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मणिहारी लादै मनै, मूंघो चुड़लो मोल

Rao GumanSingh Rao Gumansingh


सती री बाँतः-
मणिहारी लादै मनै, मूंघो चुड़लो मोल।
पति रण खेतां पौढियो, हण अरियांह हरोळ॥
पाणी सौ सौ हाथ पर सींच सींच कर सीर।
प्रीत मीत रा फूलड़ा, अरपण कीध अखीर॥
सती तणा सतरी सखी, स्रवणां हूँत सुणीह।
ज्वाला बिच तन जाळतां, दरसण करै दूणीह॥
सती समौवड़ कुण सधै, ऒपम अवर अयाणं।
बैठ विमाणां इम बळी, उमां रुप अहनांण॥
सन्देसो रथ सांड़िये, मांड़यो कागळ माय।
मिलणां बहनाँ मेलिया, साथणियां समझाय॥
फरवट आंख फरक्क, खड़ियो तायल करहलो।
उगताँ पैल अरक्क, सन्देसो जा सौंपियो॥

हाथां मे हथियारां रौ वखांण

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

गणण गणण गोळां गणण, गरण गरण गरणाय।
धरर धरर धरती धमक, कमठ पीठ कड़काय॥
गजंद गुडाणी गजबणी, अरि भखणी आराण।
सैस मुखी अर खड़गखट, गूंजै धर गरणाय॥

देवी अंबा ने रुखाळी री वंदना

Rao GumanSingh Rao Gumansingh


चढ़ो मग्रप महामाया, चामुण्ड़ा चिरताळी।
मद री छाकां छक र माता, धार त्रिसूळ धजाळी।
चंड-मुंड, भड़ राकस चंड़ा, मार दिया मतवाळी।
आज सैकड़ां राकसड़ां मिल, मचा रिया पैमाळी।
जद-जद हुई धरम री हाणी, धारी खड़ग भुजाळी।
रजवट वट प्रतपाळक देवी, जय अंबे जय काळी॥

गणेश-वंदना

Rao GumanSingh Rao Gumansingh


रणथंभर गढ़ राव, उमा सुत थांनै सिंबर।
दोखी देवण दाव, साम्रथ दीजै सूंडळा॥
रिद्धि-सिद्धि वर बुद्धि वरद, ऒढ़र बगसण आथ।
सारा कारज सारणा, नमो चरण गणनाथ॥

दारु पीवो रण चढो

Rao GumanSingh Rao Gumansingh


दारु पीवो रण चढो, राता राखो नैण।
बैरी थारा जल मरे, सुख पावे ला सैण॥
सोरठ रो दोहो भळो, कपड़ो भळो सपेत।
नारी तो निवली भळी, घोड़ो भलो कुम्मेत॥
ब्रजदेशाँ चन्दन बना, मेरु पहाड़ाँ मौड़।
गरुड़ खगाँ, लंका गढाँ, राजकुलाँ राठौर॥

(संकलनः- द ग्रैट इंडियन राव)

धरती रा थांभा

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धरती रा थांभा कद धसकै, उल्ट्यो आभो कद आसी
माता अब तो साँझ पड़ी है, रुस्यो दिन कद उग आसी
हाथ्यां रा होदा कद टूटै, घोड़ां नै कद धमकास्यूं,
मूँछां म्हारी कद बट खावै, खांड़ां नै कद खड़कास्यूं।
सूना पड़ग्या भुज म्हारा ए, अरियां नै कद जरकासी॥
म्हारै जीतां धरती लेग्या, चाकर आज धणी बणग्या,
दोखीड़ाँ रै दुख सूं म्हारै, अन्तै में छाळा पड़ग्या।
आंसू झरती आंखड़ल्यां में, राता डोरा कद आसी॥
गाठी म्हारी जीभ सुमरतां, कान हुया बोळा थारै,
दिन पल्टयो जद मायड़ पल्टी, बेटां नै कुण बुचकारै।
माँ थारो तिरशूळ चलै कद, राकसड़ा कद अरड़ासी॥
थारै तो लाखों बेटा है, म्हारी मायड़ इक रहसी,
हूं कपूत जायो हूँ थारै, थनै कुमाता कुण कहसी।
अब तो थारी पत जावै है, बाघ चढ्यां तू कद आसी॥
रचनाकारः-तनसिंघ बाड़मेर १६ अगस्त १९५९

समर जालोर रौः-

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जैसल घर भटी लजै, कुळ लजै चहुंआण।
हूँ किम परणू तुरकड़ी, अळ किम उगे भांण॥
मांमो लाजे भाटियाँ, कुळ लाजे चहुंआण।
वीरम परणे तुरकड़ी, उल्टो उगे भांण॥
(रचना-शुभकरण देवल)

वियौग श्रृंगार-सपने घड़िया झूंटणा

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वियौग श्रृंगार
सपने घड़िया झूंटणा, बिखरी धण री बात।
इसड़ा ही अफसोस में, गमगी गोरण रात॥
जमवारौ पाणी हुऔ, पिघल गयौ जिंण पाथ।
राखूं किण विध रोक नै, बिन हाथां भर बाथ॥
तो ई हूं तिरसी रही, या इचरज की बात।
बरसै बारह मास ही, हिवड़ा में बरसात॥
ढळती मांझल रात में, बादळ बीज बंधेस।
काजळ फिरोजा नैंण रो, सजल हुऔ सिंभरेस॥
ढाई आखर प्रेम रा, कांई नह कह देत।
फिरोजा अगनि बळी, रह वीरम रण खेत॥
( रचना-शुभकरण देवल कूंपावास)

वीरमदेव विड़द

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जरणी धर जाळोर री, जीतां अरि पग जाय।
लाजै मावड़ लोरियां, कुळ काळस लग जाय॥
भारत रचियां ही भड़ां, भारत रुप कहाय।
भारत सूं के दिर डरां, रहणी भारत मांय॥
प्रमलै सौरभ पौढियौ, आजादी री आंण।
जलम घूंट में जांणियौ, समर चढ़ंण चहुआंण॥
वरदायक वर वीरता, प्रथमी जस पूजाण।
सिर पडियां लड़ियौ समर, वीरमदेव चहुआंण॥
रंण बंका थैं राखियौ, मात भौम रो मांण।
अवसल वीरम आप री, पिरलै लग पहचांण॥
(रचियता-हड़मतसिंघ देवड़ा रानीवाड़ा खुर्द)