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हम तो अंग्रेजी, मायड़ में ही समझाते हैं'

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

Bhaskar Newsविभिन्न अंचलों से. प्रदेशभर के शिक्षक भी स्कूलों में प्रारंभिक स्तर से राजस्थानी पढ़ाए जाने के पक्ष में हैं। उनका कहना है कि आज भी अधिकतर गांवों की सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को शब्दों का अर्थ उनकी ही भाषा में समझाना पड़ता है। यदि राजस्थानी को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है तो बच्चे कठिन विषयों के बारे में भी सरलता से जानकारी हासिल कर सकते हैं।

शनिवार को दैनिक भास्कर के संवाददाताओं ने प्रदेश में स्कूल का दौरा कर वहां के शिक्षकों से बातचीत की जिसमें लगभग सभी ने स्कूलों में राजस्थानी विषय पढ़ाए जाने के पक्ष में राय व्यक्त की है। यह तथ्य भी सामने आया कि गांवों के मात्र पांच प्रतिशत स्कूली बच्चे ही हिन्दी में बातचीत करते हैं बाकी सभी राजस्थानी को ही बातचीत का माध्यम रखते हैं।

जयपुर के शहरी और ग्रामीण स्कूलों के शिक्षकों की यही राय रही कि राजस्थानी भाषा को स्कूलों से अलग नहीं किया जा सकता। बोलने और समझाने में जिस भाषा का सरलता से उपयोग होता है वही भाषा श्रेष्ठ मानी जाती है। आज भी प्राथमिक कक्षा के बच्चे जब समझने में अटक जाते हैं तो मातृभाषा का ही सहारा लेना पड़ता है। सरकार चाहे इस भाषा को लागू करे या न करे, हमें तो आगे भी इसका सहारा लेना ही पड़ेगा।

उदयपुर में शिक्षकों की राय थी कि बच्चों को हिंदी के मुकाबले अपनी भाषा में जल्दी समझ में आता है। कभी कभी कठिन शब्दों को समझाने के लिए यही उपाय काम आता है।

शिक्षकों का तर्क था कि जब दूसरे राज्यों में उनकी स्थानीय भाषा को मान्यता मिली हुई है तो राजस्थान इसमें पिछड़ा हुआ क्यों है?

कोटा के गुरुजनों का मत था कि अंग्रेजी और गणित विषय में कई शब्द बच्चों को समझ में नहीं आते, उस समय शिक्षक स्थानीय भाषा का ही सहारा लेते हैं। राजस्थानी भाषा में ही बच्चे प्राथमिक ज्ञान लेकर स्कूल में आते हैं, यहां आते ही उन्हें दूसरी भाषाओं का सामना करना पड़ता है। इससे अच्छा है कि उन्हें उनकी भाषा में ही ज्ञान मिले।

अजमेर के शिक्षक मानते हैं कि राजस्थानी के माध्यम से प्रारंभिक शिक्षा की नींव को मजबूत किया जा सकता है। बच्चों को आसानी से शिक्षा से जोड़ा जा सकता है और निरक्षरता को दूर किया जा सकता है। जोधपुर के शिक्षकों की राय भी राजस्थानी भाषा के पक्ष में रही।

बीकानेर की एक स्कूल में तो प्रत्यक्ष नजारा देखने को मिला जब अंग्रेजी की क्लास में शिक्षक ने बच्चों को अर्थ समझ में नहीं आने पर राजस्थानी में बताया तो सभी बच्चों की समझ में आ गया। इसके अलावा भी कई स्कूलों में राजस्थानी का सहारा लिया जा रहा था।

इस भाषा की जानकारी के अभाव में राजस्थानी इस ज्ञान के भंडार से वंचित रह जाते हैं। हकीकत यह है कि आपसी तालमेल और समझाइश का सहज और बेहतर माध्यम है। बच्चे स्कूल में हिंदी और राजस्थानी दोनो भाषा का इस्तेमाल करते हैं। यदि यह पाठ्यक्रम में हो तो उनकी समझ का दायरा बढ़ाया जा सकता है।

बीकानेर की एक स्कूल में तो प्रत्यक्ष नजारा देखने को मिला जब शिक्षक ने अंग्रेजी की क्लास में बच्चों को अर्थ समझ में नहीं आने पर राजस्थानी में बताया तो सभी बच्चों की समझ में आ गया। इसके अलावा भी कई स्कूलों में भी राजस्थानी का सहारा लिया जा रहा था। यहां के शिक्षकों का कहना है कि राजस्थानी घर— घर की भाषा है और यहां के लोगों के रोम रोम में रची बसी है।

सीकर के शिक्षक कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में राजस्थानी भाषा का अधिक प्रभाव है और बच्चे घर से राजस्थानी में ही सीखकर आते हैं। यहां भी उन्हें वैसा ही वातावरण मिले तो उचित रहता है।

श्रीगंगानगर में शिक्षकों का कहना है कि मातृभाषा में शिक्षा देने की व्यवस्था सरकार ने भले ही नहीं लागू की हो लेकिन हमारे ज्यादातर स्कूलों में व्यवहारिक रूप से राजस्थानी के माध्यम से ही पढ़ाया जाता है। बांसवाड़ा में शिक्षकों का मत था कि राजस्थानी भाषा को वागड़ भाषा के समन्वय से पढ़ाया जाए तो यहां के बच्चे अधिक आसानी से ग्रहण कर सकेंगे।