थारे ही पाण, लगा लिया पाँखङाउभगी मेङी पर, पण
क्यों डरपे है काळजो
उङबा का नाँव सूँ...
थारे ही पाण, कर लियो सीणगार
बेठगी डोली में, पण
क्यों घभरावे है जीव
बी अणजाणा गाँव सूँ...
थारे ही पाण, बांध लियो भरोसो
चाल पड़ी ला’र, पण
क्यों रुक झुक खरुँचू
आस री जमी पांव सूँ...!!!
-सिया चौधरी
(एक छोटी सी कोशिश, उनके लिए..जिन्होंने मुझे फिर से लिखने की प्रेरणा दी J )



भोत सोवणी रचना .....हृदयस्पर्शी.....
nice
bhut badiya rachana per badhi svikar karo sa.kdeyi padhro mari rachana sansar me bhi.
ati sunder siya jee............
siya jee, es poem k jawab m koi banda kya reply dega.... plz creat a new poem their situations....