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मारवाड़ी देस का न परदेस का भाग-5 लेखक: शम्भु चौधरी

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

यह बात हम सभी मानते हैं कि इस समाज ने समाज-सेवा, शिक्षा, धर्म, चिकित्सा, आकस्मिक आपदाओं, प्राकृतिक विपदाओं, काल-अकाल आदि दुर्योगों के समय तथा अन्य विविध क्षेत्रों के साथ-साथ हिन्दी साहित्य सेवा के अलावा भी समस्त भारतीय भाषा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। विद्वानों, साहित्यकारों, कलाकारों, आदि को सम्मानपूर्वक आर्थिक सहयोग प्रदान कर उनके जीवन को सुगम बनाने में अपनी भूमिका का निर्वाह भी करता रहा है, जबकि इस तरह का कार्य इतर समाज में देखने को कम ही मिलता है, जो थोड़ा बहुत मिलता है, उसका कार्यक्षेत्र स्वयं के समाज तक सिमटा नजर आता है, कुछ सामाजिक संस्थाओं को छोड़ दिया जाय तो, आंकड़े भी मिलने संभव नहीं है। जो वैगर सरकारी सहयोग के कार्य किया हो। यह एक अलग बहस का विषय है, मैं इस विवाद की तरफ नहीं जाना चाहता, किसने क्या काम किया, इस लेख में सिर्फ यह बात जानने का प्रयास करूँगा कि आखिर वे कौन-कौन से कारण हो सकते हैं जिसके चलते मारवाड़ी समाज इतर समाज में कुंठा का कारण बना रहता है। इन तमाम कार्यों के विपरीत मारवाड़ी समाज ने एक छोटी किन्तु भारी गलती भी की। वह गलती है समाज के इतिहास को महत्व न दिया जाना, यदि कहिं कुछ थोड़ा बहुत छपा भी तो उन प्रकाशनों में सम्पन्नता झलकती है। इस छोटी सी गलती ने समस्त मारवाड़ी समाज के तमाम कार्यों पर पानी फेर रखा है। हम अपने बच्चों को स्वाभिमान की जिन्दगी जीने लायक नहीं रख पाये। इसके लिये हमें आस-पास के परिवेश में मारवाड़ी समाज के प्रति व्याप्त कुंठा के लिये हम अपने ही समाज को दोषी ठहरा सकते हैं। इस कौम की एक विशेषता यह भी है कि वह किसी भी घटना का प्रतिवाद न कर हमेशा से 'आत्म-सुरक्षा' का रुख अख्तियार करता रहा है। यह आत्म-सुरक्षा, किसी आत्म-सम्मान की सूचक नहीं वरन् अपमान भरी भावना का घूँट पीने जैसा है। इस आत्म-सूरक्षा का दूसरा पहलू इस रूप में सामने आता है कि भयभीत मानसिकता के प्रतिफल के रूप में अपने बच्चों की मानसिकता को कमजोर करते हुए, कई बार यह कहते पाये जाते थे - "छोड़ ण आपणो के लेव - जाण दे" या फिर " मांयणे आकर सांकली लगा ले" अर्थात स्वयं पर कोई बात होने पर कहता है - छोद़ दो, अपना क्या लेता है, या किसी आस-पड़ोस की तकलीफ में खड़ा न होकर यह कहते पाया जाता है - 'घर के अन्दर आ जाओ और दरवाजा बन्द कर लो' । मारवाड़ी समाज सामाजिक तो है , पर की बार ऎसा लगता है कि सामाजिक प्राणी नहीं है। मैने कई बार पाया है कि कुछ लोग मेरे द्वारा स्वयं के समाज के प्रति की गई टिप्पणियों को गलत तरीके से इस्तमाल करते हैं खास कर ऎसे लोगों से मेरा निवेदन रहेगा कि वैगर किसी संदर्भ के किसी पेरा को मोटे अक्षरों में दिखाने से पूर्व अपनी बात को रखें ताकि हमारे समाज तक आपकी भावना का सही अवलोक भी साथ में किया जा सकेगा। समाज में राजनैतिक परिवेश: एक समय था जब इस समाज का प्रतिनिधित्व, समाज के चन्द पूँजीपति घराने तक ही सिमटा हुआ था, उनके द्वारा दिये गये या सुझाये गये नाम को ही संसद या विधानसभा में स्थान दिया जाता रहा। अब यह स्थिति काफी बदल चुकी है, जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओँ ने अपनी पहचान कायम की है। साथ ही साथ समाज का झूकाव एक दल की तरफ न होकर काफी फैल चुका है। आजादी के समय कांग्रेस को खुला समर्थन देने वाले समाज ने साथ ही साथ को जनसंघ वर्तमान में भाजपा को भी सहयोग दिया। परन्तु यहाँ यह बात भी महत्वपूर्ण है कि ये लोग राजनीति को कभी नजदीक से नहीं देखते थे, परोक्ष रूप से आर्थिक सहयोग देना, एवं सत्ताधारी दल से अपने फायदे या उद्योग व्यापार से जुड़ी बातों से ही अपना मतलब रखते थे। किसी सभा का आयोजक बनकर उस सभा का खर्च जुगार करने वाले वफादार कार्यकर्त्ता माने जाते थे। अब इस दिशा में भी इनकी पहचान गौण, बल्कि यूँ लिखा जा सकता है कि राजनैतिक दलों को सोच में काफी बदलाव देखने को मिला है, एक तरफ सभी दल धर्म की आड़ में एक विशेष संप्रदाय के वोटरों को लुभाने हेतु मिथ्या धर्मनिपेक्षता का चोला पहन रखें हैं और एक धर्म को केन्द्र कर अपने दल की राजनीति करने में लगे हैं वहीं कुछ प्रन्तीय स्तर के दल जात-पात की राजनीति करने में लग गये, इनकी इस राजनिति का परिणाम अभी हाल ही में हमें महाराष्ट्र के अन्दर देख्ने को मिला। यह बात हमें मान लेनी चाहिये कि भारत की एकता न तो जातिय आधार की राजनीति में समाहित हो सकती है न ही धर्म की राजनीति में, ये दोनों सिद्धान्त कुछ समय तक भले ही किसी को सत्ता में ला दे लेकिन दूरगामी परिणाम कफी भी अच्छे नहीं हो सकते। मारवाड़ी समाज का वर्तमान राजनैतिक परिवेश शुन्य में भटक चुका है। राजस्थान के सांसद, विधायक अपने को मारवाड़ी नहीं मानते, और मारवाड़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग इतने सक्षम नहीं की वे अपने बुते किसी भी क्षेत्र से विधायक या सांसद बन सके, यह बात सही है कि समाज के कई लोगों ने इस क्षेत्र में अपनी पहचान कायम की है जिसमें असम के स्व.हीराला पटवारी, एवं स्व. राधाकिशन खेमका, श्री कमला प्रसाद अग्रवाला (तेजपुर), बंगाल से स्व.विजयसिंह नाहर, स्व.प्रभुदयाल हिम्मतसिंका, स्व.ईश्वरदास जालान,श्रीमती सरला माहेशवरी,श्री राजेश खेतान, श्री संतोष बागड़ोदिया, स्व.देवकीनन्दन पौद्दार, श्री सत्यनारायण बजाज एवं अब इनके पुत्र- श्री दिनेश बजाज(कोलकात्ता), बिहार से स्व.सीताराम चमड़ीया, श्री शंकर टेकरीवाल (छपड़ा), श्री सुशील मोदी, श्री धिरेन्द्र अग्रवाल(छपड़ा), श्री बनरसी प्रसाद झूणझूणवाला(Bhagalpur), श्रीमती राजकुमारी हिम्मतसिंहका केन्द्रीय स्तर पर स्व.लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, वर्तमान में उनके पुत्र श्री अभिषेक सिंघवी, महाराष्ट्र प्रान्त के श्री राज के पुरोहित, डॉ जयप्रकाश मुंदड़ा,श्री मुरली देवड़ा, श्री दिलीप कु.मनसुखलाल गांधी, दिल्ली प्रान्त से श्री जयप्रकाश अग्रवाल श्री गोयल जी , उत्तरप्रदेश: श्री होती लाल अग्रवाल, श्री विरेन्द्र अग्रवाला(मुरादावाद) श्री मुकुन्दलाल अग्रवाल(वरेली)मध्यप्रदेश: श्री कमलनयन बजाज,श्री बी.आर.नाहटा, श्री श्रीमन नारायण अग्रवाल( वर्धा), श्री श्रीकृष्ण अग्रवाल (Mahasamund), श्री कल्याण जैन(Indore)पंजाब- श्री श्रीचंद गोयल, हरियाणा: श्री ओमप्रकाश जिंदल, श्री नवीन जिंदल इसमें कई प्रन्तों से विधायकों के नाम जोड़े जाने बाकी हैं ( मेरी जानकारी में नहीं होने के चलते नहीं जोड़ पाया हूँ, आपके पास कोई जानकारी हो तो मेल द्वारा सूचित करेगें-लेखक) ऊपर में राजस्थान से सिर्फ स्व.लक्ष्मीमल सिंघवी व उनके पुत्र वर्तमान में श्री अभिषेक जी का नाम ही जोड़ा गया है, वैसे इन दिनों मारवाड़ी युवा मंच के एक कार्यक्रम में श्रीमती सुषमा स्वराज ने भी अपनी पहचान मारवाड़ी होने की दी है। इन लोगों के अलाव भी बहुत सारे नाम है जिन्हें इस सूची में जोड़े जा सकता हैं। इन सबके होते हुए भी यह लिखने में मुझे जरा भी झीझक नहीं है, कि ये समाज राजनीति स्तर पर राजनैतिक दलों में अपनी पहचान बनाने में कसी भी प्रकार से सफल नहीं दिखते। हाँ, बिहार में श्री सुशील मोदी और दिल्ली के श्री अभिषेक सिंघवी को छोड़ दिया जाय तो सभी व्यापारी श्रेणी में ही आंके जा सकते हैं। मेरे कहने का अर्थ यह नहीं कि इनका व्यापारी होना समाज के लिये अच्छा नहीं था, मेरा मानना है कि राजनीति में जाना हो तो व्यापार की बात समाज को सोचना बन्द करके शुद्ध रूप से राजनीति करनी चाहिये। मारवाड़ी भले ही किसी राजनैतिक पार्टी का कोषाध्यक्ष बनकर अपने आपको महान समझता रहे, परन्तु मैं मानता हूँ कि यह समाज के लिये मात्र कमजोरी वाली बात है, मुझे खुशी है कि मारवाड़ी सम्मेलन के वर्तमान अध्यक्ष श्री सीताराम शर्मा ने अपने सत्र में राजनैतिक रूप से सजग होने के लिये एक अभियान चलाया है, जिसमें समाज को वोटर लिस्ट में अपने व अपने परिवार का नाम दर्ज कराना, चुनाव के दिन मतदान में हिस्सा लेना, व वोट डालने के लिये समय पर जाना, साथ ही धन के बजाय जंमीनीस्तर की राजनीति करने की सलाह दी गई है। हमारा समाज अभी तक राजनैतिक स्तर पर अपना सही प्रतिनिधित्व नहीं कर पाया है और न ही इसके लिये कोई सोच तैयार कर पा रहे हैं ना ही कोई संगठित ढाँचा है, जिस पर केंद्रित होकर काम किया जा सके। मेरा सोचना है कि आज के वर्तमान दृश्य को ध्यान में रखते हुये मारवाड़ी समाज को देश की राजनीति में हिस्सेदारी निभाने के लिये नई भूमिका क निर्वाह करना होगा, न कि केवल भामाशाह के रूप में , जैसा कि होता आया है। क्रमशः लेख आगे जारी रहेगा, आप अपनी राय से मझे अवगत कराते रहें - शम्भु चौधरी http://groups.google.com/group/hindibhasha http://groups.google.com/group/samajvikas http://samajvikas.in