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मारवाड़ी शब्द का प्रयोग -शम्भु चौधरी

Rao GumanSingh Rao Gumansingh


मारवाड़ी शब्द वर्तमान समय में संकुचित और रूढ़ीगत दायरे की चपेट से बाहर आने लगा है। धीरे-धीरे यह शब्द देश के विकास का सूचक बनता जा रहा है, एक समय था जब समाज के लोग भी इसे घृणा का पर्यावाची सा मानने लगे थे। मंच के कुछ जागरूक सदस्यों ने मेरा मंच ब्लॉग पर इस बात पर एक परिचर्चा शुरू की है। जहाँ तक मेरा मानना है कि 'मारवाड़ी' - शब्द न कोई जाति, न धर्म और न ही किसी प्रान्त का द्योतक है जैसे- पंजाबी, बंगाली, गुजराती आदि कहने से अहसास होता है। राजस्थान एवं हरियाणा व पंजाब के कुछ सीमावर्ती इलाके के प्रवासी लोगों को भारत के अन्य प्रान्तों या विदेशों में भी इस समाज को 'मारवाड़ी ' शब्द से जाना व पहचाना जाता है, वहीं इसी प्रान्त के मुसलमान समाज ने अपने आपको इस शब्द से अलग ही कर रखा हैं [कुछ अपवादों को छोड़कर]। जबकि अन्य धर्म व संप्रदाय के सभी लोगों को जिसमें विशेषत: हिन्दू, जैन, ओसवाल, माहेश्वरी, ब्राह्मण, राजपुत, बनीया आदि सभी धर्म जाति के लोग शामिल पाये जाते हैं। यहाँ पंजाब और हरियाणा क्षेत्र के राजस्थानी जो एक समय राजपुताने क्षेत्र में ही आते थे, अब भूगौलिक परिवर्तन व पंजाब और हरियाणा प्रान्तों के रूप में जाने जाने के चलते इस क्षेत्र का मारवाड़ी समाज अपने आपको पंजाबी या हरियाणवी ही मानने लगे हैं, जबकि इनकी बोलचाल-भाषा, पहनवे, रीति-रिवाज, राजस्थानी भाषा संस्कृति से मिलते ही नहीं राजस्थानी संस्कृति ही हैं, इसीलिए प्रवासी मारवाड़ी समाज के लिये आम तौर पर राजस्थानी शब्द का ही प्रयोग किया जाता है भले ही वे हरियाणा या पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र से ही क्यों न आतें हों पीछले दिनों श्री राजेश कुमार जैन ने यह प्रश्न उठाया था कि मारवाड़ी से तात्पर्य जब राजस्थानी भाषा और संस्कृति से ही लगाया जाता है तो हरियाणा की क्या कोई साहित्य या अपनी संस्कृति नहीं है? यह प्रश्न आज की युवा पीढ़ी का उठाना वाजिब सा लगता है जब हरियाणा एक समय पंजाब के अन्तर्गत आता था तो यह बात पंजाब के साथ भी उठती थी की हरियाणा की अपनी अलग संस्कृति है इस पंजाब से अलग कर दिया जाय और हुआ भी ऎसा ही पंजाब ने यह स्वीकार किया कि हरियाणा को एक अलग राज्य का दर्जा देना ही उचित रहेगा। परन्तु इस राज्य के अलग दर्जे को प्राप्त कर लेने से जो क्षेत्र राजस्थान रियासतों के अधिन आते थे उनकी भाषा, संस्कृति, पहनावे, खान-पान , रीति-रिवाज हो या पर्व त्योहारों सभी में एक समानता पाई जाती थी जो थोड़ा बहुत अन्तर था तो वह सिर्फ बोली का ही था। देखें नीचे दिये गये एक चित्र के लाल निशान को जिसमें हिसार, भिवानी, रोहतक, गुड़गावं, लेहारू, महेन्द्रगढ़, पटियाला और दिल्ली का भी छोटा सा भाग राजपुताने क्षेत्र में दिखाया हुआ है। जो इन दिनों