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धरती की शान राजस्थान

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

BY सतवीर वर्मा 'बिरकाळी'


जलम हुयो जठै म्हारो, धरती राजस्थान री।
ढोली चारण खूब सुणावै, गाथा राजस्थान री।।
ऊँचा-ऊँचा धोरा अठै, लाम्बो रेगिस्तान।
कोसां कोस रुंख कोनी, तपतो राजस्थान।।
फोगला अर कैर अठै, करै भौम पर राज।
गोडावण रा जोङा अठै, मरुधर रा ताज।।
कुंवा रो खारो पाणी, पीवै भैत मिनख।
मेह रो पालर पाणी, ब्होत जुगत सूं रख।।
कोरी कोरी टीबङी, उङै रेत असमान।
सणसणाट यूं बाज रही, जणुं सरगम रा गीत।।
सोनै ज्यूं चमके रेत, चाँदनी रातां में।
रेत री महिमा गावै, चारण आपरी बातां में।।
इटकण मिटकण दही चटोकण, खेलै बाल गोपाल अठै।
गुल्ली डंडा खेल प्यारा, कुरां कुरां और कठै।।
अरावली रा डोंगर ऊंचा, आबू शान मेवाङ री।
चम्बल घाटी तिस मिटावै, माही जान मारवाङ री।।
हवेलियाँ निरखो शेखावाटी री, जयपुर में हवामहल।
चित्तौङ रा दुर्ग निरखो, डीग रा निरखो जलमहल।।
संगमरमर बखान करै, भौम री सांची बात।
ऊजळै देश री ऊजळी माटी, परखी जांची बात।।
धोरा देखो थार रा, कोर निकळी धोरां री।
रेत चालै पाणी ज्यूं,
पून चालै जोरां री।।
भूली चूकी मेह होवै, बाजरा ग्वार उपजावै।
मोठ मूँग पल्लै पङे तो, सगळा कांख बजावै।।
पुष्कर रो जग में नाम, मेहन्दीपुर भी नाम कमावै।
अजमेर आवै सगळा धर्मी, रुणेचा जातरु पैदल जावै।।
रोहिङै रा फूल भावै, रोहिङो खेतां री शान।
खेजङी सूँ याद आवै, अमृता बाई रो बलिदान।।
सोने री धरती अठै, चांदी रो असमान।
रंग रंगीलो रस भरियो, ओ म्हारो राजस्थान।।
रंग-रंगीलो राजस्थान, नाज करै है देस।
न्यारी-न्यारी बोली अठैगी, न्यारा-न्यारा भेस।।
राणा जेङो वीर अठै, राजस्थान री शान।
जयपुर जेङो नगर अठै, सैलानियां री जान।।
अरावली पर्वत ऊंचा घणा, कांई म्हे करां बखान।
राजकनाळ लाम्बी घणी, मरुधर रो वरदान।।
चेतक तुरंग हठीलो घणो, भामाशाह महादानी।
सांगा हिन्दू लाज बचावणा, जौहर पद्मण रानी।।
ढोला मरवण प्रेम कहाणी, गावै कवि सुजान।
आल्हा ऊदल वीर कहाणी, चारण करै बखान।।
जैपुर कोटा अर् बीकाणा, जग में मान बढावै।
अलवर उदैपुर जोधाणा भी, राजस्थान री शान कहावै।।
गोगामेङी गोगो धुकै, रुणेचा रामदेव जी।
सालासर हनुमानजी बैठ्या, कोळू पाबूदेव जी।।
पल्लु में काळका माता, देशनोक में माँ करणी।
सुन्धा परबत री सुन्धा माता, तीनूं लोक दुख हरणी।।
राठी गौ री शान प्यारी, बैल नागौरी चोखा घणा।
नसल ऊंट री एक जाणी, बीकाणै में जो नाचणा।।
घूमर घालै गोरियां, माणस बजावै चंग।
होळी खेलै देवर भाभी, उङै कसूमल रंग।।
जयपुर में गणगौर सवारी, राजसी ठाठ दिखावै।
दशहरो मेळो कोटा रो, धरमी मान बढावै।।
साफा अठै जोधपुर रा, परदेशां कीर्ति बखाणै।
मोचङी भी न्यारी-न्यारी, देशोदेश जाणै।।
– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

पिउ पीयै दारूह - प्रो. जी. एस. राठौड़

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

पिउ पीयै दारूह का मंगलाचरण


वरद बण्यो रै रावळौ 
दूंदाळा गुणपत्त 
दारू रा दुख मांडवा 
बुध बगसो सुरसत्त

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कंथ कमावै मोकळौ 
कलाळां सारूह 
घर रा सह ग्यारस करां 
पिउ पियै दारूह

उडकूं आधी रात तंइ 
वळै न वै बारूंह 
दहु रा दहु भूका सुआं 
पिउ पियै दारूह

किण घर जा सुख सांस लूं 
कुण जा पुकारूंह 
पीहरिये बाबल पियै 
(अठै) पिउ पियै दारूह

म्हां जसड़ी धण मोकळी 
म्हां जसड़ा मारूह 
सै सामल आंसू पियां 
पिउ पियै दारूह

घर ग्रस्ती री नाव या 
लागै किम पारूह 
प्याला री पतवार लै 
पिउ पियै दारूह 

बिन पत फळण्या रूंखड़ा 
(थारो) फळणों धिक्कारूंह 
बिन पत म्हारो घर करîो 
पिउ पियै दारूह 

क्यूं प्रभु थैं समदर मथ्यौ 
मो घर दुख सारूह 
विख अमरत तो कुण पियौ 
पिउ पियै दारूह


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