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कटी लंकी , बंकि नज़र

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छंद त्रिभंगी

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छंद त्रिभंगी
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टाइप करवंता,नित्य नचंता,
आखर आता,छळकंता।
मनड़ौ मुस्काता,टुन टणकाता,
झन झनकाता,आ पड़ता।
मैसेज  घणेरै, तेरे   मेरे,
सांझ सवेरे,दिख जावै।
अंतस री वाणी,कुल री कांणी,
आंख्यां पांणी,झट लावै॥(१)


बैलेंस झपीड़ा,करै हबीड़ा,
बात  बतीड़ा,करवा   दे।
ओ नेट नवेलो,होय झमेलो,
झट दण हैलो,करवा  दे।
रंगां सू रंगियां,कूड़ वीडिया,
बणा सीड़िया,बपरावै।
ओ मिनखपणै नै,रीतपणै नै,
प्रीतपणै  नै, भरमावै॥(२)

- महेन्द्रसिंह सिसोदिया(छायण)

ङुगरीयो रलियावणो

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भाकरीयो मन भावणो ,जठे आवङ माँ रो थान रे |
जठे आई माँ रो धाम रे, ङुगरीयो रलियावणो ||

ऊँचे ङुगर ओर लो ज्यारी धजा उङे असमान रे |
जोत जगामग जगमगे माँ रा नामी धूरत निशान रे ||1||
ङुगरियो रलियावणो...........

पग धरिया इण पैङिया म्हारा दुखङा हुयग्या दूर रे|
दरस कर्यो जगदम्ब रो म्हारे सुख रो उग्यो सूर रे||2||
ङुगरियो रलियावणो...........

इण ङूगर पर आय कर कोई धरे रे भगत जन ध्यान रे |
आणंद उर मे ऊपजे बाने आतम होवे ओलखान रे ||3||
ङुगरियो रलियावणो.........

हल तो सिन्धु हाकङो ज्यारो पानी बिन परवाण |
आवङ सोख्यो एकलां जे रो नीर न बचीओ निवाण रे ||4||
ङुगरियो रलियावणो.........

भुजंग ङस्यो निज भ्रात ने अम्बा लोवङ रोक्यो भाण रे |
अमरापुर सूं आवङा माँ इमरत    दीनो आण रे ||5||
ङुगरियो रलियावणो.......

मारयो राकस तेमङो  माँ इण ङूगर पर आय रे |
ऊंङो दर में दाटियो माँ अधर शिला अटकाय रे ||6||
ङुगरियो रलियावणो..........

दीज्यो थारे दास ने अम्बा भगती रो वरदान रे |
सोहन  चरणां शरण मे म्हारो मात राखिजे मान रे ||7||
ङुगरियो रलियावणो......

        भूलचूक -क्षमाप्रार्थी

👏👏टाईप -   प्रेम चारण भाखराणी👏👏

गीत जांगडॉ

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सिध्ध कुंजिका स्तोत्र का भावानुवाद।

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सिध्ध कुंजिका स्तोत्र का भावानुवाद।
सिध्ध कुंजीका सांतरी, करण सकळ सुभ काज।
गुरु चावि गढवी तणी, मेहाई महाराज ॥265
चंडी जाप है चारणी, तारण भव जळ मां ज।
अवस नाम आनंदघन, मेहाई महाराज ॥266
कवच अरगला कीलकां, रो सब है मा राज।
रिधू राज राजेसुरी, मेहाई महाराज ॥267
सुकत ध्यान अर न्यास सब, अरचन वंदन आ ज।
सरस नाम सुखरुप है, मेहाई महाराज ॥268

कथन नाम किनीयाण रो, फळै पाठ दुरगा ज।
जपौ निरंतर जोगणी, मेहाई महाराज ॥269
मारण वश अर मोहनं, सबरा सच्चा राज।
डणंकंती डाढाळ है, मेहाई महाराज ॥270
थंभण उच्चाटन थुं ही, रहस सकळ रिधू राज।
किनीयाणी करुणाकरा, मेहाई महाराज ॥ 271
नमो नमो रुद्रांणी ने, मधु मारण थुं मां ज।
अभयंकर अखिलेशरी, मेहाई महाराज ॥272

खळ कैटभ खप्पर भखा, मारण मां महिखा ज।
आई आनंदा उमा , मेहाई महाराज ॥273
 हणणी शुंभ निशुंभ खळ, जागत जोगण मां ज।
महादेवी महाकालिका, मेहाई महाराज ॥274
ऐं ह्रीं क्लीं  मंत्रात्मिका,अवनि पालिका आ ज।
काम रुपिणी कामदा, मेहाई महाराज ॥275
बीज रुप बीजांकुरी ,नमन नमन माता ज।
सृजन पाळ संहारिणी, मेहाई महाराज ॥276
चामुंड घाती चंड री, यें कारी वरदा ज।
अभय  प्रदा विच्चै उमा , मेहाई महाराज ॥277
मंत्र रुपिणी मावडी, जंत्र रुप पण मां ज।
तंत्र रुप तुं त्रंबका, मेहाई महाराज ॥278
धां धीं धूं तुं धूरजटी, शगति रुप शिवाज।
धरा ध्रुजाणं धा वडी, मेहाई महाराज ॥279
वां वीं वूं वागीशरी, विण वादनी वा ज।
कविता री कमनीयता, मेहाई महाराज ॥280
क्रां क्रीं क्रूं तुं काळका, शवारुढ शिवा ज।
अवर न अब उचर सकूं, मेहाई महाराज ॥281
 शां शीं शूं शुभ कारिणी, सारा सारे काज।
चारण री चिंता मणि, मेहाई महाराज ॥282
 हुं हुं हुं हुंकारिणी, तुं ही है त्रिपूराज।
जं जं जं जंभ नादिनी, मेहाई महाराज ॥283
भ्रां भ्रीं भ्रूं  तुं भद्रका,भैरवी आप भवा ज।
भव भय भंजणि भगवती, मेहाई महाराज ॥284
अं थुं अंबा रुप है, कं रुपां करूणा ज।
चं टं है थुं चंडिका, मेहाई महाराज ॥285
तं रुपा तुं तंत्र है, पं परिपूरण मां ज।
यं रुपा यशदायिनी, मेहाई महाराज ॥286
शं रुपा मां शाम्भवी, विं सुं दस विधा ज।
दुं रुपा दूरगा सदा, मेहाई महाराज ॥287
 ऐं ऐश्वर्य अपावणी,वीं वरदाई मां ज।
हं रुपा हंस वाहिणी, मेहाई महाराज ॥288
क्षं रुपा खय कारणी, धीजाग्रणी वड धा ज।
तोड तोड मन तिमिर हर, मेहाई महाराज ॥289
सरळ ह्दय री स्वामिनी,  गरळ रुप खळ गाज।
मन रा कलिमल मेटणी, मेहाई महाराज ॥290
 मन रा सब शंशय मिटै, दिल जगमग दिवलाज।
अंतस आलोकित ईहग, मेहाई महाराज ॥291


पां पीं पूं थुं पार्वती, पियूष वरषिणी मां ज।
अवल नाम आनंदघन, मेहाई महाराज ॥292
खां खीं खूं थुं खेचरी, रहो अगोचर राज।
काज भगत करता रहो, मेहाई महाराज ॥293
सां सीं सूं सिध सतसती, रटत नाम रिधू राज।
मंत्र सिद्ध म्हारा हुवै, मेहाई महाराज ॥294
टूमण कामण टोटका, मंत्र तंत्र सब मां ज।
वड थड म्हारै विसहथ, मेहाई महाराज ॥295
नमो तंत्र नारायणी, मंत्र रुप हे मां ज।
यंत्र रुप आरासुरा, मेहाई महाराज ॥296

स्वरचित
मेहाई सतसई से

आव गज़ल थुं आव अठे

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

आव गज़ल थुं आव अठे🌺
छम छम करती पांव अठे।
आव गज़ल थुं आव अठे।
मन री बातां थनें सुणादूं,
नहीं कपट रा दाव अठे।
दाद ,कहकहा ,वाह वाह री,
अपणायत अणमाव अठे।
मन रा सुर थुं मांड मुळकती,
लय री झांझ बजाव अठे।
थाकी व्हैतो थुं सुस्ता लै,
बड पीपळ री छांव अठे।
जाजम जूनी महफिल माडां,
कोड करे अणमाव अठे।
लय री गहरी लहरी ठहरी
एहडा है घण गांव अठे।
रखसां थानै सिर रे माथै,
वळै पळोटूं पांव अठे।
आवै तो जाजै मत पाछी,
कर मन में ठहराव अठे।
नरपत रे मन रहै निरंतर,
मिळसी आदर भाव अठै॥

वैतालिक

आव ग़ज़ल थू आव अठे

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याद कबूतर चिट्ठिया

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सबद अमीनो साइया

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रेत रौ घर दे भलांई छाज दे - --- नवल जोशी

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

रेत रौ घर दे भलांई छाज दे
नाज़ दे मिनखापणौ दे लाज दे

छापरौ फाटै भली कर छौ फटै
मारुवां नै मेह दे घण गाज दे

कैद में पंछी हुयौ अधगावळौ
दे सकै तो आभ दे परवाज़ दे

भोग भोग्या ई सरै नरदेह रा
तूं तँदूरै तांण दे सुर साज दे

मुलक री सगळी जबानां जाम क्यूं
गूंगलां नै शब्द दे आवाज दे

जूण किम जमगी हिमाळै बर्फ ज्यूं
अंतसां में ओज अगनी दाझ दे

राज में मिनखापणौ लवलेस नीं
दे कदै तो मिनख नै ई राज दे

आँगळी रौ अेक टपकारौ दियौ
औरुं भुगत्या, साँडियां नै ताज दे

आपणी जूणी अटाळै सारखी
धार बँगला थूं म्हनै गैराज दे

बेङियां बेजा जङी रे साँवरा
देय झटकौ साँतरौ पण आज दे
            ⊙⊙⊙⊙
           
 --- नवल जोशी

* भ्रष्टाचार रा कुंडलिया * -

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

घोटाळा धोखाधङी,रिश्वत भ्रष्टाचार ।
भली चुणी रे भायलां,लोकतंत्र सरकार ॥
लोकतंत्र सरकार , देश नै दी बरबादी ।
म्हैनतकश नै मार,चोरटां नै आजादी ॥
मजा करै मरदूद,करणिया धंधा काळा ।
खुलतां ई दब जाय,फाइलां में घोटाळा ॥१॥

भ्रष्टाचारी म्हैकमा,भ्रष्टाचारी राज ।
भ्रष्टाचारण रै बिना,सरै न कोई काज ॥
सरै न कोई काज,नौकरी लगै न सोरी ।
नोट टेकियां टाळ,बदळियां व्हैणी दोरी ॥
क्रोङौं खर्च चुणाव लङै जिथ सत्ताधारी ।
डूबै मुलक भलाय,न धापै भ्रष्टाचारी ॥२॥

राजा अफसर माफिया,भूमि हङपणहार ।
तस्करिया आतंकिया,चौङा फिरै बजार ॥
चौङा फिरै बजार,संत भोपा बटमारा ।
नोटां री थपकार सुणै ,नाचै दरबारा ॥
बिकै मीडिया न्यूज,बजाय र थोथा बाजा ।
मूंडै मांग्या दाम लेय,बिकजावै राजा ॥३॥

सिंघ विसा राजा कठै,रजवट रापटरोळ ।
पद पाय र पसरै पदा, ठाला गाडर टोळ ॥
ठाला गाडर टोळ,साख चट जाय समूळी ।
मिनखां नै गिट जाय,समझ कर गाजर मूळी ॥
कोयक जे कानून रुखाळा मिळै कदीसा ।
अेकाधौ पज जाय,जियां पजिया सिंघवी सा ॥४॥
               
               --- नवल जोशी

गणेश स्तुति- नवल जी जोशी

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐ - ॐगणपतयै नमः *ॐ

गणेश स्तुति (छन्द त्रिभंगी में)
          (नवल जोशी कृत )
        ॐॐॐॐॐॐॐ

जय हे गणनायक सिद्धिप्रदायक
सब सुखदायक  वरदायक ।
भक्तन प्रतिपालकविघ्नविदारक
सकल सुधारक फलदायक ॥

लम्बोदर देवा सिमरथ सेवा
जगत कुटेवा हर लेवा ।
भव संकट तारण पाप विदारण
पत रखवाळण सुर देवा ॥

हे रिधसिध दाता प्रकट विधाता
जगविख्याता शुभ दाता ।
प्रथमः आराध्यं जीवन साध्यं
विकट विबाध्यं हर त्राता ॥

हे गवरीनंदन नमो निरंजन
भव भय भंजन सूंडाळा ।
मूषक असवारी जय असुरारी
गजतनधारी विरदाळा ॥

मोदक तव अर्पण भाव समर्पण
सिरधा सिमरण आप ग्रहो ।
अंतस उजियाळा कर सूंडाळा
मम ह्रिदयाळा आन रहो ॥

          --- नवल जोशी

बाबा थारै बेरणै

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मन ऊजळ ऊजळ वरण,शरण ऊजळी सेव ।
अरण रुणीचौ ऊजळौ,(जिथ)तपै त्रिलोकी देव ॥
हर भजतां हर राखतां,हर पाळै हर कोय ।
हुकम टाळ हलणौ कियां,रामदेवरै होय ॥
जोत जागरित जोयलो,अमर आस्था ईश ।
दूहा रामापीर रा ,जबर रच्या जगदीश ॥
हर कोई हेलौ करै ,(तो) हाजर हाथोहाथ ।
आय र मेटै आपदा,राम रुणीचा नाथ ॥
जणौ जणौ जग जातरू,परतख पार न पाय ।
रामदेव राखै जिनैं,रुणीचै रम जाय ॥
तेवङियां तकदीर रा,तट ताळा खुल जाय ।
रामदेव राजी हुयां,जग जाळा कट जाय ॥
पिंड पीङा परतख मिटै,प्रगट कटै पम्पाळ ।
रजी रुणीचै राज री,भाल लगाय र भाळ ॥
सुख सांयत सरसै सकल,खुलै करम री रेख ।
राम रुणीचै राज रौ,ध्यान लगाय र देख ॥
कुण ऊँचौ नीचौ कुणी,कुण गोतर कुण न्यात ।
रामदेव रा जातरू,रामदेव री जात ॥
जगधारा जित जाय कर,हरधारा रळ जाय ।
घन्न धणी रै देवरै,जमधारा थम जाय ॥
धर्म अधर्मी लोगङा,राज रंक दरवेश ।
हाथ जोङ हाजर हुवै,देव धणी रै देश ॥
मन हंसा मोती चुगै,ईश करै असनान ।
रामसरोवर राम रौ,मानसरोवर मान ॥
जम रै हाथां जेवङी,काळ कळू विकराल ।
पीर पगलिया पूज नर,तिर जावै तिरकाल ॥
जूंणी जोखम जातरा,जगत जीव भरमांण ।
भजै रामसा पीर सो,नर पावै निरवांण ॥
हर गावै ध्यावै हरी,संत गिरस्थ फकीर ।
हरजस जुम्मा जागरण,रामसरोवर तीर ॥
दुख दोरप कर दूबळा,भव रा भोग भगाय ।
राम धणी रौ ध्यान धर,रामसरोवर न्हाय ॥

अंतस दीजै आस्था,उर दीजै उजळास ।
बाबा थारै बेरणै,अथ इतरी अपदास ॥
-- नवल जोशी

वाह! मराठण वाह!॥

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

जुलमी जुलम कियो घणो,गिरी गुलामी गाज।        बैरण बण गौरों तणी,लिसमी रखली लाज।।
मरहट्ठी हट्टी नही, दटी रही कर घाव।
औ राणी अंग्रेज सूं, बूंदेली घण चाव  ॥
सबसूं उपर देश हित, मन में मरण उछाह।
करण निछावर प्राण निज, वाह! मराठण वाह!॥
लियां हाथ शमसीर,चढ़ी रँग तुरँगज तातां।
अमर रैवसी लिछमी थारे जस री बातां। 
खण्ड भलौ बुन्देल,देश मरहट्ठ उप्पज्जि।
झांसी जस ल्यो जीत जठै लिच्छमीज निप्पज्जि।  जोर लड़े घनघोर बड़ो बलशील अबै चकरावत भारी
वेग प्रहार करे रजनीचर हाथ घुमाय कियो जुध भारी
फेर कियो गिद्धराज तबै  पग नाखुन से हमलो अति भारी
रावण क्रोध कियो तब आकर काट दिए पंख ज्यु आरी देख जटायु सिया हरती झट जाय तहाँ भड़ जाय पुकारी
रे दुष्ट आज अनीत करी छल से हरली यह राजकुमारी
मैं न तुझे अब जावन दूँ भल प्राण हमार चढ़े बलिहारी
चोंच उठाय प्रहार कियो अब रावण काढत है तरवारी
मराठण मर्दानीह । फिरंग दळ घण फोरिया ।।
रंग लिछम राणीह । दीप्यो जस दुनियाण में ।।

घुंघरू छम छम बाज्या

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

कीकर कर मुरली

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हिये दरस री हाम

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नरपतदान वैतालिक

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

त्रीकम राखी टेक , मन मांगी घोड़ी मिळी !!

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

जाडीं गांव तालुका धानेरा रा ताजु मीर आछा कवि अर भक्त हा जिणांने एक दिन आय एक आदमी कह्यो कि ताजु मीर  थे भाटीब सूं जाड़ी पैदल आवो तो मालिक थांने कांई घोड़ी नी देवेला जद ताजुजी कह्यो कि म्हें कदै मालिक कनें मांगी नी तो कद देवतो !
आज थें कह दियो तो काले मांगूला हरि कने घोड़ी ,मालिक ने घोड़ी मांगतां थकां गीत में अरदास करी जिका आपरी समक्ष पेश कर रह्यो हूं !
अवल्ल में याद करूं ईल्लाही आपने ,
ईल्ललाह नांमरी लखुं अरजी !!
मुहम्मद मुस्तफा आपरी मदद सूं ,
महर कर  रहम री करो मरजी !!१
सांई अरजी विचारो दिल वसे,
थरू सम्पत मोहे घरे थोड़ी !!
गफूरा रहीम गुण आपरा गावंतां,
घाटोड़ी समापो ऐक घोड़ी.!!२!!
वेहे रैवाळ थोड़ा घणी वरीखे ,
हेफरड़ां करंतां वाग हाथां !!
ऐक पल फरूंको व्हे घर आवतां ,
जेज लागे नहीं गांम जातां !!३!!
सुरंगावान समझे बोहो सुलखणी ,
लड़ंग ठावका ठांण लावें!!
पावरो खाय चरवा जाय प्रभाते ,
आथम्या भांण री घरे आवें !!४!!
वके धनराज मुंगा घण वछेरा ,
नगद ध्रब हाथ में वधे नांणां !!
रकम कळदार आवे घर रूपिया ,
लाभ जो होवे तो कटे लेणां !!५!!
सच्ची पुकार मालिक तुंही  सांभळे ,
ओळभो आपने लखुं आछो !!
वार जो करो तो पाळ मोरा वचन ,
पत्र अरजी तणो मेल पाछो !!६!!
वडाई आपरी जगत सोहे वखांणे ,
कैक संतां तणा काम कीधा !!
बंध छोड़ाविया असंखां बापजी ,
दुखियां घणांने सुख दीधा !!७ !!
खरो विश्वास मों तुमारो खुदावीन ,
 दुथियां दान तूं समप्प दौला !!
अभ्यागत आपरो मीर ताजु आखे ,
मन तणी उम्मीद पूर मौला !!८!!
झाड़ और बेट करे तेरी जिकर ,
धरणी अंकाश दृढ एक धारा !!
जीव जंतु पंछी नाम तोरा जपे ,
तुंही तुंही भणे नवलाख तारा !!९!!
...........................................,
मच्छीयां भजे जल बीच माळा !!
.............................................,
पल पल ऐतां तणी करे पाळा !!१०!!
वळे लेखण होय वनराय की ,
सात समुद्रां तणी होय स्याही !!
अल्लापुर लखूं ऐहड़ा कथन तो ,
नाम रो गुण तणो पार नांहीं !!११!!
दुजे तीजे दिन ऐक गांव रे ठाकुरसा घरे आय ताजु मीर ने घोड़ी दिनी पण उणमें ऐप कुलखण हो जिका ताजु मीर सोरठे में कह्यो ,
त्रीकम राखी टेक , मन मांगी घोड़ी मिळी !!
(पण) उणमें कुलखण ऐक , जाती वाजे जाड़ीये !!१!!
टंकन मीठा मीर डभाल

सुचित्त नित्त प्रत्ति व्है शिवा सकत्ति सम्भरै

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

 छन्द नाराच
सुचित्त नित्त प्रत्ति व्है शिवा सकत्ति सम्भरै
सुधर्म  कर्म ज्ञान ध्यान मर्म खोजते   फिरै
तमाम रात दीह जाम नाम ले बितात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।१।
बहन्न सात एक साथ व्योम पाथ ऊतरी
अछेह नेह देह मामड़ा सुगेह में धरी
कथा अशेष देश देश में विशेष गात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।२।
असाध्य आधि व्याधियाँ उपाधियाँ उड़ाहई
कली कराल काल की कुचाल को छुड़ा दई
महान ज्योतिवान थान तेमड़ा सुहात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है ।३।
कनिष्ठ भ्रात गात पै कुघात सर्प घालियो
निदान प्रान हानि जान भानु छीर छालियो
सुधा प्रभात पूर्व स्वर्ग जात
ला पिलात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त मे विख्यात है।४।
विदारि सृष्टि तेमड़ो अरिष्ट सृष्टि को हर्यो
अपार भूमि भार को उतार दूर तें कर्यो
अरिन्द फन्द मेटके स्वच्छन्द तू लखात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।५।
पदारविन्द पै मलिन्द भक्त वृन्द मोहते
उद्योत जोत प्रेम श्रोत मग्न होत जोहते
विपत्ति काल में तुहीज तात मात भ्रात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।६।
अथाह सिन्धु हाकड़ो उमाह राह रोकियो
विलम्ब अम्ब त्यागि कै समस्त अम्बु सोखियो
विहीन नीर क्षीन हीन आज लों दिखात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त मे विख्यात है।७।
मया विचार के दया मया अवश्य कीजिये
अज्ञान जोगीदान को महान ज्ञान दीजिये
भवा तने मुरारि को तनै विनय सुनात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में  विख्यात है।८।
श्री जोगीदान जी कविया सेवापुरा कृत।
जय श्री तेमड़ा राय
जय श्री तनोट राय
जय श्री देशाण राय
🙏🙏🍄🍄🙏🙏 ंटंकन भूदेव आढा।

संत फकीर मलंग शिवागिरि

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

मस्त जटी मन बैठ मढी मह बांसुरि खूब बजाय रह्यो है।
हाथ कडा पहने नित धूरजटी शिव आप रिझाय रह्यौ है।
साधक औ सुर रो शिव सेवक तानन सूं कछू गाय रह्यौ है।
आतम ने कर कृष्ण मयी परमातम राधा रिझाय रह्यौ है॥
वैतालिक
सुंदर मोहनि मूरत बांसुरि, फेर लियां अधरां सुखकारी।
मस्त बजाय रह्यौ जिम मोहन, औ शिव है वृषभानु दुलारी।
आप बिना नह आश्रय है रख लाज हमार सुणौ जटधारी।
संत फकीर मलंग शिवागिरि पांव पडूं सुण हे अलगारी॥
वैतालिक
तान घणौ गुलतान बणै मधुरी यह बेणू बजावत है रे।
कृष्ण बणे खुद शंकर- मीराज जोगण को चित्त ध्यावत है रे।
नाचत है निज ही मन कुंजन औ संग रास रचावत है रे।
बात अनूपम आप तणी मन देख  थनें हरसावत है रे॥
वैतालिक

सखी आव अठै तरसाव

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

सखी आव अठै तरसाव मती दरसाव दिखा मुख मंडल रो।
जिण सू तनरो सब ताप मिटै
दुःख द्वंद  हटै मन रा मलरो।
तव आनन सूं मन कानन में
चपला रो प्रकाश प्रति पलरो।
मन भावण  रुप रिझावण कामण छोड सुभाव अबै छलरो॥

सवैया दुर्मिल।

नरपतदान आवडदान आशिया वैतालिक कृत।

कीधौ तैं कोप साझियो

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

कीधौ तैं कोप साझियो कांनौ,रडमल नै दीधौ थै राज..
चारणबाडां तणीं चारणीं,लोक महीं तू राखै लाज..
वरपाडां धरपाडां वाली आभ जडां नाखै उपाड..
कोय न गांज सकै किनियाणी, झिंझणियाल तुहाला झाड..मेछां अपराधियां मारणी भला सेवगां आवै भाव..
करै करां छाया तूं करणी,गांजै कुण गढवाडा गांव..
बांका मेहासधू म बिसरै,संतट हरै सांभलै साद..
गढवाडां गढ. औलै गाजै,मढ रै औलै गढां म्रजाद॥


करणी वंदना का डिंगळ गीत बांकीदास जी आशिया कृत
जय श्री करणी...🙏🙏🙏🙏🙏

कविता ना व्यापार॥

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

🌺कविता🌺
कवि नांही छोटा बडा, रंक किंवा उमराव।
सबकी अपनी कल्पना, अपने अपने भाव॥1
कवि कवि होता है सखे! , क्या आला क्या तुच्छ।
अपनी अपनी पसंद से, गढता पुष्पित गुच्छ॥2
कविता मन की कल्पना, कल्पक की सुकूमार।
मंचौ की महिमा नही,
कविता ना व्यापार॥3

कविता केवल ना विषय, नहीं शब्द लय भाव।
जन जन की पीडा अनत, मन के गहरे घाव॥4
कविता इक संवेदना, मन की गहरी सोच।
वह उमडेगी चित्त मे, जब जब लगे खरोंच॥5
कवि न केवल जात इक , या ना व्यक्ति विशेष।
जिस का अंतस हो दुःखी, वह कविता दरवेस॥6

ना निषाद ने क्रोंच पर, ताना होता तीर।
कविता कैसे चीखती, रामायण बन वीर॥7

छंद नही लय भी नही, ना मुक्तक अतुकांत।
कविता कोलाहल कभी, कभी तथा वह शांत॥8
कविता नहीं वियोग है, कविता ना संयोग।
पीडा की संवेदना-अभिव्यक्ति का रोग॥9
कविता ना विग्यान है, ना दर्शन उपदेस।
कविता केवल दर्द है, बांटत कवि दरवेस॥10
वैतालिक

Rao GumanSingh Rao Gumansingh


सगती भगती अर संस्कृति रा कवि : सोहनदान सिंढायच रातड़िया

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

इण त्रिवेणी स्वरूप व्यक्तित्व रौ पूरौ वर्णन तो शायद कोई लेखनी नीं कर सके हैं । म्हाणी जांण पिछाण इण परिवार रां वारिश जालेन्द्र सा रातड़िया अर सोहनदान सा रा जमाई जगदीश सा बीठू सिंथल सूं होवण रो श्रेय इण वाटसेप मिडिया नै ही देवूला ।
सीजीआईएफ रे जोधपुर सेमीनार में पधारिया जदै जगसा म्हनै भी चार किताब पढण सारू दीनीं तो मैं घणौ राजी होयो । इणरौ कारण मुफ्त मे किताबां मिलणौ नीं होय न, ओ हो कि मै जिण सुमधुर आवाज री चिरजावां रोजीना सुणू वारे बारे में जाणन रो सुअवसर मिलियो हो ।
इण पोथी मांय राजस्थानी रां मोटा चावां अर ठावां विद्वान श्री आईदानसिह जी भाटी रो पैलो'ई लेख पढ'र मन तिरपत व्हैगों ।
धोल़ी वेल़ू धोरिया, चांदी ज्यू चमकेर ।
रातड़ल्यां रल़ियावणौ, बंको बीकानेर ।।
भांचलिया शाखा में सिंढायचां री मानीती खांप में किसनो जी जोगा मिनख हा अर बीकानेर रा दरबारी कवि हां । बीकानेर महाराज सूरसिह जी बांरी जोगताई अर काव्य शक्ति पर रीझकर वि सं. 1672 में रातड़ियो (रायथलया ) गांव इनायत करियों ।
चौखलै रातड़ियो चावो अण धरा रा सपूत श्री सोहनदान सा रो जलम रातड़िया मांय विक्रम संवत 1995 जेठ वदी चवदस रै दिन होयो । आपरा पिताजी श्री माधोदान जी भी नांमी कवि हा ।
मां रे बालपण में ही बिछोह पछी आप भुवासा रै देखरेख अर काव्य किलोल रे वातावरण में पल़या अर बड़ा व्हैया । श्री सोहनदान सा कवि हृदय रे साथै एक समाज सुधारक, दुर्वयसनों सूं दूर रेवण वाला, साधक , रोज जोत करणो, अंगे सादगी अर वांरी मूंछ दाढी री छटा भी निराली ही, जिण कारण आपने टीवी धारावाहिक -महाराणा प्रताप मांय राजकवि री भूमिका भी निभाई ।
सोहन सा री कवितावा मानवतावादी, भगती में नीति बतावण वाला, नारी पुरूष समानता रां समर्थक हा ।
कुछ पद सोहनदान सा के -
सोहन री सुण सांवरा, विनति बारम्बार ।
अबकी बेर उबारले, हरि भगतां हितकार ।। 1।।
सोहन इण जग में सुणी, हूं बड़ हूं बड़ हेक ।
'मैं' मांही सब मर गये, आगे हुये अनेक ।। 2।।
नार पुरुष नै नर जिको, समझे एक समान ।
ज्ञानी तापस साध सिद्ध, सारा मांय सुजान ।। 3।।
भगती राखे भाव, चरखो काते चाव सूं ।
उर में शील उच्छाव, राजस्थानी नारियां ।। 4।।
जीकारा लागे जबर, बोलण मीठा बोल ।
रूड़ी राजस्थान री, आ भाषा अणमोल ।। 5।।
सोहनदान सा रे नांम रे आगै स्वर्गीय लिखण रो मन नीं करै है इणरों कारण आज भी आपां आपरी बणायोड़ी रचनाओं अर चिरजाओं, आपरी ही'ज आवाज में रोजीना सूणो हो फिर ओं अमर नाम गूंज रियो हैं ।
सोहन सा रे आत्मज जालेन्द्र सा रै सपूती रै पांण ओ लिखित साहित्य पढण रो सुअवसर मिलियों । आपरै परिवार में बहन बेटियो सहित पूरे परिवार ने काव्य वरदान और विरासत में मिलियो हैं ।
इण पौथी में श्रीआईदानसिह जी भाटी, श्री भंवर पृथ्वीराज रतनु, डा प्रकाश अमरावत, डा शक्तिदान चारण "शक्तिसुत", जालेन्द्र सा , डा गुलाबसिह रतनु, श्री गिरधरदान रतनू दासोड़ी, श्री शक्तिप्रसन्न बीठू, श्रीमती ओमकंवर जी, श्री लक्षमणदान कविया खैण, श्री पवन पहाड़िया डेह ।
सभी रचनाऐ इस महान कवि सोहनदान सा रातड़िया के पूर्ण नहीं तो, कम से कम कृतित्व और लेखनीय व्यक्तित्व का सुंदर बखान करने में अवश्य सफल रही हैं ।
टंकण:-जगदीशदान कविया, राजाबन्ध (बिराई )

मायड़ भाषा मोह

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कवी बद्रिदान जी गाडण (हरमाड़ा ) ने राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलवाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री भैंरू सिंह जी को रिझाने के लिए प्रशंसा में दो गीत लिख भेजे , किन्तु उस पर जब कोई प्रतिक्रिया नही हुई तो कवी ने उलाहना के दोहे भी बना भेजे : मायड़ भाषा मोह ,उकसयो मोनू इसो ! तो मैं कियो मतोह , तोने बिडदावण तणो ! मैं जाणी मन मांय , बिडदायां हिमत बंधे ! पण थारी न पाय , दिसी भैंरू देवरा ! आगै ख्यात अनेक , बीडदायां सिर बोलिया ! इण कलयुग में एक , भणक न लागी भैरवा ! लोही थारो लाल ,मिलतो टोडरमाल सो ! कलजुग तणी कुचाल , भेळ दियो मळ भैरजी !! ४ पख पोखर रै पाण , एक न सबद उचारियो ! अदत बिलोपी आण , मायड भाखा री मुदै ! तारीफां थारीह , बे बे गीत बणाविया ! मत गुमी म्हारीह , पातर नह पिछाणीयो ! सेखा ! थारी साख , बधाई मैं बावलै ! रै नह सकियो राख , तूं भैरूं देवा तणा ! बंस बिगाडू व्यास , चाटुकार मोनू कवै ! उर बिच होय उदास , जहर तिको ही जरावियो ! बात पोस बिजोह , खिज्यो मो माथै खरो ! रै ! तो पर रिझ्योह , भोळप म्हारी भैरजी ! मैं बिन्हू गीतां मांय , कबाई खाई किना ! निपट ताहरै नांय ,आ पूँजी माण्डी अजे ! सुख बणतां सिन्धिह ,कुळ गोरव अनुभव करै ! बंस तण बिन्दिह , भली लगाई भैरजी !! ......!! शैषकरण धनायका

विवेक वार निसाणी- गाडण केशवदासजी कृत

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ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी अस्तूत करंदे। इल, अंबर, पावक, पदन, इंच, चंद दुडंदे॥ सनकादिक, सप्त रिष फण सहंस फुणंदे। सारद, नारद, सुख मुख व्यास समरंदे। इंद्रादिक, रुद्रादिक ब्रह्मादिक बंदे॥ अष्ट भैरुं दश दृगपाल भी सात समन्दे। षट जत्ती षट चक्रदती सभी समरन्दे।। नवही नाथ अनंत सिद्ध आदेश अखन्दे। सहस्त्र अठ्यासी ऋषि संभाल धुण ध्यान धरन्दे॥ अमर बडे तैतीस कोड़ जस नाम जपंदे। पीर पकंबर दस्तगीर सब हाजर बन्दे॥ मोहमद जैसे मुसतफ़ा नीवाज़ नमन्दे। बडे-बडेरे बड बडे बड पुरुष बिलन्दे॥ जाण प्रमाण्या जाहरां दिल अन्दर दंद। सिद्धां आगम च्यार वेद कतेब करन्द॥ पूतलियां नट हन्दियां क्या आदम गंद । यह भी खेल न जाण ही उस षालक हन्द।६।

विवेक वार निसाणी की छठी निसाणी

गंग विराजत संग

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गंग विराजत संग तुम्हारे अंग भभूत लगी अति प्यारी कर तिरशूल नहीं दुकूल बाघम्बर तन पर तुम धारी पिवत कालकूट सोहे जटाजूट नंदी की करते हैे असवारी लोचन तव तीन काया अति छीन संग सोहे गिरिजा महतारी राजावत श्रवण सी कृत

शंकर शीश शशि अत चमंकत,

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शंकर शीश शशि अत चमंकत, सती उमिया विराजत संग, नीलकंठ असवारी नंदी, जटा मुकुट में खळके गंग, शेषनाग लिपटायो शंकर, भळ हळ भळके गळे भुजंग, अमल भांग आरोगे अबधू , भस्मी भोळो लगावत अंग।। ।।शंभू कजोई।।

नीलकंठ शंभू निरंकारी,

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उमापति मिरगछाळा आसन, भक्तों के दुख भंजनहारी। तांडव नृत्य कियो त्रिपुरारी, देख डरि दुनियांणद सारी, गरल गटागट पी गणपालक, नीलकंठ शंभू निरंकारी, शंभू के तुम नाथ हो शंकर, पाप हरो पल मोंय पुरारि।। ।।शंभू कजोई।।

दिवै सूं थांनक दीपै,

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दिवै सूं थांनक दीपै, पुसप सुगंध प्रमाण। मोती ज्यूं दरियाव मझ, सिंध में त्यूं सोढाण।

त्रिपुर सुंदरी त्र्यंबका

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अधिनायक नवलाख औ, वरदायक विख्यात।
सुखदायक दुःख दालणी,वड आवड विख्यात॥1
यशदायी वरदायिनी, अभय दायनी आइ।
अखिल जगत अनपायनी, जयदायी जगराइ॥2
शंकरनी शाकंभरी, त्रिपुरा अरजी तोय।
वंदनीय विश्वंभरी, किंकर कीजौ मोय॥3
खडग नेत्रिका खडगिनी, खडग वाहती खास।
खड खड खड हंस वा करै ,वैरी दळां विनास॥4
मात कपूतां महर कर, शिव अवधूता संग।
जगत प्रसूता जोगणी, जमदूतां भय भंग॥5

त्रिपुर सुंदरी त्र्यंबका, अंब आवडा आइ।
महर करौ ममतामयी, रखौ चरण शरणाइ॥6
कहर महर दोनूं करै , आप मती अनुसार।
इण सूं छोडर और सब, वड आवड चित धार॥7
सरस नाम संजीवनी, अवनी आवड आइ।
भाखर वाळी भूप मां, तखत तेमडा राइ॥8
सुखदा वरदा सौख्यदा, जयदा  हयदा अंब।
अभयप्रदा यशदायिनी, आवड कर अवलंब॥9
वीरा धीरा मतिमयी, गंभीरा गतिवान।
हर पीरा हर जन तणी, हर वामा शिव-मान।10
गोदायी गजदायिनी, हयदायी है अंब।
अन्नपुरण अनदायिनी, आवड रो अवलंब॥11
पृथी ऊपरां माहरी, बीसहथी वरदाइ।
रथी म्हारथी सारथी, अंबा आवड आइ॥12
पाप तणी प्रज्वालिका, अवनि पालिका आइ।
सचर अचर संचालिका, वीसहथी वरदाइ॥13
कमल नयन ,कर जिण कमल, कमल पुहप आसीन।
रहौ सदा ह्रिदय कमल, राय स्वांग मे लीन ॥14
जोगण झाझै झूलरै, संग बहन ले सात।
तखत तेमडै जो रमें,नमन करुं नितप्रात॥15
हय देनी भय हारिणी, अभय करण अविलंब।
जय देनी जगदंबिका, आवड इळ वड अंब॥16
शरणागत मागत सदा, जागत  जोगण अंब।
चरणां रत राखौ मनें, आवड वड भुजलंब॥17
जैसाणै जोगण बसे, सातूं बेनां साथ।
वा  आवड वड राखसी, नरपत रे सिर हाथ॥18
मन रॅग थळ आलोकिनी,महिमा मय महमाय।
आवड जोगण आद है, मन रॅग थळ री राय॥19
आवड मावड आप हो, करणी तनय जतन्न।
भूल बिसारै हे भवा,मारै बसजौ मन्न॥20
गळधर नरमुंडावली, कर में वळै कृपाण।
काली मात कृपालिनी, बसणी नमो मसाण॥21

नरपत आवडदान आशिया"वैतालिक"

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हिंगलाज

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ये छन्द जुझारदान जी देथा, मिठङिया का कहा हुआ है सा....इस छन्द के आखिरी अन्तरे की तीसरी पंक्ति इस तरह है.....
'
हमरे हिंगळाज हजुर हिंगोलज, जे पद रज वंदे जुझियो।
(हे) अजोनी अंबा हिंगलाज आशापुर, आप चंडी मुझ स्हाय आयो।।

अनुपम छबी ओपणी अवनी

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बसंत में हर तरफ एक नई उमंग दृष्टीगोचर होती है। पेड़ पौधो में नव पल्लव विकसित होते है।नव जीवन का संचार होता है। इस समय रतिपति की मार सर्वाधिक होती है। इस बारे मे चार लाईन आप की नजर कर रहा हूं, अन्यथा न लें।

अनुपम छबी ओपणी अवनी, उमड़ी अंतस सहज उमंग।
चैत चांनणी सान चढाई, अणहद चाह ऊपनी अंग।।(१)
ऊतर अनंग डील में आयो, आळस रंभ मरोड़े अंग।
देह अलौकिक जोती दीपै, रूपाळी झीली सतरंग।।(२)
ऊभी ठिठक चांदणी आछी, रात झकौळी रूपे रंग।
ठाढो पवन निलज ठिठकारो, आद इचपळो उतन अनंग।।(३)
हिचकै,सिहरे,लाजै,हालै, धण भौळी डूबी धव ध्यांन।
बादीलै वश झूम बावळी, गाफल बिसरी गाभा ग्यान।।(४)
इन्द्रलोक कर आय ऊतरी, सुरबाला साजै सिणगार।
मदभीना मारू दिस मलफै, होय रही वालौ गळहार।।(५)
ऊठी उमस अबोली अंतस, परतख प्रगटी चैहरे पूर।
चमक लिलाड़, देह चंचळता, नैह प्रकट दमकंतै नूर।।(६)
चित्त अचंचळ चाळै चड़ियौ, वेध काळजो घाली वाट।
उरड़ डील आगे हुय अड़ियौ, खुल्यौ राज रलियावण खाट।।(७)
अधरां निवतो दियो अचांचक, आद विसरै धण आचार।
समपै सुघड़ शरीर सलूणो, लाज छोड़ सुन्दर लाचार।।(८)
प्रणय मनोरथ कीना पूरा, पिव पायौ सत प्रीत प्रमांण।
विखमी वैळ महर लिखमीवर, धण री अरजी दीधो ध्यांन।।(९)

आखर रा उमराव- नपसा वैतालिक

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

आखर रा उमराव रे, नित मन बजै नगाड।
कवित लोग उणने कहै, धींगड धींगड धाड॥1
आखर रा उमराव रे, मन कोलाहल होय।
जिण ने कुछ कहता कवित, ध्वनि प्रदूषण कोय॥2
आखर रा उमराव रे, मन मे नाचै मोर।
मलजी नाठौ मेल ने, गजबण आबू  और॥3
आखर रा उमरावजी, तेज  आपरा तीर।
बिन बिंध्यां घायल किया, मारो मोटा मीर॥4
आखर भाखर सम तथा, आखर साकर होय।
आखर टांकर सांतरा, कवि बणै हर कोय॥5
पेला होवै आदमी, फेरूं कवि हर कोय।
आखर सूं भाखर बणै, आखर साकर होय॥6
आखर रा उमराव हो, सूंपौ थें सिरपाव।
बडा बडा कविराव ने, बांटौ लाख पसाव॥7
आखर रा उमराव थे, म्है छोटकियौ साव।
नरपत नेह निभाव जो, हुं  किंकर कविराव॥8
आखर रा उमरावजी, रात जमी है जोर।
घर जावा दो साह्यबा, आखर लिखसां और॥9
आज उनींदी आंखडी, पांपण झपकै जोर।
नीदं आवती नाथजी, आखर लिखसां और॥10
आवो निंदर अब बणै, मत तरसावौ मीत।
मन भावौ मिळ  सुपन मे, तोड न जावौ प्रीत॥11
घणी रात गाढी हुई, अंधारो अणपार।
दो जावण दिलदार अब,मिळसां काल सवार॥12

नरपत आवडदान आशिया"वैतालिक"

।।शिव तांडव।।

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

बरसों पहले महादेव की कृपा से लिखी हूइ स्तूति आज शिवरात्री के पावन पर्व पर प्रस्तुत करता हूं..........

           ।।दोहा।।
।।आशुतोष अजर अमर, वपु वेश विकराल।
भवपातक भंजन भला,जयजय शिव जट्टाल।।
         ।।छन्द: पद्धरी।।
जय जय महेश, जय जय जट्टाल।
हर हरहू दुख, मम प्रणत पाल।
विकराल वेश, आजान भुज।
गहे गंग नाद, गहरीय गुंज।।

कैलाश वास, प्रेतां  सुपास।
रचै रंग रजी रंभा सुरास।
गावत गंधर्व, किन्नर गान।
वधै व्योम अपसर, सुर विमान।

बजै ताल ताक, तिहू लोक बाक।
हर-हर अथाक,नभमंडल हाक।
रुदै राम रट्ट, करी घट्ट नाद।
उलट्ट पट्ट, झट्ट जोग जाद।

फर फेर हेर, फरंगट्ट फट्ट।
तांडव नाच, निरमै सुनट्ट।
सजाय जाय, शंखा सुणाय।
बेधक बुलाय, वीणा बजाय।

वजै विविधी रंगी, सारंगी शुर।
नटराज आज, पहनें नुपुर।
कसी कटिबंधी, बांधत बेर।
फनि जटाजुट, संभाल फेर।

भरी चलम भांग, बनी चकचुर।
करी नयन लाल कुदे करुर।
उछरंग अंग, करी दंग देव।
तांडव सकाज सजै सजेव।

अवनी आकम्प, दिगपाल डोल।
बमबम नाद, बहू मुख बोल।
छुटी डाकहाक बजी भ्रमत भोम।
सुझे न बात, स-सोच सोम।

भवभुत भमे, रमे नवी रीत।
लगे पाय लळी, वळी जगजीत।
होंकार खार, धरी करी क्रोध।
धधकत शिरे, गंगा रा धोध।

त्रिचख लख, लहे अगन ज्वाल।
रमेभमे रखे,सजी खखीड खाल।
अवधुत दुत, कृत करे केक।
अदभुत नृत, सरजे अनेक।

वंदे विशेष, मुनिवर समाज।
गणचारण गहे,जयजयति गाज।
दहे देव दुख, अरु अंगरोग।
कटे कष्ट कैक, मेटे जरा जोग।

हटे हानी ध्यानी, जो ध्यावु धीर।
प्रभु प्राण नाथ, परजाळे पीर।
करे सुंदर मंदर, इन्द्र धाम।
त्रिया संगे सुख, लहे तमाम।

पामे जश किर्ति, खुख अपार।
यह स्तुति पढे, नीत ध्यान धार।
जुगल हाथ जोडी, जपै "जयेश"।
जय जय महेश, जयजय महेश।
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
    ।। हर हर महादेव।।
।।महाशिवरात्री के पर्व की बधाई हो।।
-कवि: जय
- जयेशदान गढवी।

साजन अर सजनी

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

मन रो नाच्यौ मोरियौ, धण रो किण रे काज।
बात मने औ बावडौ, कविता में कविराज॥

सुंदरता री पुतळी, अर उपर है लाज।
गजब नाचती गोरडी, घूमर रे अंदाज॥

नखराळी ए नारीयां, दे ताळी नाचैह।
घूंघट वाळी  कामणी, मतवाळी सांचैह।

साजण सुपने आविया, कह्यौ आवसूं आज।
इण कारण धण नाचती, गीत रसीलै राज॥

असी कळी रो घाधरो, घूमर घेर घुमेर।
गोखां नाचै गोरडी, प्रितम खुश व्है हेर॥

प्रितम घरां पधारिया,मन रा बज्या मृदंग।
घुमर नाची गोरडी, अंतस करै उमंग॥

साजण सुपने आविया, मन रे बैठ मतंग।
इण सूं नाची गौरडी, बजतां मिलन मृदंग॥

नरपत आवडदान आशिया"वैतालिक"

रंग रे डिंगल रंग!!

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

साहित घणो सोवणो कथा गीत सतसंग!
कविता फड़ कहानिया रंग रे डिंगल रंग!!

फ़ाग घणा ही फूटरा चकरी सागे चंग!
गणगोरया रा गीतड़ा रंग रे ड़िंगळ रंग!!

सूरा तणा शुभराज  जब्बर लड़ी जो जंग!
निति रीती नित नेम रंग रे डिंगल रंग!!

कामण री संणगार आ, कमधजां सहैरो चंग।
हीङदै हिलौर उठावणी, तौ रंग रे डिगंळ रंग।

बालकिया बिलवावणी, किलक किशोरां संग।
उमंग आदू भरण तन, तौ रंग रे डिगंल रंग।।

ब्रहम शब्द वणीजन अरथ, क्षत्रियां तणी खङंग।
सुदरां सेवा लेवणी, तौ रंग रे डिगंल रंग।।

पांगां पहाङ चढावणी, मुक गुवाण सुरंग।
जरा जङां तन मेटणी, तौ रंग रे डिगंळ रंग।।

यूवां जुबा जंणकारणी, डणकां जोधां डंग।
लहूरां लाडियां लैवणी, तौ रंग रे डिगंळ रंग।

कायर हीणा कंथ ने ,जब्बर लङावणी जंग।
हार पलङ कर जीत दे ,तौ रंग रे डिगंळ रंग।।

भय भंजण अरियां हणण, हामियां जीतण जंग।
पिसांचा पछाङणी, तौ रंग रे डिगळ रंग।

राव चारणां बांमणां, मांगणियार मलंग।
सहज  संवारी  सूफियां, रंग रे डिंगल रंग॥

वातां ख्यातां वेलियां, परवाड़ा परसंग।
रम्मत रमझोल़ां रची, रंग रे डिंगल रंग!!

जात पांत जांणै नहीं, सकल मानवी संग।
नेह निरखियां नत नमै, रंग रेे डिंगल रंग॥

रावण नो ठाठ

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

जळहळ ज्योत उद्योत, मणी जळहळता जडिया,
चिंतामणी भरभीत, नवे ग्रह आवी अडिया,
परवाळा पर पोळ, स्फाटिक स्तंभ ठर्या छे,
चुडामणी चोपास, कनक कोठार भर्या छे.
अष्टमा सिद्धि नव निधि रिधि महालक्ष्मी वासे वसी,
शिवनी आपी समृधि ज्यां त्यां उपमा करवी कशी. [१]

ओळग करे ज्यां ईन्द्र चन्द्र ज्यां छत्र धरे छे,
दिवाकर कर दिप, वरूण ज्यां नीर भरे छे,
चार वदन थी वेद, ब्रह्माजी पाठ भणे छे,
धलहल तजी धर्मराय, ज्ञान गुण एह गणे छे,
रतनखांण रतनावळी कल्प द्रुम मोटा मणी,
रिधि घणी रावण घरे अलखत ईन्द्रासन तणी. [२]

सात सोनेरी कोट, अधिक एक जोजन उंचा,
पांचसो पांसठ पोळ, ओळ खरा ज्यां खूंचा,
दरवाजा दस×वीस, बसो बासठ छे बारी,
त्यां बेठा बळवंत, धीर नर धनुषो धारी,
वण आज्ञा विचरे नही वायु सरखो पण जियां,
ए अतुल बल अंगद अधिक पलक एक पहोच्यों तियां. [३]

सतर हजार संगीत, विविध पेर वाजां वागे,
घंट घडियाळां घोर, घणां निशान ज गाजे,
नव लख नवे हजार, नवे नृत किन्नर नाचे,
नाट्य चेट्य नवरंग, राय देखी मन राचे,
वळी देव दुदुंभी गडगडे सोभा सुरनायक तणी,
बाणु क्रोड सामंत सहित लायक बेठो लंक धणी. [४]

पृखराज प्रवाळां पाट, जवेरनी ज्योते जळीयां,
चोरासी जोजन चोक, महेल मणी माणेक मढिया,
जोजन सोळ सभाय, सिंहासन शोभा सोहिये,
मघवाथी बहु मान, महेल देखी मन मोहिये,
वैमान देव वैकुंठना शिव आपी समृधि घणी,
अहो समृध विध बारणे लायक बेठो लंक धणी. [५]

सहस्त्र अख्खणी सैन्य, शोभे रावण नी साथे,
मदरांचळ मंडाण, हेते धरे एक हाथे,
साठ लाख सरदार, प्रेमदा प्रीते परणी,
अणवरी एसी लाख, विविध रूपाळी वरणी,
छे सात लाख सितेर सुत ईन्द्रजीत आदे अती,
अनमी अहंकारी अंशपत रावण मोटो महिपती. [६]

एक छत्रधर राज, प्रताप पाम्यो ते प्रोढे
देव दानव नर नाग, किंकरो सहु कर जोडे,
दस मस्तक भुज वीस, ईश वरदान ज दीधुं,
चौद चोकडी राज, कबुल ए कर्मे कीधुं,
कोई थयो नथी थाशेय नही बळवंत रावण सारखो,
राम विण कोई जीते नही, पंडित रूडे पारख्यो.

पांच लाख परधान, पांच आयुतो पगेरी,
दस लाख दिवान, वीस हजार वजीरी,
सामंत सोळ हजार, लाख बहोतेरे राजा,
मंडळीक छन्नु लाख, मुगटधर जोद्धा जाजा,
बाणु करोड बेठा रहे आठ जाम अहर्निश जियां,
'शामळ' कहे अंगद बळ अधिक, पलक एक पहोच्यों तियां.

कवी - शामळ विरेश्वर भट्ट, 'अंगद विष्टी' मांथी

पील ,मीठी पीमस्यां

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

पील ,मीठी पीमस्यां
खोखा, सांगर, बेर |
मरु धरा सु जूझता
खींप झोझरू कैर ||

जूझ जूझ इण माटी में
बन ग्या कई झुंझार ।
सिर निचे दे सोवता
बिन खोल्यां तरवार ॥

ऊँचा रावला कोटड़याँ
सिरदारां की पोळ |
बैठ्या सामां गरजता
मिनखां की रमझोळ ॥

मरुधर का बे मानवी
कतरा करां बखाण
सर देवण रे साट में
नहीं जाबा दी आण ||

चाँदण उजली रातडली,
सोना जेड़ी रेत् |
सज्या -धज्या टीबड़ा,
ज्यूँ सामेळ जनेत ||

ऊँडो मरू को पाणी है,
उणसु ऊंडी सोच ।
साल्ल रात्यूं आपजी न
जायोडा री मोच ||

चीतल, तीतर, गोयरा
छतरी ताण्या मोर |
मोड्यां कुहकु -कुहकु बोलती
दिन उगता की ठोड़ ||

बे नाडयाँ बे खालडया
बे नदयां का तीर |
सुरग भलेही ना मिले,
बी माटी मिले शरीर ॥

अज्ञात कवि

आइ श्री सोनल मा स्तुती(छंद -चचॅरी)

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

आपती शांती अपार कापती कलेशो कराल, जगहित उतम विचार नित नित करती
उन्नत सेवती आचार, पावन प्रगटती प्यार,शोधती संसार सार सदगुण धरती
माया छाया थी बहार,एना वाणी विचार, करीए स्वीकार हटे भवदुख भरती
सोनल शुभ देव सगती, मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती
सोरठ कच्छ गुजॅराय जातिजन जग हिताय पावन सुप्रवास थाय दिव्यानंद दरसे
मानव मेळा भराय शारद मंदिर स्थपाय संस्कृति स्थानक रचाय मंगल वरसे
भकित नीति भणाय,वेद धमॅ विचाराय काव्य शास्त्र तणी अमी सरणी निझॅरति
सोनल शुभ देव सगती मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती
आवी करवा उद्धार आवड फरी ने उदार खोडल प्रतिपाळ प्रसिद्ध वरवडी पधारी
करसे अज्ञान नाश पाथरसे नव प्रकाश दरस ज्ञान रवि उजाश धमॅ कमॅ धारी
वंदे "क्षेम"वारवार सोनल शरणे स्वीकार हे अमार जीवन गंगधार भागीरथ्थी
सोनल शुभ देव सगती मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती

《  कवि श्री खेमराज खेतदान गढवी //मोरारदान सुरताणीया 》

आइ श्री सोनल मा स्तुती(छंद -चचॅरी)

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

आपती शांती अपार कापती कलेशो कराल, जगहित उतम विचार नित नित करती
उन्नत सेवती आचार, पावन प्रगटती प्यार,शोधती संसार सार सदगुण धरती
माया छाया थी बहार,एना वाणी विचार, करीए स्वीकार हटे भवदुख भरती
सोनल शुभ देव सगती, मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती
सोरठ कच्छ गुजॅराय जातिजन जग हिताय पावन सुप्रवास थाय दिव्यानंद दरसे
मानव मेळा भराय शारद मंदिर स्थपाय संस्कृति स्थानक रचाय मंगल वरसे
भकित नीति भणाय,वेद धमॅ विचाराय काव्य शास्त्र तणी अमी सरणी निझॅरति
सोनल शुभ देव सगती मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती
आवी करवा उद्धार आवड फरी ने उदार खोडल प्रतिपाळ प्रसिद्ध वरवडी पधारी
करसे अज्ञान नाश पाथरसे नव प्रकाश दरस ज्ञान रवि उजाश धमॅ कमॅ धारी
वंदे "क्षेम"वारवार सोनल शरणे स्वीकार हे अमार जीवन गंगधार भागीरथ्थी
सोनल शुभ देव सगती मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती

《  कवि श्री खेमराज खेतदान गढवी //मोरारदान सुरताणीया 》