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जगदंब मोगल जे भणी

Rao GumanSingh Guman singh

छंद=सारसी
ओखा धरे,नवलख फरे,गरबो धरे,मथ्थ उपरे.
नवरात रे,नवला परे,जडहड जरे,ज्योतु फरे.
आनंद रंगे,बव उमंगे,शक्त संगे,लइ घणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी.
    जगदंब मोगल जे भणी. (1)

सणगार सोळा,कयरा बोळा,पाय तोळा,शेष ना.
प्रक्रत अजोळा,वणे चोळा,बाइ तोळा,वेष ना.
बाजुयबंधा,नाग संधा,चडे कंधा,लट बणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (2)

वादळ अषाढा,थीया बाढा,बने गाढा,भेळीया.
विजडी प्रगाढा,कोर काढा,जबक जाढा,रेळीया.
नवलख जडुके तारला विजडी कडुके जो घणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (3)

लडवडे माळा,हिम पहाळा,त्रेण गाळा,कंठडे.
हुंफे हुफाळा,गळे थाळा,हिम वाळा,थे लडे.
हिम ओगडी ता जळ ढोळी,पद पखोळी गंगणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (4)

सुर चंद नयना,तपे कयना,आभ अयना,जडहडे.
दो दश मयना,नेण बयना,वक्र लयना,चडवडे.
बारेय राशी,मुख हाशी,ग्रह ग्रासी,ते तणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (5)

नवसौ नवाणा,नदी ताणा,गाय गाणा,खडखडी.
समंदर तमाणा,बिरद बाणा,बव वखाणा,फिणफडी.
डमरु डंमके,भु धंमके,गौ हंमके,रव रणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (6)

विंझणा तोळे,पवन ढोळे,वा हिलोळे,वारणा.
तुम्मरा होडे,वयडा टोळे,नाद घोळे,चारणा.
समंदर वजाडे,ढोल ढाळे,गडगड गाळे,धोरणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी. (7)

भेरव भेळो,करे केळो,वडो मेळो,जोगणी.
ब्रह्मांड बेळो,मथ्थे तेळो,निर्मळ नेळो,जो गणी.
सारसी छंदे,विज वंदे,जयो अंबे,तुं धणी.
धजबंध जे धिंगोधणी,जगदंब मोगल जे भणी.
       जगदंब मोगल जे भणी. (8)

- चारण कवि विजयभा हरदासभा बाटी
ध्रांगध्रां

आल्हा एकादसी

Rao GumanSingh Guman singh

मगरा धौरा भाखरा,घलिया घण घमसांण।
साखी कोट'र कांगरा,नमै आज अणजांण॥१॥
सुरसती सदा सरसती,हाकड़ौ कैवे हाल।
माडधरा आ मुलकती,अंतस रेत उलाल॥२॥
वीरा राखी वीरता,सूरा राखी शांण।
संतां राखी सांच री,जस जौगे जैसाण॥३॥
कुल री राखण कीरती,मही रौ राखण मांण।
आलै जंज उजालियौ,भाटी कुल रौ भांण।४॥
पौड़ भून्गरे पटकता,गूंज्यौ गढ़ गौहराण।
पीर मौडिये पाड़िया,पिरथी घणा पठाण॥५॥
छत्र धारियौ सूरमा,अनमी राखण आंण।
भली'ज राखी भांणसी,ईशाल धर एहनाण॥६॥
छत्रालै छत्र धारियौ,जबर जुन्झियौ जंग।
धर ईशाली धधकती,रंग आल्हसी रंग॥७॥
हिरदै नैण समाविया,धड़ बिच करतै दौड़।
आलोजी जंग जुन्झियौ,हरावली कर हौड़ ॥८॥
मालदे मन मोदियौ,जंज  दिखाई      जंग ।
तूटो सर धड़ जुन्झियौ,रंग आलहसी रंग॥९॥
साको कियौ सुहावणौ,जंज जुन्झकर जंग।
भाटी कुल रै  भांण  नै,दीनौ  रावल रंग ॥१०॥
कविवर 'मेन्दर' किरती,जस  गावै     जजमान ।
जुन्झिया सर बिण जगत में,रंगीलै रजथान ॥११॥

  - महेन्द्रसिह   सिसोदिया(छायण)

आल्हा एकादसी

Rao GumanSingh Guman singh

मगरा धौरा भाखरा,घलिया घण घमसांण।
साखी कोट'र कांगरा,नमै आज अणजांण॥१॥
सुरसती सदा सरसती,हाकड़ौ कैवे हाल।
माडधरा आ मुलकती,अंतस रेत उलाल॥२॥
वीरा राखी वीरता,सूरा राखी शांण।
संतां राखी सांच री,जस जौगे जैसाण॥३॥
कुल री राखण कीरती,मही रौ राखण मांण।
आलै जंज उजालियौ,भाटी कुल रौ भांण।४॥
पौड़ भून्गरे पटकता,गूंज्यौ गढ़ गौहराण।
पीर मौडिये पाड़िया,पिरथी घणा पठाण॥५॥
छत्र धारियौ सूरमा,अनमी राखण आंण।
भली'ज राखी भांणसी,ईशाल धर एहनाण॥६॥
छत्रालै छत्र धारियौ,जबर जुन्झियौ जंग।
धर ईशाली धधकती,रंग आल्हसी रंग॥७॥
हिरदै नैण समाविया,धड़ बिच करतै दौड़।
आलोजी जंग जुन्झियौ,हरावली कर हौड़ ॥८॥
मालदे मन मोदियौ,जंज  दिखाई      जंग ।
तूटो सर धड़ जुन्झियौ,रंग आलहसी रंग॥९॥
साको कियौ सुहावणौ,जंज जुन्झकर जंग।
भाटी कुल रै  भांण  नै,दीनौ  रावल रंग ॥१०॥
कविवर 'मेन्दर' किरती,जस  गावै     जजमान ।
जुन्झिया सर बिण जगत में,रंगीलै रजथान ॥११॥

  - महेन्द्रसिह   सिसोदिया(छायण)

आल्हा एकादसी

Rao GumanSingh Guman singh

मगरा धौरा भाखरा,घलिया घण घमसांण।
साखी कोट'र कांगरा,नमै आज अणजांण॥१॥
सुरसती सदा सरसती,हाकड़ौ कैवे हाल।
माडधरा आ मुलकती,अंतस रेत उलाल॥२॥
वीरा राखी वीरता,सूरा राखी शांण।
संतां राखी सांच री,जस जौगे जैसाण॥३॥
कुल री राखण कीरती,मही रौ राखण मांण।
आलै जंज उजालियौ,भाटी कुल रौ भांण।४॥
पौड़ भून्गरे पटकता,गूंज्यौ गढ़ गौहराण।
पीर मौडिये पाड़िया,पिरथी घणा पठाण॥५॥
छत्र धारियौ सूरमा,अनमी राखण आंण।
भली'ज राखी भांणसी,ईशाल धर एहनाण॥६॥
छत्रालै छत्र धारियौ,जबर जुन्झियौ जंग।
धर ईशाली धधकती,रंग आल्हसी रंग॥७॥
हिरदै नैण समाविया,धड़ बिच करतै दौड़।
आलोजी जंग जुन्झियौ,हरावली कर हौड़ ॥८॥
मालदे मन मोदियौ,जंज  दिखाई      जंग ।
तूटो सर धड़ जुन्झियौ,रंग आलहसी रंग॥९॥
साको कियौ सुहावणौ,जंज जुन्झकर जंग।
भाटी कुल रै  भांण  नै,दीनौ  रावल रंग ॥१०॥
कविवर 'मेन्दर' किरती,जस  गावै     जजमान ।
जुन्झिया सर बिण जगत में,रंगीलै रजथान ॥११॥

  - महेन्द्रसिह   सिसोदिया(छायण)

मर्यादा पुरूषोतम प्रभू श्रीरामचन्द्रजी रा दोहा :-

Rao GumanSingh Guman singh

कर हेत झाली कलम ने , धरे सरसती ध्यान !!
महर कर शारद मीर ने , सदबुध दिजो शान !!१!!
गिरिजा सतन गुणेश को , मनसूं लेऊं मनाय !!
कारज पुरण किजीयो , ऊमासुत झट्ट आय !!२!!
सब देवन की शरण में , म्हें अब नमावूं माथ !!
गुण रामरा गावस्यूं , सबेही रहीजो साथ !!३!!
मनउजळ दशरथ महपति , रघुकुळ अनमी रूप !!
परम न्याय नीति प्रिय , भलपण वंकोज भूप !!४!!
राजा रे त्रय रांणीयां , कौशल्या प्रथम कहाय !!
केकई सुमित्रा कांमणी , भूपत रे मन भाय !!५!!
जनम धरेया जद जगत में , लायक च्यारूं लाल !!
मन हरखावे मेदनी , त्रंबागळ वाजेया ताल !!६!!
गीत राग शुभ गावणो , अवध घणो उछरंग !!
वाजा छत्रीसे वाजिया , सुर ताल लय संग !!७!!
दशरथ रा दरबार में , गावे ज गायक गीत !!
दान मान सब देवणो , राज तणी आ रीत !!८!!
तिण पळ विप्र तेड़ावियो , दन चढते घटी दोय !!
पांचे ही अंग पंचांग रा , जोशी विध कर जोय !!९!!
जोशी पोथी जोवतां , हरख वधे मन हेत !!
दशरथ छोळ दरियाव ज्यूं , दान प्रगळो देत !!१०!!
मीठा मीर डभाल

केसरिया बालम

Rao GumanSingh Guman singh

केसरीया बालम कहूं, किणनें मन री पीर।
बांस विरह रो रुंखडौ, निकळ्यौ छाती चीर॥
केसरीया बालम कहूं, गाढा माढां राग।
आवो घर अलबेलडा, उपजावण अनुराग॥
केसरीया बालम कहूं,किम विसरीया कंत।
निसरिया आसूं नयण, (जिण)हरिया वन दरसंत॥ केसरीया बालम कहूं, जळूं  विरह री झाळ ।
आव अषाढै मेह ज्यूं,(तौ) भींजूं  इण बरसाळ॥
केसरीया बालम कहूं,नेह निभाज्यौ नाह।
आय मिळौ म्हानै अठै, गाढ भरण गळबांह॥

नरपतदान आवडदान आशिया"वैतालिक " कृत

आवड आखे आशिया- नरपतदान आशिया

Rao GumanSingh Guman singh

मेजर शैतान सुजस

Rao GumanSingh Guman singh

लावो ल्यो संसार- चारण मेसण चंदाजी

Rao GumanSingh Guman singh

लावो ल्यो संसार रो छोड़े द्यो लोभने ,
मरद्दां रंग ने राक मांणो !!
चार दिन चटक्का करे ल्यो छेलड़ां ,
ताकड़े हेमरे तंग तांणो !!१!!
मांणजो वस्तु जोय भली माढुआं ,
लोभ सोय छोड़ने लाहो लीजे !!
उधार न करीजे घड़ी पण एक री ,
काम धार्यो भलो परो कीजे !!२!!
पेहरीजे ओढीजे जेमीजे प्रेम सूं ,
दहि ने सुख तो घणो दीजे !!
भले धोड़े चड़ो भले ऊटे चड़ो ,
रांम तो इयुं कियां घणो रीझे !!३!!
जरा ले जावसी जम्म जो जोवन्तां ,
वावळां आपड़े पसे वारू !!
होवे जो धन तो वापरो हाथ सूं ,
सकोय पण सकोय री पोस सारू !!४!!
वेळा मत करो थे दन व्हे जावसी ,
खरचजो मरद्दां दाम खासा !!
चंदीयो कहे रे वेगेरा चेतजो ,
ऐक पण घड़ी री नहीं आशा !!५!!

प्रेषित मीठा मीर डभाल

"बिरद छहुतरि" --दुरशा आढा कृत

Rao GumanSingh Guman singh

दुर्शाजी आढ़ा नामक चारण कवी ने अकबर
की सभा में अकबर के समक्ष खड़े होकर बिना डरे
महाराणा प्रताप के नाम से 76 दुहे बना कर सुनाये
थे जो "बिरद छहुतरि" के नाम से जाना गया।
( चारण कवी दुरसाजी आढा रचित महाराणा प्रताप
की प्रशस्ती के दोहे - संपुर्ण 'बिरद छहुंतरी' )
अलख धणी आदेश, धरमाधार दया निधे,
बरणो सुजस बेस, पालक धरम प्रतापरो. (१)
गिर उंचो गिरनार, आबु गिर ओछो नही ;
अकबर अघ अंबार, पुण्य अंबार प्रतापसीं. (२)
वुहा वडेरा वाट, वाट तिकण वेहणो विसद ;
खाग, त्याग, खत्र वाट, पाले राण प्रतापसीं. (३)
अकबर गर्व न आण, हिन्दु सब चाकर हुआ ;
दिठो कोय दहिवाण, करतो लटकां कठहडे. (४)
मन अकबर मजबूत, फुट हिन्दुआ बेफिकर ;
काफर कोम कपूत, पकडो राण प्रतापसीं. (५)
अकबर किना याद, हिन्दु नॄप हाजर हुआ ;
मेद पाट मरजाद, पोहो न आव्यो प्रतापसीं. (६)
मलेच्छां आगळ माथ, नमे नही नर नाथरो,
सो करतब समराथ, पाले राण प्रतापसी. (७)
कलजुग चले न कार, अकबर मन आंजस युंही ;
सतजुग सम संसार, प्रगट राण प्रतापसीं. (८)
कदे न नमावे कंध, अकबर ढिग आवेने ओ ;
सुरज वंश संबंध, पाले राण प्रतापसी. (९)
चितवे चित चितोड, चित चिंता चिता जले ;
मेवाडो जग मोड, पुण्य घन प्रतापसीं. (१०)
सांगो धरम सहाय, बाबर सु भिडीयो बहस ;
अकबर पगमां आय, पडे न राण प्रतापसी. (११)
अकबर कुटिल अनित, और बटल सिर आदरे ;
रघुकुल उतम रीत, पाले राण प्रतापसी. (१२)
लोपे हिन्दु लाज, सगपण रों के तुरक सु ;
आर्य कुल री आज, पुंजी राण प्रतापसीं. (१३)
सुख हित शिंयाळ समाज, हिन्दु अकबर वश हुआ ;
रोशिलो मॄगराज, परवश रहे न प्रतापसी. (१४)
अकबर फुट अजाण, हिया फुट छोडे न हठ ;
पगां न लागळ पाण, पण धर राण प्रतापसीं. (१५)
अकबर पत्थर अनेक, भुपत कैं भेळा कर्या ;
हाथ न आवे हेक, पारस राण प्रतापसीं. (१६)
अकबर नीर अथाह, तह डुब्या हिन्दु तुरक ;
मेंवाडो तिण मांह, पोयण राण प्रतापसीं. (१७)
जाणे अकबर जोर, तो पण ताणे तोर तीड ;
आ बदलाय छे ओर, प्रीसणा खोर प्रतापसीं. (१८)
अकबर हिये उचाट, रात दिवस लागो रहे ;
रजवट वट सम्राट, पाटप राण प्रतापसीं. (१९)
अकबर घोर अंधार, उंघांणां हिन्दु अवर ;
जाग्यो जगदाधार, पहोरे राण प्रतापसीं. (२०)
अकबरीये एकार, दागल कैं सारी दणी ;
अण दागल असवार, पोहव रह्यो प्रतापसीं. (२१)
अकबर कने अनेक, नम नम निसर्या नरपती ;
अणनम रहियो एक, पणधर राण प्रतापसीं. (२२)
अकबर है अंगार, जाळे हिन्दु नृप जले ;
माथे मेघ मल्हार, प्राछट दिये प्रतापसीं. (२३)
अकबर मारग आठ, जवन रोक राखे जगत ;
परम धरम जस पाठ, पीठीयो राण प्रतापसीं. (२४)
आपे अकबर आण, थाप उथापे ओ थीरा ;
बापे रावल बाण, तापे राण प्रतापसीं. (२५)
है अकबर घर हाण, डाण ग्रहे नीची दिसट ;
तजे न उंची ताण, पौरस राण प्रतापसीं. (२६)
जग जाडा जुहार, अकबर पग चांपे अधिप ;
गौ राखण गुंजार, पिले रदय प्रापसीं. (२७)
अकबर जग उफाण, तंग करण भेजे तुरक ;
राणावत रीढ राण, पह न तजे प्रतापसीं. (२८)
कर खुशामद कुर, किंकर कंजुस कुंकरा ;
दुरस खुशामद दुर, पारख गुणी प्रतापसीं. (२९)
हल्दीघाटी हरोळ, घमंड करण अरी घणा ;
आरण करण अडोल, पहोच्यो राण प्रतापसीं. (३०)
थीर नृप हिन्दुस्तान, ला तरगा मग लोभ लग ;
माता पुंजी मान, पुजे राण प्रतापसीं. (३१)
सेला अरी समान, धारा तिरथ में धसे ;
देव धरम रण दान, पुरट शरीर प्रतापसीं. (३२)
ढग अकबर दल ढाण, अग अग जगडे आथडे ;
मग मग पाडे माण, पग पग राण प्रतापसीं. (३३)
दळ जो दिल्ली हुंत, अकबर चढीयो एकदम ;
राण रसिक रण रूह, पलटे किम प्रतापसीं. (३४)
चित मरण रण चाय, अकबर आधिनी विना ;
पराधिन पद पाय, पुनी न जीवे प्रतापसीं. (३५)
तुरक हिन्दवा ताण, अकबर लागे एकठा ;
राख्यो राणे माण, पाणा बल प्रतापसीं. (३६)
अकबर मच्छ अयाण, पुंछ उछालण बल प्रबल ;
गोहिल वत गहेराण, पाथोनीधी प्रतापसीं. (३७)
गोहिल कुळ धन गाढ, लेवण अकबर लालची ;
कोडी दिये ना काढ, पणधर राण प्रतापसीं. (३८)
नित गुध लावण नीर, कुंभी सम अकबर क्रमे ;
गोहिल राण गंभीर, पण न गुंधले प्रतापसीं. (३९)
अकबर दल अप्रमाण, उदयनेर घेरे अनय ;
खागां बल खुमाण, पेले दलां प्रतापसीं. (४०)
दे बारी सुर द्वार, अकबरशा पडियो असुर ;
लडियो भड ललकार, प्रोलां खोल प्रतापसीं. (४१)
उठे रीड अपार, पींठ लग लागां प्रिस ;
बेढीगार बकार, पेठो नगर प्रतापसीं. (४२)
रोक अकबर राह, ले हिन्दुं कुकर लखां ;
विभरतो वराह, पाडे घणा प्रतापसीं. (४३)
देखे अकबर दुर, घेरा दे दुश्मन घणा ;
सांगाहर रण सुर, पेड न खसे प्रतापसीं. (४४)
अकबर तलके आप, फते करण चारो तरफ ;
पण राणो प्रताप, हाथ न चढे हमीरहर. (४५)
अकबर दुरग अनेक, फते किया नीज फौज सु ;
अचल चले न एक, पाधर राण प्रतापसीं. (४६)
दुविधा अकबर देख, किण विध सु घायल करे ;
पवंगा उपर पेख, पाखर राण प्रतापसीं. (४७)
हिरदे उणा होत, सिर धुणा अकबर सदा ;
दिन दुणा देशोत, पुणा वहे न प्रतापसीं. (४८)
कलपे अकबर काय, गुणी पुगी धर गौडीया ;
मणीधर साबड मांय, पडे न राण प्रतापसीं. (४९)
मही दाबण मेवाड, राड चाड अकबर रचे ;
विषे विसायत वाड, प्रथुल वाड प्रतापसीं. (५०)
बंध्यो अकबर बेर, रसत घेर रोके रीपुं ;
कन्द मुल फल केर, पावे राण प्रतापसीं. (५१)
भागे सागे भोम, अमृत लागे उभरा ;
अकबर तल आराम, पेखे राण प्रतापसीं. (५२)
अकबर जिसा अनेक, आव पडे अनेक अरी ;
असली तजे न एक, पकडी टेक प्रतापसीं. (५३)
लांघण कर लंकाळ, सादुळो भुखो सुवे ;
कुल वट छोड क्रोधाळ, पैड न देत प्रतापसीं. (५४)
अकबर मेगल अच्छ, मांजर दळ घुमे मसत ;
पंचानन पल भच्छ, पट केछडा प्रतापसीं. (५५)
दंतीसळ सु दुर, अकबर आवे एकलो ;
चौडे रण चकचुर, पलमें करे प्रतापसीं. (५६)
चितमें गढ चितोड, राणा रे खटके रयण ;
अकबर पुनरो ओड, पेले दोड प्रतापसीं. (५७)
अकबर करे अफंड, मद प्रचंड मारग मले ;
आरज भाण अखंड, प्रभुता राण प्रतापसीं. (५८)
घट सु औघट घाट, घडीयो अकबर ते घणो ;
ईण चंदन उप्रवाट, परीमल उठी प्रतापसीं. (५९)
बडी विपत सह बीर, बडी किरत खाटी बसु ;
धरम धुरंधर धीर, पौरुष घनो प्रतापसीं. (६०)
अकबर जतन अपार, रात दिवस रोके करे ;
पंगी समदा पार, पुगी राण प्रतापसीं. (६१)
वसुधा कुल विख्यात, समरथ कुल सीसोदिया ;
राणा जसरी रात, प्रगट्यो राण भलां प्रतापसीं.
(६२)
जीणरो जस जग मांही, ईणरो धन जग जीवणो ;
नेडो अपयश नाही,प्रणधर राण प्रतापसीं. (६३)
अजरामर धन एह, जस रह जावे जगतमें ;
दु:ख सुख दोनुं देह, पणीए सुपन प्रतापसीं. (६४)
अकबर जासी आप, दिल्ली पासी दुसरा ;
पुनरासी प्रताप, सुजन जीसी सुरमा. (६५)
सफल जनम सदतार, सफल जोगी सुरमा ;
सफल जोगी भवसार, पुर त्रय प्रभा प्रतापसीं.
(६६)
सारी वात सुजाण, गुण सागर ग्राहक गुणा ;
आयोडो अवसाण, पांतरेयो नह प्रतापसीं. (६७)
छत्रधारी छत्र छांह, धरमधार सोयो धरा ;
बांह ग्रहयारी बांह, प्रत नतजे प्रतापसीं. (६८)
अंतिम येह उपाय, विसंभर न विसारीये ;
साथे धरम सहाय, पल पल राण प्रतापसीं. (६९)
मनरी मनरे मांही, अकबर रहेसी एक ज ;
नरवर करीये नांही, पुरण राण प्रतापसीं. (७०)
अकबर साहत आस, अंब खास जांखे अधम ;
नांखे रदय निसास, पास न राण प्रतापसीं. (७१)
मनमें अकबर मोद, कलमां बिच धारे न कुट ;
सपना में सीसोद, पले न राण प्रतापसीं. (७२)
कहैजो अकबर काह, सेंधव कुंजर सामटा ;
बांसे से तरबांह, पंजर थया प्रतापसीं. (७३)
चारण वरण चितार, कारण लख महिमा करी ;
धारण कीजे धार, परम उदार प्रतापसीं. (७४)
आभा जगत उदार, भारत वरस भवान भुज ;
आतम सम आधार, पृथ्वी राण प्रतापसीं. (७५)
काव्य यथारथ कीध, बिण स्वारथ साची बिरद ;
देह अविचल दिध, पंगी रूप प्रतापसीं. (७६)

आवड आखें आशिया

Rao GumanSingh Guman singh

दुर्गादास छिहोतरी

Rao GumanSingh Guman singh

डिंगल शतक

Rao GumanSingh Guman singh

मीठा मीर कृत

Rao GumanSingh Guman singh

प्रताप रा दूहा- मीठा मीर डभाळ

Rao GumanSingh Guman singh

हिन्दुआ सुरज महाराणा प्रताप रा दुहा

Rao GumanSingh Guman singh

ऐकारू पातल आय , दिल्ली पतशाह दाखवे !!
ले हिन्दुआ सुरज महाराणा प्रताप रा दुहा वूं म्हैं कंठ लगाय , परम वीर ज पातला !!१!!
भलै कैई आया भूपती , अकबर कदमां आय !!
पड़े नह कबहू पाय , प्राण जठा तक पातलो !!२!!
मांनै सगळां महपती , कबूल आधीनता कीन !!
पण न मांने प्रतापसी , प्रणधर  रांण प्रवीन!!३!!
अकबर रौष कर आवियो , करे बहू मन क्रौध !!
नमावूं मेवाड़ी नाथ ने , दिके महा भड़ जौध !!४!!
अपार संग ले आवियो , सज सैना समराथ !!
पड़ीयो हाथां प्रताप रे , मुगल नमायो माथ !!५!!
चैतक थे डाबे चाड़ेया , के मुगलां रा कंध !!
पाळेयो रांण प्रतापसी , सुरज वंश सबंध !!६!!
धमरोळया घोड़ां धके , दे अरियां सीर दौड़ !!
छत्रपती रांण सिसोदियो , मेवाड़ो जग मौड़ !!७!!
रजवट धर रखवाळ हैं , धजबंध वंको धींग !!
जुझयो पण झुकयो नहीं , तेह एसो तरसिंग !!८!!

मीठा मीर डभाल

कानदासजी मेहडु कृत हनुमान वंदना

Rao GumanSingh Guman singh

सुरस्वती उजळ अती, वळि उजळी वाण।
करु प्रणाम जुगति कर, बाळाजती बखाण॥1॥

अंश रुद्र अगियारमो, समरथ पुत्र समीर।
नीर निधि पर तीर नट,कुदि गयो क्षण वीर॥ 2 ॥

खावण द्रोणाचळ खमै, समै न धारण शंक।
वाळण सुध सीता वळै, लिवि प्रजाळै लंक॥ 3 ॥

पंचवटी वन पालटी, सीत हरण शोधंत।
अपरम शंके धाहियो, हेत करै हडमंत॥ 4॥

छंद त्रिभंगी ।
मन हेत धरंगी, हरस उमंगी, प्रेम तुरंगी, परसंगी।
सुग्रीव सथंगी, प्रेम पथंगी, शाम शोरंगी, करसंगी।
दसकंध दुरंगी, झुंबै झंगी, भड राखस जड थड भंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 1 ॥
अवधेश उदासी, सीत हरासी, शोक धरासी, सन्यासी।
अणबखत अक्रासी, बोल बंधासी, लंक विळासी, सवळासी।
अंजनी रुद्राशी, कमर कसंसी, साहर त्रासी, तौरंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 2 ॥
करजोड कठाणं, पाव प्रमाणं, दधि प्रमाणं, भरडाणं।
भचकै रथ भाणं, धरा ध्रुजाणं, शेष समाणं साताणं।
गढलंक ग्रहाणं, एक उडाणं, पोच जवाणं, प्रेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 3 ॥
हलकार हतूरं, फौज फतूरं, सायर पूरं संपूरं।
कर रुप करुरं,वध वकरुरं, त्रहकै घोरं, रणतूरं।
जोधा सह जुरं, जुध्ध जलुरं, आगैवानं, ओपंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 4 ॥
आसो अलबेली, बाग बणेली, घटा घणेली, गहरेली।
चौकोर भरेली, फूल चमेली, लता सुगंधी, लहरेली।
अंजनि कर एली, सबै सहेली,होम हवेली, होमंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 5॥
नल नील तेडाया, गरव न माया सबै बुलाया, सब आया।
पाषाण मंगाया, पास पठाया, सब बंदर लारे लाया।
पर मारग पाया, राम रिझाया, हनुए धाया, हेतंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 6॥
लखणेश लडातं, सैन धडातं, मुरछा घातं, मधरातं।
साजा घडी सातं, वैद वदातं, प्राण छंडातं, परभातं।
जोधा सम जातं, जोर न मातं, ले हाथं बीडो लंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 7॥
हडमत हुंकारं, अनड अपारं, भुजबळ डारं, भभकारं।
कर रुप कराळं, विध विकराळं, द्रोण उठारं, निरधारं।
अमरं लीलारं, भार अढारं, लखण उगारं, दधि लंघी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी॥ 8 ॥
सिंदूर सखंडं, भळळ भखंडं, तेल प्रचंडं, अतडंडं।
किय हार हसंडं, अनड अखंडं, भारथ डंडं, भुडंडं।
चारण कुळ चंडं, वैरि विहंडं , प्रणवै कानड कवि पंगी।
रामं अनुरंगी, सीत सुधंगी, बिरद उमंगी, बजरंगी ॥ 9॥

Narpatdan Charan Kaviraj:
डिंगळ री डणकार से सादर त्रिभंगी छंद ।

डिंगळ री डणकार- श्री कैलाशदानजी चारण झांकळी- बाड़मेर.

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शृंगारु दूहा

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नरपतदानजी खाण

मेहायी महाराज- नरपतदान जी खाण

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माँ मोगल- नरपतदान जी खाण

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कुरजां- नरपतदान जी खाण

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प्रताप पच्चीसी- अजयदान जी लखाजी रोहिडिया

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गढपत दियो दांतिया गाम...

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परणे वरजंग जेसळपर परथम।
दत हथ लाख खरचीया दाम।।
वेणा सामैये राव वेणा ने।
गढपत दियो दांतिया गाम।।
संवत चौद वरस सोनताले।
परबळ किनो लाख पसाव।।
तांबा पत्र कियो तिह वेणा।
रंग बलु मसरीका राव।।
शाख दिवाण दरगेश करी सही।
वणे शाख भाटी वेरीशाळ।।
राव मालदे काको रजवट।
वणी दीनी घोड़ा री वाळ।।
छत उजळ वध्यो जश सुरा।
भडा शिरामण आखे भूप।।
राजन दान दिया कुळ राव।
अण पर कीरत वधी अनूप।।

सांचोर परगना के राव वरजंगजी की जेसलमेर शादी होने के बाद बारात वापिस आने पर दांतिया गांव सांसण में वेणाजी राव को तांबा पत्र लिखकर दिया था। उसकी कुछ विगत हाथ लगी। तो आपसे शेयर की जाए। कुछ त्रुटिया भी हो सकती है। कुछ लोगों के मुंह से सुनकर लिखी है।

बाळमजी ने जाय ने कहजौ..

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श्री नरपतदान आशियां निवासी खांण
तहसील रेवदर जिला सिरोही द्वारा विरचित रचना

म्हैं खत थानै..

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श्री नरपतदान आशियां निवासी खांण
तहसील रेवदर जिला सिरोही द्वारा विरचित रचना

रजपूताणी

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पीयू कायर पधारिया अरियों आगळ भाग।
फट जावे धरा धसूं मिल जावे गर माग।।

हूं खप जाती खग तले, हूं कट जाती उण ठौड़।
बोटी बोटी बिखरती पण रहती रण राठौड़।।

हेली राजमहल रा दीपक दो बुजाय।
उजासो किणने अजसे पीव घर आया धाय।।

राठौड़ा किम रण थने भायो नहीं भरतार।
थे रहवो रंग महल में, मन देवो तलवार।।

राठौड़ रण सूं भागयो शोभे नहीं सुभट्ट।
इण कायरता उपेर रोवे अब रजवट।।

हिवड़ो खूब हरकतो जे आतो कट शीश।
सतियां भेली शोभती सुणो मरूधरधीश।।

साभार:- कविवर श्री हनुवन्तसिंघ देवड़ा पुस्तक का नाम "सिंहनाद"

युद्ध री चढ़ाई

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Maharana Raj Singh Mewar
मद झरता केइ दे रहया मातंग मचोला।
बापूकारे तोइ भरे पग होला होला।।
उडे तुरंग आकाश में ज्यूं उडण खटोला।
करभ हालिया धरमपण ज्यां बेग अतोला।।
सोहड़ चढिय़ा साथ में सीहां सा टोला।
केसरिया कीधा किता के अम्बर धोला।।
घूमे मतवाला जठे अमलां छक छोला।
वणे वीर कायर कई मासा अर तोला।।
खुलिया सहनायां तणा पांना दलदोला।
त्रंबक मोटा गड़ गड़े दल पीठ अडोला।।
रखवाला संग हालिया चढ़ शंकर भोला।
फोज रूप में जांनरा यूं थटे हबोला।।

डिंगल छन्द "नीसाणी"

ऐड़ी करी आजाद- कविवर श्री हणवन्तसिंग देवड़ा

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Late Shri Hanwant Singh Deora
thikana- Raniwara Khurd
छुक हुआ दो दिल रा नित की मार फसाद।
कूट नितिज्ञ कांग्रेसियों ऐड़ी करी आजाद।।

बिलके नितकी बेटियां चौड़े लूटे सोहाग।
फट कायरां फूट रिया भारत वाला भाग।।

हिन्दुओं पर हाले हमें तुर्को री तलवार।
अजरालों जागो अबे विणती बारमवार।।

चोटी वालों सिर काटणों जांणे छोटो खेल।
भावलपुर में भाईड़ों रोकी तुर्को रेल।।

बिलखे बहनों बापड़ी नैणों सांवण भाद।
कियो आच्छोरे कायरों भारत ने आजाद।।

कायर पूतों नित ही कियो व्यथी घणो बकवाद।
अन्न अन्न करे आदमी ऐड़ा हुआ आजाद।।

हिन्दुओं रे हित रो कियो किसे दिन काम।
ईज्जत सत्ता आबरू नित ही हणे निजाम।।

चमको खाग चितौड़ री भबको जौहर ज्वाल।
लपकों अरियां उपरे उमड़ो रगतों खाल।।

अहिंसा गांधी आपरी रही मांने रूलाय।
हिमालय परा हालजों घाल कमण्डल मांय।।

पाकिस्तान लेने मिंया रयो नाहक रीज।
जिन्ना यूं मत जाणजे बलगयो हिन्दू बीज।।

साभार:- कविवर श्री हणवन्तसिंग देवड़ा पुस्तक का नाम "सिंहनाद" 
प्रकाशन:- १३.११.१९४७ आजादी के बाद हुए घटनाक्रम पर आधारित रचित सिंहनाद की पुस्तक को भारत सरकार ने प्रतिबंधित किया था। एक दुर्लभ प्रति मेरे पास सुरक्षित है। 
(संकलन- राव गुमानसिंग राणीवाड़ा-जालोर-मारवाड़)