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राखी पथ मरजाद, सेवक इसरदास री।

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

हिरा वैरागर हुएं, चारण मारु देस।
भाट फिटक संखोटिया, कोहमी सकळ परवेश।।

जो न जळमतो जोगडो, तो कुण आ रीझ करंत।
मांगण मेढीं बैल ज्यूं, मूंडो बांध मरंत।।

जोगो किणी न जोग, सजोगो कियो सकव।
लाठा चारण लोग, तारण कुल सत्रियां तणौं।

नदी बहतों जाय, साद ज सांगरिएं दियो।
केजो म्हारी मांय ने, कवि ने देवे कांबळी।।

इसर री आवाज, सांगा जळ थळ सांभलै।
कांबळ दैवण काज, वैगो कर जळ वीस वयंण।।

सांगो गौड़ सिरै, थासू यदुनाथ ठाकरां।
इणरी रीस न थाय, दे उणरा देवळ चढै।।

दिनी रजा यदुनाथ, सांगा ने बाछां समेत।
राखी पथ मरजाद, सेवक इसरदास री।।

पूछो ना म्हे कितरा सोरा हां दादा

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

पूछो ना म्हे कितरा सोरा हां दादा।
निज भाषा बिना भोत दोरा हां दादा।।

कमावणो आप रो बतावणो दूजां रो।
परबस होयोड़ा ढिंढोरा हां दादा।।

अंतस में अळकत, है मोकळी बातां।
मनड़ै री मन में ई मोरां हां दादा।।

राज री भाषा अचपळी कूकर बोलां।
जूण अबोली सारी टोरां हां दादा।।

न्याव आडी भाषा ऊभी कूकर मांगां।
अन्याव आगै कद सैंजोरा हां दादा।।

ओम पुरोहित 'कागद'

आ मन री बात बता दादी

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

आ मन री बात बता दादी।
कुण करग्यो घात बता दादी।।

भाषा थारी लेग्या लूंठा।
कुण देग्या मात बता दादी।।

दिन तो काट लियो अणबोल्यां।
कद कटसी रात बता दादी।।

मामा है जद कंस समूळा।
कुण भरसी भात बता दादी।।

भींतां जब दुड़गी सगळी।
कठै टिकै छात बता दादी।।

ओम पुरोहित 'कागद'

शिक्षा का माध्यम बोली न हो

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

जोधपुर में मारवाड़ी बोली जाती है, कोटा में हाडोती, जयपुर में ढूंढाड़ी, पूर्वी राजस्थान में ब्रज, मेवात में मेवाती, मेवाड़ में मेवाड़ी, शेखावाटी में शेखावाटी, ऎसी स्थिति में राजस्थानी भाष्ाा किसे माना जाएगा और शिक्षा का माध्यम किसे बनाया जाएगा? कुछ ऎसे ही सवाल गुरूवार को आर्य समाज और नागरिक परिष्ाद् की ओर से वैदिक कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में आयोजित एक चर्चा मे उठाए गए।

इसमें राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस पानाचंद जैन ने कहा, राजस्थानी भाष्ाा को शिक्षा का माध्यम बनाना असंवैधानिक है, क्योंकि संविधान की 8वीं सूची में केवल अहिंदी भाष्ााओं को ही रखा जा सकता है न कि बोलियों या हिंदी भाष्ाा को जबकि राजस्थान में या तो हिंदी है या विभिन्न बोलियां।

राजस्थान की एकता के लिए और विभिन्न बोलियां बोलने वाले जन समुदाय को एक सूत्र में बांधने के लिए सर्व सम्मति से हिंदी को शिक्षा का माध्यम बनाया गया था। राजस्थानी को शिक्षा का माध्यम बनाने का विवाद खड़ा कर राजस्थान को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

पूर्व आईएएस अघिकारी सत्यनारायण सिंह का कहना था कि बोलियों के माध्यम से विश्व में कहीं भी कोई शिक्षा नहीं दी जाती है। केंद्रीय सेवाओं, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, बैंक आदि संस्थानों में हिंदी और अंग्रेजी जानने वाले लोगों को नौकरी दी जाती है। क्या बोलियों से प्राप्त ज्ञान के आधार पर राजस्थान की नई पीढ़ी को रोजगार मिल सकेगा? राजस्थान में हमेशा से शिक्षा और राजकाज की भाष्ाा हिंदी ही रही है, फिर आज इसे बदलने की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है।


आर्य प्रतिनिघि सभा के कार्यकारी प्रधान सत्यव्रत सामवेदी का मानना था कि प्रदेश में सभी प्रांत के लोग रहते हैं और सभी राष्ट्रभाष्ाा हिंदी तो समझते हैं लेकिन राजस्थान की बोलियों को नहीं। ऎसे में शिक्षा का माध्यम हिंदी से अलग किसी और भाष्ाा या बोली को कैसे बनाया जा सकता है।

शिक्षा मातृभासा में ही होनी चाहिए-ऒम नागर

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

बारह कोसां बोली पलटे, बनफल पलटे पाकाँ- अतुल कनक

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

स्वतंत्र भारत में शिक्षा को लेकर गठित हुए कमोबेश सभी आयोगों ने अपनी अपनी सिफारिशों में शुरूआती शिक्षा मातृभाषा में देने की बात कही है। अनिवार्य शिक्षा विधेयक ने एक बार फिर इस आवश्यकता को रेखांकित किया है। राजस्थान में मातृभाषा में शिक्षण का मुद्दा इसलिये विवादित हो चला है कि राजस्थानियों की मातृभाषा राजस्थानी को अभी तक संवैधानिक मान्यता नहीं मिली है। मान्यता के विरोधी राजस्थान की विविध बोलियों की स्वरूपगत विविधता को लेकर सवाल खड़ा कर रहे हैं कि जिस राजस्थानी का कोई मानक स्वरूप नहीं है, उसे यदि संवैधानिक मान्यता कैसे दी जानी चाहिये। आश्चर्यजनक बात यह है कि मानक स्वरूप का सवाल उस भाषा के लिये खड़ा किया जा रहा है, जिस भाषा की राजस्थान में अपनी एक अकादमी है, केन्द्रीय साहित्य अकादमी हर साल जिस भाषा में सृजनात्मक लेखन को देश की अन्य प्रमुख भाषाओं के साथ पुरस्कृत करती है, जिस भाषा को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर वैकल्पिक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है और देश -दुनिया के अनेक विश्वविद्यालयों में जिस भाषा में अध्ययन और शोधकार्य हो रहे हैं। स्पष्ट है कि मान्यता का विरोध दरअसल भाषा का विरोध नहीं, स्वार्थों का विरोध है।
राजनीतिक दृष्टि से हमारे दौर में यदि किसी व्यक्ति के कार्यालय को दुनिया का सर्वाधिक शक्ति संपन्न कार्यालय के बारे में चर्चा की जाये तो स्वाभाविक तौर पर अमरीकी राष्ट्रपति के कार्यालय का उल्लेख होगा। कुछ समय पहले जारी एक विज्ञप्ति में अमरीकी राष्ट्रपति के कार्यालय में मनोनयन के लिये जिन भाषाओं के ज्ञान को वरीयता देने की बात कही गई, उनमें राजस्थानी भी एक है। मूल विज्ञप्ति में राजस्थानी के लिये मारवाड़ी शब्द का उपयोग किया गया है। उल्लेखनीय है कि मारवाड़ी राजस्थानी भाषा की एक प्रमुख बोली है और मारवाड़ अंचल के व्यापारियों के व्यापक कारोबारी प्रभाव के कारण अक्सर राजस्थानी को मारवाड़ी कह दिया जाता है। मारवाड़ी के साथ ही ढूढाड़ी, वागड़ी, हाड़ौती, मेवाड़ी, मेवाती जैसी बोलियां अपनी तमाम उपबोलियों के साथ राजस्थानी के गौरव की संवाहक भी हैं, और पहचान भी। बोलियों के रूप में परिवर्तन के बारे में तो राजस्थानी में एक कहावत भी प्रचलित है- ‘बारह कोसां बोली पलटे, बनफल पलटे पाकाँ/ बरस छत्तीसा जोबन पलटे, लखण न पलटे लाखाँ ।’
अमरीकी राष्ट्रपति के कार्यालय ने राजस्थानी भाषा की क्षमता को मान्यता उस समय दी, जबकि राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की मांग अपने चरम पर है। हमारे संविधान निर्माताओं ने जन महत्व की भाषाओं को संवैधानिक मान्यता देने के लिये ही संविधान में आठवीं अनुसूची की व्यवस्था की है। लोकतंत्र की महत्ता इस बात में भी है कि वह जनता की आवाज़ को बुलंद करने वाली भाषाओं की ताकत को पहचानता भी है और स्वीकार भी करता है। लोकतंत्र ही क्या, दुनिया की हर राजनीतिक व्यवस्था में लोकभाषाओं की ताकत को स्वीकार किया जाता है। औपनिवेशिक शासनों में इसीलिये शासित राज्यों में शासक शासितों के भाषाई और सांस्कृतिक गौरव का अवमूल्यन करने की हर संभव कोशिश करते थे। इस संत्रास को भारत ने भी झेला है। औपनिवेशिक ताकतों की इसी साज़िश को पहचानते हुए खड़ी बोली के जनक माने जाने वाले भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने भारत के पहले स्वातंत्र्य संघर्ष के दिनों में ही लिखा था - निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल। अपनी भाषा की उन्नति ही सर्वतोमुखी उन्नति का आधार है।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने जब ‘निज भाषा ’ की बात की थी तो उनका मंतव्य भी यही था कि लोक अपनी ताकत को पहचाने। एक भाषा के तौर पर राजस्थानी लोक के प्रति अपने दायित्वों को आज भी बखूबी निभा रही है। व्हाइट हाउस की विज्ञप्ति में राजस्थानी को मान्यता इसका प्रमाण है। दरअसल यह विज्ञप्ति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान के निवासियों की योग्यता को भी रेखांकित करती है और एक सामर्थ्यवान भाषा के तौर पर राजस्थानी की क्षमता को भी । विसंगति यह है कि इसी राजस्थानी भाषा को भारत के ही संविधान की आठवीं सूची में शमिल किये जाने की मांग दशकों पुरानी होने के बावजूद आज तक पूरी नहीं हो सकी है। डा. कनहेया लाल सेठिया तो - खाली धड़ री कद हुवै, चैरे बिन पिछाण / मायड़ भासा रे बिना क्यां रो राजस्थान ’ कहते कहते ही हमेशा के लिये मौन हो गये। राजस्थान की संस्कृति के गौरव गायक सेठिया का यह दोहा राजस्थानी की मान्यता के संघर्ष का प्रतिनिधि बन गया है।
बेशक राजस्थानी में बोलीगत वैविध्य है, लेकिन यह विविधता ही भाषा को समृद्व करती है। कया हम में से कोई भी यह दावा कर सकता है कि वह हिन्दी के नाम पर जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहा है, वह हिन्दी के मानक स्वरूप की अनुगामिनी है। चेकोस्लोवाकिया के हिन्दी विद्वान डॉ. ओदोलन स्मेकल जब पहली बार भारत आये थे तो उन्होंने निराशापूर्वक कहा था कि मैं जिस भाषा को सीखकर यहाँ आया था, उसे सुनने के लिये तरस गया। दरअसल भाषाएँ तो एक नदी की तरह होती हैं। निरंतर प्रवाह उनके स्वरूप को परिवर्तित करता ही है। हिन्दी का मानक स्वरूप संस्कृत निष्ठ है लेकिन आज हिन्दी में अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी ही नहीं पुर्तगाली तक के शब्दों का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। भाषा की यह लोचशीलता ही उसे व्यापक बनाती है। आज भी अंग्रेजी के सर्वाधिक मान्य शब्दकोषों में एक ‘आक्सफोर्ड डिक्शनरी ’ में हर साल कुछ विदेशी भाषाओं के बहुप्रचलित शब्दों को शामिल किया जाता है। जहाँ तक राजस्थानी के मानक स्वरूप का सवाल है राजस्थानी के प्राचीन ग्रंथों की भाषा हमारे लिये अनुकरणीय हो सकती है। राजस्थानी का पहला उपन्यास कनक सुंदर करीब एक सौ दस साल पहले हैदराबाद से छपा था। उससे भी पहले सन् 1857 में बूँदी के राजकवि सूर्यमल्ल मिश्रण ने अपने साथियों को जो पत्र लिखे थे या फिर उससे भी करीब चार सदी पहले गागरौन के शिवदास गाडण ने ‘अचलदास खींची री वचनिका ’ नाम से जो पुस्तक लिखी थी, उन सबकी भाषाओं में अद्भुत साम्य है। इन सबने संबंध कारक का/के/की के स्थान पर रा/रे /री का और है/ था के स्थान पर छा/छै/ छी का प्रयोग किया है। बोलियों को समाज मुखलाघव के सिद्वांत के तौर पर इस्तेमाल करता है लेकिन इसे भाषा के मूल स्वरूप पर प्रश्नविन्ह के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिये। क्या मुंबई में बोली जाने वाली हिन्दी और पटना में बोली जाने वाली हिन्दी में कोई अंतर नहीं है? क्या किशोरवय लड़कियों में अत्यधिक लोकप्रिय रहे बार्बरा कार्टलैण्ड के उपन्यासों की अंग्रेजी भाषा को नीरद सी. चैधरी की क्लासिक अंग्रेजी के साथ रखा जा सकता है?
राशिद आरिफ का एक शेर है -‘‘ मेरी अल्लाह से बस इतनी दुआ है राशिद / मैं जो उर्दू में वसीअत लिखूँ, बेटा पढ़ ले। ’’ राजस्थान के करोड़ों राजस्थानी भाषी भी ऐसा ही कोई सपना संजोते हैं तो क्या यह उनका अधिकार नहीं है?
(पूर्व संचालिका सदस्य- राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति अकादमी, बीकानेर
प्रदेश मत्री:- अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति.38 ए 30, महावीर नगर-विस्तार,कोटा (राजस्थान)

World respect us, India don't

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

आखी दुनिया मानै कै राजस्थानी भासा इण धरती री सबसूं विशाळ साहित्यक भासा है. तमिल अर राजस्थानी दो भासा एड़ी है जिणनै अगर भारत मांय राष्ट्रभासा रौ दरजौ देरीजै तौ ईं कम है.राजस्थान रै तीन विद्यापिठां (Universities) जोधाणा, बिकाणा अर उदैपर मांय इणनै भणावै अर साथै साथै प्राईवेट इंस्टिट्यूट वाळा ईं भणावै.
राजस्थानी री भणाई आप अमेरीका, ब्रिटेन या रुस मांय कर सकौ.राजस्थानी भासा नै अमेरीका मांय ओफिसियल भासा (राजभासा) रौ दरजौ मिळ्यौड़ौ है साथै साथै संयुक्त राष्ट्र मांय ई इण भासा नै मानता है.

आप अमेरीका मांय राजस्थानी मांय अरजी दे सकौ या कोई काम काज करवा सकौ, पण राजस्थान सरकार या आपणी भारत सरकार एड़ौ करणीया नै देसद्रोही (हिंदी विरोधी) मानै अर एड़ा मिनख री अरजी ना मंजुर करिजै इण तर्क रै माथै कै इण भासा नै सांवैधानीक मान्यता कोनीं

आप संयुक्त राष्ट्रसंघ (United Nations) मांय राजस्थानी मांय बोल सकौ पण राजस्थान री विधान सभा मांय राजस्थानी बोलण सूं रोकीजै.कित्तौ बरदास्त करांला.. आपणां खुद रा नेता आपणी भासा बोलता संकौ करै.विरभुमी राजस्थान, जठै मरणै नै तैवार मानीजै उण धरती रै लोगां नै औ कांई व्है ग्यौ ??

क्यूं अठै रा लोगां रौ रगत पाणी बण ग्यौ ?

क्यूं राजस्थान रा विर सुरमा हिजड़ा बण ग्या ?

सोचो, कांई आपणौ भविष्य है... सब जागा अंधारौ इज अंधारौ देखीजै.

जै राजस्थान! जै राजस्थांनी!!

Hanvant Rajpurohit

Prambhik shiksha ka mul strot hi matrabhasha

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

राजस्थानी को सोवियत रूस ने समझा, हमने नहीं

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

Bhaskar News
जयपुर. राजस्थानी भाषा के गौरव और समृद्धि की अहमियत को सोवियत रूस जैसे बड़े देश तक ने समझा लेकिन हम नहीं समझ पाए। तत्कालीन सोवियत रूस के लेखक बोरिस आई क्लूयेव सहित कई विद्वानों ने 70 के दशक में राजस्थानी भाषा पर शोध कर इसके समग्र स्वरूप को मान्यता देने की वकालत की थी।

बोरिस ने राजस्थानी की विभिन्न बोलियों पर अपने शोध में कहा था कि राजस्थान में भाषा स्थिति इतनी जटिल नहीं है जितनी पहली बार में दिखाई देती है। इसके अलावा राजस्थानी भाषा की आंचलिक बोलियों के आधार पर राजस्थानी के स्वरूप को बिगाड़ने और इसमें विभेद पैदा करने की कोशिशों को भी गलत बताया है।

क्लूयेव ने स्वतंत्र भारत

जातीय तथा भाषाई समस्या विषय पर शोध शुरू किया तो राजस्थानी ने उन्हें बेहद प्रभावित किया। उन्होंने राजस्थान में संजाति—भाषायी प्रक्रियाएं शोध में साफ लिखा, राजस्थानी की विभिन्न बोलियों में से ज्यादातर एक ही बोली समूह की हैं। इन बोलियों की पुरानी साहित्यिक परंपराएं हैं। प्राचीन मरू भाषा से डिंगल के साहित्य और से अब तक राजस्थानी ने साहित्यिक भाषा के प्रमुख पड़ाव तय किए हैं।

1961 की भाषाई जनगणना के अनुसार राजस्थानी को अपनी मातृभाषा बताने वालों की संख्या 1.50 करोड़ थी। राजस्थानी बोलने वालों की राजस्थान के बाहर भी अच्छी खासी तादाद है। संख्या के हिसाब से राजस्थानी देश की 12वीं प्रमुख भाषा है और 1961 की जनगणना में भाषाई गणना के हिसाब से भारत की प्रमुख भाषाओं के कम में इसे 12वें पायदान पर रखा गया। इसमें राजस्थान में रहने वाले 80 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा राजस्थानी बताई गई है।

रूसी शोध में भी प्रमुख था मान्यता का मुद्दा

राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग का जिक्र रूसी विद्वान के शोध में भी था। राजस्थानी को 60 के दशक से राजभाषा की मान्यता देने की मांग उठाई जा रही है।

करणीसिंह ने लोकसभा में रखा था विधेयक

बीकानेर सांसद और पूर्व राजा करणीसिंह ने 1980 में राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए एक विधेयक लोकसभा में विचारार्थ रखा था। उस समय इस विधेयक पर बहस हुई और लोकसभा में यह 92 के विरुद्ध 38 मतों से गिर गया। तब से लेकर राजस्थानी को मान्यता का मुद्दा अभी अनिर्णीत ही है।

राजस्थानी ने लुभाया इन रूसी विद्वानों को

एल.वी. खोखोव : राजस्थान में प्रयुक्त हिंदी और राजस्थानी भाषाएं- सामाजिक तथा वैज्ञानिक अनुसंधान का अनुभव (शोध प्रबंध 1974, मास्को)।

लुई एसेले : भारत के चित्र 1977 (मास्को)

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

प्राथमिक शिक्षा मायड़भाषा में दिए जाने की मांग

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

राजस्थानी मोट्यार परिषद के कार्यकर्ताओं ने की मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मुलाकात। ज्ञापन सौंपा।
प्रदेश के शिक्षक संगठन भी हुए इस मसले पर सक्रिय।

जयपुर। महात्मा गांधी ने कहा था 'मातृभाषा मनुष्य के विकास के लिए उतनी ही स्वाभाविक है जितना छोटे बच्चे के शरीर के विकास के लिए मां का दूध। बच्चा अपना पहला पाठ अपनी मां से ही सीखता है। इसलिए मैं बच्चों के मानसिक विकास के लिए उन पर मां की भाषा को छोड़कर दूसरी कोई भाषा लादना मातृभूमि के प्रति पाप समझता हूं। मेरा यह विश्वास है कि राष्ट्र के जो बालक अपनी मातृभाषा के बजाय दूसरी भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं, वे आत्महत्या ही करते हैं।'

देश में ही नहीं दुनियाभर में गांधीजी के इन विचारों का सम्मान होता है और सब जगह मातृभाषाएं ही प्राथमिक शिक्षा का माध्यम है। मगर इसके विपरीत प्रदेश की गांधीवादी सरकार इस मसले पर मौन साधे हुए है। मंगलवार को शिक्षा संकुल में राज्य के शिक्षा अधिकारियों की बैठक लेने के लिए प्रस्थान करने से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से उनके निवास पर अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति की युवा शाखा राजस्थानी मोट्यार परिषद के एक शिष्टमंडल ने जयपुर देहात इकाई के जिला पाटवी बृजमोहन बैनीवाल की अगुवाई में भेंट की तथा इस आशय का ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में लिखा गया है कि अनिवार्य शिक्षा कानून में मायड़भाषा में प्राथमिक शिक्षा देने का प्रावधान है तथा इसी तरह त्रिगुण सेन समिति एवं यूएनओ की शिक्षा समितियों की रिपोर्टों के अनुसार पूरी दुनिया में प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा है। परन्तु राजस्थान इसका अपवाद है। यहां के बच्चों को अपने जन्म से लेकर स्कूल पहुंचने तक मायड़भाषा का जो ज्ञान होता है, वह स्कूल पहुंचने पर पीट-पीटकर छुड़वाया जाता है। जो कि मानवाधिकारों एवं प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। ज्ञापन में यह भी लिखा गया है कि प्राथमिक शिक्षा मायड़भाषा में नहीं होने से राजस्थान के बच्चों का स्वाभाविक विकास अवरुद्ध हो रहा है और बच्चे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटते जा रहे हैं।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने युवकों की पीठ थपथपाई तथा प्रसन्नता व्यक्त की कि युवा पीढ़ी अपनी मायड़भाषा व संस्कृति के प्रति जागरुकता का प्रदर्शन कर रही है। मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर गम्भीरता से विचार-विमर्श करने तथा राज्य सरकार की ओर से राजस्थानी भाषा व संस्कृति के सम्मान हेतु ठोस कदम उठाए जाने का आश्वासन दिया।
दूसरी ओर राज्य के शिक्षक संगठन भी मायड़भाषा के माध्यम से शिक्षा दिए जाने पर बल देने लगे हैं। राजस्थान शिक्षक संघ प्रगतिशील के प्रदेशाध्यक्ष हनुमान प्रसाद शर्मा ने मंगलवार को इस आशय का ज्ञापन मुख्यमंत्री को भेजा है। ज्ञापन में लिखा गया है कि राजस्थानी एक बहुत ही समृद्ध और विशाल समुदाय की मातृभाषा है तथा यह बड़ी विडम्बक स्थिति है कि आज राजस्थान का विद्यार्थी अपने ही प्रांत की गौरवशाली भाषा और संस्कृति के ज्ञान से अनभिज्ञ है। आजादी के पश्चात राजस्थान में शिक्षा के माध्यम के सम्बन्ध में जो गलत निर्णय हुआ उस गलती को सुधारने का अब एक सुनहरा अवसर आया है और राजस्थान की सरकार अगर गांधीजी के विचारों का तनिक भी सम्मान करती है तो प्रदेश में तत्काल मातृभाषा राजस्थानी के माध्यम से अनिवार्य शिक्षा का नियम लागू कर देना चाहिए।

प्रेषक :

डॉ. राजेन्द्र बारहठ, प्रदेश महामंत्री, अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति।
कानाबाती : 9829566084
सत्यनारायण सोनी, प्रदेश मंत्री, अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति।
कानाबाती : 9602412124

राज री मानता री बाट जोंवती राजस्थानी भासा!

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

भारतीय संसंद में 1963 अर 1967 में करीज्यै फोरबदळ मुजब भारत रौ संविधान देस री राज भासावां अर राज्य री राज भासावां नैं रास्ट्रभासावां सीकार करण रो फेसलो लेवे अर उण में किणी राज्य री आबादी रै कीं भाग में बोलीजण वाळी भासा रै वास्तै खास बंदोबस्त करै इण रै सागै ही भांत-भांत री अदालतां रै काम में बरतीजण वाळी भासावां रै बधापै रौ बन्दोबस्त भी करै। संविधान री आठवीं अनुसूचि में भिळयौड़ी भासावां है जिणा नैं ‘‘भारत री भासावां’’ कैर्इ्रजै। इणा में घणकरी भारत री बडी अर सैसूं लूठी जातियां री भासावां है, वांनै पैली ठौड़ दिरीजी है।

संसद में अंग्रेजी नैं आठवीं अनुसूचि में भेळण रै प्रस्ताव पर बोलतां तद रा भारत रा प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कैयो कै आपां रा संविधान लिखणियां ओ तै करतां घणी सूझ री ओळख कराई कै आठवी अनुसूचि में भिळयौड़ी सगळी भासावां नैं रास्ट्रभासावां मानणी चाईजै। (जवाहर लाल नेहरू रौ भासण, 1957-1963 (अंग्रेजी में), भाग-4 पांनावळी-53, 65)
रास्ट्रभासावां री आ परिभासा नीं तो राजनीतिक क्षेत्र अर नीं ही आम जन में घण चावी है। उतरादै भारत खासकर (राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेस, मघ्य प्रदेस अर बिहार) रा लोग हिन्दी नैं रास्ट्रभासा मानै, जदकै हिन्दी नैं हाल राज भासा रौ दरजौ मिल्योड़ौ है, रास्ट्रभासा रो नीं। घणकरा नेतावां अर भण्या-गुण्या लोगां नैं भी हाल आ निगै कोनी कै हिन्दी रौ संविधान मांय कांई दरजौ है? गैर हिन्दी राज्यावां वाळा हिन्दी नैं तो मानै इज कोनी क्यूंकै वांरै प्रदेसां में सगळो काम-काज वांरी भासावां में व्है अर अंग्रेजी रौ बरताव मोकळायत में करै। वां लोगां में आपू आप री मायड़ भासा रै प्रति घणौ हेत नैं चाव है।

आठवीं अनुसूचित में सामल भासावां नैं प्रादेषिक भासावां भी कैईजै क्यूंकै इणा मांय सूं घणकरी भासावां कैई राज्यावां री भासावां पण है। पण इण आठवीं अनुसूचि में संस्कृत भी भैळी है, जिण नैं भारत में साहित्यिक, सांस्कृतिक अर घार्मिक रीत-रिवाजां रौ खजानौ अर कैई भारतीय भासावां रै सारू सबदां रौ खजानौ भी मानीजै।
आठवीं अनुसूचि में सिंधी, कष्मीरी अर नेपाळी भी मिळयौड़ी है, जिणा में कष्मीरी री हालत घणी माड़ी है।
भारत रै संविधान में कष्मीरी भी भारत री एक रास्ट्रभासा है। पण इण रो दुरभाग देखो कै कष्मीर रै संविधान में उण नैं राज्य री राजभासा नीं मानीजी है। ध्यानजोग है कै भारत रा दूजा राज्यावां में कष्मीर री तरयां आप रो न्यारौ संविधान नीं है। कष्मीर री राजभासा उर्दु है, कष्मीरी नैं दूजी डोगरी, बल्ती, दरद, पहाड़ी, पंजाबी, लददाखी रै जोड़ अेक प्रादेषिक भासा रो दरजो मिल्यौड़ो है। (संदर्भ-कष्मीर रो संविधान, (अंग्रेजी में) पांनावळी-112) कैई लिखारां कष्मीरी नैं राजभासा रै रूप में मानता देवण री मांग करी ही पण कष्मीरी री हालत में कोई सुधार नीं आयो। आप रै घर में ही बापड़ी बणगी-कष्मीरी।
किणी भासा नैं संविधान री आठवीं अनुसूचि में भैळणौ फगत माण री बात कोनी। इण सूं विकास री नूंवी दीठ रा मारग खुलै अर उण रै काम-काज रौ बिगसाव चौगणौ व्है जावै। संघ सेवावां री परीक्षावां में फगत आठवीं अनुसूचि में भिळयौड़ी भासावां रो ई वपराव करयो जा सकै। इण भासा नैं बोलण वाळा नैं आछी तिणखा वाळी चाकर्यां मिलण में सबीस्तौ रेवै। भारत सरकार आठवीं अनुसूचि में भिळयौड़ी भासावां रै सैंजोड़ विकास सारू अेक खास समिति री थरपना कर राखी है। (हिन्दी अर संस्कृत नैं टाळ’र जिकी खास परिसदां रै हैठळ आवै)

बरसाऊ बजटां अर पांच बरसी योजनावां में इण भासावां रै बिगसाव सारू घणी लूंठी रकम खरच करीजै। छापाखाणा, सिनीमा उधोग अर रेडियो प्रसारण री अबखायां पर विचार करती वगत सैसूं जादा ध्यान इणी भासावां रै प्रकासणां, सिनिमा अर रेडियो प्रसारण कांनी दियौ जावै। आठवीं अनुसूचि में भिळयौड़ी भासावां में टाबरां सारू सांवठी पोथियां, साक्षरता अभियान सारू भणाई रा साधनां अर पढण वाळी पोथ्यां अर साहित्यिक कृतियां पर नैमसर पुरस्कार भी दिरीजै।

भासावां री इण सूचि रौ राजनीतिक फायदौ भी है। भारत रै संविधान रै अनुच्छेद 344 मुजब रास्ट्रपति कानीं सूं आठवीं अनुसूचि में भिळयौड़ी भासावां री अबखायां पर विचार करण सारू खास आयोग री नियुक्ति करीजै। दूजै सबदां में इण भासावां नैं दूजी भासावां री कूंत में खास अधिकार मिल्यौड़ा है। ठीक उणी भांत जिण भांत किणी राज्य री राज भासा री विधिक थापना रौ मतलब प्रषासनिक, विŸाीय अर बीजा अधिकार मिल्यौड़ा व्है। तथाकथित आदिवासी भासावां अेक न्यारै ही कङूम्बै रौ निर्माण करै। रास्ट्रपति रै अध्यादेष सूं जन जातियां री सूचि में भेळीजण वाळी कैई जातियां रै अेक कङूम्बै रै प्रतिनिधियां नैं राज री चाकरी अर ऊंची पोसाळां में भरती व्हैण अर संसद-विधान मंडला अर दूजी थरप्यौड़ी संस्थावां रै चुणाव में खास सुविधावां मिळै, जिकी संविधान में मंडयौड़ी है। पण इण सारू इण भासावां नैं प्रदेस सरकारां री मानता होवणी जरूरी है जिण सूं सरकारी अभिकरण इण भासावां में पोथ्यां छाप नैं वांनै प्राथमिक षिक्षा व्यवस्था में अर खास क्षेत्रा रै सरकारी काम काज में वपराव कर सकै।

उदाहरण सारू आसाम री जन जातीय भासावां री सूचि में 35 भासावां है पण राज्य सरकार ’’सरकारी पत्र-व्यवहार सारू फगत च्यार भासावां खासी, गारो, मीजो, अर मिकिर नैं ही मानता दे राखी है। उड़ीसा में 62 जन जातियां अर 25 आदिवासी भासावां है जिण में 12 भासावां नैं उण परीक्षावां री भासा सरूप मानता दे राखी है।
इण परीक्षावां में पास व्हैण वाळा राज रा चाकरां नैं पुरस्कार औरूं देवै। (संदर्भ- टाईम्स ऑफ इण्डिया, 27 जून, 1966) केन्द्र सरकार रा अभिकरण भी इणी मतै काम करै। 1966 में आधुनिक भारतीय भासावां रै बिगसाव नैं सैंजोड़ करण वाळा सार्वजनिक संगठणा नैं आर्थिक सायता देवण सारू अेक निरणै लिरीज्यौ हौ। ‘‘आधुनिक भारतीय भासावां ’’ में हिन्दी अर संस्कृत नैं टाळ आठवीं अनुसूचि में भिळयौड़ी सगळी भासावां अर ‘‘आदिवासी भासावां’’ रै सागै ‘‘मानता मिल्यौड़ी’’ दूजी भासावां आवै। सो किणी भासा नैं ‘‘मानता नीं देवण’’ रौ अरथ उण नैं सरकार रौ समर्थन कोनी। इण भांत री भासावां रै बिगसाव अर पांवडा पसारण री सगळी जम्मेवारी इण रै बोलणियां अर हेताळूवां रै कांधै पर ही आवै, जिका आप रै बूकियां रै पाण इण रौ जुगाड़ करै।

आ सागी गत ‘‘राजस्थानी भासा’’ री है, दूजै अरथ में इण लोकतंत्र में आ दादागिरी नैं लूंट है अर करोड़ू राजस्थानियां री भावनां रौ अपमान है। क्यूंकै देस रै हर भांत रै बिगसाव में राजस्थानी लोग आगे रैया है देस री समूची अर्थ व्यवस्था रौ घणकरौ भार राजस्थानी लोगां रै खांदै पर है। तद आ बात किŸाी जचती है? कै राजस्थानी लोगां री कमाई रौ हिस्सौ भारत रा दूजा प्रदेसां में कानून री आड में किण भांत लुंटाईज रैयौ है अर अठीनैं उणा रै खुद रै प्रदेस में वांरी मायड़ भासा राजस्थानी लारलै 63 बरसां सूं इण री बाट जो रैयी है। आखर सरकार कद सुणैली राजस्थानियां री आ दाद पुकार?
भारत में भासाई अबखायां रौ न्यावजोग नैम किणी हद तांई घणौ विरोधात्मक है। अेक कांनी भासाई विधि निर्माण रौ थंब जनतांत्रिक अर समानता रै अधिकार पर जोर देवै, तो दूजी कांनी राजस्थानी जिसी भासावां रै साथै इत्तौ अन्याव! राजस्थानी में अेक कैबत रै मुजब ठावा -ठावा नैं टोपियां अर बाकी रा नैं लंगोट! कठै है राजस्थानियां नैं समानता रौ अधिकार? भारतीय संविधान रै अनुच्छेद 29 में ओ प्रावधान है कै नागरिकां रै किणी घटक नैं जिण री आप री खास भासा, लिपि अर संस्कृति है उण री रिछपाळ रौ अधिकार व्हैसी। अनुच्छेद 29 रै खंड 2 अर अनुच्छेद 30 मांय पोसाळा में भासा रै आधार पर भेद नैं नाकस कर्यौ है। अनुच्छेद 35 में साफ कैईज्यौ है कै हरैक मिनख नैं किणी भी सिकायत रै निवेड़ै सारू संध या राज्य रै किणी भी अधिकारी या प्राधिकरण नैं संध में या राज्य में किणी भी सूरत में बरतीजण वाळी किणी भी भासा में अभियोग देवण रौ अधिकार है।

दूजी कांनी भांत भांत री भासावां नैं न्यारौ-न्यारौ दरजो देवणौ हकीकत में कैई भासावां सारू खास अधिकार व्हैणै अर दूजां रै सारू कमी नैं दरसावै अर आ भेद भाव री हालत कळै री मूळ जड़ है। लोकतांत्रिक दीठ सूं बण्यौ कोई भी भासा संस्कृति कानून दूजी भासावां नैं इण भांत री असमानता नैं ही थापित करै। ओ हळाहळी लोकतंत्र रौ मजाक है! अन्याव अर असमानता रौ छेकड़लो नाकौ है।

विनोद सारस्वत (बीकानेर)

भूंड री भागीदार बणती भारत सरकार!

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

भारत री सरकार राजस्थानी भासा नैं भारत रै संविधान री आठवीं अनुसूचि में नीं भेळ नै भूंड री भागीदार बणण रो कुजोग भोग रैयी है तो दूजी कांनी राजस्थान री अशोक गहलोत सरकार भी इण कांनी सूं मूंडो मोड़ लियो लागै अर राजस्थानी भासा, साहित्य, अर संस्कृति नै तळै बेठावण में कोई पाछ नीं राख रैयी है। जिण रो सैसूं लूंठो सबूत ओ है कै राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी रो सगळो काम ठप पड़यो है नै अठै सूं छपण वाळी मासिक पत्रिका जागती जोत लारलै डेड बरस सूं छपण री बाट जो रैयी है।

अठै नीं तो अध्यक्ष है अर नीं ही कार्य समिति अर सामान्य सभा। इण चक्कर में नीं तो नूंवी किताबां ही छप रैयी है नै नीं ही बरसाऊ दिरीजण वाळा पुरस्कार दिरीज रैया है। इण रो सालीणौ बजट इयां इज लाली लेखे लाग रैयो है जिण री नीं तो कदैई ऑडिट व्है अर नीं ही कोई पूछताछ। इण अकादमी में अबार आंधा पीसै नैं कुता खावै जिसी हालत हुयोड़ी है इण रो रांधण कुण खावै नैं कठै जावै? कोई बतावणियो कोनी मिले। अठै पांच कर्मचारी लागौड़ा है जिणा रै कनै कोई काम नी होवण सूं वै भी आप री हाजरी बजा नैं आप री तिणखा पक्की कर ले। कुण कद आवे, नैं कद जावे? किणी नैं किणी रो ठा कोनी।
राजस्थानी भासा री मानता री बात अबै गांव गळी सूं विधान सभा अर संसद तकात में गूंजे अर इण नैं लेय नैं समूचै भारत भर में बहस नैं चरचावां चाल रैयी है। लारलै दिनां मीडिया क्लब ऑफ इंडिया में भी इण नैं लेय’र सागीड़ी बहस व्ही जिण में सगळा लोगां मान्यो कै राजस्थानी भासा री मानता नैं घणा दिन रोक नैं नीं राखी जा सकै अर भारत री सरकार राजस्थानी भासा नैं मानता नीं देय नैं राजस्थानियां पर अन्याव कर रैयी है। इण बहस में सैसूं बडी बात आ निकळ नैं आयी कै हिन्दी राजस्थानी लोगां पर थरप्योड़ै एक नूंवै उपनिवेसवाद री भासा है अर राजस्थानी भासा नैं आप रो माण-संनमान नीं मिल्यो तो बो दिन अळगो कोनी जिण दिन राजस्थानी लोग हिन्दी रै विरोध में सड़कां पर आय नैं भारत रै इण उपनिवेसवाद रो विरोध करैला।

आपां रा लोग नैं उतरादे भारत रा घणकरा लोगां रै मन में ओ अेक कूड़ो बैम है कै हिन्दी ‘‘रास्ट्रभासा’’ है। इणी कड़ी में अेक बहस रो विसय हो-‘‘क्या हिन्दी राजभासा सै रास्ट्रभासा की ओर अग्रसर हो रही है या राजनीति ने इसे अपने मार्ग से भटका दिया है?’’ इण पर घणी लांबी चाली बहस में आ बात निकळ नैं आयी कै हिन्दी रास्ट्रभासा कदैई नीं बण सकै। क्यूंकै पैली बात तो आ दिखणादे भारत अर उतराद-पूरब रा परदेसां में कठैई किणी रूप में नीं वपराईजै। दूजी बात कै इण नैं मायड़ भासा रै रूप में बोलणिया कोई कोनी। तीजी बात भासा विज्ञान री दीठ सूं किणी भी कसौटी पर खरी नीं ऊतरे। चोथी बात इण में अेकरूपता री जाबक कमी है नैं आ खड़ी बोली रै सागै उर्दू री भेळप अर अरबी-फारसी रै मिश्रण सूं बणी अेक खिचड़ी भासा है जिकी बोल-बतळावण में तो काम आ सकै पण राज-काज नैं कोट-कचेड़ी री भासा नीं बण सकै।
छेकड़ में इण बहस रो नतीजो ओ निकळयो कै भारत सरकार नैं वैदिक भासा संस्कृत नैं रास्ट्रभासा रै रूप में मानता देवण री चेस्टा करणी चाईजै। क्यूंकै संस्कृत भासा सगळी भासावां री जणनी है अर इण रो कोई परदेस में विरोध नीं व्है सकै। इण रै सागै ही आ बात भी आई कै सरकार धर्मनिरपेक्षता री आड लेय’र इण नैं मानण सारू त्यार नीं हुवैला। सरकार त्यार हुवैला जद हुवैला पण ओ सवाल आज भी आप री ठौड़ पर खड़यो है कै इण देस री कोई एक तो रास्ट्रभासा व्हैणी चाईजै। इण में म्हारौ कोई बघार नीं है, जिण लोगां नैं इण बात रो पतियारो नी व्है, तो वै मीडिया क्लब ऑफ इण्डिया री वेबसाइट पर जाय नैं इण नैं परतख देख सकै।

मानता रै इण आंदोलन रै इतिहास में पैली वेळां हिन्दी जगत अर दूजा लोगां नैं ओ ठा पड़ियो कै राजस्थानी भासा नैं लेय’र कोई आंदोलन चाल रैयो है नैं राजस्थान रा लोग अलगाव रै मारग पर जा सकै। हिन्दी रा लोग आ मानण लागग्या कै राजस्थानी जिसी लूंठी भासा नैं बेगी सूं बेगी संवैधानिक मानता मिलणी चाईजै। ’’वैचारिकी’’ पत्रिका रै संपादकीय में छपी एक टीप निजर है। ’’राजस्थानी जैसी भासाओं को मान्यता मिलने से इनका समृद्ध साहित्य हिन्दी में से निकल जायेगा। निकल जाये तो निकल जाये कोई चारा नहीं है। हमें हिन्दी का इतिहास दुबारा लिखना लेना होगा। भले ही उन्नीसवीं सदी के उतरार्द्ध से ही सही।‘‘

दूजी कांनी राजस्थान रो संत समाज भी राजस्थानी भासा री मानता नैं लेय’र आप रा पाचिया टांग लिया है। म्है अठै उण दो राजस्थानी तोपां रो बखाण करणो जरूरी समझूं कै इण संता री वाणी री गूंज आखै भारत में ही नीं, देस-दुनियां में आप रो डंको बजा रैयी है। ऐक है जोधपुर रा जोध संत राधाकिशन जी महाराज अर दूजा रामस्नेही संप्रदाय रा रामप्रसाद जी महाराज। अठे दोवूं संत ‘‘नानी बाई रो मायरो’’ अर भागवत मायड़ भासा में बांच’र सीधा लोगां रै काळजे पर चोट करै। राधाकिशन जी महाराज तो हर ठौड़ आ बात केवै कै आप री भासा संस्कृति नैं मती छोडो।

कळकते री कथा में तो वां आदर जोग कन्हैयालाल जी सेठिया री अमर कविता ‘‘धरती धोरां री’’ सुणा’र इण बात नैं चोड़ै कर दी कै इण आंदोलन में संत समाज भी लारै कोनी। वै सरकार सूं आ खूली मांग करै कै राजस्थानी भासा जिकी करोड़ू लोगां री मायड़ भासा है, इण नैं क्यूं नीं मानता दो? इण रै सागै ही वै आ भी केवै कै इण रो सबूत चाईजै तो म्हारी इण संगत री पंगत में बैठा लोगां री गिणती करलो।

संता री इण दकाळ नैं राजस्थानियां री इण आस नैं भारत री सरकार कद तांई टाळती रेवैला? भारत री सरकार अर प्रदेस रा नेतावां नैं कद चेतौ आवैला? राजस्थान रा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत नैं पैलके अमरीका रै मांय राना रा लोगां फटकार लगाई जद वै राजस्थान री विधान सभा सूं राजस्थानी भासा री मानता रो प्रस्ताव पास करायो। ओ प्रस्ताव लारलै 7 बरसां सूं धूड़ चाट रैयो है। अबार तो देस में अर प्रदेस में वांरी पार्टी री इज सरकार है तद राजस्थान रा लूंठा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत किसी दूजी फटकार नैं उडीकै? राजस्थानी में ऐक केबत है कै गुड़ दियां ही मरै जद फिटकड़ी क्यूं देवै? राजस्थान रा लोगां गुड़ खवा-खवा नैं तो इण नेतावां नैं मोटा-ताजा कर दिया। अबै फिटकड़ी री आस में ओ फिटापो क्यूं करै?

विनोद सारस्वत,
बीकानेर

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

दिल्ली रै कुड़कै मांय फस्यौडा राजस्थान रा मिजळा नेता!

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

आज म्हनैं इण बात रौ पक्को पतियारौ व्हैग्यौ कै राजस्थानी भासा नैं रिगदोळणिया फगत इण प्रदेस रा ही वै मिजळा राजनेता है जिका वोटां री फसल तो इण भासा में काटै, पण विधायक अर मंत्री बणतां ही आप री औकात भूल जावै। कुल मिलाय नैं भारत रा नेतां राजस्थान रै नेतावां नैं जिण कुड़कै में फसा’र छोडग्या आज तकात वै उण कुड़कै सूं बारै निकळ नीं सक्या है। हिन्दी रा गंंुण गावणिया इण नेतावां रा पौत नैं इणा नैं कितोक ज्ञान है आज सगळौ चवड़ै आयग्यौ। आज रै भास्कर में छप्यै अेक समाचार मुजब राजस्थान रौ जूनौ ’िाक्षा मंत्री काळी चरण सर्राफ आ कैवै कै हिन्दी रास्ट्रभासा है! अबार रौ ’िाक्षा मंत्री मास्टर भंवरलाल आ कैवै कै हिन्दी राजस्थान री मातृ भासा है।

दूजै कांनी राजस्व मंत्री हेमाराम आप री न्यारी पूंपाड़ी बजावंता आ कैवै कै राजस्थानी भासा हरैक ठौड़ न्यारी-न्यारी बोली जावै। अबै इण कुमाणसा नैं आ कुण समझावै कै प्रकृति रौ नैम है कै 12 कोस पछै बोली बदळ जावै अर ओ नैम संसार री हरैक भासा पर लागू व्है। इण लोगां नैं ओ भी ज्ञान कोनी कै भासा अर बोली में कांई फरक व्है। भासा अर बोली मे फरक नी कर सकै वै गैलां में कांई घटै। जिण भांत अेक-अेक मिणियो जोड़ण सूं माळा बणै, उणी भांत कैई बोलियां रै पांण भासा बणै अर जद इण में साहित्य रौ सिरजण व्है वा भासा बण जावै। हिन्दी भासा में बोलचाल रा 97 पंजीकृत सरूप काम में लेईजै अर राजस्थानी में 73 सरूप काम मे लेईजै इणी भांत असमिया में 2, बंगला में 15, गुजराती में 27, कन्नड़ में 32, कोंकणी में 16, मलयालम में 14, मराठी में 65, तमिल में 22, तेलुगु में 36, उर्दू में 9 क’मीरी में में 5 नेपाळी में 4, संथाळी में 11, पंजाबी में 29, सिंधी में 8, बिहारी में 34, अे सगळा वां बोलियां रा न्यारा-न्यारा सरूप है अर इण बोलियां सूं अे भासावां बणीजी है। इण लोगां नैं राजस्थानी रै लूंठै साहित्य रौ अंगाई ज्ञान कोनी। आखी जगत बिरादरी इण भासा री धाक मानै।

राजस्थान री यूनिवर्सिटिया में तो इण रौ साहित्य पढाईजै ई है इण रै सागै ही अमरीका री सिकागो यूनिवर्सिटी में भी पढाईजै। अमरीका री ओबामा सरकार भी आप रै अठै इण भासा नैं मानता दे राखी है। आ तो वा भासा है जिण में मीरां मेड़तणी गिरधर गोपाळ नैं रिझायौ है, इणी भासा में भगवान करमा रौ खीचड़ौ खायौ है। इण भासा रौ बखाण कठै तांई करां इण रौ कोई पार कोनी। पण इण सूं ओ साफ लखाव व्है कै लारलै साठ बरसां सूं जिण हिन्दी माध्यम सूं अे नेता भण्या-गुण्या है वांरौ डोळ नै वारौ ज्ञान चवडै+ आयग्यौ है। इण प्रदेस रा नेतावां रौ ही ज्ञान जद इत्तौ ओछो नैं कंवळौ है तद सोचो कै इण प्रदेस में इण अधकिचरी भणाई में भण्या आम लोगां रौ ज्ञान कित्तौक बध्यौ हुसी। अे मिजळा नेता नीं चावै कै प्रदेस रा टाबर आप री उण वीर भासा में भणै, जिण रै रसपाण सू खागां खड़क उठै अर लोग बळती लाय में कूद पड़ै। जदि ओ हुंवतो तो आज आ विगत नीं होवंती, इण रोळ राज रा टप्पू कदै चकीज जांवता अर मायड़ भासा रौ अपमान भी नीं होंवतो अर लोग इण अन्याव नैं मून धार नैं नीं सैंवता। वै खागां लेय’र इण रोळ राज रै सांमी आ भिड़ता।

मतलब भारत रा राजनेतावां नूंवै उपनिवेसवाद री अेक भासा ’’हिन्दी’’ माडाणी अठै रा लोगां पर थरपदी। किणी भी संस्कृति नैं खतम करणी है तो अेक सीधो सो हथियार है कै उण री भासा नैं खतम कर दो, संस्कृति रा भट~टा मतोमत ही तळै बैठ जासी। राजस्थान रा राजनेता आप री चाल में कामयाब व्हैग्या। इण नेतावां री लूण हरामी रौ अेक नमूनौ निजर है- कै किण भांत इण लोगां हिन्दी रा पांवडा इण प्रदेस में पधरावण रा जतन करण सारू राजस्थान री जन गणना रा आंकड़ा में हिन्दी नैं पटराणी बणावण रा सगळा ं पड़पंच रच लिया। 1951 री जनगणना मुजब राजस्थानी भासा बोलणियां री संख्या 1,34,01,630 ही अर 1961 में राजस्थान री आबादी में 26 प्रति’ात रौ बधापौ व्हियौ पण राजस्थानी बोलणियां री संख्या में फगत 11 प्रति’ात रौ ही बधापौ दीखै। 1961 री जन गणना में राजस्थानी बोलणियां री संख्या 1,49,33,016 दिखाईजी है। इणी भांत आवण वाळी हरैक जन गणना मे राजस्थानी बोलणिया री संख्या नैंं अे बटटै खाते में नाखता थकां इण नैं हिन्दी रै खाते में खतावंता-खतावंता दिल्ली री इण आस नैं पूरी कर दी कै राजस्थान हिन्दी भासी प्रदे’ा है।

मतलब राजस्थान नैं दिल्ली रौ उप निवे’ा बणावण री सगळी जरूरतां पूरी करली जद ही तो राजस्थान रौ ’िाक्षा मंत्री कैवै कै राजस्थान री मातृ भासा हिन्दी है। इण भांत राजस्थान नैं अेक चरणोई बणा’र समूचै भारत रा गोघां नैं अठै चरण री खूली छूट मिलगी। राजस्थानी भासा नैं आठवीं अनुसूचि में भेळण री मांग बरसां सूं चालती रैयी है, अर राजस्थान री विधान सभा 2003 में अेक प्रस्ताव सरब सम्मति सूं पारित कर नैं भेज चुकी है ओ प्रस्ताव भी सरकार किण मजबूरी रै पांण पारित करवायौ आ बात जगचावी व्है चुकी है। राजस्थानी भासा आठवीं अनुसूचि में जद कदै भी भिळै, पण राजस्थान सरकार खुद कनैं इण भांत रा अधिकार है कै वा अेक रात में प्राथमिक ’िाक्षा रौ माध्यम राजस्थानी नैं बणा सकै। पण सरकार ओला रैयी है अर कोई नैं कोई नूंवौ विवाद खड़ो कर नैं इण मामला नैं Åंडै कुअै में न्हाखण सारू ताफड़ा तोड़ रैयी है। राजस्थान रा राजनेता आम जन री नीं सुण नैं वां अधिकारियां री सला पर काम कर रैया है जिका नीं चावै कै राजस्थानी अठै रै राजकाज अर ’िाक्षा री भासा बणै।

नेतावां खनै आप री सोचण-समझण री सगळी Åरमा खतम व्हैगी। वै तो उणी मारग पर चालै जिका वांरा पीअे अर सेकzेटरी बतावै। जिका सगळा लोग बारै रा है, कैई अेक राजस्थानी मूळ रा है भी तो वांरी कठैई चलै कोनी। अे नेता इण अधिकारियां रै हाथं री कठपुतलियां है, अे जिंया नचावै अै बिंया ई इज नाचै। फैर तो अठै रौ राम ही रूखाळौ है अर इण भासा में कीं तो इसौ है नैं आप री वा लूंठाई है कै अे मिजळा नेता अर वै बारला अधिकारी लाख फिटापणौ करलौ इण भासा री लूंठाई अर अमरता नैं कम नीं कर सकै।
विनोद सारस्वत,
बीकानेर

राजस्थानी को बचाना जरूरी

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

Bhaskar News
जयपुर. प्रदेश में प्राथमिक कक्षाओं में राजस्थानी को सरल भाषा के रूप में अपनाए जाने पर राज्य के मंत्री और पूर्व मंत्री सहमत हैं, लेकिन इससे पहले उनका जोर इस बात पर है कि पहले राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिले।
इन राजनेताओं का यह भी कहना है कि अलग-अलग क्षेत्र में राजस्थानी भाषा अलग-अलग लहजे में बोली जाएगी, इसलिए सरकार या राजनीतिक स्तर पर इस बात का निर्धारण हो कि राजस्थानी भाषा का स्वरूप क्या होगा। इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए राज्य सरकार केंद्र सरकार को संकल्प पारित कर भेज चुकी है।

कोटा संभाग से आने वाले ग्रामीण विकास मंत्री भरतसिंह की चिंता यह है कि उनके क्षेत्र के लोग मातृभाषा को ही भूलने लगे हैं और सामान्य बोलचाल में अंग्रेजी ने घर कर लिया है। पूर्व शिक्षा मंत्री कालीचरण सराफ राजस्थानी का पक्ष तो लेते हैं, लेकिन वे यह भी जोड़ते है कि वैश्वीकरण के दौर में सिर्फ राजस्थानी तक ही सिमटे रहना नहीं चाहते।

राजस्थानी को इसका असली मुकाम दिलाने के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है। केंद्र से मान्यता मिलने के बाद स्कूलों में इसे मातृभाषा के रूप में शामिल करने जैसी योजनाएं स्वत: ही पूरी हो जाएंगी।
- वासुदेव देवनानी, पूर्व शिक्षा राज्यमंत्री

राजस्थानी का विकास हो और मातृभाषा के रूप में इसको सम्मान मिले, लेकिन शिक्षा के माध्यम के रूप में इसे लागू कर पाना संभव नहीं है। वैश्विकरण के इस दौर में हमारे बच्चे पीछे रह जाएंगे, शिक्षा का माध्यम हिंदी ही सही है, जो हमारी राष्ट्रभाषा है।
- कालीचरण सराफ, पूर्व शिक्षा मंत्री

प्रदेश में हाड़ौती, मेवाड़ी, मारवाड़ी, ढूंढ़ाड़, वागड़ी, शेखावाटी, मेवाती और ब्रज बोली का क्षेत्र के अनुसार प्रचलन है। ऐसे में किसे राजस्थानी भाषा कहा जाएगा और इसके निर्धारण का क्या मापदंड होगा, यह तय हुए बिना इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। हिंदी और अंग्रेजी भाषा ऐसी है जिसे हर क्षेत्र का व्यक्ति सहजता से समझता है। मुझे तो इस बात का दुख है कि हाड़ौती के लोग ही हाड़ौती में बात करने के स्थान पर हिंदी या अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हैं।
- भरतसिंह, ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज मंत्री

हमारी भाषा को मान्यता दो

हम राजस्थानी को आगे बढ़ाने के पक्षधर हैं। यह संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल हो जाए तो सारे काम अपने आप हो जाएंगे।
-बी.डी. कल्ला, पूर्व शिक्षा मंत्री

बच्च मातृभाषा में ज्यादा सीखता है और पढ़ाई का माध्यम भी यही होना चाहिए। मेरे शिक्षा मंत्री रहते हुए प्रारंभिक शिक्षा में राजस्थानी को शामिल करने की मांग को लेकर एक बार प्रतिनिधिमंडल मिला था, इसके बाद कोई नहीं आया।
- घनश्याम तिवाड़ी, पूर्व शिक्षा मंत्री

अभी यह तय नहीं हो पाया है कि राजस्थानी भाषा किसे कहा जाए, क्योंकि हर क्षेत्र में अलग—अलग बोलियां हैं। मुख्यमंत्री और सरकार इस बारे में कोई निर्णय ले तो इसके बाद स्कूलों में लागू करने की बात आएगी।
- हेमाराम चौधरी, राजस्व मंत्री

हम तो अंग्रेजी, मायड़ में ही समझाते हैं'

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

Bhaskar Newsविभिन्न अंचलों से. प्रदेशभर के शिक्षक भी स्कूलों में प्रारंभिक स्तर से राजस्थानी पढ़ाए जाने के पक्ष में हैं। उनका कहना है कि आज भी अधिकतर गांवों की सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को शब्दों का अर्थ उनकी ही भाषा में समझाना पड़ता है। यदि राजस्थानी को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है तो बच्चे कठिन विषयों के बारे में भी सरलता से जानकारी हासिल कर सकते हैं।

शनिवार को दैनिक भास्कर के संवाददाताओं ने प्रदेश में स्कूल का दौरा कर वहां के शिक्षकों से बातचीत की जिसमें लगभग सभी ने स्कूलों में राजस्थानी विषय पढ़ाए जाने के पक्ष में राय व्यक्त की है। यह तथ्य भी सामने आया कि गांवों के मात्र पांच प्रतिशत स्कूली बच्चे ही हिन्दी में बातचीत करते हैं बाकी सभी राजस्थानी को ही बातचीत का माध्यम रखते हैं।

जयपुर के शहरी और ग्रामीण स्कूलों के शिक्षकों की यही राय रही कि राजस्थानी भाषा को स्कूलों से अलग नहीं किया जा सकता। बोलने और समझाने में जिस भाषा का सरलता से उपयोग होता है वही भाषा श्रेष्ठ मानी जाती है। आज भी प्राथमिक कक्षा के बच्चे जब समझने में अटक जाते हैं तो मातृभाषा का ही सहारा लेना पड़ता है। सरकार चाहे इस भाषा को लागू करे या न करे, हमें तो आगे भी इसका सहारा लेना ही पड़ेगा।

उदयपुर में शिक्षकों की राय थी कि बच्चों को हिंदी के मुकाबले अपनी भाषा में जल्दी समझ में आता है। कभी कभी कठिन शब्दों को समझाने के लिए यही उपाय काम आता है।

शिक्षकों का तर्क था कि जब दूसरे राज्यों में उनकी स्थानीय भाषा को मान्यता मिली हुई है तो राजस्थान इसमें पिछड़ा हुआ क्यों है?

कोटा के गुरुजनों का मत था कि अंग्रेजी और गणित विषय में कई शब्द बच्चों को समझ में नहीं आते, उस समय शिक्षक स्थानीय भाषा का ही सहारा लेते हैं। राजस्थानी भाषा में ही बच्चे प्राथमिक ज्ञान लेकर स्कूल में आते हैं, यहां आते ही उन्हें दूसरी भाषाओं का सामना करना पड़ता है। इससे अच्छा है कि उन्हें उनकी भाषा में ही ज्ञान मिले।

अजमेर के शिक्षक मानते हैं कि राजस्थानी के माध्यम से प्रारंभिक शिक्षा की नींव को मजबूत किया जा सकता है। बच्चों को आसानी से शिक्षा से जोड़ा जा सकता है और निरक्षरता को दूर किया जा सकता है। जोधपुर के शिक्षकों की राय भी राजस्थानी भाषा के पक्ष में रही।

बीकानेर की एक स्कूल में तो प्रत्यक्ष नजारा देखने को मिला जब अंग्रेजी की क्लास में शिक्षक ने बच्चों को अर्थ समझ में नहीं आने पर राजस्थानी में बताया तो सभी बच्चों की समझ में आ गया। इसके अलावा भी कई स्कूलों में राजस्थानी का सहारा लिया जा रहा था।

इस भाषा की जानकारी के अभाव में राजस्थानी इस ज्ञान के भंडार से वंचित रह जाते हैं। हकीकत यह है कि आपसी तालमेल और समझाइश का सहज और बेहतर माध्यम है। बच्चे स्कूल में हिंदी और राजस्थानी दोनो भाषा का इस्तेमाल करते हैं। यदि यह पाठ्यक्रम में हो तो उनकी समझ का दायरा बढ़ाया जा सकता है।

बीकानेर की एक स्कूल में तो प्रत्यक्ष नजारा देखने को मिला जब शिक्षक ने अंग्रेजी की क्लास में बच्चों को अर्थ समझ में नहीं आने पर राजस्थानी में बताया तो सभी बच्चों की समझ में आ गया। इसके अलावा भी कई स्कूलों में भी राजस्थानी का सहारा लिया जा रहा था। यहां के शिक्षकों का कहना है कि राजस्थानी घर— घर की भाषा है और यहां के लोगों के रोम रोम में रची बसी है।

सीकर के शिक्षक कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में राजस्थानी भाषा का अधिक प्रभाव है और बच्चे घर से राजस्थानी में ही सीखकर आते हैं। यहां भी उन्हें वैसा ही वातावरण मिले तो उचित रहता है।

श्रीगंगानगर में शिक्षकों का कहना है कि मातृभाषा में शिक्षा देने की व्यवस्था सरकार ने भले ही नहीं लागू की हो लेकिन हमारे ज्यादातर स्कूलों में व्यवहारिक रूप से राजस्थानी के माध्यम से ही पढ़ाया जाता है। बांसवाड़ा में शिक्षकों का मत था कि राजस्थानी भाषा को वागड़ भाषा के समन्वय से पढ़ाया जाए तो यहां के बच्चे अधिक आसानी से ग्रहण कर सकेंगे।

बच्चे आसानी से सीख जाते हैं स्थानीय बोली से

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

Bhaskar News
उदयपुर. स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई के दौरान हिंदी के मुकाबले स्थानीय बोली जल्दी समझ आती है। कई बार अंग्रेजी शब्दों को भी स्थानीय भाषा के माध्यम से सिखाना पड़ता है। पढ़ाई के दौरान शिक्षक स्थानीय (मेवाड़ी) भाषा का प्रयोग अधिक करते हैं। शनिवार को भास्कर संवाददाता ने शहर के प्रमुख सरकारी स्कूलों में जाकर हिन्दी और राजस्थानी भाषा के बारे में जाना तो यह सामने आया।

राजस्थान में राजस्थानी क्यों नहीं : पंडित खेमराज राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय की हिन्दी की शिक्षिका मंजु जैन ने कहा कि जब दूसरे राज्यों में उनकी स्थानीय भाषाओं को मान्यता मिली है तो राजस्थानी को क्यों नहीं? स्थानीय भाषा से बच्चों को अच्छे तरीके से समझाया जा सकता है।

बच्चों को सिखाना ज्यादा आसान : राजकीय विद्यालय मावली के हिंदी प्राध्यापक दुर्गेश भट्ट का कहना है कि ज्यादातर बच्चे स्थानीय भाषा में बोलचाल करते हैं। पढ़ाते समय उनकी भाषा में बेहतर तरीके से समझाया जा सकता है।

95 प्रतिशत बच्चे बोलते हैं घर की बोली : गरीब नवाज राजकीय विद्यालय की प्राचार्य पार्वती कोटिया का कहना है कि हिंदी सरल है, लेकिन स्थानीय भाषा में उन्हें बेहतर तरीके से पढ़ाया जा सकता है। 95 प्रतिशत बच्चे घर में बोली जाने वाली भाषा में बात करते हैं।

बच्चे सहजता से बोलते हैं स्थानीय भाषा : बिलोचिस्तान कॉलोनी स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय के डॉ. विवेक वशिष्ट का कहना है कि हिन्दी को हिन्दी भाषा में ही पढ़ाया जाता है, लेकिन बच्चों के स्थानीय भाषा में बोलने पर उन्हें हिन्दी में बोलने को कहा जाता है।
थे समझ ग्या बात नै, मतळब जद टाबर राजस्थानी मांय बोले तौ उणनै राजस्थानी बोलण सूं रोकिजै अर हिंदी बोलण वास्तै मजबुर करिजै, अगर वौ हिंदी नीं बोल सकै तौ फाईन, चार्ज या पनिस्मेंट मिळै. आ हालत है आपणी राजस्थान री आपणै राजस्थान मांय. कांई आपां आजाद हौ ??

खूंटे से बंधी गाय समझ जाती है, सरकार नहीं

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

नवनीत गुर्जर
त्वरित टिप्पणी. वो बच्चे का रोना, खिलखिला कर हंसना! मां का डांटना..फिर पुचकारना। ..और चूल्हे पर दूध में उफाण आते ही बच्चे को चारपाई पर पटक कर भागना..। इस पूरे वात्सल्य में बोलता कोई नहीं। न मां, न बच्च। लेकिन दोनों ही समझते हैं एक-दूसरे को। मन की भाषा को। मातृभाषा क्या है? यही तो है। जिसे अबोला बच्च समझता है। खूंटे से बंधी गायें जानती हैं। आखिर इस मर्म को सरकार क्यों नहीं समझती।

हो सकता है सरकार ही सही हो! क्योंकि उसमें बैठे मंत्रियों, अफसरों के कान तो राजस्थानी ही हैं, सुनने की क्षमता राजनीतिक। उन्हें वही बात सुनाई देती है, जो वे सुनना चाहते हैं। जैसे- सरकार बहुत अच्छे काम कर रही है। आपका ‘वो’ भाषण जोरदार था। हंसते वक्त आप बहुत अच्छे लगते हैं।..अरे!

एक बच्चे को हंसा कर तो देखिए। अपनी भाषा में। थारी-म्हारी राजस्थानी मं। पूरे जीवन की सुंदरता नजर आ जाएगी। ऐसा नहीं है कि कोई मंत्री राजस्थानी नहीं बोलता। सबके सब इसी भाषा में अपनापन पाते हैं। लेकिन मंच से नीचे। मंच पर चढ़ते ही भाषा बदल जाती है। हां! जब गांव-ढाणियों में वोट मांगने जाते हैं, तब ठेठ राजस्थानी बोलते हैं। ..फिर भी शिक्षा मंत्री कहते हैं- बच्चों को हिंदी में ही पढ़ाया जाना चाहिए। हैरत इस बात की है कि वे यह बात भी राजस्थानी में ही कहते हैं।

कितनी समृद्ध और मीठी है यह भाषा। इसके लोकगीत सर्वाधिक शास्त्रीय भी। उतने ही मीठे भी। इसका लहजा महाराणा प्रताप जितना बहादुर भी। पन्नाधाय जितना ममतामयी भी। इस सबके बावजूद अगर किसी राजस्थानी को अपनी मातृभाषा के लिए किसी सरकार से अनुनय-विनय करनी पड़े तो यकीनन उस सरकार को अपने बारे में सोचना चाहिए।

क्या होगी 90 लाख बच्चों की मातृभाषा

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

जयपुर. अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा कानून ने अब शिक्षाविदों और प्रदेशवासियों में नई बहस छेड़ दी है। कानून के एक प्रावधान में कहा गया है कि प्राथमिक कक्षाओं तक बच्चों को अनिवार्य रूप से मातृभाषा में पढ़ाना ही होगा।

इधर अभी तक राजस्थानी को संवौधानिक मंजूरी नहीं मिलने से पसोपेश की स्थिति पैदा हो रही है। ऐसे में प्रदेश के 90 लाख बच्चों की मातृभाषा को लेकर भी सवाल पैदा हो गया है। भाषा की मान्यता को लेकर शिक्षाविद एवं जनप्रतिनिधियों का एक तबका एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है।

अनिवार्य शिक्षा कानून के अनुच्छेद 29 में यह प्रावधान किया गया है कि बच्चों की समझ को आसान एवं प्रभावी बनाने के लिए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में पढ़ाना होगा। अपनी भाषा के इस्तेमाल से बच्च तनावरहित रहेगा साथ ही विचारों को आसानी से प्रकट कर सकता है। इससे बच्चे की आंतरिक क्षमताओं का सही मूल्यांकन और उसे मानसिक रूप से विकसित किए जाने में मदद मिलेगी।

फिलहाल प्रदेश में करीब 90 लाख बच्चे प्राथमिक कक्षाओं की पढ़ाई कर रहे हैं जबकि सालाना औसतन 15 लाख बच्चे सालाना नए जुड़ते हैं। इधर शिक्षा विभाग कानूनी प्रावधानों को लागू करने की योजना तैयारी में जुटा है। विभाग पाठ्यक्रम को ज्यादा से ज्यादा चाइल्ड फ्रैंडली बनाने की भी योजना तैयार कर रहा है।

इनका कहना है:

बच्चों के हक के साथ नहीं होना चाहिए खिलवाड़: राजस्थानी भाषा को 8 वीं अनुसूची में शामिल करने का मामला एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है। शिक्षाविदों एवं भाषा की वकालत करने वालों का कहना है कि बच्चों के हक के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए और पाठ्यक्रम को इस प्रकार बनाया जाना चाहिए कि बच्चों को अपनी मातृभाषा में शिक्षा मिल सके।

इनका कहना है:
यदि अनिवार्य शिक्षा कानून को प्रदेश में ईमानदारी से लागू करना है तो मातृभाषा को माध्यम बनाना ही होगा। त्रिगुण सेन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार प्रारंभिक शिक्षा में पहले नंबर पर मातृभाषा को रखना होगा। अगले दो चरणों में संपर्क भाषा के रूप में हिंदी या अंग्रेजी तथा वैकल्पिक भाषा के रूप में अन्य किसी भारतीय भाषा को समाहित किया जा सकता है।

-सी.पी. देवल, साहित्यकार

जब विधानसभा में जनप्रतिनिधि ही राजस्थानी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में अपनी बात रखते हैं तो बच्चों को राजस्थानी से कैसे दूर किया जा सकता है। हम बच्चों को अपनी भाषा ही नहीं सिखाएंगे तो यह अन्याय है। शिक्षा विभाग को चाहिए कि प्रावधान को तुरंत ही लागू करे।

-सूर्यकांता व्यास, विधायक, सूरसागर, जोधपुर

राजस्थानी हिंदी से भी पुरानी भाषा है। तो फिर इसे मान्यता क्यों नहीं?
- कृष्ण वृहस्पति, साहित्यकार

स्कूलों में ड्राप आउट की एक वजह बच्चों पर हिंदी और अंग्रेजी लादने का दबाव है। कई बच्चे महज इसलिए स्कूल नहीं जाते कि उन्हें क्षेत्रीय भाषा बोलने पर पाबंदी होती है। बच्चों के पास विकल्प होना चाहिए। कानून का नया प्रावधान बच्चों को स्कूलों की ओर से आकर्षित करने का माध्यम हो सकता है। सरकार को इसे नए शिक्षा सत्र से ही लागू करना चाहिए।
-अनिता भदेल, विधायक, अजमेर दक्षिण

क्रो, कौआ और कागला?

साहित्यकार सी.पी. देवल तर्क देते है कि राज्य के दूरदराज गांव के छोटे बच्चे के मानस पटल पर कौवे के लिए कागला शब्द अंकित रहता है। जब बच्च स्कूल जाता है तो शिक्षक कागला बोलने पर उसे बैंत दिखाता है। शिक्षक उसे ‘कौआ’ बताता है, कुछ दिन बाद यही कागला ‘क्रो’ हो जाता है। ऐसे में कई बच्चे पूरी तरह भ्रमित हो जाते हैं। स्कूल से आंखें मूंदने का एक बड़ा कारण यह भी रहता है।

सणफ, धरण, सूळ, रीळ —

चिकित्साविद डॉ. एस. जी. काबरा का कहना है कि ग्रामीण रोगी दर्द के लिए राजस्थानी भाषा में सणफ, धरण, सूÝ, रीÝ, बाइंठा जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इन्हें नहीं समझने से डॉक्टर बीमारी ठीक से समझ ही नहीं पाता। इससे मरीज का सही इलाज नहीं हो पाता। हालांकि जिस क्षेत्र में डॉक्टर ड्यूटी कर रहा है वह हालात देखते हुए धीरे धीरे स्थानीय भाषा सीख जाता है।

अनिवार्य शिक्षा के प्रावधानों को लागू करने के लिए कमेटी गठित कर दी गई है। बच्चों के लिए जो भी बेहतर होगा, कदम उठाया जाएगा। फिलहाल राज्य में हिंदी ही मातृभाषा है।
- मास्टर भंवरलाल, शिक्षामंत्री

राजस्थानी भाषा को साहित्य अकादमी की मान्यता है। 22 भारतीय भाषाओं के साथ इसे साहित्यिक मान्यता है। इसलिए बच्चों को पढ़ाने के लिए भी मान्यता दी जाने चाहिए।
- मोहन आलोक, साहित्यकार

टूटे बाजूडा री लूम लड़ उलझी उलझी जाए

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

टूटे बाजूडा री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
टूटे बाजूबंद री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
कोई पंचरंगी लहेरिया रो पल्लो लहेराए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए

टूटे बाजूडा री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
टूटे बाजूबंद री लूम लड़ उलझी उलझी जाए
कोई पंचरंगी लहेरिया रो पल्लो लहेराए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए

लागी प्यारी फुलवारी आतो झूम झूम जाए
ल्याई गोरी रो संदेशो घर आओ नी सजन
बैरी आंसुडा रो हार बिखर नही जाए
कोई चमकी री चुंदरी में सळ पड़ जाए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो नी बयारिया
झालो सहयो नही जाए
धीरे चालो नी बायरिया हौळे हालो री बयारिया
झालो सहयो नही जाए

हो बांगा माहे

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

शहर बाजार में जाइजो हो बना जी हो राज
पान मंगाय वो रंगतदार बनजी बांगा माहे
पांन खाय बनी सांभी सभी, बना हजी हो राजे
बनो खीचे बनी से हाथ .. हो बांगा माहे
हाव्यलड़ों मत खीचों बना जी हो राजे
रुपया लेस्सूँ सात हजार .... हो बांगा माहे
ऊधार फुझाब मैं नहीं करां हो राज
रुपया गिगलां सात हजार ... हो बांगा माहे
शहर बाजरां मती जाइजो हो राज
म्हांने परदेसी रो कांई रे विसवास .. हो बांगा माहे...

बैठूंगी मोटर कार में

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

चाहे बिक जाये हरियो रूमाळ
बैठूंगी मोटर कार में

चाहे सास बिको चाहे ससुर बिको
चाहे बिक जाये नणद छिनार
बैठूंगी मोटर कार में

चाहे देवर बिको चाहे देराणी बिको
चाहे बिक जाये सारा रूमाळ
बैठूंगी मोटर कार में

चाहे जेठ बिको चाहे जेठाणी बिको
चाहे बिक जाये हरियो रूमाळ
बैठूंगी मोटर कार में

चाहे बलम बिको चाहे सौंक बिको
चाहे बिक जाये सांस को लाल
बैठूंगी मोटर कार में

कैसरी कुंडै की मारी, भोजों बोल्यौं बस

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

एक गांव मे भोजा नाम रौ मिनख रैवतौ हौं। उणरी लुगाई रौ नाम केसरी हौ। कैसरी घणी लड़ाक ही। दोनूं आपरै घर सूं न्यारा रैवता हा। घर में वै सिरफ तीन मिनख हा। अेक टाबर भी हौ। रात दिन बात-बात में लड़ाई करणौ तौ केसरी रौ सौक हौ। भोजौ इण बात सूं घणौं कायौं व्हैतौ। वौ केसरी नै घणी समझाई। पग पकड़िया, हाथा-जोड़ी करी। उणरै मां-बाप सूं बात करी। छोरी री मां अर बाप उणनै समझाई। लाड़ेसर, अे थ्हारा धणी हैं। धणी भगवान समान व्है, इणरी सेवा करणौ थ्हारौ धरम हैं। पण केसरी नै किणी बात रौ फरक नीं पड़ियौं, वा तौ आपरी मरजी री मालकिन ही। साधु-मातमा कना सूं भी उपाय करवाया पण वा तौ लखणौ री लाड़गी ही। भोजा रा मां-बाप अर बहना उणनै आंख देवता ही नीं सुवाता। भौजों कितरी बार मरन री कोसिस करी, पण वा कैवती अबै यूं नीं करू ? म्हारी गलती व्हैगी। भौजौं घर सूं जावण री बात करतौ तौ वा मरण-मारण री धमकी देवती। कितरी बार कपड़ा में आग लगाय देवती। भाजा अर उणरा परिवार नै घणी भूंडी बोलती। रोज-रोज रा झगड़ा सूं कायौं व्हैनै भोजो सोचियौं कै अबै यूं नी चालैला। इणरी धमकिया सूं डरगियौ तौ म्हारौ जमारौ खराब व्है जावैला। औ विचार नै वौ केसरी सूं कह्यौं, म्हैं तौ जा रियो हूं, अबै थू अेकली रै सुख सूं। केसरी घणा ही नाटक करिया। भोजा थूं घर सूं ग्यौ तौ मर जाऊंला। मां-बाप तौ मुंडौ घालैला नीं। भौजौ इण बार अेक नीं सुंणी। जिण समै भौजौं घर छोड़ण री बात करी ही, वा आटौं गूंद री ही। वा कुंड़ौ उठायनै भोजा रै माथा माथै मार दियौं। बापड़ौ भौजौ वठै ही बैठ ग्यौ अर कह्यौं, बस कठी दूंजी जगै मत मार दीजै, म्है कठी ही नीं जाऊंला।
भोजै भजंगी मारी, कम्मर लीनी कस।
क्ेसरी कुंडै की मारी, भाजौ बौल्यों बस।

पण कैसरी नीं मानीं। इण बार वा माथा मंे वार करियौ अर भौजा रौ जीव निकलग्यौं। भौजौ मरियों तौ घणी पछताई, टाबर अनाथ व्यैगियौं। पण अबै की व्हैं। अबै उणनै नीं तौ घर वाला नीं पीर वाला मुंडौ घालता। क्यूंकि सगळा उणरा लखण जाणता। इण कहाणी सूं आ सीख मिलै कै घर में लड़ाई झगड़ा परिवार नै खराब कर दैवे। लुंगाई घर में लिछमी रौ रूप व्हैं, उणनै आपरी मर्यादा में रैवणौ चाहिजें।

ऊंदरा यूं काम आया हाथियां रै

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

एक ऊंदरा री नगरी हीं। उणमें घणा सारा ऊंदरा रैवता हा। वठै जगै-जगै उणरा घणा सारा बिल हां। एकर वठा सूं हाथियां रज्ञै झुंड पाणी पीवण सारू निकलियौ। ऊंदरा झुंड नै देखियौं तौ उणमें खलबली माचगी। अबै करै तौ कांई। इण पर सगळा विचारियौं कै हाथियां सूं बात करणी चाहिजे। ऊंदरा रौ सरदार हाथियां कनै गयौ अर हाथ जोड़नै अरज करी कै महाराज, औ ऊंदरां रौ मुलक हैं। अठैं ऊंदरा रां घणा सारा बिल हैं। आप राग अठै पडग्या तो हाहाकार मच जावैला। आप किरपा करनै दूजी जगा पधार जावौ। आपरी घणी किपरा व्हैला। हाथियां नै आ बात जचगी कै बापड़ा यूं ही मारियां जावैला। वै सिरदारा री बात मान नै दूजीं जगै सारू व्हिर व्हिया। इण पर ऊंदरां रो सरदार कह्यौ, महाराज आप घणी किरपा करी हौं। जद कदैई आपनै जरूरत पड़े, म्हानै जरूर याद करजौ। म्हैं जितरी व्है सकैला उतरी आपरी मदद जरूर करूंला।
ऊंदरां रै सरदार री बात सुण हाथियां नै हंसी आयगी। बापड़ा उंदरा म्हारी कांई मदद करैला। व्है हंसता-हंसता ही व्हिर व्हिया अर कह्यौं जरूर याद करांला। घणौं टेम निकलियौ। एक दिन सिकारी रै जाल सूं हार्थी एक मोटा खाड़ा रै मांय पड़ ग्या। खाड़ा में पड़णै सूं हार्थी रौ बल बेकार व्हैगियौ। घणी कोसिस करी पण सगळी बैकार गई। जद उणनै ऊंदरां रे सरदार री कयोड़ी बात याद आई। वौ उणी टैम सरदार नै याद करियौं। याद करता हीं ऊंदरां रौ सिरदार वठै पूंग गयौं। हार्थी री दसा देख वौ कह्यौं, महाराज, म्है आपरा थोड़ा और सार्थी लेय‘र आंऊ। म्हैं सगळा मिल नै आप नै निकाल देवाला। इण बार भी हार्थी हंसिया बिना नी रै सकियां। ऊंदरां रौ सिरदार गयौ अ‘र सगळी परजा नै वठै बुला ली।
सरदार रै आदेस रै मुजब सगळा वठै पहुंचिया अर खाड़ा में धूल भरण लागा। ऊंदरां रै पगा में इतरी धूड़ ही कै अंधेरौ पड़ ग्यौ। हाथी आपरा पगा सूं धूड़ सू खाड़ौ भरण लागौ। ज्यूं-ज्यूं धूड़ पड़ती री खाड़ौ भरतौ गयौ। थोड़ी दैर रै मांय ही खाड़ौ भर ग्यौ। हाथी बारै निकलग्यौ तौ आपरी सूंड में उठायर ऊंदरां रै सरदार ने आपरै गले लगायौ अर उणनै धन्यवाद दियौ। हार्थी नै आ बात समझ आयगी कै दुनिया में कोई छोटो नीं व्हिया करै। मुस्किल री घड़ी मंे कोई भी एक दूजा रौ साथ दे सके। हाथी आपरी नगरी अर ऊंदरां आपरी नगरी सारू व्हिर व्हिया।

कठै गमग्या है वै इतरा आखर

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

कठै गमग्या है वै इतरा आखर
गुनहगार गजला रा आखर हैं कुचमादी, श्रीमाली सुरगां सूं म्हारो गांव वालो है।
सळवटा मीटणी हैं, मूंडे जो समाज रे है, हाडी राणी वालों देश जग सूं रूखाळो है।
साहित्य सूरज बण, मेटणो है जड़ा मूल, जन मन व्यापो जो भी अंधकार काळो है।
साहित्य सूरज रामेश्वर री उड़ान देख, साचाणी लागै अबै बावनो हिमालो है।


-साहित्यकार रामेश्वरदयाल श्रीमाली को श्रद्धाजंलि स्वरूप भीनमाल में व्याखाता अरूण दवे ने ये पक्तियां लिखी। जिनमें श्रीमाली की सभी पुस्तकों के नाम शामिल हैं।
साहित्यकार रामेश्वर दयाल श्रीमाली के निधन पर साहित्य जगत और अन्य लोगों ने जताया शोक। कहा- श्रीमाली ने शुरू की थी राजस्थानी भाषा के लिए संघर्ष की यात्रा। अपने साहित्य की बदौलत दिलाया राजस्थानी को मान सम्मान। अंतिम संस्कार में उमड़े लोग।

कठीनै गमग्या है वै बावळा आखर
मूडां मायं सूं एक हरफ नीकलतो हो- देस
अर मूडां री माळा गूंथीजती ही च्यारूमेर
थमती ई कोनी हो माथा देवणिया रो रेळो
मां कैवतां ई जागतो हो नेह अर बलिदान
मुलक सारू मिटता ही माथा
लूळा साटै बिकता हा माथा
कठै गमग्या है वे आखर
असल उन्मादी अरथावाळा आखर।


अपनी राजस्थानी कविता कुचमादी आखर में ही लाईनों के माध्यम से समाज में आ रहे बदलाव, खत्म होते रिश्ते और भावनओं समेत अन्य समाप्त होती परंपराओं पर तीखी चोट करने वाले साहित्यकार रामेश्वर दयाल श्रीमाली बुधवार को पंचतत्व में विलीन हो गए। उनका मंगलवार शाम को निधन हो गया था। कुचमादी आखर नामक इस कविता संग्रह में उन्होंने बताया था कि अपनापन भरे और भावनाओं से ओतप्रोत आखर आज मिट गए हैं। श्रीमाली के निधन का समाचार सवेरे जैसे ही लोगों तक पहुंचा किसी को विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि एक दिन पहले तक ही लोगों ने उन्हें हमेशा की तरह उत्साह के साथ बात करते हुए देखा था।
सरलता और सादगी
सरलता और सादगी ही श्रीमाली की पहचान थी। उन्होंने लगभग तीन साल तक साहित्य की साधना की, लेकिन कभी भी निराशा और घमंड को अपने पर हावी नहीं होने दिया। साहित्य के क्षेत्र में भी राजस्थानी भाषा के लिए उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। ७६ वर्ष की आयु में भी वे अक्सर बाहर होने वाले साहित्य सम्मेलनों में भाग लेते और शेष समय घर पर बच्चों के साथ खेलकर और नवीन साहित्य सृजन में बिताते थे। साहित्य के माध्यम से उनका व्यंग्य तीखी चोट करता था।
साहित्यकार ही नहीं प्रेरक भी

जालोर में उनकी पहचान एक साहित्यकार के रूप में ही नहीं बल्कि वे कई युवा साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्रोत भी रहे। उन्होंने कई युवाओं को साहित्य सृजन के लिए तैयार किया और मार्गदर्शन भी दिया।

-उनका साहित्य मन पर चोट करता था। कविताओं की पक्तियां नया जोश भर देती थी। वे खुद ही साहित्य की साधना नहीं करते थे बल्कि अपने छोटे कई युवाओं को उन्होंने प्रेरित किया। जिनमें मैं भी शामिल हूं। उनकी प्रेरणा से ही मै साहित्य सृजन कर पाया। निराशा को उन्होंने कभी स्वयं पर हावी नहीं होने दिया। यही कारण था कि जब भी उनके पास जाते वे सदैव नए जोश से भरे हुए रहते थे।
-पुरुषोत्तम पोमल, साहित्यकार, जालोर
-उन्होंने साहित्य का जो सृजन शुरू किया वह उनके निधन तक अनवरत जारी रहा। पिछले तीन दशकों में मंैने उन्हें कभी ठहरा हुआ नहीं देखा। हमेशा वे चिंतन करते और कुछ ना कुछ लिखते रहते। समाज में व्याप्त बुराइयों के प्रति उनका दृष्टिïकोण व्यापक था। जिसे उन्होंने अपने साहित्य में भी उतारा। व्यंग्य भी किया तो इतना सटीक कि सीधा मन पर चोट करता।
-अचलेश्वर आनंद, साहित्यकार, जालोर
-राजस्थानी भाषा के लिए उनका योगदान सदैव याद किया जाएगा। इस भाषा में लिखी उनकी कई पुस्तकों का हिंदी और बंगाली में अनुवाद हुआ। राजस्थानी शब्दों का उन्होंने जिस प्रकार से उपयोग किया है उसके बाद उनका साहित्य लगातार पढऩे का मन करता है। साथ ही राजस्थान दिवस के दिन ही उनका मौन हो जाना एक संयोग ही है।
-अशोक दवे, जनसम्पर्ककर्मी, जालोर
-जीवन के सरोकारों से जुड़ी रचनाएं जुड़ी हुई थी। मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत थी। कविता और कहानी दोनों क्षेत्रों में आम व्यक्ति को पीड़ा और भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रदान की थी।
-अरूण दवे, व्याख्याता, जालोर
नम आंखो से किया विदा
श्रीमाली का अंतिम संस्कार सवेरे करीब साढ़े नौ बजे समाज के श्मशान घाट में किया गया। इससे पूर्व चामुंडा मंदिर के समीप स्थित उनके निवास से अंतिम यात्रा शुरू हुई। जो अस्पताल चौराहा, सूरजपोल होते हुए श्मशान घाट पहुंची। वहां उनके ज्येष्ठï पुत्र विश्वनाथ श्रीमाली ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान वरिष्ठï लेखाकार ईश्वरलाल शर्मा, साहित्यकार पुरूषोत्तम पोमल, बाबूभाई व्यास, अचलेश्वर आनंद, मधुसूदन व्यास, ऋषिकुमार दवे, भीनमाल से व्याखाता अरूण दवे और अशोक दवे समेत कई लोग मौजूद थे।