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महाराणा प्रताप रौ जस

Rao GumanSingh Guman singh

"उतर दियौ उदीयाण दिन पलट्यौ पल़टी दूणी।
पातल़ थंभ प्रमाण़ शैल गुफावा संचरीयौ।

मिल़ीयौ मैध मला़र मुगला री लशकर माय।
कलपै राज कुमार मैहला़ चालौ मावड़ी।

महल रजै महाराण कन्दरावा डैरा किया।
पौढण सैज पाखांण हिन्दुवां सुरज हालीया।

उलटीया एहलूर म़ाझल़ गल़ती रात रा ।
पछटयौ पालर् पुर गाडरीया झुकीया गिरा।

झंखड़ अकबर जाण़ राजन्द झुकीया गिरा।
पातल़ थम्भ प्रमाण इडग रयौ धर ऊपरां।।

गीत
रौवण लागा राज दुलारा, रल़कीयौ नीर रैवास।
वाव सपैटै दीप बुझायौ, उझमी जीवण आस।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।1।।

ब़ीज बल़ौबल़ जौर झबुकै, घौर माय घमसाण।
हिन्दुवौ सुरज डैरड़ै हाल्यौ, पौढ़वा सैज पाख़ाण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।2।।

बिलखती माता कैह विधाता, तै ही लिख्या तकदीर।
राजभवना रा आज रैवासी, फड़फडै़ जाण फकीर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।3।।
कंवर कंवरी कंध चढ़ाय, महाराणी समझाय् ।
आवै राणौसा तौ हालस्या अपै, महल़ पिछौलै माय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ, ।।4।।

मांगड़ै आवतौ मुन्छ मरौड़ै, वल़ीयौ पाछौ वीर।
आज मैहल़ा आजाद करावा, न लैवा अन्र नीर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।5।।
आवतौ माल़क सार अवैल़ौ हिसीयौ हैवन हार ।
सज वाहुणी लगा़म संभ़ाल़ै आवियौ पीठ अमीर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।6।।

चीरतौ पाण़ी घौड़ल़ौ चाल्यौ, कुदतौ थौहर कैर।
आंच आवै असवार ना तौ मारौ जीवणौ खारौ ज़ैर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।7।।

पाव घड़ी माय पुगीयौ पवन पिछौल़ै री पाल़।
पाव पख़ाल़ण काज़ पिछौल़ौ आवियौ लौप औवाल़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।8।।

कौयल़ा सारस कीर कबुतर पंखीड़ा घण़ प्रीत।
दैश धणी ना आवत़ौ दैख गुटकवा लागा गीत।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।9।।
रुखड़ल़ा पण दैख राणै ना अंजसीया हौय अधीर।
झुमती शाखा पगल़ा झुकी नैह त्रमंकयौ नीर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।10।।

वीर शीरौमण नांव मा बैठा पा़ण ग्रहै पतवार ।
पार पुगावण काज पिछौलौ धावीयौ गंगाधार।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।11।।

आवती नैया सार अवैल़ी ताणीया तीर कबाण।
भील़ण़ी जाय़ा शब्द भैदी जैरौ ना चुकै निश़ाण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।12।।

जवान बैटा ना संभता दैखै बौल़ीयौ ब़ुढ़ौ भ़ील़।
आज बैटा कुण बाग मां आयौ ईडग़ा तौड़ी ईल़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।13।।

आज क्या मारी आंख फरूखै अंग उमंग अनुप।
एहड़ै सुगनै भैट करावै अवस मैवाड़ौ भुप।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।14।।

बाप री बात़ा साम्भल़ै बैटा नाखीया तीर कब़ाण ।
दैश धणी रै दरसण़ा हैतू अंजसीया औस़ाण़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।15।।
आय् किनारै नावड़ी उभी भागीया सामा भील़।
चौखसी राणै तीर चढ़ायौ दैख उबाण़ा डील़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।16.।।

आपरा चाकर जा़णा़ै अन्रदाता माफ करौ शक मैट।
पातशाह रै पौहरै उभ़ा पाल़वा पापी पैट।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।। 17।।

माफ करौ माही बाप कै मा़झ़ी पांव पड़या अकुलात् ।
बाट जौवता मारा दिनड़ा बीता रौवता का़ल़ी रात्।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।18।।
कैकू पगल़ा कीच भराण़ा धौऊ नैण़ा जलधार्।
खाम़द़ा रौ दुख दैख खूपै मारै काल़जै बीच कटार्।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।19।।

आंखड़ीया भर आवीया आंसु बादल़ा ज्यू बरसात।
आज सौनै रौ सुरज उगौ हिवड़ल़ौ हरसात।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।। 20।।

रंक हैतालू बौलीयौ राणौ हाख मा थांमै हाथ।
बीती सौ ही बिसार दै वाल़ा पौर भयौ परभात् ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।21।।

आज कसौटी रंगत आणै सौलवौ सौन कहाय् ।
आज हु जैड़ै कारज आयौ मारौ कारज सिद्ध कराय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।22।।

नींद मा मुगल़ सैन निचींती और भयौ् अंधकार ।
प्रौल़ीया ऊभ़ा तीन पाराधी (पाराथी) काल़ीयौ किल्लैदार।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।23।।

चौर गुफा मां पुगीयौ च्यरौ उन्चल़ी मंझील आण़ ।
बारणै भ़ुखा सिंह बंधाड़ै सैज पौढीयौ सुल्ताण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।24।।

सिंह छैड़ा तौ शौर मचावै जाग अकबर जाय् ।
एक ताड़ी सुण़ फौज असंख्या प्राण हैरै पल़ माय् ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।25।।
दैश धणी ना दैख उद्द्यासी भीलड़ौ सौच भराय।
छैरूवा कानी बातड़ी छानी सानी मा समझाय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अ,कबर शाह ऊन्घाण़ौ।।26।।

जगत् सु बैटा एक दिन जावणौ खाटल़ी सुता खाय।
मात्रभुमी रै काज मरा तौ जीव वैकुटाय जाय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।27।।

बाप ना बैटा बैरवा बैठा मुखड़ा धारै मौन।
च्यार चीराल़ै कर न चाल्या चारवा सिहा चुण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।28।।

पंड कीधौ बलिदान पाराधी हंसतै कमल़ हाय।
मरतां वैल्या जनम मांगयौ दैश मैवाड़ै माय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।29।।

आंखड़ीया भर आविया आंसु राण भराणौ रीस।
अनवीया वाल़ी ईल तौड़ै न शिशौद नमायौ शीश।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।30।।

पैढ़लीया कर पार राणैजी सांभ लैही शमसैर।
हिन्दुवै सुरज हाथ उठायौ बाल्वा जुनौ बैर ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।31।।
एक अंतै माय आवियौ हिलौ कांप गई किरपाण ।
बिन बाकारयां मारणै सु मारौ दैश लाजै उदीयाण़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।32।।

राजपुती री रीत रुपाल़ी नींद मा सुतौ न धाय्।
सात पीड़ी रै शत्रु ना पैश पड़या बगसाय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।33।।

आंगली चिरै मांडीया आखर सामली भ़ीत सुजाण।
आखरी वैल़या आज अकबर दैवा जीवनदान ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।34।।

आज प्रभाता त्याग उदयपुर कूच करै कमठ़ाण़।
दुसरा मौका न दैवा हु थारै मांझल रौ मैहमाण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।35।।

रंग रै राणा रात थारी ना रंग जाती रजपुत।
रंग माता जकै गौद रंमाड़्यौ पातल़ जैड़ौ पूत।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।36।।
अवतरीया ईण धरती पर मौकल़ा वीर महान।
सुरमा री मरजाद सुणावै बारट भंवरदान ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।
अवतरीया ईण धरती पर मौकल़ा वीर महान।
सुरमा री मरजाद सुणावै बारट भंवरदान ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।37।

'खूबड़ माँ ' रा छप्पय

Rao GumanSingh Guman singh

मह वरसे नही मेह, पड़े असमान धरा पर।
राह थके खगराज, अखे बलराजा उत्तर।
हेमगिर ऊनो हुवे, वके झूठो दुरवासा।
अत सितळ व्है अगन, प्रगट नह भाण प्रकासा।
सामंप्रत देख वहतो सगर, घबरावे वांगा घङा।
(तो)समरिया 'गँग'  अबखी समै,  बेल न आवे खुबङा।। १।।

जे नृप धू डग जाय, गणो डगमडे मेर गिर।
गोरख भुले गयान, ध्यान तप भुले जटधर।
खारो व्है दध खीर, दखो मीठो खारो दध।
जुजठल भाखे झुठ, वळे लखियो पलटे वध।
सैंस तज भार जावे सरक, धरती व्है उथल धङा।
समरिया 'गंग' अबखी समै, (जे) बेल न आवे खुबङा ॥२॥

जळनद तजे म्रजाद, प्रगट गंगेव तजे पण।
भीम तजे भाराथ,  जंग सर चुके अरजण।
करगां माठो करण,  जोओ गुडळो गंगजळ।
पंथ थके सपतास,  सुणे नही पाबु सावळ।
म्रगराज घास खावे मुदे,  मारे लाता मरगङा।
समरिया 'गंग'  अबखी समै, (जे)  बेल न आवे खुबङा।। ३।।

सत तज जावे सीत,  हुवे बळहीणो हङमत।
जहर सरप जाय,  जोओ छांङे लछमण जत।
गुणपत व्है बुधहीण,  उकत सुरसत न आवे।
भोजन न मिटे भूख,  भगति पहळाद न भावे।
श्रीराम बाण चुके संवर, खळ आसुर जुझे खङा।
(तो)  समरिया 'गंग'  अबखी समै, बेल न आवे खुबङा।। ४।।
..... क्रमश.....

गंगारामजी बोगसा 'सरवड़ी' कृत

छंद विर छप्पय

Rao GumanSingh Guman singh

मां मोगल मछराळ.काळ बण दौता कौपे.
फाळ भरण फुंफाळ झाळ नफरा जण झौपे.
खाळ कहट खडगाळ.साळ चारण जे सौपे.
पाळ रिपूं पाताळ.ताळ धमकां हण तौपे.
बाळ बचाळ बचावणीं .टाळ नफट वखताळ.
जाळ कटण जोगा जपण.मां मोगल मछराळ.

ड़ंणके जब डाढाळ.गाळ गर गौहर गुज्जे.
चाळ भेळीया चमक.धमक पड धरणीं धुज्जे.
पाळ अहर बीच पठे.सठे नह मारग सुज्जे.
धाळ माळ धुंधाळ.जाळ कट रण में जुज्जे.
तांणत नह ममताळ तुं. वखत कठण विगताळ.
जांणत जौगो जोगणीं.मां मोगल मछराळ.

जोगीदान गढवी कृत

छंद विर छप्पय

Rao GumanSingh Guman singh

मां मोगल मछराळ.काळ बण दौता कौपे.
फाळ भरण फुंफाळ झाळ नफरा जण झौपे.
खाळ कहट खडगाळ.साळ चारण जे सौपे.
पाळ रिपूं पाताळ.ताळ धमकां हण तौपे.
बाळ बचाळ बचावणीं .टाळ नफट वखताळ.
जाळ कटण जोगा जपण.मां मोगल मछराळ.

ड़ंणके जब डाढाळ.गाळ गर गौहर गुज्जे.
चाळ भेळीया चमक.धमक पड धरणीं धुज्जे.
पाळ अहर बीच पठे.सठे नह मारग सुज्जे.
धाळ माळ धुंधाळ.जाळ कट रण में जुज्जे.
तांणत नह ममताळ तुं. वखत कठण विगताळ.
जांणत जौगो जोगणीं.मां मोगल मछराळ.

जोगीदान गढवी कृत

सरदी लागै कोढ

Rao GumanSingh Guman singh

.
सरदी लागै कोढ
===========
गरमी लागै सांतरी ,  सरदी लागै कोढ
छोड सियाळा मरुधरा , जाय हिमाळै पोढ ।।
गूदड़ दोरा सांभणां , सांभण दोरो कंत ।
सरदी थारै कारणैं ,  जूण डरै बेअंत ।।
घर में बड़ता पावणां , ताती मांगै चाय ।
ठोकै पोढ जमावणां , लुक्खा न आवै दाय ।।
न्हाणां धोणां छूटिया , बाळां धूणीं काठ ।
चेतै कद नित नेमड़ा , रोटी ठोकां आठ ।।
नित रा भावै गुलगला , रत्ती न भावै काम ।
इण सरदी रै मांयनैं   , कियां कुटावां चाम ।।
*
ओम पुरोहित कागद
24-दुर्गा कोलोनी
हनुमानगढ़ जंक्शन-335513

छन्द रेणकी- कवि कान जी गांगड़ा

Rao GumanSingh Guman singh

मळया आय मिथिलापुरी , भूतळरा के भूप !!
गर्व सकळ रा गाळिया , राघव कुळरा रुप !!१!!
धनुष धरण जब तुं धस्यो , लौचन अरूण लिलाट !!
पद चंपत पगनेश , डग दीसा डणणाट !!२!!
          
डणणणणण दीस दिग्गज सह डणकत भणण खणण ब्रह्मांड भयो :
गणणणणण गहर गुहागिरी गणकत ठणण ठणण टंकार थयो :
कणणण लंक नृपाळ कणंकत गणण गणण शीर मुगट ग्रीयो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!१!!
कड़ड़ड़ड़ड़ व्योम गोम पड़ कड़कत अड़ड़ अड़ड़ समुदर उछळं :
थड़ड़ड धाम छोड़ खळ थड़कत धड़ड़ धड़ड़ धर नमत ढळं :
गड़ड़ड़ड़ चंद्र लोक लग गड़गड़ फड़ड़ फड़ड़ हय फांण फर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!२!!
कटकटकट सपट झपट फटफट थट खटखट झटपट उलट झटयो :
भटभटभट भटक भटक भय भटभट फटक फटक मनु व्योम फटयो :
घट घट घट अमट अर्यां गभरावट हटहटहट खळदळ हहर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!३!!
झक झक झक नमक रमक झणकारव दमक चमक हर ध्यांन खुले :
छकछक मद अछक अछक्के तक तक भटक भटक भट खटक भूले : हकबकहिय सठक गठकटक नाटक फटक फटक थक थक फफर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!४!!
खळभळ अळ प्रबळ प्रबळ तळ पातळ खळखळ कळ बळ अकळ खसे :
डळडळडळ डळत ढळत भुदरसर तळतळ थळथळ सभड़ त्रसे :
झळ झळ झळ झळकझळक कर झळकत खळकखळक सुर कुसुम खर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!५!!
सगवगनग अडगअडग चगचगचग जगजगजग रणंकार जग्यो :
टगटगटग टगर मगर खगखगखग छगछग रग पग अछग छग्यो :
फगफगफग विलग विलग मगडगडग नगनग भग सुरराज नर्यो : धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!६!!
खररर अपर अपरं वरधर पर पर धरधर पर अमर पर्यो :
झररर सरर सरर झट झांझर सुरपर परहर सकर सर्यो:
कर कर कर जयति कौशीककर धर धर हर धनु सधर धर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!७!!
सत सत कृत अमत श्रवत दशरथ सत रजत रजत सुर प्रमुद रह्यो :
ध्रत ध्रत ततकाल हारगल सीतरत गत मत रत गुर चरन ग्रह्यो :
क्रत क्रत अत कांन दांन नीज क्रत दत भजत भजत भव पार कर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!८!!
              कळस छन्द छप्पैया
धर्यो धनुष रणधीर , वीस्मय घणा विदार्या :
धर्यो धनुष रणधीर , ताप मुनि गणरा टाळ्या :
धर्यो धनुष रणधीर लंक रोळण खग लीधो :
धर्यो धनुष रणधीर , काज अमारो वड कीधो :
धर्यो धनुष ब्रह्मांडधर ,धरण भार भूवरो हसी :
चित वृथा कान सुरभिय चहे चण सारूं लेवा असी !!१!!

वढियार धरा के रत्न कवि कान गांगड़ा कृत छन्द रेणकी :- प्रेषित मीठा मीर डभाल

जगदंब मोगल जे भणी

Rao GumanSingh Guman singh

छंद=सारसी
ओखा धरे,नवलख फरे,गरबो धरे,मथ्थ उपरे.
नवरात रे,नवला परे,जडहड जरे,ज्योतु फरे.
आनंद रंगे,बव उमंगे,शक्त संगे,लइ घणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी.
    जगदंब मोगल जे भणी. (1)

सणगार सोळा,कयरा बोळा,पाय तोळा,शेष ना.
प्रक्रत अजोळा,वणे चोळा,बाइ तोळा,वेष ना.
बाजुयबंधा,नाग संधा,चडे कंधा,लट बणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (2)

वादळ अषाढा,थीया बाढा,बने गाढा,भेळीया.
विजडी प्रगाढा,कोर काढा,जबक जाढा,रेळीया.
नवलख जडुके तारला विजडी कडुके जो घणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (3)

लडवडे माळा,हिम पहाळा,त्रेण गाळा,कंठडे.
हुंफे हुफाळा,गळे थाळा,हिम वाळा,थे लडे.
हिम ओगडी ता जळ ढोळी,पद पखोळी गंगणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (4)

सुर चंद नयना,तपे कयना,आभ अयना,जडहडे.
दो दश मयना,नेण बयना,वक्र लयना,चडवडे.
बारेय राशी,मुख हाशी,ग्रह ग्रासी,ते तणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (5)

नवसौ नवाणा,नदी ताणा,गाय गाणा,खडखडी.
समंदर तमाणा,बिरद बाणा,बव वखाणा,फिणफडी.
डमरु डंमके,भु धंमके,गौ हंमके,रव रणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (6)

विंझणा तोळे,पवन ढोळे,वा हिलोळे,वारणा.
तुम्मरा होडे,वयडा टोळे,नाद घोळे,चारणा.
समंदर वजाडे,ढोल ढाळे,गडगड गाळे,धोरणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (7)

भेरव भेळो,करे केळो,वडो मेळो,जोगणी.
ब्रह्मांड बेळो,मथ्थे तेळो,निर्मळ नेळो,जो गणी.
सारसी छंदे,विज वंदे,जयो अंबे,तुं धणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी.
       जगदंब मोगल जे भणी. (8)

- चारण कवि विजयभा हरदासभा बाटी
ध्रांगध्रां

आल्हा एकादसी

Rao GumanSingh Guman singh

मगरा धौरा भाखरा,घलिया घण घमसांण।
साखी कोट'र कांगरा,नमै आज अणजांण॥१॥
सुरसती सदा सरसती,हाकड़ौ कैवे हाल।
माडधरा आ मुलकती,अंतस रेत उलाल॥२॥
वीरा राखी वीरता,सूरा राखी शांण।
संतां राखी सांच री,जस जौगे जैसाण॥३॥
कुल री राखण कीरती,मही रौ राखण मांण।
आलै जंज उजालियौ,भाटी कुल रौ भांण।४॥
पौड़ भून्गरे पटकता,गूंज्यौ गढ़ गौहराण।
पीर मौडिये पाड़िया,पिरथी घणा पठाण॥५॥
छत्र धारियौ सूरमा,अनमी राखण आंण।
भली'ज राखी भांणसी,ईशाल धर एहनाण॥६॥
छत्रालै छत्र धारियौ,जबर जुन्झियौ जंग।
धर ईशाली धधकती,रंग आल्हसी रंग॥७॥
हिरदै नैण समाविया,धड़ बिच करतै दौड़।
आलोजी जंग जुन्झियौ,हरावली कर हौड़ ॥८॥
मालदे मन मोदियौ,जंज  दिखाई      जंग ।
तूटो सर धड़ जुन्झियौ,रंग आलहसी रंग॥९॥
साको कियौ सुहावणौ,जंज जुन्झकर जंग।
भाटी कुल रै  भांण  नै,दीनौ  रावल रंग ॥१०॥
कविवर 'मेन्दर' किरती,जस  गावै     जजमान ।
जुन्झिया सर बिण जगत में,रंगीलै रजथान ॥११॥

  - महेन्द्रसिह   सिसोदिया(छायण)

आल्हा एकादसी

Rao GumanSingh Guman singh

मगरा धौरा भाखरा,घलिया घण घमसांण।
साखी कोट'र कांगरा,नमै आज अणजांण॥१॥
सुरसती सदा सरसती,हाकड़ौ कैवे हाल।
माडधरा आ मुलकती,अंतस रेत उलाल॥२॥
वीरा राखी वीरता,सूरा राखी शांण।
संतां राखी सांच री,जस जौगे जैसाण॥३॥
कुल री राखण कीरती,मही रौ राखण मांण।
आलै जंज उजालियौ,भाटी कुल रौ भांण।४॥
पौड़ भून्गरे पटकता,गूंज्यौ गढ़ गौहराण।
पीर मौडिये पाड़िया,पिरथी घणा पठाण॥५॥
छत्र धारियौ सूरमा,अनमी राखण आंण।
भली'ज राखी भांणसी,ईशाल धर एहनाण॥६॥
छत्रालै छत्र धारियौ,जबर जुन्झियौ जंग।
धर ईशाली धधकती,रंग आल्हसी रंग॥७॥
हिरदै नैण समाविया,धड़ बिच करतै दौड़।
आलोजी जंग जुन्झियौ,हरावली कर हौड़ ॥८॥
मालदे मन मोदियौ,जंज  दिखाई      जंग ।
तूटो सर धड़ जुन्झियौ,रंग आलहसी रंग॥९॥
साको कियौ सुहावणौ,जंज जुन्झकर जंग।
भाटी कुल रै  भांण  नै,दीनौ  रावल रंग ॥१०॥
कविवर 'मेन्दर' किरती,जस  गावै     जजमान ।
जुन्झिया सर बिण जगत में,रंगीलै रजथान ॥११॥

  - महेन्द्रसिह   सिसोदिया(छायण)

आल्हा एकादसी

Rao GumanSingh Guman singh

मगरा धौरा भाखरा,घलिया घण घमसांण।
साखी कोट'र कांगरा,नमै आज अणजांण॥१॥
सुरसती सदा सरसती,हाकड़ौ कैवे हाल।
माडधरा आ मुलकती,अंतस रेत उलाल॥२॥
वीरा राखी वीरता,सूरा राखी शांण।
संतां राखी सांच री,जस जौगे जैसाण॥३॥
कुल री राखण कीरती,मही रौ राखण मांण।
आलै जंज उजालियौ,भाटी कुल रौ भांण।४॥
पौड़ भून्गरे पटकता,गूंज्यौ गढ़ गौहराण।
पीर मौडिये पाड़िया,पिरथी घणा पठाण॥५॥
छत्र धारियौ सूरमा,अनमी राखण आंण।
भली'ज राखी भांणसी,ईशाल धर एहनाण॥६॥
छत्रालै छत्र धारियौ,जबर जुन्झियौ जंग।
धर ईशाली धधकती,रंग आल्हसी रंग॥७॥
हिरदै नैण समाविया,धड़ बिच करतै दौड़।
आलोजी जंग जुन्झियौ,हरावली कर हौड़ ॥८॥
मालदे मन मोदियौ,जंज  दिखाई      जंग ।
तूटो सर धड़ जुन्झियौ,रंग आलहसी रंग॥९॥
साको कियौ सुहावणौ,जंज जुन्झकर जंग।
भाटी कुल रै  भांण  नै,दीनौ  रावल रंग ॥१०॥
कविवर 'मेन्दर' किरती,जस  गावै     जजमान ।
जुन्झिया सर बिण जगत में,रंगीलै रजथान ॥११॥

  - महेन्द्रसिह   सिसोदिया(छायण)

मर्यादा पुरूषोतम प्रभू श्रीरामचन्द्रजी रा दोहा :-

Rao GumanSingh Guman singh

कर हेत झाली कलम ने , धरे सरसती ध्यान !!
महर कर शारद मीर ने , सदबुध दिजो शान !!१!!
गिरिजा सतन गुणेश को , मनसूं लेऊं मनाय !!
कारज पुरण किजीयो , ऊमासुत झट्ट आय !!२!!
सब देवन की शरण में , म्हें अब नमावूं माथ !!
गुण रामरा गावस्यूं , सबेही रहीजो साथ !!३!!
मनउजळ दशरथ महपति , रघुकुळ अनमी रूप !!
परम न्याय नीति प्रिय , भलपण वंकोज भूप !!४!!
राजा रे त्रय रांणीयां , कौशल्या प्रथम कहाय !!
केकई सुमित्रा कांमणी , भूपत रे मन भाय !!५!!
जनम धरेया जद जगत में , लायक च्यारूं लाल !!
मन हरखावे मेदनी , त्रंबागळ वाजेया ताल !!६!!
गीत राग शुभ गावणो , अवध घणो उछरंग !!
वाजा छत्रीसे वाजिया , सुर ताल लय संग !!७!!
दशरथ रा दरबार में , गावे ज गायक गीत !!
दान मान सब देवणो , राज तणी आ रीत !!८!!
तिण पळ विप्र तेड़ावियो , दन चढते घटी दोय !!
पांचे ही अंग पंचांग रा , जोशी विध कर जोय !!९!!
जोशी पोथी जोवतां , हरख वधे मन हेत !!
दशरथ छोळ दरियाव ज्यूं , दान प्रगळो देत !!१०!!
मीठा मीर डभाल

केसरिया बालम

Rao GumanSingh Guman singh

केसरीया बालम कहूं, किणनें मन री पीर।
बांस विरह रो रुंखडौ, निकळ्यौ छाती चीर॥
केसरीया बालम कहूं, गाढा माढां राग।
आवो घर अलबेलडा, उपजावण अनुराग॥
केसरीया बालम कहूं,किम विसरीया कंत।
निसरिया आसूं नयण, (जिण)हरिया वन दरसंत॥ केसरीया बालम कहूं, जळूं  विरह री झाळ ।
आव अषाढै मेह ज्यूं,(तौ) भींजूं  इण बरसाळ॥
केसरीया बालम कहूं,नेह निभाज्यौ नाह।
आय मिळौ म्हानै अठै, गाढ भरण गळबांह॥

नरपतदान आवडदान आशिया"वैतालिक " कृत

आवड आखे आशिया- नरपतदान आशिया

Rao GumanSingh Guman singh

मेजर शैतान सुजस

Rao GumanSingh Guman singh

लावो ल्यो संसार- चारण मेसण चंदाजी

Rao GumanSingh Guman singh

लावो ल्यो संसार रो छोड़े द्यो लोभने ,
मरद्दां रंग ने राक मांणो !!
चार दिन चटक्का करे ल्यो छेलड़ां ,
ताकड़े हेमरे तंग तांणो !!१!!
मांणजो वस्तु जोय भली माढुआं ,
लोभ सोय छोड़ने लाहो लीजे !!
उधार न करीजे घड़ी पण एक री ,
काम धार्यो भलो परो कीजे !!२!!
पेहरीजे ओढीजे जेमीजे प्रेम सूं ,
दहि ने सुख तो घणो दीजे !!
भले धोड़े चड़ो भले ऊटे चड़ो ,
रांम तो इयुं कियां घणो रीझे !!३!!
जरा ले जावसी जम्म जो जोवन्तां ,
वावळां आपड़े पसे वारू !!
होवे जो धन तो वापरो हाथ सूं ,
सकोय पण सकोय री पोस सारू !!४!!
वेळा मत करो थे दन व्हे जावसी ,
खरचजो मरद्दां दाम खासा !!
चंदीयो कहे रे वेगेरा चेतजो ,
ऐक पण घड़ी री नहीं आशा !!५!!

प्रेषित मीठा मीर डभाल

"बिरद छहुतरि" --दुरशा आढा कृत

Rao GumanSingh Guman singh

दुर्शाजी आढ़ा नामक चारण कवी ने अकबर
की सभा में अकबर के समक्ष खड़े होकर बिना डरे
महाराणा प्रताप के नाम से 76 दुहे बना कर सुनाये
थे जो "बिरद छहुतरि" के नाम से जाना गया।
( चारण कवी दुरसाजी आढा रचित महाराणा प्रताप
की प्रशस्ती के दोहे - संपुर्ण 'बिरद छहुंतरी' )
अलख धणी आदेश, धरमाधार दया निधे,
बरणो सुजस बेस, पालक धरम प्रतापरो. (१)
गिर उंचो गिरनार, आबु गिर ओछो नही ;
अकबर अघ अंबार, पुण्य अंबार प्रतापसीं. (२)
वुहा वडेरा वाट, वाट तिकण वेहणो विसद ;
खाग, त्याग, खत्र वाट, पाले राण प्रतापसीं. (३)
अकबर गर्व न आण, हिन्दु सब चाकर हुआ ;
दिठो कोय दहिवाण, करतो लटकां कठहडे. (४)
मन अकबर मजबूत, फुट हिन्दुआ बेफिकर ;
काफर कोम कपूत, पकडो राण प्रतापसीं. (५)
अकबर किना याद, हिन्दु नॄप हाजर हुआ ;
मेद पाट मरजाद, पोहो न आव्यो प्रतापसीं. (६)
मलेच्छां आगळ माथ, नमे नही नर नाथरो,
सो करतब समराथ, पाले राण प्रतापसी. (७)
कलजुग चले न कार, अकबर मन आंजस युंही ;
सतजुग सम संसार, प्रगट राण प्रतापसीं. (८)
कदे न नमावे कंध, अकबर ढिग आवेने ओ ;
सुरज वंश संबंध, पाले राण प्रतापसी. (९)
चितवे चित चितोड, चित चिंता चिता जले ;
मेवाडो जग मोड, पुण्य घन प्रतापसीं. (१०)
सांगो धरम सहाय, बाबर सु भिडीयो बहस ;
अकबर पगमां आय, पडे न राण प्रतापसी. (११)
अकबर कुटिल अनित, और बटल सिर आदरे ;
रघुकुल उतम रीत, पाले राण प्रतापसी. (१२)
लोपे हिन्दु लाज, सगपण रों के तुरक सु ;
आर्य कुल री आज, पुंजी राण प्रतापसीं. (१३)
सुख हित शिंयाळ समाज, हिन्दु अकबर वश हुआ ;
रोशिलो मॄगराज, परवश रहे न प्रतापसी. (१४)
अकबर फुट अजाण, हिया फुट छोडे न हठ ;
पगां न लागळ पाण, पण धर राण प्रतापसीं. (१५)
अकबर पत्थर अनेक, भुपत कैं भेळा कर्या ;
हाथ न आवे हेक, पारस राण प्रतापसीं. (१६)
अकबर नीर अथाह, तह डुब्या हिन्दु तुरक ;
मेंवाडो तिण मांह, पोयण राण प्रतापसीं. (१७)
जाणे अकबर जोर, तो पण ताणे तोर तीड ;
आ बदलाय छे ओर, प्रीसणा खोर प्रतापसीं. (१८)
अकबर हिये उचाट, रात दिवस लागो रहे ;
रजवट वट सम्राट, पाटप राण प्रतापसीं. (१९)
अकबर घोर अंधार, उंघांणां हिन्दु अवर ;
जाग्यो जगदाधार, पहोरे राण प्रतापसीं. (२०)
अकबरीये एकार, दागल कैं सारी दणी ;
अण दागल असवार, पोहव रह्यो प्रतापसीं. (२१)
अकबर कने अनेक, नम नम निसर्या नरपती ;
अणनम रहियो एक, पणधर राण प्रतापसीं. (२२)
अकबर है अंगार, जाळे हिन्दु नृप जले ;
माथे मेघ मल्हार, प्राछट दिये प्रतापसीं. (२३)
अकबर मारग आठ, जवन रोक राखे जगत ;
परम धरम जस पाठ, पीठीयो राण प्रतापसीं. (२४)
आपे अकबर आण, थाप उथापे ओ थीरा ;
बापे रावल बाण, तापे राण प्रतापसीं. (२५)
है अकबर घर हाण, डाण ग्रहे नीची दिसट ;
तजे न उंची ताण, पौरस राण प्रतापसीं. (२६)
जग जाडा जुहार, अकबर पग चांपे अधिप ;
गौ राखण गुंजार, पिले रदय प्रापसीं. (२७)
अकबर जग उफाण, तंग करण भेजे तुरक ;
राणावत रीढ राण, पह न तजे प्रतापसीं. (२८)
कर खुशामद कुर, किंकर कंजुस कुंकरा ;
दुरस खुशामद दुर, पारख गुणी प्रतापसीं. (२९)
हल्दीघाटी हरोळ, घमंड करण अरी घणा ;
आरण करण अडोल, पहोच्यो राण प्रतापसीं. (३०)
थीर नृप हिन्दुस्तान, ला तरगा मग लोभ लग ;
माता पुंजी मान, पुजे राण प्रतापसीं. (३१)
सेला अरी समान, धारा तिरथ में धसे ;
देव धरम रण दान, पुरट शरीर प्रतापसीं. (३२)
ढग अकबर दल ढाण, अग अग जगडे आथडे ;
मग मग पाडे माण, पग पग राण प्रतापसीं. (३३)
दळ जो दिल्ली हुंत, अकबर चढीयो एकदम ;
राण रसिक रण रूह, पलटे किम प्रतापसीं. (३४)
चित मरण रण चाय, अकबर आधिनी विना ;
पराधिन पद पाय, पुनी न जीवे प्रतापसीं. (३५)
तुरक हिन्दवा ताण, अकबर लागे एकठा ;
राख्यो राणे माण, पाणा बल प्रतापसीं. (३६)
अकबर मच्छ अयाण, पुंछ उछालण बल प्रबल ;
गोहिल वत गहेराण, पाथोनीधी प्रतापसीं. (३७)
गोहिल कुळ धन गाढ, लेवण अकबर लालची ;
कोडी दिये ना काढ, पणधर राण प्रतापसीं. (३८)
नित गुध लावण नीर, कुंभी सम अकबर क्रमे ;
गोहिल राण गंभीर, पण न गुंधले प्रतापसीं. (३९)
अकबर दल अप्रमाण, उदयनेर घेरे अनय ;
खागां बल खुमाण, पेले दलां प्रतापसीं. (४०)
दे बारी सुर द्वार, अकबरशा पडियो असुर ;
लडियो भड ललकार, प्रोलां खोल प्रतापसीं. (४१)
उठे रीड अपार, पींठ लग लागां प्रिस ;
बेढीगार बकार, पेठो नगर प्रतापसीं. (४२)
रोक अकबर राह, ले हिन्दुं कुकर लखां ;
विभरतो वराह, पाडे घणा प्रतापसीं. (४३)
देखे अकबर दुर, घेरा दे दुश्मन घणा ;
सांगाहर रण सुर, पेड न खसे प्रतापसीं. (४४)
अकबर तलके आप, फते करण चारो तरफ ;
पण राणो प्रताप, हाथ न चढे हमीरहर. (४५)
अकबर दुरग अनेक, फते किया नीज फौज सु ;
अचल चले न एक, पाधर राण प्रतापसीं. (४६)
दुविधा अकबर देख, किण विध सु घायल करे ;
पवंगा उपर पेख, पाखर राण प्रतापसीं. (४७)
हिरदे उणा होत, सिर धुणा अकबर सदा ;
दिन दुणा देशोत, पुणा वहे न प्रतापसीं. (४८)
कलपे अकबर काय, गुणी पुगी धर गौडीया ;
मणीधर साबड मांय, पडे न राण प्रतापसीं. (४९)
मही दाबण मेवाड, राड चाड अकबर रचे ;
विषे विसायत वाड, प्रथुल वाड प्रतापसीं. (५०)
बंध्यो अकबर बेर, रसत घेर रोके रीपुं ;
कन्द मुल फल केर, पावे राण प्रतापसीं. (५१)
भागे सागे भोम, अमृत लागे उभरा ;
अकबर तल आराम, पेखे राण प्रतापसीं. (५२)
अकबर जिसा अनेक, आव पडे अनेक अरी ;
असली तजे न एक, पकडी टेक प्रतापसीं. (५३)
लांघण कर लंकाळ, सादुळो भुखो सुवे ;
कुल वट छोड क्रोधाळ, पैड न देत प्रतापसीं. (५४)
अकबर मेगल अच्छ, मांजर दळ घुमे मसत ;
पंचानन पल भच्छ, पट केछडा प्रतापसीं. (५५)
दंतीसळ सु दुर, अकबर आवे एकलो ;
चौडे रण चकचुर, पलमें करे प्रतापसीं. (५६)
चितमें गढ चितोड, राणा रे खटके रयण ;
अकबर पुनरो ओड, पेले दोड प्रतापसीं. (५७)
अकबर करे अफंड, मद प्रचंड मारग मले ;
आरज भाण अखंड, प्रभुता राण प्रतापसीं. (५८)
घट सु औघट घाट, घडीयो अकबर ते घणो ;
ईण चंदन उप्रवाट, परीमल उठी प्रतापसीं. (५९)
बडी विपत सह बीर, बडी किरत खाटी बसु ;
धरम धुरंधर धीर, पौरुष घनो प्रतापसीं. (६०)
अकबर जतन अपार, रात दिवस रोके करे ;
पंगी समदा पार, पुगी राण प्रतापसीं. (६१)
वसुधा कुल विख्यात, समरथ कुल सीसोदिया ;
राणा जसरी रात, प्रगट्यो राण भलां प्रतापसीं.
(६२)
जीणरो जस जग मांही, ईणरो धन जग जीवणो ;
नेडो अपयश नाही,प्रणधर राण प्रतापसीं. (६३)
अजरामर धन एह, जस रह जावे जगतमें ;
दु:ख सुख दोनुं देह, पणीए सुपन प्रतापसीं. (६४)
अकबर जासी आप, दिल्ली पासी दुसरा ;
पुनरासी प्रताप, सुजन जीसी सुरमा. (६५)
सफल जनम सदतार, सफल जोगी सुरमा ;
सफल जोगी भवसार, पुर त्रय प्रभा प्रतापसीं.
(६६)
सारी वात सुजाण, गुण सागर ग्राहक गुणा ;
आयोडो अवसाण, पांतरेयो नह प्रतापसीं. (६७)
छत्रधारी छत्र छांह, धरमधार सोयो धरा ;
बांह ग्रहयारी बांह, प्रत नतजे प्रतापसीं. (६८)
अंतिम येह उपाय, विसंभर न विसारीये ;
साथे धरम सहाय, पल पल राण प्रतापसीं. (६९)
मनरी मनरे मांही, अकबर रहेसी एक ज ;
नरवर करीये नांही, पुरण राण प्रतापसीं. (७०)
अकबर साहत आस, अंब खास जांखे अधम ;
नांखे रदय निसास, पास न राण प्रतापसीं. (७१)
मनमें अकबर मोद, कलमां बिच धारे न कुट ;
सपना में सीसोद, पले न राण प्रतापसीं. (७२)
कहैजो अकबर काह, सेंधव कुंजर सामटा ;
बांसे से तरबांह, पंजर थया प्रतापसीं. (७३)
चारण वरण चितार, कारण लख महिमा करी ;
धारण कीजे धार, परम उदार प्रतापसीं. (७४)
आभा जगत उदार, भारत वरस भवान भुज ;
आतम सम आधार, पृथ्वी राण प्रतापसीं. (७५)
काव्य यथारथ कीध, बिण स्वारथ साची बिरद ;
देह अविचल दिध, पंगी रूप प्रतापसीं. (७६)