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पिंजारै री चतराई

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

एक गांव में एक पिंजारौ रैवतो हो। एकर उणरी लुगाई उणसूं कह्यों कै आज - काळ अठै कोई काम धंधों नीं हैं, इण सारू सहर जावौ अर कमावौ। पिंजारौ आपरी धुनकी अर दूजौ सामान लेयर सहर री कानी निकळियोै। चालता-चालता वौ जंगल मांय पूगिग्यों, वठै उणनै एक सैर आवतौ दिखियौ। पिंजारौ ने दैखिओ अर सैर पिनारै नै। दोंनां एक दूजै सूं डर गिया।पिंजारै कंधै माथै धुनकी देख सेर सौचियौ कै मोटो सिकारी आयौ हैं, लूंठा अस्त्रर-सस्त्रर लायौ हैं। म्हैं तो आज तक अेड़ा अस्त्रर नीं देखिया, ओ तो म्हारी जान लेने हीं चुप व्हैला। पिजांरे री जान निकलरीहीं। इतरा में वठै एक गीदड़ आयो। वो दोनो री मनोदसा समझगियों। वो सेर रै कनै पूंगौ अर कहयौ मामा, आज यूं किकर पूंछ दबायनै खड़ा हौ ? सेर पूरी बात बताय दी। गीदड़ तो चालाक हो हीं, वो कह्यों, मानों नीं मानो आ मिनख हैं तो न्यारौ, पण म्हैं इणसूं थ्हारौ जीवण बचा सकू। पण म्हारी एक बात माननी पड़ैला, म्हनै जंगल मय घूमण फिरण री छूट देन पड़ेला। सैर तो ड़रियोड़ो वो हाथां हाथ बात मान ली। पछै गीदड़ पिंजारै रै पास पूगा। पिंजारौ आपरा हाल बताया। गीदड़ सेर सूं जीवन बचावण रौ आस्वासन दियो, पण सागै कहयौ कै म्हारीं सरत माननी पड़ैला। जद सेर अठा सूं जावैला जणै म्हैं थ्हारा सरीर पर जठै चाहूं ला, वठै दों बटका भर लूं ला। पिंजारौ सोचियों जान जावण सूं बढ़िया कै गीदड़ दरी बात मान लूं। ज्यूं ही पिंजारौ हां भरियौ, गीदड़ सेर कानी इशारौ करियौ तो वो वठा सू भाग गियौ। अबै गीदड़ पिंजारै नै पूरौ देखियौ। उणरै कठी मांस नीं दिखयौ छाती माथै मांस उभरियोड़ौ उनणै दिख गयौ। गीदड़ पिंजारे सू कह्यों, म्हैं थ्हारीं छाती माथै दो बटका भरूंला। सेर सूं डरियौड़ै पिंजारौ आपरौ कुरतोै उपरै उठायौ जणै दीखी। वो पिंजारै सूं माजरौ पूछिया ? उणरै भेजा मांय एक युक्ति आई, वौ कह्यों इणरै मायंे एक कुतौ घुसगियौ है, थ्हनै देख अर भौक रियौं है, मै किणी तरै इणै बारै आवणसूं रोकियों हूं, पिंजरै री बात सुणता हीं गीदड़ रा हौस उड़ गिया, वौ पूंछ ददबार वठा सू भाग गियौ। अबै पिंजारै री जान में जान आई, अर वो झट झट सहर पूग गयौ।