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पूराणो घणो स्याणो, राख ली लाज

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

एक सेठ रो कारोबार देस-दिसावर फैलियोड़ो हो। उणरै एक बेटो हो। ठोर-ठोर उणरी गद्दिया हीं, पण उणरै स्वरगसिधारण रै पछै छोरो ठीक तरीका सूं काम नीं संभालियो। वो पुराणा लोगां नै निकाल नुवा मिनखा नै काम माथे राख दिया। इणरो असर ओ व्हियों कै काम-काज खराब व्हैवण लागो। एक दिन सेठ रै बैटा माथै दस हजार रूपिया री दरसन हुंडी आई। गल्ला में रूपिया नहीं हा, पण हुंडो सिकारनी जरूरी हीं। छोरो उदास मुंडा सू घरै गियो, उणरी मां कह्यों कै बात हैं ? वो सारी बात बतलायी तो मां कह्यो रूपया रा जुगाड़ में थोड़ो अैम लाग जावैला, तू आपरी गद्दिया माथै कागद लिख अर रूपिया भेजण वास्ते कह, पण इतरा टैम हुंडी खड़ी नीं रै सके, इण सारू जुणोड़े बूढे मुनीम नै बुलावा। बूढ़ा मुनीम रै घरे बुलावो भेजियो ग्यो। मुनीम री घणी उमर व्हैगी ही। ठंड रो मौसम हो, इण सारू बुढो मुनीम रूई अर शाला ओढणै जाड़ा रै मारै कांपतो-कांपतो सेठी री पेड़ी माथै पूगियो। उणमें काम करण री आसग नीं ही। मुनीम कह्यों आज घणी ठंड हैं, पेड़ी माथै हीं सिगड़ी मंगवाओं ? मुनीम रै सारू सिगड़ी मंगवाई गई। हुंडी लावण वालो मिनख हुंडी बूढा मुनीम रै हाथ में दी अर मुनीम कांपता हाथां सूं हुंडी पढण लागौ। मुनीम रा हाथ ठंड सू कांप रिया हा। हुंडी उणरै हाथ सू छूट सिगडी मांय पडगी। हुंडी जल-बग गी जणै मुनीम घणों दुख परगट करियो वो उणसूं कह्यो भाई । हुडी म्हारा हाथ सूं सिगड़ी माय पडऩै जलगी, अब थै उणरी पैठ मंगवा लो। पैठ आवैला जणै थाणै रूपिया मिल जावैला। हुंडी लावण वालां मिनख आ बात नीं जान सकिया कै बूढ़ौ मुनीण जाण-बूझणै हुंडी सिगड़ी मांयने डाली है। सेठ री फरम घणी मोटी हीं, मुनीम रो भारी परभाव हो। वो मिनख वठा सूं चलो गियो। उणरै जावण रै पछेै सेठ रो बैटो मुनीम रा पग पकड़ लिया अर उणणै पाछौ बड़ा मुनीम री गादी माथे बिठा दियो। थौड़ा टेैम रे पछै सैठ रो कारोबार उणी तरा सूं चालण लागौ। देस-दिसावर में सेठ रा छोरा री पैचाण व्हैगी।


पाणी रे काचे-पाके सूं करी छोरे री पैचाण

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

एक डोकरे आप रे धरा जा रहï्यो हो। रास्ते में उणनै एक छोरो मिल्यो। दोनूं सागै हो लिया। वै जिकै गांव जा रहï्या हां, वो चार कोस हो। छोरी डोकरे ने कहï्यों, बाबा, गंाव चार कोस पर है, दो कोस थे म्हनै कांधे पर चढ़ा ल्यां, दो कोस म्हैं थाने चढ़ा लेस्यूं। डोकरो कहï्यो, थू तो जवान है, म्हनै चढ़ा लेसी, पण म्है कीकरण थनै चढाऊंला, रहण दे भाया। बीच में एक जगा नाठो आयो तो डाकरो जूता आपरे हाथां में ले लिया, पण छोरो पैर्या हीं राख्या। डोकरो मन में सोची, ओ छोरो मूरख है, नया जूता पानी में गीला कर र खराब कर लिया। थोड़ी देर में दोनूं गांव पूरा ग्या। डोकरो छोरे ने इशारे सूं आपरो घर बतायो, तो छोरो एक कांकरी घर कै किवांड पर मार दियो। किवांड डोकरे री छोरी खोल्या। छोरो पाणी मांग्यो। छोरी पाणी लेयर आई तो छोरो पूछ्यो, पाणी काचो है के पाको ? छोरी भी हुशियार हीं, बोली, पाणी काचो है। डोकरो ऐ बाता सुण र हैरान होग्यो। वो छोरी ने मांयने ले जाय र कहï्यो कै छोरी मूरख है, रस्ते में इण तरहा री बातां करो। छोरी हुशियार हीं, मा बापू ने कैवण लागी, बाबा, छोरो मूरख कोनी, हुशियार है। वो आधे रस्ते थाने चढ़ावण और आधे रस्ते खुद चढ़ण री बात यूं करी हीं कै आधे रस्ते थे की बोलो, आधे रस्ते म्हैं कीं बोलू तो रस्तो आराम सूं कट जावैला। पाणी रे मांय जूता इण वास्ते नीं उतारया, क्यूंकि पाणी रे तल रे मांय कोई चीज सूं पगां में चोट लाग सके। जूता मिनख री जान सूं बता कीमती कोनी हुया करै। गांव आया पछै छोरो किवांड पर कांकरो फेंक्यो, उण टैम म्हैं न्हा रेया हीं। म्हैं फटाफट बारै निकळ कर कपड़ा पैरय और बारे आय र किवांड़ खेल दियो। घरै आतां ही छोरो पाणी लावण पर पूछये कै पाणी काचो है या पको, इण रो मतलब यो हैं कै म्हैं कुंवारी हूं या ब्याहता, म्हैं पडूतर दियो, पाणी काचो है, यानी म्हैं कुंवारी हूं। डोकरो पूरी बात समझग्यों अर छोरी सो ब्याह उण छोरे सू कर दियों। दोनूं राजी सुखी रैवण लाग गया।