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एक आसरो वादळी

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

आठूं पोर अडीकतां 
वीतै दिन ज्यूं मास।
दरसण दे अब वादळी 
मत मुरधर नै तास॥

आस लगायां मुरधरा 
देख रही दिन रात।
भागी आ तूं वादळी 
आयी रुत वरसात॥

कोरां-कोरां धोरियां 
डूंगां डूंगां डैर।
आव रमां अे वादळी 
ले-ले मुरधर ल्हैर॥

ग्रीखम रुत दाझी धरा 
कळप रही दिन-रात।
मेह मिलावण वादळी 
वरस वरस वरसात॥

नहीं नदी नाळा अठै
नहिं सरवर सरसाय।
एक आसरो वादळी
मरु सूकी मत जाय॥


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Posted By AAPNI BHASHA - AAPNI BAAT to AAPNI BHASHA-AAPNI BAAT at 7/16/2010 07:13:00 AM