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आखर रा उमराव- नपसा वैतालिक

Rao GumanSingh Guman singh

आखर रा उमराव रे, नित मन बजै नगाड।
कवित लोग उणने कहै, धींगड धींगड धाड॥1
आखर रा उमराव रे, मन कोलाहल होय।
जिण ने कुछ कहता कवित, ध्वनि प्रदूषण कोय॥2
आखर रा उमराव रे, मन मे नाचै मोर।
मलजी नाठौ मेल ने, गजबण आबू  और॥3
आखर रा उमरावजी, तेज  आपरा तीर।
बिन बिंध्यां घायल किया, मारो मोटा मीर॥4
आखर भाखर सम तथा, आखर साकर होय।
आखर टांकर सांतरा, कवि बणै हर कोय॥5
पेला होवै आदमी, फेरूं कवि हर कोय।
आखर सूं भाखर बणै, आखर साकर होय॥6
आखर रा उमराव हो, सूंपौ थें सिरपाव।
बडा बडा कविराव ने, बांटौ लाख पसाव॥7
आखर रा उमराव थे, म्है छोटकियौ साव।
नरपत नेह निभाव जो, हुं  किंकर कविराव॥8
आखर रा उमरावजी, रात जमी है जोर।
घर जावा दो साह्यबा, आखर लिखसां और॥9
आज उनींदी आंखडी, पांपण झपकै जोर।
नीदं आवती नाथजी, आखर लिखसां और॥10
आवो निंदर अब बणै, मत तरसावौ मीत।
मन भावौ मिळ  सुपन मे, तोड न जावौ प्रीत॥11
घणी रात गाढी हुई, अंधारो अणपार।
दो जावण दिलदार अब,मिळसां काल सवार॥12

नरपत आवडदान आशिया"वैतालिक"

।।शिव तांडव।।

Rao GumanSingh Guman singh

बरसों पहले महादेव की कृपा से लिखी हूइ स्तूति आज शिवरात्री के पावन पर्व पर प्रस्तुत करता हूं..........

           ।।दोहा।।
।।आशुतोष अजर अमर, वपु वेश विकराल।
भवपातक भंजन भला,जयजय शिव जट्टाल।।
         ।।छन्द: पद्धरी।।
जय जय महेश, जय जय जट्टाल।
हर हरहू दुख, मम प्रणत पाल।
विकराल वेश, आजान भुज।
गहे गंग नाद, गहरीय गुंज।।

कैलाश वास, प्रेतां  सुपास।
रचै रंग रजी रंभा सुरास।
गावत गंधर्व, किन्नर गान।
वधै व्योम अपसर, सुर विमान।

बजै ताल ताक, तिहू लोक बाक।
हर-हर अथाक,नभमंडल हाक।
रुदै राम रट्ट, करी घट्ट नाद।
उलट्ट पट्ट, झट्ट जोग जाद।

फर फेर हेर, फरंगट्ट फट्ट।
तांडव नाच, निरमै सुनट्ट।
सजाय जाय, शंखा सुणाय।
बेधक बुलाय, वीणा बजाय।

वजै विविधी रंगी, सारंगी शुर।
नटराज आज, पहनें नुपुर।
कसी कटिबंधी, बांधत बेर।
फनि जटाजुट, संभाल फेर।

भरी चलम भांग, बनी चकचुर।
करी नयन लाल कुदे करुर।
उछरंग अंग, करी दंग देव।
तांडव सकाज सजै सजेव।

अवनी आकम्प, दिगपाल डोल।
बमबम नाद, बहू मुख बोल।
छुटी डाकहाक बजी भ्रमत भोम।
सुझे न बात, स-सोच सोम।

भवभुत भमे, रमे नवी रीत।
लगे पाय लळी, वळी जगजीत।
होंकार खार, धरी करी क्रोध।
धधकत शिरे, गंगा रा धोध।

त्रिचख लख, लहे अगन ज्वाल।
रमेभमे रखे,सजी खखीड खाल।
अवधुत दुत, कृत करे केक।
अदभुत नृत, सरजे अनेक।

वंदे विशेष, मुनिवर समाज।
गणचारण गहे,जयजयति गाज।
दहे देव दुख, अरु अंगरोग।
कटे कष्ट कैक, मेटे जरा जोग।

हटे हानी ध्यानी, जो ध्यावु धीर।
प्रभु प्राण नाथ, परजाळे पीर।
करे सुंदर मंदर, इन्द्र धाम।
त्रिया संगे सुख, लहे तमाम।

पामे जश किर्ति, खुख अपार।
यह स्तुति पढे, नीत ध्यान धार।
जुगल हाथ जोडी, जपै "जयेश"।
जय जय महेश, जयजय महेश।
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
    ।। हर हर महादेव।।
।।महाशिवरात्री के पर्व की बधाई हो।।
-कवि: जय
- जयेशदान गढवी।

साजन अर सजनी

Rao GumanSingh Guman singh

मन रो नाच्यौ मोरियौ, धण रो किण रे काज।
बात मने औ बावडौ, कविता में कविराज॥

सुंदरता री पुतळी, अर उपर है लाज।
गजब नाचती गोरडी, घूमर रे अंदाज॥

नखराळी ए नारीयां, दे ताळी नाचैह।
घूंघट वाळी  कामणी, मतवाळी सांचैह।

साजण सुपने आविया, कह्यौ आवसूं आज।
इण कारण धण नाचती, गीत रसीलै राज॥

असी कळी रो घाधरो, घूमर घेर घुमेर।
गोखां नाचै गोरडी, प्रितम खुश व्है हेर॥

प्रितम घरां पधारिया,मन रा बज्या मृदंग।
घुमर नाची गोरडी, अंतस करै उमंग॥

साजण सुपने आविया, मन रे बैठ मतंग।
इण सूं नाची गौरडी, बजतां मिलन मृदंग॥

नरपत आवडदान आशिया"वैतालिक"

रंग रे डिंगल रंग!!

Rao GumanSingh Guman singh

साहित घणो सोवणो कथा गीत सतसंग!
कविता फड़ कहानिया रंग रे डिंगल रंग!!

फ़ाग घणा ही फूटरा चकरी सागे चंग!
गणगोरया रा गीतड़ा रंग रे ड़िंगळ रंग!!

सूरा तणा शुभराज  जब्बर लड़ी जो जंग!
निति रीती नित नेम रंग रे डिंगल रंग!!

कामण री संणगार आ, कमधजां सहैरो चंग।
हीङदै हिलौर उठावणी, तौ रंग रे डिगंळ रंग।

बालकिया बिलवावणी, किलक किशोरां संग।
उमंग आदू भरण तन, तौ रंग रे डिगंल रंग।।

ब्रहम शब्द वणीजन अरथ, क्षत्रियां तणी खङंग।
सुदरां सेवा लेवणी, तौ रंग रे डिगंल रंग।।

पांगां पहाङ चढावणी, मुक गुवाण सुरंग।
जरा जङां तन मेटणी, तौ रंग रे डिगंळ रंग।।

यूवां जुबा जंणकारणी, डणकां जोधां डंग।
लहूरां लाडियां लैवणी, तौ रंग रे डिगंळ रंग।

कायर हीणा कंथ ने ,जब्बर लङावणी जंग।
हार पलङ कर जीत दे ,तौ रंग रे डिगंळ रंग।।

भय भंजण अरियां हणण, हामियां जीतण जंग।
पिसांचा पछाङणी, तौ रंग रे डिगळ रंग।

राव चारणां बांमणां, मांगणियार मलंग।
सहज  संवारी  सूफियां, रंग रे डिंगल रंग॥

वातां ख्यातां वेलियां, परवाड़ा परसंग।
रम्मत रमझोल़ां रची, रंग रे डिंगल रंग!!

जात पांत जांणै नहीं, सकल मानवी संग।
नेह निरखियां नत नमै, रंग रेे डिंगल रंग॥

रावण नो ठाठ

Rao GumanSingh Guman singh

जळहळ ज्योत उद्योत, मणी जळहळता जडिया,
चिंतामणी भरभीत, नवे ग्रह आवी अडिया,
परवाळा पर पोळ, स्फाटिक स्तंभ ठर्या छे,
चुडामणी चोपास, कनक कोठार भर्या छे.
अष्टमा सिद्धि नव निधि रिधि महालक्ष्मी वासे वसी,
शिवनी आपी समृधि ज्यां त्यां उपमा करवी कशी. [१]

ओळग करे ज्यां ईन्द्र चन्द्र ज्यां छत्र धरे छे,
दिवाकर कर दिप, वरूण ज्यां नीर भरे छे,
चार वदन थी वेद, ब्रह्माजी पाठ भणे छे,
धलहल तजी धर्मराय, ज्ञान गुण एह गणे छे,
रतनखांण रतनावळी कल्प द्रुम मोटा मणी,
रिधि घणी रावण घरे अलखत ईन्द्रासन तणी. [२]

सात सोनेरी कोट, अधिक एक जोजन उंचा,
पांचसो पांसठ पोळ, ओळ खरा ज्यां खूंचा,
दरवाजा दस×वीस, बसो बासठ छे बारी,
त्यां बेठा बळवंत, धीर नर धनुषो धारी,
वण आज्ञा विचरे नही वायु सरखो पण जियां,
ए अतुल बल अंगद अधिक पलक एक पहोच्यों तियां. [३]

सतर हजार संगीत, विविध पेर वाजां वागे,
घंट घडियाळां घोर, घणां निशान ज गाजे,
नव लख नवे हजार, नवे नृत किन्नर नाचे,
नाट्य चेट्य नवरंग, राय देखी मन राचे,
वळी देव दुदुंभी गडगडे सोभा सुरनायक तणी,
बाणु क्रोड सामंत सहित लायक बेठो लंक धणी. [४]

पृखराज प्रवाळां पाट, जवेरनी ज्योते जळीयां,
चोरासी जोजन चोक, महेल मणी माणेक मढिया,
जोजन सोळ सभाय, सिंहासन शोभा सोहिये,
मघवाथी बहु मान, महेल देखी मन मोहिये,
वैमान देव वैकुंठना शिव आपी समृधि घणी,
अहो समृध विध बारणे लायक बेठो लंक धणी. [५]

सहस्त्र अख्खणी सैन्य, शोभे रावण नी साथे,
मदरांचळ मंडाण, हेते धरे एक हाथे,
साठ लाख सरदार, प्रेमदा प्रीते परणी,
अणवरी एसी लाख, विविध रूपाळी वरणी,
छे सात लाख सितेर सुत ईन्द्रजीत आदे अती,
अनमी अहंकारी अंशपत रावण मोटो महिपती. [६]

एक छत्रधर राज, प्रताप पाम्यो ते प्रोढे
देव दानव नर नाग, किंकरो सहु कर जोडे,
दस मस्तक भुज वीस, ईश वरदान ज दीधुं,
चौद चोकडी राज, कबुल ए कर्मे कीधुं,
कोई थयो नथी थाशेय नही बळवंत रावण सारखो,
राम विण कोई जीते नही, पंडित रूडे पारख्यो.

पांच लाख परधान, पांच आयुतो पगेरी,
दस लाख दिवान, वीस हजार वजीरी,
सामंत सोळ हजार, लाख बहोतेरे राजा,
मंडळीक छन्नु लाख, मुगटधर जोद्धा जाजा,
बाणु करोड बेठा रहे आठ जाम अहर्निश जियां,
'शामळ' कहे अंगद बळ अधिक, पलक एक पहोच्यों तियां.

कवी - शामळ विरेश्वर भट्ट, 'अंगद विष्टी' मांथी

पील ,मीठी पीमस्यां

Rao GumanSingh Guman singh

पील ,मीठी पीमस्यां
खोखा, सांगर, बेर |
मरु धरा सु जूझता
खींप झोझरू कैर ||

जूझ जूझ इण माटी में
बन ग्या कई झुंझार ।
सिर निचे दे सोवता
बिन खोल्यां तरवार ॥

ऊँचा रावला कोटड़याँ
सिरदारां की पोळ |
बैठ्या सामां गरजता
मिनखां की रमझोळ ॥

मरुधर का बे मानवी
कतरा करां बखाण
सर देवण रे साट में
नहीं जाबा दी आण ||

चाँदण उजली रातडली,
सोना जेड़ी रेत् |
सज्या -धज्या टीबड़ा,
ज्यूँ सामेळ जनेत ||

ऊँडो मरू को पाणी है,
उणसु ऊंडी सोच ।
साल्ल रात्यूं आपजी न
जायोडा री मोच ||

चीतल, तीतर, गोयरा
छतरी ताण्या मोर |
मोड्यां कुहकु -कुहकु बोलती
दिन उगता की ठोड़ ||

बे नाडयाँ बे खालडया
बे नदयां का तीर |
सुरग भलेही ना मिले,
बी माटी मिले शरीर ॥

अज्ञात कवि

आइ श्री सोनल मा स्तुती(छंद -चचॅरी)

Rao GumanSingh Guman singh

आपती शांती अपार कापती कलेशो कराल, जगहित उतम विचार नित नित करती
उन्नत सेवती आचार, पावन प्रगटती प्यार,शोधती संसार सार सदगुण धरती
माया छाया थी बहार,एना वाणी विचार, करीए स्वीकार हटे भवदुख भरती
सोनल शुभ देव सगती, मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती
सोरठ कच्छ गुजॅराय जातिजन जग हिताय पावन सुप्रवास थाय दिव्यानंद दरसे
मानव मेळा भराय शारद मंदिर स्थपाय संस्कृति स्थानक रचाय मंगल वरसे
भकित नीति भणाय,वेद धमॅ विचाराय काव्य शास्त्र तणी अमी सरणी निझॅरति
सोनल शुभ देव सगती मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती
आवी करवा उद्धार आवड फरी ने उदार खोडल प्रतिपाळ प्रसिद्ध वरवडी पधारी
करसे अज्ञान नाश पाथरसे नव प्रकाश दरस ज्ञान रवि उजाश धमॅ कमॅ धारी
वंदे "क्षेम"वारवार सोनल शरणे स्वीकार हे अमार जीवन गंगधार भागीरथ्थी
सोनल शुभ देव सगती मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती

《  कवि श्री खेमराज खेतदान गढवी //मोरारदान सुरताणीया 》

आइ श्री सोनल मा स्तुती(छंद -चचॅरी)

Rao GumanSingh Guman singh

आपती शांती अपार कापती कलेशो कराल, जगहित उतम विचार नित नित करती
उन्नत सेवती आचार, पावन प्रगटती प्यार,शोधती संसार सार सदगुण धरती
माया छाया थी बहार,एना वाणी विचार, करीए स्वीकार हटे भवदुख भरती
सोनल शुभ देव सगती, मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती
सोरठ कच्छ गुजॅराय जातिजन जग हिताय पावन सुप्रवास थाय दिव्यानंद दरसे
मानव मेळा भराय शारद मंदिर स्थपाय संस्कृति स्थानक रचाय मंगल वरसे
भकित नीति भणाय,वेद धमॅ विचाराय काव्य शास्त्र तणी अमी सरणी निझॅरति
सोनल शुभ देव सगती मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती
आवी करवा उद्धार आवड फरी ने उदार खोडल प्रतिपाळ प्रसिद्ध वरवडी पधारी
करसे अज्ञान नाश पाथरसे नव प्रकाश दरस ज्ञान रवि उजाश धमॅ कमॅ धारी
वंदे "क्षेम"वारवार सोनल शरणे स्वीकार हे अमार जीवन गंगधार भागीरथ्थी
सोनल शुभ देव सगती मढडे तप तपती महती जगदंबा ध्यान धरती मंगल मुरती

《  कवि श्री खेमराज खेतदान गढवी //मोरारदान सुरताणीया 》

महाराणा प्रताप रौ जस

Rao GumanSingh Guman singh

"उतर दियौ उदीयाण दिन पलट्यौ पल़टी दूणी।
पातल़ थंभ प्रमाण़ शैल गुफावा संचरीयौ।

मिल़ीयौ मैध मला़र मुगला री लशकर माय।
कलपै राज कुमार मैहला़ चालौ मावड़ी।

महल रजै महाराण कन्दरावा डैरा किया।
पौढण सैज पाखांण हिन्दुवां सुरज हालीया।

उलटीया एहलूर म़ाझल़ गल़ती रात रा ।
पछटयौ पालर् पुर गाडरीया झुकीया गिरा।

झंखड़ अकबर जाण़ राजन्द झुकीया गिरा।
पातल़ थम्भ प्रमाण इडग रयौ धर ऊपरां।।

गीत
रौवण लागा राज दुलारा, रल़कीयौ नीर रैवास।
वाव सपैटै दीप बुझायौ, उझमी जीवण आस।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।1।।

ब़ीज बल़ौबल़ जौर झबुकै, घौर माय घमसाण।
हिन्दुवौ सुरज डैरड़ै हाल्यौ, पौढ़वा सैज पाख़ाण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।2।।

बिलखती माता कैह विधाता, तै ही लिख्या तकदीर।
राजभवना रा आज रैवासी, फड़फडै़ जाण फकीर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।3।।
कंवर कंवरी कंध चढ़ाय, महाराणी समझाय् ।
आवै राणौसा तौ हालस्या अपै, महल़ पिछौलै माय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ, ।।4।।

मांगड़ै आवतौ मुन्छ मरौड़ै, वल़ीयौ पाछौ वीर।
आज मैहल़ा आजाद करावा, न लैवा अन्र नीर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।5।।
आवतौ माल़क सार अवैल़ौ हिसीयौ हैवन हार ।
सज वाहुणी लगा़म संभ़ाल़ै आवियौ पीठ अमीर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।6।।

चीरतौ पाण़ी घौड़ल़ौ चाल्यौ, कुदतौ थौहर कैर।
आंच आवै असवार ना तौ मारौ जीवणौ खारौ ज़ैर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।7।।

पाव घड़ी माय पुगीयौ पवन पिछौल़ै री पाल़।
पाव पख़ाल़ण काज़ पिछौल़ौ आवियौ लौप औवाल़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।8।।

कौयल़ा सारस कीर कबुतर पंखीड़ा घण़ प्रीत।
दैश धणी ना आवत़ौ दैख गुटकवा लागा गीत।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।9।।
रुखड़ल़ा पण दैख राणै ना अंजसीया हौय अधीर।
झुमती शाखा पगल़ा झुकी नैह त्रमंकयौ नीर।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।10।।

वीर शीरौमण नांव मा बैठा पा़ण ग्रहै पतवार ।
पार पुगावण काज पिछौलौ धावीयौ गंगाधार।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।11।।

आवती नैया सार अवैल़ी ताणीया तीर कबाण।
भील़ण़ी जाय़ा शब्द भैदी जैरौ ना चुकै निश़ाण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।12।।

जवान बैटा ना संभता दैखै बौल़ीयौ ब़ुढ़ौ भ़ील़।
आज बैटा कुण बाग मां आयौ ईडग़ा तौड़ी ईल़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।13।।

आज क्या मारी आंख फरूखै अंग उमंग अनुप।
एहड़ै सुगनै भैट करावै अवस मैवाड़ौ भुप।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।14।।

बाप री बात़ा साम्भल़ै बैटा नाखीया तीर कब़ाण ।
दैश धणी रै दरसण़ा हैतू अंजसीया औस़ाण़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।15।।
आय् किनारै नावड़ी उभी भागीया सामा भील़।
चौखसी राणै तीर चढ़ायौ दैख उबाण़ा डील़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।16.।।

आपरा चाकर जा़णा़ै अन्रदाता माफ करौ शक मैट।
पातशाह रै पौहरै उभ़ा पाल़वा पापी पैट।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।। 17।।

माफ करौ माही बाप कै मा़झ़ी पांव पड़या अकुलात् ।
बाट जौवता मारा दिनड़ा बीता रौवता का़ल़ी रात्।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।18।।
कैकू पगल़ा कीच भराण़ा धौऊ नैण़ा जलधार्।
खाम़द़ा रौ दुख दैख खूपै मारै काल़जै बीच कटार्।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।19।।

आंखड़ीया भर आवीया आंसु बादल़ा ज्यू बरसात।
आज सौनै रौ सुरज उगौ हिवड़ल़ौ हरसात।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।। 20।।

रंक हैतालू बौलीयौ राणौ हाख मा थांमै हाथ।
बीती सौ ही बिसार दै वाल़ा पौर भयौ परभात् ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।21।।

आज कसौटी रंगत आणै सौलवौ सौन कहाय् ।
आज हु जैड़ै कारज आयौ मारौ कारज सिद्ध कराय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।22।।

नींद मा मुगल़ सैन निचींती और भयौ् अंधकार ।
प्रौल़ीया ऊभ़ा तीन पाराधी (पाराथी) काल़ीयौ किल्लैदार।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।23।।

चौर गुफा मां पुगीयौ च्यरौ उन्चल़ी मंझील आण़ ।
बारणै भ़ुखा सिंह बंधाड़ै सैज पौढीयौ सुल्ताण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।24।।

सिंह छैड़ा तौ शौर मचावै जाग अकबर जाय् ।
एक ताड़ी सुण़ फौज असंख्या प्राण हैरै पल़ माय् ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।25।।
दैश धणी ना दैख उद्द्यासी भीलड़ौ सौच भराय।
छैरूवा कानी बातड़ी छानी सानी मा समझाय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अ,कबर शाह ऊन्घाण़ौ।।26।।

जगत् सु बैटा एक दिन जावणौ खाटल़ी सुता खाय।
मात्रभुमी रै काज मरा तौ जीव वैकुटाय जाय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।27।।

बाप ना बैटा बैरवा बैठा मुखड़ा धारै मौन।
च्यार चीराल़ै कर न चाल्या चारवा सिहा चुण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।28।।

पंड कीधौ बलिदान पाराधी हंसतै कमल़ हाय।
मरतां वैल्या जनम मांगयौ दैश मैवाड़ै माय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।29।।

आंखड़ीया भर आविया आंसु राण भराणौ रीस।
अनवीया वाल़ी ईल तौड़ै न शिशौद नमायौ शीश।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।30।।

पैढ़लीया कर पार राणैजी सांभ लैही शमसैर।
हिन्दुवै सुरज हाथ उठायौ बाल्वा जुनौ बैर ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।31।।
एक अंतै माय आवियौ हिलौ कांप गई किरपाण ।
बिन बाकारयां मारणै सु मारौ दैश लाजै उदीयाण़।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ ।।32।।

राजपुती री रीत रुपाल़ी नींद मा सुतौ न धाय्।
सात पीड़ी रै शत्रु ना पैश पड़या बगसाय।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।33।।

आंगली चिरै मांडीया आखर सामली भ़ीत सुजाण।
आखरी वैल़या आज अकबर दैवा जीवनदान ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।34।।

आज प्रभाता त्याग उदयपुर कूच करै कमठ़ाण़।
दुसरा मौका न दैवा हु थारै मांझल रौ मैहमाण।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।35।।

रंग रै राणा रात थारी ना रंग जाती रजपुत।
रंग माता जकै गौद रंमाड़्यौ पातल़ जैड़ौ पूत।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।36।।
अवतरीया ईण धरती पर मौकल़ा वीर महान।
सुरमा री मरजाद सुणावै बारट भंवरदान ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।
अवतरीया ईण धरती पर मौकल़ा वीर महान।
सुरमा री मरजाद सुणावै बारट भंवरदान ।
राणौ प्रताप रीस़ाणौ अकबर शाह ऊन्घाण़ौ।।37।

'खूबड़ माँ ' रा छप्पय

Rao GumanSingh Guman singh

मह वरसे नही मेह, पड़े असमान धरा पर।
राह थके खगराज, अखे बलराजा उत्तर।
हेमगिर ऊनो हुवे, वके झूठो दुरवासा।
अत सितळ व्है अगन, प्रगट नह भाण प्रकासा।
सामंप्रत देख वहतो सगर, घबरावे वांगा घङा।
(तो)समरिया 'गँग'  अबखी समै,  बेल न आवे खुबङा।। १।।

जे नृप धू डग जाय, गणो डगमडे मेर गिर।
गोरख भुले गयान, ध्यान तप भुले जटधर।
खारो व्है दध खीर, दखो मीठो खारो दध।
जुजठल भाखे झुठ, वळे लखियो पलटे वध।
सैंस तज भार जावे सरक, धरती व्है उथल धङा।
समरिया 'गंग' अबखी समै, (जे) बेल न आवे खुबङा ॥२॥

जळनद तजे म्रजाद, प्रगट गंगेव तजे पण।
भीम तजे भाराथ,  जंग सर चुके अरजण।
करगां माठो करण,  जोओ गुडळो गंगजळ।
पंथ थके सपतास,  सुणे नही पाबु सावळ।
म्रगराज घास खावे मुदे,  मारे लाता मरगङा।
समरिया 'गंग'  अबखी समै, (जे)  बेल न आवे खुबङा।। ३।।

सत तज जावे सीत,  हुवे बळहीणो हङमत।
जहर सरप जाय,  जोओ छांङे लछमण जत।
गुणपत व्है बुधहीण,  उकत सुरसत न आवे।
भोजन न मिटे भूख,  भगति पहळाद न भावे।
श्रीराम बाण चुके संवर, खळ आसुर जुझे खङा।
(तो)  समरिया 'गंग'  अबखी समै, बेल न आवे खुबङा।। ४।।
..... क्रमश.....

गंगारामजी बोगसा 'सरवड़ी' कृत

छंद विर छप्पय

Rao GumanSingh Guman singh

मां मोगल मछराळ.काळ बण दौता कौपे.
फाळ भरण फुंफाळ झाळ नफरा जण झौपे.
खाळ कहट खडगाळ.साळ चारण जे सौपे.
पाळ रिपूं पाताळ.ताळ धमकां हण तौपे.
बाळ बचाळ बचावणीं .टाळ नफट वखताळ.
जाळ कटण जोगा जपण.मां मोगल मछराळ.

ड़ंणके जब डाढाळ.गाळ गर गौहर गुज्जे.
चाळ भेळीया चमक.धमक पड धरणीं धुज्जे.
पाळ अहर बीच पठे.सठे नह मारग सुज्जे.
धाळ माळ धुंधाळ.जाळ कट रण में जुज्जे.
तांणत नह ममताळ तुं. वखत कठण विगताळ.
जांणत जौगो जोगणीं.मां मोगल मछराळ.

जोगीदान गढवी कृत

छंद विर छप्पय

Rao GumanSingh Guman singh

मां मोगल मछराळ.काळ बण दौता कौपे.
फाळ भरण फुंफाळ झाळ नफरा जण झौपे.
खाळ कहट खडगाळ.साळ चारण जे सौपे.
पाळ रिपूं पाताळ.ताळ धमकां हण तौपे.
बाळ बचाळ बचावणीं .टाळ नफट वखताळ.
जाळ कटण जोगा जपण.मां मोगल मछराळ.

ड़ंणके जब डाढाळ.गाळ गर गौहर गुज्जे.
चाळ भेळीया चमक.धमक पड धरणीं धुज्जे.
पाळ अहर बीच पठे.सठे नह मारग सुज्जे.
धाळ माळ धुंधाळ.जाळ कट रण में जुज्जे.
तांणत नह ममताळ तुं. वखत कठण विगताळ.
जांणत जौगो जोगणीं.मां मोगल मछराळ.

जोगीदान गढवी कृत

सरदी लागै कोढ

Rao GumanSingh Guman singh

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सरदी लागै कोढ
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गरमी लागै सांतरी ,  सरदी लागै कोढ
छोड सियाळा मरुधरा , जाय हिमाळै पोढ ।।
गूदड़ दोरा सांभणां , सांभण दोरो कंत ।
सरदी थारै कारणैं ,  जूण डरै बेअंत ।।
घर में बड़ता पावणां , ताती मांगै चाय ।
ठोकै पोढ जमावणां , लुक्खा न आवै दाय ।।
न्हाणां धोणां छूटिया , बाळां धूणीं काठ ।
चेतै कद नित नेमड़ा , रोटी ठोकां आठ ।।
नित रा भावै गुलगला , रत्ती न भावै काम ।
इण सरदी रै मांयनैं   , कियां कुटावां चाम ।।
*
ओम पुरोहित कागद
24-दुर्गा कोलोनी
हनुमानगढ़ जंक्शन-335513

छन्द रेणकी- कवि कान जी गांगड़ा

Rao GumanSingh Guman singh

मळया आय मिथिलापुरी , भूतळरा के भूप !!
गर्व सकळ रा गाळिया , राघव कुळरा रुप !!१!!
धनुष धरण जब तुं धस्यो , लौचन अरूण लिलाट !!
पद चंपत पगनेश , डग दीसा डणणाट !!२!!
          
डणणणणण दीस दिग्गज सह डणकत भणण खणण ब्रह्मांड भयो :
गणणणणण गहर गुहागिरी गणकत ठणण ठणण टंकार थयो :
कणणण लंक नृपाळ कणंकत गणण गणण शीर मुगट ग्रीयो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!१!!
कड़ड़ड़ड़ड़ व्योम गोम पड़ कड़कत अड़ड़ अड़ड़ समुदर उछळं :
थड़ड़ड धाम छोड़ खळ थड़कत धड़ड़ धड़ड़ धर नमत ढळं :
गड़ड़ड़ड़ चंद्र लोक लग गड़गड़ फड़ड़ फड़ड़ हय फांण फर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!२!!
कटकटकट सपट झपट फटफट थट खटखट झटपट उलट झटयो :
भटभटभट भटक भटक भय भटभट फटक फटक मनु व्योम फटयो :
घट घट घट अमट अर्यां गभरावट हटहटहट खळदळ हहर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!३!!
झक झक झक नमक रमक झणकारव दमक चमक हर ध्यांन खुले :
छकछक मद अछक अछक्के तक तक भटक भटक भट खटक भूले : हकबकहिय सठक गठकटक नाटक फटक फटक थक थक फफर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!४!!
खळभळ अळ प्रबळ प्रबळ तळ पातळ खळखळ कळ बळ अकळ खसे :
डळडळडळ डळत ढळत भुदरसर तळतळ थळथळ सभड़ त्रसे :
झळ झळ झळ झळकझळक कर झळकत खळकखळक सुर कुसुम खर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!५!!
सगवगनग अडगअडग चगचगचग जगजगजग रणंकार जग्यो :
टगटगटग टगर मगर खगखगखग छगछग रग पग अछग छग्यो :
फगफगफग विलग विलग मगडगडग नगनग भग सुरराज नर्यो : धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!६!!
खररर अपर अपरं वरधर पर पर धरधर पर अमर पर्यो :
झररर सरर सरर झट झांझर सुरपर परहर सकर सर्यो:
कर कर कर जयति कौशीककर धर धर हर धनु सधर धर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!७!!
सत सत कृत अमत श्रवत दशरथ सत रजत रजत सुर प्रमुद रह्यो :
ध्रत ध्रत ततकाल हारगल सीतरत गत मत रत गुर चरन ग्रह्यो :
क्रत क्रत अत कांन दांन नीज क्रत दत भजत भजत भव पार कर्यो :
धणणण शैष कोल कच्छ धणकत धनुष हाथ रघुनाथ धर्यो !!८!!
              कळस छन्द छप्पैया
धर्यो धनुष रणधीर , वीस्मय घणा विदार्या :
धर्यो धनुष रणधीर , ताप मुनि गणरा टाळ्या :
धर्यो धनुष रणधीर लंक रोळण खग लीधो :
धर्यो धनुष रणधीर , काज अमारो वड कीधो :
धर्यो धनुष ब्रह्मांडधर ,धरण भार भूवरो हसी :
चित वृथा कान सुरभिय चहे चण सारूं लेवा असी !!१!!

वढियार धरा के रत्न कवि कान गांगड़ा कृत छन्द रेणकी :- प्रेषित मीठा मीर डभाल