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प्रताप-प्रतिग्या

Rao GumanSingh Rao Gumansingh


दुरजण जबलग देस में, हेम न पहरुं हाथ।
भाखर विपदा भटकणो, आंणज इकलिंग नाथ॥
बड़का जिण कारण विकट, सही विपद सन्ताप।
हडकण रजकण बिण हुवां, पण नँह तजै प्रताप॥
चेटक चढ़ आयौ चटक, मेटक अरियां माण।
जग उण दिन ही जाणियौ, भव मझ बीजो भाण॥
धारां हूंत धपाविया, अरियल दळ आराण।
पीढ्या लग लडिया पिसण, मिणधारी महराण॥
नम नम नीसरीया निलज, दूजा सह देसोत।
दिल्ली ढिग नह डिग दियो, सूरज कुल सांगोत॥
भाखर भाखर भटकियो, तजियो ध्रम नह तन्त।
महाराण मेवाड मह, भली करी भगवन्त॥
सत पर साबत साहिबौ, कर देखो सह कोय।
सीसोदा रहिया सदा, साय एकलिंग सोय॥
चेटक आहव इम भाखियो, पता तुरंग तूरंग॥