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जयपुर. प्रदेश में प्राथमिक कक्षाओं में राजस्थानी को सरल भाषा के रूप में अपनाए जाने पर राज्य के मंत्री और पूर्व मंत्री सहमत हैं, लेकिन इससे पहले उनका जोर इस बात पर है कि पहले राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिले।
इन राजनेताओं का यह भी कहना है कि अलग-अलग क्षेत्र में राजस्थानी भाषा अलग-अलग लहजे में बोली जाएगी, इसलिए सरकार या राजनीतिक स्तर पर इस बात का निर्धारण हो कि राजस्थानी भाषा का स्वरूप क्या होगा। इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए राज्य सरकार केंद्र सरकार को संकल्प पारित कर भेज चुकी है।
कोटा संभाग से आने वाले ग्रामीण विकास मंत्री भरतसिंह की चिंता यह है कि उनके क्षेत्र के लोग मातृभाषा को ही भूलने लगे हैं और सामान्य बोलचाल में अंग्रेजी ने घर कर लिया है। पूर्व शिक्षा मंत्री कालीचरण सराफ राजस्थानी का पक्ष तो लेते हैं, लेकिन वे यह भी जोड़ते है कि वैश्वीकरण के दौर में सिर्फ राजस्थानी तक ही सिमटे रहना नहीं चाहते।
राजस्थानी को इसका असली मुकाम दिलाने के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है। केंद्र से मान्यता मिलने के बाद स्कूलों में इसे मातृभाषा के रूप में शामिल करने जैसी योजनाएं स्वत: ही पूरी हो जाएंगी।
- वासुदेव देवनानी, पूर्व शिक्षा राज्यमंत्री
राजस्थानी का विकास हो और मातृभाषा के रूप में इसको सम्मान मिले, लेकिन शिक्षा के माध्यम के रूप में इसे लागू कर पाना संभव नहीं है। वैश्विकरण के इस दौर में हमारे बच्चे पीछे रह जाएंगे, शिक्षा का माध्यम हिंदी ही सही है, जो हमारी राष्ट्रभाषा है।
- कालीचरण सराफ, पूर्व शिक्षा मंत्री
प्रदेश में हाड़ौती, मेवाड़ी, मारवाड़ी, ढूंढ़ाड़, वागड़ी, शेखावाटी, मेवाती और ब्रज बोली का क्षेत्र के अनुसार प्रचलन है। ऐसे में किसे राजस्थानी भाषा कहा जाएगा और इसके निर्धारण का क्या मापदंड होगा, यह तय हुए बिना इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। हिंदी और अंग्रेजी भाषा ऐसी है जिसे हर क्षेत्र का व्यक्ति सहजता से समझता है। मुझे तो इस बात का दुख है कि हाड़ौती के लोग ही हाड़ौती में बात करने के स्थान पर हिंदी या अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हैं।
- भरतसिंह, ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज मंत्री
हमारी भाषा को मान्यता दो
हम राजस्थानी को आगे बढ़ाने के पक्षधर हैं। यह संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल हो जाए तो सारे काम अपने आप हो जाएंगे।
-बी.डी. कल्ला, पूर्व शिक्षा मंत्री
बच्च मातृभाषा में ज्यादा सीखता है और पढ़ाई का माध्यम भी यही होना चाहिए। मेरे शिक्षा मंत्री रहते हुए प्रारंभिक शिक्षा में राजस्थानी को शामिल करने की मांग को लेकर एक बार प्रतिनिधिमंडल मिला था, इसके बाद कोई नहीं आया।
- घनश्याम तिवाड़ी, पूर्व शिक्षा मंत्री
अभी यह तय नहीं हो पाया है कि राजस्थानी भाषा किसे कहा जाए, क्योंकि हर क्षेत्र में अलग—अलग बोलियां हैं। मुख्यमंत्री और सरकार इस बारे में कोई निर्णय ले तो इसके बाद स्कूलों में लागू करने की बात आएगी।
- हेमाराम चौधरी, राजस्व मंत्री
Bhaskar Newsविभिन्न अंचलों से. प्रदेशभर के शिक्षक भी स्कूलों में प्रारंभिक स्तर से राजस्थानी पढ़ाए जाने के पक्ष में हैं। उनका कहना है कि आज भी अधिकतर गांवों की सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को शब्दों का अर्थ उनकी ही भाषा में समझाना पड़ता है। यदि राजस्थानी को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है तो बच्चे कठिन विषयों के बारे में भी सरलता से जानकारी हासिल कर सकते हैं।
शनिवार को दैनिक भास्कर के संवाददाताओं ने प्रदेश में स्कूल का दौरा कर वहां के शिक्षकों से बातचीत की जिसमें लगभग सभी ने स्कूलों में राजस्थानी विषय पढ़ाए जाने के पक्ष में राय व्यक्त की है। यह तथ्य भी सामने आया कि गांवों के मात्र पांच प्रतिशत स्कूली बच्चे ही हिन्दी में बातचीत करते हैं बाकी सभी राजस्थानी को ही बातचीत का माध्यम रखते हैं।
जयपुर के शहरी और ग्रामीण स्कूलों के शिक्षकों की यही राय रही कि राजस्थानी भाषा को स्कूलों से अलग नहीं किया जा सकता। बोलने और समझाने में जिस भाषा का सरलता से उपयोग होता है वही भाषा श्रेष्ठ मानी जाती है। आज भी प्राथमिक कक्षा के बच्चे जब समझने में अटक जाते हैं तो मातृभाषा का ही सहारा लेना पड़ता है। सरकार चाहे इस भाषा को लागू करे या न करे, हमें तो आगे भी इसका सहारा लेना ही पड़ेगा।
उदयपुर में शिक्षकों की राय थी कि बच्चों को हिंदी के मुकाबले अपनी भाषा में जल्दी समझ में आता है। कभी कभी कठिन शब्दों को समझाने के लिए यही उपाय काम आता है।
शिक्षकों का तर्क था कि जब दूसरे राज्यों में उनकी स्थानीय भाषा को मान्यता मिली हुई है तो राजस्थान इसमें पिछड़ा हुआ क्यों है?
कोटा के गुरुजनों का मत था कि अंग्रेजी और गणित विषय में कई शब्द बच्चों को समझ में नहीं आते, उस समय शिक्षक स्थानीय भाषा का ही सहारा लेते हैं। राजस्थानी भाषा में ही बच्चे प्राथमिक ज्ञान लेकर स्कूल में आते हैं, यहां आते ही उन्हें दूसरी भाषाओं का सामना करना पड़ता है। इससे अच्छा है कि उन्हें उनकी भाषा में ही ज्ञान मिले।
अजमेर के शिक्षक मानते हैं कि राजस्थानी के माध्यम से प्रारंभिक शिक्षा की नींव को मजबूत किया जा सकता है। बच्चों को आसानी से शिक्षा से जोड़ा जा सकता है और निरक्षरता को दूर किया जा सकता है। जोधपुर के शिक्षकों की राय भी राजस्थानी भाषा के पक्ष में रही।
बीकानेर की एक स्कूल में तो प्रत्यक्ष नजारा देखने को मिला जब अंग्रेजी की क्लास में शिक्षक ने बच्चों को अर्थ समझ में नहीं आने पर राजस्थानी में बताया तो सभी बच्चों की समझ में आ गया। इसके अलावा भी कई स्कूलों में राजस्थानी का सहारा लिया जा रहा था।
इस भाषा की जानकारी के अभाव में राजस्थानी इस ज्ञान के भंडार से वंचित रह जाते हैं। हकीकत यह है कि आपसी तालमेल और समझाइश का सहज और बेहतर माध्यम है। बच्चे स्कूल में हिंदी और राजस्थानी दोनो भाषा का इस्तेमाल करते हैं। यदि यह पाठ्यक्रम में हो तो उनकी समझ का दायरा बढ़ाया जा सकता है।
बीकानेर की एक स्कूल में तो प्रत्यक्ष नजारा देखने को मिला जब शिक्षक ने अंग्रेजी की क्लास में बच्चों को अर्थ समझ में नहीं आने पर राजस्थानी में बताया तो सभी बच्चों की समझ में आ गया। इसके अलावा भी कई स्कूलों में भी राजस्थानी का सहारा लिया जा रहा था। यहां के शिक्षकों का कहना है कि राजस्थानी घर— घर की भाषा है और यहां के लोगों के रोम रोम में रची बसी है।
सीकर के शिक्षक कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में राजस्थानी भाषा का अधिक प्रभाव है और बच्चे घर से राजस्थानी में ही सीखकर आते हैं। यहां भी उन्हें वैसा ही वातावरण मिले तो उचित रहता है।
श्रीगंगानगर में शिक्षकों का कहना है कि मातृभाषा में शिक्षा देने की व्यवस्था सरकार ने भले ही नहीं लागू की हो लेकिन हमारे ज्यादातर स्कूलों में व्यवहारिक रूप से राजस्थानी के माध्यम से ही पढ़ाया जाता है। बांसवाड़ा में शिक्षकों का मत था कि राजस्थानी भाषा को वागड़ भाषा के समन्वय से पढ़ाया जाए तो यहां के बच्चे अधिक आसानी से ग्रहण कर सकेंगे।
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उदयपुर. स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई के दौरान हिंदी के मुकाबले स्थानीय बोली जल्दी समझ आती है। कई बार अंग्रेजी शब्दों को भी स्थानीय भाषा के माध्यम से सिखाना पड़ता है। पढ़ाई के दौरान शिक्षक स्थानीय (मेवाड़ी) भाषा का प्रयोग अधिक करते हैं। शनिवार को भास्कर संवाददाता ने शहर के प्रमुख सरकारी स्कूलों में जाकर हिन्दी और राजस्थानी भाषा के बारे में जाना तो यह सामने आया।
राजस्थान में राजस्थानी क्यों नहीं : पंडित खेमराज राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय की हिन्दी की शिक्षिका मंजु जैन ने कहा कि जब दूसरे राज्यों में उनकी स्थानीय भाषाओं को मान्यता मिली है तो राजस्थानी को क्यों नहीं? स्थानीय भाषा से बच्चों को अच्छे तरीके से समझाया जा सकता है।
बच्चों को सिखाना ज्यादा आसान : राजकीय विद्यालय मावली के हिंदी प्राध्यापक दुर्गेश भट्ट का कहना है कि ज्यादातर बच्चे स्थानीय भाषा में बोलचाल करते हैं। पढ़ाते समय उनकी भाषा में बेहतर तरीके से समझाया जा सकता है।
95 प्रतिशत बच्चे बोलते हैं घर की बोली : गरीब नवाज राजकीय विद्यालय की प्राचार्य पार्वती कोटिया का कहना है कि हिंदी सरल है, लेकिन स्थानीय भाषा में उन्हें बेहतर तरीके से पढ़ाया जा सकता है। 95 प्रतिशत बच्चे घर में बोली जाने वाली भाषा में बात करते हैं।
बच्चे सहजता से बोलते हैं स्थानीय भाषा : बिलोचिस्तान कॉलोनी स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय के डॉ. विवेक वशिष्ट का कहना है कि हिन्दी को हिन्दी भाषा में ही पढ़ाया जाता है, लेकिन बच्चों के स्थानीय भाषा में बोलने पर उन्हें हिन्दी में बोलने को कहा जाता है।
थे समझ ग्या बात नै, मतळब जद टाबर राजस्थानी मांय बोले तौ उणनै राजस्थानी बोलण सूं रोकिजै अर हिंदी बोलण वास्तै मजबुर करिजै, अगर वौ हिंदी नीं बोल सकै तौ फाईन, चार्ज या पनिस्मेंट मिळै. आ हालत है आपणी राजस्थान री आपणै राजस्थान मांय. कांई आपां आजाद हौ ??
नवनीत गुर्जर
त्वरित टिप्पणी. वो बच्चे का रोना, खिलखिला कर हंसना! मां का डांटना..फिर पुचकारना। ..और चूल्हे पर दूध में उफाण आते ही बच्चे को चारपाई पर पटक कर भागना..। इस पूरे वात्सल्य में बोलता कोई नहीं। न मां, न बच्च। लेकिन दोनों ही समझते हैं एक-दूसरे को। मन की भाषा को। मातृभाषा क्या है? यही तो है। जिसे अबोला बच्च समझता है। खूंटे से बंधी गायें जानती हैं। आखिर इस मर्म को सरकार क्यों नहीं समझती।
हो सकता है सरकार ही सही हो! क्योंकि उसमें बैठे मंत्रियों, अफसरों के कान तो राजस्थानी ही हैं, सुनने की क्षमता राजनीतिक। उन्हें वही बात सुनाई देती है, जो वे सुनना चाहते हैं। जैसे- सरकार बहुत अच्छे काम कर रही है। आपका ‘वो’ भाषण जोरदार था। हंसते वक्त आप बहुत अच्छे लगते हैं।..अरे!
एक बच्चे को हंसा कर तो देखिए। अपनी भाषा में। थारी-म्हारी राजस्थानी मं। पूरे जीवन की सुंदरता नजर आ जाएगी। ऐसा नहीं है कि कोई मंत्री राजस्थानी नहीं बोलता। सबके सब इसी भाषा में अपनापन पाते हैं। लेकिन मंच से नीचे। मंच पर चढ़ते ही भाषा बदल जाती है। हां! जब गांव-ढाणियों में वोट मांगने जाते हैं, तब ठेठ राजस्थानी बोलते हैं। ..फिर भी शिक्षा मंत्री कहते हैं- बच्चों को हिंदी में ही पढ़ाया जाना चाहिए। हैरत इस बात की है कि वे यह बात भी राजस्थानी में ही कहते हैं।
कितनी समृद्ध और मीठी है यह भाषा। इसके लोकगीत सर्वाधिक शास्त्रीय भी। उतने ही मीठे भी। इसका लहजा महाराणा प्रताप जितना बहादुर भी। पन्नाधाय जितना ममतामयी भी। इस सबके बावजूद अगर किसी राजस्थानी को अपनी मातृभाषा के लिए किसी सरकार से अनुनय-विनय करनी पड़े तो यकीनन उस सरकार को अपने बारे में सोचना चाहिए।
जयपुर. अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा कानून ने अब शिक्षाविदों और प्रदेशवासियों में नई बहस छेड़ दी है। कानून के एक प्रावधान में कहा गया है कि प्राथमिक कक्षाओं तक बच्चों को अनिवार्य रूप से मातृभाषा में पढ़ाना ही होगा।
इधर अभी तक राजस्थानी को संवौधानिक मंजूरी नहीं मिलने से पसोपेश की स्थिति पैदा हो रही है। ऐसे में प्रदेश के 90 लाख बच्चों की मातृभाषा को लेकर भी सवाल पैदा हो गया है। भाषा की मान्यता को लेकर शिक्षाविद एवं जनप्रतिनिधियों का एक तबका एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है।
अनिवार्य शिक्षा कानून के अनुच्छेद 29 में यह प्रावधान किया गया है कि बच्चों की समझ को आसान एवं प्रभावी बनाने के लिए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में पढ़ाना होगा। अपनी भाषा के इस्तेमाल से बच्च तनावरहित रहेगा साथ ही विचारों को आसानी से प्रकट कर सकता है। इससे बच्चे की आंतरिक क्षमताओं का सही मूल्यांकन और उसे मानसिक रूप से विकसित किए जाने में मदद मिलेगी।
फिलहाल प्रदेश में करीब 90 लाख बच्चे प्राथमिक कक्षाओं की पढ़ाई कर रहे हैं जबकि सालाना औसतन 15 लाख बच्चे सालाना नए जुड़ते हैं। इधर शिक्षा विभाग कानूनी प्रावधानों को लागू करने की योजना तैयारी में जुटा है। विभाग पाठ्यक्रम को ज्यादा से ज्यादा चाइल्ड फ्रैंडली बनाने की भी योजना तैयार कर रहा है।
इनका कहना है:
बच्चों के हक के साथ नहीं होना चाहिए खिलवाड़: राजस्थानी भाषा को 8 वीं अनुसूची में शामिल करने का मामला एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है। शिक्षाविदों एवं भाषा की वकालत करने वालों का कहना है कि बच्चों के हक के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए और पाठ्यक्रम को इस प्रकार बनाया जाना चाहिए कि बच्चों को अपनी मातृभाषा में शिक्षा मिल सके।
इनका कहना है:
यदि अनिवार्य शिक्षा कानून को प्रदेश में ईमानदारी से लागू करना है तो मातृभाषा को माध्यम बनाना ही होगा। त्रिगुण सेन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार प्रारंभिक शिक्षा में पहले नंबर पर मातृभाषा को रखना होगा। अगले दो चरणों में संपर्क भाषा के रूप में हिंदी या अंग्रेजी तथा वैकल्पिक भाषा के रूप में अन्य किसी भारतीय भाषा को समाहित किया जा सकता है।
-सी.पी. देवल, साहित्यकार
जब विधानसभा में जनप्रतिनिधि ही राजस्थानी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में अपनी बात रखते हैं तो बच्चों को राजस्थानी से कैसे दूर किया जा सकता है। हम बच्चों को अपनी भाषा ही नहीं सिखाएंगे तो यह अन्याय है। शिक्षा विभाग को चाहिए कि प्रावधान को तुरंत ही लागू करे।
-सूर्यकांता व्यास, विधायक, सूरसागर, जोधपुर
राजस्थानी हिंदी से भी पुरानी भाषा है। तो फिर इसे मान्यता क्यों नहीं?
- कृष्ण वृहस्पति, साहित्यकार
स्कूलों में ड्राप आउट की एक वजह बच्चों पर हिंदी और अंग्रेजी लादने का दबाव है। कई बच्चे महज इसलिए स्कूल नहीं जाते कि उन्हें क्षेत्रीय भाषा बोलने पर पाबंदी होती है। बच्चों के पास विकल्प होना चाहिए। कानून का नया प्रावधान बच्चों को स्कूलों की ओर से आकर्षित करने का माध्यम हो सकता है। सरकार को इसे नए शिक्षा सत्र से ही लागू करना चाहिए।
-अनिता भदेल, विधायक, अजमेर दक्षिण
क्रो, कौआ और कागला?
साहित्यकार सी.पी. देवल तर्क देते है कि राज्य के दूरदराज गांव के छोटे बच्चे के मानस पटल पर कौवे के लिए कागला शब्द अंकित रहता है। जब बच्च स्कूल जाता है तो शिक्षक कागला बोलने पर उसे बैंत दिखाता है। शिक्षक उसे ‘कौआ’ बताता है, कुछ दिन बाद यही कागला ‘क्रो’ हो जाता है। ऐसे में कई बच्चे पूरी तरह भ्रमित हो जाते हैं। स्कूल से आंखें मूंदने का एक बड़ा कारण यह भी रहता है।
सणफ, धरण, सूळ, रीळ —
चिकित्साविद डॉ. एस. जी. काबरा का कहना है कि ग्रामीण रोगी दर्द के लिए राजस्थानी भाषा में सणफ, धरण, सूÝ, रीÝ, बाइंठा जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इन्हें नहीं समझने से डॉक्टर बीमारी ठीक से समझ ही नहीं पाता। इससे मरीज का सही इलाज नहीं हो पाता। हालांकि जिस क्षेत्र में डॉक्टर ड्यूटी कर रहा है वह हालात देखते हुए धीरे धीरे स्थानीय भाषा सीख जाता है।
अनिवार्य शिक्षा के प्रावधानों को लागू करने के लिए कमेटी गठित कर दी गई है। बच्चों के लिए जो भी बेहतर होगा, कदम उठाया जाएगा। फिलहाल राज्य में हिंदी ही मातृभाषा है।
- मास्टर भंवरलाल, शिक्षामंत्री
राजस्थानी भाषा को साहित्य अकादमी की मान्यता है। 22 भारतीय भाषाओं के साथ इसे साहित्यिक मान्यता है। इसलिए बच्चों को पढ़ाने के लिए भी मान्यता दी जाने चाहिए।
- मोहन आलोक, साहित्यकार
टूटे बाजूडा री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
टूटे बाजूबंद री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
कोई पंचरंगी लहेरिया रो पल्लो लहेराए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए
टूटे बाजूडा री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
टूटे बाजूबंद री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
कोई पंचरंगी लहेरिया रो पल्लो लहेराए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए
लागी प्यारी फुलवारी आतो झूम झूम जाए
ल्याई गोरी रो संदेशो घर आओ नी सजन
बैरी आंसुडा रो हार बिखर नही जाए
कोई चमकी री चुंदरी में सळ पड़ जाए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो री बयारिया
झालो सहयो नही जाए
शहर बाजार में जाइजो हो बना जी हो राज
पान मंगाय वो रंगतदार बनजी बांगा माहे
पांन खाय बनी सांभी सभी, बना हजी हो राजे
बनो खीचे बनी से हाथ .. हो बांगा माहे
हाव्यलड़ों मत खीचों बना जी हो राजे
रुपया लेस्सूँ सात हजार .... हो बांगा माहे
ऊधार फुझाब मैं नहीं करां हो राज
रुपया गिगलां सात हजार ... हो बांगा माहे
शहर बाजरां मती जाइजो हो राज
म्हांने परदेसी रो कांई रे विसवास .. हो बांगा माहे...
चाहे बिक जाये हरियो रूमाळ
बैठूंगी मोटर कार में
चाहे सास बिको चाहे ससुर बिको
चाहे बिक जाये नणद छिनार
बैठूंगी मोटर कार में
चाहे देवर बिको चाहे देराणी बिको
चाहे बिक जाये सारा रूमाळ
बैठूंगी मोटर कार में
चाहे जेठ बिको चाहे जेठाणी बिको
चाहे बिक जाये हरियो रूमाळ
बैठूंगी मोटर कार में
चाहे बलम बिको चाहे सौंक बिको
चाहे बिक जाये सांस को लाल
बैठूंगी मोटर कार में
एक गांव मे भोजा नाम रौ मिनख रैवतौ हौं। उणरी लुगाई रौ नाम केसरी हौ। कैसरी घणी लड़ाक ही। दोनूं आपरै घर सूं न्यारा रैवता हा। घर में वै सिरफ तीन मिनख हा। अेक टाबर भी हौ। रात दिन बात-बात में लड़ाई करणौ तौ केसरी रौ सौक हौ। भोजौ इण बात सूं घणौं कायौं व्हैतौ। वौ केसरी नै घणी समझाई। पग पकड़िया, हाथा-जोड़ी करी। उणरै मां-बाप सूं बात करी। छोरी री मां अर बाप उणनै समझाई। लाड़ेसर, अे थ्हारा धणी हैं। धणी भगवान समान व्है, इणरी सेवा करणौ थ्हारौ धरम हैं। पण केसरी नै किणी बात रौ फरक नीं पड़ियौं, वा तौ आपरी मरजी री मालकिन ही। साधु-मातमा कना सूं भी उपाय करवाया पण वा तौ लखणौ री लाड़गी ही। भोजा रा मां-बाप अर बहना उणनै आंख देवता ही नीं सुवाता। भौजों कितरी बार मरन री कोसिस करी, पण वा कैवती अबै यूं नीं करू ? म्हारी गलती व्हैगी। भौजौं घर सूं जावण री बात करतौ तौ वा मरण-मारण री धमकी देवती। कितरी बार कपड़ा में आग लगाय देवती। भाजा अर उणरा परिवार नै घणी भूंडी बोलती। रोज-रोज रा झगड़ा सूं कायौं व्हैनै भोजो सोचियौं कै अबै यूं नी चालैला। इणरी धमकिया सूं डरगियौ तौ म्हारौ जमारौ खराब व्है जावैला। औ विचार नै वौ केसरी सूं कह्यौं, म्हैं तौ जा रियो हूं, अबै थू अेकली रै सुख सूं। केसरी घणा ही नाटक करिया। भोजा थूं घर सूं ग्यौ तौ मर जाऊंला। मां-बाप तौ मुंडौ घालैला नीं। भौजौ इण बार अेक नीं सुंणी। जिण समै भौजौं घर छोड़ण री बात करी ही, वा आटौं गूंद री ही। वा कुंड़ौ उठायनै भोजा रै माथा माथै मार दियौं। बापड़ौ भौजौ वठै ही बैठ ग्यौ अर कह्यौं, बस कठी दूंजी जगै मत मार दीजै, म्है कठी ही नीं जाऊंला।
भोजै भजंगी मारी, कम्मर लीनी कस।
क्ेसरी कुंडै की मारी, भाजौ बौल्यों बस।
पण कैसरी नीं मानीं। इण बार वा माथा मंे वार करियौ अर भौजा रौ जीव निकलग्यौं। भौजौ मरियों तौ घणी पछताई, टाबर अनाथ व्यैगियौं। पण अबै की व्हैं। अबै उणनै नीं तौ घर वाला नीं पीर वाला मुंडौ घालता। क्यूंकि सगळा उणरा लखण जाणता। इण कहाणी सूं आ सीख मिलै कै घर में लड़ाई झगड़ा परिवार नै खराब कर दैवे। लुंगाई घर में लिछमी रौ रूप व्हैं, उणनै आपरी मर्यादा में रैवणौ चाहिजें।
एक ऊंदरा री नगरी हीं। उणमें घणा सारा ऊंदरा रैवता हा। वठै जगै-जगै उणरा घणा सारा बिल हां। एकर वठा सूं हाथियां रज्ञै झुंड पाणी पीवण सारू निकलियौ। ऊंदरा झुंड नै देखियौं तौ उणमें खलबली माचगी। अबै करै तौ कांई। इण पर सगळा विचारियौं कै हाथियां सूं बात करणी चाहिजे। ऊंदरा रौ सरदार हाथियां कनै गयौ अर हाथ जोड़नै अरज करी कै महाराज, औ ऊंदरां रौ मुलक हैं। अठैं ऊंदरा रां घणा सारा बिल हैं। आप राग अठै पडग्या तो हाहाकार मच जावैला। आप किरपा करनै दूजी जगा पधार जावौ। आपरी घणी किपरा व्हैला। हाथियां नै आ बात जचगी कै बापड़ा यूं ही मारियां जावैला। वै सिरदारा री बात मान नै दूजीं जगै सारू व्हिर व्हिया। इण पर ऊंदरां रो सरदार कह्यौ, महाराज आप घणी किरपा करी हौं। जद कदैई आपनै जरूरत पड़े, म्हानै जरूर याद करजौ। म्हैं जितरी व्है सकैला उतरी आपरी मदद जरूर करूंला।
ऊंदरां रै सरदार री बात सुण हाथियां नै हंसी आयगी। बापड़ा उंदरा म्हारी कांई मदद करैला। व्है हंसता-हंसता ही व्हिर व्हिया अर कह्यौं जरूर याद करांला। घणौं टेम निकलियौ। एक दिन सिकारी रै जाल सूं हार्थी एक मोटा खाड़ा रै मांय पड़ ग्या। खाड़ा में पड़णै सूं हार्थी रौ बल बेकार व्हैगियौ। घणी कोसिस करी पण सगळी बैकार गई। जद उणनै ऊंदरां रे सरदार री कयोड़ी बात याद आई। वौ उणी टैम सरदार नै याद करियौं। याद करता हीं ऊंदरां रौ सिरदार वठै पूंग गयौं। हार्थी री दसा देख वौ कह्यौं, महाराज, म्है आपरा थोड़ा और सार्थी लेय‘र आंऊ। म्हैं सगळा मिल नै आप नै निकाल देवाला। इण बार भी हार्थी हंसिया बिना नी रै सकियां। ऊंदरां रौ सिरदार गयौ अ‘र सगळी परजा नै वठै बुला ली।
सरदार रै आदेस रै मुजब सगळा वठै पहुंचिया अर खाड़ा में धूल भरण लागा। ऊंदरां रै पगा में इतरी धूड़ ही कै अंधेरौ पड़ ग्यौ। हाथी आपरा पगा सूं धूड़ सू खाड़ौ भरण लागौ। ज्यूं-ज्यूं धूड़ पड़ती री खाड़ौ भरतौ गयौ। थोड़ी दैर रै मांय ही खाड़ौ भर ग्यौ। हाथी बारै निकलग्यौ तौ आपरी सूंड में उठायर ऊंदरां रै सरदार ने आपरै गले लगायौ अर उणनै धन्यवाद दियौ। हार्थी नै आ बात समझ आयगी कै दुनिया में कोई छोटो नीं व्हिया करै। मुस्किल री घड़ी मंे कोई भी एक दूजा रौ साथ दे सके। हाथी आपरी नगरी अर ऊंदरां आपरी नगरी सारू व्हिर व्हिया।
कठै गमग्या है वै इतरा आखर
गुनहगार गजला रा आखर हैं कुचमादी, श्रीमाली सुरगां सूं म्हारो गांव वालो है।
सळवटा मीटणी हैं, मूंडे जो समाज रे है, हाडी राणी वालों देश जग सूं रूखाळो है।
साहित्य सूरज बण, मेटणो है जड़ा मूल, जन मन व्यापो जो भी अंधकार काळो है।
साहित्य सूरज रामेश्वर री उड़ान देख, साचाणी लागै अबै बावनो हिमालो है।
-साहित्यकार रामेश्वरदयाल श्रीमाली को श्रद्धाजंलि स्वरूप भीनमाल में व्याखाता अरूण दवे ने ये पक्तियां लिखी। जिनमें श्रीमाली की सभी पुस्तकों के नाम शामिल हैं।
साहित्यकार रामेश्वर दयाल श्रीमाली के निधन पर साहित्य जगत और अन्य लोगों ने जताया शोक। कहा- श्रीमाली ने शुरू की थी राजस्थानी भाषा के लिए संघर्ष की यात्रा। अपने साहित्य की बदौलत दिलाया राजस्थानी को मान सम्मान। अंतिम संस्कार में उमड़े लोग।
कठीनै गमग्या है वै बावळा आखर
मूडां मायं सूं एक हरफ नीकलतो हो- देस
अर मूडां री माळा गूंथीजती ही च्यारूमेर
थमती ई कोनी हो माथा देवणिया रो रेळो
मां कैवतां ई जागतो हो नेह अर बलिदान
मुलक सारू मिटता ही माथा
लूळा साटै बिकता हा माथा
कठै गमग्या है वे आखर
असल उन्मादी अरथावाळा आखर।
अपनी राजस्थानी कविता कुचमादी आखर में ही लाईनों के माध्यम से समाज में आ रहे बदलाव, खत्म होते रिश्ते और भावनओं समेत अन्य समाप्त होती परंपराओं पर तीखी चोट करने वाले साहित्यकार रामेश्वर दयाल श्रीमाली बुधवार को पंचतत्व में विलीन हो गए। उनका मंगलवार शाम को निधन हो गया था। कुचमादी आखर नामक इस कविता संग्रह में उन्होंने बताया था कि अपनापन भरे और भावनाओं से ओतप्रोत आखर आज मिट गए हैं। श्रीमाली के निधन का समाचार सवेरे जैसे ही लोगों तक पहुंचा किसी को विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि एक दिन पहले तक ही लोगों ने उन्हें हमेशा की तरह उत्साह के साथ बात करते हुए देखा था।
सरलता और सादगी
सरलता और सादगी ही श्रीमाली की पहचान थी। उन्होंने लगभग तीन साल तक साहित्य की साधना की, लेकिन कभी भी निराशा और घमंड को अपने पर हावी नहीं होने दिया। साहित्य के क्षेत्र में भी राजस्थानी भाषा के लिए उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। ७६ वर्ष की आयु में भी वे अक्सर बाहर होने वाले साहित्य सम्मेलनों में भाग लेते और शेष समय घर पर बच्चों के साथ खेलकर और नवीन साहित्य सृजन में बिताते थे। साहित्य के माध्यम से उनका व्यंग्य तीखी चोट करता था।
साहित्यकार ही नहीं प्रेरक भी
जालोर में उनकी पहचान एक साहित्यकार के रूप में ही नहीं बल्कि वे कई युवा साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्रोत भी रहे। उन्होंने कई युवाओं को साहित्य सृजन के लिए तैयार किया और मार्गदर्शन भी दिया।
-उनका साहित्य मन पर चोट करता था। कविताओं की पक्तियां नया जोश भर देती थी। वे खुद ही साहित्य की साधना नहीं करते थे बल्कि अपने छोटे कई युवाओं को उन्होंने प्रेरित किया। जिनमें मैं भी शामिल हूं। उनकी प्रेरणा से ही मै साहित्य सृजन कर पाया। निराशा को उन्होंने कभी स्वयं पर हावी नहीं होने दिया। यही कारण था कि जब भी उनके पास जाते वे सदैव नए जोश से भरे हुए रहते थे।
-पुरुषोत्तम पोमल, साहित्यकार, जालोर
-उन्होंने साहित्य का जो सृजन शुरू किया वह उनके निधन तक अनवरत जारी रहा। पिछले तीन दशकों में मंैने उन्हें कभी ठहरा हुआ नहीं देखा। हमेशा वे चिंतन करते और कुछ ना कुछ लिखते रहते। समाज में व्याप्त बुराइयों के प्रति उनका दृष्टिïकोण व्यापक था। जिसे उन्होंने अपने साहित्य में भी उतारा। व्यंग्य भी किया तो इतना सटीक कि सीधा मन पर चोट करता।
-अचलेश्वर आनंद, साहित्यकार, जालोर
-राजस्थानी भाषा के लिए उनका योगदान सदैव याद किया जाएगा। इस भाषा में लिखी उनकी कई पुस्तकों का हिंदी और बंगाली में अनुवाद हुआ। राजस्थानी शब्दों का उन्होंने जिस प्रकार से उपयोग किया है उसके बाद उनका साहित्य लगातार पढऩे का मन करता है। साथ ही राजस्थान दिवस के दिन ही उनका मौन हो जाना एक संयोग ही है।
-अशोक दवे, जनसम्पर्ककर्मी, जालोर
-जीवन के सरोकारों से जुड़ी रचनाएं जुड़ी हुई थी। मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत थी। कविता और कहानी दोनों क्षेत्रों में आम व्यक्ति को पीड़ा और भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रदान की थी।
-अरूण दवे, व्याख्याता, जालोर
नम आंखो से किया विदा
श्रीमाली का अंतिम संस्कार सवेरे करीब साढ़े नौ बजे समाज के श्मशान घाट में किया गया। इससे पूर्व चामुंडा मंदिर के समीप स्थित उनके निवास से अंतिम यात्रा शुरू हुई। जो अस्पताल चौराहा, सूरजपोल होते हुए श्मशान घाट पहुंची। वहां उनके ज्येष्ठï पुत्र विश्वनाथ श्रीमाली ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान वरिष्ठï लेखाकार ईश्वरलाल शर्मा, साहित्यकार पुरूषोत्तम पोमल, बाबूभाई व्यास, अचलेश्वर आनंद, मधुसूदन व्यास, ऋषिकुमार दवे, भीनमाल से व्याखाता अरूण दवे और अशोक दवे समेत कई लोग मौजूद थे।
राजस्थांन दिवस मनावण री मन मांय उमक जागी, अेक’र पाछौ टटोळ्यौ जकौ पोसाळां मांय बांच्यौ हौ. राजस्थांन कंया बण्यौ अर इणरौ इतिहास कांई हौ.
सब देख’र लागौ कै फक्त इणरौ नांव इज राजस्थान पड़यौ छै, राजस्थान मांय रेवणीयौ राजस्थानी कुहावै पण वौ ई फक्त नांव रौ राजस्थांनी, उणनै उणरी भासा अर संस्क्रती सूं हेत राखण रौ हक ईं नीं दियौ भारत सरकार.
सरदार पटेल राजपुतानै रै सगळा राजावां नै लाळा-लुंभा करनै अर वांनै वांरी अर वांरै रईयत (प्रजा) री भलाई बताय’र भारत मांय विलय वास्तै राजी कर दिया. इणरै साथै ईं अठा री संस्क्रती, अठा री सभ्यता, रीति रिवाज सैं कीं खतम कर दियौ. भारत मांय विलय रै साथै ईं आपां आपणी हजारूं बरसां री परंपरा, भासा अर संस्क्रती रौ राष्ट्रीय अेकता अर अखंडता रै नांव पर आपां समर्पण कर दियौ.
राजस्थांनी भारत मांय सबसूं विशाळ भाग मांय बोली जावण वाळी भासा छै. आ भासा आखै राजस्थांन, मध्य प्रदेश रै माळवै, उत्तर गुजरात, पाकिस्तान रै सिंध, थारपारकर अर पंजाब रा घणकरा इलाकां, हरियाणा अर इणरी अेक बोली गुजरी तौ कश्मिर, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चेकोस्लाविया अर सोवियत रुस रा घणकरा देसां मांय बोलीजे.
भारत सरकार राजपुतानै नै राजस्थांन नांव तौ दे दियौ, पण राजस्थांन रा प्राण अठा री भासा नै मानता नीं दी. राजस्थांन री सगळी बोलियां सूं मिळ’र जै भासा बणै वा अेक राजस्थांनी नै इण री बोलीयां रै हिसाब सूं तोड दी अर इणनै हिंदी भासा री अेक बोली बताय दि.
भारत सरकार नै औ डर ई सतावै कै जिण हिंदी भासा नै राष्ट्रभासा बणावण रौ वा सुपणां देखै छै, अर बोलै छै कै आ भासा दुनीया री तीजी सबसूं ज्यादा बोली जावण वाळी भासा छै. राजस्थानी भासा नै मान्यता मिळ जावै तौ इण भारत सरकार री आ बात झुठी हु जावै, क्युं कै राजस्थांनी अेक स्वतंत्र भासा रै रुप मांय भारत री सबसूं ज्यादा बोली जावण वाळी भासा छै.
राजस्थान रै भारत मांय विलय सूं राजस्थांन नै अेक हिसाब सूं गुलामी इज हाथ लागी है. भारत मांय रेवता राजस्थांनीयां नै आपरी भासा वापरवा रौ इधकार कोनीं, जिणसूं वांनै वांरै राज्य मांय भासा रै आधार पर मिलण वाळा सगळा हकां सूं हाथ धोवणा पडे छै. राजथांनीयां नै वांरै खुद रै राज्य मांय नौकरी नीं मिळै. दूजा राज्यां रा हिंदी भासी आय’र अठै नौकरी करै अर आपणा राजस्थांनी भाई प्रदेसा कांनी न्हावै.
दूजी कांनी पोसाळां मांय शिक्षा हिंदी भासा मांय हुवण सूं टाबरां नै भणाई मांय तकलिफ आवै. टाबर डाफाचुक व्है जावै कै, घरै तौ वौ दूजी भासा बोलै अर पोसाळां मांय दूजी भासा छै. वौ खुद री भासा नै हिनता री निजर सूं देखण लागै. अेड़ौ टाबर ना तौ हिंदी बराबर सिखै ना ई राजस्थांनी रौ ग्यान हुवै. सेवट ૪-૫ पास करनै वौ पोसाळां (स्कुलां) छोड’र प्रदेशां कांनी मुंडो करै.
राजस्थांन रै भारत मांय विलय सूं अठा रै मानखां नै बेरोजगारी मिळी, लोगां नै आपणी भासा-संस्क्रती रै प्रती हिन भावना मिळी. पछै बतावौ कैड़ौ राजस्थांन दिवस. हकिकत मांय तौ ૩૦ मार्च नै राजस्थांन वासियां नै काळा दिन रै रुप मांय मनावणौ चाईजै. लोग केह्वै इण दिन राजपुतानै री सगळी रियासतां आपस रौ बैर भुलाय’र अेक हूगी, ना आ बात नीं है, राजस्थान सूं पैली जद राजपुतानौ हौ उण समै अेकता अबार रै राजस्थान करता वधारै ही, हर रियासत री राजभासा राजस्थानी ही. लोगां रै कन्नै रुजगार हौ अर आपसरी मांय घणौ भाईपौ हौ.
रहसी राजस्थान, राजस्थानी राखिया ।
Posted by हनवंतसिंघ at 2:00 AM
साथियो,
राम-राम। आज मैं आपसे राजभाषा हिन्दी में मुखातिब हूं, इसका मतलब यह नहीं कि मैं अपनी मातृभाषा राजस्थानी का सम्मान नहीं करता। हकीकत तो यह है कि जो व्यक्ति अपनी मां का सम्मान करता है, वही अन्य की मांओं का सम्मान करना जानता है। हमारे दिल की बात अन्य भाषा-भाषियों तक भी पहुंचे, इसलिए आज हिन्दी में।
मां हमें जिस भाषा में दुलारती है, लोरियां सुनाती है, जिस भाषा के संस्कार पाकर हम पलते-बढ़ते हैं, वही होती है हमारी मातृभाषा। जनगणना के वक्त भी मातृभाषा के कॉलम में हमें उसी मां-भाषा का नाम लिखना-लिखवाना चाहिए। अक्सर देखा गया है कि राजस्थान में बसने वाले राजस्थानी, पंजाबी, सिंधी आदि भाषी लोगों की मातृभाषा अनभिज्ञतावश हिन्दी लिख दी जाती है। हमें इस मामले में सावचेती बरतनी चाहिए। सही आंकड़े प्रस्तुत कर हम हिन्दी के सम्मान को कम नहीं कर रहे, बल्कि अपनी मां-भाषा का सच्चा सम्मान कर रहे होते हैं और अपने राष्ट्र की एक सही-सही तस्वीर भी दुनिया के समक्ष रख रहे होते हैं। असल में भाषाओं की विविधता हमारे राष्ट्र की खूबी है और यह खूबी बरकरार रहनी चाहिए। राजस्थानियों को भी जनकवि कन्हैयालाल सेठिया का यह दूहा याद रखना चाहिए-
खाली धड़ री कद हुवै, चैरै बिन्यां पिछाण?
मायड़ भासा रै बिन्यां, क्यां रो राजस्थान?
सही कहा सेठियाजी ने कि जिस भाषा के नाम पर राजस्थान नाम पड़ा इस प्रांत का। वह भाषा ही नहीं रही तो राजस्थान काहे का? इसलिए राजस्थानी का सवाल राजस्थान की पहचान का सवाल है।
देश के लगभग हर प्रांत में वहां की प्रमुख भाषा को प्रथम भाषा के रूप में स्वीकार किया जाता है और सारा राजकाज उसी भाषा में चलता है। वही भाषा शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रचलित है। मसलन पंजाब में पंजाबी, गुजरात में गुजराती, महाराष्ट्र में मराठी, आंध्र प्रदेश में तेलुगु, अरुणाचल प्रदेश में असमिया, बिहार में मैथिली और हिन्दी, गोआ में कोंकणी, जम्मू-कश्मीर में उर्दू, झारखंड में संथाली, कर्नाटका में कन्नड़, केरला में मलयालम, मणिपुर में मणिपुरी, उड़ीसा में उडिय़ा, सिक्किम में नेपाली, तमिलनाडु में तमिल, प. बंगाल में बंगाली आदि। इन प्रांतों में हिन्दी, अंग्रेजी आदि को प्रांत की द्वितीय राजभाषा के रूप में अंगीकार किया गया है। यहां तक कि दिल्ली और हरियाणा राज्यों में तो पंजाबी को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया गया है। दूसरी और राजस्थान राज्य का हाल यह है कि यहां की प्रमुख भाषा राजस्थानी राज्य की प्रथम राजभाषा बनने की अधिकारिणी है, मगर उसे द्वितीय तो दूर तृतीय भाषा के रूप में भी स्वीकार नहीं किया जाता। राजस्थान के स्कूलों में संस्कृत, उर्दू, गुजराती, सिंधी, पंजाबी, मलयालम, तमिल आदि भाषाएं तो तृतीय भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है, मगर अपने ही प्रांत की राजस्थानी नहीं। राजस्थान की विधानसभा में राजस्थानी भाषा के संस्कारों से ही पला-बढ़ा और राजस्थानी में ही वोट मांग-मांग कर विधानसभा तक पहुंचा एक विधायक 22 भारतीय भाषाओं में भाषण देने का अधिकार तो रखता है, मगर अपनी मातृभाषा राजस्थानी में शपथ तक नहीं ले सकता। राजस्थान की जनता पर अपमान का यह काला टीका आखिर कब तक लगा रहेगा? बातें तो बहुत हैं दोस्तो! मगर अगले खत में। आज तो रामस्वरूप किसान का यह दूहा सुनलो-
भासा अपणी बोलियो, जे चावो थे मान।
राजस्थानी कम नहीं, कम नहीं राजस्थान॥
आपरो
-सत्यनारायण सोनी, व्याख्याता (हिन्दी)
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, परलीका।
aapnibhasha@gmail.com
बोलो-बोलो रे भायला, अठै की नीं आणी-जाणी छै।
व्है छै कीं उठै, जठै खीरा भळ-भळता व्है।
भर काळजे बारूद, घूमतो हरेक जोध व्है।
बात साटै सिर देवण नैं तातो कुंचो-कुंचो व्है।
जठै अन्याव रै सांमी लड़-भिड़णो ही धर्म व्है।
इसड़ै जोधां रै सांमी लुळ्यो, जमानो छै।
पण तूं बोलो-बोलो रे भायला, अठै की नीं आणी-जाणी छै।
विनोद सारस्वत
छायळ फूल विछाय, वीसम तो वरजांगदे।
गैमर गोरी राय, तिण आंमास अड़ाविया।।
इसड़ै सै अहिनांण, चहुवांणो चौथे चलण।
डखडखती दीवांण, सुजड़ी आयो सोभड़ो।।
काला काळ कलास, सरस पलासां सोभड़ो।
वीकम सीहां वास, मांहि मसीतां मांडजै।।
हीमाळाउत हीज, सुजड़ी साही सोभड़े।
ढ़ील पहां रिमहां घड़ी, खखळ-बखळ की खीज।।
सोभड़ा सूअर सीत, दूछर ध्यावै ज्यां दिसी।
भीत हुवा भड़ भड़भड़ै, रोद्रित कर गज रीत।।
चोळ वदन चहुवांण, मिलक अढ़ारे मारिया।
सुजड़ी आयो सोभड़ो, डखडखती दीवांण।।
वणवीरोत वखांण, हीमाळावत मन हुवा।
त्रिजड़ी काढ़ेवा तणी, चलण दियै चहुवांण।।
सोभड़ै कियो सुगाळ, मुंहगौ एकण ताळ में।
खेतल वाहण खडख़ड़ै, चुडख़ै चामरियाळ।।
लोद्रां चीलू आंध, भागी सोह कोई भणै।
सोभ्रमड़ा सरग सात मै, बाबा तोरण बांध।।
राजस्थान रंगीलो प्रदेस। राजस्थान नै परम्परागत रूप सूं रंगां रै प्रति अणूंतो लगाव। सगळी दुनिया रो मन मोवै राजस्थान रा ऐ रंग। बरसां पैली नेहरूजी रै बगत नागौर में पंचायत राज रो पैलड़ो टणको मेळो लाग्यो। 2 अक्टूबर, 1959 रो दिन हो। राजस्थान रा सगळा सिरैपंच भेळा हुया। नेहरूजी मंच माथै पधार्या तो निजरां साम्हीं रंग-बिरंगा साफां रो समंदर लहरावतो देख'र मगन हुयग्या। रंगां री आ छटा देख वां री आंख्यां तिरपत हुयगी। मन सतरंगी छटा में डूबग्यो। रंगां रै इण समंदर में डूबता-उतरता गदगद वाणी में बोल्या- ''राजस्थान वासियां! थै म्हारी एक बात मानज्यो, आ म्हारै अंतस री अरदास है। वगत रा बहाव में आय'र रंगां री इण अनूठी छटा नै मत छोड़ज्यो। राजस्थानी जनजीवण री आ एक अमर औळखांण है। इण धरती री आ आपरी न्यारी पिछाण है। इण वास्तै राजस्थान रो ओ रंगीलो स्वरूप कायम रैवणो चाइजै।''
राजस्थानी जनजीवण रा सांस्कृतिक पख नै उजागर करता पंडतजी रा ऐ बोल घणा महताऊ है। 'रंग' राजस्थानी लोक-संस्कृति री एक खासियत है। अठै कोई बिड़दावै, स्याबासी दिरीजै तो उणनै 'रंग देवणो' कहीजै- 'घणा रंग है थनै अर थारा माईतां नै कै थे इस्यो सुगणो काम कर्यो।' अमल लेवती-देवती वगत ई जिको 'रंग' दिरीजै उणमें सगळा सतपुरुषां नै बिड़दाइजै।
राजस्थान री धरती माथै ठौड़-ठौड़ मेळा भरीजै। आप कोई मेळै में पधार जावो- आपनै रंगां रो समंदर लहरावतो निगै आसी। लुगायां रो रंग-बिरंगो परिधान आपरो मन मोह लेसी। खासकर विदेसी सैलाणियां नै ओ दरसाव घणो ई चोखो लागै। इण रंगां री छटा नै वै आपरै कैमरां में कैद करनै जीवण लग अंवेर नै राखै।
राजस्थानी पैरवास कुड़ती-कांचळी अर लहंगो-ओढणी संसार में आपरी न्यारी मठोठ राखै। लैरियो, चूंनड़ी, धनक अर पोमचो आपरी सतरंगी छटा बिखेरै। ओ सगळो रंगां रो प्रताप।
इणीज भांत राजस्थानी होळी एक रंगीलो महोच्छब। इण मौकै मानखै रो तन अर मन दोन्यूं रंगीज जावै। उड़तोड़ी गुलाल अर छितरता रंग एक मनमोवणो वातावरण पैदा करै। रंगां रो जिको मेळ होळी रै दिनां राजस्थान में देखण नै मिलै, संसार में दूजी ठौड़ स्यात ई निजरां आवै।
मानवीय दुरबळतावां रै कारण साल भर में पैदा हुयोड़ा टंटा-झगड़ा, मन-मुटाव अर ईर्ष्या-द्वेष सगळा इण रंगीलै वातावरण में धुप नै साफ होय जावै, मन रो मैल मिट जावै।
इण रंगीलै प्रदेस री रंगीली होळी रै मंगळ मौकै आपां नै आ बात चेतै राखणी कै वगत रै बहाव में आय'र भलां ई सो कीं छूट जावै पण आपणी रंग-बिरंगी संस्कृति री अनूठी छटा बणायां राखणी।
कंवल उणियार रो लिख्योड़ो ओ दूहो बांचो सा!
चिपग्या कंचन देह रै, कपड़ा रंग में भीज।
सदा सुरंगी कामणी, खिली और, रंगीज॥
संकलन अर प्रस्तुति
आपणी भाषा आपणी बात
जन्मे सूत सादल जिसों,आहंसी तपवान!!१!!
"धर गुज्जर वालो धणी ,सोलंकी सिधराव !
बणियो बनदो बनथली,कहिया सुजस कहाव !!
देग तेग भड़ डोडिया ,बांका जगत विख्यात !
ए अनमी अपनाविया,राव धणी गुजरात !!२!!

भारत नै आजाद हुयां 57 बरस होग्या, पण राजस्थानी भाषा नै, जिकी 15 करोड़ (प्रवासी 7 करोड़) लोगां री भाषा है, भारत रै संविधान में मान्यता नहीं देणो - संविधान री घोर अवमानना है। जनतांत्रिक संविधान में संविधान री जड़ पर कुठाराघात कर्यो गयो है, आ घणी चिन्ता री बात है। राजस्थान विधानसभा में राजस्थानी नै सर्वसम्मत संकल्प सैं पारित कर केन्द्रीय सरकार नै भेज्यो, पण बीं पर तानाशाही राजनेता विचार तक कोनी कर्यो, आ राजस्थानियां सारू अपमानजनक बात है। अब समै आग्यो है कै सब राजस्थानी एकजुट होय जन-जागरण वास्तै अभियान सरू करै। ईं अभियान रो पैलो चरण होसी राजस्थानी रै लियै जन-जागरण - अर ईं काम रै लियै राजस्थान रै हर जिलै में एक समिति गठित करी जावै। इण रा कार्यकर्ता तहसीलां अर पंचायत समितियां ताईं लोगां नै राजस्थानी भाषा री महत्ता री जाणकारी देवै अर उणां नै ईं मुद्दै पर सावचेत करै। जन-जागरण नै प्रभावशाली बणाणै सारू कार्यकर्ता पैदल यात्रा करै अर ढाणी-ढाणी ताईं राजस्थानी रो संदेश पुगावै। ईं जन-जागरण रै बारै में गठित समिति 'राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी' नै सही रपट भेजै। ईं रै बाद में दूसरो चरण जन-आंदोलन होसी। ईं आंदोलन में रेल रोको, स्कूल-कालेजां में हड़ताल, वकीलां री ओर सूं अदालतां रो बहिस्कार अर हरेक कस्बै-शहर में राजस्थानी भाषा नै मान्यता नहीं देणै रै विरोध में काळा झंडां रो जलूस निकळै। ईं सारै कार्यक्रम नै पूरो कर कै कम सैं कम 20 हजार आदमी नई दिल्ली पूंचै। जलूस निकाळ कै महात्मा गांधी री समाधि पर धरणो देवै अर अनशन करै। राजस्थान रा जित्ता भी सांसद है, बांकै घरां पर धरणो देवै अर उण सूं इस्तीफै री मांग करै। सागै-सागै संसद में भी ईं मान्यता सारू राजनैतिक पार्टियां सूं प्रस्ताव रखावै। राजस्थान रा विधायकां नै आप रै क्षेत्र में भाषा री अलख जगाणी चायै।
अमेरिका रा भाषा-विद्वान (अमेरीकन कांग्रेस ऑफ लाईब्रेरीज) दुनियां री 13 समृद्ध भाषावां में राजस्थानी भाषा नै भी एक समर्थ भाषा मानी है। राजस्थानी भाषा री उप-शाखावां में हरियाणवी, मालवी, मेवाती, मारवाड़ी, हाड़ोती, ढूँढाड़ी, बागड़ी अर पश्चिम राजस्थान री गुर्जर भाषा मुख्य है। राजस्थान में करीब 72 बोलियां बोली जावै है। कैबत है 'तीन कोस पर पाणी बदळै, 12 कोस पर बोली।' जकी भाषा री जितणी बोलियां अर उप-शाखावां हुवै, बा उतणी ही समर्थ भाषा मानीजै। नेपाल अलग राष्ट्र होतां हुयां भी बठै री नेपाली भाषा में राजस्थानी रा मोकळा सबद है। कारण साफ है कै बठै रो राजवंश राजस्थान सूं जुड़ेड़ो है।
राजस्थान मरुधर देस है। बीं री परम्परा अर संस्कृति भारत रै अन्य प्रदेशां सूं बिलकुल अलग है। बठै रा लोकदेवता, लोकगीत, लोक-गाथावां, खान-पान-पहराण री आपरी अलग विशेषता है। राजस्थान रा पसु-पाखी, बठै रा रूंख सब अलग हैं। इण री सही अभिव्यक्ति राजस्थानी में ही सम्भव है। बठै री प्रेम-कथावां दूजै साहित्य में कोनी। भारत रै इतिहास में राजस्थान आप री न्यारी पिछाण राखै है। बठै सूं राष्ट्रीय स्वतंत्रता रा सब क्रांतिकारी प्रेरणा ली है।
राजस्थानी भाषा नै मान्यता मिले बिना बठै री महान परम्परावां नै, अनूठी संस्कृति नै टाबर किंया जाणसी?
टाबरियां नै किंया हुवैलो, निज धरती रो ज्ञान।
राख्यां चावो जड़ां जीवती, द्यो मायड़ नै मान॥
-कन्हैया लाल सेठिया
(राजस्थानी भाषा मान्यता आंदोलन रा पर्याय-पुरुष श्री सेठिया कोलकाता सूं 21 दिसम्बर 2004 नै अखिल भारतीय राजस्थानी समारोह रासंयोजक श्री रतन शाह रै नांव लिखियोड़ी पाती रो एक अंश।)
-प्रस्तुति- सत्यनारायण सोनी
बोलैनीं हेमाणी.....
जिण हाथां सूं
थें आ रेत रची है,
वां हाथां ई
म्हारै ऐड़ै उळझ्योड़ै उजाड़ में
कीं तो बीज देंवती!
थकी न थाकै
मांडै आखर,
ढाय-ढायती ई उगटावै
नूंवा अबोट,
कद सूं म्हारो
साव उघाड़ो औ तन
ईं माथै थूं
अ आ ई तो रेख देवती!
सांभ्या अतरा साज,
बिना साजिंदां
रागोळ्यां रंभावै,
वै गूंजां-अनुगूंजां
सूत्योड़ै अंतस नै जा झणकारै
सातूं नीं तो
एक सुरो
एकतारो ई तो थमा देंवती!
जिकै झरोखै
जा-जा झांकूं
दीखै सांप्रत नीलक
पण चारूं दिस
झलमल-झलमल
एकै सागै सात-सात रंग
इकरंगी कूंची ई
म्हारै मन तो फेर देंवती!
जिंयां घड़यो थेंघड़ीज्यो,
नीं आयो रच-रचणो
पण बूझण जोगो तो
राख्यो ई थें
भलै ई मत टीप
ओळियो म्हारो,
रै अणबोली
पण म्हारी रचणारी!
सैन-सैन में
इतरो ई समझादै-
कुण सै अणदीठै री बणी मारफत
राच्योड़ो राखै थूं
म्हारो जग ऐड़ो? [‘जिण हाथां आ रेत रचीजै’ से ]
जद तू मिलसी बेलिया करस्यूँ मन री बात ।
बध बध देस्यू ओळमा भर भर रोस्यूँ बाँथ ॥
पैली तारिख लागताँ जागै घर ओ भाग ।
मनियाडर री बाट मँ बाप उडावै काग ॥
फागण राच्यो फोगला रागाँ रची धमाल ।
चाल सपन तूँ गाँव री गळीयाँ मँ ले चाल ॥
घर, गळियारा, सायना, सेजाँ सुख री छाँव् ।
दो रोट्या रै कारणै पेट छुडावै गाँव ॥
चैत चुरावै चित्त नै चित्त आयो चित्तचोर ।
गौर बणाती गौरडी खुद बणगी गणगौर ॥
चपडासी है सा’ब रो बूढो ठेरो बाप ।
बडै घराणै भोगरयो गेल जनम रा पाप॥
बेली तरसै गांव मँ मन मँ तरसै हेत ।
घिर घिर तरसै एकली सेजाँ मँ परणेत ॥
भाँत भाँत री बात है बात बात दुभाँत ।
परदेशाँ रा लोगडा ज्यूँ हाथी रा दांत ॥
गळै मशीनाँ मँ सदा गांवा री सै मौज ।
परदेसाँ मै गांगलो घर रो राजा भोज ॥
बैठ भलाईँ डागळै मत कर कागा कांव ।
चित चैते अर नैण मँ गूमण लागै गांव ।।
बडा बडेरा कैंवता पंडित और पिरोत।
बडै भाग और पुन्न सूँ मिलै गांव री मौत ।|
लोग चौकसी राखता खुद बांका सिरदार ।
बांकडला परदेस मँ बणग्या चौकीदार ॥
मरती बेळ्या आदमी रटै राम र्रो नांव ।
म्हारी सांसा साथ ही चित्त सू जासी गांव ॥
मै परदेशी दरद हूँ तू गांवा री मौज ।
मै हू सूरज जेठ रो तूँ धरती आसोज॥
बेमाता रा आंकङा मेट्या मिटे नै एक ।
गूंगै री ज्यू गांव रा दिन भर सुपना देख ॥
दादोसा पुचकारता दादा करता लाड ।
पीसाँ खातर आपजी दियो दिसावर काढ ।।
मायड रोयी रात भर रह्यो खांसतो बाप ।
जिण घर रो बारणो मै छोड्यो चुपचाप ॥
जद सूँ परदेसी हुयो भूल्यो सगळा काम ।
गांवा रो हंस बोलणौ कीया भूलू राम ॥
गरजै बरसै गांव मै चौमासै रो मेह ।
सेजा बरसै सायनी परदेसी रो नेह ॥
कुण चुपकै सी कान मै कग्यो मन री बात ।
रात हमेशा आवती रात नै आयी रात ॥
आंगण मांड्या मांडणा कंवलै मांड्या गीत ।
मन री मैडी मांडदी मरवण थारी प्रीत ॥
दोरा सोराँ दिन ढल्यो जपताँ थारो नाम ।
च्यार पहर री रात आ कीयाँ ढळसी राम ॥
सांपा री गत जी उठी पुरवाई मँ याद ।
प्रीत पुराणै दरद रै घांवा पडी मवाद ॥
नैण बिछायाँ मारगाँ मन रा खोल कपाट ।
चढ चौबारै सायनी जोती हुसी बाट ॥
प्रीत करी गैला हुया लाजाँ तोङी पाळ ।
दिन भर चुगिया चिरडा रात्यु काढी गाळ ॥
पाती लिखदे डाकिया लिखदे सात सलाम ।
उपर लिख दे पीव रो नीचै म्हारो नांम ॥
दीप जळास्यु हेत रा दीवाळी रो नाम ।
इण कातिक तो आ घराँ ओ ! परदेसी राम ॥
जोबण घेर घुमेर है निरखै सारो गांव ।
म्हारै होठाँ आयग्यो परदेसी रो नांव ॥
जीव जळावै डाकियो बांटै घर घर डाक ।
म्हारै घर रै आंगणै कदै न देख झांक ॥
मैडी उभी कामणी कामणगारो फाग ।
उडतो सो मन प्रीत रो रोज उडावै काग ॥
बागाँ कोयल गांवती खेता गाता मोर ।
जब अम्बर मँ बादळी घिरता लोराँ लोर ॥
बाबल रै घर खेलती दरद न जाण्यो कोय ।
साजन थारै आंगणै उमर बिताई रोय ॥
बाबल सूंपी गाय ज्यूँ परदेसी रै लार ।
मार एक बर ज्यान सूँ तडपाके मत मार ॥
नणद,जिठाणी,जेठसा दयोराणी अर सास ।
सगलाँ रै रैताँ थका थाँ बिन घणी उदास ॥
सुस्ताले मन पावणा गांव प्रीत री पाळ ।
मिनख पणै रै नांव पर सहर सूगली गाळ ॥
सहर डूंगरी दूर री दीखै घणी सरूप ।
सहर बस्याँ बेरो पडै किण रो कैडो रूप ॥
खाणो पीणो बैठणो घडी नही बिसराम ।
बो जावै परदेस मँ जिण रो रूसै राम ||
भगीरथ सिंह भाग्य
कीडी नगरो सहर है मोटर बंगला कार ।
जठै जमारो बेच कै मिनख करै रूजगार ॥
अजब रीत परदेस री एक सांच सौ झूँठ ।
हँस बतळावै सामनै घात करै पर पूठ ॥
खेत खळा अर रूंखडा बै धोरा बै ऊंट ।
बाँ खातर परदेस के तज देवूँ बैकूँट ॥
देह मशीना मै गळै आयो मौसम जेठ ।
बिरथा खोयी जूण म्हे परदेसा मँ बैठ ।।
ऊमस महीना जेठ रो बो पीपळ रो गांव ।
संगळियाँ संग खेलता चोपङ ठंडी छाव ॥
गाता गीत न गा सक्या करता करया न कार ।
जीतै जी ना जी सक्या मरिया पडसी पार ॥
ठीडै ठाकर ठेस रा ठीडै ही ठुकरेस ।
बिना ठौड अर ठाईचै क्यूँ भटकै परदेस ॥
समरथ जाणु लेखणी सांचो जाणू रोग ।
गावैला जद चाव सूँ दरद दिसावर लोग ।।
सूना सा दिन रात है सूनी सूनी सांझ ।
बंस बध्यो है पीर रो खुशिया रै गी बांझ ।।
हिरण्याँ हर ले नीन्द नै किरत्याँ कैदे बात ।
तारा गिणता काटदे नित परदेसी रात ॥
रिमझिम बरसै भादवो झरणा री झणकार ।
परदेसी रै आन्गणै रूत लागी बेकार ॥
साखीणो संसार है कद तक राखा साख ।
साख राखताँ गांव मँ मिटगी खुद री साख ॥
तन री मौज मजूर हा मन री मौज फकीर ।
दोनूँ बाताँ रो कठै परदेसाँ मँ सीर ॥
ऊंचा ऊंचा माळिया ऊची ऊंची छांव ।
महला सूँ चोखो सदा झूंपडियाँ रो गांव ॥
बाट जोंवता जोंवता मन हुग्यो बैसाख ।
छोड प्रीत री आस नै प्रीत रमाली राख ॥
जद सूँ छोड्यो गांव नै हिवडै पडी कुबाण ।
गीत प्रीत री याद मँ आवै नित मौकाण ॥
प्रीत आपरी सायनी होगी म्हारै गैल ।
भारी पडज्या गांव नै जिया कंगलौ छैल॥
प्रीत करी नादान सूँ हुयो घणो नुकसान ।
आप डूबतो पांडियो ले डूब्यो जुजमान ॥
हेत कामयो देश मँ परदेसा मँ दाम ।
किण री पूजा मै करू गूगो बडो क राम ॥
बाबो मरगो काळ मै करग्यो बारा बाट ।
घर मँ टाबर मौकळा कै करजै रो ठाठ ॥
मारै आह गरीब री करदे मटिया मेट ।
पण कंजूसी सेठ रो रति ना सूकै पेट ॥
किण नै देवाँ ओळमाँ किण नै कैँवा बात ।
टाबरियाँ रै पेट पर राम मार दी लात ॥
भगीरथ सिंह भाग्य
सूका सूका खेतडा पण नैणा मै बाढ ।
घर मँ कोनी बाजरी ऊपर सूँ दो साढ ॥
जद सूँ पाकी बाजरी काचर मोठ समेत ।
दिन भर नापै चाव सूँ पटवारी जी खेत ॥
फिर फिर आवै बादळी घिर घिर आवै मेह ।
सर सर करती पून मँ थर थर कांपै देह ॥
होगी सोळा साल री बेटी करै बणाव ।
कद निपजैली टीबडी कद मांडूला ब्याव ॥
टूटी फूटी झूँपडी बरसै गरजै गाज ।
इण चौमासै रामजी दोराँ रहसी लाज ॥
टाबर टीकर मोकळाँ करजै री भरमार ।
राम रूखाळी राखजै थाँ सरणै घरबार ॥
निरधनियाँ नै धन मिल्यो रोजणख्याँ नै राग ।
राम बता कद जागसी परदेसी रा भाग ॥
उगतो पिणघट ऊपराँ सुणतो मिठी बात ।
गळी गुवाडी घूमतो चान्दो सारी रात ॥
ना पिणघट ना बावडी ना कोयल ना छाँव ।
तो भी चोखो सहर सूँ म्हारो आधो गांव ॥
सांझ ढळ्याँ नित जांवता देखै सारो गांव ।
पिरमा थारी लाडली पटवारी रै ठांव ॥
पैली उठती गौरडी पाछै उठती भोर ।
झांझर कै ही नीरती सगळा डांगर ढोर ॥
छैल सहर सूँ बावडै खरचै धोबा धोब ।
पडै गांव मै रात दिन पटवारी सा रोब ॥
जद मन तरस्यो गांव नै जद जद हुयो अधीर ।
दूहा रै मिस मांडदी परदेसी री पीर ॥
प्रीत आपरी अचपळी घणी करै कुचमाद ।
सुपना मै सामी रवै जाग्या आवै याद ॥
पाती लिख रियो गांव नै अपरंच ओ समचार ।
दुख पावुँ परदेस मँ जीवूँ हूँ मन मार ॥
राग रंग नी आवडै कींकर उपजै तान ।
घर मै कोनी बाजरी अर टूट्योडी छान ॥
घर दे घर रूजगार दे घर घर री दे साख ।
ना देवै तो सांवरा जीवण पाछो राख ॥
बिन हरियाळी रूंखडा घरघूल्या सा ठांव ।
’राही’ दीखै दूर सूँ थारो आधो गांव ॥
लेग्या तो हा गांव सूँ कंचन देही राज ।
पाछी ल्याया सहर सूँ खांसी कब्जी खाज ॥
गाय चराती छोरडयाँ जोबन सूँ अणजाण ।
देख ओपरा जा लूकै कर जांटी री आण ।।
जोध जुवानी बेलड्याँ मिलसी करयाँ बणाव ।
आखडजै मत पावणा पगडंड्या रै गांव ॥
के तडपासी बादळी के कोयल री कूक ।
पैली ही सूँ काळजो हुयो पड्यो दो टूक ॥
अजब पीर परदेस री म मर जीवै जीव ।
घर मै तरसै गोरडी परदेसाँ मै पीव ।।
ना आंचळ ना घूंघटो ना हीवडै मै लाज ।
घिरसत पाळै गोरडी रोटी पोवै राज ॥
घाटै रो घर दे दिये दुख दीजै अणचींत ।
मतना दीजे सांवरा परदेसी री प्रीत ॥
धान महाजन रै घराँ ढोर बिक्या बे दाम ।
करज पुराणो बाप रो कीयाँ चुकै राम ॥
बेटो तो परदेस मै घर बूढा मा बाप ।
दोनो पीढी दो जघाँ दुख भोगै चुपचाप ॥
ठाला बिन रूजगार कै ताना देता लोग ।
भरी न अब तक गांव सूँ मनस्या बळण जोग ॥
जद जासी परदेस तूँ हुसी जद बरबाद ।
दरद दिसावर ई कडया रोज करैलो याद ॥
कितरा ही दुहा लिखूँ अकथ रहीज्या भाव ।
परदेसी रो दरद तो है गूंगै रो भाव ॥
सुख को कनको उड़तो कीया काण राख दी काणै में |
खोयो ऊँट घडै मै ढूडै कसर नहीं है स्याणै में ||
भूल चूक सब लेणी देणी ठग विद्या व्यापार करयो |
एक काठ की हांडी पर ही दळियो सौ बर त्यार करयो ||
बस पङता तो एक न छोड्यो च्यारू मेर सिवाणै मै |
खोयो ऊँट घडै में ढूँढे कसर नहीं है स्याणै मै
डाकण बेटा दे या ले , आ भी बात बताणी के |
तेल बड़ा सू पैली पीज्या बां की कथा कहाणी के ||
भोळा पंडित के ले ले भागोत बांच कर थाणै मे |
खोयो ऊंट घडै मे ढूंढै क़सर नहीं है स्याणै में |
जका चालता बेटा बांटै ,बै नितकी प्रसिद्ध रैया |
बिगड़ी तो बस चेली बिगड़ी संत सिद्ध का सिद्ध रैया ||
नै भी सिद्ध रैया तो कुण सो कटगो नाक ठिकाणै मे ||
खोयो ऊंट घडै मे ढूंढै क़सर नहीं है स्याणै में |
बडै चाव सूँ नाम निकाल्यो , होगो घर हाळा भागी |
लगा नाम कै बट्टो खुद कै लखणा बणरयो निर भागी |
तूं उखडन सूँ नहीं आपक्यो थकग्यो गाँव जमाणै में |
खोयो ऊंट घडै मे ढूंढै क़सर नहीं है स्याणै में |
भासा राजस्थान री, रहियां राजस्थान।
राजस्थानी रै बिना, थोथो मान 'गुमान'॥
आढो दुरसौ अखौ, ठाढ़ा कवि टणकेल।
भासा बिना न पांगरै, साहित वाळी बेल॥
पीथल बीकाणै पुर्णा, जाणै सकल जिहान।
पातल नै पत्री पठा, गहर करायौ ग्यान॥
सबद बाण पीथल लगै, मन महाराणा मोद।
अकबर दल आयो अड़ण, हलदी घाट सीसोद॥
धर बांकी बांका अनड़, वांका नर अर नार।
इण धरती रा ऊपना, प्रिथमी रा सिंणगार॥
धन धरती धन ध्रंगड़ो, धन धन धणी धिणाप।
धन मारु धर धींगड़ा, जपै जगत ज्यां जाप॥
रचदे मेहंदी राचणी, नायण रण मुख नाह।
जीतां जंग बधावस्यां, ढहियां तन संग दाह॥
नरपुर लग निभवै नहीं, आज काल री प्रीत।
सुरपुर तक पाळी सखी, प्रेम तणी प्रतीत॥
मायड़ भासा मान सूं, प्रांत तणी पहिचांण।
भासा में ईज मिलैह, आण काण ऒळखांण॥
मायड़ भासा जाण बिण, गूंगो ग्यान 'गुमान'।
तीजा गवरा होळीका, हुवै प्रांत पहिचांन॥
भाइ बीज राखी बंधण, गीत भात अर बान।
बनौ विन्याक कामण्या, विण भासा न बखान॥
अ-अः
अकल बिना ऊंट उभाणा फिरैं ।
अक्खा रोहण बायरी, राखी सरबन न होय । पो ही मूल न होय तो, म्ही दूलन्ती जोय ।।
अगम् बुद्धी बाणियो पिच्छम् बुद्धी जाट । तुर्त बुद्धी तुरकड़ो, बामण सपनपाट ।।
अग्रे अग्रे ब्राह्मणा, नदी नाला बरजन्ते ।
अगस्त ऊगा, मेह पूगा ।
अटक्यो बोरो उधार दे ।
अठे किसा काचर खाय है
अदपढ़ी विद्या धुवै चिन्त्या धुवे सरीर
अनहोणी होणी नहीं, होणी होय सो होय
अभागियो टाबर त्युंहार नै रूसै ।
अम्बर कै थेगळी कोनी लागै ।
अम्मर को तारो हाथ सै कोनी टूटै ।
अम्मर पीळो में सीळो ।
अमरो तो मैं मरतो देख्यो, भाजत देख्यो सूरो । चोधर तो मैं खुसती देखी, लाछ बुहारी कूडो ।। आगै हूँ पाछो भलो, नांव भलो लैटूरो ।।। (देखें - नाम में क्या रखा है)
अय्याँ ही रांडा रोळा करसी अर अय्याँ ही पावणा जिमबो करसी ।
अरड़ावतां ऊँट लदै ।
अरजन जसा ही फरजन ।
अल्ला अल्ला खैर सल्ला ।
असलेखा बूठां, बैदां घरे बधावणा । अर्थ - असलेखा नक्षत्र में वर्षा हो तो बैद-हकीमों के घर बधाई बँटे, मतलब रोग बढ़ते हैं ।
असवार तो को थी ना पण ठाडां करदी - किस्सा यों है कि एक औरत को एक डाकू जबरदस्ती उठा कर ले जा रहा था. ऊँट तेजी से दोड़ रहा था. रास्ते में उस औरत का एक परिचित मिल गया. उसने पूछा, 'आरी तू ऐसी सवार कब से हो गयी जो ऊँट को इतने जोरों से भगा रही है ?' तब उसने उत्तर में ऊपर की कहावत कही जिसका अर्थ है कि मैं सवार तो नही थी, जबर्दस्तों ने मुझे सवार बना दिया ।
असाई म्हे असाई म्हारा सगा, बां कै टोपी न म्हारे झगा ।
असी रातां का अस्सा ही तड़का ।
असो भगवान्यू भोळो कोनी जको भूखो भैसां में जाय ।
अस्सी बरस पूरा हुया तो भी मन फेरां में रह्या ।
आंध्यां की माखी राम उडावै ।
आलकसण ने रोट्याँ रो साग ।
आठ फिरंगी नो गोरा लड़ें जाट के दो छोरा ।
आसोजां का पड्या तावडा जोगी बणग्या जाट ।
उधार दियोड़ो आवै घर लेखै, नींतर हर लेखै ।
ऊन'रै को जायेड़ो बिल ही खोदै ।
अछूकाळ कादा में पीवै ।
आदर खादर बाजे बाव , झूंपङ पङिया झोला खाय ।
आँख कान को च्यार आंगळ को फरक है ।
आंख गयी संसार गयो, कान गया हँकार गयो ।
आँख फड़कै दहणी, लात घमूका सहणी ।
आँख फड़कै बांई, के बीर मिलै के सांई ।
आँख फुड़ाई मूंड मुन्डायो, घर को फेरयो द्वार । दोन्यू बोई रै बूबना, आदेश न जुहार ।।
आँख मीच्यां अंधेरो होय ।
आंख्याँ देखी परसराम, कदे न झूठी होय ।
आंख्याँ में गीड पड़ै, नांव मिरगानैणी ।
आंख्याँ सै आन्धो, नांव नैनसुख ।
आंगल्याँ सूं नूं परै कोनी हुवे ।
आंधा की गफ्फी, बहरा को बटको । राम छुटावै तो छूटै नहीं सिर ही पटको ।।
आंधा सुसरा सैं क्यांकी लाज ।
आंधी आई ही कोनी, सूंसाट पैली ही माचगो ।
आंधी भैंस बरू में चरै ।
आई ही छाय ने, घर की धिराणी बन बैठी ।
आक को कीड़ो आक में, ढाक को कीड़ो ढाक में ।
उठो राणी, काढो बुहारी, आंगण आया, किरसन मुरारी।
उत्तम धरती मध्यम काया, उठो देव, जंगळ कूं आया।
उन्नाळै खाटु भळी सियाळे अजमेर। नागाणौ नितको भळो सावणं बिकानेर॥
ऊंट मिठाई इस्तरी, सोनो गहणो शाह। पांच चीज पिरथी सिरै, वाह बीकाणा वाह । अर्थ - काव्य पंक्तियां मरुधरा की ऐसी पांच विशिष्टताओं को उल्लेखित करती है जिनकी सराहना समूची दुनिया में हो रही है।
क-घ
क ख ग घ ड़, काको खोटा क्यों घडै ।
कपूत हूँ नपूत भलो ।
कमाऊड़ै नै घी, खाऊड़ै नै दुर छी! अर्थात - कमाने वाले का सर्वत्र सम्मान होता है और उड़ाने वाले को सभी अवज्ञा की नजर से देखते हैं।
कर रै बेटा फाटको, खड्यो पी दूध को बाटको ।
करम लिखा कंकर तो के करै शिव शंकर ।
करमहीण किसनियो, जान कठै सूं जाय । करमां लिखी खीचड़ी, घी कठै सूं खाय ।।
करमहीण खेती करे, के हळ भागे के बळद मरे ।
काणी के ब्याह में सौ टेड ।
काणी भाभी पाणी प्याई, कै लक्खण तो दूधआळा है।
काम का ना काज का ... ढाई मण अनाज का ।
काळी बहू अर जल्योड़ो दूध पीढ्याँ ताईं लजावै ।
काळी हांडी रै कनै बैठयाँ काळस न सरी काट तो लाग्यां सरै ।
काळो कै काळो न जलमे तो किल्ड काबरो जरुर जलमै ।
कौड़ी बिन कीमत नहीं सगा नॅ राखै साथ, हुवै जे नामों (रूपया) हाथ मैं बैरी बूझै बात।
खरी कमाई घणी कमाई ।
खाणै में दळिया, मिनखां में थळिया।
खेती करै नॅ बिणजी जाय, विद्या कै बल बैठ्यो खाय ।
खोखा म्हांने चोखा लागै, खेजड़लो ज्यूं खजूर। निंबोळी-अंबोळी सिरखी, रस देवै भरपूर’ अर्थ - इसमें खेजड़ी को खजूर से बेहतर और निंबोळी को आम से मीठी व रसीली मानने का लेख है.
खोखा व्है तो खावां, गीत व्है तो गावां। अर्थात जैसी परिस्थिति हो उसी के अनुसार चलना चाहिए।
खुपरी जाण खोपरा, बीज जाण हीरा, बीकाणो भंडार रा मीठा हुवै मतीरा । अर्थ - बीकानेरी मरुधरा की वनस्पतियों के राजा मतीरे की तुलना हीरे-जवाहरातों से की गई हैं।
गंगा रो गटोळियो, लोटो पाणी ढोळियो, धोया कान अर होया सिनान।
गंडक की पूंछ तो बांकी ही रहसी ।
गरज दीवानी गूजरी नूंत जिमावै खीर, गरज मिटी गूजरी नटी, छाछ नही रे बीर ।
गरजवान री अकल जाय, दरदवान री शक्कल जाय ।
गरज सरी अर वैद बैरी ।
गरीब री हाय, जड़ामूल सूं जाय ।
गादड़ै की मोत आवै जणा गांव कानी भागै।
गाँवहाला कूटै तो माईतां कनै जावै, माईत कूटै तो कठै जावै ।
गोदी मैं छोरो गळी मैं हेरै ।
घणी सुधी छिपकली चुग चुग जिनावर खाय ।
घणूं खाय ज्यों घणों मरै ।
घणों सयाणों कागलो दे गोबर में चांच ।
घर का टाबर काणा भी सोवणा ।
घर की खांड किरकिरी लागै, गुड चोरी को मीठो ।
घर की डाकन घर का नै ही खाय ।
घर को जोगी जोगणूं आन गाँव को सिद्ध ।
घर नै खोवाई साळो ।
घर बळतो कोनी दीखै, डूंगर बळतो दीखै
घायल गत घूमैह, रै भूमी मारवाड़ री। राळो रुं रुं मेह, साहित इमरत सूरमों॥
घी सुधारै खीचड़ी, और बड्डी बहू का नाम ।
घैरगडी सासू छोटी भू बडी ।
च-झ
च्यार चोर चौरासी बाणिया, बाणिया बापड़ा के करँ ।
च्यार पाव चून चौबारे रसोई
चढ्योड़ो जाट तूम्बो ई चबा जावै ।
चोरी जैड़ो रुजगार नीं, जे पड़ती व्है मार नीं ।
छड़ी पड़ै छमाछम, विद्या आवै धमाधम।
ज्यादा स्याणु कागलो गू मैं चांच दे ।
जाओ लाख रैवो साख, गई साख तो बची राख ।
जांन में कुण-कुण आया? कै बीन अर बीन रो भाई, खोड़ियो ऊंट अर कांणियो नाई।
जंगल जाट न छोड़िये,हाटां बीच किराड़। रांगड़ कदे न छोड़िये,ये हरदम करे बिगाड़।।
जमीन ऍर जोरु जोर की नहीं तो कोई और की।
जळ ऊँड़ा थळ उजळा नारि नवळे वेश। पुरुष पट्टाधर निपजे आई मरुधर देश॥ अर्थ - गहरे पानी और गहरी सोच वाले यहां के पटादर पुरुष सिर्फ इंसानों से ही नहीं मरुभूमि की उपज से भी प्यार करते हैँ.
जाट ओर जाट भाई॥
जांटी चढे जको सीरणी बाँट - अर्थ: जो समी के पेड़ पर चढ़ता है, वही खतरे के निवारण हेतू देवता का प्रसाद बोलता है ।
जाट करै ना दोस्ती, जाट करै ना प्यार जो साचा इंसान हो, वो-ए इसका यार । चुगलखोर और दुतेड़े दुश्मन इनके खास चाहे पायां पड़े रहो, कोन्यां आवैं रास
जाट पहाडा: एक जाट-जाट, दो जाट-मौज, तीन जाट-कंपनी, चार जाट-फौज
जाट की बेटी और काकोजी की सूं - अर्थ: छोटा भी जब ज्यादा नजाकत दिखाने लगता है तब प्रयोग किया जाता है ।
जाट जंवाई भाणजो, रेवारी सुनार । ऐता नहीं है आपणा, कर देखो उपकार ।।
जाट जंवाई भाणजा, रैबारी सुनार । कदे न होसी आपणा, कर देखो व्योहार ।।
जाट जठे ठाठ ।
जाट जडूलै मारिये, कागलिये ने आळै । मोठ बगर में पाडि़ये, चोदू हो सो बाळै - अर्थ:जाट जब तक वयस्क नहीं हो जाता, कौवा जब तक उड़ना नहीं सीख लेता तब तक ही ये वश में आते हैं । मोठों पर जब तक बगर आया रहता है तब तक ही उपाड़ना ठीक है ।
जाट कहे सुण जाटणी, इसी ना कदे होय । चाकी पीसे ठाकरां, भांडा मांजै जोय ।।
जाट कहे सुण जाटणी, इणी गाँव में रणों, ऊंट बिलाई लेगई हांजी हांजी कहणों ।
जाट की छोरी र' फलकै बिना दोरी ।
जाट को के जजमान, राबडी को के पकवान ।
जाट गंगाजी नहा आयो के ? कह, खुदाई कुण है ।
जाट जाट तेरो पेट बांको, कह, मैं ई मैं दो रोटी अलजा ल्यूंगो ।
जाट न जायो गुण करै, चणैं न मानी बाह, चन्नण बिड़ो कटायकी, अब क्यों रोव बराह ।
जाट बलवान जय भगवान ।
जाट डूबै धोळी धार, बानियों डूबै काळी धार ।
जाट मरा जब जानिये जब चालिसा होय ।
जाट रे जाट ! तेरे सिर पर खाट, कह, मियाँ रे मियाँ ! तेरे सिर पर कोल्हू, कह, तुक तो मिली ना, कह, बोझ्याँ तो मरैगा ।
जीभड़ल्यां इमरत बसै, जीभड़ल्यां विष होय। बोलण सूं ई ठा पड़ै, कागा-कोयल दोय।।
जीम्या जिनै जीमांणा ई पडे ।
जीमण अर झगड़ौ, पराये घरां आछो लागै ।
जीमाणों सोरो जीमाणो दोरौ ।
जीम्यां छोडै पांवणौ, मरयाँ छोडै ब्याज ।
जैं करी सरम, बैंका फूट्या करम ।
जो गुड़ सैं मरै बी'नै जहर की के जरुरत।
जाट और घोयरा तावडॆ मॆ ही निकला करे।
ट-ढ
टका दाई ले गी अर कून्डो फोड़गी ।
टकै की हांडी फूटी, गंडक की जात पिछाणी ।
टपकन लागी टापरी, भीजण लागी खाट ।
टको टूंसी एक न यार, तोरण मारण होग्यो त्यार ।
ठाकर री गोळी, गांवरी सिरमोळी ।
ठाकरण भागो किसाक ? कह, गैल की मार जाणिये ।
ठाडै को डोको डांग नै फाड़ै ।
ठाडो मारै अर रोवण भी कोन्या दे ।
ठाली ठुकराणी को पेई में हाथ जाय ।
ठाली बैठी डोकरी, घर में घाल्यो घोड़ो ।
ठालै बैठ्याँ सूँ बेगार भली ।
ठिकाणे ठाकुर पूजीजै ।
ठिकाणै सैं ई ठाकर बाजै ।
ठोकर खार हुन्स्यार होय ।
डाकण बेटा ले क दे ।
डाकणां के ब्यावां में नूतारां का गटका ।
डाकणां सै गाँव का नळा के छाना है ।
दिग्मरां के गाँव में धोबी को के काम ।
डूंगर चढ़तो पांगळो, सीस अणीतो भार ।
डूंगर बळती दिखै, पगां बळती कोनी दिखै ।
डूबतो सिंवाळां न हाथ घालै ।
डेड घड़ो'र डीडवाणू पाऊँ ।
ढक्योड़ो मत उघाड़ और भू घर तेरो ई है ।
ढबां खेती,ढबां न्याव ।
ढल्यो घोटी, हुयो माटी ।
ढेढ़ को मन ल्याह्वड़ै में ही ।
ढेढ़ नै सुरग में भी बेगार ।
ढेढ़ रे साथे धाप'र जीमो भांवै आंगळी भर कर चाखो ।
ढेढ़ रो पल्लो लगावो, भांवै बाथे पड़ो ।
ढेढ़ां की दुर्सीस सूं दाव थोड़ा ई मरै ।
ढेढणी और रावळै जा आई ।
ढोली गावतो अर टाबर रोवतो चोखो लागै ।
त-न
तंगी में कुण संगी ?
तरवार को घाव भरज्या बात को कोनी भरै ।
तवै की काची नै, सासरै की भाजी नै कठैई ठोड़ कोनी ।
तवै चढ़ै नै धाड़ खाय ।
ताता पाणी सैं कसी बाड़ बळै ।
तातो खावै छायाँ सोवै, बैंको बैद पिछोकड़ रोवै ।
ताळी लाग्यां ताळो खुलै ।
तावळो सो बावळो ।
तिरिया चरित न जाणे कोय, खसम मार के सत्ती होय ।
तीज त्युंहारां बावड़ी, ले डूबी गणगौर ।
तीजां पाछै तीजड़ी, होळी पाछै ढूंढ, फेरां पाछै चुनड़ी, मार खसम कै मूंड ।
तीतर कै मूंडै कुसळ है ।
तीतर पंखी बादळी, विधवा काजळ रेख । बा बरसे बा घर करै, ई में मीन न मेख ।।
तीन तेरा घर बिखरै ।
तीन बुलाया तेरा आया, भई राम की बाणी । राघो चेतन यूँ कहै, द्यो दाळ में पाणी ।।
तीन सुहाळी, तेरा थाळी । बांटण वाळी सतर जणी ।।
तीसरे सूखो आठवैं अकाळ - राजस्थान के लिए प्रयोग किया गया है ।
तुरकणी कै रान्ध्योड़ा में के कसर ।
तुरकणी रे कात्योडे में ही फिदकड़ो ।
तूं है देसी रूंखड़ो, परदेसी लोग, म्हांने अकबर तेड़िया तूं किम आयो फोग। अर्थ - दूर देस में अपनी भूमि के पौधे फोग को देखकर अपनापन जताना महज देस से दूरी का वियोग नहीं है अपितु अपनी हर उपज का सम्मान यहां के लोग बड़े सलीके से करते हैं।
दियो लियो आडो आवै ।
दूध पीती बिलाई गंडका कै मायं पड़गी ।
दूसरे की थाळी मँ घी ज्यादा दीखॅ।
दूसरे की थाळी में सदा हि ज्यादा लाडू दीखैं ।
धणी बिना गीत सूना तो सिरदार बिना फौज निकांमी।
धणी रो धन नीं देखणों, धणी रो मन देखणों ।
धरती करिया बिछावणा, अम्बर करिया गलेफ। पोढो राजा भरतरी, चोकी देवै अलेख।
धरती माता थूं बड़ी, थां सूं बड़ो न कोय। उठ संवारै पग धरां, बाळ न बांका होय।।
धन्ना जाट का हरिसों हेत, बिना बीज के निपजँ खेत।
नट विद्या आ जावै, जट विद्या कोनी आवै।
नानी फंड करै, दोहितो दंड भरै ।
नेपॅ की रुख खेड़ा'ई बतादें ।
प-म
पावणां सूं पीढ़ी कोनी चालै, जवायाँ सूं खेती कोनी चालै ।
पेड़ की जड धरती और लूगाई की जड़ रसोई ।
पूत का पग पालणें में ही दीख जा हीं ।
पत्थर का बाट - जत्ता भी तोलो, घाट-ही-घाट ।
पीसो हाथ को, भाई साथ को ही काम आवै ।
फूटेड़ो ढोल अर कूटेड़ो ढोली चीं नीं करै ।
फूहड़ रो मैल फागण में उतरै।
फोग आलो ई बळै, सासू सूदी ई लड़ै।
फोगलो फूट्यो, मिणमिणी ब्याई। भैंस री धिरियाणी, छाछ नै आई।
फोगलै रो रायतो, काचरी रो साग। बाजरी री रोटड़ी, जाग्या म्हारा भाग
बड़ सींचूं बड़ोली सींचूं, सींचूं बड़ की डाळी, राम झरोखै बैठ कर सींचै सींचण वाळी
बड़ी रातां का बड़ा ही तड़का ।
बहुआं हाथ चोर मरावै, चोर बहू का भाई ।
बाड़ में मूत्यां कसौ बैर नीकळै ।
बाड़ में हाथ घालण सैं तो काँटा ही लाग ।
बातां रीझै बाणियूं, गीतां सै रजपूत । बामण रीझै लाडुवां, बाकळ रीझै भूत ।।
बात में हुंकारो, फौज में नंगारो ।
बाप ना मारी मांखी, बेटो तीरंदाज ।
बाबो सगळां'नॅ लड़ॅ, बाबॅ'न कुण लड़ॅ ।
बामण नै दियां पीछै गाय पराई हो जावै, परबारे हाथां में गयां पीछै रकम पराई हो जावै, पर्णीज्यां पीछै बेटी पराई हो जावै ।
बायेड़ो उगै अर लिखेड़ो चूगै ।
बावाड़ेड़ो पाहुणों भूत बिरौबर ।
बिना बुलाया पावणा, घी घालूं कॅ तेल ।
बिना रोऍ तो मा'ई बोबो कोनी दे ।
बीन कॅ'ई लाळ पड़ँ जणा बराती के करँ ।
बींद मरौ बींदणी मरौ, बांमण रै टक्कौ त्यार। ठाकर ग्या ठग रिया, रिया मुळक रा चोर॥
बूढळी रै कह्यां खीर कुण रांधै?
बैठणो छाया मैं हुओ भलां कैर ही, रहणो भायां मैं हुओ भलां बैर ही ।
भोजन में लाडू अर सगाँ में साडू ।
भौंकँ जका काटँ कोनी ।
मन का लाडु खाटा क्यों ।
मन सूं रान्धेड़ो खाटो ई खीर लागै ।
म्हानैं घडगी अ'र बेमाता बाड़ मैं बड़गी ।
मँगो रोवे ऐक बार, सस्तो रोवे सो बार ।
मन मीठो तो सै मीठा, मन खाटो तो सै खाटा ।
मरद की कूब्बत राड़ में, लुगाई की कूब्बत रान्धणें में |
मरु रो पत माळवो नाळी बिकानेर। कवियाँ ने काठी भळा आँधा ने अजमेर॥
मानो तो देव नहीं तो भींत को लेव।
मां, घोड़ा री पूंछ पकड़ूं, कांईं दे'सी कै घोड़ो मतै ई दे दे'सी। अर्थात - गलत काम का अंजाम हमेशा बुरा होता है।
मां कैवतां मूंडो भरीजै।मां, मायड़भोम अर मायड़भासा रौ दरजौ सुरग सूं ईं उचौ हुवै.
मां री गाळियां, घी री नाळियां। अर्थ - मां की गालियां, घी की नालियां। मां ललकारती-फटकारती है तो संतान के भले की खातिर। उसके मन में दूर-दूर तक कोई दुर्भावना नहीं रहती। मां की गालियां ममता का ही दूसरा रूप है।
मिनख कमावै च्यार पहर, ब्याज कमावै आठ पहर ।
मिनख बाण रो गोलौ ।
मेवा तो बरसँता भला, होणी होवॅ सो होय ।
मेह की रुख तो भदवड़ा'ई बता दें ।
मुंडै सूं नीसरी बात, कमाण सूं नीसरयो तीर, अर परमात्मा री पोळ गयोड़ा पराण पाछा नीं बावडै ।
मुंह करे है छाछ सो
मोटो ब्याज मूल नै खावै ।
मोर जंगल में नाच्योहो पण कुण देख्यो
य-व
रजपूत की जात जमी ।
राजपूती धोरां में रळगी, ऊपर चढ़ गई रेत ।
राजा री आस करणी, पण आसंगो नीं कारणों ।
रांड आग गाळ कोनी ।
रांड कै मारयोड़ै की अर गाँव में फिरयोड़ै की दाद-फिराद कोनी ।
राई का भाव रात ही गया ।
राई बिना किसो रायतो ।
राजा करै सो न्याव, पासो पड़ै सो डाव ।
राजा जोगी अगन जळ, इण की उलटी रीत । डरता रहियो परसराम, ये थोडी पाळै प्रीत ।।
राड़ को घर हांसी, रोग को घर खांसी ।
राड़ सैं बड़ भली ।
रात आगै उँवार कोनी ।
रात च्यानणी, बात आंख्या देखी मानणी ।
राबड़ी को नांव गुलसफ्फा ।
राबड़ी बी कहै मन दांतां सै खावो ।
राबड़ी में गुण होता तो ब्या में नां रान्धता ।
राबड़ी में राख रांधै, चून पाटै पीसती । देखो रै या फ़ूड रांड, चालै पल्ला घींसती ।।
रिण अर बैर कदैई जूनां नीं व्है ।
रांड स्याणी हुवै पण कसम मरयां फेर ।
रूप की रोवै करम की खावै ।
रूपयो होवै रोकड़ी सोरो, आवै सांस, संपत होय तो घर भलो, नहीं भलो परदेस।
रोता जां बै मरेडां की खबर ल्यावैं ।
रोती रांड सासरे में क्ये न्याहल करेगी ।
लालबही छप्पन रो पानो, बोहरो रोवै छानो-छानो ।
श-ह
संपत हुवै तो घर, नींतर भलो परदेस।
सरलायो छूंदरो, बद्दां बंध्यो जाट । मदमाती गूजरी, तीनों वारां बाट ।।
साबत रैसी सर तो घणाई बससीं घर।
सात घर तो डाकण भी छोड दिया करै है।
सावण भलो सूर'यो भादुड़ो पिरवाय, आसोजां मैं पछवा चाली गाडा भर भर ल्याव ।
सासरौ सुख आसरौ, जे ढबै दिन चार । जे बसै दिन दस बीस, हाथ में खुरपी माथै भार ।।
सासरौ सुख बासरौ, चार दिनां को आसरौ, जै रवे मास दो मास, देस्याँ खुरपी खुदास्याँ घास ।
सूखै घसीजै हळबांणी, आलै घसीजै चवू। सांवण घसीजै डीकरी, काती घसीजै बहू।।
हाँसी-हाँसी में हो-ज्यासी खाँसी ।
हिल्योडो चोर गुलगुला खाय ।
समर चढै़ काठां चढै़, रहै पीव रै साथ।
एक गुणा नर सूरमा, तिगुण गुणा तमय जात॥
चन्द ऊजाळै एक पक, बीजै पख अंधिकार।
बळ दुंहु पाख उजाळिया, चन्द्रमुखी बळिहार॥
खाटी कुळ रो खोयणां, नेपै घर घर नींद।
रसा कंवारी रावतां, वीर तिको ही वींद॥
ऊंघ न आवै त्रण जणां, कामण कहीं किणांह।
उकडू थटां बहुरिणां, बैर खटक्के ज्यांह॥
एक्कर वन वसंतड़ा, एकर अंतर काय।
सिंघ कवड्डी ना लहै, गँवर लक्ख विकाय॥
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Ratan Singh Shekhawat,
मानसून पूर्व की वर्षा की बोछारें जगह-जगह शुरू हो चुकी है | किसान मानसून का बेसब्री से इंतजार करने में लगे है | और अपने खेतो में फसल बोने के लिए घास,झाडियाँ व अन्य खरपतवार काट कर (जिसे राजस्थान में सूड़ काटना कहते है ) तैयार कर वर्षा के स्वागत में लगे है | बचपन में सूड़ काटते किसानो के गीत सुनकर बहुत आनंद आता था लेकिन आजकल के किसान इस तरह के लोक गीत भूल चुके है |
जटक जांट क बटक बांट क लागन दे हब्बिडो रै,
बेरी धीडो रै , हब्बिडो |
इस गीत की मुझे भी बस यही एक लाइन याद रही है | जिन गांवों के निवासी पेयजल के लिए तालाबों,पोखरों व कुंडों पर निर्भर है वहां सार्वजानिक श्रमदान के जरिए ग्रामीण गांव के तालाब व पोखर आदि के जल संग्रहण क्षेत्र (केचमेंट एरिया ) की वर्षा पूर्व सफाई करने में जुट जाते है व जिन लोगों ने अपने घरों व खेतो में व्यक्तिगत पक्के कुण्ड बना रखे है वे भी वर्षा पूर्व साफ कर दिए जाते है ताकि संग्रहित वर्षा जल का पेयजल के रूप में साल भर इस्तेमाल किया जा सके |
शहरों में भी नगर निगमे मानसून पूर्व वर्षा जल की समुचित निकासी की व्यवस्था के लिए जुट जाने की घोषणाए व दावे करती है | ताकि शहर में वर्षा जल सडको पर इक्कठा होकर लोगों की समस्या ना बने हालाँकि इनके दावों की पहली वर्षा ही धो कर पोल खोल देती है |
कुल मिलाकर चाहे किसान हो या पेयजल के लिए वर्षा जल पर निर्भर ग्रामीण या शहरों की नगर पलिकाए या गर्मी से तड़पते लोग जो राहत पाने के लिए वर्षा के इंतजार में होते है , सभी वर्षा ऋतु के शुरू होने से पहले ठीक उसी तरह वर्षा के स्वागत की तैयारी में जुट जाते है जैसे किसी घर में नई नवेली दुल्हन के स्वागत में जुटे हो | शायद इसीलिए राजस्थान के एक विद्वान कवि रेवतदान ने वर्षा की तुलना एक नई नवेली दुल्हन से करते हुए वर्षा को बरखा बिन्दणी ( वर्षा वधू ) की संज्ञा देते हुए ये शानदार कविता लिखी है :
लूम झूम मदमाती, मन बिलमाती, सौ बळ खाती ,
गीत प्रीत रा गाती, हंसती आवै बिरखा बिंनणी |
चौमासै में चंवरी चढनै, सांवण पूगी सासरै,
भरै भादवै ढळी जवांनी, आधी रैगी आसरै
मन रौ भेद लुकाती , नैणा आंसूडा ढळकाती
रिमझिम आवै बिरखा बिंनणी |
ठुमक-ठुमक पग धरती , नखरौ करती
हिवड़ौ हरती, बींद पगलिया भरती
छम-छम आवै बिरखा बिंनणी |
तीतर बरणी चूंदड़ी नै काजळिया री कोर
प्रेम डोर मे बांधती आवै रुपाळी गिणगोर
झूंटी प्रीत जताती , झीणै घूंघट में सरमाती
ठगती आवै बिरखा बिंनणी |
घिर-घिर घूमर रमती , रुकती थमती
बीज चमकती, झब-झब पळका करती
भंवती आवै बिरखा बिंनणी |
आ परदेसण पांवणी जी, पुळ देखै नीं बेळा
आलीजा रै आंगणै मे करै मनां रा मेळा
झिरमिर गीत सुणाती, भोळै मनड़ै नै भरमाती
छळती आवै बिरखा बिंनणी |
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Ratan Singh Shekhawat,
1903 मे लार्ड कर्जन द्वारा आयोजित दिल्ली दरबार मे सभी राजाओ के साथ हिन्दू कुल सूर्य मेवाड़ के महाराणा का जाना राजस्थान के जागीरदार क्रान्तिकारियो को अच्छा नही लग रहा था इसलिय उन्हे रोकने के लिये शेखावाटी के मलसीसर के ठाकुर भूर सिह ने ठाकुर करण सिह जोबनेर व राव गोपाल सिह खरवा के साथ मिल कर महाराणा फ़तह सिह को दिल्ली जाने से रोकने की जिम्मेदारी क्रांतिकारी कवि केसरी सिह बारहट को दी | केसरी सिह बारहट ने "चेतावनी रा चुंग्ट्या " नामक सौरठे रचे जिन्हे पढकर महाराणा अत्यधिक प्रभावित हुये और दिल्ली दरबार मे न जाने का निश्चय किया |और दिल्ली आने के बावजूद समारोह में शामिल नहीं हुए |
पग पग भम्या पहाड,धरा छांड राख्यो धरम |
(ईंसू) महाराणा'र मेवाङ, हिरदे बसिया हिन्द रै ||1||
भयंकर मुसीबतों में दुःख सहते हुए मेवाड़ के महाराणा नंगे पैर पहाडों में घुमे ,घास की रोटियां खाई फिर भी उन्होंने हमेशा धर्म की रक्षा की | मातृभूमि के गौरव के लिए वे कभी कितनी ही बड़ी मुसीबत से विचलित नहीं हुए उन्होंने हमेशा मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया है वे कभी किसी के आगे नहीं झुके | इसीलिए आज मेवाड़ के महाराणा हिंदुस्तान के जन जन के हृदय में बसे है |
घणा घलिया घमसांण, (तोई) राणा सदा रहिया निडर |
(अब) पेखँतां, फ़रमाण हलचल किम फ़तमल ! हुवै ||2||
अनगिनत व भीषण युद्ध लड़ने के बावजूद भी मेवाड़ के महाराणा कभी किसी युद्ध से न तो विचलित हुए और न ही कभी किसी से डरे उन्होंने हमेशा निडरता ही दिखाई | लेकिन हे महाराणा फतह सिंह आपके ऐसे शूरवीर कुल में जन्म लेने के बावजूद लार्ड कर्जन के एक छोटे से फरमान से आपके मन में किस तरह की हलचल पैदा हो गई ये समझ से परे है |
गिरद गजां घमसांणष नहचै धर माई नहीं |
(ऊ) मावै किम महाराणा, गज दोसै रा गिरद मे ||3||
मेवाड़ के महाराणाओं द्वारा लड़े गए अनगिनत घमासान युद्धों में जिनमे हजारों हाथी व असंख्य सैनिक होते थे कि उनके लिए धरती कम पड़ जाती थी आज वे महाराणा अंग्रेज सरकार द्वारा २०० गज के कक्ष में आयोजित समरोह में कैसे समा सकते है ? क्या उनके लिए यह जगह काफी है ?
ओरां ने आसान , हांका हरवळ हालणों |
(पणा) किम हालै कुल राणा, (जिण) हरवळ साहाँ हंकिया ||4||
अन्य राजा महाराजाओं के लिए तो यह बहुत आसान है कि उन्हें कोई हांक कर अग्रिम पंक्ति में बिठा दे लेकिन राणा कुल के महाराणा को वह पंक्ति कैसे शोभा देगी जिस कुल के महाराणाओं ने आज तक बादशाही फौज के अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं को युद्ध में खदेड़ कर भगाया है |
नरियंद सह नजरांण, झुक करसी सरसी जिकाँ |
(पण) पसरैलो किम पाण , पाणा छतां थारो फ़ता ! ||5||
अन्य राजा जब अंग्रेज सरकार के आगे नतमस्तक होंगे और उसे हाथ बढाकर झुक कर नजराना पेश करेंगे | उनकी तो हमेशा झुकने की आदत है वे तो हमेशा झुकते आये है लेकिन हे सिसोदिया बलशाली महाराणा उनकी तरह झुक कर अंग्रेज सरकार को नजराना पेश करने के लिए आपका हाथ कैसे बढेगा ? जो आज तक किसी के आगे नहीं बढा और न ही झुका |
सिर झुकिया सह शाह, सींहासण जिण सम्हने |
(अब) रळनो पंगत राह, फ़ाबै किम तोने फ़ता ! ||6||
हे महाराणा फतह सिंह ! जिस सिसोदिया कुल सिंहासन के आगे कई राजा,महाराजा,राव,उमराव ,बादशाह सिर झुकाते थे | लेकिन आज सिर झुके राजाओं की पंगत में शामिल होना आपको कैसे शोभा देगा ?
सकल चढावे सीस , दान धरम जिण रौ दियौ |
सो खिताब बखसीस , लेवण किम ललचावसी ||7||
जिन महाराणाओं का दिया दान,बख्शिसे व जागीरे लोग अपने माथे पर लगाकर स्वीकार करते थे | जो आजतक दूसरो को बख्शीस व दान देते आये है आज वो महाराणा खुद अंग्रेज सरकार द्वारा दिए जाने वाले स्टार ऑफ़ इंडिया नामक खिताब रूपी बख्शीस लेने के लालच में कैसे आ गए ?
देखेला हिंदवाण, निज सूरज दिस नह सूं |
पण "तारा" परमाण , निरख निसासा न्हांकसी ||8||
हे महाराणा फतह सिंह हिंदुस्तान की जनता आपको अपना हिंदुआ सूर्य समझती है जब वह आपकी तरफ यानी अपने सूर्य की और स्नेह से देखेगी तब आपके सीने पर अंग्रेज सरकार द्वारा दिया गया " तारा" (स्टार ऑफ़ इंडिया का खिताब ) देख उसकी अपने सूर्य से तुलना करेगी तो वह क्या समझेगी और मन ही मन बहुत लज्जित होगी |
देखे अंजस दीह, मुळकेलो मनही मनां |
दंभी गढ़ दिल्लीह , सीस नमंताँ सीसवद ||9||
जब दिल्ली की दम्भी अंग्रेज सरकार हिंदुआ सूर्य सिसोदिया नरेश महाराणा फतह सिंह को अपने आगे झुकता हुआ देखेगी तो तब उनका घमंडी मुखिया लार्ड कर्जन मन ही मन खुश होगा और सोचेगा कि मेवाड़ के जिन महाराणाओं ने आज तक किसी के आगे अपना शीश नहीं झुकाया वे आज मेरे आगे शीश झुका रहे है |
अंत बेर आखीह, पताल जे बाताँ पहल |
(वे) राणा सह राखीह, जिण री साखी सिर जटा ||10||
अपने जीवन के अंतिम समय में आपके कुल पुरुष महाराणा प्रताप ने जो बाते कही थी व प्रतिज्ञाएँ की थी व आने वाली पीढियों के लिए आख्यान दिए थे कि किसी के आगे नहीं झुकना ,दिल्ली को कभी कर नहीं देना , पातळ में खाना खाना , केश नहीं कटवाना जिनका पालन आज तक आप व आपके पूर्वज महाराणा करते आये है और हे महाराणा फतह सिंह इन सब बातों के साक्षी आपके सिर के ये लम्बे केश है |
"कठिण जमानो" कौल, बाँधे नर हीमत बिना |
(यो) बीराँ हंदो बोल, पातल साँगे पेखियो ||11||
हे महाराणा यह समय बहुत कठिन है इस समय प्रतिज्ञाओं और वचन का पालन करना बिना हिम्मत के संभव नहीं है अर्थात इस कठिन समय में अपने वचन का पालन सिर्फ एक वीर पुरुष ही कर सकता है | जो शूरवीर होते है उनके वचनों का ही महत्व होता है | ऐसे ही शूरवीरों में महाराणा सांगा ,कुम्भा व महाराणा प्रताप को लोगो ने परखा है |
अब लग सारां आस , राण रीत कुळ राखसी |
रहो सहाय सुखरास , एकलिंग प्रभु आप रै ||12||
हे महाराणा फतह सिंह जी पुरे भारत की जनता को आपसे ही आशा है कि आप राणा कुल की चली आ रही परम्पराओं का निरवाह करेंगे और किसी के आगे न झुकने का महाराणा प्रताप के प्रण का पालन करेंगे | प्रभु एकलिंग नाथ इस कार्य में आपके साथ होंगे व आपको सफल होने की शक्ति देंगे |
मान मोद सीसोद, राजनित बळ राखणो |
(ईं) गवरमेन्ट री गोद, फ़ळ मिठा दिठा फ़ता ||13||
हे महाराणा सिसोदिया राजनैतिक इच्छा शक्ति व बल रखना इस सरकार की गोद में बैठकर आप जिस मीठे फल की आस कर रहे है वह मीठा नहीं खट्ठा है |
इन सौरठों की सही सही व्याख्या करने की राजस्थानी भाषा के साहित्यकार आदरणीय श्री सोभाग्य सिंह जी से समझकर भरपूर कोशिश की गई फिर भी किसी बंधू को इसमें त्रुटी लगे तो सूचित करे | ठीक कर दी जायेगी |
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म्हारे आलीजा री चंग, बाजै अलगौजा रे संग,
फागण आयो रे !
रूंख-रूंख री नूंवी कूपळा, गीत मिलण रा अब गावै।
बन-बागां म काळा भंवरा, कळी-कळी ने हरसावै।
गूंझै ढोलक ताल मृदंग, बाजे आलीजा री चंग।।
फागण आयो रे !
आज बणी हर नारी राधा, नर बणिया है आज किसन।
रंग प्रीत रो एडो बिखर्यो, गली-गली है बिंदराबन।
हिवडै-हिवडै उठे तरंग, बाजे आलीजा री चंग।।
फागण आयो रे !

वारी वारी वारी वारी वारी वारी म्हारा परम गुरूजी ।
आज म्हारो जनम सफल भयो , मैं गुरुदेवजी न देख्या । टेक ।
भाग हमारा हे सखी, गुरुदेवजी पधारया ।
काम, क्रोध, मद, लोभ, ने ये, म्हारा दूर निवारया ।।1।।
सोव्हन कलश सामेलसा ये, मोतीड़ा बधास्यां ।
पग मंद पधरावस्यां ये, मिल मंगल गास्यां ।।2।।
बंदन वार घलावस्यां ये, मोत्यां चौक पुरावस्यां ।
पर दिखानां परनाम स्यूं ये, चरनां शीश निवास्यां ।।3।।
ढोल्यो रतन जड़ावरो ये, रेशम गिदरो बिछावस्यां ।
सतगुरु ऊंचा बिराजसी ये, दूधा चरण पखास्यां ।।4।।
भोजन बहुत परकार का ये, कंचन थाल परोसां ।
सतगुरु जीमे आंगणे ये, पंखा बाय ढुलास्यां ।।5।।
चरण खोल चिरणामृत ये, सतगुरुजी का लेस्यां ।
तन मन री हेली बातड़ली ये, म्हारा गुरूजी ने कह्स्यां ।।6।।
आज सुफल म्हारा नेणज ये, गुरुदेवजी ने निरखूं ।
कान सुफल सुन बेणज ये, दूरी नहीं सरकूं ।।7।।
आज म्हारे आनंद बधावणा ये, बायां मन भाया ।
'राना' रे घरां बधावणा ये, गुरु खोजीजी आया ।।8।।
रसना बाण पड़ी रटबा की ।
बिसरत नहीं घड़ी पल छिन-छिन, स्वांस स्वांस गाबा की ।।1।।
मनड़ो मरम धरम ओही जाण्यो, गुरु किरपा बल पा की ।।2।।
लख चौरासी जूण भटकती, मोह माया सूं थाकी ।।3।।
समरथ खोजी 'राना' पाया, जद यूँ काया झांकी ।।4।।
म्हारो म्हारो करतांई जावै ।
मिनख जमारो ओ हे अमोलक, कोडी मोल फिंकावै ।।1।।
गरभ वास में कौल कियो तूं, जिणनै क्यों बिसरावै ।।2।।
पालनहार, करतार,विसंभर, तिरलोकी जस छावै ।।3।।
जिणने थां छिटकाय दियो जद, कुण थांने अपनावै ।।4।।
वाल्मकि सुक व्यास पुराणां, बेद भेद समझावै ।।5।।
कैं म्हारो तू थारो करतां, मिनख जमारो गमावै ।।6।।
'राना' सतगुरु खोजी सरणै, आवागमन मिटावै ।।7।।
ऐ तो जाबाला ऐ बाई थारा, मन में निरख निरधार ।
कुण थारा साथी कुण थारा बैरी, कुण थारा गोती नाती ।।1।।
कुण थारा भाई बाप ये मायड़, किस्या जनम की जाती ।
सुरतां सूरत पिछाणी नाही, भाभी भरम में गेली ।।2।।
कुण रोवे कुण हँसे बावळी, कुण किण रो भरतार ।
गया सू आवणा का है नांही, रया सू जावाण हार ।।3।।
दस दरवाजा इण पिंजरा के, पलक पंखेरू जैले ।
चेतन नौबत बजे जठा तक, अंत पछै कुण बौलै ।।4।।
हर सूं हेत चेत मन करलै, मिनख जमारो आयो ।
गुरु खोजी 'राना' रंग रीझी, भरम भूत बिसरायो ।।5।।
करसण होरयो रे बीरा, भूल्यो जग जंजाळ ।
काया खेत में रे बीरा, पाप पुण्य री नाळ ।।टेक।।
खाद खुटे नहीं रे बीरा, बीज तणी पैछाण ।
जोड़ सागै बणी रे बीरा, हलधर जोय निनाण ।।1।।
भावणी बीजणी रे बीरा, पाणी पाल परमाण ।
रूंखड़ी रोपणी रे बीरा, धरणीधर री छांण ।।2।।
गाज गरजै घणी रे बीरा, बरसै कठेक जाय ।
साख सूखै नहीं रे बीरा, जल जमना रो पाय ।।3।।
चतुर खोजी मिल्या रे पाकी, साख सराई लोग ।
जतन 'राना' करे रे बीरा, स्याम अरोगे भोग ।।4।।
चूंदड़ मैली न होय म्हारी बाया, चूंदड़ मैली न होय ।
नौ दस मास रही आ ऊंडी, अब सिणगार करण लागी ।
चूंदड़ चिमक चतुर साजन री, निजरया में गौरी आगी ।।1।।
कर मनुहार बुलाई पिवजी, चूंदड़ घणी सराई ए ।
मन की बात करी हित चित सूं, हिवडे घणी लगाई ए ।।2।।
जुग जुग चूंदड़ करे झिलामिल, जतन रतन अनमोल ए ।
'राना' सतगुरु खोजी सरणै, निरभै निसदिन बोला ए ।।3।।
जह हरि-भक्त चरण पधरावै ।
तीरथ एक कहा कहिये, तहां भुवन चतुर्दश धावै ।।टेक।।
भृगुजी क्रोध विवश जायो तज, हरि के लात लगावै ।
प्रभु की प्रभुताई का बरणो, जाकै चरण पुजावै ।।1।।
चतरो बिप्र साथ संगत रहे, बीरा बैर करावै ।
पितृ फूल दे जबरन ताको, हर पेड़ी पठवावै ।।2।।
जहाँ तिरथन को गुरु पुष्कर, सतगुरु धून रमावै
डेरा की धणयाप करता, छत्री मद चकरावै ।।3।।
कथा कीर्तन भंग पड़ता, काम्बल आग बंधावै ।
गठड़ी बंधी देखकर जोड्या, अब तो सकलां नावै ।।4।।
भगवत भक्त निराली लीला, पार कोई न पावै
'राना' सतगुरु तीरथ खोजी, अमरापुर चली आवै ।।5।।
कोई दिन साथनियाँ संग रमती ।
रमती रमती हीजे रहती, चिरम्या ज्यूं ही गमती ।।टेक।।
म्हारो राम संदेशो भेज्यो, सतगुरु नूत बुलाया ।
हरजी सत सनेह सूं पोखी, नहीं तो काया गमती ।।1।।
मानव पास उदार में राखी, बाबल लाड लडाया ।
जनम जनम रो वर संवरियो, मिनख धार क्यों टलती ।।2।।
काची काया मन मनसौबा, रमती मोह संग माया ।
काहन कुंवर ही मोही 'राना', परम्परा सूं चलती ।।3।।

बंसीवारा आज्यो म्हारे देस। सांवरी सुरत वारी बेस।।
ॐ-ॐ कर गया जी, कर गया कौल अनेक।
गिणता-गिणता घस गई म्हारी आंगलिया री रेख।।
मैं बैरागिण आदिकी जी थांरे म्हारे कदको सनेस।
बिन पाणी बिन साबुण जी, होय गई धोय सफेद।।
जोगण होय जंगल सब हेरूं छोड़ा ना कुछ सैस।
तेरी सुरत के कारणे जी म्हे धर लिया भगवां भेस।।
मोर-मुकुट पीताम्बर सोहै घूंघरवाला केस।
मीरा के प्रभु गिरधर मिलियां दूनो बढ़ै सनेस।
म्हारां री गिरधर गोपाल
म्हारां री गिरधर गोपाल दूसरां णा कूयां।
दूसरां णां कूयां साधां सकल लोक जूयां।
भाया छांणयां, वन्धा छांड्यां सगां भूयां।
साधां ढिग बैठ बैठ, लोक लाज सूयां।
भगत देख्यां राजी ह्यां, ह्यां जगत देख्यां रूयां
दूध मथ घृत काढ लयां डार दया छूयां।
राणा विषरो प्याला भेज्यां, पीय मगण हूयां।
मीरा री लगण लग्यां होणा हो जो हूयां॥
दरद न जाण्यां कोय
हेरी म्हां दरदे दिवाणी म्हारां दरद न जाण्यां कोय।
घायल री गत घाइल जाण्यां, हिवडो अगण संजोय।
जौहर की गत जौहरी जाणै, क्या जाण्यां जिण खोय।
दरद की मार्यां दर दर डोल्यां बैद मिल्या नहिं कोय।
मीरा री प्रभु पीर मिटांगां जब बैद सांवरो होय॥
नित उठ दरसण जास्यां
माई म्हां गोविन्द, गुण गास्यां।
चरणम्रति रो नेम सकारे, नित उठ दरसण जास्यां।
हरि मन्दिर मां निरत करावां घूंघर्यां छमकास्यां।
स्याम नाम रो झांझ चलास्यां, भोसागर तर जास्यां।
यो संसार बीडरो कांटो, गेल प्रीतम अटकास्यां।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, गुन गावां सुख पास्यां॥
भजणा बिना नर फीका
आली म्हाणो लागां बृन्दावण नीकां।
घर-घर तुलती ठाकर पूजां, दरसण गोविन्द जी कां।
निरमल नीर बह्या जमणां मां, भोजण दूध दहीं कां।
रतण सिंघासण आप बिराज्यां, मुगट धर्या तुलसी कां।
कुंजन-कुंजन फिर्या सांवरा, सबद सुण्या मुरली कां।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, भजण बिना नर फीकां॥
म्हारे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥
जाके सिर मोर मुगट मेरो पति सोई।
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥
छाँडि दई कुद्दकि कानि कहा करिहै कोई॥
संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई॥
चुनरीके किये टूक ओढ लीन्हीं लोई।
मोती मूँगे उतार बनमाला पोई॥
अंसुवन ज8 सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई।
अब तो बेल फैल गई आणँद फल होई॥
भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई।
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही॥
मीराबाई के भजन संग्रह से यह पद उद्धृत है।
परसि हरि के चरण
मन रे परसि हरि के चरण।
सुभग सीतल कँवल कोमल, त्रिविध, ज्वाला हरण।
जिण चरण प्रह्लाद परसे, इंद्र पदवी धरण॥
जिण चरण ध्रुव अटल कीन्हें, राख अपनी सरण।
जिण चरण ब्रह्मांड भेटयो, नखसिखाँ सिरी धरण॥
जिण चरण प्रभु परसि लीने, तरी गोतम-घरण।
जिण चरण काद्दीनाग नाथ्यो, गोप लीला-करण॥
जिण चरण गोबरधन धारयो, गर्व मघवा हरण।
आँख्या-गीड़, उमड़ती भीड़
हवेली री पीड़
सूनी छोड़ग्या बेटी रा बाप !
बुझाग्या चुल्है रो ताप
कुण कमावै, कुण खावै
कुण चिणावै, कुण रेवै !
जंगी ढोलां पर चाल्योड़ी तराड़
बोदी भींता रा खिंडता लेवड़ा
भुजणता चितराम
चारूंमेर लाग्योड़ी लेदरी
बतावै भूत-भविस अ’र वरतमान
री कहाणी ! कीं आणी न जाणी !
आदमखोर मिनख
बैंसग्या पड्योड़ा सांसर ज्यूं
भाखर मांय टांडै
जबरी जूण’र जमारो मांडै !
काकोसा आपरै जींवतै थकां
ई भींत पर
एक कीड़ी नी चढ़णै देवतां
पण टैम रै आगै कीं रो जोर ?
काकोसा खुद कांच री फ्रेम में
ऊपर टंगग्या
पेट भराई रै जुगाड़ मैं
सगळो कडुमो छोड्यो देस
बसग्या परदेस,
ठांवा रै ताळा, पोळ्यां में बैठग्या
ठाकर रूखाळा।
टूट्योड़ी सी खाट
ठाकरां रा ठाट
बीड्यां रो बंडल, चिलम’र सिगड़ी
कुणै में उतर्योड़ो घड़ो
गण्डक अ’र ससांर घेरणै तांई
एक लाठी
अरड़ावै पांगली पीड़ स्यूं गैली
बापड़ी सूनी हवेली !-डॉ. एस.आर.टेलर
जोधपुर. प्राचीन काल से ही पाग और साफों को आन, बान और शान का प्रतीक माना जाता है। यही नहीं स्वास्थ्य के लिहाज से भी पाग की उपयोगिता साबित हो गई है। एक शोध में वैज्ञानिकों ने मारवाड़ी पाग को स्वास्थ्य के लिहाज से उपयुक्त पाया है।
उदयपुर के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सीटीएई) के वैज्ञानिक अब मारवाड़ी पाग की तर्ज पर ऐसी पगड़ी डिजाइन करने में जुटे हैं, जो तेज गर्मी में खेतों में काम कर रहे किसान और मजदूरों का बचाव करेगी। सीटीएई के वैज्ञानिकों ने इस शोध में विभिन्न क्षेत्रों की पगड़ियों और साफों के विवरण, उनकी कार्यक्षमता, पगड़ी या साफा पहनने से काम पर असर, काम के प्रकार, क्षेत्रवार तापमान आदि का भी सर्वे किया।
सीटीएई के डॉ. अशोक मेहता के नेतृत्व में शुभकरणसिंह द्वारा किए जा रहे शोध में प्रारंभिक अध्ययन के बाद पाया गया कि मारवाड़ी साफे (बंटदार गुंथे हुए) किसानों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त हैं। इनमें भी सफेद पगड़ी स्वास्थ्य की दृष्टि से सबसे बेहतर है। ये खासकर बाड़मेर, नागौर व जैसलमेर जिले के ग्रामीण इलाकों में बांधे जाते हैं।
बनाई जाएगी नई पगड़ी: डॉ. मेहता ने बताया कि फील्ड वर्क के बाद कॉलेज में मारवाड़ी पाग की तर्ज पर एक विशेष प्रकार की पगड़ी डिजाइन की जाएगी, जो किसानों की कार्य क्षमता बढ़ाएगी। साल भर में यह पगड़ी किसानों को मुहैया करा दी जाएगी।
खिड़किया पाग: जोधपुर की प्रचलित खिड़किया पाग बांधने के लिए पीतल व तांबे के तारों का एक सांचा बनाया जाता है। रुई की तहें और सिलाई के जरिये उसको आकार दिया जाता है। कपड़ा चाहे बंधेज या खीनखाब हो, उस पर लपेटने के बाद मोतियों से उसकी सजावट की जाती है। खिड़किया पाग के सामने का सिरा ऊंचा होता हैं और पीछे से नीचा।
थळी रौ अेक वासी अेकर नेड़ा रा गांव में आयौ। उठै रौ थाट देखनै वौ तौ हाक्यौ-बाक्यौं व्हैगौ। वौ अेक बेरा माथै आयौ तौ उणरी अकल ई कह्यौं को करियौं नीं। थळियौं चकन-बकन व्हियौ। वै बेरा रा सागड़ी कनै आयौ। वो सागड़ी ने इचरज सूं पूछ्यौ-आ घड़लिया रौ तौ सेड़ौ ई कोंनी। कितीक लाबीं हैं ? सागड़ी कोतकियौ हौ। थळिया री बात सुणनै वौ जोर सूं हंसियौ। कह्यौं-थनै ईती ई ठाह कोनी ? घड़लिया री आ माळ तौ सात पंयाळ उंडी हैं, पछै किकर सेड़ौ आवै। बात सुणनै थळिया रौ तौ माथै ई चकरीजगौ। बेरा माथै उणीगंाव रा च्यार पांच मिनख बैठा हा। थळियां री भौळप माथै वै ई हंसिया। फरे पूछ्यौ-पण आं घड़लिया बौल्यौ-घड़लिया भरे थारौ बाप। थारा बाप नै घड़लिया भरण सारू राख्या हूं। थळियौं कह्यौं-म्हारो बाप मांय बैठौ सीयां नी मरतौ व्हैला ? सागड़ी कह्यो-थनै बाप माथै दया आवती व्है तौ थ्हारी कांगल दे दै। थळियौं लप उतारनै सागड़ी नै आपरी कांबल झिलाय दीवी। मिनख हंसिया तौ कह्यौ-बाप सूं बती कांबल थोड़ी ई हैं। थळियौं कांबळ गमायनै राजी-खुसी व्हीर व्हैगौ। सागड़ी कह्यौ-थळिया कितरा नाढ़ व्हैं। फागण उतरतां वौ थळियौं पाछौ उण बेरा माथै आयौ। सगळा लोग बेरा माथै पूगा। थलियौं कह्यौ-म्हारा बाप घड़लिया नीं भरतौ तौ गवूं रौ अेक दांणौ ई नीं व्हैतौ। इण सारू साख री आधी पांती रौ हकदार म्हैं हूं। थळियां रीबात सुणतां पांण सागड़ी रौ मूंड़ौ थाप खायग्यौं। म्हारौ बात कित्तौ दौरौ दिनां तक घड़लिया भरी, अबै औ पांती देवतौ दौरौ क्यंू व्है ? बेरा रो धणी छान सूं काबळ लायनै थळिया रै साम्ही करतौ बौल्यौ-आ लै थारी कांबली, म्हैं तौ कोगत करी ही। थळिये कह्यौ-अबै मानूं जैड़ौ म्हैं ई कोंनी। म्हैं तौ माथौ बाढ़िया ई म्हारी पाती नी छौड़ूं। इण गांव में मिनख बसता व्हैला तौ म्हारा न्याव करैला, नीतर म्है खुद निवेड़ लेस्यू। मरणौ तेवड़नै ई अठै आयौ हूं। लोग कह्यौ-बात तौ न्याव री कैवै हैं। पैला ठागौ करियौं जकौ अबै भुगतै। तेवड़ी कांबळ लेवती वगत उणनै आ बात सोच लेवणी हीं। बस्ती रा सगळा मिनख थळिया रै विळू रहया। सागड़ी घणौ ई रौयौ-रीक्यौं के म्हारी धूड़ खांणी व्हैगी, माफी चांवू। पण थळियौं तौ अेक ई सुणी नीं। झख मारनै आपरै हाथ छुरी-छैक आधौ आध पांती करनै थळियां सूं नीठ आपरौ लारौ छुड़ायौ।
एक सेठाणी बेरा माथै पांणी सींचण गई। वा डोली उरायनै उंची खांचै तौ डोली खाली-री-खाली। डोली भरीजी कोनी। वा लुळ नै मांय झांक्यौं तौ उणनै किणी मिनख रौ झबकौ पड़ियौ। बोली-ओ मांय कुण बैठौ मायं कुण बैठौ म्हारी डोलिया खाली करे ? रसोई रौ अबैठौ व्है। वौ भूत हौ। कह्यौ, म्हैं भूत हूं। बेरा रौ भंवणिया चरराटा घणा करै। म्हनै इणरी चूं-चूं सूं नींद नीं आवै। म्है म्हारै हाथां इणनै गावा घी रौ वांगण देवूंला। थूं म्हनैं अेक कटोरौ भरने घी लायदै। सेठाणी कह्यौ - घी तो तौ कटौरौ भरनै घी लायदै। सेठाणी कह्यौ-घी तो कटौरा री ठौड़ कूड़ियौं भरने लाय दूं। पण पछै ई थूं डोलियां खाली करे तौ। म्हनै बचन दे, के आज पछै म्हारी डोलियां खाली नीं करैला, अर म्हारौं कीं बिगाड़ नीं करैला। भूत कह्यौ - थूं म्हनै कचोळा री ठौड़ कूड़ियौं धांमियौं, इण सूं म्हैं राजी हूं। थूं घी नीं लावै तौ ई थारज्ञै कीं बिगाड़ नीं करूलां। पक्कों बचन दूं हूं। थूं म्हनै चैथै-पांचवै वांगण सारू गावा घी रौ कटौरौ डोली रै मांय धरनै पुगाय दिया कर। सेठाणी जांणियौं के अबै तौ औ वाचा में बंधग्यौं। घी नीं लावूं तौ ई म्हारी बिगाड़ नीं करै। पछै फालतू आ वांगण री लाग क्यूं भरू। वां कह्यौ, घी तौ म्हारै घणौं ई है। पण लावण सारू म्हारै कनै बासण कोंनी। थूं म्हनैं हीरा मौत्या रौ अेक कचोळौ लाय दै तौ म्हंै रोजीना थारै वांगण पुगावती रैवूंला। भूत उणरै हीरा मौत्या रौ अेक अमोलक कचोलौं सूंच दियौ। सेठाणी कचोळौ घरे लायनै जाब्ता सूं धर दियौ। पण घी लावणौं तो अगळौं वा तौ पाछी उणरी बातई नीं करी। भूत रोज वांगण सारूघी मांगतौ पण सेठांणी पिछतावौं करनै कैवती-पांतर गी। घी-घी घोखूं तौ ई मौका भूल जावूं। कालै जरूर लावूंला। भूत नै गावा घी री भावड ़अणहूंती ही। वौ राजीना सेठाणी नै पूरी-पूरी भुळावण दैवतौ। पण सैठाणी तौ टाळमटोळ करती रेई। सेवट अेक दिन वो काठौ आंती आयनै बौल्यौ-सेठाणी, धायौ थारा वांगण सूं, म्हनैं म्हारौ कचैळी तौ पाछौ दे। सेठाणी हसती थकी जबाब दियौ - आज नीं कालै जरूर लावूंला। भूत कह्यौ - थारै इण कालै रौ तौ अंत ई कोनीं। सेठांणी बोली था में अेड़ी करामंत व्है तौ थूं काळै पछै इण आज नै पाछौ मत आवण दै। जिण दिन थूं औ कांम कर दियौ तौ म्हैं उणी दिन थनै ढुळढुळतौं कचैळौं गावा घी सू भरनै लाय देवूंला। भूत कह्यौ, आ तौ म्हारा बस री कोंनीं। सेठाणी कह्यौ-जद थारै बस री बाता कोनीं तौ पछै जावणौ म्हारै बस री ई बात कोनीं।
एक नटणी आपरै झीणा करतबां सू सगळा मुलक में चावीही। एकर उदैपुर में उण री रांमत मंडी। राणौजी नटणी ने कह्यौं-एड़ी रांमत बता जिकी ली कोंई नीं देखी व्हैं। नटणी कह्यौं-बड़ौं काम, म्हैं तौ करतब जाणूं, पण देखण वाळा री ई सरधा चाहीजे। आप देखी चावौं तौ म्हैं भरत माथै पीछोला पार कर जावूं। रांणौजी नै विसवार नीं व्हियौ। अंचभा सूं पाछै खरायौ, कंाई पीछोला ? नटणी कह्यो-हां, पीछौला। आपनै दीखै आ पीछौला।अेकर छोड, भरत माथै चार वळा फिर जावूं। रांणौजी जांणियौ के आ बात ई कोई व्हैणी हैं ! वै कह्यौं - थे, थूं पीछौला भरत माथै अेक वळा ई पार कर जावै तौ मैवाड़ रौ आधौ राज थारै नांव कर दूं। जे पार नीं व्हीं तौ म्हारौ राज छौड़नै किणी दूजा रजवाड़ा में थू रांमत नीं मांड़ सकेला। पीछोला री इण तीर सू उण तीर भरत बांधीजी। नटणी रांतम करण सारू भरत माथै चढी। अलेखूं निजरां नटणी रै पगां साम्हीं पड़ी। ओ कंाई! व तौ जमीं माथै चालै ज्यूं भरत माथै चालण ढूकी।देखण वाळां रा सांस ऊंचा चढग्या। रांणौजी रौ काळजौ उंचै चढग्यौं। ठाकर ठेठर कह्यो-हजारूं माथा दियां जकां नै ई मेवाड़ री पांती नीं मिळी अर आप इण नटणी री रांमत माथै आधौ राज देवणौ कबूल कर लियौ, अंदाता जुलम हैं। रांणौजी देखियौ के नटणी तो आधेटै पूगण वाळी हैं। नटणी तौ पीछोला पार जावैला। पार करियां आधौ राज देवणौ पड़ैला। नटे ई कीकर! मेवाड़ री आंन माथै पांणी फिर जावैला। जबांन में बंधग्यौ। पाखती ई अेक जाट उभौ हौ। कह्यौं-अनदांता कोप नीं करै तौ म्है उपाव कर दूं। जाट कह्यौ-जे इण सूं बांजी अर आंन रैवती व्हैला तौ म्है राख देवूंला। वौ तीर रै पाखती ई नटिया रै डैरै पूंगौ। नटणी आधेटा सूं सली पार व्हेगी। उणरै हांचळा में फेर पांनौ आवण ढूकौ हौ। वा आपरा बेटा रौ ध्यांन करियौ। वा फेर खाथी सिरकण ढूकी। पांणी रै हिबोळां रै टाळ कोई आवाज नीं ही। जांणै आवाज खुद सूं चिराळी सुणीजी। चिराळी नटणी रै कानां पूगी। वा तुरंत आपरै बैटठा री चिराळी ओळख लीवी। रांमत करती मां रौ ध्यान चूकौ। नटणी तौ भरत माथा सूं पीछौला री लैरां मंे पडग्यी। चैधरी रै पाखती आतां ई ठाकर ठेठर कह्यौ-तरवारां सूं राज नीं बचै जकौ औ जाट बाळक रै चूंटिया भरनै बचाय लिया।
बात घणी पुराणी है। उण समै दवाखाना नीं खुलिया हा। लोग इलाज करण सारू हकीमा अर झाड़-फंूक करण वाळा रै अटै ही जावता हा। अेकर अेक मिनख नै कांळिंदर सरप डसग्यौ। झाड़ौ दिरावण सारू वौ झाड़ागर रै पाखती गियौ। झाड़ागर गोरियावर रैझाड़ा रौ अेक रिपियौ अर कांळिंदर रै झाड़ा रा पांच रिपिया लेवतौ हौ। मिनख रो जीव रौ बोदौ घणौं हो। मन में सोच्यौं झाड़ा-झाड़ा तो सगळा अेक सरीख व्है। दुनिया ने ठागौ बतावण सारू अै झाड़ागर ढपला करै। अै तौ फगत रिपिया कमावण री अटकंळा है। वो उणी समे अेक अटकल विचारी की इणनै गोरियावर कै दूं तो भी म्हारौ तौ इलाज व्है जावै ला। वो झाडा़गर ने कळदार अेक रिपियौ पकड़ायनै कह्यौ-गोरियावर सरप डसग्यौ, नांमी झाडौ दे दै। झाड़ागर पैचाण भी पूछी तौ वौ गोरियावर ही बताई। झाड़ागर झाड़ौ देवण लागौ। झाड़ौ देवतां थोडी ई ताळ व्हींके मिनख रा मन में डर वापरियौ-जे कदास न्यारा-न्यारा झाड़ा व्हैता व्है तौ। घर में साची बात तौ आ हैं कि खायौ तो कंळिंदर, गोरियावर रौ नांव तौ कूड़ौ लियौ। झाड़ौ गुण करियौ तौ हकनाक मारियौ जावैला। उणरै मन मं डर अणहूंतौ घर करगियौ। पण झाड़ागर नै आ बात कैवै तौ चार रिपिया ओर देवणा पड़ैला। उणरै मळीच जीव सूं वत्ता चार रिपिया देवणी नीं आवै। वौ यूं ई उपरवाड़ी कांम सारणी चावतौ हौ। वौ पाछी अटकल विचारी झाड़ागर ने कह्यौं-भाईड़ा, म्है निजरा तौ गोरियावार देख्यौ, पण मिनखा देह है, भूल व्है सकै। थने कांई खरच लागै, भेळमभेळ अंकाध नांव काळियौं रा ई परा लेई। झाड़ागर भी अणहूंतौं हौ, वौ मिनख रै मन री बात जाण ली। वौ कह्यौ-गोरियावर अर काळिंया रा नांव लूं, पण मिनख देह है, एकाध आध नांव उपर नीचे व्हियौ तौ कैंनीं सकूं। यूं करा जीव री बात हैं, म्हैं पैला गोरियावर रौ पछै काळियां रौ झाड़ौ दे दूं, ताकि किणी बात री चिंता नी व्हैं। अबै तौ मिनख री हालत फेर बिगड़ गी, वौ सौचियौ अटकळ में एक रिपियौ बिगड़ियौं अर जान जावै जकौ नैरी। उणरै सागै उारी लुगाई आई ही। वा कह्यौ-झाड़ागरजी, थ्हैं मानळौ इणनै गोरियावर अर काळियौं दोनूं साप डस लिया अे लोग पांच रिपिया फरे थ्हैं दोनूं झाड़ा लगाय लियौ। इण तरै मिनख नै लालच में एक रिपियौं गमावनौं पड़ियौै।
एक गांव में अेक गवैयौ रैवतौं हौ। अेक दिन गांव में रात रा गीत-संगीता रो नूंठौ आयोजन व्हियौ। वो पक्की राग में गांणौ गावतौ हौ। रांगा रा मोटा-मोटा जांणकार सुणणिया उणरै, औळू-दोळू बैठा हां। भीड़ देखने अेक मिनख ई उठै जमग्यौ। वौ देखियौ गवैयौ घंाटी हिलाय-हिलाय अर बाकौ फाड़-फाड़नै उंचा सुर में गावती हौ। सुणण वाळा सगळा ई मस्त व्हैगा। घणा दिनां बाद इण तरै रौ आयोजन व्हियौ हौ। सगळा लोग मस्त हा। वै गवैया री तारीख कर रिया हा। पण इण सब में एक मिनख वां सगळा सूं उंचै रह्यौ। वौ गवैया रौ असंली जांणकर हौ, जेड़ौ दूजा आज तांई मिळियौ। वौ गांणौ सुणतौ-सुणतौ जोर-जोर सू रोवण लागौ। गवैयौ मिनख रो घणौ-घणौ औसांण जतावतां कह्यौ-म्हनै आज अणहूंती खुसी है के म्हारी राग आपरे माथै इतौ असर करियौ कै आपरी आंख्या में आसुवां री झड़ी मचगी। इण दुनिया में हाल पक्की रांगा आप जैड़ा असली जांणकर बैठा तौ है, आ बात जाणनै म्हनैं घणौं मोद व्है। घणी खुसी व्हिई की आप जेड़ा राग रा जानकार इण आयोजन में पधारिया। सब एक दूजा कानी देखण लागा। इता में मिनख रोवतौ-रौवतौ ई कह्यौं-अबै मोद गुमेज री बातां छोड़ौ अरले सकौ तो आखरी वगत रांतजी रो नांव लेलौ। मोद-फोद तौ सगळौ लारै धरियां रैय जावैला, फगत रांमजी रौ नांव साथै चालैला। अबै आपरौ घड़ी-पलकां रौ सांस हैं। म्हारा बकरा नै ई औ बोबाड़िया रौग लागो हौ। बापड़ौ बोबाड़ा करती-करती उणी सांयत प्रांण छोड़ दिया। आपनै ई बकरा वालौ सागै रोग लागौ हैं। अबै धन्तर वेद ई आपनै बचा नीं सके। परारा री साल म्हारौ बकरौ भूंडै ढाळै दौरौ घणौ मरियौ हौ। आपनै उणी भांत बोबाड़ा करतां देख म्हनै बकरा री याद आयगी। इण सूं म्हनै रोज आयग्यौ। म्हारौ कैणौ मानौं, ले सकौ तौ दोय-च्यार राम रा नांव लेलौ। अबारूं आपनै मरणौ पड़ेला। मिनख री बात सुणनै सगळां नै ई हंसी छूटगी। तद मिनख आंख्या पूछतौ फैर कह्यौ-अबारूं हंसौ भला ई, सेवट रोवणौ पड़ैला। मरिया पछै थानै म्हारी बात रौ साच आवैला। म्हारौ बकरौ भी इण तरै घणौ दुखी हो। सगळा उणनै राग रौ मतलब समझायौं पण उणनै तो इतरौ हीं समझ मं आयौ के गवैया नै नै ई औ बोबाड़िया रोग लागौ हौ।
महात्मा गांधी रै सुरगवास माथै देस री कांई दसा व्ही। सगळै जीव जगत माथै उण महान आत्मा रै गमन रौ कांई असर व्हीयो, उणरौ वर्णन कवि सेठिया री रचना मे घणौ मर्मस्पर्शी शब्दां में मिळै। जात-पांत रा भेद नै मेटण वाळौ, मिनख मातर रौ सांचो मींत, महात्मा गांधी जैड़ा अवतारी इण धरती माथै आया न कोई आवै। एक गांधी रै मिटण सूं सगळा री आँख्यां में आँसू है। मरतो-मरतो ई गांधी एकता रौ पाठ पढ़ाय ग्यौ।
आभै में उड़ता खग थमग्या
गेलै में बैंता पग थमग्या
हाको सो फूट्यो धरती पर
बै कुण गमग्या, बै कुण गमग्या?
ओ मिनख मरयो'क मरयो पाखी?
सै साथै नाड़ कियां नाखी?
बा सिर कूटै है हिंदुआणी
बा झुर झुर रोवै तुरकाणी।
इसड़ो कुण सजन सनेही हो
सगळां रा हिवड़ा डगमगग्या।
बै कुण गमग्या, बै कुण गमग्या?
मिनखां रो रुळग्यो मिनखपणो
देवां री मिटगी संकळाई,
बापूजी सुरग सिधार गया
हूणी रै आडी के आई?
जीऊंला सौ'र पचीस बरस
बिसवास दिरा'र किंया ठगग्या?
गिगनार पडै़ लो अब नीचै
सतवादी वचनां स्यूं डिगग्या
बै कुण गमग्या, बै कुण गमग्या?
बापू सा मिनखां देही में
धरती पर मिनख नहीं आया,
आगै री पीढ्यां पूछै ली-
के इस्या नखतरी जुग जाया?
ई एक जोत रै पळकै स्यूं
इतिहास सदा नै जगमगग्या
ईं एक मौत रै मोकै पर
सगळां रा आंसू रळ मिलग्या,
बै कुण गमग्या, बै कुण गमग्या?
एक चोर एक सेठां रै घरै घुसियौ पण, सेठ पांणी पीवण नै जागया सो उण री निजर चोर माथै पड़गी। सेठ मांचा माथै बैठग्या। चोर थांभा रै लारै उभौं रह्यौ। सेठ दो-तीन हेला पाड़नै सेठांणी नै जगाई। कह्यौं-ब्याव नै बीसेेक बरस व्हैगा। आज कांई जची के फेरा पाछा नवा करलां। सेठाणी सानी में समझगी, तौ ई वा अण जांण बणनै कह्यौं-माथा में धोळा आया हैं अर हाल टाबरपणा री बातां करौ। फेरा खावण री मन में आवै तौ अेकला खायलौ। सेठ बोल्या,-थे रांजी व्हौ भंलाई बैराजी। म्है तौ पांतरग्यौं के फेरा कीकर खाया हा। सेठांणी बोली-थारां आगै म्हारीं जोर नीं चाले। पण पाड़ौसियां रै साम्हीं अैड़ी बातां मत करज्यौ। लो, नवा फेरा खावणा व्है तौ अबै झट खायलौ। चोर सेठ सेठाणी री बातां सुणनै मन में जांणियौ के अेड़ौ भौळौ सेठ तौ मुलकां में ई नीं लाधै। परिंड़ा माथै सींचणियौ पड़ियौ हौ। सेठ डोली खोलनै सींचणियौ पड़ियौ हौ। सेठ डोली खोलनै सींचणियौ लाया। अेक मूंड़ौ सेठाणी ने झिलयानै कह्यौ-म्हनै साचैला फेरा तो खावण नी है। पाछा याद करणाहै जकौं इणसींचणिया सूं याद व्है जावैला। लौ, थैं इणरौ मूंड़ौ झेलौ। आ कैयनै सेठ उणी थांभा सू चिपियोड़ौ ऊभग्यौ। दोनूं धणी लुगाई थांभा रै चारूकांनी फेरा खावण लागा। चोर रै साम्हीं तौ वै भळियौ ई कोनीं। तीन फेरां रै पछै सेठाणी कह्यौ-लो, अबै म्हनै लारै आवण दौ। सेठ हौळै-हौळै चालता ई रह्या। चोर नै गिरियां सूं लेयनै ठेठ गळा तंाई आटां में पळेट लियौ। सेठ, सेठांणी नै थांभा रै पाखती बैठांणनै खुद डागळै चढ्या। जोर सूं हेलौ मारियौ-पाडिसियां, सावळ कांन देयनै सुण लीजौ, म्हैं चोरी करण सारू आवूं हूं। जाब्तौं करणौं व्है जकों कर लीजों। तीन चार बार वौ औ ई हेलौ मारियौ। चैथी वळा उणरौ हेलौ सुणनै अेक लड़कीलौ आदमी कह्यौ-सेठां, चोरी करोला तो माथा में अणगिणती रा जूत पड़ैला। सेठ पड़ूतर दियौ-चैरियां करण सूं जूत पड़ता व्है तो आवौ, चोर म्हारै घरै बंधियोड़ौ त्यार है। सगळा आड़ौसी पाड़ौसी जूता अब गेड़िया लेयनै दौड़ता आया। सेठ चोर नै बताया कह्यो-चोरां रै जूत पड़ता व्है तौ औ कोरौ क्यूं जावै ? अबै चूकजौ मती। पाड़ौसी लिगतरां सूं मार मारनै उणरौ पोखाळौ कर दियौ। वौ तौ सेठां रै नवा फेरा खावण रौ खिलकौं आखी ऊमर नीं पातरैला।
सीयाळा रा दिन हा। सेठ-सेठांणी सूता हा। आधी रात रा सेठांणी नै तिरस लागी। सेठांणी आड़ौ खोलनै थळी रै बारै पग धरियौ तौ साम्हीं डागळा सूं दो चोर उतरता दिख्या। वा तौ डरी, पर झट पाछौ आड़ौ देयनै आगळ जड़ दी। सेठा रा कांन में डरती-डरती हौळै सूं बोळी, गींगला रा भायजी, घर में चोर घुसग्या है। सेठ कह्यौ, डरण री जरूरत कोनी। सेठांणी पाछी सूय तौ गी पण डर नीं मिट्यौ। काळजौ धक-धक करण लागौ। सेठ सेठांणी रौ पुणचै दबायनै केवण लागा, सेठांणीजी, सुणौ कोंनीं, काई। बताळयनै कायौ व्हैगौ पण थांरी तौ आंख ई नीं उघड़े। सेठांणी बोली क्यूं, जीव खावौ। थे तोै रैय-रैयनै चमकौ। दूजा नै ई सावळ नीं सूवण दौ। हाका मत करौ। साळ रौ तौ आड़ौ दियड़ौ हौ। मांय सेठ-सेठांणी नै बातां करता सुणिया तौ चोर आड़ा रै पाखती कांन लगायनै उभग्या। जांणियौ के धन री की सोय लागैला। सेठ कह्यौं, आज थानै नांणौ लायनै दियौ जकौ सावळ जाब्ता सूं धर दियौ कांई ? सेठांणी चिड़ती बोली, थांने तो दिन रात धन हीं दिखे। सावळ आंख में कस ई नीं लेवण दौ। सेठ कह्यौं, अेकर पूछणा में थाने इती रीस क्यूं आवै ? धन कमावणौ दोरौ घणौ है। हजार-हजार रा नग जड़ियोड़ी बींटियां अर सौ मोहरां थारा हाथ में झिलाई। सेठांणी कह्यौ-म्हनै किसौ धन खारौ लागै। अैड़ौ जाब्ता सूं धरियौ हूं के चोर रा बाप रै ई हाथ नीं आवे। चोर काठा कांन अड़ायनै ध्यानं सूं बात सुणाण लागा। सेठांणी कह्यौ-बीटियां तौ बेक कुलड़ी में घालने सावळ माथै ढकणी देयनै चैक रा उखल माथै धरी हूं अर मोहरां सगळी अेक काळी चूंदड़ी में पळैटनै बाड़ां रै नींबड़ा रा डाळा में टेर दी हूं। बतावौ, थे अेड़ी जुगत कर सकता। चोर मन में कह्यौं के अबै घणा दिन रोवौला के कोई चोर मिळिया तौ हा। बेक तुरत मोहरां लावण सारू गियौ। वठै सांचांणी ई कुलड़ी पड़ी हीं। लप ढकणी उघाड़ी अर हाथ घालियौ। हाथ मांय घालतां ई जोर सूं हाकौ करियों-अरै, खायग्यौ रै। चोर रा सगळा डील में लाय-लाय फूटगी ही। बिच्छुवां रा ओळबां चढ़िया पण चढिया। सेठांणी नै सिंझया रा ऊखळ कनै दौ बिच्छु लाध्या हा। वा वांनै कुलड़ी में घाल दिया। उठीनै दूजौड़ौ चोर चूंदड़ी में बंधियोड़ी मोहरा लेवण सारू नींबड़ा माथै चढ़ियौ। डाळां माथै टिरती चूंदड़ी दिखी। देखतां ई वौ जोर सूं हचीड़ दियौ। हचीड़ देवतां ई अलेखूं मधु मखिया ठोड-ठोड डस न्हाकियौ। हैटै पड़ग्यौ। चोरां री गत देख सेठ सेठांणी हंसण लागा।
