राजिया रे दूहा सारु http://rajiaduha.blogspot.com क्लिक करावें रज़वाड़ी टेम री ठावकी ख्यातां रो ब्लॉग आपरै सांमै थोड़ाक टेम मा आरीयो है वाट जोवताईज रौ।

रावण नो ठाठ

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

जळहळ ज्योत उद्योत, मणी जळहळता जडिया,
चिंतामणी भरभीत, नवे ग्रह आवी अडिया,
परवाळा पर पोळ, स्फाटिक स्तंभ ठर्या छे,
चुडामणी चोपास, कनक कोठार भर्या छे.
अष्टमा सिद्धि नव निधि रिधि महालक्ष्मी वासे वसी,
शिवनी आपी समृधि ज्यां त्यां उपमा करवी कशी. [१]

ओळग करे ज्यां ईन्द्र चन्द्र ज्यां छत्र धरे छे,
दिवाकर कर दिप, वरूण ज्यां नीर भरे छे,
चार वदन थी वेद, ब्रह्माजी पाठ भणे छे,
धलहल तजी धर्मराय, ज्ञान गुण एह गणे छे,
रतनखांण रतनावळी कल्प द्रुम मोटा मणी,
रिधि घणी रावण घरे अलखत ईन्द्रासन तणी. [२]

सात सोनेरी कोट, अधिक एक जोजन उंचा,
पांचसो पांसठ पोळ, ओळ खरा ज्यां खूंचा,
दरवाजा दस×वीस, बसो बासठ छे बारी,
त्यां बेठा बळवंत, धीर नर धनुषो धारी,
वण आज्ञा विचरे नही वायु सरखो पण जियां,
ए अतुल बल अंगद अधिक पलक एक पहोच्यों तियां. [३]

सतर हजार संगीत, विविध पेर वाजां वागे,
घंट घडियाळां घोर, घणां निशान ज गाजे,
नव लख नवे हजार, नवे नृत किन्नर नाचे,
नाट्य चेट्य नवरंग, राय देखी मन राचे,
वळी देव दुदुंभी गडगडे सोभा सुरनायक तणी,
बाणु क्रोड सामंत सहित लायक बेठो लंक धणी. [४]

पृखराज प्रवाळां पाट, जवेरनी ज्योते जळीयां,
चोरासी जोजन चोक, महेल मणी माणेक मढिया,
जोजन सोळ सभाय, सिंहासन शोभा सोहिये,
मघवाथी बहु मान, महेल देखी मन मोहिये,
वैमान देव वैकुंठना शिव आपी समृधि घणी,
अहो समृध विध बारणे लायक बेठो लंक धणी. [५]

सहस्त्र अख्खणी सैन्य, शोभे रावण नी साथे,
मदरांचळ मंडाण, हेते धरे एक हाथे,
साठ लाख सरदार, प्रेमदा प्रीते परणी,
अणवरी एसी लाख, विविध रूपाळी वरणी,
छे सात लाख सितेर सुत ईन्द्रजीत आदे अती,
अनमी अहंकारी अंशपत रावण मोटो महिपती. [६]

एक छत्रधर राज, प्रताप पाम्यो ते प्रोढे
देव दानव नर नाग, किंकरो सहु कर जोडे,
दस मस्तक भुज वीस, ईश वरदान ज दीधुं,
चौद चोकडी राज, कबुल ए कर्मे कीधुं,
कोई थयो नथी थाशेय नही बळवंत रावण सारखो,
राम विण कोई जीते नही, पंडित रूडे पारख्यो.

पांच लाख परधान, पांच आयुतो पगेरी,
दस लाख दिवान, वीस हजार वजीरी,
सामंत सोळ हजार, लाख बहोतेरे राजा,
मंडळीक छन्नु लाख, मुगटधर जोद्धा जाजा,
बाणु करोड बेठा रहे आठ जाम अहर्निश जियां,
'शामळ' कहे अंगद बळ अधिक, पलक एक पहोच्यों तियां.

कवी - शामळ विरेश्वर भट्ट, 'अंगद विष्टी' मांथी