजक इत्तो कै घास पर पळका मारती ओस नै परस सकां पण इण नै परसतो हाथ धूजै। आ टीबां पर रमती ओस ई है। लाल ओस। जियां ओस तावड़ो नीं सैय सकै अर सूरज री किरणां रै रथ पर सवार होय'र इण लोक सूं उण लोक सिधार ज्यावै। उणी भांत ओ जिनावर भी तावडिय़ै सूं बचण सारू बूई-बांठ अर घास-पात री सरण में चल्यो जावै। कैय सकां, टीबां रै लोक सूं बांठां रै लोक सिधार ज्यावै। अर जद ठंड हुवै, पाछो ई टीबां नै मखमली करद्यै। 
आपणी भाषा में आ बूढ़ी माई बजै। तीज, सावण री डोकरी, थार री बूढ़ी नानी अर ममोल इणरा ई नांव। हिंदी में इणनै वीर-बहूटी अर इंद्रवधू अनै अंग्रेजी में रेड वेलवेट माइट कैवै। जीव विज्ञान री दीठ सूं ओ संधि पाद विभाग री लूना श्रेणी में वरूथी वर्ग में द्रोम्बी डायोडी परिवार में डायनाथोम्बियम वंस रो जीव है। इणरो हाड-पांसळी बायरो डील घणो लचीलो। पैली बिरखा री टेम बूढ़ी माई जमीं में इंडा देवै। आठ पौर में बचिया बारै निकळै। ऐ जमीं रै मांय-मांय नान्हा-नान्हा जीवां नै खाय'र पळै। अर सूरज उगाळी रै साथै बारै टुरता-फिरता निगै आवै। जद सूरज छिपै, पाछा ई जमीं में बड़ ज्यावै। इणरै आठ पग। पण नखराळी चाल। संकोची सभाव। जकी छेड़्यां छापळै। डील पर रेशम सूं कंवळा लाल बाळ। इणरो गात इत्तो कंवळो कै चित्रण करतो कवि कतरावै। इत्ता कंवळा सबद कठै लाधै? अर कठै लाधै इत्तो कंवळो भाव, जिणसूं इणरो कंवळो डील अभिव्यक्त होय सकै। इणनै किणरी उपमा देवै? इसो उपमान कठै ढूंढै? मखमल? ना! कठै मखमल अर कठै बूढ़ी माई! कठै राम-राम अर कठै टैं-टैं। हां, मां रै मोम सरीखै दिल री कंवळाई सूं मींड सकां आपां इणनै। पण आ उपमा ई बेमेळ है। क्यूंकै वस्तुगत खासियत री भावगत खासियत सूं तुलना अपरोगी लागै। ईयां कै बारली विसेसता नै भीतरली विसेसता सूं तोलणो फिट कोनी बैठै। अब रैयी बात इण रै फूटरापै री। फूटरी इत्ती कै देख्यां जीवसोरो हुवै। हथाळी पर लेवण नै जी करै। पण इण रो रूप बिगड़ण रै भय सूं कदे-कदास ई अर बा ई अणूंती सावचेती सूं पकड़'र हथाळी पर धरां। आ हाथ में लेयां मैली हुवै। इण रै रूप रो पार नीं। टीबां पर हवळै-हवळै चालती बूढ़ी माई लाल जोड़ै में लाल बीनणी-सी लागै। जकी रूप रै रसियां नै आप कानी खींचै। आ टाबरां नै घणी प्यारी लागै। वै इणनै हथाळी पर राखै अर घणा लाड-कोड करै। बा पंजा भेळा कर्यां हथाळी पर पड़ी रैवै। टाबर नाचता-कूदता गावै- 'तीज-तीज थारो मामो आयो, आठूं पजां खोल दे।' आओ, आपणी भाषा रै दूहां में इणरो बिड़द बखाणां! 

बूढ़ी माई बापरी, हरखी धरा समूल। 
जाणै आभै फैंकिया, गठजोड़ै पर फूल॥ 

रज-रज टीबां में रमै, बिरखा मांय ममोल। 
जाणै मरुधर ओढियो, चूंदड़ आज अमोल॥ 

चालै धरती सूंघती, बूढ़ी माई धीम। 
आई खेत विभाग सूं, माटी परखण टीम॥ 

बूढ़ी माई आ नहीं, झूठो बोलै जग्ग। 
इंदराणी रै नाथ रो, पड़ग्यो हूसी नग्ग॥ 


Ramswaroopji kisan

कवि 'गंग तो एक गोविंद भजै

Rao GumanSingh Guman singh

मृगनैनी की पीठ पै बेनी लसै, सुख साज सनेह समोइ रही।
सुचि चीकनी चारु चुभी चित मैं, भरि भौन भरी खुसबोई रही॥
कवि 'गंग जू या उपमा जो कियो, लखि सूरति या स्रुति गोइ रही।
मनो कंचन के कदली दल पै, अति साँवरी साँपिन सोइ रही॥

करि कै जु सिंगार अटारी चढी, मनि लालन सों हियरा लहक्यो।
सब अंग सुबास सुगंध लगाइ कै, बास चँ दिसि को महक्यो॥
कर तें इक कंकन छूटि परयो, सिढियाँ सिढियाँ सिढियाँ बहक्यो।
कवि 'गंग भनै इक शब्द भयो, ठननं ठननं ठननं ठहक्यो॥

लहसुन गाँठ कपूर के नीर में, बार पचासक धोइ मँगाई।
केसर के पुट दै दै कै फेरि, सुचंदन बृच्छ की छाँह सुखाई॥
मोगरे माहिं लपेटि धरी 'गंग बास सुबास न आव न आई।
ऐसेहि नीच को ऊँच की संगति, कोटि करौ पै कुटेव न जाई॥
रती बिन राज, रती बिन पाट, रती बिन छत्र नहीं इक टीको।

रती बिन साधु, रती बिन संत, रती बिन जोग न होय जती को॥
रती बिन मात, रती बिन तात, रती बिन मानस लागत फीको।
'गंग कहै सुन साह अकब्बर, एक रती बिन पाव रती को॥
एक को छोड बिजा को भजै, रसना जु कटौ उस लब्बर की।

अब तौ गुनियाँ दुनियाँ को भजै, सिर बाँधत पोट अटब्बर की॥
कवि 'गंग तो एक गोविंद भजै, कुछ संक न मानत जब्बर की।
जिनको हरि की परतीत नहीं, सो करौ मिल आस अकब्बर की॥


(बस इस बात से जहांगीर ने कविराज को मरवा दिया और उसका समस्त साहित्य भी नष्ट करवा दिया. मुश्किल से चार पांच कविताएं ही मोजूद है)

दारु दाखा रो

Rao GumanSingh Guman singh

भर लाये कलाळी दारु दाखा रो
पीवण वालो लाखा रो
भर लाये कलाळी 
दारु दाखा रो दारु पीओ रंग रमो
और रात राखो नैन
दोखी थारा जल मारे
सुख पावैला नैन
भर लाये कलाळी 
दारु दाखा रो

ऊँचो पावा ढोलियो
और झीनी पड़ी निवार
मृगा नैनी अरज करै
रमिया राजकुमार
शीशी तो डग डग करै
और प्यालो करै पुकार
मृगा नैनी अर्ज्या करै
पीवो राज कुमार
पीवण वालो लाखा रो
भर लाये कलाळी 
दारु दाखा रो
के 
दारु मेड़ते
तो के 
दारु अजमेर
म्हारा रठोदा अरोग्सी
सोमो राखो सेन
पीवण वालो लाखा रो
भर लाये कलाळी 
दारु दाखा रो
साजन आया हे सखी तो
कांई भेंट कराँ
थाल भरयो गज मोतिया
ऊपर नैन धरां
पीवण वालो लाखा रो
भर लाये कलाळी 
दारु दाखा रो

हे खडग।

Rao GumanSingh Guman singh

गरब गनीमा गालणी, दुज्जण दलणी रंग।
भारथ भवा भगीरथी, रंग क्रपाणी रंग।।
परचौं देवण में प्रचंड, अडतां पैलै आप।
सैणा मण सरसावणी, दुसमण दलणी दाप।।
चपळा सम चमकै चपळ, हण अरियण रण हुंत।
खट खग खल दल खौल दे, करामत कर कूंत।।
(हे खडग। 
तू ही प्रत्यक्ष शक्ति है। तू ही शत्रुओं के गर्व का चूर्ण करने वाली है और तू ही उन्हें प्रतिहत करने वाली है। स्पर्श होते ही तू प्रत्यक्ष चमत्कार दिखाने में समर्थ है तथा मित्रों की सहायक और शत्रुओं की शत्रु है। दुश्मनों के दर्प का दमन करने वाली है। समर भूमि में शत्रु सैन्य के संधी स्थलों को खटकी ध्वनी से खोल देने वाली तथा उन पर बिजली की भांती चमक कर प्रहार करने में सशक्त शक्ति तू ही है) 


एक आसरो वादळी

Rao GumanSingh Guman singh

आठूं पोर अडीकतां 
वीतै दिन ज्यूं मास।
दरसण दे अब वादळी 
मत मुरधर नै तास॥

आस लगायां मुरधरा 
देख रही दिन रात।
भागी आ तूं वादळी 
आयी रुत वरसात॥

कोरां-कोरां धोरियां 
डूंगां डूंगां डैर।
आव रमां अे वादळी 
ले-ले मुरधर ल्हैर॥

ग्रीखम रुत दाझी धरा 
कळप रही दिन-रात।
मेह मिलावण वादळी 
वरस वरस वरसात॥

नहीं नदी नाळा अठै
नहिं सरवर सरसाय।
एक आसरो वादळी
मरु सूकी मत जाय॥


--
Posted By AAPNI BHASHA - AAPNI BAAT to AAPNI BHASHA-AAPNI BAAT at 7/16/2010 07:13:00 AM

अढाई आखर

Rao GumanSingh Guman singh

मोर री 'पिहू', कोयल री 'कुहू', पपीहै री 'पी पिव' अर टीटोड़ी री 'टी टिव' आप रै रूप में पूरी रट है। ऐ आप-आपरी विसेसता न्यारी-न्यारी राखै है अर जी रा भाव पूरै जोर सूं परगट करै है। इण रट नै चावै आं रो सुभाव समझो चावै प्रकृति री दात, पण मिनख री विसेसता आं सगळां सूं न्यारी है। मिनख बुद्धि रै परभाव सूं दूसरां री भासा अथवा भावां पर रीझ वांनै आपरा वणाणै रो सांग भरै है पण जद जी छोळां चढ़ै, कोड में रग-रग नाचै, बैं मस्ती में मातृभाषा री गोद में ही मोद आवै। जद वड़ां री बात याद आवै 'मांग्यां घीयां किसा चूरमा' अथवा भारी दुख सूं जी में ठेस लगै तो चट मा ही याद आवै, मांगेड़ी धाड़ के ठारै? जद इसी बात है तो दूजा क्यूं जी दोरो करै।

वादळी मरुधर नैं प्राणां सूं प्यारी है। बैं रै चाव नै कुण पूगै। रात-दिन आंख्यां में रमै। जैं रो नाम सुण्यां सुख ऊपजै। वाळकपणै सूं जिण में ऊंट-घोड़ां री अनेक कल्पना करी जावै, जिण में इंद्रधनस अर जळेरी जी ललचावै, इसी प्यारी चीज रा गुण दूसरी भासा में गाऊं, आ सोचण री विरियां कैं नैं? झट मुंह सूं 'वरसे भोळी वादळी आयो आज असाढ़' निकळतां ही 'रम रम धोरां आव' री रट लागै। जठै जी खोल मिलणो हुवै, दूजो वीचविचाव किसो? आपरी भासा अर आपरै भावां पर भरोसो चाहिजै।

-चंद्रसिंह


जीवण नै सह तरसिया बंजड़ झंखड़ वाढ।

वरसे, भोळी वादळी आयो आज असाढ॥
Posted By AAPNI BHASHA - AAPNI BAAT to AAPNI BHASHA-AAPNI BAAT at 7/13/2010 02:22:00 AM

मारु थारा देस में, निपजे तीन रतन

Rao GumanSingh Guman singh



कोई घोडो कोई पुरखडों, कोई सतसंगी नार।
सरजण हारे सिरजिया, तीनूं रतन संसार।।

जौधाणे री कामणी, गोखां काढै गात।
मन तो देवां रा डिगै, मिनखा कितीक बात।।


जोधाणो जसराज रो, खूबी करे खलक्क।
खावण पीवण गांठ रो, देखण री हलक्क।।

मारु थारा देस में, निपजे तीन रतन।
एक ढोला दूजी मारवण, तीजो कसूमल व्रन्न।।

खग धारां थोड़ां नरां, सिमट भरयो सह पाण।
इण थी मुरधर तरळ जळ, पाताळां परवांण।।

ऊमर घटे बढै कोनी

Rao GumanSingh Guman singh

एक गांव मं एक लुगाई आपरै मिनख रै सागै रेवती ही। ऐक भूत एणरै घर मंे घुस ग्यौ। भूत उत्पादी हौ। एकर वौ घर रा धणी नै मार दियौ। उण समै उणरी लुगाई पेट सूं ही। धणी रै मरिया पछै लुगाई सौवियौं के इण घर मं रेवण रौ फायदौं नीं है। भूत म्हारा टाबर अर म्हानै मार डालेला। आ बात सोच व आपरै पीहर निकलगी। वठै उणै छौरौ व्हियौ। छौरौ बदमास हो। वौ आपरा सागै खेलण वाला छोरा-छौरिया नै बात-बात माथै मारतौ हौ। एक उणरा सगी कह्यौ-थ्हारै बाप रौ थ्हानै पतो नीं अर म्हानै दिन भर ठोकै पीटै। छोरा रा मन मे आ बात घर कर गी। वौ घरै आयनै मां सूं बाप रै बारै मंे पूछियौ, मां सगळी बात बताय दी। छौरौ कह्यों, मां म्है तौ घरे जायनै ही रेवंूला। थूं भलै ही अठै रह। मां छोरा नै घणौ समझायौं पण वौ पक्को जिद्दी हौ नीं मानियौं जकौ नीं मानियो। वौ घरे व्हिर व्हियौ। घर पहुंचण रै पछै वौ घर साफ करियौं अर घणी सारी लकडियां भैळी करनै घर मंे ळाय लगाय दी। भूत आया तौ छौरौ लक्कड़ लैयर उण मौथै झपटौ मारियज्ञै। भूत डर ग्यौ, अर कह्यौं, कुण है रै ? छौरौ कह्यौ, म्हैं इण घर रौ धण्री हूं। म्हैं रोज खानौ बणफं ला, थूं रौज सामान लेयर आयजै। भूत बापड़ौ की करतौ ? वौ छोरा री बात मान ली। दोनूं ही सागै रैवण लागा। अेकर छोरौ पूछियौ थूं रोज किण ठौर जावे ? भूत कह्यौं, म्है भगवान रै दरीखानै जाया करू। आ बात सुण छोरौ कह्यज्ञै, कल जद थूं दरीखानै जावै तो भगवान सूं म्हारी उमर पूछनै आयजै ? दूजे दिन भूत आयनै छौरा नै बतायौ के थ्हारी उमर अस्सी बरस हैं। छौरौ कह्यौ, अबै औ पूछजै कै इण उमर मंे अेक या दो दिन अठीनै-उठीनै व्है सकै कीं। दूजें दिन भूत आयने कह्यौ, भगवान रौ कैवणौ है कै उमर मंे अेक दिन तौ दूर अेक घड़ी भर रौ फरक नीं व्है सकै। मौत तौ जिण समै लिखी है उण समै व्हैला ही। इतरौ सुणतौ ही छौरौ भूत माथै लकड़ी लैयर झपटियौ। भूत कह्यों, औ की करै ? म्है थ्हानै मार दूं ला। छोरौ कह्यौ, म्हारी उमर अस्सी बरस है, थूं तौ कीं भगवान भी म्हनै नी मार सके। थू म्हांसू बचनौ चावै तौ अठा सूं भाग जा,ं नैड़ौ भी मत दीखजै। भूत बापड़ौ नैनौं मुंडौ करनै वठा सूं निकलग्यौ। छौरौ मां नै भी वठै बुला ली। दोनू राजी खुसीं रैवण लागा।

मोरू भाई पांवणा

Rao GumanSingh Guman singh

आया आया रे
मोरू भाई पांवणा
कांई आगे धोरा वाळो देश

बीरो बणजारो रे
कांई आया म्‍हारा देवर जेठ
बीरो बणजारो रे
सासू रांध्‍या रे मोरू भाई बांकळा

म्‍हारी नणद बिलोवे खाटी छा
बीरो बणजारो रे
मंगरिया उंछाळू रे
मोरू भाई बांकळा
नदिया में लिमोऊं खाटी छाछ
बीरो बणजारो रे
माथा धोऊं रे

मोरू भाई मेट सूं
कांई घालूं चमेली रो तेल
बीरो बणजारो रे

चेतक की टापें गूंजी है

Rao GumanSingh Guman singh

राणा प्रताप इस भरत भूमि के, मुक्ति मंत्र का गायक है। 
राणा प्रताप आजादी का, अपराजित काल विधायक है।। 
वह अजर अमरता का गौरव, वह मानवता का विजय तूर्य। 
आदर्शों के दुर्गम पथ को, आलोकित करता हुआ सूर्य।। 
राणा प्रताप की खुद्दारी, भारत माता की पूंजी है। 
ये वो धरती है जहां कभी, चेतक की टापें गूंजी है।। 
पत्थर-पत्थर में जागा था, विक्रमी तेज बलिदानी का। 
जय एकलिंग का ज्वार जगा, जागा था खड्ग भवानी का।। 
लासानी वतन परस्ती का, वह वीर धधकता शोला था। 
हल्दीघाटी का महासमर, मजहब से बढकर बोला था।। 
राणा प्रताप की कर्मशक्ति, गंगा का पावन नीर हुई। 
राणा प्रताप की देशभक्ति, पत्थर की अमिट लकीर हुई। 
समराँगण में अरियों तक से, इस योद्धा ने छल नहीं किया। 
सम्मान बेचकर जीवन का, कोई सपना हल नहीं किया।। 
मिट्टी पर मिटने वालों ने, अब तक जिसका अनुगमन किया। 
राणा प्रताप के भाले को, हिमगिरि ने झुककर नमन किया।। 
प्रण की गरिमा का सूत्रधार, आसिन्धु धरा सत्कार हुआ। 
राणा प्रताप का भारत की, धरती पर जयजयकार हुआ।