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पातळ अर पीथळ- कन्हैयालाल सेठिया (२७ मई, महाराणा प्रताप जयंती पर खास)

Rao GumanSingh Guman singh


राजस्थानी रा सिरै नांव कवि अर मनीषी कन्हैयालाल सेठिया री 'पातळ अर पीथळ' नामी अर चावी कविता है। आ कविता १९४२ में लिखीजी। उण वगत अंग्रेजां रो राज हो अर गांधीजी री पुकार 'करो या मरो' रै साथै देस रा सगळा नेतावां नै जेळ में ठूंस दिया हा अर जनता में घणी उदासी अर निरासा फैलगी ही। उण संदर्भ नै ध्यान में राख'र देस री जनता नै चेतावण सारू सेठिया आजादी रै रखवाळै महाराणा प्रताप रै इण इतियास कथा-प्रसंग नै लेय'र आ कविता लिखी। आ कविता इत्ती चावी बणी कै राजस्थानी रा लूंठा विद्वान प्रो. नरोत्तमदास स्वामी इणरी दस हजार प्रतियां छपवा'र आखै राजपूतानै री रियासतां में भिजवाई।
रावत सारस्वत इण कविता रो अंग्रेजी अनुवाद ही करियो। 'पातळ-पीथळ' राजस्थानी भोम रै स्वाभिमान, गौरव, अठै री मान-सम्मान अर वीरता री भावना नै सांगोपांग ढंग सूं प्रगटै। इण ओजस्वी रचना में आपणी संस्क्रति री मरजादा अर माठ-मरोड़ री भावना छिप्योड़ी है। आ रचना राजस्थानी री घणी चावी अर अमर रचना है।

पातळ'र पीथळ

अरै घास री रोटी ही जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो।
नान्हो सो अमरयो चीख पड़्यो राणा रो सोयो दुख जाग्यो।
हूं लड़्यो घणो हूं सह्यो घणो
मेवाड़ी मान बचावण नै
हूं पाछ नहीं राखी रण में
बैरयाँ री खात खिंडावण में,
जद याद करूं हळदी घाटी नैणां में रगत उतर आवै,
सुख दुख रो साथी चेतकड़ो सूती सी हूक जगा ज्यावै,
पण आज बिलखतो देखूं हूं
जद राज कंवर नै रोटी नै,
तो क्षात्र-धरम नै भूलूं हूं
भूलूं हिंदवाणी चोटी नै
मै'लां में छप्पन भोग जका मनवार बिनां करता कोनी,
सोनै री थाळ्यां नीलम रै बाजोट बिनां धरता कोनी,
 हाय जका करता पगल्या
फूलां री कंवळी सेजां पर,
बै आज रुळै भूखा तिसिया
हिंदवाणै सूरज रा टाबर,
आ सोच हुई दो टूक तड़क राणा री भीम बजर छाती,
आंख्यां में आंसू भर बोल्या मैं लिखस्यूं अकबर नै पाती,
पण लिखूं कियां जद देखै है आडावळ ऊंचो हियो लियां,
चितौड़ खड़्यो है मगरां में विकराळ भूत सी लियां छियां,
मैं झुकूं कियां? है आण मनैं
कुळ रा केसरिया बानां री,
मैं बुझूं कियां हूं सेस लपट
आजादी रै परवानां री,
पण फेर अमर री सुण बुसक्यां राणा रो हिवड़ो भर आयो,
मैं मानूं हूं दिल्लीस तनैं समराट् सनेशो कैवायो।
राणा रो कागद बांच हुयो अकबर रो' सपनूं सो सांचो,
पण नैण करयो बिसवास नहीं जद बांच बांच नै फिर बांच्यो,
कै आज हिंमाळो पिघळ बह्यो
कै आज हुयो सूरज सीतळ,
कै आज सेस रो सिर डोल्यो
आ सोच हुयो समराट् विकळ,
बस दूत इसारो पा भाज्यो पीथळ नै तुरत बुलावण नै,
किरणां रो पीथळ आ पूग्यो ओ सांचो भरम मिटावण नै,
बीं वीर बांकुड़ै पीथळ नै
रजपूती गौरव भारी हो,
बो क्षात्र धरम रो नेमी हो
राणा रो प्रेम पुजारी हो,
बैरयाँ रै मन रो कांटो हो बीकाणूं पूत खरारो हो,
राठौड़ रणां में रातो हो बस सागी तेज दुधारो हो,
आ बात पातस्या जाणै हो
घावां पर लूण लगावण नै,
पीथळ नै तुरत बुलायो हो
राणा री हार बंचावण नै,
म्हे बांध लियो है पीथळ सुण पिंजरै में जंगळी शेर पकड़,
ओ देख हाथ रो कागद है तूं देखां फिरसी कियां अकड़?
मर डूब चळू भर पाणी में
बस झूठा गाल बजावै हो,
पण टूट गयो बीं राणा रो
तूं भाट बण्यो बिड़दावै हो,
मैं आज पातस्या धरती रो मेवाड़ी पाग पगां में है,
अब बता मनै किण रजवट रै रजपूती खून रगां में है?
जद पीथळ कागद ले देखी
राणा री सागी सैनाणी,
नीचै स्यूं धरती खसक गई
आंख्यां में आयो भर पाणी,
पण फेर कही ततकाल संभळ आ बात सफा ही झूठी है,
राणा री पाघ सदा ऊंची राणा री आण अटूटी है।
ल्यो हुकम हुवै तो लिख पूछूं
राणा नै कागद रै खातर,
लै पूछ भलांई पीथळ तूं
आ बात सही, बोल्यो अकबर,

म्हे आज सुणी है नाहरियो
स्याळां रै सागै सोवैलो,
म्हे आज सुणी है सूरजड़ो
बादळ री ओटां खोवैलो,

म्हे आज सुणी है चातगड़ो
धरती रो पाणी पीवैलो,
म्हे आज सुणी है हाथीड़ो
कूकर री जूणां जीवैलो,

म्हे आज सुणी है थकां खसम
अब रांड हुवैली रजपूती,
म्हे आज सुणी है म्यानां में
तरवार रवैली अब सूती,
तो म्हांरो हिवड़ो कांपै है मूंछ्यां री मोड़ मरोड़ गई,
पीथळ राणा नै लिख भेज्यो, आ बात कठै तक गिणां सही?

पीथळ रा आखर पढ़तां ही
राणा री आंख्यां लाल हुई,
धिक्कार मनै हूं कायर हूं
नाहर री एक दकाल हुई,

हूं भूख मरूं हूं प्यास मरूं
मेवाड़ धरा आजाद रवै
हूं घोर उजाड़ां में भटकूं
पण मन में मां री याद रवै,
हूं रजपूतण रो जायो हूं रजपूती करज चुकाऊंला,
ओ सीस पड़ै पण पाघ नहीं दिल्ली रो मान झुकाऊंला,
पीथळ के खिमता बादळ री
जो रोकै सूर उगाळी नै,
सिंघां री हाथळ सह लेवै
बा कूख मिली कद स्याळी नै?

धरती रो पाणी पिवै इसी
चातग री चूंच बणी कोनी,
कूकर री जूणां जिवै इसी
हाथी री बात सुणी कोनी,

आं हाथां में तरवार थकां
कुण रांड कवै है रजपूती?
म्यानां रै बदळै बैरयाँ री
छात्यां में रैवैली सूती,
मेवाड़ धधकतो अंगारो आंध्यां में चमचम चमकैलो,
कड़खै री उठती तानां पर पग पग पर खांडो खड़कैलो,
राखो थे मूंछ्यां ऐंठ्योड़ी
लोही री नदी बहा द्यूंला,
हूं अथक लड़ूंला अकबर स्यूं
उजड़्यो मेवाड़ बसा द्यूंला,
जद राणा रो संदेश गयो पीथळ री छाती दूणी ही,
हिंदवाणों सूरज चमकै हो अकबर री दुनियां सूनी ही।

पातळ=प्रताप। पीथळ=कवि पृथ्वीराज राठौड़ जका महाराणा प्रताप रा साथी अर अकबर रै दरबार रा नवरतनां में सूं एक हा। अमरयो=महाराणा प्रताप रो बेटो अमरसिंह। चेतकड़ो=राणा प्रताप रो घोड़ो। बाजोट=जीमण सारू बणी काठ री चौकी। आडावळ=अरावली। पण=प्रण। कूकर=कुत्तो। कड़खो=विजयगान।

रावळ बापा री ख्यात:-

Rao GumanSingh Guman singh


आदि मूळ उतपति, ब्रहम पिण खत्री जांणां,

आणंदपुर सिणगार, नयर आहोर वखांणां।

दळ समूह राव रांण, मिळै मंडळीक महाभड़,

मिळै सबै भूपती, गरू गहलोत नरेसर।

एकल्ल मल्ल धू ज्युॅ अचळ, कहै राज बापै कीयौ,

एकलिंगदेव आहूठमां, राजपाठ इण पर दीयो।।१।।

छपन कोड सोवन्न, रिखी हारीत समप्पै,

सैंदेही श्रग गयौ, राय-रायां उथप्पै।

अंतरीख ले अमरत, सिद पिण आघो कीन्हो,

भयो हाथ दस देह, सस्त्र वजर मई सं दीन्हो।

आवध्ध अंग लगै नहीं, आदि देव इम वर दीयौ,

गुहादित तणै भैरव भणै, मेदपाट इण पर लीयौ।।२।।

हर हारीत पसाय, सात-वीसां वर तरणी,

मंगळवार अनेंक, चैत वद पंचम परणी।

चित्रकोट कैलास, आप वस परगह कीधौ,

मोरी दळ मारेव, राज रायां गुर लीधौ।

बारह लख बोहतर सहस, हय गय दळ पैदळ वणं,

नित मूडो मीठो ऊपडै, भंूजाई बापा तणै।।३।।

खडग़ धार पाहार, नित भॅयसा दुय भंजै,

करै आहार छ वार, ताम भोजन मन रंजै।

पट्टोळो पैतीस हाथ, पेहरण पहरीजै,

पिछोडो सोळे हाथ, तेण तन नहीं ढक़ीजै।

पय तोडर तोल पचास मण, खडग़ बत्तीसा मण तणौ,

सुण बापा सेन सम्मं चलै, जिण भय कांपै गज्जणौ।।४।।

जालन्धर कसमीर, सिंध सोरठ खुंरसांणी,

ओडिसा कनवज्ज, नगरथट्टा मूलतांणी।

कुंकण नै केदार, दीप सिंघळ मालेरी,

द्रावड सावड़ देस, आंण तिलॅंगांणह फेरी।

उतर दिखण पूरब पछिम, कोई पांण न दख्खवै,

सांवत एक एकाणवै, बापा समो न चक्कवै।।५।।

(मूथा नैणसी री ख्यात रै पांने सूं लियो)

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पीथल री वीरवाणी
पातळ जो पतसाह, बोलै मुख हुंतां बयण।
मिहर पछम दिसमाहं, ऊगे कासप राव उत॥
पटकूं मूंछां पाण, के पटकूं निजतन करद।
दीजे लिख दीवाण, इणदो महली बात इक॥
परताप रौ उतर
तुरक कहासी मुख पतौ, इण तन सूं इकलिंग।
ऊगे जांही उगसी, प्राची बीच पतंग॥
खुशी हूंत पीथल कमध, पटको मूंछं पाण।
पछटण है जे तौ पतौ, कलमां सिर के बाण॥

प्रताप-प्रतिग्या

Rao GumanSingh Guman singh


दुरजण जबलग देस में, हेम न पहरुं हाथ।
भाखर विपदा भटकणो, आंणज इकलिंग नाथ॥
बड़का जिण कारण विकट, सही विपद सन्ताप।
हडकण रजकण बिण हुवां, पण नँह तजै प्रताप॥
चेटक चढ़ आयौ चटक, मेटक अरियां माण।
जग उण दिन ही जाणियौ, भव मझ बीजो भाण॥
धारां हूंत धपाविया, अरियल दळ आराण।
पीढ्या लग लडिया पिसण, मिणधारी महराण॥
नम नम नीसरीया निलज, दूजा सह देसोत।
दिल्ली ढिग नह डिग दियो, सूरज कुल सांगोत॥
भाखर भाखर भटकियो, तजियो ध्रम नह तन्त।
महाराण मेवाड मह, भली करी भगवन्त॥
सत पर साबत साहिबौ, कर देखो सह कोय।
सीसोदा रहिया सदा, साय एकलिंग सोय॥
चेटक आहव इम भाखियो, पता तुरंग तूरंग॥

बजे तळवार खटाखट...

Rao GumanSingh Guman singh


'बजे तळवार खटाखट, गिर खोपड़ियां कटाकट।

वीर निकळे बच झटपट, मरे कितने ही चटपट॥

मची लड़ाई विकट भयंकर, नदी खून की चाळी।

जोगणियां खप्पर ळे आई, नाच करे कंकाळी॥


'पड़ी नगारां ठोर मच्या दळ सोर

इकट्ठा हो र कटक पर चाळा

कर हनुमान ज्यूं हाक ळंक पर ड़ाक पड़ा छिन मांही

ज्यूं व्रज पर कर्यो चढ़ाव इन्द्र की नांई

केई ळिया खंग कुरसांण धनुष करतांण बांण फँटकारै

केई तबळ तेग त्रिसूळ वज्र के मारे

केई गुप्ती गुर्ज चळावै केई छुरी कटांरा बावै

केई ळे ळे चक्र चढ़ावै केई जादू सा आजमावै।'

पग पग भम्यां पहाड़

Rao GumanSingh Guman singh


पग पग भम्यां पहाड़, धरा छांड़ राख्यो धरम।
'महाराणा' र 'मेवाड़', हिरदै बसिया हिंद रे॥

सकळ चढावै सीस, दान धरम जिणरो दियो।
सो खिताब बगसीस, लेवण किम लळचावसी॥

दिया सत्रुवां दाह, सांचा भड़ रखिया सदा।
लाखां सीस लियाह, वाज्या धन धन सीसवद॥

उरा थरिंदां आंपणां, सीस घुणिन्दां साह।
रुप रखिन्दा राण रा, वाह गिरिन्दां वाह॥

धर बांकी दिन पाधरा, मरद न मूकै माण।
धणा नरिन्दा घेरियो, रहै गिरंदां राण॥

अकबर जासी आप, दिल्ली पासी दूसरा।
पुनरासी परताप, सुजस न जासी सूरमा॥

गिर पुर देस गमाड़, भमिया पग पग भाखरां।
मह अंजसै मेवाड़, सह अंजसै सीसोदिया॥

समंदर पूछै सफ्फरां, आज रतंबर काह।
भारत तणै उमेदसी, खाग झकोळी आह॥

राहब उटठ कमाणगर, मूंछ मरोड़ न रोय।
मरदां मरणों हक्क है, रोणो हक्क न होय॥

सत री सहनाणी चही, समर सळूंबर घीस।
चूड़ामण मेळी सिया, इण धण मेल्यो सीस॥

सीता ना रावण सको, दोप्रद कीचक देख।
अकबर काम उमीठियो, इण सींसोदण एक॥

अकबर देख अचाणचक, भई न तिल भर जीत।
नीरोजै नर नाहरी, जबर लियो जस गीत॥

दुरगो आसावत रो, नित उठ बागां जाय।
अमळ औरंग रा ऊतरे, दिल्ली धड़का खाय॥

बीज चंद सी बकड़ी, खड़ी खड़ी भ्रह खूंच।
टणकापण री तखतसी, मारै हेळा मूंह॥

उजड़ चाळे उतावळो, रोही गिण न रन्न।
जावे धरती धूंसतो, धन्न हो घोड़ा धन्न॥

(मेवाड़ री महिमा)

बलिदानी चित्तोड़........

Rao GumanSingh Guman singh


मांणक सूं मूंगी घणी जुडै़ न हीरां जोड़।
पन्नौं न पावै पांतने रज थारी चित्तौड़॥
आवै न सोनौं ऒळ म्हं हुवे न चांदी होड़।
रगत धाप मूंघी रही माटी गढ़ चित्तोड़॥
दान जगन तप तेज हूं बाजिया तीर्थ बहोड़।
तूं तीरथ तेगां तणौ बलिदानी चित्तोड़॥
बड़तां पाड़ळ पोळ में मम् झुकियौ माथोह।
चित्रांगद रा चित्रगढ़ नम् नम् करुं नमोह॥
जठै झड़या जयमल कला छतरी छतरां मोड़।
कमधज कट बणिया कमंध गढ थारै चित्तोड़॥
गढला भारत देस रा जुडै़ न थारी जोड़।
इक चित्तोड़ थां उपरां गढळा वारुं क्रोड़॥


संकलित काव्य