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पील ,मीठी पीमस्यां

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

पील ,मीठी पीमस्यां
खोखा, सांगर, बेर |
मरु धरा सु जूझता
खींप झोझरू कैर ||

जूझ जूझ इण माटी में
बन ग्या कई झुंझार ।
सिर निचे दे सोवता
बिन खोल्यां तरवार ॥

ऊँचा रावला कोटड़याँ
सिरदारां की पोळ |
बैठ्या सामां गरजता
मिनखां की रमझोळ ॥

मरुधर का बे मानवी
कतरा करां बखाण
सर देवण रे साट में
नहीं जाबा दी आण ||

चाँदण उजली रातडली,
सोना जेड़ी रेत् |
सज्या -धज्या टीबड़ा,
ज्यूँ सामेळ जनेत ||

ऊँडो मरू को पाणी है,
उणसु ऊंडी सोच ।
साल्ल रात्यूं आपजी न
जायोडा री मोच ||

चीतल, तीतर, गोयरा
छतरी ताण्या मोर |
मोड्यां कुहकु -कुहकु बोलती
दिन उगता की ठोड़ ||

बे नाडयाँ बे खालडया
बे नदयां का तीर |
सुरग भलेही ना मिले,
बी माटी मिले शरीर ॥

अज्ञात कवि

आइ श्री सोनल मा स्तुती(छंद -चचॅरी)

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

आपती शांती अपार कापती कलेशो कराल, जगहित उतम विचार नित नित करती
उन्नत सेवती आचार, पावन प्रगटती प्यार,शोधती संसार सार सदगुण धरती
माया छाया थी बहार,एना वाणी विचार, करीए स्वीकार हटे भवदुख भरती
सोनल शुभ देव सगती, मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती
सोरठ कच्छ गुजॅराय जातिजन जग हिताय पावन सुप्रवास थाय दिव्यानंद दरसे
मानव मेळा भराय शारद मंदिर स्थपाय संस्कृति स्थानक रचाय मंगल वरसे
भकित नीति भणाय,वेद धमॅ विचाराय काव्य शास्त्र तणी अमी सरणी निझॅरति
सोनल शुभ देव सगती मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती
आवी करवा उद्धार आवड फरी ने उदार खोडल प्रतिपाळ प्रसिद्ध वरवडी पधारी
करसे अज्ञान नाश पाथरसे नव प्रकाश दरस ज्ञान रवि उजाश धमॅ कमॅ धारी
वंदे "क्षेम"वारवार सोनल शरणे स्वीकार हे अमार जीवन गंगधार भागीरथ्थी
सोनल शुभ देव सगती मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती

《  कवि श्री खेमराज खेतदान गढवी //मोरारदान सुरताणीया 》

आइ श्री सोनल मा स्तुती(छंद -चचॅरी)

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

आपती शांती अपार कापती कलेशो कराल, जगहित उतम विचार नित नित करती
उन्नत सेवती आचार, पावन प्रगटती प्यार,शोधती संसार सार सदगुण धरती
माया छाया थी बहार,एना वाणी विचार, करीए स्वीकार हटे भवदुख भरती
सोनल शुभ देव सगती, मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती
सोरठ कच्छ गुजॅराय जातिजन जग हिताय पावन सुप्रवास थाय दिव्यानंद दरसे
मानव मेळा भराय शारद मंदिर स्थपाय संस्कृति स्थानक रचाय मंगल वरसे
भकित नीति भणाय,वेद धमॅ विचाराय काव्य शास्त्र तणी अमी सरणी निझॅरति
सोनल शुभ देव सगती मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती
आवी करवा उद्धार आवड फरी ने उदार खोडल प्रतिपाळ प्रसिद्ध वरवडी पधारी
करसे अज्ञान नाश पाथरसे नव प्रकाश दरस ज्ञान रवि उजाश धमॅ कमॅ धारी
वंदे "क्षेम"वारवार सोनल शरणे स्वीकार हे अमार जीवन गंगधार भागीरथ्थी
सोनल शुभ देव सगती मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती

《  कवि श्री खेमराज खेतदान गढवी //मोरारदान सुरताणीया 》

महाराणा प्रताप रौ जस

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

"उतर दियौ उदीयाण दिन पलट्यौ पल़टी दूणी।
पातल़ थंभ प्रमाण़ शैल गुफावा संचरीयौ।

मिल़ीयौ मैध मला़र मुगला री लशकर माय।
कलपै राज कुमार मैहला़ चालौ मावड़ी।

महल रजै महाराण कन्दरावा डैरा किया।
पौढण सैज पाखांण हिन्दुवां सुरज हालीया।

उलटीया एहलूर म़ाझल़ गल़ती रात रा ।
पछटयौ पालर् पुर गाडरीया झुकीया गिरा।

झंखड़ अकबर जाण़ राजन्द झुकीया गिरा।
पातल़ थम्भ प्रमाण इडग रयौ धर ऊपरां।।

गीत
रौवण लागा राज दुलारा, रल़कीयौ नीर रैवास।
वाव सपैटै दीप बुझायौ, उझमी जीवण आस।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।1।।

ब़ीज बल़ौबल़ जौर झबुकै, घौर माय घमसाण।
हिन्दुवौ सुरज डैरड़ै हाल्यौ, पौढ़वा सैज पाख़ाण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।2।।

बिलखती माता कैह विधाता, तै ही लिख्या तकदीर।
राजभवना रा आज रैवासी, फड़फडै़ जाण फकीर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।3।।
कंवर कंवरी कंध चढ़ाय, महाराणी समझाय् ।
आवै राणौसा तौ हालस्या अपै, महल़ पिछौलै माय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ, ।।4।।

मांगड़ै आवतौ मुन्छ मरौड़ै, वल़ीयौ पाछौ वीर।
आज मैहल़ा आजाद करावा, न लैवा अन्र नीर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।5।।
आवतौ माल़क सार अवैल़ौ हिसीयौ हैवन हार ।
सज वाहुणी लगा़म संभ़ाल़ै आवियौ पीठ अमीर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।6।।

चीरतौ पाण़ी घौड़ल़ौ चाल्यौ, कुदतौ थौहर कैर।
आंच आवै असवार ना तौ मारौ जीवणौ खारौ ज़ैर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।7।।

पाव घड़ी माय पुगीयौ पवन पिछौल़ै री पाल़।
पाव पख़ाल़ण काज़ पिछौल़ौ आवियौ लौप औवाल़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।8।।

कौयल़ा सारस कीर कबुतर पंखीड़ा घण़ प्रीत।
दैश धणी ना आवत़ौ दैख गुटकवा लागा गीत।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।9।।
रुखड़ल़ा पण दैख राणै ना अंजसीया हौय अधीर।
झुमती शाखा पगल़ा झुकी नैह त्रमंकयौ नीर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।10।।

वीर शीरौमण नांव मा बैठा पा़ण ग्रहै पतवार ।
पार पुगावण काज पिछौलौ धावीयौ गंगाधार।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।11।।

आवती नैया सार अवैल़ी ताणीया तीर कबाण।
भील़ण़ी जाय़ा शब्द भैदी जैरौ ना चुकै निश़ाण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।12।।

जवान बैटा ना संभता दैखै बौल़ीयौ ब़ुढ़ौ भ़ील़।
आज बैटा कुण बाग मां आयौ ईडग़ा तौड़ी ईल़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।13।।

आज क्या मारी आंख फरूखै अंग उमंग अनुप।
एहड़ै सुगनै भैट करावै अवस मैवाड़ौ भुप।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।14।।

बाप री बात़ा साम्भल़ै बैटा नाखीया तीर कब़ाण ।
दैश धणी रै दरसण़ा हैतू अंजसीया औस़ाण़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।15।।
आय् किनारै नावड़ी उभी भागीया सामा भील़।
चौखसी राणै तीर चढ़ायौ दैख उबाण़ा डील़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।16.।।

आपरा चाकर जा़णा़ै अन्रदाता माफ करौ शक मैट।
पातशाह रै पौहरै उभ़ा पाल़वा पापी पैट।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।। 17।।

माफ करौ माही बाप कै मा़झ़ी पांव पड़या अकुलात् ।
बाट जौवता मारा दिनड़ा बीता रौवता का़ल़ी रात्।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।18।।
कैकू पगल़ा कीच भराण़ा धौऊ नैण़ा जलधार्।
खाम़द़ा रौ दुख दैख खूपै मारै काल़जै बीच कटार्।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।19।।

आंखड़ीया भर आवीया आंसु बादल़ा ज्यू बरसात।
आज सौनै रौ सुरज उगौ हिवड़ल़ौ हरसात।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।। 20।।

रंक हैतालू बौलीयौ राणौ हाख मा थांमै हाथ।
बीती सौ ही बिसार दै वाल़ा पौर भयौ परभात् ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।21।।

आज कसौटी रंगत आणै सौलवौ सौन कहाय् ।
आज हु जैड़ै कारज आयौ मारौ कारज सिद्ध कराय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।22।।

नींद मा मुगल़ सैन निचींती और भयौ् अंधकार ।
प्रौल़ीया ऊभ़ा तीन पाराधी (पाराथी) काल़ीयौ किल्लैदार।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।23।।

चौर गुफा मां पुगीयौ च्यरौ उन्चल़ी मंझील आण़ ।
बारणै भ़ुखा सिंह बंधाड़ै सैज पौढीयौ सुल्ताण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।24।।

सिंह छैड़ा तौ शौर मचावै जाग अकबर जाय् ।
एक ताड़ी सुण़ फौज असंख्या प्राण हैरै पल़ माय् ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।25।।
दैश धणी ना दैख उद्द्यासी भीलड़ौ सौच भराय।
छैरूवा कानी बातड़ी छानी सानी मा समझाय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अ,कबर शाह ऊन्घाण़ौ।।26।।

जगत् सु बैटा एक दिन जावणौ खाटल़ी सुता खाय।
मात्रभुमी रै काज मरा तौ जीव वैकुटाय जाय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।27।।

बाप ना बैटा बैरवा बैठा मुखड़ा धारै मौन।
च्यार चीराल़ै कर न चाल्या चारवा सिहा चुण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।28।।

पंड कीधौ बलिदान पाराधी हंसतै कमल़ हाय।
मरतां वैल्या जनम मांगयौ दैश मैवाड़ै माय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।29।।

आंखड़ीया भर आविया आंसु राण भराणौ रीस।
अनवीया वाल़ी ईल तौड़ै न शिशौद नमायौ शीश।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।30।।

पैढ़लीया कर पार राणैजी सांभ लैही शमसैर।
हिन्दुवै सुरज हाथ उठायौ बाल्वा जुनौ बैर ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।31।।
एक अंतै माय आवियौ हिलौ कांप गई किरपाण ।
बिन बाकारयां मारणै सु मारौ दैश लाजै उदीयाण़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।32।।

राजपुती री रीत रुपाल़ी नींद मा सुतौ न धाय्।
सात पीड़ी रै शत्रु ना पैश पड़या बगसाय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।33।।

आंगली चिरै मांडीया आखर सामली भ़ीत सुजाण।
आखरी वैल़या आज अकबर दैवा जीवनदान ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।34।।

आज प्रभाता त्याग उदयपुर कूच करै कमठ़ाण़।
दुसरा मौका न दैवा हु थारै मांझल रौ मैहमाण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।35।।

रंग रै राणा रात थारी ना रंग जाती रजपुत।
रंग माता जकै गौद रंमाड़्यौ पातल़ जैड़ौ पूत।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।36।।
अवतरीया ईण धरती पर मौकल़ा वीर महान।
सुरमा री मरजाद सुणावै बारट भंवरदान ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।
अवतरीया ईण धरती पर मौकल़ा वीर महान।
सुरमा री मरजाद सुणावै बारट भंवरदान ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।37।

'खूबड़ माँ ' रा छप्पय

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

मह वरसे नही मेह, पड़े असमान धरा पर।
राह थके खगराज, अखे बलराजा उत्तर।
हेमगिर ऊनो हुवे, वके झूठो दुरवासा।
अत सितळ व्है अगन, प्रगट नह भाण प्रकासा।
सामंप्रत देख वहतो सगर, घबरावे वांगा घङा।
(तो)समरिया 'गँग'  अबखी समै,  बेल न आवे खुबङा।। १।।

जे नृप धू डग जाय, गणो डगमडे मेर गिर।
गोरख भुले गयान, ध्यान तप भुले जटधर।
खारो व्है दध खीर, दखो मीठो खारो दध।
जुजठल भाखे झुठ, वळे लखियो पलटे वध।
सैंस तज भार जावे सरक, धरती व्है उथल धङा।
समरिया 'गंग' अबखी समै, (जे) बेल न आवे खुबङा ॥२॥

जळनद तजे म्रजाद, प्रगट गंगेव तजे पण।
भीम तजे भाराथ,  जंग सर चुके अरजण।
करगां माठो करण,  जोओ गुडळो गंगजळ।
पंथ थके सपतास,  सुणे नही पाबु सावळ।
म्रगराज घास खावे मुदे,  मारे लाता मरगङा।
समरिया 'गंग'  अबखी समै, (जे)  बेल न आवे खुबङा।। ३।।

सत तज जावे सीत,  हुवे बळहीणो हङमत।
जहर सरप जाय,  जोओ छांङे लछमण जत।
गुणपत व्है बुधहीण,  उकत सुरसत न आवे।
भोजन न मिटे भूख,  भगति पहळाद न भावे।
श्रीराम बाण चुके संवर, खळ आसुर जुझे खङा।
(तो)  समरिया 'गंग'  अबखी समै, बेल न आवे खुबङा।। ४।।
..... क्रमश.....

गंगारामजी बोगसा 'सरवड़ी' कृत

छंद विर छप्पय

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

मां मोगल मछराळ.काळ बण दौता कौपे.
फाळ भरण फुंफाळ झाळ नफरा जण झौपे.
खाळ कहट खडगाळ.साळ चारण जे सौपे.
पाळ रिपूं पाताळ.ताळ धमकां हण तौपे.
बाळ बचाळ बचावणीं .टाळ नफट वखताळ.
जाळ कटण जोगा जपण.मां मोगल मछराळ.

ड़ंणके जब डाढाळ.गाळ गर गौहर गुज्जे.
चाळ भेळीया चमक.धमक पड धरणीं धुज्जे.
पाळ अहर बीच पठे.सठे नह मारग सुज्जे.
धाळ माळ धुंधाळ.जाळ कट रण में जुज्जे.
तांणत नह ममताळ तुं. वखत कठण विगताळ.
जांणत जौगो जोगणीं.मां मोगल मछराळ.

जोगीदान गढवी कृत

छंद विर छप्पय

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

मां मोगल मछराळ.काळ बण दौता कौपे.
फाळ भरण फुंफाळ झाळ नफरा जण झौपे.
खाळ कहट खडगाळ.साळ चारण जे सौपे.
पाळ रिपूं पाताळ.ताळ धमकां हण तौपे.
बाळ बचाळ बचावणीं .टाळ नफट वखताळ.
जाळ कटण जोगा जपण.मां मोगल मछराळ.

ड़ंणके जब डाढाळ.गाळ गर गौहर गुज्जे.
चाळ भेळीया चमक.धमक पड धरणीं धुज्जे.
पाळ अहर बीच पठे.सठे नह मारग सुज्जे.
धाळ माळ धुंधाळ.जाळ कट रण में जुज्जे.
तांणत नह ममताळ तुं. वखत कठण विगताळ.
जांणत जौगो जोगणीं.मां मोगल मछराळ.

जोगीदान गढवी कृत

सरदी लागै कोढ

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

.
सरदी लागै कोढ
===========
गरमी लागै सांतरी ,  सरदी लागै कोढ
छोड सियाळा मरुधरा , जाय हिमाळै पोढ ।।
गूदड़ दोरा सांभणां , सांभण दोरो कंत ।
सरदी थारै कारणैं ,  जूण डरै बेअंत ।।
घर में बड़ता पावणां , ताती मांगै चाय ।
ठोकै पोढ जमावणां , लुक्खा न आवै दाय ।।
न्हाणां धोणां छूटिया , बाळां धूणीं काठ ।
चेतै कद नित नेमड़ा , रोटी ठोकां आठ ।।
नित रा भावै गुलगला , रत्ती न भावै काम ।
इण सरदी रै मांयनैं   , कियां कुटावां चाम ।।
*
ओम पुरोहित कागद
24-दुर्गा कोलोनी
हनुमानगढ़ जंक्शन-335513

छन्द रेणकी- कवि कान जी गांगड़ा

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

मळया आय मिथिलापुरी , भूतळरा के भूप !!
गर्व सकळ रा गाळिया , राघव कुळरा रुप !!१!!
धनुष धरण जब तुं धस्यो , लौचन अरूण लिलाट !!
पद चंपत पगनेश , डग दीसा डणणाट !!२!!
          
डणणणणण दीस दिग्गज सह डणकत भणण खणण ब्रह्मांड भयो :
गणणणणण गहर गुहागिरी गणकत ठणण ठणण टंकार थयो :
कणणण लंक नृपाळ कणंकत गणण गणण शीर मुगट ग्रीयो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!१!!
कड़ड़ड़ड़ड़ व्योम गोम पड़ कड़कत अड़ड़ अड़ड़ समुदर उछळं :
थड़ड़ड धाम छोड़ खळ थड़कत धड़ड़ धड़ड़ धर नमत ढळं :
गड़ड़ड़ड़ चंद्र लोक लग गड़गड़ फड़ड़ फड़ड़ हय फांण फर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!२!!
कटकटकट सपट झपट फटफट थट खटखट झटपट उलट झटयो :
भटभटभट भटक भटक भय भटभट फटक फटक मनु व्योम फटयो :
घट घट घट अमट अर्यां गभरावट हटहटहट खळदळ हहर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!३!!
झक झक झक नमक रमक झणकारव दमक चमक हर ध्यांन खुले :
छकछक मद अछक अछक्के तक तक भटक भटक भट खटक भूले : हकबकहिय सठक गठकटक नाटक फटक फटक थक थक फफर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!४!!
खळभळ अळ प्रबळ प्रबळ तळ पातळ खळखळ कळ बळ अकळ खसे :
डळडळडळ डळत ढळत भुदरसर तळतळ थळथळ सभड़ त्रसे :
झळ झळ झळ झळकझळक कर झळकत खळकखळक सुर कुसुम खर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!५!!
सगवगनग अडगअडग चगचगचग जगजगजग रणंकार जग्यो :
टगटगटग टगर मगर खगखगखग छगछग रग पग अछग छग्यो :
फगफगफग विलग विलग मगडगडग नगनग भग सुरराज नर्यो : धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!६!!
खररर अपर अपरं वरधर पर पर धरधर पर अमर पर्यो :
झररर सरर सरर झट झांझर सुरपर परहर सकर सर्यो:
कर कर कर जयति कौशीककर धर धर हर धनु सधर धर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!७!!
सत सत कृत अमत श्रवत दशरथ सत रजत रजत सुर प्रमुद रह्यो :
ध्रत ध्रत ततकाल हारगल सीतरत गत मत रत गुर चरन ग्रह्यो :
क्रत क्रत अत कांन दांन नीज क्रत दत भजत भजत भव पार कर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!८!!
              कळस छन्द छप्पैया
धर्यो धनुष रणधीर , वीस्मय घणा विदार्या :
धर्यो धनुष रणधीर , ताप मुनि गणरा टाळ्या :
धर्यो धनुष रणधीर लंक रोळण खग लीधो :
धर्यो धनुष रणधीर , काज अमारो वड कीधो :
धर्यो धनुष ब्रह्मांडधर ,धरण भार भूवरो हसी :
चित वृथा कान सुरभिय चहे चण सारूं लेवा असी !!१!!

वढियार धरा के रत्न कवि कान गांगड़ा कृत छन्द रेणकी :- प्रेषित मीठा मीर डभाल

जगदंब मोगल जे भणी

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

छंद=सारसी
ओखा धरे,नवलख फरे,गरबो धरे,मथ्थ उपरे.
नवरात रे,नवला परे,जडहड जरे,ज्योतु फरे.
आनंद रंगे,बव उमंगे,शक्त संगे,लइ घणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी.
    जगदंब मोगल जे भणी. (1)

सणगार सोळा,कयरा बोळा,पाय तोळा,शेष ना.
प्रक्रत अजोळा,वणे चोळा,बाइ तोळा,वेष ना.
बाजुयबंधा,नाग संधा,चडे कंधा,लट बणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (2)

वादळ अषाढा,थीया बाढा,बने गाढा,भेळीया.
विजडी प्रगाढा,कोर काढा,जबक जाढा,रेळीया.
नवलख जडुके तारला विजडी कडुके जो घणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (3)

लडवडे माळा,हिम पहाळा,त्रेण गाळा,कंठडे.
हुंफे हुफाळा,गळे थाळा,हिम वाळा,थे लडे.
हिम ओगडी ता जळ ढोळी,पद पखोळी गंगणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (4)

सुर चंद नयना,तपे कयना,आभ अयना,जडहडे.
दो दश मयना,नेण बयना,वक्र लयना,चडवडे.
बारेय राशी,मुख हाशी,ग्रह ग्रासी,ते तणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (5)

नवसौ नवाणा,नदी ताणा,गाय गाणा,खडखडी.
समंदर तमाणा,बिरद बाणा,बव वखाणा,फिणफडी.
डमरु डंमके,भु धंमके,गौ हंमके,रव रणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (6)

विंझणा तोळे,पवन ढोळे,वा हिलोळे,वारणा.
तुम्मरा होडे,वयडा टोळे,नाद घोळे,चारणा.
समंदर वजाडे,ढोल ढाळे,गडगड गाळे,धोरणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (7)

भेरव भेळो,करे केळो,वडो मेळो,जोगणी.
ब्रह्मांड बेळो,मथ्थे तेळो,निर्मळ नेळो,जो गणी.
सारसी छंदे,विज वंदे,जयो अंबे,तुं धणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी.
       जगदंब मोगल जे भणी. (8)

- चारण कवि विजयभा हरदासभा बाटी
ध्रांगध्रां

आल्हा एकादसी

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

मगरा धौरा भाखरा,घलिया घण घमसांण।
साखी कोट'र कांगरा,नमै आज अणजांण॥१॥
सुरसती सदा सरसती,हाकड़ौ कैवे हाल।
माडधरा आ मुलकती,अंतस रेत उलाल॥२॥
वीरा राखी वीरता,सूरा राखी शांण।
संतां राखी सांच री,जस जौगे जैसाण॥३॥
कुल री राखण कीरती,मही रौ राखण मांण।
आलै जंज उजालियौ,भाटी कुल रौ भांण।४॥
पौड़ भून्गरे पटकता,गूंज्यौ गढ़ गौहराण।
पीर मौडिये पाड़िया,पिरथी घणा पठाण॥५॥
छत्र धारियौ सूरमा,अनमी राखण आंण।
भली'ज राखी भांणसी,ईशाल धर एहनाण॥६॥
छत्रालै छत्र धारियौ,जबर जुन्झियौ जंग।
धर ईशाली धधकती,रंग आल्हसी रंग॥७॥
हिरदै नैण समाविया,धड़ बिच करतै दौड़।
आलोजी जंग जुन्झियौ,हरावली कर हौड़ ॥८॥
मालदे मन मोदियौ,जंज  दिखाई      जंग ।
तूटो सर धड़ जुन्झियौ,रंग आलहसी रंग॥९॥
साको कियौ सुहावणौ,जंज जुन्झकर जंग।
भाटी कुल रै  भांण  नै,दीनौ  रावल रंग ॥१०॥
कविवर 'मेन्दर' किरती,जस  गावै     जजमान ।
जुन्झिया सर बिण जगत में,रंगीलै रजथान ॥११॥

  - महेन्द्रसिह   सिसोदिया(छायण)

आल्हा एकादसी

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

मगरा धौरा भाखरा,घलिया घण घमसांण।
साखी कोट'र कांगरा,नमै आज अणजांण॥१॥
सुरसती सदा सरसती,हाकड़ौ कैवे हाल।
माडधरा आ मुलकती,अंतस रेत उलाल॥२॥
वीरा राखी वीरता,सूरा राखी शांण।
संतां राखी सांच री,जस जौगे जैसाण॥३॥
कुल री राखण कीरती,मही रौ राखण मांण।
आलै जंज उजालियौ,भाटी कुल रौ भांण।४॥
पौड़ भून्गरे पटकता,गूंज्यौ गढ़ गौहराण।
पीर मौडिये पाड़िया,पिरथी घणा पठाण॥५॥
छत्र धारियौ सूरमा,अनमी राखण आंण।
भली'ज राखी भांणसी,ईशाल धर एहनाण॥६॥
छत्रालै छत्र धारियौ,जबर जुन्झियौ जंग।
धर ईशाली धधकती,रंग आल्हसी रंग॥७॥
हिरदै नैण समाविया,धड़ बिच करतै दौड़।
आलोजी जंग जुन्झियौ,हरावली कर हौड़ ॥८॥
मालदे मन मोदियौ,जंज  दिखाई      जंग ।
तूटो सर धड़ जुन्झियौ,रंग आलहसी रंग॥९॥
साको कियौ सुहावणौ,जंज जुन्झकर जंग।
भाटी कुल रै  भांण  नै,दीनौ  रावल रंग ॥१०॥
कविवर 'मेन्दर' किरती,जस  गावै     जजमान ।
जुन्झिया सर बिण जगत में,रंगीलै रजथान ॥११॥

  - महेन्द्रसिह   सिसोदिया(छायण)

आल्हा एकादसी

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

मगरा धौरा भाखरा,घलिया घण घमसांण।
साखी कोट'र कांगरा,नमै आज अणजांण॥१॥
सुरसती सदा सरसती,हाकड़ौ कैवे हाल।
माडधरा आ मुलकती,अंतस रेत उलाल॥२॥
वीरा राखी वीरता,सूरा राखी शांण।
संतां राखी सांच री,जस जौगे जैसाण॥३॥
कुल री राखण कीरती,मही रौ राखण मांण।
आलै जंज उजालियौ,भाटी कुल रौ भांण।४॥
पौड़ भून्गरे पटकता,गूंज्यौ गढ़ गौहराण।
पीर मौडिये पाड़िया,पिरथी घणा पठाण॥५॥
छत्र धारियौ सूरमा,अनमी राखण आंण।
भली'ज राखी भांणसी,ईशाल धर एहनाण॥६॥
छत्रालै छत्र धारियौ,जबर जुन्झियौ जंग।
धर ईशाली धधकती,रंग आल्हसी रंग॥७॥
हिरदै नैण समाविया,धड़ बिच करतै दौड़।
आलोजी जंग जुन्झियौ,हरावली कर हौड़ ॥८॥
मालदे मन मोदियौ,जंज  दिखाई      जंग ।
तूटो सर धड़ जुन्झियौ,रंग आलहसी रंग॥९॥
साको कियौ सुहावणौ,जंज जुन्झकर जंग।
भाटी कुल रै  भांण  नै,दीनौ  रावल रंग ॥१०॥
कविवर 'मेन्दर' किरती,जस  गावै     जजमान ।
जुन्झिया सर बिण जगत में,रंगीलै रजथान ॥११॥

  - महेन्द्रसिह   सिसोदिया(छायण)

मर्यादा पुरूषोतम प्रभू श्रीरामचन्द्रजी रा दोहा :-

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

कर हेत झाली कलम ने , धरे सरसती ध्यान !!
महर कर शारद मीर ने , सदबुध दिजो शान !!१!!
गिरिजा सतन गुणेश को , मनसूं लेऊं मनाय !!
कारज पुरण किजीयो , ऊमासुत झट्ट आय !!२!!
सब देवन की शरण में , म्हें अब नमावूं माथ !!
गुण रामरा गावस्यूं , सबेही रहीजो साथ !!३!!
मनउजळ दशरथ महपति , रघुकुळ अनमी रूप !!
परम न्याय नीति प्रिय , भलपण वंकोज भूप !!४!!
राजा रे त्रय रांणीयां , कौशल्या प्रथम कहाय !!
केकई सुमित्रा कांमणी , भूपत रे मन भाय !!५!!
जनम धरेया जद जगत में , लायक च्यारूं लाल !!
मन हरखावे मेदनी , त्रंबागळ वाजेया ताल !!६!!
गीत राग शुभ गावणो , अवध घणो उछरंग !!
वाजा छत्रीसे वाजिया , सुर ताल लय संग !!७!!
दशरथ रा दरबार में , गावे ज गायक गीत !!
दान मान सब देवणो , राज तणी आ रीत !!८!!
तिण पळ विप्र तेड़ावियो , दन चढते घटी दोय !!
पांचे ही अंग पंचांग रा , जोशी विध कर जोय !!९!!
जोशी पोथी जोवतां , हरख वधे मन हेत !!
दशरथ छोळ दरियाव ज्यूं , दान प्रगळो देत !!१०!!
मीठा मीर डभाल

केसरिया बालम

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

केसरीया बालम कहूं, किणनें मन री पीर।
बांस विरह रो रुंखडौ, निकळ्यौ छाती चीर॥
केसरीया बालम कहूं, गाढा माढां राग।
आवो घर अलबेलडा, उपजावण अनुराग॥
केसरीया बालम कहूं,किम विसरीया कंत।
निसरिया आसूं नयण, (जिण)हरिया वन दरसंत॥ केसरीया बालम कहूं, जळूं  विरह री झाळ ।
आव अषाढै मेह ज्यूं,(तौ) भींजूं  इण बरसाळ॥
केसरीया बालम कहूं,नेह निभाज्यौ नाह।
आय मिळौ म्हानै अठै, गाढ भरण गळबांह॥

नरपतदान आवडदान आशिया"वैतालिक " कृत