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त्रीकम राखी टेक , मन मांगी घोड़ी मिळी !!

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

जाडीं गांव तालुका धानेरा रा ताजु मीर आछा कवि अर भक्त हा जिणांने एक दिन आय एक आदमी कह्यो कि ताजु मीर  थे भाटीब सूं जाड़ी पैदल आवो तो मालिक थांने कांई घोड़ी नी देवेला जद ताजुजी कह्यो कि म्हें कदै मालिक कनें मांगी नी तो कद देवतो !
आज थें कह दियो तो काले मांगूला हरि कने घोड़ी ,मालिक ने घोड़ी मांगतां थकां गीत में अरदास करी जिका आपरी समक्ष पेश कर रह्यो हूं !
अवल्ल में याद करूं ईल्लाही आपने ,
ईल्ललाह नांमरी लखुं अरजी !!
मुहम्मद मुस्तफा आपरी मदद सूं ,
महर कर  रहम री करो मरजी !!१
सांई अरजी विचारो दिल वसे,
थरू सम्पत मोहे घरे थोड़ी !!
गफूरा रहीम गुण आपरा गावंतां,
घाटोड़ी समापो ऐक घोड़ी.!!२!!
वेहे रैवाळ थोड़ा घणी वरीखे ,
हेफरड़ां करंतां वाग हाथां !!
ऐक पल फरूंको व्हे घर आवतां ,
जेज लागे नहीं गांम जातां !!३!!
सुरंगावान समझे बोहो सुलखणी ,
लड़ंग ठावका ठांण लावें!!
पावरो खाय चरवा जाय प्रभाते ,
आथम्या भांण री घरे आवें !!४!!
वके धनराज मुंगा घण वछेरा ,
नगद ध्रब हाथ में वधे नांणां !!
रकम कळदार आवे घर रूपिया ,
लाभ जो होवे तो कटे लेणां !!५!!
सच्ची पुकार मालिक तुंही  सांभळे ,
ओळभो आपने लखुं आछो !!
वार जो करो तो पाळ मोरा वचन ,
पत्र अरजी तणो मेल पाछो !!६!!
वडाई आपरी जगत सोहे वखांणे ,
कैक संतां तणा काम कीधा !!
बंध छोड़ाविया असंखां बापजी ,
दुखियां घणांने सुख दीधा !!७ !!
खरो विश्वास मों तुमारो खुदावीन ,
 दुथियां दान तूं समप्प दौला !!
अभ्यागत आपरो मीर ताजु आखे ,
मन तणी उम्मीद पूर मौला !!८!!
झाड़ और बेट करे तेरी जिकर ,
धरणी अंकाश दृढ एक धारा !!
जीव जंतु पंछी नाम तोरा जपे ,
तुंही तुंही भणे नवलाख तारा !!९!!
...........................................,
मच्छीयां भजे जल बीच माळा !!
.............................................,
पल पल ऐतां तणी करे पाळा !!१०!!
वळे लेखण होय वनराय की ,
सात समुद्रां तणी होय स्याही !!
अल्लापुर लखूं ऐहड़ा कथन तो ,
नाम रो गुण तणो पार नांहीं !!११!!
दुजे तीजे दिन ऐक गांव रे ठाकुरसा घरे आय ताजु मीर ने घोड़ी दिनी पण उणमें ऐप कुलखण हो जिका ताजु मीर सोरठे में कह्यो ,
त्रीकम राखी टेक , मन मांगी घोड़ी मिळी !!
(पण) उणमें कुलखण ऐक , जाती वाजे जाड़ीये !!१!!
टंकन मीठा मीर डभाल

सुचित्त नित्त प्रत्ति व्है शिवा सकत्ति सम्भरै

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

 छन्द नाराच
सुचित्त नित्त प्रत्ति व्है शिवा सकत्ति सम्भरै
सुधर्म  कर्म ज्ञान ध्यान मर्म खोजते   फिरै
तमाम रात दीह जाम नाम ले बितात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।१।
बहन्न सात एक साथ व्योम पाथ ऊतरी
अछेह नेह देह मामड़ा सुगेह में धरी
कथा अशेष देश देश में विशेष गात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।२।
असाध्य आधि व्याधियाँ उपाधियाँ उड़ाहई
कली कराल काल की कुचाल को छुड़ा दई
महान ज्योतिवान थान तेमड़ा सुहात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है ।३।
कनिष्ठ भ्रात गात पै कुघात सर्प घालियो
निदान प्रान हानि जान भानु छीर छालियो
सुधा प्रभात पूर्व स्वर्ग जात
ला पिलात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त मे विख्यात है।४।
विदारि सृष्टि तेमड़ो अरिष्ट सृष्टि को हर्यो
अपार भूमि भार को उतार दूर तें कर्यो
अरिन्द फन्द मेटके स्वच्छन्द तू लखात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।५।
पदारविन्द पै मलिन्द भक्त वृन्द मोहते
उद्योत जोत प्रेम श्रोत मग्न होत जोहते
विपत्ति काल में तुहीज तात मात भ्रात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में विख्यात है।६।
अथाह सिन्धु हाकड़ो उमाह राह रोकियो
विलम्ब अम्ब त्यागि कै समस्त अम्बु सोखियो
विहीन नीर क्षीन हीन आज लों दिखात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त मे विख्यात है।७।
मया विचार के दया मया अवश्य कीजिये
अज्ञान जोगीदान को महान ज्ञान दीजिये
भवा तने मुरारि को तनै विनय सुनात है
सुपात मात आवड़ा जगत्त में  विख्यात है।८।
श्री जोगीदान जी कविया सेवापुरा कृत।
जय श्री तेमड़ा राय
जय श्री तनोट राय
जय श्री देशाण राय
🙏🙏🍄🍄🙏🙏 ंटंकन भूदेव आढा।

संत फकीर मलंग शिवागिरि

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

मस्त जटी मन बैठ मढी मह बांसुरि खूब बजाय रह्यो है।
हाथ कडा पहने नित धूरजटी शिव आप रिझाय रह्यौ है।
साधक औ सुर रो शिव सेवक तानन सूं कछू गाय रह्यौ है।
आतम ने कर कृष्ण मयी परमातम राधा रिझाय रह्यौ है॥
वैतालिक
सुंदर मोहनि मूरत बांसुरि, फेर लियां अधरां सुखकारी।
मस्त बजाय रह्यौ जिम मोहन, औ शिव है वृषभानु दुलारी।
आप बिना नह आश्रय है रख लाज हमार सुणौ जटधारी।
संत फकीर मलंग शिवागिरि पांव पडूं सुण हे अलगारी॥
वैतालिक
तान घणौ गुलतान बणै मधुरी यह बेणू बजावत है रे।
कृष्ण बणे खुद शंकर- मीराज जोगण को चित्त ध्यावत है रे।
नाचत है निज ही मन कुंजन औ संग रास रचावत है रे।
बात अनूपम आप तणी मन देख  थनें हरसावत है रे॥
वैतालिक

सखी आव अठै तरसाव

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

सखी आव अठै तरसाव मती दरसाव दिखा मुख मंडल रो।
जिण सू तनरो सब ताप मिटै
दुःख द्वंद  हटै मन रा मलरो।
तव आनन सूं मन कानन में
चपला रो प्रकाश प्रति पलरो।
मन भावण  रुप रिझावण कामण छोड सुभाव अबै छलरो॥

सवैया दुर्मिल।

नरपतदान आवडदान आशिया वैतालिक कृत।

कीधौ तैं कोप साझियो

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

कीधौ तैं कोप साझियो कांनौ,रडमल नै दीधौ थै राज..
चारणबाडां तणीं चारणीं,लोक महीं तू राखै लाज..
वरपाडां धरपाडां वाली आभ जडां नाखै उपाड..
कोय न गांज सकै किनियाणी, झिंझणियाल तुहाला झाड..मेछां अपराधियां मारणी भला सेवगां आवै भाव..
करै करां छाया तूं करणी,गांजै कुण गढवाडा गांव..
बांका मेहासधू म बिसरै,संतट हरै सांभलै साद..
गढवाडां गढ. औलै गाजै,मढ रै औलै गढां म्रजाद॥


करणी वंदना का डिंगळ गीत बांकीदास जी आशिया कृत
जय श्री करणी...🙏🙏🙏🙏🙏

कविता ना व्यापार॥

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

🌺कविता🌺
कवि नांही छोटा बडा, रंक किंवा उमराव।
सबकी अपनी कल्पना, अपने अपने भाव॥1
कवि कवि होता है सखे! , क्या आला क्या तुच्छ।
अपनी अपनी पसंद से, गढता पुष्पित गुच्छ॥2
कविता मन की कल्पना, कल्पक की सुकूमार।
मंचौ की महिमा नही,
कविता ना व्यापार॥3

कविता केवल ना विषय, नहीं शब्द लय भाव।
जन जन की पीडा अनत, मन के गहरे घाव॥4
कविता इक संवेदना, मन की गहरी सोच।
वह उमडेगी चित्त मे, जब जब लगे खरोंच॥5
कवि न केवल जात इक , या ना व्यक्ति विशेष।
जिस का अंतस हो दुःखी, वह कविता दरवेस॥6

ना निषाद ने क्रोंच पर, ताना होता तीर।
कविता कैसे चीखती, रामायण बन वीर॥7

छंद नही लय भी नही, ना मुक्तक अतुकांत।
कविता कोलाहल कभी, कभी तथा वह शांत॥8
कविता नहीं वियोग है, कविता ना संयोग।
पीडा की संवेदना-अभिव्यक्ति का रोग॥9
कविता ना विग्यान है, ना दर्शन उपदेस।
कविता केवल दर्द है, बांटत कवि दरवेस॥10
वैतालिक

Rao GumanSingh Rao Gumansingh


सगती भगती अर संस्कृति रा कवि : सोहनदान सिंढायच रातड़िया

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

इण त्रिवेणी स्वरूप व्यक्तित्व रौ पूरौ वर्णन तो शायद कोई लेखनी नीं कर सके हैं । म्हाणी जांण पिछाण इण परिवार रां वारिश जालेन्द्र सा रातड़िया अर सोहनदान सा रा जमाई जगदीश सा बीठू सिंथल सूं होवण रो श्रेय इण वाटसेप मिडिया नै ही देवूला ।
सीजीआईएफ रे जोधपुर सेमीनार में पधारिया जदै जगसा म्हनै भी चार किताब पढण सारू दीनीं तो मैं घणौ राजी होयो । इणरौ कारण मुफ्त मे किताबां मिलणौ नीं होय न, ओ हो कि मै जिण सुमधुर आवाज री चिरजावां रोजीना सुणू वारे बारे में जाणन रो सुअवसर मिलियो हो ।
इण पोथी मांय राजस्थानी रां मोटा चावां अर ठावां विद्वान श्री आईदानसिह जी भाटी रो पैलो'ई लेख पढ'र मन तिरपत व्हैगों ।
धोल़ी वेल़ू धोरिया, चांदी ज्यू चमकेर ।
रातड़ल्यां रल़ियावणौ, बंको बीकानेर ।।
भांचलिया शाखा में सिंढायचां री मानीती खांप में किसनो जी जोगा मिनख हा अर बीकानेर रा दरबारी कवि हां । बीकानेर महाराज सूरसिह जी बांरी जोगताई अर काव्य शक्ति पर रीझकर वि सं. 1672 में रातड़ियो (रायथलया ) गांव इनायत करियों ।
चौखलै रातड़ियो चावो अण धरा रा सपूत श्री सोहनदान सा रो जलम रातड़िया मांय विक्रम संवत 1995 जेठ वदी चवदस रै दिन होयो । आपरा पिताजी श्री माधोदान जी भी नांमी कवि हा ।
मां रे बालपण में ही बिछोह पछी आप भुवासा रै देखरेख अर काव्य किलोल रे वातावरण में पल़या अर बड़ा व्हैया । श्री सोहनदान सा कवि हृदय रे साथै एक समाज सुधारक, दुर्वयसनों सूं दूर रेवण वाला, साधक , रोज जोत करणो, अंगे सादगी अर वांरी मूंछ दाढी री छटा भी निराली ही, जिण कारण आपने टीवी धारावाहिक -महाराणा प्रताप मांय राजकवि री भूमिका भी निभाई ।
सोहन सा री कवितावा मानवतावादी, भगती में नीति बतावण वाला, नारी पुरूष समानता रां समर्थक हा ।
कुछ पद सोहनदान सा के -
सोहन री सुण सांवरा, विनति बारम्बार ।
अबकी बेर उबारले, हरि भगतां हितकार ।। 1।।
सोहन इण जग में सुणी, हूं बड़ हूं बड़ हेक ।
'मैं' मांही सब मर गये, आगे हुये अनेक ।। 2।।
नार पुरुष नै नर जिको, समझे एक समान ।
ज्ञानी तापस साध सिद्ध, सारा मांय सुजान ।। 3।।
भगती राखे भाव, चरखो काते चाव सूं ।
उर में शील उच्छाव, राजस्थानी नारियां ।। 4।।
जीकारा लागे जबर, बोलण मीठा बोल ।
रूड़ी राजस्थान री, आ भाषा अणमोल ।। 5।।
सोहनदान सा रे नांम रे आगै स्वर्गीय लिखण रो मन नीं करै है इणरों कारण आज भी आपां आपरी बणायोड़ी रचनाओं अर चिरजाओं, आपरी ही'ज आवाज में रोजीना सूणो हो फिर ओं अमर नाम गूंज रियो हैं ।
सोहन सा रे आत्मज जालेन्द्र सा रै सपूती रै पांण ओ लिखित साहित्य पढण रो सुअवसर मिलियों । आपरै परिवार में बहन बेटियो सहित पूरे परिवार ने काव्य वरदान और विरासत में मिलियो हैं ।
इण पौथी में श्रीआईदानसिह जी भाटी, श्री भंवर पृथ्वीराज रतनु, डा प्रकाश अमरावत, डा शक्तिदान चारण "शक्तिसुत", जालेन्द्र सा , डा गुलाबसिह रतनु, श्री गिरधरदान रतनू दासोड़ी, श्री शक्तिप्रसन्न बीठू, श्रीमती ओमकंवर जी, श्री लक्षमणदान कविया खैण, श्री पवन पहाड़िया डेह ।
सभी रचनाऐ इस महान कवि सोहनदान सा रातड़िया के पूर्ण नहीं तो, कम से कम कृतित्व और लेखनीय व्यक्तित्व का सुंदर बखान करने में अवश्य सफल रही हैं ।
टंकण:-जगदीशदान कविया, राजाबन्ध (बिराई )