गरब गनीमा गालणी, दुज्जण दलणी रंग।
भारथ भवा भगीरथी, रंग क्रपाणी रंग।।
परचौं देवण में प्रचंड, अडतां पैलै आप।
सैणा मण सरसावणी, दुसमण दलणी दाप।।
चपळा सम चमकै चपळ, हण अरियण रण हुंत।
खट खग खल दल खौल दे, करामत कर कूंत।।
(हे खडग।
तू ही प्रत्यक्ष शक्ति है। तू ही शत्रुओं के गर्व का चूर्ण करने वाली है और तू ही उन्हें प्रतिहत करने वाली है। स्पर्श होते ही तू प्रत्यक्ष चमत्कार दिखाने में समर्थ है तथा मित्रों की सहायक और शत्रुओं की शत्रु है। दुश्मनों के दर्प का दमन करने वाली है। समर भूमि में शत्रु सैन्य के संधी स्थलों को खटकी ध्वनी से खोल देने वाली तथा उन पर बिजली की भांती चमक कर प्रहार करने में सशक्त शक्ति तू ही है)
वीतै दिन ज्यूं मास।
दरसण दे अब वादळी
मत मुरधर नै तास॥
आस लगायां मुरधरा
देख रही दिन रात।
भागी आ तूं वादळी
आयी रुत वरसात॥
कोरां-कोरां धोरियां
डूंगां डूंगां डैर।
आव रमां अे वादळी
ले-ले मुरधर ल्हैर॥
ग्रीखम रुत दाझी धरा
कळप रही दिन-रात।
मेह मिलावण वादळी
वरस वरस वरसात॥
नहीं नदी नाळा अठै
नहिं सरवर सरसाय।
एक आसरो वादळी
मरु सूकी मत जाय॥
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Posted By AAPNI BHASHA - AAPNI BAAT to AAPNI BHASHA-AAPNI BAAT at 7/16/2010 07:13:00 AM
Posted By AAPNI BHASHA - AAPNI BAAT to AAPNI BHASHA-AAPNI BAAT at 7/13/2010 02:22:00 AM
कोई घोडो कोई पुरखडों, कोई सतसंगी नार।
सरजण हारे सिरजिया, तीनूं रतन संसार।।
जौधाणे री कामणी, गोखां काढै गात।
मन तो देवां रा डिगै, मिनखा कितीक बात।।
जोधाणो जसराज रो, खूबी करे खलक्क।
खावण पीवण गांठ रो, देखण री हलक्क।।
मारु थारा देस में, निपजे तीन रतन।
एक ढोला दूजी मारवण, तीजो कसूमल व्रन्न।।
खग धारां थोड़ां नरां, सिमट भरयो सह पाण।
इण थी मुरधर तरळ जळ, पाताळां परवांण।।
आया आया रे
मोरू भाई पांवणा
कांई आगे धोरा वाळो देश
बीरो बणजारो रे
कांई आया म्हारा देवर जेठ
बीरो बणजारो रे
सासू रांध्या रे मोरू भाई बांकळा
म्हारी नणद बिलोवे खाटी छाछ
बीरो बणजारो रे
मंगरिया उंछाळू रे
मोरू भाई बांकळा
नदिया में लिमोऊं खाटी छाछ
बीरो बणजारो रे
माथा धोऊं रे
मोरू भाई मेट सूं
कांई घालूं चमेली रो तेल
बीरो बणजारो रे
राणा प्रताप आजादी का, अपराजित काल विधायक है।।
वह अजर अमरता का गौरव, वह मानवता का विजय तूर्य।
आदर्शों के दुर्गम पथ को, आलोकित करता हुआ सूर्य।।
राणा प्रताप की खुद्दारी, भारत माता की पूंजी है।
ये वो धरती है जहां कभी, चेतक की टापें गूंजी है।।
पत्थर-पत्थर में जागा था, विक्रमी तेज बलिदानी का।
जय एकलिंग का ज्वार जगा, जागा था खड्ग भवानी का।।
लासानी वतन परस्ती का, वह वीर धधकता शोला था।
हल्दीघाटी का महासमर, मजहब से बढकर बोला था।।
राणा प्रताप की कर्मशक्ति, गंगा का पावन नीर हुई।
राणा प्रताप की देशभक्ति, पत्थर की अमिट लकीर हुई।
समराँगण में अरियों तक से, इस योद्धा ने छल नहीं किया।
सम्मान बेचकर जीवन का, कोई सपना हल नहीं किया।।
मिट्टी पर मिटने वालों ने, अब तक जिसका अनुगमन किया।
राणा प्रताप के भाले को, हिमगिरि ने झुककर नमन किया।।
प्रण की गरिमा का सूत्रधार, आसिन्धु धरा सत्कार हुआ।
राणा प्रताप का भारत की, धरती पर जयजयकार हुआ।
नान्हो सो अमरयो चीख पड़्यो राणा रो सोयो दुख जाग्यो।
हूं लड़्यो घणो हूं सह्यो घणो
मेवाड़ी मान बचावण नै
हूं पाछ नहीं राखी रण में
बैरयाँ री खात खिंडावण में,
जद याद करूं हळदी घाटी नैणां में रगत उतर आवै,
सुख दुख रो साथी चेतकड़ो सूती सी हूक जगा ज्यावै,
पण आज बिलखतो देखूं हूं
जद राज कंवर नै रोटी नै,
तो क्षात्र-धरम नै भूलूं हूं
भूलूं हिंदवाणी चोटी नै
मै'लां में छप्पन भोग जका मनवार बिनां करता कोनी,
सोनै री थाळ्यां नीलम रै बाजोट बिनां धरता कोनी,
ऐ हाय जका करता पगल्या
फूलां री कंवळी सेजां पर,
बै आज रुळै भूखा तिसिया
हिंदवाणै सूरज रा टाबर,
आ सोच हुई दो टूक तड़क राणा री भीम बजर छाती,
आंख्यां में आंसू भर बोल्या मैं लिखस्यूं अकबर नै पाती,
पण लिखूं कियां जद देखै है आडावळ ऊंचो हियो लियां,
चितौड़ खड़्यो है मगरां में विकराळ भूत सी लियां छियां,
मैं झुकूं कियां? है आण मनैं
कुळ रा केसरिया बानां री,
मैं बुझूं कियां हूं सेस लपट
आजादी रै परवानां री,
पण फेर अमर री सुण बुसक्यां राणा रो हिवड़ो भर आयो,
मैं मानूं हूं दिल्लीस तनैं समराट् सनेशो कैवायो।
राणा रो कागद बांच हुयो अकबर रो' सपनूं सो सांचो,
पण नैण करयो बिसवास नहीं जद बांच बांच नै फिर बांच्यो,
कै आज हिंमाळो पिघळ बह्यो
कै आज हुयो सूरज सीतळ,
कै आज सेस रो सिर डोल्यो
आ सोच हुयो समराट् विकळ,
बस दूत इसारो पा भाज्यो पीथळ नै तुरत बुलावण नै,
किरणां रो पीथळ आ पूग्यो ओ सांचो भरम मिटावण नै,
बीं वीर बांकुड़ै पीथळ नै
रजपूती गौरव भारी हो,
बो क्षात्र धरम रो नेमी हो
राणा रो प्रेम पुजारी हो,
बैरयाँ रै मन रो कांटो हो बीकाणूं पूत खरारो हो,
राठौड़ रणां में रातो हो बस सागी तेज दुधारो हो,
आ बात पातस्या जाणै हो
घावां पर लूण लगावण नै,
पीथळ नै तुरत बुलायो हो
राणा री हार बंचावण नै,
म्हे बांध लियो है पीथळ सुण पिंजरै में जंगळी शेर पकड़,
ओ देख हाथ रो कागद है तूं देखां फिरसी कियां अकड़?
मर डूब चळू भर पाणी में
बस झूठा गाल बजावै हो,
पण टूट गयो बीं राणा रो
तूं भाट बण्यो बिड़दावै हो,
मैं आज पातस्या धरती रो मेवाड़ी पाग पगां में है,
अब बता मनै किण रजवट रै रजपूती खून रगां में है?
जद पीथळ कागद ले देखी
राणा री सागी सैनाणी,
नीचै स्यूं धरती खसक गई
आंख्यां में आयो भर पाणी,
पण फेर कही ततकाल संभळ आ बात सफा ही झूठी है,
राणा री पाघ सदा ऊंची राणा री आण अटूटी है।
ल्यो हुकम हुवै तो लिख पूछूं
राणा नै कागद रै खातर,
लै पूछ भलांई पीथळ तूं
आ बात सही, बोल्यो अकबर,
म्हे आज सुणी है नाहरियो
स्याळां रै सागै सोवैलो,
म्हे आज सुणी है सूरजड़ो
बादळ री ओटां खोवैलो,
म्हे आज सुणी है चातगड़ो
धरती रो पाणी पीवैलो,
म्हे आज सुणी है हाथीड़ो
कूकर री जूणां जीवैलो,
म्हे आज सुणी है थकां खसम
अब रांड हुवैली रजपूती,
म्हे आज सुणी है म्यानां में
तरवार रवैली अब सूती,
तो म्हांरो हिवड़ो कांपै है मूंछ्यां री मोड़ मरोड़ गई,
पीथळ राणा नै लिख भेज्यो, आ बात कठै तक गिणां सही?
पीथळ रा आखर पढ़तां ही
राणा री आंख्यां लाल हुई,
धिक्कार मनै हूं कायर हूं
नाहर री एक दकाल हुई,
हूं भूख मरूं हूं प्यास मरूं
मेवाड़ धरा आजाद रवै
हूं घोर उजाड़ां में भटकूं
पण मन में मां री याद रवै,
हूं रजपूतण रो जायो हूं रजपूती करज चुकाऊंला,
ओ सीस पड़ै पण पाघ नहीं दिल्ली रो मान झुकाऊंला,
पीथळ के खिमता बादळ री
जो रोकै सूर उगाळी नै,
सिंघां री हाथळ सह लेवै
बा कूख मिली कद स्याळी नै?
धरती रो पाणी पिवै इसी
चातग री चूंच बणी कोनी,
कूकर री जूणां जिवै इसी
हाथी री बात सुणी कोनी,
आं हाथां में तरवार थकां
कुण रांड कवै है रजपूती?
म्यानां रै बदळै बैरयाँ री
छात्यां में रैवैली सूती,
मेवाड़ धधकतो अंगारो आंध्यां में चमचम चमकैलो,
कड़खै री उठती तानां पर पग पग पर खांडो खड़कैलो,
राखो थे मूंछ्यां ऐंठ्योड़ी
लोही री नदी बहा द्यूंला,
हूं अथक लड़ूंला अकबर स्यूं
उजड़्यो मेवाड़ बसा द्यूंला,
जद राणा रो संदेश गयो पीथळ री छाती दूणी ही,
हिंदवाणों सूरज चमकै हो अकबर री दुनियां सूनी ही।
राजस्थानी हु प्रेम करणीया चावे तो, ब्याव-शादी री कूकू पत्री राजस्थानी मा छीपा सके |
इऊ आपणो अर् आपणी भासा रो मान बधसी| घणी मेनत हु इक कू-कू पत्री लाधी,
बीरो नमूणौ देऊ हु ।
< ईष्ट देब रो मंतर >
श्री ****** री घणी किरपा हु
<बींद रो नाम >
<बाप-दादा रो नाम अर् ठिकाणौ>
व
<बधू रो नाम >
<बधू रा बाप-दादा रो नाम अर् ठिकाणौ >
रो शुभ-ब्याव
<मास बार तारीख > न होवाणों तय हुयो हे ।
म्हे हाथ जोढर घणेमाण हु आपणे अरज करा के ब्याव रे इण
मांगलिक ठाणे माथे राज रे पधारिया ही म्हारी शोभा व्हेलासा ।
*ब्याव रा नेगचार *
बान <तारीख > <समय >
भात <> <>
सामेळो <**> <**>
<बच्योडा कार्य-करम >
ठाणो : <कालोनी , शहर >
<जान रो ढूकबा रो समय >
पधारण री बाट जोवता
<बींद रे बडा रो नाम >
दर्शाणा रा कोडारू
<बींद रे बिराओ रो नाम >
दर्शाणा न उडिकता
<बींद रे ठेठू आला रो नाम >
Rajasthani Vaata
पिया सूं मलबां गांव चली, म्हारे पग में पड ग्या छाला रे।
रिमझिम........
भरी ज्वानी म्हांने छोड गया क्यूं, जोबन का रखवाला रे।
सोलह बरस की रही कुंवारी, अब तो कर मुकलावां रे।
रिमझिम...........
घणी र दूर सूं आई सजनवां, थांसू मिलवा रातां रे।
हाथ पकड म्हांने निकां बिठाया, कान में कर गया बातां रे।
रिमझिम.......
हिरा वैरागर हुएं, चारण मारु देस।
भाट फिटक संखोटिया, कोहमी सकळ परवेश।।
जो न जळमतो जोगडो, तो कुण आ रीझ करंत।
मांगण मेढीं बैल ज्यूं, मूंडो बांध मरंत।।
जोगो किणी न जोग, सजोगो कियो सकव।
लाठा चारण लोग, तारण कुल सत्रियां तणौं।
नदी बहतों जाय, साद ज सांगरिएं दियो।
केजो म्हारी मांय ने, कवि ने देवे कांबळी।।
इसर री आवाज, सांगा जळ थळ सांभलै।
कांबळ दैवण काज, वैगो कर जळ वीस वयंण।।
सांगो गौड़ सिरै, थासू यदुनाथ ठाकरां।
इणरी रीस न थाय, दे उणरा देवळ चढै।।
दिनी रजा यदुनाथ, सांगा ने बाछां समेत।
राखी पथ मरजाद, सेवक इसरदास री।।
पूछो ना म्हे कितरा सोरा हां दादा।
निज भाषा बिना भोत दोरा हां दादा।।
कमावणो आप रो बतावणो दूजां रो।
परबस होयोड़ा ढिंढोरा हां दादा।।
अंतस में अळकत, है मोकळी बातां।
मनड़ै री मन में ई मोरां हां दादा।।
राज री भाषा अचपळी कूकर बोलां।
जूण अबोली सारी टोरां हां दादा।।
न्याव आडी भाषा ऊभी कूकर मांगां।
अन्याव आगै कद सैंजोरा हां दादा।।
ओम पुरोहित 'कागद'
जोधपुर में मारवाड़ी बोली जाती है, कोटा में हाडोती, जयपुर में ढूंढाड़ी, पूर्वी राजस्थान में ब्रज, मेवात में मेवाती, मेवाड़ में मेवाड़ी, शेखावाटी में शेखावाटी, ऎसी स्थिति में राजस्थानी भाष्ाा किसे माना जाएगा और शिक्षा का माध्यम किसे बनाया जाएगा? कुछ ऎसे ही सवाल गुरूवार को आर्य समाज और नागरिक परिष्ाद् की ओर से वैदिक कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में आयोजित एक चर्चा मे उठाए गए।
इसमें राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस पानाचंद जैन ने कहा, राजस्थानी भाष्ाा को शिक्षा का माध्यम बनाना असंवैधानिक है, क्योंकि संविधान की 8वीं सूची में केवल अहिंदी भाष्ााओं को ही रखा जा सकता है न कि बोलियों या हिंदी भाष्ाा को जबकि राजस्थान में या तो हिंदी है या विभिन्न बोलियां।
राजस्थान की एकता के लिए और विभिन्न बोलियां बोलने वाले जन समुदाय को एक सूत्र में बांधने के लिए सर्व सम्मति से हिंदी को शिक्षा का माध्यम बनाया गया था। राजस्थानी को शिक्षा का माध्यम बनाने का विवाद खड़ा कर राजस्थान को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
पूर्व आईएएस अघिकारी सत्यनारायण सिंह का कहना था कि बोलियों के माध्यम से विश्व में कहीं भी कोई शिक्षा नहीं दी जाती है। केंद्रीय सेवाओं, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, बैंक आदि संस्थानों में हिंदी और अंग्रेजी जानने वाले लोगों को नौकरी दी जाती है। क्या बोलियों से प्राप्त ज्ञान के आधार पर राजस्थान की नई पीढ़ी को रोजगार मिल सकेगा? राजस्थान में हमेशा से शिक्षा और राजकाज की भाष्ाा हिंदी ही रही है, फिर आज इसे बदलने की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है।
आर्य प्रतिनिघि सभा के कार्यकारी प्रधान सत्यव्रत सामवेदी का मानना था कि प्रदेश में सभी प्रांत के लोग रहते हैं और सभी राष्ट्रभाष्ाा हिंदी तो समझते हैं लेकिन राजस्थान की बोलियों को नहीं। ऎसे में शिक्षा का माध्यम हिंदी से अलग किसी और भाष्ाा या बोली को कैसे बनाया जा सकता है।
स्वतंत्र भारत में शिक्षा को लेकर गठित हुए कमोबेश सभी आयोगों ने अपनी अपनी सिफारिशों में शुरूआती शिक्षा मातृभाषा में देने की बात कही है। अनिवार्य शिक्षा विधेयक ने एक बार फिर इस आवश्यकता को रेखांकित किया है। राजस्थान में मातृभाषा में शिक्षण का मुद्दा इसलिये विवादित हो चला है कि राजस्थानियों की मातृभाषा राजस्थानी को अभी तक संवैधानिक मान्यता नहीं मिली है। मान्यता के विरोधी राजस्थान की विविध बोलियों की स्वरूपगत विविधता को लेकर सवाल खड़ा कर रहे हैं कि जिस राजस्थानी का कोई मानक स्वरूप नहीं है, उसे यदि संवैधानिक मान्यता कैसे दी जानी चाहिये। आश्चर्यजनक बात यह है कि मानक स्वरूप का सवाल उस भाषा के लिये खड़ा किया जा रहा है, जिस भाषा की राजस्थान में अपनी एक अकादमी है, केन्द्रीय साहित्य अकादमी हर साल जिस भाषा में सृजनात्मक लेखन को देश की अन्य प्रमुख भाषाओं के साथ पुरस्कृत करती है, जिस भाषा को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर वैकल्पिक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है और देश -दुनिया के अनेक विश्वविद्यालयों में जिस भाषा में अध्ययन और शोधकार्य हो रहे हैं। स्पष्ट है कि मान्यता का विरोध दरअसल भाषा का विरोध नहीं, स्वार्थों का विरोध है।
राजनीतिक दृष्टि से हमारे दौर में यदि किसी व्यक्ति के कार्यालय को दुनिया का सर्वाधिक शक्ति संपन्न कार्यालय के बारे में चर्चा की जाये तो स्वाभाविक तौर पर अमरीकी राष्ट्रपति के कार्यालय का उल्लेख होगा। कुछ समय पहले जारी एक विज्ञप्ति में अमरीकी राष्ट्रपति के कार्यालय में मनोनयन के लिये जिन भाषाओं के ज्ञान को वरीयता देने की बात कही गई, उनमें राजस्थानी भी एक है। मूल विज्ञप्ति में राजस्थानी के लिये मारवाड़ी शब्द का उपयोग किया गया है। उल्लेखनीय है कि मारवाड़ी राजस्थानी भाषा की एक प्रमुख बोली है और मारवाड़ अंचल के व्यापारियों के व्यापक कारोबारी प्रभाव के कारण अक्सर राजस्थानी को मारवाड़ी कह दिया जाता है। मारवाड़ी के साथ ही ढूढाड़ी, वागड़ी, हाड़ौती, मेवाड़ी, मेवाती जैसी बोलियां अपनी तमाम उपबोलियों के साथ राजस्थानी के गौरव की संवाहक भी हैं, और पहचान भी। बोलियों के रूप में परिवर्तन के बारे में तो राजस्थानी में एक कहावत भी प्रचलित है- ‘बारह कोसां बोली पलटे, बनफल पलटे पाकाँ/ बरस छत्तीसा जोबन पलटे, लखण न पलटे लाखाँ ।’
अमरीकी राष्ट्रपति के कार्यालय ने राजस्थानी भाषा की क्षमता को मान्यता उस समय दी, जबकि राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की मांग अपने चरम पर है। हमारे संविधान निर्माताओं ने जन महत्व की भाषाओं को संवैधानिक मान्यता देने के लिये ही संविधान में आठवीं अनुसूची की व्यवस्था की है। लोकतंत्र की महत्ता इस बात में भी है कि वह जनता की आवाज़ को बुलंद करने वाली भाषाओं की ताकत को पहचानता भी है और स्वीकार भी करता है। लोकतंत्र ही क्या, दुनिया की हर राजनीतिक व्यवस्था में लोकभाषाओं की ताकत को स्वीकार किया जाता है। औपनिवेशिक शासनों में इसीलिये शासित राज्यों में शासक शासितों के भाषाई और सांस्कृतिक गौरव का अवमूल्यन करने की हर संभव कोशिश करते थे। इस संत्रास को भारत ने भी झेला है। औपनिवेशिक ताकतों की इसी साज़िश को पहचानते हुए खड़ी बोली के जनक माने जाने वाले भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने भारत के पहले स्वातंत्र्य संघर्ष के दिनों में ही लिखा था - निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल। अपनी भाषा की उन्नति ही सर्वतोमुखी उन्नति का आधार है।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने जब ‘निज भाषा ’ की बात की थी तो उनका मंतव्य भी यही था कि लोक अपनी ताकत को पहचाने। एक भाषा के तौर पर राजस्थानी लोक के प्रति अपने दायित्वों को आज भी बखूबी निभा रही है। व्हाइट हाउस की विज्ञप्ति में राजस्थानी को मान्यता इसका प्रमाण है। दरअसल यह विज्ञप्ति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान के निवासियों की योग्यता को भी रेखांकित करती है और एक सामर्थ्यवान भाषा के तौर पर राजस्थानी की क्षमता को भी । विसंगति यह है कि इसी राजस्थानी भाषा को भारत के ही संविधान की आठवीं सूची में शमिल किये जाने की मांग दशकों पुरानी होने के बावजूद आज तक पूरी नहीं हो सकी है। डा. कनहेया लाल सेठिया तो - खाली धड़ री कद हुवै, चैरे बिन पिछाण / मायड़ भासा रे बिना क्यां रो राजस्थान ’ कहते कहते ही हमेशा के लिये मौन हो गये। राजस्थान की संस्कृति के गौरव गायक सेठिया का यह दोहा राजस्थानी की मान्यता के संघर्ष का प्रतिनिधि बन गया है।
बेशक राजस्थानी में बोलीगत वैविध्य है, लेकिन यह विविधता ही भाषा को समृद्व करती है। कया हम में से कोई भी यह दावा कर सकता है कि वह हिन्दी के नाम पर जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहा है, वह हिन्दी के मानक स्वरूप की अनुगामिनी है। चेकोस्लोवाकिया के हिन्दी विद्वान डॉ. ओदोलन स्मेकल जब पहली बार भारत आये थे तो उन्होंने निराशापूर्वक कहा था कि मैं जिस भाषा को सीखकर यहाँ आया था, उसे सुनने के लिये तरस गया। दरअसल भाषाएँ तो एक नदी की तरह होती हैं। निरंतर प्रवाह उनके स्वरूप को परिवर्तित करता ही है। हिन्दी का मानक स्वरूप संस्कृत निष्ठ है लेकिन आज हिन्दी में अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी ही नहीं पुर्तगाली तक के शब्दों का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। भाषा की यह लोचशीलता ही उसे व्यापक बनाती है। आज भी अंग्रेजी के सर्वाधिक मान्य शब्दकोषों में एक ‘आक्सफोर्ड डिक्शनरी ’ में हर साल कुछ विदेशी भाषाओं के बहुप्रचलित शब्दों को शामिल किया जाता है। जहाँ तक राजस्थानी के मानक स्वरूप का सवाल है राजस्थानी के प्राचीन ग्रंथों की भाषा हमारे लिये अनुकरणीय हो सकती है। राजस्थानी का पहला उपन्यास कनक सुंदर करीब एक सौ दस साल पहले हैदराबाद से छपा था। उससे भी पहले सन् 1857 में बूँदी के राजकवि सूर्यमल्ल मिश्रण ने अपने साथियों को जो पत्र लिखे थे या फिर उससे भी करीब चार सदी पहले गागरौन के शिवदास गाडण ने ‘अचलदास खींची री वचनिका ’ नाम से जो पुस्तक लिखी थी, उन सबकी भाषाओं में अद्भुत साम्य है। इन सबने संबंध कारक का/के/की के स्थान पर रा/रे /री का और है/ था के स्थान पर छा/छै/ छी का प्रयोग किया है। बोलियों को समाज मुखलाघव के सिद्वांत के तौर पर इस्तेमाल करता है लेकिन इसे भाषा के मूल स्वरूप पर प्रश्नविन्ह के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिये। क्या मुंबई में बोली जाने वाली हिन्दी और पटना में बोली जाने वाली हिन्दी में कोई अंतर नहीं है? क्या किशोरवय लड़कियों में अत्यधिक लोकप्रिय रहे बार्बरा कार्टलैण्ड के उपन्यासों की अंग्रेजी भाषा को नीरद सी. चैधरी की क्लासिक अंग्रेजी के साथ रखा जा सकता है?
राशिद आरिफ का एक शेर है -‘‘ मेरी अल्लाह से बस इतनी दुआ है राशिद / मैं जो उर्दू में वसीअत लिखूँ, बेटा पढ़ ले। ’’ राजस्थान के करोड़ों राजस्थानी भाषी भी ऐसा ही कोई सपना संजोते हैं तो क्या यह उनका अधिकार नहीं है?
(पूर्व संचालिका सदस्य- राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति अकादमी, बीकानेर
प्रदेश मत्री:- अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति.38 ए 30, महावीर नगर-विस्तार,कोटा (राजस्थान)
आखी दुनिया मानै कै राजस्थानी भासा इण धरती री सबसूं विशाळ साहित्यक भासा है. तमिल अर राजस्थानी दो भासा एड़ी है जिणनै अगर भारत मांय राष्ट्रभासा रौ दरजौ देरीजै तौ ईं कम है.राजस्थान रै तीन विद्यापिठां (Universities) जोधाणा, बिकाणा अर उदैपर मांय इणनै भणावै अर साथै साथै प्राईवेट इंस्टिट्यूट वाळा ईं भणावै.
राजस्थानी री भणाई आप अमेरीका, ब्रिटेन या रुस मांय कर सकौ.राजस्थानी भासा नै अमेरीका मांय ओफिसियल भासा (राजभासा) रौ दरजौ मिळ्यौड़ौ है साथै साथै संयुक्त राष्ट्र मांय ई इण भासा नै मानता है.
आप अमेरीका मांय राजस्थानी मांय अरजी दे सकौ या कोई काम काज करवा सकौ, पण राजस्थान सरकार या आपणी भारत सरकार एड़ौ करणीया नै देसद्रोही (हिंदी विरोधी) मानै अर एड़ा मिनख री अरजी ना मंजुर करिजै इण तर्क रै माथै कै इण भासा नै सांवैधानीक मान्यता कोनीं
आप संयुक्त राष्ट्रसंघ (United Nations) मांय राजस्थानी मांय बोल सकौ पण राजस्थान री विधान सभा मांय राजस्थानी बोलण सूं रोकीजै.कित्तौ बरदास्त करांला.. आपणां खुद रा नेता आपणी भासा बोलता संकौ करै.विरभुमी राजस्थान, जठै मरणै नै तैवार मानीजै उण धरती रै लोगां नै औ कांई व्है ग्यौ ??
क्यूं अठै रा लोगां रौ रगत पाणी बण ग्यौ ?
क्यूं राजस्थान रा विर सुरमा हिजड़ा बण ग्या ?
सोचो, कांई आपणौ भविष्य है... सब जागा अंधारौ इज अंधारौ देखीजै.
जै राजस्थान! जै राजस्थांनी!!
Hanvant Rajpurohit
Bhaskar News
जयपुर. राजस्थानी भाषा के गौरव और समृद्धि की अहमियत को सोवियत रूस जैसे बड़े देश तक ने समझा लेकिन हम नहीं समझ पाए। तत्कालीन सोवियत रूस के लेखक बोरिस आई क्लूयेव सहित कई विद्वानों ने 70 के दशक में राजस्थानी भाषा पर शोध कर इसके समग्र स्वरूप को मान्यता देने की वकालत की थी।
बोरिस ने राजस्थानी की विभिन्न बोलियों पर अपने शोध में कहा था कि राजस्थान में भाषा स्थिति इतनी जटिल नहीं है जितनी पहली बार में दिखाई देती है। इसके अलावा राजस्थानी भाषा की आंचलिक बोलियों के आधार पर राजस्थानी के स्वरूप को बिगाड़ने और इसमें विभेद पैदा करने की कोशिशों को भी गलत बताया है।
क्लूयेव ने स्वतंत्र भारत
जातीय तथा भाषाई समस्या विषय पर शोध शुरू किया तो राजस्थानी ने उन्हें बेहद प्रभावित किया। उन्होंने राजस्थान में संजाति—भाषायी प्रक्रियाएं शोध में साफ लिखा, राजस्थानी की विभिन्न बोलियों में से ज्यादातर एक ही बोली समूह की हैं। इन बोलियों की पुरानी साहित्यिक परंपराएं हैं। प्राचीन मरू भाषा से डिंगल के साहित्य और से अब तक राजस्थानी ने साहित्यिक भाषा के प्रमुख पड़ाव तय किए हैं।
1961 की भाषाई जनगणना के अनुसार राजस्थानी को अपनी मातृभाषा बताने वालों की संख्या 1.50 करोड़ थी। राजस्थानी बोलने वालों की राजस्थान के बाहर भी अच्छी खासी तादाद है। संख्या के हिसाब से राजस्थानी देश की 12वीं प्रमुख भाषा है और 1961 की जनगणना में भाषाई गणना के हिसाब से भारत की प्रमुख भाषाओं के कम में इसे 12वें पायदान पर रखा गया। इसमें राजस्थान में रहने वाले 80 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा राजस्थानी बताई गई है।
रूसी शोध में भी प्रमुख था मान्यता का मुद्दा
राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग का जिक्र रूसी विद्वान के शोध में भी था। राजस्थानी को 60 के दशक से राजभाषा की मान्यता देने की मांग उठाई जा रही है।
करणीसिंह ने लोकसभा में रखा था विधेयक
बीकानेर सांसद और पूर्व राजा करणीसिंह ने 1980 में राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए एक विधेयक लोकसभा में विचारार्थ रखा था। उस समय इस विधेयक पर बहस हुई और लोकसभा में यह 92 के विरुद्ध 38 मतों से गिर गया। तब से लेकर राजस्थानी को मान्यता का मुद्दा अभी अनिर्णीत ही है।
राजस्थानी ने लुभाया इन रूसी विद्वानों को
एल.वी. खोखोव : राजस्थान में प्रयुक्त हिंदी और राजस्थानी भाषाएं- सामाजिक तथा वैज्ञानिक अनुसंधान का अनुभव (शोध प्रबंध 1974, मास्को)।
लुई एसेले : भारत के चित्र 1977 (मास्को)










