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मारु थारा देस में, निपजे तीन रतन

Rao GumanSingh Rao Gumansingh



कोई घोडो कोई पुरखडों, कोई सतसंगी नार।
सरजण हारे सिरजिया, तीनूं रतन संसार।।

जौधाणे री कामणी, गोखां काढै गात।
मन तो देवां रा डिगै, मिनखा कितीक बात।।


जोधाणो जसराज रो, खूबी करे खलक्क।
खावण पीवण गांठ रो, देखण री हलक्क।।

मारु थारा देस में, निपजे तीन रतन।
एक ढोला दूजी मारवण, तीजो कसूमल व्रन्न।।

खग धारां थोड़ां नरां, सिमट भरयो सह पाण।
इण थी मुरधर तरळ जळ, पाताळां परवांण।।

3 comments:

  1. ललित शर्मा ने कहा…

    अच्छी पोस्ट,बेहतरीन रचना

    यह पोस्ट ब्लाग4वार्ता पर भी है

  2. RAJNISH PARIHAR ने कहा…

    काई बात है सा ...भोत ही आछ्या दोहा ल्याया हो....

  3. Bhati Dashrath Singh Ramseen ने कहा…

    Wah ...Rao Shab