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थारे ही पाण, कर लियो सीणगार- Siya Choudhary

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

थारे ही पाण, लगा लिया पाँखङा
उभगी मेङी पर, पण
क्यों डरपे है काळजो
उङबा का नाँव सूँ...

थारे ही पाण, कर लियो सीणगार
बेठगी डोली में, पण
क्यों घभरावे है जीव
बी अणजाणा गाँव सूँ...

थारे ही पाण, बांध लियो भरोसो
चाल पड़ी ला’र, पण
क्यों रुक झुक खरुँचू
आस री जमी पांव सूँ...!!!
-सिया चौधरी

(एक छोटी सी कोशिश, उनके लिए..जिन्होंने मुझे फिर से लिखने की प्रेरणा दी J )

5 comments:

  1. डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

    भोत सोवणी रचना .....हृदयस्पर्शी.....

  2. बेनामी ने कहा…

    nice

  3. ITU RAJPUROHIT ने कहा…

    bhut badiya rachana per badhi svikar karo sa.kdeyi padhro mari rachana sansar me bhi.

  4. BANWARI LAL JAT ने कहा…

    ati sunder siya jee............

  5. BANWARI LAL JAT ने कहा…

    siya jee, es poem k jawab m koi banda kya reply dega.... plz creat a new poem their situations....