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चंदबरदाई / परिचय

Rao GumanSingh Rao Gumansingh



इसे हिन्दी का प्रथम महा कवि माना जाता है। इनका पृथ्वीराजरासो हिंदी का प्रथम महाकाव्य है। चंद दिल्ली के अंतिम हिंदू सम्राट महाराज पृथ्वीराज के सामंत और राजकवि के रुप में जाने जाते हैं। इससे इनके नाम में भावुक हिन्दुओं के लिए एक विशेष प्रकार का आकर्षण बढ़ता है।चंद ड़िंगळ व पिंगळ भाषा के भी जानकार थे। जन्म रासो के अनुसार ये जागीरदार राव जाति के जगात नामक गोत्र के थे। इनके पूर्वज की भूमि पंजाब थी। इनका जन्म लाहोर में हुआ था। इनका और महाराज पृथ्वीराज का जन्म एक ही दिन हुआ था। ये महाराज पृथ्वीराज के राजकवि के साथ-साथ उनके सखा ओर सामंत भी थे। वे षड्भाषा, व्याकरण, काव्य, साहित्य, छंद:शास्र, ज्योतिष, पुराण, नाटक आदि अनेक विद्याओं में पारंगत थे। इन्हें जालंधरी देवी का इष्ट था जिनकी कृपा से ये अदृष्ट-काव्य भी कर सकते थे। इनका जीवन पृथ्वीराज के जीवन के साथ ऐसा मिला हुआ था कि अलग नहीं किया जा सकता। युद्ध में, आखेट में, सभा में, यात्रा में, सदा महाराज के साथ रहते थे, और जहाँ जो बातें होती थीं, सब में सम्मिलित रहते थे। चन्द और पृथ्वीराजरासो पृथ्वीराजरासो ढाई हजार पृष्ठों का बहुत बड़ा ग्रंथ है जिसमें ६९ समय (सर्ग या अध्याय) हैं। प्राचीन समय में प्रचलित प्रायः सभी छंदों का इसमें व्यवहार हुआ है। मुख्य छन्द हैं - कवित्त (छप्पय), दूहा, तोमर, त्रोटक, गाहा और आर्या। जैसे कादंबरी के संबंध में प्रसिद्ध है कि उसका पिछला भाग बाण के पुत्र ने पूरा किया है, वैसे ही रासो के पिछले भाग का भी चंद के पुत्र जल्हण द्वारा पूर्ण किया गया है। रासो के अनुसार जब शहाबुद्दीन गोरी पृथ्वीराज को कैद करके गजनी ले गया, तब कुछ दिनों पीछे चंद भी वहीं गए। जाते समय कवि ने अपने पुत्र जल्हण के हाथ में रासो की पुस्तक देकर उसे पूर्ण करने का संकेत किया। जल्हण के हाथ में रासो को सौंपे जाने और उसके पूरे किए जाने का उल्लेख रासो में है - पुस्तक जल्हण हत्थ दै चलि गज्जन नृपकाज । रघुनाथनचरित हनुमंतकृत भूप भोज उद्धरिय जिमि । पृथिराजसुजस कवि चंद कृत चंदनंद उद्धरिय तिमि ।। रासो में दिए हुए संवतों का ऐतिहासिक तथ्यों के साथ बिल्कुल मेल न खाने के कारण अनेक विद्वानों ने पृथ्वीराजरासा के समसामयिक किसी कवि की रचना होने में पूरा संदेह किया है और उसे १६वीं शताब्दी में लिखा हुआ एक जाली ग्रंथ ठहराया है। रासो में चंगेज, तैमूर आदि कुछ पीछे के नाम आने से यह संदेह और भी पुष्ट हाता है। प्रसिद्ध इतिहासज्ञ रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा रासो में वर्णित घटनाओं तथा संवतों का बिल्कुल भाटों की कल्पना मानते हैं। पृथ्वीराज की राजसभा के काश्मीरी कवि जयानक ने संस्कृत में "पृथ्वीराजविजय' नामक एक काव्य लिखा है जो पूरा नहीं मिला है। उसमें दिए हुए संवत् तथा घटनाएं ऐतिहासिक खोज के अनुसार ठीक ठहरती है। उसमें पृथ्वीराज की माता का नाम कर्पूरदेवी लिखा है जिसका समर्थन हाँसी के शिलालेख से भी होता है। उक्त ग्रंथ अत्यंत प्रामाणिक और समसामयिक रचना है। उसके तथा "हम्मीर महाकाव्य' आदि कई प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार सोमेश्वर का दिल्ली के तोमर राजा अनंगपाल की पुत्री से विवाह होना और पृथ्वीराज का अपने नाना की गोद जाना, राणा समरसिंह का पृथ्वीराज का समकालीन होना और उसके पक्ष में लड़ना, संयोगिताहरण इत्यादि बातें असंगत सिद्ध होती हैं। इसी प्रकार आबू के यज्ञ से चौहान आदि चार अग्निकुलों की उत्पत्ति की कथा भी शिलालेखों की जाँच करने पर कल्पित ठहरती है, क्योंकि इनमें से सोलंकी, चौहान आदि कई कुलों के प्राचीन राजाओं के शिलालेख मिले हैं जिनमें वे सूर्यवंशी, चंद्रवंशी आदि कहे गए हैं, अग्निकुल का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या ने रासो के पक्ष समर्थन में इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि रासो के सब संवतों में, यथार्थ संवतों से ९०-९१ वर्ष का अन्तर एक नियम से पड़ता है। उन्होंने यह विचार उपस्थित किया कि यह अंतर भूल नहीं है, बल्कि किसी कारण से रखा गया है। इसी धारणा को लिए हुए उन्होंने रासो के इस दोहे को पकड़ा - एकादस सै पंचदह विक्रम साक अनंद । तिहि रिपुजय पुरहरन को भग पृथिराज नकिंरद ।। फिर यह भी विचारणीय है कि जिस किसी ने प्रचलित विक्रम संवत् में से ९०-९१ वर्ष निकालकर पृथ्वीराजरासो में संवत् दिए हैं, उसने क्या ऐसा जान बूझकर किया है अथवा धोखे या भ्रम में पड़कर। ऊपर जो दोहा उद्धृत किया गया है, उसमें अनंद के स्थान पर कुछ लोग अनिंद पाठ का होना अधिक उपयुक्त मानते हैं। इसी रासो में एक दोहा यह भी मिलता है - एकादस सैपंचदह विक्रम जिम ध्रमसुत्त । त्रतिय साक प्रथिराज कौ लिष्यौ विप्र गुन गुत्त ।। जीवन परिचय हिंदी के महान कवि चन्दबरदाई का जन्म संवत् १२२५ में हुआ था। उनका जन्म स्थान लाहौर बताया जाता है। चन्द पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर के समय में राजपूताने आए थे। सोमेश्वर ने आपको अपना दरबारी कवि बनाया। यहीं से आपकी दरबारी जिंदगी शुरु होती है। पृथ्वीराज के समय में आप नागौर में बस गए। यहाँ आज भी आपके वंशज रहते हैं। चन्दबरदाई की औलाद चंद के वंश के सितारे नानूराम के अनुसार चंद के चार लड़के थे। चार में से एक लड़का मुसलमान हो गया। तीसरा लड़का अमोर में बस गया और उसका वंश वहीं चलता रहा। चौथे लड़के का वंश नागौर में चला। चंद ने पृथ्वीराजरासो में अपने लड़कों का उल्लेख इस प्रकार किया है:- दहति पुत्र कविचंद कै सुंदर रुप सुजान। इक्क जल्ह गुन बावरो गुन समुदं ससभान।। साहित्य लहरी की टीका में एक पद इस तरह बयान करता है -- प्रथम ही प्रथु यज्ञ ते ये प्रगट अद्भुत रुप। ब्रह्मराव विचारी ब्रह्मा राखु नाम अनूप।। पान पय देवी दियो सिव आदि सुर सुख पाय। कहमो दुर्गा पुत्र तेरो भयो अति अधिकाय।। पारि पाँयन सुख के सुर सहित अस्तुति कीन। तासु बंस प्रसंस मैं भौ चंद चारु नवीन।। भूप पृथ्वीराज दीन्हीं तिन्हें ज्वाला दंस। तनय ताके चार कीनो प्रथम आप नरेस।। दूसरे गुनचंद ता सुत सीलचंद सरुप। वीरचंद प्रताप पूरन भयो अद्भुत रुप।। रणथंभौर हमीर भूपति लँगत खेसत जाये। तासू बंस अनूप भौ हरिचंद अति विख्यात।। आगों रहि गोपचल मैं रहयो तर सुत वीर। पुत्र जन्मे सात तोके महा भट गंभीर।। कृष्णाचंद्र उदारचंद जु रुपचंद सुभाई। बुद्धिचंद प्रकास चौथे चंद में सुखदाई।। देवचंद प्रबोध संसृतचंद ताको नाम। भयो सप्तो नाम सूरजचंद मंद निकाम।। उपर्युक्त पद और नानूराम के द्वारा बताये गए एक नाम के अलावा सभी नाम मिलते- जुलते दिखाई देते हैं। चन्दबरदाइ दरबार में चन्द दिल्ली के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज के दरबार में एक सामंत तथा राजकवि के रुप में प्रसिद्ध हैं। इनका जन्म और सम्राट पृथ्वीराज का जन्म एक ही दिन हुआ माना जाता है। दोनों की इस संसार से विदाई भी एक ही दिन हुई थी। दुनिया में आने से मरने तक दोनों एक साथ रहे। ये दोनों कहीं भी एक साथ दिखाई दे सकते थे। महाराज चाहे घर में हों, युद्ध में या यात्रा में चन्दजी साथ में अवश्य होते थे और प्रत्येक बात मशविरे में शामिल रहा करते थे। इसी अथाह प्रेम में चन्दबरदाई ने हिंदी भाषा का प्रथम महाकाव्य पृथ्वीराज रासो की रचना कर डाली। इसमें चंद ने पृथ्वीराज की जिंदगी की अनेक घटनाओं उका उल्लेख किया है। इसमें पायी जाने वाली बहुत- सी घटनाओं से पृथ्वीराज की चरित्र को प्रस्तुत में सार्मथ्य मानी जाती हैं। यह महाकाव्य ढ़ाई हजार पृष्ठों का विशाल ग्रंथ है। इसमें कुल मिलाकर उनहत्तर अध्याय की रचना की गई है। बाण की कादंबरी की तरह पृथ्वीराजरासो के बारे में भी यह कहा जाता है कि पिछले भाग को चंद के पुत्र जल्हण ने पूर्ण किया। चंद ने अपने पुत्र जल्हण को यह महान काव्य देते हुए कहा था :- पुस्तक जल्हण हत्थ है चलि गज्ज्न नृपकाज। रघुनाथ चरित हनुमंतकृत भूप भोज उद्धरिय जिमि। पृथ्वीराज सुजस कवि चंद कृत चंदनंद उद्धरिय तिमि।। नानूराम के अनुसार उसके पास पृथ्वीराज रासो की एक असल प्रति अब भी मौजूद है। इस असली पृथ्वीराजरासो का एक नमूना जो पद्मावती के समय का है, उल्लेख किया जा रहा है:- हिंदूवान थान उत्तम सुदेस। तहँ उदित द्रूग्गा दिल्ली सुदेस। संभरिनरेस चहुआन थान। पृथ्वीराज तहाँ राजत भान।। संभरिनरेस सोमेस पूत। देक्त रुप अवतार धूत।। जिहि पकरि साह साहाब लीन। तिहुँ बेर करिया पानीप हीन।। सिंगिनि- सुसद्द गुनि चढि जंजीर। चुक्कइ न सबद बधंत तीर।। मनहु कला ससमान कला सोलह सो बिन्नय। बाल वेस, ससिता समीप अभ्रित रस पिन्निय।। विगसि कमलास्त्रिग, भमर, बेनु खंजन मग लुट्टिय। हरी, कीय, अरु, बिंब मोति नखसिख अहिघुट्टिय।। कुट्टिल केस सुदेस पोह परिचियत पिक्क सह। कमलगंध बयसंघ, हंसगति चलाति मंद मंद।। सेत वस्र सोहे सरीर नख स्वाति बूँद जस। भमर भवहिं भुल्लहिं सुभाव मकरंद बास रस।। पृथ्वीराज की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा:- प्रिय प्रथिराज नरेस जोग लिखि कग्गार दिन्नो। लगन बराग रचि सरब दिन्न द्वादस ससि लिन्नो।। से ग्यारह अरु तीस साष संवत परमानह। जो पित्रीकुल सुद्ध बरन, बरि रक्खहु प्रानह।। दिक्खंत दिट्ठि उच्चरिय वर इक पलक्क् विलँब न करिय। अलगार रयनि दिन पंच महि ज्यों रुकमिनि कन्हर बरिय।। पृथ्वीराजरासो की भाषा इस महाकाव्य की भाषा कई स्थानों पर आधुनिक सांचे में ढली दिखाई देती है। कुछ स्थानों पर प्राचीन साहित्यिक रुप में भी दिखाई देती हैं। इसमें प्राकृत और अपभ्रंश शब्दों के साथ- साथ शब्दों के रुप और विभक्तियों के निशानात पुराने तरीके से पाये जाते हैं। बज्जिय घोर निसान राज चौहान चहों दिस। सकल सूर सामंत समरि बल जंत्र मंत्र तिस।। उद्वि राज प्रिथिराज बाग मानो लग्ग बीर नट। कढ़त तेग मनवेग लगंत मनो बीजु झ छट।। थकि रहे सुर कौतिज गगन। रंगन मगन भाई सोन घर।। हदि हरषि बीर जग्गे हुलसी। दुरंउ रंग नवरत बर।। खुरासान मुलतान खघार मीर। बलख स्थो बलं तेग अच्चूक तीर।। रुहंगी फिरगो हल्बबी सुमानी। ठटी ठ भल्लोच ढालं निसानी।। मजारी- चषी मुक्ख जंबु क्कलारी। हजारी- हजारी हुकें जोध भारी।।

पृथ्वीराज रासो

Rao GumanSingh Rao Gumansingh


 पद्मसेन कूँवर सुघर ताघर नारि सुजान।

ता उर इक पुत्री प्रकट, मनहुँ कला ससभान॥

मनहुँ कला ससभान कला सोलह सो बन्निय।
बाल वैस, ससि ता समीप अम्रित रस पिन्निय॥

बिगसि कमल-स्रिग, भ्रमर, बेनु, खंजन, म्रिग लुट्टिय।
हीर, कीर, अरु बिंब मोति, नष सिष अहि घुट्टिय॥

छप्पति गयंद हरि हंस गति, बिह बनाय संचै सँचिय।
पदमिनिय रूप पद्मावतिय, मनहुँ काम-कामिनि रचिय॥

मनहुँ काम-कामिनि रचिय, रचिय रूप की रास।
पसु पंछी मृग मोहिनी, सुर नर, मुनियर पास॥

सामुद्रिक लच्छिन सकल, चौंसठि कला सुजान।
जानि चतुर्दस अंग खट, रति बसंत परमान॥

सषियन संग खेलत फिरत, महलनि बग्ग निवास।
कीर इक्क दिष्षिय नयन, तब मन भयो हुलास॥

मन अति भयौ हुलास, बिगसि जनु कोक किरन-रबि।
अरुन अधर तिय सुघर, बिंबफल जानि कीर छबि॥

यह चाहत चष चकित, उह जु तक्किय झरंप्पि झर।
चंचु चहुट्टिय लोभ, लियो तब गहित अप्प कर॥

हरषत अनंद मन मँह हुलस, लै जु महल भीतर गइय।
पंजर अनूप नग मनि जटित, सो तिहि मँह रष्षत भइय॥

तिहि महल रष्षत भइय, गइय खेल सब भुल्ल।
चित्त चहुँट्टयो कीर सों, राम पढ़ावत फुल्ल॥

कीर कुंवरि तन निरषि दिषि, नष सिष लौं यह रूप।
करता करी बनाय कै, यह पद्मिनी सरूप॥

कुट्टिल केस सुदेस पोहप रचयित पिक्क सद।
कमल-गंध, वय-संध, हंसगति चलत मंद मंद॥

सेत वस्त्र सोहे सरीर, नष स्वाति बूँद जस।
भमर-भमहिं भुल्लहिं सुभाव मकरंद वास रस॥

नैनन निरषि सुष पाय सुक, यह सुदिन्न मूरति रचिय।
उमा प्रसाद हर हेरियत, मिलहि राज प्रथिराज जिय॥

चंदबरदाई

मारवाड़ी देस का न परदेस का भाग-5 लेखक: शम्भु चौधरी

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यह बात हम सभी मानते हैं कि इस समाज ने समाज-सेवा, शिक्षा, धर्म, चिकित्सा, आकस्मिक आपदाओं, प्राकृतिक विपदाओं, काल-अकाल आदि दुर्योगों के समय तथा अन्य विविध क्षेत्रों के साथ-साथ हिन्दी साहित्य सेवा के अलावा भी समस्त भारतीय भाषा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। विद्वानों, साहित्यकारों, कलाकारों, आदि को सम्मानपूर्वक आर्थिक सहयोग प्रदान कर उनके जीवन को सुगम बनाने में अपनी भूमिका का निर्वाह भी करता रहा है, जबकि इस तरह का कार्य इतर समाज में देखने को कम ही मिलता है, जो थोड़ा बहुत मिलता है, उसका कार्यक्षेत्र स्वयं के समाज तक सिमटा नजर आता है, कुछ सामाजिक संस्थाओं को छोड़ दिया जाय तो, आंकड़े भी मिलने संभव नहीं है। जो वैगर सरकारी सहयोग के कार्य किया हो। यह एक अलग बहस का विषय है, मैं इस विवाद की तरफ नहीं जाना चाहता, किसने क्या काम किया, इस लेख में सिर्फ यह बात जानने का प्रयास करूँगा कि आखिर वे कौन-कौन से कारण हो सकते हैं जिसके चलते मारवाड़ी समाज इतर समाज में कुंठा का कारण बना रहता है। इन तमाम कार्यों के विपरीत मारवाड़ी समाज ने एक छोटी किन्तु भारी गलती भी की। वह गलती है समाज के इतिहास को महत्व न दिया जाना, यदि कहिं कुछ थोड़ा बहुत छपा भी तो उन प्रकाशनों में सम्पन्नता झलकती है। इस छोटी सी गलती ने समस्त मारवाड़ी समाज के तमाम कार्यों पर पानी फेर रखा है। हम अपने बच्चों को स्वाभिमान की जिन्दगी जीने लायक नहीं रख पाये। इसके लिये हमें आस-पास के परिवेश में मारवाड़ी समाज के प्रति व्याप्त कुंठा के लिये हम अपने ही समाज को दोषी ठहरा सकते हैं। इस कौम की एक विशेषता यह भी है कि वह किसी भी घटना का प्रतिवाद न कर हमेशा से 'आत्म-सुरक्षा' का रुख अख्तियार करता रहा है। यह आत्म-सुरक्षा, किसी आत्म-सम्मान की सूचक नहीं वरन् अपमान भरी भावना का घूँट पीने जैसा है। इस आत्म-सूरक्षा का दूसरा पहलू इस रूप में सामने आता है कि भयभीत मानसिकता के प्रतिफल के रूप में अपने बच्चों की मानसिकता को कमजोर करते हुए, कई बार यह कहते पाये जाते थे - "छोड़ ण आपणो के लेव - जाण दे" या फिर " मांयणे आकर सांकली लगा ले" अर्थात स्वयं पर कोई बात होने पर कहता है - छोद़ दो, अपना क्या लेता है, या किसी आस-पड़ोस की तकलीफ में खड़ा न होकर यह कहते पाया जाता है - 'घर के अन्दर आ जाओ और दरवाजा बन्द कर लो' । मारवाड़ी समाज सामाजिक तो है , पर की बार ऎसा लगता है कि सामाजिक प्राणी नहीं है। मैने कई बार पाया है कि कुछ लोग मेरे द्वारा स्वयं के समाज के प्रति की गई टिप्पणियों को गलत तरीके से इस्तमाल करते हैं खास कर ऎसे लोगों से मेरा निवेदन रहेगा कि वैगर किसी संदर्भ के किसी पेरा को मोटे अक्षरों में दिखाने से पूर्व अपनी बात को रखें ताकि हमारे समाज तक आपकी भावना का सही अवलोक भी साथ में किया जा सकेगा। समाज में राजनैतिक परिवेश: एक समय था जब इस समाज का प्रतिनिधित्व, समाज के चन्द पूँजीपति घराने तक ही सिमटा हुआ था, उनके द्वारा दिये गये या सुझाये गये नाम को ही संसद या विधानसभा में स्थान दिया जाता रहा। अब यह स्थिति काफी बदल चुकी है, जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओँ ने अपनी पहचान कायम की है। साथ ही साथ समाज का झूकाव एक दल की तरफ न होकर काफी फैल चुका है। आजादी के समय कांग्रेस को खुला समर्थन देने वाले समाज ने साथ ही साथ को जनसंघ वर्तमान में भाजपा को भी सहयोग दिया। परन्तु यहाँ यह बात भी महत्वपूर्ण है कि ये लोग राजनीति को कभी नजदीक से नहीं देखते थे, परोक्ष रूप से आर्थिक सहयोग देना, एवं सत्ताधारी दल से अपने फायदे या उद्योग व्यापार से जुड़ी बातों से ही अपना मतलब रखते थे। किसी सभा का आयोजक बनकर उस सभा का खर्च जुगार करने वाले वफादार कार्यकर्त्ता माने जाते थे। अब इस दिशा में भी इनकी पहचान गौण, बल्कि यूँ लिखा जा सकता है कि राजनैतिक दलों को सोच में काफी बदलाव देखने को मिला है, एक तरफ सभी दल धर्म की आड़ में एक विशेष संप्रदाय के वोटरों को लुभाने हेतु मिथ्या धर्मनिपेक्षता का चोला पहन रखें हैं और एक धर्म को केन्द्र कर अपने दल की राजनीति करने में लगे हैं वहीं कुछ प्रन्तीय स्तर के दल जात-पात की राजनीति करने में लग गये, इनकी इस राजनिति का परिणाम अभी हाल ही में हमें महाराष्ट्र के अन्दर देख्ने को मिला। यह बात हमें मान लेनी चाहिये कि भारत की एकता न तो जातिय आधार की राजनीति में समाहित हो सकती है न ही धर्म की राजनीति में, ये दोनों सिद्धान्त कुछ समय तक भले ही किसी को सत्ता में ला दे लेकिन दूरगामी परिणाम कफी भी अच्छे नहीं हो सकते। मारवाड़ी समाज का वर्तमान राजनैतिक परिवेश शुन्य में भटक चुका है। राजस्थान के सांसद, विधायक अपने को मारवाड़ी नहीं मानते, और मारवाड़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग इतने सक्षम नहीं की वे अपने बुते किसी भी क्षेत्र से विधायक या सांसद बन सके, यह बात सही है कि समाज के कई लोगों ने इस क्षेत्र में अपनी पहचान कायम की है जिसमें असम के स्व.हीराला पटवारी, एवं स्व. राधाकिशन खेमका, श्री कमला प्रसाद अग्रवाला (तेजपुर), बंगाल से स्व.विजयसिंह नाहर, स्व.प्रभुदयाल हिम्मतसिंका, स्व.ईश्वरदास जालान,श्रीमती सरला माहेशवरी,श्री राजेश खेतान, श्री संतोष बागड़ोदिया, स्व.देवकीनन्दन पौद्दार, श्री सत्यनारायण बजाज एवं अब इनके पुत्र- श्री दिनेश बजाज(कोलकात्ता), बिहार से स्व.सीताराम चमड़ीया, श्री शंकर टेकरीवाल (छपड़ा), श्री सुशील मोदी, श्री धिरेन्द्र अग्रवाल(छपड़ा), श्री बनरसी प्रसाद झूणझूणवाला(Bhagalpur), श्रीमती राजकुमारी हिम्मतसिंहका केन्द्रीय स्तर पर स्व.लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, वर्तमान में उनके पुत्र श्री अभिषेक सिंघवी, महाराष्ट्र प्रान्त के श्री राज के पुरोहित, डॉ जयप्रकाश मुंदड़ा,श्री मुरली देवड़ा, श्री दिलीप कु.मनसुखलाल गांधी, दिल्ली प्रान्त से श्री जयप्रकाश अग्रवाल श्री गोयल जी , उत्तरप्रदेश: श्री होती लाल अग्रवाल, श्री विरेन्द्र अग्रवाला(मुरादावाद) श्री मुकुन्दलाल अग्रवाल(वरेली)मध्यप्रदेश: श्री कमलनयन बजाज,श्री बी.आर.नाहटा, श्री श्रीमन नारायण अग्रवाल( वर्धा), श्री श्रीकृष्ण अग्रवाल (Mahasamund), श्री कल्याण जैन(Indore)पंजाब- श्री श्रीचंद गोयल, हरियाणा: श्री ओमप्रकाश जिंदल, श्री नवीन जिंदल इसमें कई प्रन्तों से विधायकों के नाम जोड़े जाने बाकी हैं ( मेरी जानकारी में नहीं होने के चलते नहीं जोड़ पाया हूँ, आपके पास कोई जानकारी हो तो मेल द्वारा सूचित करेगें-लेखक) ऊपर में राजस्थान से सिर्फ स्व.लक्ष्मीमल सिंघवी व उनके पुत्र वर्तमान में श्री अभिषेक जी का नाम ही जोड़ा गया है, वैसे इन दिनों मारवाड़ी युवा मंच के एक कार्यक्रम में श्रीमती सुषमा स्वराज ने भी अपनी पहचान मारवाड़ी होने की दी है। इन लोगों के अलाव भी बहुत सारे नाम है जिन्हें इस सूची में जोड़े जा सकता हैं। इन सबके होते हुए भी यह लिखने में मुझे जरा भी झीझक नहीं है, कि ये समाज राजनीति स्तर पर राजनैतिक दलों में अपनी पहचान बनाने में कसी भी प्रकार से सफल नहीं दिखते। हाँ, बिहार में श्री सुशील मोदी और दिल्ली के श्री अभिषेक सिंघवी को छोड़ दिया जाय तो सभी व्यापारी श्रेणी में ही आंके जा सकते हैं। मेरे कहने का अर्थ यह नहीं कि इनका व्यापारी होना समाज के लिये अच्छा नहीं था, मेरा मानना है कि राजनीति में जाना हो तो व्यापार की बात समाज को सोचना बन्द करके शुद्ध रूप से राजनीति करनी चाहिये। मारवाड़ी भले ही किसी राजनैतिक पार्टी का कोषाध्यक्ष बनकर अपने आपको महान समझता रहे, परन्तु मैं मानता हूँ कि यह समाज के लिये मात्र कमजोरी वाली बात है, मुझे खुशी है कि मारवाड़ी सम्मेलन के वर्तमान अध्यक्ष श्री सीताराम शर्मा ने अपने सत्र में राजनैतिक रूप से सजग होने के लिये एक अभियान चलाया है, जिसमें समाज को वोटर लिस्ट में अपने व अपने परिवार का नाम दर्ज कराना, चुनाव के दिन मतदान में हिस्सा लेना, व वोट डालने के लिये समय पर जाना, साथ ही धन के बजाय जंमीनीस्तर की राजनीति करने की सलाह दी गई है। हमारा समाज अभी तक राजनैतिक स्तर पर अपना सही प्रतिनिधित्व नहीं कर पाया है और न ही इसके लिये कोई सोच तैयार कर पा रहे हैं ना ही कोई संगठित ढाँचा है, जिस पर केंद्रित होकर काम किया जा सके। मेरा सोचना है कि आज के वर्तमान दृश्य को ध्यान में रखते हुये मारवाड़ी समाज को देश की राजनीति में हिस्सेदारी निभाने के लिये नई भूमिका क निर्वाह करना होगा, न कि केवल भामाशाह के रूप में , जैसा कि होता आया है। क्रमशः लेख आगे जारी रहेगा, आप अपनी राय से मझे अवगत कराते रहें - शम्भु चौधरी http://groups.google.com/group/hindibhasha http://groups.google.com/group/samajvikas http://samajvikas.in

मारवाड़ी समाज में समाप्त होती परम्परा:

Rao GumanSingh Rao Gumansingh


मारवाड़ी समाज में ब्याह-शादियों में कल तक मुस्लिम घरों की राजस्थानी मुस्लिम औरतें ही लखारी चूड़ियाँ पहनाया करती थी। यह ब्याह की एक रस्म सी बन चुकी थी। मुस्लिम औरतों का समाज के घरों मे आना-जाना भी था। परन्तु हिन्दुस्तान विभाजन ने इन रिस्तों में काफी दरार पैदा कर दी, अब तो यह परम्परा समाप्त सी हो गई है। ठीक इसी प्रकार हर गाँव व कस्बे में मारवाड़ी 'नाई' एवं 'मिसरानी' का होना उतना ही जरूरी माना जाता था, जितना जीना-मरना। कुछ ऎसी बातें इस समाज में उदाहरण के रूप में आज भी मिल जायेगी, जिससे यह सबुत आसानी से मिल जाएँगे कि यह समाज राजस्थान से जैसे- जैसे दूर होता गया, वैसे-वैसे ही स्थानीय समाज एवं स्थानीय बोल-चाल, भाषा, लोक त्योहारों को अपनाता चला गया। समय का यह दौर यहाँ तक चला कि लोगों ने राजस्थान की पुश्तों पुरानी जमीन-जायदाद को कौड़ियों के भाव बिक्री कर दी। जो जिस प्रदेश में बसा वह वहीं का होकर रह गया। देश में आजादी के पूर्व मारवाड़ियों का केन्द्र प्रायः अविभाजित बंगाल ही रहा। धीरे-धीरे यह समाज आस-पास के शहरों, प्रान्तौं में फैलता चला गया। यहाँ बता देना भी जरूरी होगा कि दक्षिण भारत को छोड़कर पूर्वी भारत में मारवाडि़यों का प्रवेश प्रायः 300 वर्ष पूर्व ही हो गया था, जिसमें बिहार ( झारखण्ड के साथ) , असम, अविभाजित बंगाल (उडिसा को लेकर), और कलकत्ता इनका केन्द्र बना रहता । एक प्रकार से कोलकाता को मारवाड़ीयों का 'मिनी राजस्थान' भी कहा जा सकता है। स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी थी, कि कलकत्ता एक प्रकार से मारवाड़ियों का मक्का-मदीना बन चुका था। इस हरी-भरी धरती को अपना बना लेने वाला यह समाज अपने आप में एक उदाहरण तो है ही, साथ ही साथ यहाँ के सुख-दुःख में भी बराबर का साथ रहा है, चाहे वह अकाल की घटना हो या बाढ़ की हर पल इस समाज ने अग्रणी भूमिका अदा की है। एक सबसे बड़ी बात मुझे देखने को मिली की अहिन्दी भाषी प्रन्तों में मारवाड़ी समाज ने हिन्दी का एक प्रकार से लालन-पोषण ही किया। इसका सबसे बड़ा कारण था, इन प्रन्तों हिन्दी भाषा-भाषी के लिये किसी प्रकार की शिक्षण व्यवस्था का न होना, जगह-जगह हिन्दी का पोषण करने हेतु स्कूल-विद्यालय-पुस्तकालय की स्थापना के साथ-साथ हिन्दी समाचार पत्रों के प्रकाशन में इस प्रवासी समाज के योगदान को इंकार करना किसी भी प्रकार से संभव नहीं है। पिछले दिनों जब समाज विकास में 'मारवाड़ी समाज के धरोहर' का प्रकाशन का निर्णय लिया तो, विभिन्न प्रन्तों से काफी आंकड़े प्राप्त हुए, जिसके विवरणों को आगे देने का प्रयास करूंगा, पाया कि इस समाज ने जो भी जनोपयोगी कार्य किये वे समस्त मानवजाति के लिये तो किये ही, साथ ही साथ स्थानीय साहित्य,भाषा, संस्कृति के विकास में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह बात मेरे लिख देने से या कह देने से प्रमाणित नहीं हो जाती, कोई भी यह जानना जरूर चाहेगा कि, यह बात कैसे प्रमाणित की जाय? इसका एक छोटा सा उदाहरण असम में "रूपकंवर ज्योतिप्रसाद अग्रवाला" का ही देना चाहूगां, असम में एक दिन का राजकीय छुट्टी प्रति वर्ष मनाई जाती है, इनके नाम से और इस दिन समुचा असमिया समाज दिनभर सांस्कृतिक कार्यक्रम करते हैं, एकप्रकार से "रूपकंवर ज्योतिप्रसाद अग्रवाला" को असम का रविन्द्रनाथ ठाकुर कहा जा सकता है। एक समय था जब समाज के लोग न सिर्फ अपने समाज के विकास की बात सोचते थे, वे स्थानीय साहित्य,भाषा, संस्कृति के विकास में भी अपना महत्वपूर्ण दिया है। आज की पीढ़ी में यह बात देखने को नहीं मिलती, जो काम मारवाड़ी समाज ने किये उनके आंकडों का एक दस्तावेज यदि बनाया जाय तो यह ज्यादा उपयोगी होगा। मारवाड़ी शब्द की परिभाषा: जहाँ तक मेरा मानना है, 'मारवाड़ी' - शब्द न कोई विशेष जाति, न धर्म और न ही किसी प्रान्त को द्योतक है। जैसे पंजाबी, बंगाली, गुजराती आदि कहने पर अहसास होता है। राजस्थान व हरियाणा के लोगों को इनकी भाषा-बोली, पहनाव- संस्कृति में एकरूपता के चलते इन्हें देश के अन्य प्रन्तों में, विदेशों में भी मारवाड़ी शब्द से सम्बोधित किया जाने लगा। (इस बात पर आगे चर्चा करूगाँ कि, कब से और कैसे इस समाज को 'मारवाड़ी' शब्द से संबोधित किया जाने लगा, और इसके पीछे क्या कारण थे।) अब यह प्रश्न स्वभाविक तौर पर हो सकता है, कि तब मारवाड़ी किस प्रान्त के हैं? एक पाठक ने रायपुर से ई- मेल कर, मुझसे प्रश्न किया कि - "मारवाड़ी से तात्पर्य सीधे रूप में राजस्थानी से माना जाता है, मारवाड़ी सम्मेलन भी अपने संविधान में राजस्थानी संस्कृति की बात करती है, तो फिर हरियाणा के प्रवासी लोगों को देश के अन्य हिस्सों में मारवाड़ी शब्द से क्यों सम्बोधित किया जाता है?" इसका सटिक उत्तर अभी तक मेरे पास नहीं है, हाँ यह बात तो सही है कि जहाँ एक तरफ राजस्थान व हरियाणा के लोगों को देश के अन्य भागों में मारवाड़ी कह कर संबोधित किया जाता है, वहीं राजस्थानी व हरियाण्वी अपने मूल प्रान्त के अन्दर अपने आपको मारवाड़ी नहीं मानते। इसका कारण क्या है इस पर हम बाद में विचार करगें। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात ओर है, जिसपर भी गौर करने की बात है कि, हिन्दू, जैन, ब्राह्मण समाज, माहेश्वरी, ओसवाल, जाट, बनिया, आदि सभी को देश-विदेश के समस्त हिस्सों में मारवाड़ी कहा जाता है, परन्तु राजस्थान, हरियाणा के मुसलमानों को मारवाड़ी शब्द से संबोधित नहीं किया जाता है और ( कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो ) न ही वे अपने आपको संबंधित रखना पसंद करते हैं । वैसे तो अभी तक इस शब्द की सही व्याख्या नहीं हो पाई है, फिर भी कई विद्वानों ने इसकी व्याख्या करने का प्रयास किया है। जिसमें मारवाड़ के सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ श्री गौरीशंकर हीरा चन्द जी ओझा ने लिखा है, 'मारवाड़' शब्द देशवाची और मारवाड़ी शब्द लोकभाषा एवं संस्कृतिवाची है। राजपुताना के लोगों को हिन्दूस्तान में मारवाड़ी ही कहते हैं। जयपुर के प्रसिद्ध इतिहासज्ञ तथा पुरातत्ववेत्ता पुरोहित श्री हरि नारायण जी ने लिखा है - " राजपूताना से बाहर जाने वाले लोग अपने पहनावे, रहन-सहन, व्यवहार और व्यापार आदि में समानता के कारण राजस्थान से बाहर कलकत्ता, मुंबई आदि भारत के सभी स्थानों में मारवाड़ी कहे जाते हैं, भले ही वे राजस्थान में जोधपुर, बीकानेर अथवा जयपुर के या अन्य किसी राज्य (राजस्थानी रियासत वाले#) के निवासी क्यों न हों। डॉ.डी.के.टकनेत ने अपनी पुस्तक "मारवाड़ी समाज" में बालचन्द मोदी का हवाला देकर लिखा है कि " मारवाड़ शब्द संस्कृत के 'मरुवर' का अपभ्रंश है एवं प्राचीन काल में यह मरू प्रदेश कहलाता था। इसकी व्याख्या श्री मोदी के अनुसार 'माड' जैसलमेर का दूसरा नाम था और 'वाड' मेवाड़ का अंतिम अंश। इन दोनों शब्दों को मिलाकर मारवाड़ शब्द बना और इसी शब्द से 'मारवाड़ी' शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है। जब यहा बात लिखी गई थी उन दिनों राजस्थान में कई अलग-अलग रियासतें भी थी, जिसे बाद मेम राजस्थान में विलय कर दिया गया। क्रमशः - शम्भु चौधरी

मारवाड़ी शब्द का प्रयोग -शम्भु चौधरी

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मारवाड़ी शब्द वर्तमान समय में संकुचित और रूढ़ीगत दायरे की चपेट से बाहर आने लगा है। धीरे-धीरे यह शब्द देश के विकास का सूचक बनता जा रहा है, एक समय था जब समाज के लोग भी इसे घृणा का पर्यावाची सा मानने लगे थे। मंच के कुछ जागरूक सदस्यों ने मेरा मंच ब्लॉग पर इस बात पर एक परिचर्चा शुरू की है। जहाँ तक मेरा मानना है कि 'मारवाड़ी' - शब्द न कोई जाति, न धर्म और न ही किसी प्रान्त का द्योतक है जैसे- पंजाबी, बंगाली, गुजराती आदि कहने से अहसास होता है। राजस्थान एवं हरियाणा व पंजाब के कुछ सीमावर्ती इलाके के प्रवासी लोगों को भारत के अन्य प्रान्तों या विदेशों में भी इस समाज को 'मारवाड़ी ' शब्द से जाना व पहचाना जाता है, वहीं इसी प्रान्त के मुसलमान समाज ने अपने आपको इस शब्द से अलग ही कर रखा हैं [कुछ अपवादों को छोड़कर]। जबकि अन्य धर्म व संप्रदाय के सभी लोगों को जिसमें विशेषत: हिन्दू, जैन, ओसवाल, माहेश्वरी, ब्राह्मण, राजपुत, बनीया आदि सभी धर्म जाति के लोग शामिल पाये जाते हैं। यहाँ पंजाब और हरियाणा क्षेत्र के राजस्थानी जो एक समय राजपुताने क्षेत्र में ही आते थे, अब भूगौलिक परिवर्तन व पंजाब और हरियाणा प्रान्तों के रूप में जाने जाने के चलते इस क्षेत्र का मारवाड़ी समाज अपने आपको पंजाबी या हरियाणवी ही मानने लगे हैं, जबकि इनकी बोलचाल-भाषा, पहनवे, रीति-रिवाज, राजस्थानी भाषा संस्कृति से मिलते ही नहीं राजस्थानी संस्कृति ही हैं, इसीलिए प्रवासी मारवाड़ी समाज के लिये आम तौर पर राजस्थानी शब्द का ही प्रयोग किया जाता है भले ही वे हरियाणा या पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र से ही क्यों न आतें हों पीछले दिनों श्री राजेश कुमार जैन ने यह प्रश्न उठाया था कि मारवाड़ी से तात्पर्य जब राजस्थानी भाषा और संस्कृति से ही लगाया जाता है तो हरियाणा की क्या कोई साहित्य या अपनी संस्कृति नहीं है? यह प्रश्न आज की युवा पीढ़ी का उठाना वाजिब सा लगता है जब हरियाणा एक समय पंजाब के अन्तर्गत आता था तो यह बात पंजाब के साथ भी उठती थी की हरियाणा की अपनी अलग संस्कृति है इस पंजाब से अलग कर दिया जाय और हुआ भी ऎसा ही पंजाब ने यह स्वीकार किया कि हरियाणा को एक अलग राज्य का दर्जा देना ही उचित रहेगा। परन्तु इस राज्य के अलग दर्जे को प्राप्त कर लेने से जो क्षेत्र राजस्थान रियासतों के अधिन आते थे उनकी भाषा, संस्कृति, पहनावे, खान-पान , रीति-रिवाज हो या पर्व त्योहारों सभी में एक समानता पाई जाती थी जो थोड़ा बहुत अन्तर था तो वह सिर्फ बोली का ही था। देखें नीचे दिये गये एक चित्र के लाल निशान को जिसमें हिसार, भिवानी, रोहतक, गुड़गावं, लेहारू, महेन्द्रगढ़, पटियाला और दिल्ली का भी छोटा सा भाग राजपुताने क्षेत्र में दिखाया हुआ है। जो इन दिनों