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कानदासजी मेहडु कृत हनुमान वंदना

Rao GumanSingh Rao Gumansingh

सुरस्वती उजळ अती, वळि उजळी वाण।
करु प्रणाम जुगति कर, बाळाजती बखाण॥1॥

अंश रुद्र अगियारमो, समरथ पुत्र समीर।
नीर निधि पर तीर नट,कुदि गयो क्षण वीर॥ 2 ॥

खावण द्रोणाचळ खमै, समै न धारण शंक।
वाळण सुध सीता वळै, लिवि प्रजाळै लंक॥ 3 ॥

पंचवटी वन पालटी, सीत हरण शोधंत।
अपरम शंके धाहियो, हेत करै हडमंत॥ 4॥

छंद त्रिभंगी ।
मन हेत धरंगी, हरस उमंगी, प्रेम तुरंगी, परसंगी।
सुग्रीव सथंगी, प्रेम पथंगी, शाम शोरंगी, करसंगी।
दसकंध दुरंगी, झुंबै झंगी, भड राखस जड थड भंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 1 ॥
अवधेश उदासी, सीत हरासी, शोक धरासी, सन्यासी।
अणबखत अक्रासी, बोल बंधासी, लंक विळासी, सवळासी।
अंजनी रुद्राशी, कमर कसंसी, साहर त्रासी, तौरंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 2 ॥
करजोड कठाणं, पाव प्रमाणं, दधि प्रमाणं, भरडाणं।
भचकै रथ भाणं, धरा ध्रुजाणं, शेष समाणं साताणं।
गढलंक ग्रहाणं, एक उडाणं, पोच जवाणं, प्रेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 3 ॥
हलकार हतूरं, फौज फतूरं, सायर पूरं संपूरं।
कर रुप करुरं,वध वकरुरं, त्रहकै घोरं, रणतूरं।
जोधा सह जुरं, जुध्ध जलुरं, आगैवानं, ओपंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 4 ॥
आसो अलबेली, बाग बणेली, घटा घणेली, गहरेली।
चौकोर भरेली, फूल चमेली, लता सुगंधी, लहरेली।
अंजनि कर एली, सबै सहेली,होम हवेली, होमंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 5॥
नल नील तेडाया, गरव न माया सबै बुलाया, सब आया।
पाषाण मंगाया, पास पठाया, सब बंदर लारे लाया।
पर मारग पाया, राम रिझाया, हनुए धाया, हेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 6॥
लखणेश लडातं, सैन धडातं, मुरछा घातं, मधरातं।
साजा घडी सातं, वैद वदातं, प्राण छंडातं, परभातं।
जोधा सम जातं, जोर न मातं, ले हाथं बीडो लंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 7॥
हडमत हुंकारं, अनड अपारं, भुजबळ डारं, भभकारं।
कर रुप कराळं, विध विकराळं, द्रोण उठारं, निरधारं।
अमरं लीलारं, भार अढारं, लखण उगारं, दधि लंघी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 8 ॥
सिंदूर सखंडं, भळळ भखंडं, तेल प्रचंडं, अतडंडं।
किय हार हसंडं, अनड अखंडं, भारथ डंडं, भुडंडं।
चारण कुळ चंडं, वैरि विहंडं , प्रणवै कानड कवि पंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी ॥ 9॥

Narpatdan Charan Kaviraj:
डिंगळ री डणकार से सादर त्रिभंगी छंद ।