राजिया रे दूहा सारु http://rajiaduha.blogspot.com क्लिक करावें रज़वाड़ी टेम री ठावकी ख्यातां रो ब्लॉग आपरै सांमै थोड़ाक टेम मा आरीयो है वाट जोवताईज रौ।

प्राथमिक शिक्षा मायड़भाषा में दिए जाने की मांग

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

राजस्थानी मोट्यार परिषद के कार्यकर्ताओं ने की मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मुलाकात। ज्ञापन सौंपा।
प्रदेश के शिक्षक संगठन भी हुए इस मसले पर सक्रिय।

जयपुर। महात्मा गांधी ने कहा था 'मातृभाषा मनुष्य के विकास के लिए उतनी ही स्वाभाविक है जितना छोटे बच्चे के शरीर के विकास के लिए मां का दूध। बच्चा अपना पहला पाठ अपनी मां से ही सीखता है। इसलिए मैं बच्चों के मानसिक विकास के लिए उन पर मां की भाषा को छोड़कर दूसरी कोई भाषा लादना मातृभूमि के प्रति पाप समझता हूं। मेरा यह विश्वास है कि राष्ट्र के जो बालक अपनी मातृभाषा के बजाय दूसरी भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं, वे आत्महत्या ही करते हैं।'

देश में ही नहीं दुनियाभर में गांधीजी के इन विचारों का सम्मान होता है और सब जगह मातृभाषाएं ही प्राथमिक शिक्षा का माध्यम है। मगर इसके विपरीत प्रदेश की गांधीवादी सरकार इस मसले पर मौन साधे हुए है। मंगलवार को शिक्षा संकुल में राज्य के शिक्षा अधिकारियों की बैठक लेने के लिए प्रस्थान करने से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से उनके निवास पर अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति की युवा शाखा राजस्थानी मोट्यार परिषद के एक शिष्टमंडल ने जयपुर देहात इकाई के जिला पाटवी बृजमोहन बैनीवाल की अगुवाई में भेंट की तथा इस आशय का ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में लिखा गया है कि अनिवार्य शिक्षा कानून में मायड़भाषा में प्राथमिक शिक्षा देने का प्रावधान है तथा इसी तरह त्रिगुण सेन समिति एवं यूएनओ की शिक्षा समितियों की रिपोर्टों के अनुसार पूरी दुनिया में प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा है। परन्तु राजस्थान इसका अपवाद है। यहां के बच्चों को अपने जन्म से लेकर स्कूल पहुंचने तक मायड़भाषा का जो ज्ञान होता है, वह स्कूल पहुंचने पर पीट-पीटकर छुड़वाया जाता है। जो कि मानवाधिकारों एवं प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। ज्ञापन में यह भी लिखा गया है कि प्राथमिक शिक्षा मायड़भाषा में नहीं होने से राजस्थान के बच्चों का स्वाभाविक विकास अवरुद्ध हो रहा है और बच्चे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटते जा रहे हैं।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने युवकों की पीठ थपथपाई तथा प्रसन्नता व्यक्त की कि युवा पीढ़ी अपनी मायड़भाषा व संस्कृति के प्रति जागरुकता का प्रदर्शन कर रही है। मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर गम्भीरता से विचार-विमर्श करने तथा राज्य सरकार की ओर से राजस्थानी भाषा व संस्कृति के सम्मान हेतु ठोस कदम उठाए जाने का आश्वासन दिया।
दूसरी ओर राज्य के शिक्षक संगठन भी मायड़भाषा के माध्यम से शिक्षा दिए जाने पर बल देने लगे हैं। राजस्थान शिक्षक संघ प्रगतिशील के प्रदेशाध्यक्ष हनुमान प्रसाद शर्मा ने मंगलवार को इस आशय का ज्ञापन मुख्यमंत्री को भेजा है। ज्ञापन में लिखा गया है कि राजस्थानी एक बहुत ही समृद्ध और विशाल समुदाय की मातृभाषा है तथा यह बड़ी विडम्बक स्थिति है कि आज राजस्थान का विद्यार्थी अपने ही प्रांत की गौरवशाली भाषा और संस्कृति के ज्ञान से अनभिज्ञ है। आजादी के पश्चात राजस्थान में शिक्षा के माध्यम के सम्बन्ध में जो गलत निर्णय हुआ उस गलती को सुधारने का अब एक सुनहरा अवसर आया है और राजस्थान की सरकार अगर गांधीजी के विचारों का तनिक भी सम्मान करती है तो प्रदेश में तत्काल मातृभाषा राजस्थानी के माध्यम से अनिवार्य शिक्षा का नियम लागू कर देना चाहिए।

प्रेषक :

डॉ. राजेन्द्र बारहठ, प्रदेश महामंत्री, अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति।
कानाबाती : 9829566084
सत्यनारायण सोनी, प्रदेश मंत्री, अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति।
कानाबाती : 9602412124

राज री मानता री बाट जोंवती राजस्थानी भासा!

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

भारतीय संसंद में 1963 अर 1967 में करीज्यै फोरबदळ मुजब भारत रौ संविधान देस री राज भासावां अर राज्य री राज भासावां नैं रास्ट्रभासावां सीकार करण रो फेसलो लेवे अर उण में किणी राज्य री आबादी रै कीं भाग में बोलीजण वाळी भासा रै वास्तै खास बंदोबस्त करै इण रै सागै ही भांत-भांत री अदालतां रै काम में बरतीजण वाळी भासावां रै बधापै रौ बन्दोबस्त भी करै। संविधान री आठवीं अनुसूचि में भिळयौड़ी भासावां है जिणा नैं ‘‘भारत री भासावां’’ कैर्इ्रजै। इणा में घणकरी भारत री बडी अर सैसूं लूठी जातियां री भासावां है, वांनै पैली ठौड़ दिरीजी है।

संसद में अंग्रेजी नैं आठवीं अनुसूचि में भेळण रै प्रस्ताव पर बोलतां तद रा भारत रा प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कैयो कै आपां रा संविधान लिखणियां ओ तै करतां घणी सूझ री ओळख कराई कै आठवी अनुसूचि में भिळयौड़ी सगळी भासावां नैं रास्ट्रभासावां मानणी चाईजै। (जवाहर लाल नेहरू रौ भासण, 1957-1963 (अंग्रेजी में), भाग-4 पांनावळी-53, 65)
रास्ट्रभासावां री आ परिभासा नीं तो राजनीतिक क्षेत्र अर नीं ही आम जन में घण चावी है। उतरादै भारत खासकर (राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेस, मघ्य प्रदेस अर बिहार) रा लोग हिन्दी नैं रास्ट्रभासा मानै, जदकै हिन्दी नैं हाल राज भासा रौ दरजौ मिल्योड़ौ है, रास्ट्रभासा रो नीं। घणकरा नेतावां अर भण्या-गुण्या लोगां नैं भी हाल आ निगै कोनी कै हिन्दी रौ संविधान मांय कांई दरजौ है? गैर हिन्दी राज्यावां वाळा हिन्दी नैं तो मानै इज कोनी क्यूंकै वांरै प्रदेसां में सगळो काम-काज वांरी भासावां में व्है अर अंग्रेजी रौ बरताव मोकळायत में करै। वां लोगां में आपू आप री मायड़ भासा रै प्रति घणौ हेत नैं चाव है।

आठवीं अनुसूचित में सामल भासावां नैं प्रादेषिक भासावां भी कैईजै क्यूंकै इणा मांय सूं घणकरी भासावां कैई राज्यावां री भासावां पण है। पण इण आठवीं अनुसूचि में संस्कृत भी भैळी है, जिण नैं भारत में साहित्यिक, सांस्कृतिक अर घार्मिक रीत-रिवाजां रौ खजानौ अर कैई भारतीय भासावां रै सारू सबदां रौ खजानौ भी मानीजै।
आठवीं अनुसूचि में सिंधी, कष्मीरी अर नेपाळी भी मिळयौड़ी है, जिणा में कष्मीरी री हालत घणी माड़ी है।
भारत रै संविधान में कष्मीरी भी भारत री एक रास्ट्रभासा है। पण इण रो दुरभाग देखो कै कष्मीर रै संविधान में उण नैं राज्य री राजभासा नीं मानीजी है। ध्यानजोग है कै भारत रा दूजा राज्यावां में कष्मीर री तरयां आप रो न्यारौ संविधान नीं है। कष्मीर री राजभासा उर्दु है, कष्मीरी नैं दूजी डोगरी, बल्ती, दरद, पहाड़ी, पंजाबी, लददाखी रै जोड़ अेक प्रादेषिक भासा रो दरजो मिल्यौड़ो है। (संदर्भ-कष्मीर रो संविधान, (अंग्रेजी में) पांनावळी-112) कैई लिखारां कष्मीरी नैं राजभासा रै रूप में मानता देवण री मांग करी ही पण कष्मीरी री हालत में कोई सुधार नीं आयो। आप रै घर में ही बापड़ी बणगी-कष्मीरी।
किणी भासा नैं संविधान री आठवीं अनुसूचि में भैळणौ फगत माण री बात कोनी। इण सूं विकास री नूंवी दीठ रा मारग खुलै अर उण रै काम-काज रौ बिगसाव चौगणौ व्है जावै। संघ सेवावां री परीक्षावां में फगत आठवीं अनुसूचि में भिळयौड़ी भासावां रो ई वपराव करयो जा सकै। इण भासा नैं बोलण वाळा नैं आछी तिणखा वाळी चाकर्यां मिलण में सबीस्तौ रेवै। भारत सरकार आठवीं अनुसूचि में भिळयौड़ी भासावां रै सैंजोड़ विकास सारू अेक खास समिति री थरपना कर राखी है। (हिन्दी अर संस्कृत नैं टाळ’र जिकी खास परिसदां रै हैठळ आवै)

बरसाऊ बजटां अर पांच बरसी योजनावां में इण भासावां रै बिगसाव सारू घणी लूंठी रकम खरच करीजै। छापाखाणा, सिनीमा उधोग अर रेडियो प्रसारण री अबखायां पर विचार करती वगत सैसूं जादा ध्यान इणी भासावां रै प्रकासणां, सिनिमा अर रेडियो प्रसारण कांनी दियौ जावै। आठवीं अनुसूचि में भिळयौड़ी भासावां में टाबरां सारू सांवठी पोथियां, साक्षरता अभियान सारू भणाई रा साधनां अर पढण वाळी पोथ्यां अर साहित्यिक कृतियां पर नैमसर पुरस्कार भी दिरीजै।

भासावां री इण सूचि रौ राजनीतिक फायदौ भी है। भारत रै संविधान रै अनुच्छेद 344 मुजब रास्ट्रपति कानीं सूं आठवीं अनुसूचि में भिळयौड़ी भासावां री अबखायां पर विचार करण सारू खास आयोग री नियुक्ति करीजै। दूजै सबदां में इण भासावां नैं दूजी भासावां री कूंत में खास अधिकार मिल्यौड़ा है। ठीक उणी भांत जिण भांत किणी राज्य री राज भासा री विधिक थापना रौ मतलब प्रषासनिक, विŸाीय अर बीजा अधिकार मिल्यौड़ा व्है। तथाकथित आदिवासी भासावां अेक न्यारै ही कङूम्बै रौ निर्माण करै। रास्ट्रपति रै अध्यादेष सूं जन जातियां री सूचि में भेळीजण वाळी कैई जातियां रै अेक कङूम्बै रै प्रतिनिधियां नैं राज री चाकरी अर ऊंची पोसाळां में भरती व्हैण अर संसद-विधान मंडला अर दूजी थरप्यौड़ी संस्थावां रै चुणाव में खास सुविधावां मिळै, जिकी संविधान में मंडयौड़ी है। पण इण सारू इण भासावां नैं प्रदेस सरकारां री मानता होवणी जरूरी है जिण सूं सरकारी अभिकरण इण भासावां में पोथ्यां छाप नैं वांनै प्राथमिक षिक्षा व्यवस्था में अर खास क्षेत्रा रै सरकारी काम काज में वपराव कर सकै।

उदाहरण सारू आसाम री जन जातीय भासावां री सूचि में 35 भासावां है पण राज्य सरकार ’’सरकारी पत्र-व्यवहार सारू फगत च्यार भासावां खासी, गारो, मीजो, अर मिकिर नैं ही मानता दे राखी है। उड़ीसा में 62 जन जातियां अर 25 आदिवासी भासावां है जिण में 12 भासावां नैं उण परीक्षावां री भासा सरूप मानता दे राखी है।
इण परीक्षावां में पास व्हैण वाळा राज रा चाकरां नैं पुरस्कार औरूं देवै। (संदर्भ- टाईम्स ऑफ इण्डिया, 27 जून, 1966) केन्द्र सरकार रा अभिकरण भी इणी मतै काम करै। 1966 में आधुनिक भारतीय भासावां रै बिगसाव नैं सैंजोड़ करण वाळा सार्वजनिक संगठणा नैं आर्थिक सायता देवण सारू अेक निरणै लिरीज्यौ हौ। ‘‘आधुनिक भारतीय भासावां ’’ में हिन्दी अर संस्कृत नैं टाळ आठवीं अनुसूचि में भिळयौड़ी सगळी भासावां अर ‘‘आदिवासी भासावां’’ रै सागै ‘‘मानता मिल्यौड़ी’’ दूजी भासावां आवै। सो किणी भासा नैं ‘‘मानता नीं देवण’’ रौ अरथ उण नैं सरकार रौ समर्थन कोनी। इण भांत री भासावां रै बिगसाव अर पांवडा पसारण री सगळी जम्मेवारी इण रै बोलणियां अर हेताळूवां रै कांधै पर ही आवै, जिका आप रै बूकियां रै पाण इण रौ जुगाड़ करै।

आ सागी गत ‘‘राजस्थानी भासा’’ री है, दूजै अरथ में इण लोकतंत्र में आ दादागिरी नैं लूंट है अर करोड़ू राजस्थानियां री भावनां रौ अपमान है। क्यूंकै देस रै हर भांत रै बिगसाव में राजस्थानी लोग आगे रैया है देस री समूची अर्थ व्यवस्था रौ घणकरौ भार राजस्थानी लोगां रै खांदै पर है। तद आ बात किŸाी जचती है? कै राजस्थानी लोगां री कमाई रौ हिस्सौ भारत रा दूजा प्रदेसां में कानून री आड में किण भांत लुंटाईज रैयौ है अर अठीनैं उणा रै खुद रै प्रदेस में वांरी मायड़ भासा राजस्थानी लारलै 63 बरसां सूं इण री बाट जो रैयी है। आखर सरकार कद सुणैली राजस्थानियां री आ दाद पुकार?
भारत में भासाई अबखायां रौ न्यावजोग नैम किणी हद तांई घणौ विरोधात्मक है। अेक कांनी भासाई विधि निर्माण रौ थंब जनतांत्रिक अर समानता रै अधिकार पर जोर देवै, तो दूजी कांनी राजस्थानी जिसी भासावां रै साथै इत्तौ अन्याव! राजस्थानी में अेक कैबत रै मुजब ठावा -ठावा नैं टोपियां अर बाकी रा नैं लंगोट! कठै है राजस्थानियां नैं समानता रौ अधिकार? भारतीय संविधान रै अनुच्छेद 29 में ओ प्रावधान है कै नागरिकां रै किणी घटक नैं जिण री आप री खास भासा, लिपि अर संस्कृति है उण री रिछपाळ रौ अधिकार व्हैसी। अनुच्छेद 29 रै खंड 2 अर अनुच्छेद 30 मांय पोसाळा में भासा रै आधार पर भेद नैं नाकस कर्यौ है। अनुच्छेद 35 में साफ कैईज्यौ है कै हरैक मिनख नैं किणी भी सिकायत रै निवेड़ै सारू संध या राज्य रै किणी भी अधिकारी या प्राधिकरण नैं संध में या राज्य में किणी भी सूरत में बरतीजण वाळी किणी भी भासा में अभियोग देवण रौ अधिकार है।

दूजी कांनी भांत भांत री भासावां नैं न्यारौ-न्यारौ दरजो देवणौ हकीकत में कैई भासावां सारू खास अधिकार व्हैणै अर दूजां रै सारू कमी नैं दरसावै अर आ भेद भाव री हालत कळै री मूळ जड़ है। लोकतांत्रिक दीठ सूं बण्यौ कोई भी भासा संस्कृति कानून दूजी भासावां नैं इण भांत री असमानता नैं ही थापित करै। ओ हळाहळी लोकतंत्र रौ मजाक है! अन्याव अर असमानता रौ छेकड़लो नाकौ है।

विनोद सारस्वत (बीकानेर)

भूंड री भागीदार बणती भारत सरकार!

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

भारत री सरकार राजस्थानी भासा नैं भारत रै संविधान री आठवीं अनुसूचि में नीं भेळ नै भूंड री भागीदार बणण रो कुजोग भोग रैयी है तो दूजी कांनी राजस्थान री अशोक गहलोत सरकार भी इण कांनी सूं मूंडो मोड़ लियो लागै अर राजस्थानी भासा, साहित्य, अर संस्कृति नै तळै बेठावण में कोई पाछ नीं राख रैयी है। जिण रो सैसूं लूंठो सबूत ओ है कै राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी रो सगळो काम ठप पड़यो है नै अठै सूं छपण वाळी मासिक पत्रिका जागती जोत लारलै डेड बरस सूं छपण री बाट जो रैयी है।

अठै नीं तो अध्यक्ष है अर नीं ही कार्य समिति अर सामान्य सभा। इण चक्कर में नीं तो नूंवी किताबां ही छप रैयी है नै नीं ही बरसाऊ दिरीजण वाळा पुरस्कार दिरीज रैया है। इण रो सालीणौ बजट इयां इज लाली लेखे लाग रैयो है जिण री नीं तो कदैई ऑडिट व्है अर नीं ही कोई पूछताछ। इण अकादमी में अबार आंधा पीसै नैं कुता खावै जिसी हालत हुयोड़ी है इण रो रांधण कुण खावै नैं कठै जावै? कोई बतावणियो कोनी मिले। अठै पांच कर्मचारी लागौड़ा है जिणा रै कनै कोई काम नी होवण सूं वै भी आप री हाजरी बजा नैं आप री तिणखा पक्की कर ले। कुण कद आवे, नैं कद जावे? किणी नैं किणी रो ठा कोनी।
राजस्थानी भासा री मानता री बात अबै गांव गळी सूं विधान सभा अर संसद तकात में गूंजे अर इण नैं लेय नैं समूचै भारत भर में बहस नैं चरचावां चाल रैयी है। लारलै दिनां मीडिया क्लब ऑफ इंडिया में भी इण नैं लेय’र सागीड़ी बहस व्ही जिण में सगळा लोगां मान्यो कै राजस्थानी भासा री मानता नैं घणा दिन रोक नैं नीं राखी जा सकै अर भारत री सरकार राजस्थानी भासा नैं मानता नीं देय नैं राजस्थानियां पर अन्याव कर रैयी है। इण बहस में सैसूं बडी बात आ निकळ नैं आयी कै हिन्दी राजस्थानी लोगां पर थरप्योड़ै एक नूंवै उपनिवेसवाद री भासा है अर राजस्थानी भासा नैं आप रो माण-संनमान नीं मिल्यो तो बो दिन अळगो कोनी जिण दिन राजस्थानी लोग हिन्दी रै विरोध में सड़कां पर आय नैं भारत रै इण उपनिवेसवाद रो विरोध करैला।

आपां रा लोग नैं उतरादे भारत रा घणकरा लोगां रै मन में ओ अेक कूड़ो बैम है कै हिन्दी ‘‘रास्ट्रभासा’’ है। इणी कड़ी में अेक बहस रो विसय हो-‘‘क्या हिन्दी राजभासा सै रास्ट्रभासा की ओर अग्रसर हो रही है या राजनीति ने इसे अपने मार्ग से भटका दिया है?’’ इण पर घणी लांबी चाली बहस में आ बात निकळ नैं आयी कै हिन्दी रास्ट्रभासा कदैई नीं बण सकै। क्यूंकै पैली बात तो आ दिखणादे भारत अर उतराद-पूरब रा परदेसां में कठैई किणी रूप में नीं वपराईजै। दूजी बात कै इण नैं मायड़ भासा रै रूप में बोलणिया कोई कोनी। तीजी बात भासा विज्ञान री दीठ सूं किणी भी कसौटी पर खरी नीं ऊतरे। चोथी बात इण में अेकरूपता री जाबक कमी है नैं आ खड़ी बोली रै सागै उर्दू री भेळप अर अरबी-फारसी रै मिश्रण सूं बणी अेक खिचड़ी भासा है जिकी बोल-बतळावण में तो काम आ सकै पण राज-काज नैं कोट-कचेड़ी री भासा नीं बण सकै।
छेकड़ में इण बहस रो नतीजो ओ निकळयो कै भारत सरकार नैं वैदिक भासा संस्कृत नैं रास्ट्रभासा रै रूप में मानता देवण री चेस्टा करणी चाईजै। क्यूंकै संस्कृत भासा सगळी भासावां री जणनी है अर इण रो कोई परदेस में विरोध नीं व्है सकै। इण रै सागै ही आ बात भी आई कै सरकार धर्मनिरपेक्षता री आड लेय’र इण नैं मानण सारू त्यार नीं हुवैला। सरकार त्यार हुवैला जद हुवैला पण ओ सवाल आज भी आप री ठौड़ पर खड़यो है कै इण देस री कोई एक तो रास्ट्रभासा व्हैणी चाईजै। इण में म्हारौ कोई बघार नीं है, जिण लोगां नैं इण बात रो पतियारो नी व्है, तो वै मीडिया क्लब ऑफ इण्डिया री वेबसाइट पर जाय नैं इण नैं परतख देख सकै।

मानता रै इण आंदोलन रै इतिहास में पैली वेळां हिन्दी जगत अर दूजा लोगां नैं ओ ठा पड़ियो कै राजस्थानी भासा नैं लेय’र कोई आंदोलन चाल रैयो है नैं राजस्थान रा लोग अलगाव रै मारग पर जा सकै। हिन्दी रा लोग आ मानण लागग्या कै राजस्थानी जिसी लूंठी भासा नैं बेगी सूं बेगी संवैधानिक मानता मिलणी चाईजै। ’’वैचारिकी’’ पत्रिका रै संपादकीय में छपी एक टीप निजर है। ’’राजस्थानी जैसी भासाओं को मान्यता मिलने से इनका समृद्ध साहित्य हिन्दी में से निकल जायेगा। निकल जाये तो निकल जाये कोई चारा नहीं है। हमें हिन्दी का इतिहास दुबारा लिखना लेना होगा। भले ही उन्नीसवीं सदी के उतरार्द्ध से ही सही।‘‘

दूजी कांनी राजस्थान रो संत समाज भी राजस्थानी भासा री मानता नैं लेय’र आप रा पाचिया टांग लिया है। म्है अठै उण दो राजस्थानी तोपां रो बखाण करणो जरूरी समझूं कै इण संता री वाणी री गूंज आखै भारत में ही नीं, देस-दुनियां में आप रो डंको बजा रैयी है। ऐक है जोधपुर रा जोध संत राधाकिशन जी महाराज अर दूजा रामस्नेही संप्रदाय रा रामप्रसाद जी महाराज। अठे दोवूं संत ‘‘नानी बाई रो मायरो’’ अर भागवत मायड़ भासा में बांच’र सीधा लोगां रै काळजे पर चोट करै। राधाकिशन जी महाराज तो हर ठौड़ आ बात केवै कै आप री भासा संस्कृति नैं मती छोडो।

कळकते री कथा में तो वां आदर जोग कन्हैयालाल जी सेठिया री अमर कविता ‘‘धरती धोरां री’’ सुणा’र इण बात नैं चोड़ै कर दी कै इण आंदोलन में संत समाज भी लारै कोनी। वै सरकार सूं आ खूली मांग करै कै राजस्थानी भासा जिकी करोड़ू लोगां री मायड़ भासा है, इण नैं क्यूं नीं मानता दो? इण रै सागै ही वै आ भी केवै कै इण रो सबूत चाईजै तो म्हारी इण संगत री पंगत में बैठा लोगां री गिणती करलो।

संता री इण दकाळ नैं राजस्थानियां री इण आस नैं भारत री सरकार कद तांई टाळती रेवैला? भारत री सरकार अर प्रदेस रा नेतावां नैं कद चेतौ आवैला? राजस्थान रा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत नैं पैलके अमरीका रै मांय राना रा लोगां फटकार लगाई जद वै राजस्थान री विधान सभा सूं राजस्थानी भासा री मानता रो प्रस्ताव पास करायो। ओ प्रस्ताव लारलै 7 बरसां सूं धूड़ चाट रैयो है। अबार तो देस में अर प्रदेस में वांरी पार्टी री इज सरकार है तद राजस्थान रा लूंठा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत किसी दूजी फटकार नैं उडीकै? राजस्थानी में ऐक केबत है कै गुड़ दियां ही मरै जद फिटकड़ी क्यूं देवै? राजस्थान रा लोगां गुड़ खवा-खवा नैं तो इण नेतावां नैं मोटा-ताजा कर दिया। अबै फिटकड़ी री आस में ओ फिटापो क्यूं करै?

विनोद सारस्वत,
बीकानेर

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

दिल्ली रै कुड़कै मांय फस्यौडा राजस्थान रा मिजळा नेता!

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

आज म्हनैं इण बात रौ पक्को पतियारौ व्हैग्यौ कै राजस्थानी भासा नैं रिगदोळणिया फगत इण प्रदेस रा ही वै मिजळा राजनेता है जिका वोटां री फसल तो इण भासा में काटै, पण विधायक अर मंत्री बणतां ही आप री औकात भूल जावै। कुल मिलाय नैं भारत रा नेतां राजस्थान रै नेतावां नैं जिण कुड़कै में फसा’र छोडग्या आज तकात वै उण कुड़कै सूं बारै निकळ नीं सक्या है। हिन्दी रा गंंुण गावणिया इण नेतावां रा पौत नैं इणा नैं कितोक ज्ञान है आज सगळौ चवड़ै आयग्यौ। आज रै भास्कर में छप्यै अेक समाचार मुजब राजस्थान रौ जूनौ ’िाक्षा मंत्री काळी चरण सर्राफ आ कैवै कै हिन्दी रास्ट्रभासा है! अबार रौ ’िाक्षा मंत्री मास्टर भंवरलाल आ कैवै कै हिन्दी राजस्थान री मातृ भासा है।

दूजै कांनी राजस्व मंत्री हेमाराम आप री न्यारी पूंपाड़ी बजावंता आ कैवै कै राजस्थानी भासा हरैक ठौड़ न्यारी-न्यारी बोली जावै। अबै इण कुमाणसा नैं आ कुण समझावै कै प्रकृति रौ नैम है कै 12 कोस पछै बोली बदळ जावै अर ओ नैम संसार री हरैक भासा पर लागू व्है। इण लोगां नैं ओ भी ज्ञान कोनी कै भासा अर बोली में कांई फरक व्है। भासा अर बोली मे फरक नी कर सकै वै गैलां में कांई घटै। जिण भांत अेक-अेक मिणियो जोड़ण सूं माळा बणै, उणी भांत कैई बोलियां रै पांण भासा बणै अर जद इण में साहित्य रौ सिरजण व्है वा भासा बण जावै। हिन्दी भासा में बोलचाल रा 97 पंजीकृत सरूप काम में लेईजै अर राजस्थानी में 73 सरूप काम मे लेईजै इणी भांत असमिया में 2, बंगला में 15, गुजराती में 27, कन्नड़ में 32, कोंकणी में 16, मलयालम में 14, मराठी में 65, तमिल में 22, तेलुगु में 36, उर्दू में 9 क’मीरी में में 5 नेपाळी में 4, संथाळी में 11, पंजाबी में 29, सिंधी में 8, बिहारी में 34, अे सगळा वां बोलियां रा न्यारा-न्यारा सरूप है अर इण बोलियां सूं अे भासावां बणीजी है। इण लोगां नैं राजस्थानी रै लूंठै साहित्य रौ अंगाई ज्ञान कोनी। आखी जगत बिरादरी इण भासा री धाक मानै।

राजस्थान री यूनिवर्सिटिया में तो इण रौ साहित्य पढाईजै ई है इण रै सागै ही अमरीका री सिकागो यूनिवर्सिटी में भी पढाईजै। अमरीका री ओबामा सरकार भी आप रै अठै इण भासा नैं मानता दे राखी है। आ तो वा भासा है जिण में मीरां मेड़तणी गिरधर गोपाळ नैं रिझायौ है, इणी भासा में भगवान करमा रौ खीचड़ौ खायौ है। इण भासा रौ बखाण कठै तांई करां इण रौ कोई पार कोनी। पण इण सूं ओ साफ लखाव व्है कै लारलै साठ बरसां सूं जिण हिन्दी माध्यम सूं अे नेता भण्या-गुण्या है वांरौ डोळ नै वारौ ज्ञान चवडै+ आयग्यौ है। इण प्रदेस रा नेतावां रौ ही ज्ञान जद इत्तौ ओछो नैं कंवळौ है तद सोचो कै इण प्रदेस में इण अधकिचरी भणाई में भण्या आम लोगां रौ ज्ञान कित्तौक बध्यौ हुसी। अे मिजळा नेता नीं चावै कै प्रदेस रा टाबर आप री उण वीर भासा में भणै, जिण रै रसपाण सू खागां खड़क उठै अर लोग बळती लाय में कूद पड़ै। जदि ओ हुंवतो तो आज आ विगत नीं होवंती, इण रोळ राज रा टप्पू कदै चकीज जांवता अर मायड़ भासा रौ अपमान भी नीं होंवतो अर लोग इण अन्याव नैं मून धार नैं नीं सैंवता। वै खागां लेय’र इण रोळ राज रै सांमी आ भिड़ता।

मतलब भारत रा राजनेतावां नूंवै उपनिवेसवाद री अेक भासा ’’हिन्दी’’ माडाणी अठै रा लोगां पर थरपदी। किणी भी संस्कृति नैं खतम करणी है तो अेक सीधो सो हथियार है कै उण री भासा नैं खतम कर दो, संस्कृति रा भट~टा मतोमत ही तळै बैठ जासी। राजस्थान रा राजनेता आप री चाल में कामयाब व्हैग्या। इण नेतावां री लूण हरामी रौ अेक नमूनौ निजर है- कै किण भांत इण लोगां हिन्दी रा पांवडा इण प्रदेस में पधरावण रा जतन करण सारू राजस्थान री जन गणना रा आंकड़ा में हिन्दी नैं पटराणी बणावण रा सगळा ं पड़पंच रच लिया। 1951 री जनगणना मुजब राजस्थानी भासा बोलणियां री संख्या 1,34,01,630 ही अर 1961 में राजस्थान री आबादी में 26 प्रति’ात रौ बधापौ व्हियौ पण राजस्थानी बोलणियां री संख्या में फगत 11 प्रति’ात रौ ही बधापौ दीखै। 1961 री जन गणना में राजस्थानी बोलणियां री संख्या 1,49,33,016 दिखाईजी है। इणी भांत आवण वाळी हरैक जन गणना मे राजस्थानी बोलणिया री संख्या नैंं अे बटटै खाते में नाखता थकां इण नैं हिन्दी रै खाते में खतावंता-खतावंता दिल्ली री इण आस नैं पूरी कर दी कै राजस्थान हिन्दी भासी प्रदे’ा है।

मतलब राजस्थान नैं दिल्ली रौ उप निवे’ा बणावण री सगळी जरूरतां पूरी करली जद ही तो राजस्थान रौ ’िाक्षा मंत्री कैवै कै राजस्थान री मातृ भासा हिन्दी है। इण भांत राजस्थान नैं अेक चरणोई बणा’र समूचै भारत रा गोघां नैं अठै चरण री खूली छूट मिलगी। राजस्थानी भासा नैं आठवीं अनुसूचि में भेळण री मांग बरसां सूं चालती रैयी है, अर राजस्थान री विधान सभा 2003 में अेक प्रस्ताव सरब सम्मति सूं पारित कर नैं भेज चुकी है ओ प्रस्ताव भी सरकार किण मजबूरी रै पांण पारित करवायौ आ बात जगचावी व्है चुकी है। राजस्थानी भासा आठवीं अनुसूचि में जद कदै भी भिळै, पण राजस्थान सरकार खुद कनैं इण भांत रा अधिकार है कै वा अेक रात में प्राथमिक ’िाक्षा रौ माध्यम राजस्थानी नैं बणा सकै। पण सरकार ओला रैयी है अर कोई नैं कोई नूंवौ विवाद खड़ो कर नैं इण मामला नैं Åंडै कुअै में न्हाखण सारू ताफड़ा तोड़ रैयी है। राजस्थान रा राजनेता आम जन री नीं सुण नैं वां अधिकारियां री सला पर काम कर रैया है जिका नीं चावै कै राजस्थानी अठै रै राजकाज अर ’िाक्षा री भासा बणै।

नेतावां खनै आप री सोचण-समझण री सगळी Åरमा खतम व्हैगी। वै तो उणी मारग पर चालै जिका वांरा पीअे अर सेकzेटरी बतावै। जिका सगळा लोग बारै रा है, कैई अेक राजस्थानी मूळ रा है भी तो वांरी कठैई चलै कोनी। अे नेता इण अधिकारियां रै हाथं री कठपुतलियां है, अे जिंया नचावै अै बिंया ई इज नाचै। फैर तो अठै रौ राम ही रूखाळौ है अर इण भासा में कीं तो इसौ है नैं आप री वा लूंठाई है कै अे मिजळा नेता अर वै बारला अधिकारी लाख फिटापणौ करलौ इण भासा री लूंठाई अर अमरता नैं कम नीं कर सकै।
विनोद सारस्वत,
बीकानेर